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                <title>चीनी कर्ज जाल में फंस भारत के लिए खतरा बना ये देश</title>
                                    <description><![CDATA[नेवल बेस बनाने की तैयारी में दुश्मन कोलंबो। चीन के कर्ज जाल में फंसा श्रीलंका अब गंभीर आर्थिक संकट और भुखमरी की मार झेल रहा है। इसी के चलते श्रीलंकाई सरकार को पिछले हफ्ते देश में आर्थिक आपातकाल का ऐलान करना पड़ा। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों, मुद्रा में गिरावट और तेजी से घटते विदेशी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/sri-lanka-has-become-a-threat-to-india-trapped-in-the-chinese-debt-trap/article-26708"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/sri-lanka.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;">नेवल बेस बनाने की तैयारी में दुश्मन</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>कोलंबो।</strong> चीन के कर्ज जाल में फंसा श्रीलंका अब गंभीर आर्थिक संकट और भुखमरी की मार झेल रहा है। इसी के चलते श्रीलंकाई सरकार को पिछले हफ्ते देश में आर्थिक आपातकाल का ऐलान करना पड़ा। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों, मुद्रा में गिरावट और तेजी से घटते विदेशी मुद्रा भंडार ने श्रीलंका की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। हालात इस कद्र बिगड़ चुके हैं कि राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को विभिन्न आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए सेना को बुलाना पड़ा। आर्थिक तंगी की बदौलत श्रीलंका को चीन से बार-बार कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में श्रीलंका के चीन का उपनिवेश बनने का खतरा बढ़ रहा है और यह भारत के लिए बेहद चिंता की बात है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">चीन के विस्तार का केन्द्र बना श्रीलंका</h4>
<p style="text-align:justify;">चीन की इंडो पैसिफिक एक्सपेंशन और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में चीन ने श्रीलंका को भी शामिल किया है। श्रीलंका ने चीन का कर्ज न चुका पाने के कारण हंबनटोटा बंदरगाह चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को 1.12 अरब डॉलर में साल 2017 में 99 साल के लिए लीज पर दे दिया था। हालांकि अब श्रीलंका इस पोर्ट को वापस चाहता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में गहरी हुई चीन से दोस्ती</h4>
<p style="text-align:justify;">महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका और चीन की दोस्ती और गहरी हो गई। श्रीलंका ने विकास के नाम पर चीन से भरपूर कर्ज लिया। लेकिन, जब उसे चुकाने की बारी आई तो श्रीलंका के पास कुछ भी नहीं बचा। जिसके बाद हंबनटोटा पोर्ट और 15,000 एकड़ जगह एक इंडस्ट्रियल जोन के लिए चीन को सौंपना पड़ा। अब आशंका जताई जा रही है कि हिंद महासागर में अपनी गतिविधियों को जारी रखने के लिए चीन इसे बतौर नेवल बेस भी प्रयोग कर सकता है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Sep 2021 10:07:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खट्टर सरकार के छह साल के शासन में हरियाणा पर कर्ज हुआ तीन गुणा</title>
                                    <description><![CDATA[ हुड्डा के 10 साल के शासन काल में भी 4 गुणा हुआ था कर्ज (Debt on Haryana tripled) सच कहूँ/अनिल कक्कड़ चंडीगढ़। प्रदेश के गठन से लेकर अब तक बेशक कई सरकारें आई और गई , लेकिन प्रदेश की जनता पर कर्ज का बोझ कोई भी सत्ता कम नहीं कर सकी, बल्कि आए साल के […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/sach-kahoon-special-story/during-the-six-year-rule-of-the-khattar-government-the-debt-on-haryana-tripled/article-16604"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-07/during-the-six-year-rule-of-the-khattar-government-the-debt-on-haryana-tripled.gif" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"> हुड्डा के 10 साल के शासन काल में भी 4 गुणा हुआ था कर्ज</h3>
<h3 style="text-align:center;">(Debt on Haryana tripled)</h3>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ/अनिल कक्कड़ चंडीगढ़</strong>। प्रदेश के गठन से लेकर अब तक बेशक कई सरकारें आई और गई , लेकिन प्रदेश की जनता पर कर्ज का बोझ कोई भी सत्ता कम नहीं कर सकी, बल्कि आए साल के साथ यह कर्ज भी लगातार बढ़ रहा (Debt on Haryana tripled) है और मौजूदा खट्टर सरकार के छह साल के कार्यकाल में अब तक यह कर्ज बढ़कर तीन गुणा हो गया है। एक आरटीआई के तहत प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार पिछले छह साल में हरियाणा पर कर्ज 60 हजार करोड़ से बढ़कर एक लाख 85 हजार करोड़ हो चुका है। बता दें कि एक आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा वित्त विभाग के उप-निदेशक के पास आवेदन देकर हरियाणा सरकार के कर्ज की जानकारी मांगी थी। जानकारी के अनुसार, हरियाणा सरकार इस साल पर 03 अप्रैल तक 1,85,548 करोड़ रुपये का कर्जा हो गया है। यह प्रोविजनल आंकड़ा है।</h6>
<h4 style="text-align:justify;">खट्टर सरकार से पहले प्रदेश पर था 60 हजार 293 करोड़ रुपए कर्ज</h4>
<h6 style="text-align:justify;">आरटीआई के अनुसार, प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मनोहर लाल खट्टर सरकार आने से पूर्व 31 मार्च 2014 तक प्रदेश पर 60,293 करोड़ रुपये का कर्ज था। मौजूदा सरकार ने छह वर्ष के कार्यकाल में विकास के लिए 1,85,548 करोड़ रुपये हरियाणा सरकार पर कर्ज लिया और इस दौरान सड़कों को बार-बार तोड़ फोड़ कर दोबारा बनाने का फिजूल खर्च भी किया गया है। आरटीआई लगाने वाले शख्स ने आरोप लगाया कि इस दौरान सरकार ने प्रदेश स्तर पर कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं लगाया गया।</h6>
<h4 style="text-align:justify;">हुड्डा सरकार में 4 गुना बढ़ा था कर्ज</h4>
<h6 style="text-align:justify;">वहीं आरटीआई में खट्टर सरकार से पहले हुड्डा शासनकाल का भी जिक्र है, जिसमें बताया गया है कि खट्टर सरकार से पूर्व लगभग दस साल रही भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार के कार्यकाल में भी राज्य में कर्ज पर लगभग चौगुनी वृद्धि हुई थी और 15,886 करोड़ से बढ़कर यह 60 हजार करोड़ से पार हो गया था। बता दें कि इस दौरान कांग्रेस सरकार ने झांडली व खेदड़ बिजली के दो प्लांट लगाने का काम किया, लेकिन हुड्डा सरकार पर रोहतक के अलावा हरियाणा में समान रूप के विकास कार्य न करने के आरोप भी लगते रहे हैं। साथ ही कांग्रेस सरकार में कमीशनखोरी का आरोप लगा एवं झूठे विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्चने के आरोप भी लगे।</h6>
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                                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2020 20:00:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कर्जमुक्त कंपनियों का बढ़ता मुनाफा</title>
                                    <description><![CDATA[हाल ही में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के निफ्टी सूचकांक में शामिल कंपनियों के प्रतिफल का विश्लेषण किया गया, जिससे पता चला कि वैसी कंपनियां जो आंतरिक स्रोत से पूंजी जुटा कर कारोबार कर रही हैं, के प्रदर्शन में निरंतर सुधार आ रहा है। यह निष्कर्ष 911 कंपनियों के अंकेक्षित तुलना पत्र के विश्लेषण के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/growing-profits-of-debt-free-companies/article-6319"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/company.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हाल ही में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के निफ्टी सूचकांक में शामिल कंपनियों के प्रतिफल का विश्लेषण किया गया, जिससे पता चला कि वैसी कंपनियां जो आंतरिक स्रोत से पूंजी जुटा कर कारोबार कर रही हैं, के प्रदर्शन में निरंतर सुधार आ रहा है। यह निष्कर्ष 911 कंपनियों के अंकेक्षित तुलना पत्र के विश्लेषण के आधार पर निकाला गया। इस आंकलन में बैंक एवं गैर-बैंक ऋणदाता कंपनियों को शामिल नहीं किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पड़ताल में औसत आंकड़ों को सूचीबद्ध होल्डिंग कंपनियों की सूचीबद्ध सहायक कंपनियों के साथ समायोजित किया गया है, ताकि दोहरी गणना से बचा जा सके। विश्लेषण के लिये कंपनियों की नकदी आवक, कर्ज के स्तर और ऋण के बजाय आंतरिक कोष से वित्त पोषित संपत्तियों के अनुपात को आधार बनाया गया। विश्लेषण से यह पता चला कि जो कंपनियां कर्जमुक्त हैं, वे बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस आकलन में वर्ष 2013 से वर्ष 2018 तक के प्रतिफल को शामिल किया गया। कंपनियाँ, जो खुद के संसाधनों पर निर्भर रही हैं, ने आलोच्य अवधि में 30 प्रतिशत से अधिक का प्रतिफल दिया है। इन कंपनियों का प्रदर्शन अप्रैल, 2018 के बाद भी बेहतर रहा है, जबकि भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष में 2 बार नीतिगत दरों में इजाफा किया है। जून और अगस्त में बढ़ोतरी के जरिये कुल 50 आधार अंकों की बढ़ोतरी की गई है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी के कारण कर्ज मिलने की शर्त कड़ी हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कर्ज के महंगे होने से कर्ज में चूक करने वाली ऋणदाता कंपनियों की संख्या में इजाफा हुआ है। आईएलऐंडएफएस समूह के डूबने से भी स्थानीय बाजार से पूँजी जुटाना में मुश्किलें आ रही है। बाजार में अनिश्चितता का माहौल है। बीते महीनों से वैश्विक बाजार से भी पूँजी इकठ्ठा करना महंगा हुआ है।<br />
बिना कर्ज वाली कंपनियों का प्रदर्शन इसलिये बेहतर है, क्योंकि उनकी कोई देनदारी नहीं है। कम कर्ज होना या कर्ज का नहीं होना हमेशा फायदेमंद होता है। ऐसी स्थिति बेहतर प्रदर्शन में मददगार होती है। कर्ज नहीं होने से शेयर बाजार से पूँजी जुटाने की जरूरत नहीं होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">शेयर बाजार से पूँजी नहीं जुटाने से शेयरधारकों की इक्विटी कम नहीं होगी, प्रोमोटर का कैपिटल अक्षुण्ण बना रहेगा। आम तौर पर अच्छे कारोबारी मॉडल और शानदार वृद्धि करने वाली कंपनियों को शेयर बाजार से पूँजी जुटाने की जरूरत नहीं होती है, क्योंकि उनके द्वारा अच्छे प्रदर्शन करने के आसार होते हैं। फिच रेटिंग्स और उसकी भारतीय इकाई इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के 28 सितंबर के प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में हाल में बढ़़ोतरी की है और वह इस प्रक्रिया को आगे भी जारी रखेगा की प्रबल संभावना जताई जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">माना जा रहा है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक की इस नीति की वजह से दुनिया भर में पूँजी की उपलब्धता कम होगी। एजेंसी के मुताबिक घरेलू स्तर पर पूँजी की उपलब्धता में और भी कमी आने की संभावना है। फिलहाल, भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। कमजोर रुपये से कंपिनयों के लिए विदेश से कर्ज लेना महंगा हो गया है। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता की स्थिति है एवं घरेलू स्तर पर ब्याज दर ऊंचे स्तर पर है। बदले परिवेश में भारतीय कंपनियाँ अपने बैलेंस शीट को ऋणमुक्त बनाने की कोशिश कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कंपनियाँ राजस्व वृद्धि में सुधार के बावजूद वृद्धि पर जोर नहीं दे रही हैं। मन:स्थिति में इस बदलाव से वित्त वर्ष 2018 में भारतीय कंपनियों का शुद्ध कर्ज-इक्विटी अनुपात सुधरा है और नई परियोजनाओं में निवेश 10 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। पिछले साल कंपनियों का संयुक्त रूप से कुल ऋण सालाना आधार पर 3.3 प्रतिशत अधिक था, जो पिछले 10 सालों में सबसे धीमी वृद्धि है, जबकि गत वर्ष इन कंपनियों का संयुक्त राजस्व सालाना आधार पर 10.5 प्रतिशत अधिक था और उनका शुद्ध लाभ 3.4 प्रतिशत बढ़ा था। इधर, वित्त वर्ष 2018 में संयुक्त रूप से कंपनियों की स्थायी संपत्तियों या संयंत्रों एवं उपकरणों में निवेश 3 प्रतिशत बढ़ा, जो पिछले 10 सालों में सबसे कम वृद्धि है।</p>
<p style="text-align:justify;">विनिर्माण और बुनियादी ढांचा क्षेत्र में नये निवेश घटने की रफ्तार और अधिक है। पिछले वित्त वर्ष में तेल एवं गैस, सूचना प्रौद्योगिकी सेवायेँ एवं फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स कंपनियों को छोड़कर अन्य कंपनियों की संयुक्त रूप से स्थायी संपत्तियां 2.8 प्रतिशत बढ़ीं, जो पिछले 10 सालों में सबसे सुस्त वृद्धि है। वित्त वर्ष 2018 में कंपनियों, जिसमें ऊर्जा शामिल नहीं है का शुद्ध कर्ज उनके शुद्ध पूँजी या शेयरधारक इक्विटी के अनुपात में सुधरकर औसतन 60 प्रतिशत पर आ गया। यह वित्त वर्ष 2016 में 68 प्रतिशत पर एक दशक के सर्वोच्च स्तर पर था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अवधि में तेल एवं गैस, आईटी सेवाएं और एफएमसीजी को छोड़कर अन्य कंपनियों का कर्ज अनुपात सुधरकर 80 प्रतिशत पर आ गया था, जो वित्त वर्ष 2016 में 10 साल के सर्वोच्च स्तर 87 प्रतिशत पर था। इस तरह के संकेतों से पता चलता है कि कंपनियों की बैलेंस शीट में कर्ज का बोझ घटा है, जो बैंकरों और कर्ज में डूबी कंपनियों के शेयर बाजार मूल्यांकन के लिए सकारात्मक है।इक्नॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी सर्विसेज के संस्थापक और एमडी जी चोक्कालिंगम के अनुसार इक्विटी के अनुपात में कर्ज में गिरावट उपभोक्ता क्षेत्रों में ज्यादा मुनाफे या ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के तहत कंपनी ऋण के पुनर्गठन की वजह से आई है। इससे बैंकों को इन कंपनियों में अपने ऋण का बड़ा हिस्सा छोड़ना पड़ा है। आईबीसी के तहत कंपनियों का कर्ज बैंकों का घाटा बन जाता है, जिससे कंपनियों के कर्ज में कमी दिखती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस साल मार्च के अंत में भारतीय कंपनियों का कुल कर्ज 26.9 लाख करोड़ रुपये था, जो एक साल पहले के स्तर 25.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। वित्त वर्ष 2018 की अंतिम तिमाही में कंपनियों के पास नकदी एवं इसके समान संपत्ति 8.66 लाख करोड़ रुपये थी, जो एक साल पहले के स्तर 8.73 लाख करोड़ रुपये से कम है। हालाँकि, चोक्कालिंगम के तर्क को सही नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि यह विश्लेषण अनियमित एवं नमूना आधार पर किया गया है, जिसमें कंपनियाँ बैंक की चूककर्ता हैं या नहीं का खुलासा नहीं किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिये, किसी भी तरह से ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता है। कंपनियों के बैलेंस शीट से कर्ज के भार कम करने के दौरान उन्हें मुश्किलों का भी सामना करना पड़ रहा है। ज्यादातर कंपनियों ने पिछले वित्त वर्ष में अपने ऋण अनुपात में सुधार दर्ज किया है, लेकिन इस दौरान धातु एवं खनन, ऊर्जा एवं दूरसंचार क्षेत्रों में इक्विटी अनुपात में शुद्ध कर्ज की स्थिति बिगड़ी है। इन तीन क्षेत्रों का वित्त वर्ष 2018 में भारतीय कंपनियों के कुल बकाया ऋण में औसतन 43 प्रतिशत हिस्सा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे माहौल में बैंकों को अपने कर्ज को वसूलने में मुश्किल हो रही है। बिजली कंपनियों का कुल कंपनी ऋणों में करीब 20 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन इस क्षेत्र का कुल कंपनी लाभ में हिस्सा महज 5.9 प्रतिशत है। सबसे ज्यादा कर्ज वाले क्षेत्र बिजली, धातु व खनन, निर्माण, बुनियादी ढांचा और दूरसंचार हैं। इनका कुल उधारी में करीब 53 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन वित्त वर्ष 2018 में कुल लाभ में इनका हिस्सा महज 12 प्रतिशत था। कंपनियों की खराब वित्तीय हालात के लिये सरकार को भी कुछ हद तक जिम्मेदार माना जा सकता है, जो सरकारी बैंकों का पुनर्पूंजीकरण नहीं कर पा रही है। मौजूदा समय में सरकारी बैंक ही कंपनियों को ऋण देने वाले मुख्य ऋणदाता हैं।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>सतीश सिंह</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Oct 2018 10:06:36 +0530</pubDate>
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                <title>किसान कर्ज की परतें खंगालनी होंगी</title>
                                    <description><![CDATA[यह पहली बार है कि किसानों की आत्महत्याओं के लिए जिम्मेवार कारणों में विवाह-शादियों में फिजूल खर्ची, नए-नए ट्रैक्टर व कोठियां खरीदने को शामिल किया गया हो। पंजाब विधान सभा में एक समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा कि किसानों पर कर्ज का मुख्य कारण किसान परिवार विवाह-शादियों पर अत्याधिक खर्चा व महंगे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/farmers-will-have-to-lend-the-debt/article-3679"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/punjab.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">यह पहली बार है कि किसानों की आत्महत्याओं के लिए जिम्मेवार कारणों में विवाह-शादियों में फिजूल खर्ची, नए-नए ट्रैक्टर व कोठियां खरीदने को शामिल किया गया हो। पंजाब विधान सभा में एक समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा कि किसानों पर कर्ज का मुख्य कारण किसान परिवार विवाह-शादियों पर अत्याधिक खर्चा व महंगे ट्रैक्टर खरीदने के लिए आढ़ती व फाईनेसरों से अधिक ब्याज पर कर्जे लेते हैं। यह सच्चाई है। वर्तमान की दिखावटी संस्कृति ने किसानों को मंदी का शिकार बना दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">आज पंजाब का कोई ऐसा शहर व कस्बा नहीं जहां आलीशान होटल, मैरिज पैलेस, रैस्टोरैंट न हों। विवाह शादी के प्रबंध बड़ी इंडस्ट्री का रूप ले चुके हैं। कभी शादी में 5-7 हजार रुपए में होने वाली वीडियोग्राफी अब एक लाख रुपए तक पहुंच गई है। छोटे व मध्य वर्गीय किसान भी राजा-महाराजाओं की शान वाले टैंट, सजावट, खाने का खर्च करने लगे हैं। आॅटो कंपनियां गाड़ियां बेचने के लिए लोगों के घरों तक चक्कर लगाती हैं और फाइनेंस की सुविधा मुहैया करवाकर किसानों को गाड़ियां दी जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पंजाबी लोगों में आदत बन गई है कि किश्तों पर मिलने वाली वस्तु को लेने के लिए झट तैयार हो जाते हैं। रिपोर्ट में फिजूल खर्ची पर चिंता व्यक्त की गई, लेकिन इसे रोका कैसे जाए इस बारे में कोई चर्चा नहीं की गई। दरअसल यह सामाजिक मुद्दा है, समाज में परिवर्तन लाने के लिए पहले अमीर राजनेताओं को ही पहल करनी होगी। किसान संगठन भी इसे एक अभियान का रूप दें तो अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। यूं यह मामला केवल पंजाब का नहीं बल्कि पूरे देश का है। यदि इस संबंधी कोई राष्ट्रीय नीति बनाई जाए तब बेहतर होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अन्यथा फिजूल खर्ची के अलावा मौसम की मार, वाजिब भाव न मिलने, खर्च बढ़ने, मंडी प्रबंधों व तकनीकी जानकारी की कमी जैसी समस्याओं को ही कृषि के लिए जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल कृषि में एक इंकलाब की आवश्यकता है जिसमें सरकार व किसानों को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी। सरकार किसानों की दशा सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाए। किसान फिजूल खर्ची के लिए उच्च ब्याज दरों पर कर्ज नहीं लेंवे। पंजाब की समिति द्वारा पेश किए गए तथ्यों में सभी दलों को ठोस निर्णय लेने का समर्थन करना चाहिए। अन्य सरकारें भी पंजाब से सीख ले सकती है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Mar 2018 03:23:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कर्ज के मक्कड़जाल मेंं दम तोड़ती जिंदगियां</title>
                                    <description><![CDATA[डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा आजादी के सात दशक बाद भी देश में कर्ज की अंतिम परिणीति मौत को गले लगाना ही हो, तो इससे अधिक दुर्भाग्यजनक और शर्मनाक क्या हो सकता है। पिछले दिनों ही कर्ज के बोझ तले डूबे जयपुर मेंं एक ही परिवार के सभी सदस्यों द्वारा सामूहिक आत्महत्या या दो दिन पहले […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/losing-life-in-the-crocodile-debt/article-3321"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-09/karj.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के सात दशक बाद भी देश में कर्ज की अंतिम परिणीति मौत को गले लगाना ही हो, तो इससे अधिक दुर्भाग्यजनक और शर्मनाक क्या हो सकता है। पिछले दिनों ही कर्ज के बोझ तले डूबे जयपुर मेंं एक ही परिवार के सभी सदस्यों द्वारा सामूहिक आत्महत्या या दो दिन पहले ही एक बिल्डर द्वारा नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या का प्रयास के संकेत साफ है। देश का शायद ही कोई कोना होगा, जहां कर्ज के बोझ तले डूबे लोगों में से आए दिन किसी न किसी द्वारा इहलीला समाप्त करने के साथ ही सुसाइड नोट में कर्ज के दर्द की दास्तां देखने को न मिलती हो।</p>
<p style="text-align:justify;">अब तो स्थिति यहां तक होने लगी है कि लोग दूसरी जगह होटलों आदि में जाकर आत्महत्याएं करने लगे हैं। देश में इस तरह की घटनाएं आम हैं। इस सबका का एक बड़ा कारण बाजार में अत्यधिक पैसे का आना, लोगों का रातों-रात रईस बनने का सपना, ऊंचे ख्वाब देखना ही तो है। मजे की बात यह है कि देश में बैंकिंग क्षेत्र में इतने विकास और आसान शर्तों पर कर्जे की सरकारी घोषणाओं के बावजूद सूदखोरों का जाल फैला हुआ है, तो यह सरकार और समाज दोनों के लिए शर्मनाक स्थिति है।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के पहले के आंचलिक साहित्य और आजादी के बाद के जमाने की गोदान, दो बीघा जमीन जैसी फिल्मों के माध्यम से सूदखोरों के चंगुल में एक बार फंसने के बाद उनकी ज्यादतियों और कर्ज के जाल में पीढ़ी-दर-पीढ़ी फंसने की रोंगटे खड़ी करने वाली दास्तानें यदि आज भी देखने को मिलती हैं, तो फिर आजादी के कोई मायने नहीं हो सकते। हालांकि इसके लिए केवल सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता, बल्कि ज्यादा दोष तो समाज के बदलते मानकों को जाता है। एक समय था, जब समाज में ईज्जत ही सब-कुछ होती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">ठीक इसके विपरीत आज पैसा ही सब-कुछ होने लगा है। ऐसे में लोगों में ज्यादा से ज्यादा धन जल्दी से जल्दी बटोरने की धुन सवार होती है और इसके लिए उल्टे-सीधे कामों के साथ ही कर्ज के जाल में फंसकर जीवन दूभर करना भी शामिल है। कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या की घटनाओं से जुडेÞ लोग मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग के रहे हैं। पर देश दुनिया में सूदखोरों के चंगुल से बचाकर गरीब और साधनहीन लोगों की रुपए-पैसे की जरुरतों को पूरा करने के लिए सारी दुनिया चिंतित रही है। बांग्लादेश में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से माइक्रो फाइनेंस का प्रयोग एक सीमा तक सफल रहा और समूहों का बैंक तक संचालित होने लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में भी 90 के दशक में स्वयं सहायता समूहों का कंस्पेट तेजी से उभरा और आंध्रप्रदेश व बंगाल में इसी गरीबी के विरुद्ध लड़ाई का सशक्त हथियार माना जाने लगा। आंध्रपदेश को इसका रोलमॉडल भी माना गया। इसके बाद नाबार्ड ने भी स्वयं सहायता समूहों के गठन कर वित्तीय समावेशन के काम को गति देने का प्रयास किया। स्वयं सहायता समूहों को बैकों से जोड़ा गया। यह भी माना गया कि स्वयं सहायता समूहों में चूंकि सामाजिक सरोकार जुड़े होते हैं, इसलिए इनकी वसूली भी लगभग शत्-प्रतिशत तक हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी यह माना जाता है और सत्य भी है कि गरीब आदमी की सोच यही होती है कि वह कर्ज में नहीं मरे और दूसरा यह कि बच्चोें पर कर्ज का बोझ डालकर न जाए। यह भी एक कारण रहा कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वित्तीय समावेशन का सपना देखा गया, हालांकि समय के बदलाव के साथ स्वयं सहायता समूहों द्वारा वितरित ऋणों की वसूली के स्तर में भी आज तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है और अब तो यह मॉडल भी अपने उद्देश्यों में विफल होता दिखने लगा है। प्रश्न यह उठता है कि देश में गरीब और साधनहीन लोगों के साथ ही कारोबारियों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराने की सरकारी गैर-सरकारी बैंकों की योजनाओं के बावजूद सूदखोरों का रैकेट देश के सभी इलाकों में जारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">गांवों में ही नहीं, शहरों में भी खासतौर से निम्न व मध्यमवर्गीय इलाकों में इस तरह के रैकेट जारी हैं। यह रैकेट लोगों को ऊंची ब्याज दर का सपना दिखाकर खासतौर से इन वर्ग के लोगों की बचत को ले जाते हैं और फिर रातों-रात अपनी दुकान बंद कर चूना लगा देते हैं। सब्जी मंडियों, गलियों के छोटे वेंडर्स के इलाकों में इस तरह के सूदखोरों के रैकेट सक्रिय रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इनसे कोई अंजान हो, पर सहज उपलब्धता और तत्काल पैसा उपलब्ध कराना ही इनकी ताकत है। दूसरी ओर सरकार द्वारा विभिन्न विभागों व बैंकों के माध्यम से आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराने की योजनाएं घोषित की जाती है। लक्ष्य जारी होते हैं, लक्ष्य पूरे भी दिखाए जाते हैं, पर उसके बाद भी सूदखोरों की दुकानें मजे से चल रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">उदारीकरण के बाद से ही रोजगारपरक कार्यों के लिए ऋण वितरण की बहुत सी योजनाएं आई हैं। मोदी सरकार ने मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी योजना, स्टार्ट अप आदि योजनाएं लाकर बैंकों का मुंह जरुरतंद लोगों की और मोड़ा है, पर कर्ज देने वालों की दुकानें आज भी वैसे ही चल रही हैं। यह सब तो तब है, जब बैंक लोन मेले लगाते हैं, योजनाओं की जानकारी देते हैं, उसके बाद भी सबकी ऋण जरुरतें पूरी नहीं हो पाती है। बैंकिंग संस्थाओं द्वारा ऋण, साख सीमा, वर्किंग केपिटल आदि के लिए ऋण, माइक्रो फाइनेंस के बावजूद सूदखोरों की दुकान चलने का साफ-साफ अर्थ यह है कि लक्षित वर्ग या यूं कहें कि जरुरतमंद लोगों की इन संस्थाओं तक सहज पहुंच नहीं हो पा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">वित्तदायी संस्थाओं को अपनी प्रक्रिया में बदलाव लाना होगा, ताकि लोगों तक आसानी से ऋण सुविधा पहुंच सके। आसानी से ऋण-साख सुविधा मिलेगी, तो इसका लाभ जहां बैंकों को ऋण विविधिकरण के रुप में होगा, वहीं यह साफ है कि इस वर्ग को वितरित ऋण कम से कम डूबने की संभावना भी लगभग शून्य स्तर पर ही होगी। वैसे भी इस पोर्टफोलियों में वितरित होने वाले ऋण की मात्रा कम ही होती है। ऐसे में लाखों-करोड़ों रुपए की एनपीए में डूबत खातों में पड़े ऋण की तुलना में यह ऋण सुविधा निचले स्तर पर रोजगार सृजन, वित्तीय समावेशन और नीचले स्तर तक आर्थिक विकास की राह को प्रशस्त करने में सहायक होगा। सरकार को सूदखोरों के रेकेट को समाप्त करने के लिए बैंकिंग व्यवस्था को सहज और सरल बनाना की दिशा में कुछ ठोस प्रयास करने ही होंगे।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 Sep 2017 02:03:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कर्ज में फंसी कम्पनियों को बचाना है मकसद: जेटली</title>
                                    <description><![CDATA[मुंबई। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कर्ज के दबाव में फंसी कंपनियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि उनके पुराने फंसे कर्ज (एनपीए) की समस्या का समाधान करने के पीछे मूल उद्देश्य कारोबार को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उसे बचाना है। उन्होंने कहा कि नए दिवाला कानून ने उन कर्जदारों जो उसे समय पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/jaitley-trying-to-save-the-companies-trapped-in-debt/article-3246"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/arun-11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>मुंबई।</strong> वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कर्ज के दबाव में फंसी कंपनियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि उनके पुराने फंसे कर्ज (एनपीए) की समस्या का समाधान करने के पीछे मूल उद्देश्य कारोबार को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उसे बचाना है। उन्होंने कहा कि नए दिवाला कानून ने उन कर्जदारों जो उसे समय पर कर्ज नहीं लौटा पाए और कर्ज देने वालों के रिश्तों में उल्लेखनीय बदलाव ला दिया है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">मूल्यवान संपत्तियों को संरक्षित करना</h2>
<p style="text-align:justify;">जेटली ने कहा कि एनपीए समस्या के समाधान के पीछे वास्तविक उद्देश्य संपत्तियों को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उनके व्यावसाय को बचाना है। यह काम चाहे इन कंपनियों के मौजूदा प्रवर्तक खुद करें अथवा अपने साथ नया भागीदार जोड़कर करें या फिर नए उद्यमी आएं और यह सुनिश्चित करें कि इन मूल्यावान संपत्तियों को संरक्षित रखा जा सके। जेटली यहां देश के प्रमुख वाणिज्य एवं उद्योग मंडल सीआईआई द्वारा आयोजित एक बैठक को संबोधित कर रहे थे।</p>
<p> </p>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 19 Aug 2017 06:00:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कर्ज में डूबे किसान ने गटका जहर, मौत</title>
                                    <description><![CDATA[सरसा (सच-कहूँ न्यूज)। जिले के गांव खारीसुरेरां निवासी बलविंद्र सिहाग ने शनिवार को कर्ज से परेशान होकर जहर पीकर आत्महत्या कर ली। घटना से पूरे प्रशासन की नींद उड़ गई। मामले की सूचना मिलते ही प्रशासनिक तंत्र हरकत में आया और नागरिक अस्पताल पहुंच गया। बताया जा रहा है कि मृतक किसान पिछले 10 दिनों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/farmer-committed-suicide-under-debt/article-2173"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/suicide-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सरसा (सच-कहूँ न्यूज)।</strong> जिले के गांव खारीसुरेरां निवासी बलविंद्र सिहाग ने शनिवार को कर्ज से परेशान होकर जहर पीकर आत्महत्या कर ली। घटना से पूरे प्रशासन की नींद उड़ गई।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की सूचना मिलते ही प्रशासनिक तंत्र हरकत में आया और नागरिक अस्पताल पहुंच गया। बताया जा रहा है कि मृतक किसान पिछले 10 दिनों से यहां लघु सचिवालय में चल रहे किसानों के धरने पर आ रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के अनुसार 28 वर्षीय किसान गांव खारीसुरेरां का रहने वाला बलविंद्र सिहाग पिछले काफी समय से कर्ज को लेकर परेशान था। हालत ये थी कि वह अपने बच्चों की स्कूल फीस भी नहीं भर पा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी के चलते शनिवार को उसने अपने खेतों में जाकर कीटनाशक पी लिया, जिसके बाद उसे सरसा के एक निजी अस्पताल में दाखिल करवाया गया। फिर उपचार के दौरान उसने दम तोड़ दिया। बाद में शव को पोस्टमार्टम के लिए सरसा के नागरिक अस्पताल लाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">मौके पर पहुंचे किसान नेता विकल पचार ने प्रशासन व सरकार से मृतक किसान के परिवार को 1 करोड़ रुपए का मुआवजा और परिवार के किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी दिए जाने की मांग की है।</p>
<p style="text-align:justify;">मृतक बलविंद्र के चाचा दलबीर ने बताया कि कुछ समय पहले उसे घर से अलग कर दिया गया था। उसके पिता के कुल 25 लाख में से आधा कर्जा उसके हिस्से में आया था, जिसे वो चुका नहीं पाया और उसी मानसिक दबाव में वह आत्महत्या कर गया।</p>
<h2 style="text-align:justify;">परिजनों और किसानों ने काटा बवाल</h2>
<p style="text-align:justify;">अस्पताल परिसर में मृतक किसान के परिजनों व किसान नेताओं ने जमकर बवाल काटा और मृतक किसान के परिजनों की आर्थिक सहायता किए जाने की पुरजोर मांग रखी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर सरसा के एसडीएम बिजेंद्र सिंह व अन्य अधिकारियों ने किसान नेताओं को आश्वस्त किया कि वे बच्चों की शिक्षा का प्रशासन की ओर से प्रबंध कराएंगे व विधवा की पेंशन आरंभ कराई जाएगी। शेष मृतक परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक मदद व परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग को सरकार के पास भिजवाया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/farmer-committed-suicide-under-debt/article-2173</link>
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                <pubDate>Mon, 10 Jul 2017 02:16:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘किसानों का कर्ज कांग्रेस का कर्ज’</title>
                                    <description><![CDATA[कैप्टन के सौ दिनों के काम केंद्र के एक हजार दिनों पर भारी जाखड़ ने पटियाला में किया संबोधित कहा, बादल को कर्ज माफी की सराहना करनी चाहिए थी न की निंदा पटियाला। कैप्टन अमरिन्दर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार की ओर से अपने 100 दिनों अंदर किए हुए काम केंद्र सरकार के एक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/debt-of-farmers-debt-of-congress/article-1661"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/captain-govt.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">कैप्टन के सौ दिनों के काम केंद्र के एक हजार दिनों पर भारी</h2>
<ul style="text-align:justify;">
<li><strong>जाखड़ ने पटियाला में किया संबोधित</strong></li>
<li><strong>कहा, बादल को कर्ज माफी की सराहना करनी चाहिए थी न की निंदा</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>पटियाला।</strong> कैप्टन अमरिन्दर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार की ओर से अपने 100 दिनों अंदर किए हुए काम केंद्र सरकार के एक हजार दिनों पर भी भारू हैं। हमने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किए हुए वायदों को पहले सौ दिनों में ही पूरा करके लोकतंत्र में लोगों के टूटे हुए विश्वास को कायम किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ये उद्गार पंजाब प्रदेश कांग्रेस समिति के पंजाब प्रधान सुनील जाखड़ ने यहां पत्रकारों के साथ बातचीत करते हुए कहे। वह कांग्रेस समिति के प्रधान बनने पर पहली बार आज पटियाला पहुंचे हुए थे। उन्होंने कहा कि पंजाब के किसानों की कर्ज माफी ऐतिहासिक फैसला है और 10 लाख से अधिक किसानों का 2 लाख का कर्ज अब कांग्रेस सरकार का कर्ज हो गया है और पंजाब का किसान इस कर्जे से बरी हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जाखड़ ने कहा कि पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल जो कि खुद भी किसान हैं , ने सरकार की ओर से किसानों की की कर्ज माफी पर कैप्टन सरकार को सराहने की बजाय इस पर राजनीति की है, जिसका उनको बहुत दुख हुआ है। उन्होंने कहा कि कर्ज माफी को तो आम आदमी पार्टी ने भी सराहना है।</p>
<p style="text-align:justify;">जाखड़ ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने शुरूआती दिनों में ही ऐसे कार्य किये हैं जो कि सरकारें चुनावों से पहले करते हैं। इस मौके जंगलात मंत्री साधू सिंह धर्मसोत, विधायक हरदयाल सिंह कम्बोज, विधायक मदन लाल जलालपुर, पीआरटीसी के चेयरमैन केके शर्मा, शहरी प्रधान पीके पुरी आदि उपस्थित थे।</p>
<h2 style="text-align:justify;">बंडूगर पर साधा निशाना</h2>
<p style="text-align:justify;">एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि विधान सभा सैशन में अकाली दल ने ‘आप’ को अपने काबू में करके उनको इस्तेमाल किया है। जाखड़ ने शिरोमणी समिति के प्रधान किरपाल सिंह बंडूगर पर निशाना साधते हुए कहा कि वह धार्मिक नेता हैं और धर्म की बात ही उनको अच्छी लगती है, परंतु वह सिर्फ राजनीति करने को ही अपना धर्म समझी बैठे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सैशन में उतरी पगड़ी संबंधी उन्होंने कहा कि कांग्रेस को जान बूझ कर बदनाम किया जा रहा है जबकि हकीकत यह है कि एक वीडियो क्लिप में एक विधायक खुद अपनी पगड़ी उतारता हुआ नजर आ रहा है। उन्होंने अपनी, कमियों छिपाने की खातिर ही ऐसे ड्रामे रचे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 27 Jun 2017 00:00:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसानों की कर्ज माफी का विचार नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[वामीनाथन रिपोर्ट में शामिल बिंदुओं को लागू करने पर कर रहे हैं मंथन रोहतक। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला ने कहा है कि किसानों के कर्ज को लेकर सभी प्रदेशों की अपनी अलग-अलग नीतियां है, फिलहाल प्रदेश सरकार का किसानों का कर्जा माफ करने का कोई विचार नहीं है। शनिवार को वे यहां मैना पर्यटक केन्द्र […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/no-consider-on-debt-forgiveness-of-farmers/article-1343"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/17rtk3.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">वामीनाथन रिपोर्ट में शामिल बिंदुओं को लागू करने पर कर रहे हैं मंथन</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>रोहतक।</strong> भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला ने कहा है कि किसानों के कर्ज को लेकर सभी प्रदेशों की अपनी अलग-अलग नीतियां है, फिलहाल प्रदेश सरकार का किसानों का कर्जा माफ करने का कोई विचार नहीं है। शनिवार को वे यहां मैना पर्यटक केन्द्र में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। इनेलो पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश में इनेलो का जनाधार खत्म हो चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">एसवाइएल के मुद्दे को लेकर इनेलो अपना अस्तित्व बचाने में जुटी है। बराला ने कहा कि भाजपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसमें कार्यकर्ता व पदाधिकारियों को एक सम्मान देखा जाता है। किसान आंदोलन पर उनहोंने कहा कि विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं है और भाजपा सरकार किसान हितेषी है। सरकार स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में शामिल बिंदुओं को लागू करने की दिशा में काम कर रही है। इस अवसर पर प्रदेश महामंत्री एडवोकेट वेदपाल, प्रदेश उपाध्यक्ष जेपी दलाल व कविता चौधरी, अजय बंसल, प्रतिभा सुमन, शमशेर खरक, सतीश आहूजा मौजूद रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 17 Jun 2017 09:36:14 +0530</pubDate>
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