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                <title>Farmers News - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Farmers News RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>Farmers News: खरीफ सीजन में डीएपी की आपूर्ति तेज, सरसा के 300 किसानों को मिली खाद</title>
                                    <description><![CDATA[खरीफ सीजन के दौरान किसानों को समय पर डीएपी खाद उपलब्ध कराने के लिए कृषि विभाग ने आपूर्ति व्यवस्था तेज कर दी है। शुक्रवार को इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) का 800 मीट्रिक टन डीएपी खाद का नया रैक सरसा पहुंचने के बाद शनिवार को अनाज मंडी स्थित सरकारी वितरण केंद्र पर टोकन प्रणाली के माध्यम से किसानों को खाद वितरित की गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/farmers-news-dap-supply-increased-in-kharif-season-300-farmers/article-89087"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-08/dap-distributed.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Farmers News: सरसा, (सच कहूँ/सुनील वर्मा)। खरीफ सीजन के दौरान किसानों को समय पर डीएपी खाद उपलब्ध कराने के लिए कृषि विभाग ने आपूर्ति व्यवस्था तेज कर दी है। शुक्रवार को इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) का 800 मीट्रिक टन डीएपी खाद का नया रैक सरसा पहुंचने के बाद शनिवार को अनाज मंडी स्थित सरकारी वितरण केंद्र पर टोकन प्रणाली के माध्यम से किसानों को खाद वितरित की गई। वितरण व्यवस्था को सुव्यवस्थित रखने के लिए पहले किसानों के टोकन जारी किए गए, जिसके बाद उन्हें निर्धारित मात्रा में डीएपी उपलब्ध कराई गई। Sirsa News</p>
<p style="text-align:justify;">शनिवार सुबह अनाज मंडी स्थित 13 नंबर पैक्स सेल प्वाइंट पर करीब 300 किसानों के टोकन काटे गए। प्रत्येक किसान को पांच-पांच कट्टे डीएपी खाद दी गई। टोकन प्रणाली के चलते वितरण के दौरान न तो अव्यवस्था देखने को मिली और न ही किसानों को लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा। कृषि विभाग के अधिकारियों ने पूरे वितरण कार्य की निगरानी की, जिससे प्रक्रिया शांतिपूर्वक संपन्न हुई। कृषि विभाग के अनुसार चालू खरीफ सीजन में जिले में अब तक कुल 11,300 मीट्रिक टन डीएपी खाद की आपूर्ति हो चुकी है। जिले में पूरे सीजन के दौरान करीब 42 हजार मीट्रिक टन डीएपी की आवश्यकता रहती है। </p>
<h3 style="text-align:justify;">60:40 अनुपात में हो रहा वितरण</h3>
<p style="text-align:justify;">विभाग की ओर से डीएपी खाद का वितरण निर्धारित 60:40 अनुपात के तहत किया जा रहा है। इसके अनुसार 60 प्रतिशत खाद प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पैक्स) के माध्यम से तथा 40 प्रतिशत अधिकृत निजी विक्रेताओं के जरिए किसानों तक पहुंचाई जा रही है। पिछले वर्षों की तुलना में इस बार डीएपी खाद को लेकर अफरा-तफरी की स्थिति देखने को नहीं मिल रही है। न ही सरकारी केंद्रों पर लंबी कतारें लग रही हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं। Sirsa News</p>
<p style="text-align:justify;">पहला, अधिकांश किसानों ने जनवरी और फरवरी माह में ही डीएपी खाद का पर्याप्त भंडारण कर लिया था। दूसरा, जिले में अब तक सामान्य से कम बारिश होने के कारण कई क्षेत्रों में बुवाई की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी रही है, जिससे फिलहाल डीएपी की मांग भी नियंत्रित बनी हुई है। विभाग लगातार खाद की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था पर नजर बनाए हुए है।</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि विभाग के क्यूसीआई अमित कुमार ने बताया कि जिले में किसानों के वितरण के लिए आईपीएल की 800 मीट्रिक टन डीएपी खाद पहुंच चुकी है। शनिवार को सरसा के जनता भवन रोड स्थित पैक्स सेल प्वाइंट पर टोकन प्रणाली के माध्यम से करीब 300 किसानों को डीएपी खाद वितरित की गई। विभाग का प्रयास है कि सभी पात्र किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराई जाए और आवश्यकता के अनुसार आगे भी डीएपी की आपूर्ति जारी रखी जाएगी। Sirsa News</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 15:30:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Agricultural News: पॉलीहाउस खेती से बढ़ाएं मुनाफा जानें शिमला मिर्च, चेरी टमाटर और बिना बीज वाले खीरे की उन्नत खेती</title>
                                    <description><![CDATA[पॉलीहाउस और नेट हाउस में शिमला मिर्च, चेरी टमाटर, बिना बीज वाले खीरे और उन्नत बैंगन की वैज्ञानिक खेती से अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा कैसे प्राप्त करें। जानें पौध तैयार करने की तकनीक, उन्नत किस्में और विशेषज्ञों की सलाह।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/agricultural-news-increase-profits-from-polyhouse-farming-know-advanced-cultivation/article-88963"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/polyhouse-agriculture.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. संदीप सिंहमार</strong><br /></p><p style="text-align:justify;">बदलते समय के साथ सब्जी उत्पादन में भी आधुनिक तकनीकों का महत्व बढ़ रहा है। पारंपरिक खेती के साथ अब किसान पॉलीहाउस और नेट हाउस जैसी संरक्षित खेती अपनाकर कम जोखिम में अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। बाजार में रंगीन शिमला मिर्च, चेरी टमाटर, बिना बीज वाले खीरे और उन्नत बैंगन जैसी उच्च मूल्य वाली सब्जियों की मांग लगातार बढ़ रही है। इन फसलों को गुणवत्तापूर्ण तरीके से तैयार करने पर किसानों को सामान्य सब्जियों की तुलना में बेहतर कीमत मिल सकती है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के सब्जी विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार, वैज्ञानिक तकनीकों से तैयार पौधों में रोगों का खतरा कम रहता है और उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है। जुलाई और अगस्त का समय संरक्षित खेती के लिए पौध तैयार करने और नए चक्र की शुरूआत के लिए उपयुक्त माना जाता है। Agricultural News<br /></p><h3 style="text-align:justify;">ट्रे में तैयार करें पौध: <br /></h3><p style="text-align:justify;">पॉलीहाउस में बेहतर उत्पादन के लिए पौध तैयार करने की प्रक्रिया भी वैज्ञानिक तरीके से की जाती है। सामान्य मिट्टी में पौध तैयार करने की बजाय 99 खानों वाली काली प्लास्टिक ट्रे का उपयोग किया जाता है। इसमें कोकोपीट, परलाइट और वमीर्कुलाइट जैसे माध्यमों का प्रयोग किया जाता है, जिससे पौध को पर्याप्त हवा, नमी और पोषक तत्व मिलते हैं। प्रत्येक खाने में एक बीज बोया जाता है और लगभग 30 से 35 दिन में रोपाई योग्य पौध तैयार हो जाती है। तैयार पौध को 1 अगस्त से 15 सितंबर के बीच पॉलीहाउस या नेट हाउस में लगाया जा सकता है। जो किसान अगस्त के मध्य तक रोपाई कर लेते हैं, उन्हें फसल से जल्दी उत्पादन मिलने की संभावना रहती है। Agricultural News<br /></p><h3 style="text-align:justify;">शिमला मिर्च व टमाटर की उन्नत किस्में बढ़ाएंगी लाभ<br /></h3><p style="text-align:justify;">शिमला मिर्च की खेती में रंगीन किस्में किसानों को बेहतर बाजार मूल्य दिला सकती हैं। पीली और संतरी शिमला मिर्च में नेटा आॅरेंज, मिलीना, बचाटा, एनएस-281, औरोविले और कामोश जैसी किस्में उपयोगी मानी जाती हैं। वहीं हरी शिमला मिर्च के लिए इंदिरा, आशा, पसरेला, पालाडीन, कावेरी और अरिस्टोटल जैसी किस्में बेहतर विकल्प हो सकती हैं। लाल रंग की शिमला मिर्च में इंस्पिरेशन, बोम्बी, एनएस-280 और शीलिन जैसी किस्मों का चयन किया जा सकता है। टमाटर उत्पादन में भी अच्छी किस्मों का चुनाव जरूरी है। एनएस-4266, हिमसोना, हिमशिखर, नोवारा, लीडरटन, टॉलस्टॉय और एनएस-4190 जैसी हाइब्रिड किस्में अधिक उत्पादन देने वाली मानी जाती हैं। चेरी टमाटर में रोजा, शीजा, पंजाब सोना, मैस्कोटैल, पंजाब केसर, रूही और गोल्डी जैसी किस्में बाजार में पसंद की जाती हैं।<br /></p><h3 style="text-align:justify;">खीरे से जल्दी मिलेगा उत्पादन<br /></h3><p style="text-align:justify;">बिना बीज वाले खीरे की खेती में किसानों को पौध तैयार करने की आवश्यकता नहीं होती। इसके बीज सीधे संरक्षित क्षेत्र या खेत में लगाए जा सकते हैं। 15 से 31 अगस्त के बीच बुवाई करने पर फसल सामान्य समय से करीब 15 से 20 दिन पहले तुड़ाई के लिए तैयार हो सकती है। खीरे की उन्नत किस्मों में सनस्टार, किंग स्टार, ईमिल स्टार, मल्टीस्टार, फाल्कोन स्टार, कैप्टन स्टार और हिल्टन जैसी किस्में शामिल हैं। इनकी बाजार में मांग अच्छी बनी रहती है। Agricultural News<br /></p><h3 style="text-align:justify;">इन बातों का रखें ध्यान<br /></h3><ul><li style="text-align:justify;">पौध हमेशा प्रमाणित और गुणवत्तापूर्ण बीज से तैयार करें।</li><li style="text-align:justify;">पॉलीहाउस में तापमान और नमी का संतुलन बनाए रखें।</li><li style="text-align:justify;">सिंचाई के लिए टपक प्रणाली अपनाना लाभकारी रहता है।</li><li style="text-align:justify;">समय-समय पर रोग और कीट की निगरानी करते रहें।</li><li style="text-align:justify;">बाजार की मांग के अनुसार किस्मों का चयन करें।</li></ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:54:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुलाबी सुंडी से बचाएंगे फेरोमोन ट्रैप, किसानों को समय रहते निगरानी की सलाह</title>
                                    <description><![CDATA[गुलाबी सुंडी से बचाएंगे फेरोमोन ट्रैप, किसानों को समय रहते निगरानी की सलाह]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/pheromone-traps-will-save-from-pink-caterpillar-advice-to-farmers/article-88894"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/farmers-news1.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.sachkahoon.com/media/2026-07/farmers-news1.jpg" alt="Farmers-News" width="773" height="443"></img>
Farmers News: गुलाबी सुंडी से बचाएंगे फेरोमोन ट्रैप, किसानों को समय रहते निगरानी की सलाह

<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा, सच कहूँ/पवन कुमार।</strong> कपास की फसल को गुलाबी सुंडी से बचाने के लिए फेरोमोन ट्रैप प्रभावी साबित हो रहे हैं। किसानों के फीडबैक में भी इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। यही वजह है कि अब बड़ी संख्या में किसान अपने खेतों में फेरोमोन ट्रैप लगा रहे हैं। यह जानकारी बुधवार को भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के निर्देशन में हुए संयुक्त सर्वेक्षण के दौरान सामने आई। क्षेत्रीय एकीकृत नाशी जीव प्रबंधन केंद्र (आरसीआईपीएमसी), फरीदाबाद और संयुक्त कृषि निदेशक (कपास) सरसा की टीम ने जिले के विभिन्न क्षेत्रों में कपास की फसल का निरीक्षण किया। संयुक्त कृषि निदेशक (कपास) डॉ. आत्मा राम गोदारा ने बताया कि सरसा, फतेहाबाद, हिसार, हांसी, भिवानी, चरखी दादरी और जींद जिलों में करीब 120 फेरोमोन ट्रैप लगाए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन किसानों ने इनका प्रयोग किया, उन्होंने गुलाबी सुंडी की निगरानी और नियंत्रण में बेहतर परिणाम मिलने की बात कही। विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी कि वे प्रति एकड़ 4 से 5 फेरोमोन ट्रैप तथा रस चूसने वाले कीटों की निगरानी के लिए 20 पीले या नीले स्टिकी ट्रैप लगाएं। इससे कीटों की संख्या का समय पर पता लगाया जा सकता है और आवश्यकता होने पर ही अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए। इससे उत्पादन लागत घटेगी और अनावश्यक रसायनों के उपयोग से भी बचाव होगा। सर्वेक्षण के दौरान अधिकारियों ने किसानों को एनपीएसएस मोबाइल ऐप की जानकारी भी दी। </p>
<p style="text-align:justify;">    उन्होंने बताया कि इस ऐप के जरिए किसान फसल में लगने वाले कीट एवं रोगों की पहचान, निगरानी और नियंत्रण संबंधी वैज्ञानिक सलाह तुरंत प्राप्त कर सकते हैं। टीम ने निरीक्षण के दौरान पाया कि फिलहाल कपास में गुलाबी सुंडी और अन्य कीटों का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर (ईटीएल) से नीचे है। ऐसे में किसानों को घबराने के बजाय नियमित निगरानी और एकीकृत नाशी जीव प्रबंधन तकनीकों को अपनाने की सलाह दी गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 10:16:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खजूर से बढ़ेगी किसानों की आय! प्रशिक्षण में सिखाए गए लड्डू, शरबत, अचार, माउथ फ्रेशनर, केक, बिस्कुट आदि बनाने के गुर</title>
                                    <description><![CDATA[दो दिवसीय प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को खजूर से लड्डू, शरबत, अचार, केक, बिस्कुट सहित कई वैल्यू एडेड उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। उद्देश्य किसानों की आय और स्वरोजगार को बढ़ावा देना है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/dates-will-increase-farmers-income-modern-methods-of-making-laddu/article-88825"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/palm-training.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बीकानेर (हि.स.)। खजूर उत्पादकों और उद्यमिता से जुड़ने के इच्छुक प्रतिभागियों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ। इस प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को खजूर के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन से जुड़े विभिन्न उत्पाद तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया, जिससे कृषि उत्पादों का बेहतर उपयोग कर अतिरिक्त आय अर्जित करने की संभावनाओं पर जोर दिया गया। Agricultural Training</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रम में 37 प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें खजूर से लड्डू, शरबत, अचार, माउथ फ्रेशनर, बिस्कुट, केक, छुहारा, पिंड सहित अनेक मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की व्यवहारिक तकनीक सिखाई गई। विशेषज्ञों ने उत्पाद निर्माण के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता, पैकेजिंग और बाजार की संभावनाओं की भी जानकारी दी।</p>
<p style="text-align:justify;">समापन समारोह में अनुसंधान निदेशक डॉ. एन. के. शर्मा ने कहा कि प्रदेश में खजूर की खेती का विस्तार लगातार हो रहा है। ऐसे में किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित न रहकर प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि बदलते मौसम और प्राकृतिक जोखिमों को देखते हुए किसानों के लिए आय के वैकल्पिक स्रोत विकसित करना समय की आवश्यकता है। Agricultural Training</p>
<p style="text-align:justify;">प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. राजेंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने अलग-अलग उत्पादों के निर्माण की तकनीकों का प्रदर्शन किया। प्रतिभागियों को खाद्य सुरक्षा मानकों और व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन की आवश्यक जानकारी भी दी गई, ताकि वे भविष्य में इसे स्वरोजगार के रूप में विकसित कर सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">उद्यान विभाग के अधिकारियों ने कहा कि खजूर आधारित आकर्षक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के विकास के साथ यदि प्रभावी विपणन रणनीति अपनाई जाए तो किसानों और स्वयं सहायता समूहों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">राजीविका से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण महिलाओं, युवाओं और स्वयं सहायता समूहों को लघु उद्योग स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और कृषि आधारित उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन किसानों की आय बढ़ाने, फसल की बर्बादी कम करने और बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। Agricultural Training</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 17:14:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Agricultural News: जानें, बीज रहित बैंगन की खेती कैसे करें, किसानों को मिलेगा अधिक लाभ</title>
                                    <description><![CDATA[पॉलीहाउस में बीज रहित बैंगन की खेती किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बन रही है। जानें रोपाई का सही समय, सिंचाई, पोषण, कीट नियंत्रण और अधिक उत्पादन के वैज्ञानिक उपाय।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/agricultural-news-know-how-to-cultivate-seedless-brinjal-farmers-will/article-88618"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/brinjal-farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Seedless Brinjal Farming: हिसार। बदलते मौसम, अनिश्चित वर्षा और बढ़ती कृषि लागत के बीच पॉलीहाउस में बीज रहित बैंगन की खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का प्रभावी विकल्प बनकर सामने आ रही है। संरक्षित वातावरण में की जाने वाली इस खेती से फसल को तेज गर्मी, अत्यधिक वर्षा, ठंडी हवाओं और अन्य प्रतिकूल मौसम की परिस्थितियों से सुरक्षा मिलती है। Agricultural News</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर किसान लंबे समय तक गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जुलाई और अगस्त में पौध रोपाई करने पर सितंबर-अक्टूबर में फूल आने शुरू हो जाते हैं, जबकि अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से फल तुड़ाई शुरू हो जाती है। इसके बाद नवंबर से मार्च तक लगातार उत्पादन मिलने से किसानों को नियमित आमदनी प्राप्त होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि बेहतर उत्पादन के लिए रोगमुक्त और मजबूत पौध तैयार करना आवश्यक है। इसके लिए मिट्टी रहित माध्यम (Soilless Media) का उपयोग अधिक उपयुक्त माना जाता है। उन्नत संकर किस्मों के पौधे लगभग एक माह में रोपाई योग्य हो जाते हैं। रोपाई से पहले जड़ों का जैविक फफूंदनाशकों से उपचार करने पर शुरुआती रोगों की संभावना काफी कम हो जाती है। Agricultural News</p>
<h3 style="text-align:justify;">जिग-जैग रोपाई और ड्रिप सिंचाई से बढ़ती है गुणवत्ता</h3>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों की सलाह है कि उठी हुई क्यारियों में जिग-जैग पद्धति से पौध लगाने पर पौधों को पर्याप्त धूप और वायु मिलती है, जिससे रोगों का प्रकोप कम होता है और फल अधिक आकर्षक बनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पॉलीहाउस में ड्रिप सिंचाई प्रणाली सबसे प्रभावी मानी जाती है। इसी माध्यम से पानी में घुलनशील उर्वरकों की आपूर्ति करने पर पौधों को संतुलित पोषण मिलता है। इससे फल का आकार, रंग और चमक बेहतर होती है, साथ ही पानी की बचत भी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का कहना है कि समय-समय पर पुरानी, कमजोर और रोगग्रस्त शाखाओं की छंटाई करने से नई शाखाएं विकसित होती हैं। इससे पौधों की उत्पादक क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है और लगातार तुड़ाई संभव होती है। Agricultural News</p>
<h3 style="text-align:justify;">कीट एवं रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान जरूरी</h3>
<p style="text-align:justify;">संरक्षित खेती में भी सफेद मक्खी तथा अन्य रस चूसने वाले कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनके नियंत्रण के लिए पीले चिपचिपे ट्रैप प्रभावी माने जाते हैं। इसके अलावा नियमित निरीक्षण, संक्रमित भागों को हटाना तथा जैविक नियंत्रण उपाय अपनाने से रासायनिक दवाओं की आवश्यकता कम हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बीज रहित बैंगन की गुणवत्ता और बाजार में इसकी बढ़ती मांग के कारण किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहती है। एक बार फसल स्थापित होने के बाद कई महीनों तक नियमित तुड़ाई होने से यह खेती कम समय में अधिक लाभ देने वाली तकनीकों में शामिल होती जा रही है। Agricultural News</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 12:49:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हर पशुपालक के लिए जरूरी है ईयर टैग, जानिए इसके बड़े लाभ</title>
                                    <description><![CDATA[हर पशुपालक के लिए जरूरी है ईयर टैग, जानिए इसके बड़े लाभ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/ear-tag-is-necessary-for-every-animal-owner-know-its/article-88255"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/farmers-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>भगत सिंह, चौपटा। </strong>आज पशुपालन किसानों की आय बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऐसे में हर पशु की सही पहचान और उसका पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखना पहले से अधिक जरूरी हो गया है। इसी उद्देश्य से ईयर टैग व्यवस्था लागू की गई है। यह छोटा-सा टैग पशु को एक स्थायी डिजिटल पहचान प्रदान करता है, जिससे उसके स्वास्थ्य, टीकाकरण, बीमा और अन्य जरूरी जानकारियों का रिकॉर्ड आसानी से सुरक्षित रखा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कैसे करता है काम: ईयर टैग मजबूत प्लास्टिक या विशेष सामग्री से बनाया जाता है और इसे प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा पशु के कान में लगाया जाता है। इस पर अंकित यूनिक पहचान संख्या पूरे देश में केवल उसी पशु के लिए होती है। इस नंबर के माध्यम से पशु की नस्ल, आयु, टीकाकरण, उपचार और प्रजनन संबंधी जानकारी डिजिटल प्रणाली में दर्ज रहती है। यही कारण है कि इसे पशुओं के ‘आधार’ के रूप में भी देखा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बीमा में मिलेगी सुविधा: यदि किसी दुधारू पशु का बीमा कराया गया है, तो ईयर टैग उसकी पहचान का सबसे विश्वसनीय प्रमाण बनता है। बीमारी, दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में बीमा कंपनी आसानी से पुष्टि कर सकती है कि दावा उसी पशु से जुड़ा है। इससे क्लेम प्रक्रिया तेज होती है, पारदर्शिता बनी रहती है और फर्जी दावों की संभावना काफी कम हो जाती है। </p>
<p style="text-align:justify;">खोए पशु की पहचान: कई बार पशु चरते समय भटक जाते हैं या चोरी हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में ईयर टैग मालिक तक पहुंचने का सबसे आसान माध्यम बन जाता है। यदि पशु किसी अन्य गांव या जिले में मिलता है, तो उसके कान में लगे यूनिक नंबर के आधार पर उसकी पहचान कर मालिक से संपर्क किया जा सकता है। इससे पशुओं की चोरी पर नियंत्रण रखने और उन्हें वापस दिलाने में भी मदद मिलती है।<br />सरकारी योजनाओं का लाभ: केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर पशुपालकों के लिए बीमा, टीकाकरण, नस्ल सुधार, सब्सिडी और पशुधन विकास जैसी कई योजनाएं संचालित करती हैं। इन योजनाओं का लाभ लेने के लिए पशुओं का पंजीकरण आवश्यक होता है। ईयर टैग लगे होने पर पशु की पहचान पहले से दर्ज रहती है, जिससे आवेदन प्रक्रिया आसान हो जाती है और सरकारी सहायता सही लाभार्थियों तक पहुंचाने में सुविधा मिलती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 15:58:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Groundnut Farming: वैज्ञानिक तरीके से करें मूंगफली की खेती, बढ़ाएं मुनाफा</title>
                                    <description><![CDATA[मूंगफली देश की प्रमुख तिलहनी फसलों में शामिल है, जिसकी खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम मानी जाती है। यदि इसकी बुवाई उचित समय और वैज्ञानिक विधि से की जाए, तो कम लागत में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ मौसम में मूंगफली की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करना सबसे उपयुक्त रहता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/groundnut-farming-cultivate-groundnut-scientifically-and-increase-profits/article-88089"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/nut-farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मूंगफली देश की प्रमुख तिलहनी फसलों में शामिल है, जिसकी खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम मानी जाती है। यदि इसकी बुवाई उचित समय और वैज्ञानिक विधि से की जाए, तो कम लागत में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ मौसम में मूंगफली की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करना सबसे उपयुक्त रहता है। इस अवधि में भूमि में पर्याप्त नमी उपलब्ध होने के कारण बीजों का अंकुरण समान रूप से होता है और पौधों का विकास भी तेजी से होता है। Groundnut Farming</p>
<p style="text-align:justify;">उन्नत उत्पादन के लिए किसानों को प्रमाणित एवं उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए। एमएच-4 तथा पंजाब मूंगफली नंबर-1 जैसी उन्नत किस्में अधिक उपज देने के साथ रोगों के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील मानी जाती हैं। बुवाई के समय कतार से कतार की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर रखना लाभदायक होता है। वहीं पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने से उन्हें पर्याप्त पोषण, धूप और वायु मिलती है, जिससे फसल का विकास बेहतर होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छे उत्पादन के लिए संतुलित पोषण प्रबंधन भी अत्यंत आवश्यक है। खेत की तैयारी के दौरान मृदा परीक्षण के आधार पर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश तथा जिंक जैसे पोषक तत्वों का उपयोग करना चाहिए। साथ ही जिप्सम का प्रयोग फली बनने की अवस्था में करने से दानों का विकास बेहतर होता है तथा कैल्शियम और सल्फर की कमी भी पूरी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">खरपतवार नियंत्रण, समय-समय पर सिंचाई (जहां आवश्यकता हो), रोग एवं कीटों की नियमित निगरानी और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार फसल प्रबंधन अपनाकर किसान मूंगफली की पैदावार और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। उचित तकनीक और आधुनिक कृषि पद्धतियों का पालन करने से यह फसल किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। Groundnut Farming</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/groundnut-farming-cultivate-groundnut-scientifically-and-increase-profits/article-88089</link>
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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 16:27:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Farmers Protest: सरसा के गांव वैदवाला में हाईटेंशन टावर पर चढ़े किसान, जानें क्या है मामला? </title>
                                    <description><![CDATA[हरियाणा के सिरसा जिले के वैदवाला गांव में भूमि मुआवजे को लेकर बुधवार को उस समय तनावपूर्ण स्थिति बन गई, जब कुछ किसान विरोध स्वरूप हाईटेंशन बिजली टावर पर चढ़ गए। किसानों के इस कदम से क्षेत्र में हड़कंप मच गया और प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा। सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/farmers-protest-farmers-climbed-the-high-tension-tower-in-village/article-87793"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/baidwala-farmers.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Farmers Protest: सरसा (सच कहूँ न्यूज़)। हरियाणा के सिरसा जिले के वैदवाला गांव में भूमि मुआवजे को लेकर बुधवार को उस समय तनावपूर्ण स्थिति बन गई, जब कुछ किसान विरोध स्वरूप हाईटेंशन बिजली टावर पर चढ़ गए। किसानों के इस कदम से क्षेत्र में हड़कंप मच गया और प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा। सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। किसी भी अप्रिय घटना से बचाव के लिए गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। अधिकारियों ने टावर पर चढ़े किसानों को सुरक्षित नीचे उतारने और बातचीत के माध्यम से स्थिति सामान्य करने के प्रयास शुरू किए। Sirsa News</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि किसान भूमि अधिग्रहण अथवा उससे जुड़े मुआवजे को लेकर अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। उनका आरोप है कि उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिला है, जिसके विरोध में उन्होंने यह कदम उठाया। तनावपूर्ण हालात को देखते हुए संबंधित परियोजना का कार्य फिलहाल रोक दिया गया है। प्रशासन लगातार किसानों से वार्ता कर समाधान निकालने का प्रयास कर रहा है। फिलहाल क्षेत्र में स्थिति पर प्रशासन की नजर बनी हुई है। पुलिस ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। वहीं, किसानों और प्रशासन के बीच बातचीत के बाद ही आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। Sirsa News</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 16:46:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Monsoon Update: राजस्थान, यूपी व उत्तराखंड वासियों के लिए ख़ुशखबरी! ''झमाझम बारिश के लिए तैयार रहें सभी'' </title>
                                    <description><![CDATA[पूर्वी राजस्थान, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में दक्षिण-पश्चिम मानसून का लंबा इंतजार अब जल्द खत्म होने वाला है। देश के कई हिस्सों में तय समय से पीछे चल रहा मानसून अब तेजी से आगे बढ़ने के संकेत दे रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttarakhand/monsoon-update-good-news-for-the-people-of-rajasthan-up/article-87429"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/sach-weather.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Monsoon Update: नई दिल्ली/हिसार (सच कहूँ/संदीप सिंहमार)। पूर्वी राजस्थान, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में दक्षिण-पश्चिम मानसून का लंबा इंतजार अब जल्द खत्म होने वाला है। देश के कई हिस्सों में तय समय से पीछे चल रहा मानसून अब तेजी से आगे बढ़ने के संकेत दे रहा है। सामान्य परिस्थितियों में मानसून 20 जून के आसपास पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में पहुंच जाता है, लेकिन इस बार इसकी रफ्तार धीमी रहने के कारण करीब 10 दिनों की देरी हुई। Monsoon News</p>
<p style="text-align:justify;">इसी वजह से दोनों राज्यों के अधिकांश हिस्सों में अब तक गर्म और उमस भरा मौसम बना हुआ है। अब मौसम की परिस्थितियां मानसून के आगे बढ़ने के लिए अनुकूल हो गई हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के ऊपर एक चक्रवाती परिसंचरण बना हुआ है। इसके साथ ही बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी से भरपूर पूर्वी हवाएं उत्तर प्रदेश के पूर्वोत्तर हिस्सों तक पहुंचने लगी हैं। इन दोनों मौसम प्रणालियों के प्रभाव से मानसून को उत्तर दिशा में तेजी से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी और आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियां बढ़ेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">मौसम प्रणाली और मजबूत होगी, जिससे उत्तर प्रदेश और उससे लगे उत्तराखंड में बारिश का दायरा और तीव्रता बढ़ेगी। 2 जुलाई तक उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों और पूरे उत्तराखंड में व्यापक मानसूनी बारिश होने की उम्मीद है। इस दौरान कुछ स्थानों पर मध्यम से भारी बारिश भी हो सकती है, जिससे इन क्षेत्रों में मानसून का प्रभावी आगमन माना जाएगा। Monsoon News</p>
<h3 style="text-align:justify;">गर्मी से मिलेगी राहत, किसानों के लिए खुशखबरी</h3>
<p style="text-align:justify;">बारिश बढ़ने के साथ ही गर्म और उमस भरे मौसम से राहत मिलने लगेगी। बादल छाने और लगातार बारिश होने से दिन के तापमान में गिरावट आएगी तथा मौसम सुहावना हो जाएगा। मानसून की देरी के कारण किसान खरीफ फसलों की बुवाई शुरू नहीं कर पा रहे थे। जुलाई के पहले सप्ताह में व्यापक बारिश होने से मिट्टी में पर्याप्त नमी आएगी, जिससे धान, मक्का, दलहन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनेंगी। उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भी जुलाई के पहले सप्ताह के दौरान कई दौर की बारिश होने की संभावना है और कुछ स्थानों पर भारी वर्षा भी दर्ज की जा सकती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">देश में तिलहन को सबसे ज्यादा नुकसान</h3>
<p style="text-align:justify;">नई दिल्ली। अल नीनो के कारण कमजोर हुए मानसून का असर अब खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ रहा है। बीते साल की तुलना में इस साल खरीफ की बुवाई करीब 54 लाख हेक्टेयर कम हुई है। इसमें सबसे बुरा हाल तिलहनी फसलों (सोयाबीन और मूंगफली) का बना हुआ है। कृषि मंत्रालय के नए आंकड़ों के अनुसार, इस साल 25 जून तक पूरे देश में फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले करीब 23 फीसदी (53.74 लाख हेक्टेयर) कम हुई है। Monsoon News</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले साल इस समय तक जहाँ करीब 236 लाख हेक्टेयर से ज्यादा खेतों में बुवाई हो चुकी थी, वहीं इस साल करीब 183 लाख हेक्टेयर खेतों में ही बिजाई हो सकी है। मौसम विभाग का पैमाना बताता है कि 30 जून तक औसत बारिश का 40 प्रतिशत पानी नहीं बरसा। जून का महीना लगभग सूखा बीतने की वजह से खेतों में नमी गायब है और बुवाई का काम काफी अटक गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सीजन की सबसे मुख्य फसल धान की बुवाई अब तक केवल 26 लाख हेक्टेयर में हो सकी है, जबकि पिछले साल इसी दौरान यह 34 लाख हेक्टेयर से ज्यादा हो चुकी थी। इस तरह धान के खेतों में लगभग 25 प्रतिशत की बड़ी कमी आई है। मोटे अनाज का रकबा चार लाख हेक्टेयर कम चल रहा है। दलहन की कुल बुवाई पिछले साल के 21 लाख हेक्टेयर से घटकर इस बार सिर्फ 15 लाख हेक्टेयर रह गई है, जो कि सीधे-सीधे 30 प्रतिशत की भारी गिरावट है। खासतौर पर अरहर, उड़द और मूंग जैसी जरूरी दालों की बुवाई बहुत पिछड़ गई है। Monsoon News</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>उत्तराखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 13:28:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Date Palm Farming: धर्मपुरी के किसानों ने रचा नया कृषि मॉडल, 100 साल तक फल देने वाली इस फल की खेती की शुरू</title>
                                    <description><![CDATA[कभी केवल इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य मध्य-पूर्वी रेगिस्तानी देशों की पहचान मानी जाने वाली खजूर (डेट पाम) की खेती अब तमिलनाडु की धरती पर भी सफलता की नई कहानी लिख रही है। धर्मपुरी और कृष्णागिरि जिलों के कई किसानों ने आधुनिक तकनीक और अपने अनुभव के दम पर खजूर की व्यावसायिक खेती शुरू कर दी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/business/farmers-of-dharmapuri-created-a-new-agricultural-model-and-started/article-87377"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-06/palm-farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">धर्मपुरी, (हि.स.)। कभी केवल इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य मध्य-पूर्वी रेगिस्तानी देशों की पहचान मानी जाने वाली खजूर (डेट पाम) की खेती अब तमिलनाडु की धरती पर भी सफलता की नई कहानी लिख रही है। धर्मपुरी और कृष्णागिरि जिलों के कई किसानों ने आधुनिक तकनीक और अपने अनुभव के दम पर खजूर की व्यावसायिक खेती शुरू कर दी है। अच्छी पैदावार और बाजार में मिलने वाले बेहतर दामों के कारण यह खेती किसानों के लिए लाभदायक साबित हो रही है। Date Palm Farming</p>
<p style="text-align:justify;">विशेष रूप से धर्मपुरी जिले के पालक्कोडु, मोरप्पूर, कंबैनल्लूर, अरियाकुलम तथा कृष्णागिरि जिले के सूलगिरि, बरगूर, कावेरीपट्टिनम और होसूर जैसे क्षेत्रों में खजूर के बाग तेजी से विकसित हो रहे हैं। इन इलाकों की अपेक्षाकृत शुष्क जलवायु और पर्याप्त धूप खजूर की खेती के लिए अनुकूल मानी जा रही है, जिसके कारण अब अधिक किसान इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मध्य-पूर्व के अनुभव से बदली किस्मत</h3>
<p style="text-align:justify;">धर्मपुरी जिले के अरियाकुलम गांव के किसान एस. निजामुद्दीन इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभरे हैं। उन्होंने कई वर्षों तक सऊदी अरब के एक खजूर फार्म में काम किया और वहीं से इस फसल की आधुनिक खेती की बारीकियां सीखीं। भारत लौटने के बाद उन्होंने तय किया कि जिस फसल ने रेगिस्तान में चमत्कार किया है, उसे अपने गांव की जमीन पर भी उगाया जा सकता है। Date Palm Farming</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने विदेशों से टिश्यू कल्चर तकनीक से तैयार खजूर के पौधे मंगवाकर प्रयोग के तौर पर खेती शुरू की। शुरुआती सफलता मिलने के बाद उन्होंने लगातार अपने बाग का विस्तार किया और आज लगभग 15 एकड़ भूमि में खजूर की खेती कर रहे हैं। उनके बाग में बर्री, मस्तूर, अम्मार, नूर, अजवा सहित 35 से अधिक किस्मों के खजूर लगाए गए हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">35 से अधिक किस्में, हर एक की अलग पहचान</h3>
<p style="text-align:justify;">दुनिया में खजूर की लगभग 3,000 से अधिक किस्में पाई जाती हैं। इनमें से कई व्यावसायिक किस्में अब धर्मपुरी की मिट्टी में भी उगाई जा रही हैं। किसान निजामुद्दीन के अनुसार, बर्री किस्म ने धर्मपुरी के अपेक्षाकृत सूखे मौसम में भी शानदार उत्पादन दिया है। वहीं नूर किस्म अपने स्वाद, मिठास और गुणवत्ता के कारण बाजार में विशेष मांग रखती है। अजवा जैसी लोकप्रिय किस्मों की भी खेती की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">खजूर के पौधे की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबी आयु है। उचित देखभाल मिलने पर एक खजूर का पेड़ कई दशकों तक लगातार फल देता है और लगभग 100 वर्षों तक उत्पादक बना रह सकता है। यही कारण है कि किसान इसे दीर्घकालिक निवेश के रूप में भी देख रहे हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">जून-जुलाई में होती है कटाई</h3>
<p style="text-align:justify;">हर वर्ष जून से खजूर की कटाई शुरू हो जाती है। इस वर्ष मौसम में बदलाव के कारण कटाई कुछ देर से शुरू हुई, लेकिन उत्पादन अच्छा मिलने की उम्मीद है। खेतों से ताजा खजूर की तुड़ाई कर उन्हें सीधे व्यापारियों को भेजा जा रहा है। Date Palm Farming</p>
<p style="text-align:justify;">कटाई के बाद स्थानीय व्यापारी सीधे बागानों से खजूर खरीदकर खुदरा बाजार तक पहुंचाते हैं। इसके अलावा दूसरे राज्यों के व्यापारी भी बड़ी संख्या में खरीदारी कर रहे हैं। किसानों के अनुसार किस्म और गुणवत्ता के आधार पर खजूर की कीमत 200 से 600 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल रही है। कुछ उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों की मांग विदेशों में भी है और इन्हें निर्यात के लिए भी खरीदा जा रहा है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मदुरै में भी सफल हो रही खेती</h3>
<p style="text-align:justify;">धर्मपुरी के अलावा मदुरै जिले के अलंगानल्लूर के निकट इडैयपट्टी गांव में भी खजूर की खेती सफल हो रही है। यहां किसान मूवेंधर ने लगभग दो एकड़ भूमि में 95 खजूर के पौधों का बाग तैयार किया है। पहले निजी कंपनी में कार्यरत रहे मूवेंधर ने नौकरी छोड़कर खेती को अपना व्यवसाय बनाया। उन्होंने पूरी तरह प्राकृतिक खेती अपनाते हुए बकरी की खाद, गोबर, गुड़ और दही जैसे जैविक पोषक तत्वों का उपयोग किया। तीन वर्ष की मेहनत के बाद अब पहली बार प्रत्येक पेड़ पर तीन से चार फल के गुच्छे आए हैं, जिससे वे काफी उत्साहित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मूवेंधर बताते हैं कि शुरुआत में खजूर की खेती आसान नहीं थी। उनकी पत्नी अमुधा और भाई ने हर कदम पर उनका साथ दिया। खजूर के पौधों में कृत्रिम परागण (हाथ से नर फूलों का पराग मादा फूलों तक पहुंचाना) करना पड़ता है। कई बार परागण की प्रक्रिया पूरी करने के बाद पेड़ों पर सफलतापूर्वक फल लगने शुरू हुए। मार्च में शुरू हुई यह प्रक्रिया अब अच्छी पैदावार के रूप में सामने आ रही है और अगस्त तक पहली फसल पूरी तरह तैयार हो जाएगी। Date Palm Farming</p>
<h3 style="text-align:justify;">किसानों के लिए बन रही नई उम्मीद</h3>
<p style="text-align:justify;">कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि तमिलनाडु के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में खजूर की खेती किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी विकल्प बन सकती है। एक बार बाग स्थापित होने के बाद लंबे समय तक उत्पादन मिलता है, रखरखाव अपेक्षाकृत कम रहता है और बाजार में मांग लगातार बनी रहती है। ऐसे में धर्मपुरी, कृष्णागिरि और मदुरै के किसानों की सफलता अन्य राज्यों के किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है। आने वाले वर्षों में यदि वैज्ञानिक तकनीक और बाजार की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध होती है, तो खजूर की खेती दक्षिण भारत की प्रमुख नकदी फसलों में अपनी मजबूत पहचान बना सकती है। Date Palm Farming</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 13:35:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Farmers News: एल नीनो से घबराएं नहीं, डटकर सामना करें! सीएम चंद्रबाबू नायडू की किसानों से बड़ी अपील</title>
                                    <description><![CDATA[आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने सोमवार को किसानों से एल नीनो जैसी प्राकृतिक चुनौती का साहसपूर्वक सामना करने की अपील की। एल नीनो एक ऐसी जलवायु संबंधी घटना है, जो सामान्य वर्षा चक्र को प्रभावित करती है। मुख्यमंत्री ने नए कृषि सीजन की शुरुआत का प्रतीक माने जाने वाले एरुवाका पूर्णिमा के अवसर पर किसानों को शुभकामनाएं दीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/farmers-news-do-not-be-afraid-of-el-nino-face/article-87331"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-06/farmer-naidu.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Farmers News: अमरावती। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने सोमवार को किसानों से एल नीनो जैसी प्राकृतिक चुनौती का साहसपूर्वक सामना करने की अपील की। एल नीनो एक ऐसी जलवायु संबंधी घटना है, जो सामान्य वर्षा चक्र को प्रभावित करती है। मुख्यमंत्री ने नए कृषि सीजन की शुरुआत का प्रतीक माने जाने वाले एरुवाका पूर्णिमा के अवसर पर किसानों को शुभकामनाएं दीं। वहीं, कृषि मंत्री के अच्चन्नायडू ने भी किसानों से एल नीनो की चुनौती का हिम्मत के साथ सामना करने की अपील की। Andhra Pradesh News</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के दिन किसान एरुवाका की परंपरा निभाते हैं। इस अवसर पर वे भूमि और पशुधन की पूजा करते हैं तथा स्वयं को प्रकृति के साथ जोड़ते हैं। उन्होंने कहा, "मैं प्रार्थना करता हूं कि किसानों के घर भरपूर फसल की खुशियों से रोशन हों। हम उस भूमि में जन्मे हैं, जहां प्रकृति की पूजा की जाती है और हम उन परंपराओं का सम्मान करते हैं। आइए, प्राकृतिक खेती को अपनाकर अपनी भूमि और स्वास्थ्य को विषैले तत्वों से सुरक्षित रखें।"</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री ने कहा कि गठबंधन सरकार कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए हमेशा सक्रिय कदम उठाएगी। इसी क्रम में अन्नदाता सुखीभव योजना के तहत सरकार ने पीएम किसान की राशि किसानों के खातों में जमा कर उनका सहयोग किया है। उन्होंने कहा, "मुझे उम्मीद है कि किसान एल नीनो और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से उत्पन्न चुनौतियों पर विजय प्राप्त करेंगे। सरकार की सलाह और दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए वे सफल खेती करेंगे और बेहतर उत्पादन हासिल करेंगे।" Andhra Pradesh News</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि मंत्री के.अच्चन्नायडू ने विजयवाड़ा स्थित कनक दुर्गा मंदिर में राज्य के किसानों की समृद्धि के लिए पूजा-अर्चना की। इस दौरान अच्छी फसल, अधिक उत्पादन और किसानों को बेहतर लाभ मिलने की कामना करते हुए विशेष प्रार्थनाएं की गईं। कृषि मंत्री ने कहा कि खरीफ सीजन के लिए आवश्यक उर्वरक और बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसानों को उनकी उपलब्धता को लेकर किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार किसानों को हरसंभव सहायता और सहयोग प्रदान करेगी। साथ ही बताया कि खरीफ खेती के लिए सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। कृषि मंत्री अच्चन्नायडू ने कहा कि किसानों का कल्याण सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और उन्होंने किसानों से एल नीनो की चुनौती का साहस के साथ सामना करने का आह्वान किया। उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने भी एरुवाका पूर्णिमा के अवसर पर किसानों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि एरुवाका पूर्णिमा एक कृषि पर्व है, जो मानव और प्रकृति के अटूट संबंध का उत्सव है तथा धरती माता और पशुधन के सम्मान का प्रतीक है। Andhra Pradesh News</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 15:20:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Paddy Seeding: धान की सीधी बिजाई करने वाले किसानों को मिलेगा 4500 रुपये प्रति एकड़ अनुदान</title>
                                    <description><![CDATA[जिले में धीरे धीरे किसानों का धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) की तरफ रुझान बढ़ रहा है। इसका कारण है कि मानसून के दौरान सामान्य से कम वर्षा की आशंका के बीच धान की सीधी बुवाई तकनीक किसानों के लिए लाभकारी विकल्प है। जल संकट, बढ़ती मजदूरी और लागत के दौर में यह तकनीक धान उत्पादन के लिए भविष्य की जरूरतों के अनुरूप प्रभावी मानी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/paddy-seeding-farmers-doing-direct-sowing-of-paddy-will-get/article-86877"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-06/paddy-seeding-subsidy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कैथल (कुलदीप नैन)। जिले में धीरे धीरे किसानों का धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) की तरफ रुझान बढ़ रहा है। इसका कारण है कि मानसून के दौरान सामान्य से कम वर्षा की आशंका के बीच धान की सीधी बुवाई तकनीक किसानों के लिए लाभकारी विकल्प है। जल संकट, बढ़ती मजदूरी और लागत के दौर में यह तकनीक धान उत्पादन के लिए भविष्य की जरूरतों के अनुरूप प्रभावी मानी जा रही है। वहीं राज्य सरकार द्वारा डीएसआर विधि से धान की बिजाई करने वाले किसानों को भौतिक सत्यापन उपरांत 4500 रुपये प्रति एकड़ का अनुदान प्रदान किया जाएगा। योजना का लाभ लेने के लिए किसानों का मेरी फसल-मेरा ब्यौरा पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य है। पंजीकरण की अंतिम तिथि 28 जून 2026 निर्धारित की गई है। Paddy Seeding</p>
<p style="text-align:justify;">बरटा निवासी जसवीर ने बताया कि वह पिछले दो सालों से बड़ी मात्रा में धान की सीधी बिजाई कर रहा है। इस साल भी 25 एकड़ में धान की सीधी बिजाई की है। धान की सीधी बिजाई किसानों के लिए लाभकारी है। इससे किसानों पर आर्थिक बोझ घटता है। गाँव में उनके अलावा अन्य किसान भी इसी विधि से धान उगाये हुए है। किसान जसवीर ने बताया कि उसने 4 जून को फसल बोई थी। उसने अपने खेत में 1401 और 1509 किस्म का धान बोया हुआ है। सारी फसल सही फुटाव कर रही है। थोड़ा घास जरूर उगा है। बीते वर्ष भी धान का झाड़ अच्छा रहता है। पानी का कम प्रयोग होता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">15 हजार एकड़ का लक्ष्य </h3>
<p style="text-align:justify;">जिले में इस वर्ष 15 हजार एकड़ क्षेत्र में धान की सीधी बिजाई का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। पिछले साल कैथल जिले के गुहणा, बरटा, ग्योंग, चौशाला, लाम्बा खेडी, सजूमा, नरड, बाता, ढुंढवा, राजौंद, कम्हेडी, महमदपुर मंझला , पाडला, आँहु में धान की सीधी बिजाई हुई थी। जिले के खेड़ी लांबा और गुहणा गाँव में सबसे ज्यादा सीधी बिजाई होती है Paddy Seeding</p>
<p style="text-align:justify;">डीएसआर विधि से धान की बुवाई करने से 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, जबकि नर्सरी तैयार करने, पौध उखाड़ने और रोपाई में लगने वाली श्रम लागत में 25 से 30 प्रतिशत तक कमी आती है। वैज्ञानिकों के अनुसार लगातार जलभराव न होने से मिट्टी की संरचना और स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ऐसे होती है सीधी बिजाई</h3>
<p>धान की सीधी बिजाई के समय पनीरी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि इसे सामान्य फसलों की तरह बोया जाता है। इससे किसानों को फायदा हो रहा हैं। एक तो पानी की बचत होती है, उपर से खेत में कद्दू नहीं करना पड़ता, जिससे डीजल की भी बचत होती है। 15 दिन में एक बार किसान फसल में सिचाई कर सकता हैं। Paddy Seeding <img style="float:right;" src="https://www.sachkahoon.com/media/2026-06/kuldeep-nain.jpg" alt="Kuldeep-Nain" width="117" height="426"></img></p>
<p style="text-align:justify;">कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के उपनिदेशक डॉ. रविंद्र कुमार ने बताया कि धान की सीधी बिजाई को बढ़ावा देने के लिए सरकार आधुनिक डीएसआर मशीनों की खरीद पर भी अनुदान प्रदान कर रही है। किसानों को मशीन के कुल मूल्य का 50 प्रतिशत अथवा अधिकतम 40 हजार रुपये तक अनुदान दिया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए विभागीय पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होता है। आवेदन के लिए किसान के पास मेरी फसल-मेरा ब्यौरा पंजीकरण, ट्रैक्टर की वैध आरसी, परिवार पहचान पत्र, आधार कार्ड तथा बैंक खाते की जानकारी होना आवश्यक है। इच्छुक किसान अपने क्षेत्र के कृषि विकास अधिकारी, खंड कृषि अधिकारी, उप मंडल कृषि अधिकारी, सहायक कृषि अभियंता अथवा उप कृषि निदेशक कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं। Paddy Seeding </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 13:16:32 +0530</pubDate>
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