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                <title>struggle - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>संघर्ष का महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[कभी बाढ़ आ जाए, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाए। हर बार कुछ ना कुछ कारण से एक किसान (Farmer) की फसल खराब होती गई। एक दिन तंग आकर उसने परमात्मा से कहा-देखिए प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आप हमारे ऊपर रहम क्यों नहीं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/importance-of-struggle/article-49121"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/farmers.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी बाढ़ आ जाए, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाए। हर बार कुछ ना कुछ कारण से एक किसान (Farmer) की फसल खराब होती गई। एक दिन तंग आकर उसने परमात्मा से कहा-देखिए प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आप हमारे ऊपर रहम क्यों नहीं करते। एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिए, जैसा मैं चाहूँ वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मैं कैसे अन्न के भंडार भर दूंगा। परमात्मा मुस्कराए और कहा-ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूंगा। Struggle</p>
<p style="text-align:justify;">अब, किसान ने गेहूं की फसल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी चाहा तो पानी मिला। तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की खुशी भी, क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी। किसान ने मन ही मन सोचा अब देखना हैरान कर देने वाली कैसी फसल होगी। फसल काटने का समय भी आया, किसान बड़े गर्व से फसल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा, एकदम से छाती पर हाथ रखकर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूँ का दाना नहीं था, सारी बालियां अन्दर से खाली थी, बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा-प्रभु ये क्या हुआ? तब परमात्मा बोले-ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का जरा सा भी मौका नहीं दिया। Struggle</p>
<p style="text-align:justify;">ना तेज धूप में उनको तपने दिया, ना आंधी ओलों से जूझने दिया, उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया, इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए। जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं, तब पौधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है, वो ही उसे शक्ति देता है, उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है। सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने, हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनौतियों से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है, उसे अनमोल बनाती है। किसान ने यह सुनकर तौबा की और परमात्मा से माफी मांगी। Motivational</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
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                <pubDate>Thu, 22 Jun 2023 15:43:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>मुश्किलों को मात देकर मिसाल बनी अनिता यादव</title>
                                    <description><![CDATA[संघर्ष | 13 साल में 50 हजार किमी. का पैदल तय कर चुकी है सफर , गुरुग्राम जिले की एकमात्र महिला डाककर्मी हैं अनीता
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/anita-yadav-became-an-example-by-defeating-difficulties/article-13663"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-03/anita-yadav-struggled.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">जिदंगी का सफर : पोस्ट मास्टर पति के देहांत के बाद मिली थी डाकिए की नौकरी(Anita Yadav struggled)</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजय मेहरा / सच कहूँ गुरुग्राम।</strong> 21वीं सदी में जब दुपहिया, चौपहिया पर सवार होकर दुनिया दौड़ रही है, वहीं इस सदी में मिलेनियम सिटी में एक महिला ऐसी है, जो पैदल चलते हुए ही अपने काम को अंजाम तक पहुंचाती है। वह पिछले 13 साल से पैदल घूमकर अपनी नौकरी कर रही है और करीब 50 हजार किलोमीटर पैदल चल चुकी है। उसे अपने पांवों पर विश्वास है और अपने कदमों से उसने शहर के कई इलाकों को मापा है। कोई भी दूरी उसे दूरी नहीं लगती।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">वह जुनून के साथ अपना काम करती है।</li>
<li style="text-align:justify;">न तो उसके रास्ते में सर्दी रोड़ा बनती है और ना ही गर्मी।</li>
</ul>
<h3>कम वेतन में घर का खर्च चलाने के साथ बच्चों की अच्छी पढ़ाई कराना चुनौती थी</h3>
<p style="text-align:justify;">उस कर्मठ महिला का नाम है अनीता यादव। मात्र दसवीं पास अनीता को डाकखाने में अपने पति अशोक कुमार के देहांत के बाद जनवरी 2008 में डाक विभाग में डाककर्मी (पोस्ट वूमेन) की नौकरी मिली थी। मूलरूप से गुरुग्राम के गांव जमालपुर की रहने वाली अनीता यादव के तीन बच्चे दो बेटे व एक बेटी हैं।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">पति के देहांत के बाद सारी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।</li>
<li style="text-align:justify;">कम वेतन में घर का खर्च चलाने के साथ बच्चों की अच्छी पढ़ाई कराना चुनौती थी।</li>
<li style="text-align:justify;">अनीता ने इस चुनौती को स्वीकारा और एक-एक पैसे का प्रबंधन करके सब कुछ मैनेज किया।</li>
<li style="text-align:justify;">आज उनका एक बेटा कस्टम में नौकरी करता है तो दूसरे का एक्सपोर्ट का बिजनेस है।</li>
<li style="text-align:justify;">वह 15 दिन भारत में रहता है और 15 दिन विदेश (ढाका) में।</li>
<li style="text-align:justify;">बेटी केंद्रीय विद्यालय में टीचर लग चुकी हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">वह चेन्नई में नौकरी कर रही है।</li>
<li style="text-align:justify;">यानी परिवार पूरी तरह से सेट हो चुका है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">एक दिन में 15 किमी. से अधिक चलती है अनीता</h3>
<p style="text-align:justify;">अनीता यादव ने अपने डाक वितरण का गुरुग्राम का क्षेत्र जब सांझा किया तो समझ में आया कि वह औसतन रोजाना 15 किलोमीटर पैदल चलकर डाक बांटती है। इस हिसाब से वह अपनी नौकरी के 13 साल के सफर में 50 हजार किलोमीटर से अधिक पैदल चलते हुए डाक बांट चुकी हैं। गुरुग्राम के मुख्य डाकघर सदर बाजार व इसके आसपास का काफी क्षेत्र उन्हें के दायरे में आता है। वे रजिस्ट्री व आॅर्डिनरी डाक मिलाकर रोजाना करीब 300 डाक वितरित करती हैं। कंधे पर थैला, हाथों में डाक अगर ना हों तो अनीता को सूनापन लगता है। क्योंकि उसकी बोझ उठाने की भी आदत सी बन गई है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बच्चों को संस्कारित बना किया कामयाब</h3>
<p style="text-align:justify;">अपने अतीत में झांकते हुए अनीता कहती हैं कि पति अशोक कुमार के देहांत के बाद तीन बच्चों की परवरिश को लेकर चिंता जरूर हुई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। ना तो खुद परिवार का कहीं सिर नीचा होने दिया और ना ही बच्चों की वजह से उसे कभी कोई परेशानी हुई। बच्चों को भी शिक्षा दी कि जीवन में ईमानदारी के साथ कामयाबी हासिल करें। अनीता कहती हैं कि अपनी करीब 13 साल की नौकरी में उन्होंने कभी कामचोरी नहीं की। पूरी जिम्मेदारी के साथ काम किया। हर डाक को उसकी मंजिल तक पहुंचाने के लिए कई-कई बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। उन्होंने लगाए।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">अनीता के बारे में यहां लोग भी दावे के साथ इस बात को कहते हैं</li>
<li style="text-align:justify;">उन्होंने सदा जिम्मेदारी के साथ अपनी ड्यूटी निभाई है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">जरूरी हो, तभी लेती हैं छुट्टियां</h3>
<p style="text-align:justify;">अपने काम के प्रति जुनूनी अनीता यादव कहती हैं कि वह छुट्टी लेकर घर में आराम करने की बजाय काम को अहमियत देती हैं। अपने काम को पेंडिंग रखना उन्हें पसंद नहीं। उनका कहना है कि डाक ऐसी चीज है, जिससे किसी का भविष्य भी जुड़ा होता है। किसी का और बहुत जरूर डॉक्यूमेंट होता है। अगर हम ही उसे पहुंचाने में देरी करते हैं तो वह अपने फर्ज में कोताही होगी। हर डाक को वह उसी दिन संबंधित व्यक्ति तक पहुंचाने का प्रयास करती है। यह अलग बात है कि कोई पते पर ना मिले। डाक विभाग में वैसे तो छुट्टियां भी कम मिलती हैं, लेकिन उसने खुद भी छुट्टियां कम ही ली।</p>
<h3 style="text-align:justify;">हर कोई उनके काम को करता है सेल्यूट</h3>
<p style="text-align:justify;">खाकी वर्दी, कंधे पर थैला, थैले और हाथ में एरिया वाइज डाक होती हैं। जिस एरिया में वह जाती हैं, उसी एरिया की डाक थैले से निकालकर हाथ में रखती हैं। बच्चे से युवा हुए और युवा से अधेड़ हुए लोग जब अनीता को देखते हैं तो उसके जज्बे को सेल्यूट करते हैं। हर किसी की जुबां से अनीता के सम्मान में कशीदे सुने जा सकते हैं।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 14 Mar 2020 18:15:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>फर्श से अर्श पर पहुंची राज मिस्त्री की बेटी</title>
                                    <description><![CDATA[आभूषण और कीमती पत्थरों के काम को उसने तल्लीनता से सीखा और काबुल आकर इसी विधा में कारोबार शुरू कर दिया। सादत बानु जेम्स एंड ज्वेलरी तथा सादत बानु हैंडीक्राफ्ट्स की सीईओ शहला सादत के पास तीस महिला कारीगरों का स्टाफ काम कर रहा है
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/afghan-girl-did-not-give-up-the-struggle-and-courage-in-difficult-circumstances/article-12895"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/afghani-maiden.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">मुश्किल हालातों में अफगानी युवती ने संघर्ष और हिम्मत का नहीं छोड़ा दामन</h1>
<h1 style="text-align:center;">(Afghani maiden)</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3> युवा उद्यमी ने दो साल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित की कंपनी</h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>फरीदाबाद (राजेन्द्र दहिया/सच कहूँ)।</strong> विषम परिस्थितियों में रह कर भी एक लड़क़ी फर्श से अर्श तक पहुंच सकती है, इसका एक जीवंत उदाहरण है अफगानिस्तान के काबुल शहर से आई शहला सादत। (Afghani maiden)एक राजमिस्त्री के साधारण से घर में जन्म लेने वाली शहला तालिबानी कुंठित मानसिकता वाले देश में अपनी खुद की ज्वैलरी और हैंडलूम कंपनी का न केवल सफलतापूर्वक संचालन कर रही है, अपितु अपने वतन की गुरबत झेल रही महिलाओं की मदद भी कर रही है। शहला का जन्म अफगानिस्तान की उसी धरती बोहमिया में हुआ है, जहां कभी तालिबानी आतंकवादियों ने शांति और मानवता को अपने प्रेम से सींचने वाले महात्मा बुद्घ की विशालकाय प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया था। जान अली और निखबा के घर में 26 दिसंबर, 1995 को जन्मी शहला सादत छ: भाई-बहनों में तीसरे स्थान पर है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">चीन में सीखी जुमोलॉजी, अब बनी उद्यमी</h3>
<p style="text-align:justify;">शहला ने वर्ष 2017 में काबुल की हयात युनिवर्सिटी से जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद माता-पिता के प्रोत्साहन से वह चीन में चंचा शहर चली गई। वहां एक साल तक शहला ने जुमोलॉजी सीखी। आभूषण और कीमती पत्थरों के काम को उसने तल्लीनता से सीखा और काबुल आकर इसी विधा में कारोबार शुरू कर दिया। सादत बानु जेम्स एंड ज्वेलरी तथा सादत बानु हैंडीक्राफ्ट्स की सीईओ शहला सादत के पास तीस महिला कारीगरों का स्टाफ काम कर रहा है और लगभग दो सौ से अधिक महिलाएं उसके साथ हैंडलूम के व्यवसाय में जुड़ी हुई हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कई देशों में फैलाया कारोबार</h3>
<p style="text-align:justify;">हिंदुस्तान पहली बार आई शहला ने सूरजकुंड में स्टाल लगाने का प्रथम अनुभव प्राप्त कर रही है। वह इससे पहले दुबई इंटरनेशनल फेयर में स्टाल लगा चुकी है। एक आधुनिक एवं प्रगतिशील मुस्लिम उद्यमी ने दो साल में ही चीन, भारत, दुबई, कजाकिस्तान तक अपने व्यापार को फैला लिया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अलग सोच से बढ़ी आगे, घर का बनी सहारा</h3>
<p style="text-align:justify;">यही नहीं उसकी दो बड़ी बहनें जहां 17-18 साल की उम्र में घर बसा चुकी थी, वहीं 26 साल की शहला अभी अपने विवाह के बारे में सोच-विचार कर रही हैं। उसकी सोच यहीं तक सीमित नहीं है। घर में उसके पिता बीमार है। इस परिस्थिति से ना घबराकर वह अपने तीन भाईयों, 17 वर्षीय मोहम्मद रिजा को स्वीडन, 19 वर्षीय मो. अली को फ्रांस एवं 21 वर्षीय मो. दाउत को जर्मनी देश में पढ़ा रही है। घर व भाईयों का व्यय वह खुद वहन करती है। उसे अफगानिस्तान के राष्टÑपति मोहम्मद गनी की पत्नी बीबी गुल व उप उपराष्टÑपति अब्दुल्ला अब्दुल्ला सम्मानित कर चुके हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">भारत एक शांतिप्रिय देश</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">भारत देश की सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित शहला कहती है।</li>
<li style="text-align:justify;">अफगानिस्तान में करीब 27 करोड़ की आबादी आपस में लड़ती रहती है।</li>
<li style="text-align:justify;">वहां खून-खराबा मचा रखा है। जबकि भारत में कितनी शांति है ।</li>
<li style="text-align:justify;">यहां के नागरिक किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में कोई दखल नहीं देते, चाहे वह किसी धर्म या जाति का हो।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">इस्लाम की गलत तस्वीर की जा रही पेश</h3>
<ul>
<li>पांचों वक्त नमाज अता करने वाली शहला सादत का कहना है।</li>
<li>इस्लाम एक शांतिप्रिय धर्म है।</li>
<li>किंतु जेहाद के नाम पर उसके धर्म की जालिम तस्वीर दुनिया के सामने प्रस्तुत की जा रही है।</li>
<li>इस्लाम में कहीं भी महिलाओं को तरक्की ना करने देने का जिक्र नहीं है।</li>
<li>इसके बावजूद यदि वह अफगानिस्तान के किसी सीमा प्रांत में होती तो शायद उसका हश्र बुरा होता।</li>
<li>शहला को परिवार नियोजन पर भी कोई आपत्ति नहीं है और वह खुद चाहती है ।</li>
<li>शादी करने के बाद संतान दो तक ही सीमित रखे।</li>
</ul>
<p> </p>
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                <pubDate>Sun, 02 Feb 2020 20:28:07 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>डॉ लोहिया ने जलाई थी गोवा मुक्ति संग्राम की अलख</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर लुभाता भारत का खूबसूरत शहर गोवा 18 जून को क्रांति दिवस के रूप में मनाता है। इस दिन समाजवादी नेता डॉ. क्टर राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन का शंखनाद किया था। यह दिन गोवा की आजादी की लडाई के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/dr-lohia-had-burnt-alive-for-the-liberation-struggle-of-goa/article-4262"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/dr-lohia.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर लुभाता भारत का खूबसूरत शहर गोवा 18 जून को क्रांति दिवस के रूप में मनाता है। इस दिन समाजवादी नेता डॉ. क्टर राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन का शंखनाद किया था। यह दिन गोवा की आजादी की लडाई के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">पुर्तगालियों के 550 वर्ष के शासन से गोवा को आजादी दिलाने वाले डॉक्टर लोहिया ने 18 जून को गोवा के लोगों को एकजुट होने और पुर्तगाली शासन के खिलाफ लड़ने का संदेश दिया था। भारत को 1947 में आजादी मिल गई थी, लेकिन इसके 14 साल बाद भी गोवा पर पुर्तगाली अपना शासन जमाये बैठे थे। 19 दिसम्बर, 1961 को भारतीय सेना ने आॅपरेशन विजय अभियान शुरू कर गोवा, दमन और दीव को पुर्तगालियों के शासन से मुक्त कराया था</p>
<p style="text-align:justify;">18 जून 1946 को डॉ. राम मनोहर लोहिया ने गोवा जाकर स्थानीय निवासियों को पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन करने के लिए प्रेरित किया था। लंबे अरसे तक चले आंदोलन के बाद 19 दिसम्बर 1961 को गोवा को पुर्तगाली आधिपत्य से मुक्त कराकर भारत में शामिल कर लिया गया था। 1946 में आज ही के दिन डॉ.क्टर राममनोहर लोहिया ने पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन का नारा दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">तब अंग्रेजी साम्राज्य डूब रहा था, कई बड़े राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि अंग्रेजों के जाते ही पुर्तगाली भी गोवा से कूच कर जाएंगे। पर स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया सहमत नहीं थे कि बिना आंदोलन छेड़े ऐसा संभव हो पाएगा। हालांकि गोवा को पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करवाने में कई साल और लगे।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवा की आजादी का शंखनाद समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने किया था। आज भी वहाँ के लोकगीतों में डॉ. लोहिया का वर्णन पौराणिक नायकों की तरह होता है। गोवा की आजादी में लोहिया और उनके समाजवादी साथियों का बड़ा योगदान था।</p>
<p style="text-align:justify;">लोहिया ने पहली बार गोवा के आजादी के मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाया और लोगों का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुए। अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए मगर गोवा पर पुर्तगाल का कब्जा बना रहा। लोहिया गोवा मुक्ति आंदोलन के महान सेनानी थे। उन्होंने 1942 से ही गोवा मुक्ति आंदोलन का बीड़ा उठाया।</p>
<p style="text-align:justify;">15 जून 1946 को पंजिम में डॉ. लोहिया की सभा हुई जिसमें तय हुआ 18 जून से सविनय अवज्ञा प्रारम्भ होगा। पुलिस ने टैक्सी वालों को मना कर दिया था। डॉ. लोहिया मड़गाँव सभा स्थल घोड़ागाड़ी से पहुँचे। घनघोर बारिश, 20 हजार की जनता और मशीनगन लिए हुए पुर्तगाली फौज। गगनचुम्बी नारों के बीच डॉ. लोहिया के ऊपर प्रशासक मिराण्डा ने पिस्तौल तान दिया, लेकिन लोहिया के आत्मबल और आभामण्डल के आगे उसे झुकना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">पांच सौ वर्ष के इतिहास में गोवा में पहली बार आजादी का सिंहनाद हुआ। लोहिया गिरफ्तार कर लिए गए। पूरा गोवा युद्ध-स्थल बन गया। पंजिम थाने पर जनता ने धावा बोल कर लोहिया को छुड़ाने का प्रयास किया। एक छोटी लड़की को जयहिन्द कहने पर पुलिस ने काफी पीटा। 21 जून को गवर्नर का आदेश हुआ कि आम-सभा व भाषण के लिए सरकारी आदेश लेने की आवश्यकता नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">लोहिया चौक पर झण्डा फहराया गया। गोवा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा पुर्तगाल को तीन माह की नोटिस देकर लोहिया लौट आए। 26 जून 1946 के अंक में महात्मा गांधी ने लेख लिख कर लोहिया की गिरफ्तारी का पुरजोर विरोध किया।</p>
<p style="text-align:justify;">तीन महीने पश्चात डॉ. लोहिया दोबारा गोवा के मड़गाँव के लिए चले। उन्हें कोलेम में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 29 सितम्बर से 8 अक्टूबर तक उन्हें आग्वाद के किले में कैदी बनाकर रखा गया, बाद में अनमाड़ के पास लाकर छोड़ा गया। 2 अक्टूबर को अपने जन्मदिन के दिन गांधी जी ने लार्ड बेवेल से लोहिया की रिहाई के लिए बात की। लोहिया पर गोवा-प्रवेश के लिए मनाही हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवा मुक्ति आंदोलन के इतिहास में जिन लोगों ने अपना खून पसीना बहाया और जेल की यंत्रणा सही इस दिन उनका समरण देशवासियों के लिए जरुरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवा आंदोलन में समाजवादी नेता डॉ. लोहिया और उनके साथियों की भूमिका अविसमरणीय है जिन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए गोवा को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोहिया के लम्बे जनजागरण के बाद गोवा को आजादी मिली थी।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 Jun 2018 08:43:32 +0530</pubDate>
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                <title>‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’</title>
                                    <description><![CDATA[18जून 1858 को महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने देश को स्वतंत्र कराने हेतु जो आत्मोत्सर्ग किया, वह भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया। महारानी लक्ष्मीबाई के समान अतुलनीय पराक्रम, शौर्य, संगठन भावना और दूरदृष्टि विश्व इतिहास में यदा कदा ही दृष्टिगोचर होते हैं। यूं तो तात्या टोपे नि:संदेह अपूर्व पराक्रम […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-jhansi-ki-rani/article-1346"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/jhansi-ki-rani.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">18जून 1858 को महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने देश को स्वतंत्र कराने हेतु जो आत्मोत्सर्ग किया, वह भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया। महारानी लक्ष्मीबाई के समान अतुलनीय पराक्रम, शौर्य, संगठन भावना और दूरदृष्टि विश्व इतिहास में यदा कदा ही दृष्टिगोचर होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यूं तो तात्या टोपे नि:संदेह अपूर्व पराक्रम और शौर्य रखने वाले सेनापति थे परन्तु उनकी भी कुछ कमजोरियां थी, जैसे वे छापामार प्रणाली में विश्वास रखने वाले योद्धा थे परन्तु इस प्रणाली के नकारात्मक और तीव्र आक्रमण के प्रत्युत्तर में और भी तीव्र तथा प्रबल आक्रमण में वे कुछ अधिक ही विश्वास रखते थे। शत्रु के तीव्र आक्रमण के समय युद्ध भूमि से भागना नकारात्मक पक्ष है। कुंवर सिंह अपने शत्रु पर बाज की तरह झपटना चाहते थे जबकि तांत्या टोपे इस तीव्र आक्रमणकारी शत्रु को छकाना चाहते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">तांत्या टोपे को रानी का पत्र मिला। तुरंत ही तांत्या सेना लेकर झांसी पहुंचे और अंग्रेजों के पृष्ठभाग पर हमला बोल दिया। अंग्रेज सेना अब दो पाटों के बीच फंस गयी। एक ओर रानी की अनुशासित सेना थी तो दूसरी ओर थी तांत्या की भी़ड।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्याक्रमण को तांत्या के सैनिक न रोक सके। अंतत: तांत्या को मैदान छोड़ना पड़ा जिसका परिणाम यह निकला कि तांत्या टोपे की तोपें और गोला बारूद अंग्रेजों के हाथ लगा परन्तु इससे भी ब़डा परिणाम यह निकला कि भारतीय सैन्य नेतृत्व की विश्वसनीयता घट गयी और अंग्रेजों की हिम्मत बढ़ी, जिससे भारतीय सेना को ही नुकसान हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">झांसी त्याग कर रानी कालपी पहुंची जहां राव साहब और तांत्या टोपे के साथ ही बांदा, शाहगढ़ और बानापुर के राजा उनके साथ हो लिये परन्तु रानी साहिबा को छोड़कर किसी अन्य में कुशल सैन्य रचना की शक्ति न थी।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके सैनिकों में एकात्मकता, एक विचार, एक कार्यक्रम, अनुशासन तो था ही नहीं, साथ ही अपने संयुक्त नेतृत्व के प्रति पूर्ण निष्ठा न होकर अपने वास्तविक राजा के प्रति निष्ठा और वफादारी अधिक थी। अत: यह संयुक्त सेना एक मन, एक प्राण होकर सर ह्यूरोज का सामना नहीं कर पायी और पराजित हो गयी। इतनी विशाल सेना एकजुट होकर अंग्रेज सेना पर आक्रमण करती तो शायद अंग्रेजों को हार से कोई न बचा पाता।</p>
<p style="text-align:justify;">जब ग्वालियर पर इस क्रांतिकारी-संयुक्त सेना ने आक्रमण किया तो बिना किसी प्रतिरोध और बल प्रदर्शन के ही उनका अधिकार ग्वालियर पर हो गया। ग्वालियर महाराज जीयाजी राव आगरा भाग गये और सेना ने आत्म-समर्पण कर दिया। इस विजय से पेशवा सरदार फूले न समाये और विजयोल्लास में डूब गये।</p>
<p style="text-align:justify;">अपनी सेना को सुसज्जित करने और एकता के सूत्र में पिरो कर अनुशासित करने जैसी सीधी सी बात क्रान्ति नेताओं ने नहीं मानी। वस्तुत: भारत उसी दिन पराजित हो गया बाद में तो उसकी घोषणा मात्र होनी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय क्रान्तिकारी सरदार अमोद मंगल और विलास में आकण्ठ डूब गए। उन्हें होश तब आया जब सर ह्यूरोज ने विशाल सेना लेकर ग्वालियर पर तेजी से आक्रमण कर दिया। जीयाजी राव को ह्यूरोज के साथ देखकर उनके सरदार वापिस अपने महाराज के पास लौट गए। ऐसी खबर सुनकर क्रांतिकारी सरदार ज़डवत हो गये परन्तु लक्ष्मीबाई शांत और गंभीर थी।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी तलवार म्यान में गयी ही कब थी? फिर तो वही हुआ, जो होना था। रानी साहिबा वीरगति को प्राप्त हुई। भारत पुन: अंग्रेजों के हाथ में आ गया। क्रांति की ज्वाला अब हृदय में ही प्रज्ज्वलित होने लगी। 19 नवम्बर 1835 (जन्म) से 18 जून 1858 (मृत्यु) तक अर्थात 22 वर्ष 7 माह की आयु में ही जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के अद्वितीय शौर्यवान और पराक्रमी सेनापतियों को युद्धभूमि में घुटने टेकने पर मजबूर किया, भारतीय क्रांतिकारियों की सदैव ही प्रेरणा स्रोत रही, ज्योतिपुंज महारानी लक्ष्मीबाई को शत् शत् नमन।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-राम पंजवानी</strong></p>
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                <pubDate>Sat, 17 Jun 2017 23:36:11 +0530</pubDate>
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