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                <title>Decreasing - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>पर्यावरण: घटती हरियाली, बढ़ता प्रदूषण</title>
                                    <description><![CDATA[देश की राजधानी दिल्ली में सरकार द्वारा हजारों पेड़ काटने की अनुमति प्रदान किए जाने को लेकर विवाद खड़ा होने के बाद अंतत: दिल्ली सरकार द्वारा यह तर्क देते हुए राजधानी में पेड़ काटने के सभी आदेश रद्द कर दिए गए हैं कि पेड़ काटने के नियमों के उल्लंघन का मामला सामने आया है। राष्ट्रीय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/environment-decreasing-greenery-increasing-pollution/article-5001"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/pollution.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की राजधानी दिल्ली में सरकार द्वारा हजारों पेड़ काटने की अनुमति प्रदान किए जाने को लेकर विवाद खड़ा होने के बाद अंतत: दिल्ली सरकार द्वारा यह तर्क देते हुए राजधानी में पेड़ काटने के सभी आदेश रद्द कर दिए गए हैं कि पेड़ काटने के नियमों के उल्लंघन का मामला सामने आया है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) द्वारा भी दक्षिणी दिल्ली की कालोनियों के पुनर्विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई पर अस्थायी रोक लगाई जा चुकी है तथा दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पेड़ों की कटाई पर रोक लगाते हुए सरकार से सवाल किए हैं कि क्षतिपूरक वनीकरण नीति के तहत लगाए जाने वाले 10 छोटे पौधे एक बड़े पेड़ की बराबरी कैसे कर सकते हैं? कड़ी फटकार लगाते हुए हाईकोर्ट द्वारा दो टूक शब्दों में कहा गया कि दक्षिणी दिल्ली की सरकारी आवासीय कालोनियों के पुनर्निर्माण के नाम पर 16500 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव इस शहर को मरने के लिए छोड़ देने जैसा है। वैसे सरकारी परियोजनाओं के तहत 3300 पेड़ अब तक काटे भी जा चुके हैं। कैग की एक रिपोर्ट पर नजर डालें तो दिल्ली पहले से ही करीब नौ लाख पेड़ों की कमी से जूझ रही है और दूसरी ओर शहरीकरण की कीमत पर सरकारी आदेशों पर साल दर साल हजारों हरे-भरे विशालकाय वृक्षों का सफाया किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले 5-6 वर्षों के दौरान दिल्ली में नए आवासीय परिसर, भूमिगत पार्किंग, व्यापारिक केन्द्र खोलने और मार्गों को चौड़ा करने के लिए करीब बावन हजार छायादार वृक्षों का अस्तित्व मिटाया जा चुका है और इन्हीं पांच वर्षों के प्रदूषण के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि इस दौरान हरियाली घटने से दिल्ली में वायु प्रदूषण करीब चार सौ फीसदी बढ़ा है। अब मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है, जलवायु संकट गहरा रहा है और इन पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने का एक ही उपाय है वृक्षों की अधिकता। वायु प्रदूषण हो या जल प्रदूषण अथवा भू-क्षरण, इन समस्याओं से केवल ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर ही निपटा जा सकता है लेकिन इसके बावजूद दिल्ली में प्रदूषण की भयावह स्थिति होने पर भी साढ़े सोलह हजार वृक्षों को काटने का निर्णय सरकारी नीतियों पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">संभवत: इसीलिए दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पेड़ काटे जाने की मंजूरी देने पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या दिल्ली इस हालत में है कि वो इतने वृक्षों का विनाश झेल लेगी और क्या आवासीय परियोजना के लिए राजधानी में हजारों पेड़ काटे जाने को देश बर्दाश्त करेगा? पिछले कुछ समय में पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई रिपोर्टों में स्पष्ट हो चुका है कि दिल्ली दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार है। हर साल दिल्ली में करीब पांच हजार लोग वायु प्रदूषण के कारण दम तोड़ देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इतनी बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाने की योजना के विरोध में स्वर बुलंद होने पर सरकारी एजेंसियों द्वारा तर्क दिया गया कि जितने पेड़ काटे जाने हैं, उसके बदले 10 गुना वृक्ष लगाए जाएंगे किन्तु वृक्षारोपण के मामले में सरकारी निष्क्रियता के मामले किसी से छिपे नहीं हैं। कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2015-17 के बीच दिल्ली में 13018 वृक्ष काटे गए थे और उसके बदले 65090 पौधे लगाए जाने थे किन्तु लगाए गए मात्र 21048 पौधे और इनमें भी बहुत सारे सजावटी पौधे लगाकर खानापूर्ति कर दी गई। मामला सामने आने पर शहरी विकास मंत्रालय द्वारा रटा-रटाया जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया गया कि मंत्रालय कम पेड़ लगाने के मामले की जांच कराएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मैट्रो निर्माण के दौरान भी हजारों पेड़ काटे गए थे किन्तु उसके बदले नए पौधे लगाने के दावों के बावजूद पौधे नहीं लगाए गए। वैसे भी पेड़ों को काटने के बदले जो पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से महज दस फीसदी ही बचे रह पाते हैं और ये छोटे-छोटे पौधे प्रदूषण से निपटने तथा वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने में मददगार साबित नहीं होते। इन पौधों को वृक्ष का रूप लेने में 8-10 साल लग जाते हैं और नीम, बरगद तथा पीपल जैसे वृक्षों को फलने-फूलने में तो 25-30 साल का समय लग जाता है, तब तक पर्यावरण के साथ क्या होगा? ऐसे में पहले से ही पर्यावरण प्रदूषण से बुरी तरह जूझ रही दिल्ली में हजारों छायादार पेड़ काटे जाने से आपातकालीन स्थिति पैदा हो सकती है। किसी भी क्षेत्र में वातावरण को शुद्ध बनाए रखने के लिए वहां वन क्षेत्र 33 फीसदी होना चाहिए किन्तु दिल्ली में यह सिर्फ 11.88 फीसदी है और दिल्ली से सटे इलाकों फरीदाबाद, नोएडा तथा गाजियाबाद की हालत तो बहुत बुरी है, जहां वन क्षेत्र क्रमश: 4.32, 2.43 तथा 1.89 फीसदी ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
ऊंचे और पुराने वृक्ष काटे जाने से दिल्ली में पक्षियों की 15 प्रजातियों का जीवन भी खतरे में है। दरअसल दिल्ली में स्पॉटेड आउलेट, कॉपरस्मिथ बारबेट, ब्राउन हेडेड बारबेट, अलेवजेंडर पैराकीट, रोडविंग पैराकीट, ग्रेटर प्लेनबैक वुडपैकर, ग्रे हॉर्नबिल, ब्लैक काइट, ब्लैक शोल्डर काइट, एशियन पैराडाइज फ्लाईकैचर इत्यादि पक्षियों की 15 प्रजातियां ऐसी हैं, जो ऊंचे दरख्तों पर घोंसला बनाते हैं और अपने खान-पान तथा रहन-सहन की आदतों के चलते ऊंचे पेड़ों पर ही रहना पसंद करते हैं, इनमें कुछ प्रजातियां दुर्लभ पक्षियों की भी हैं। ऐसे ऊंचे वृक्ष काटे जाने से इन पक्षियों का घर भी उजड़ता है और पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि ऊंचे दरख्तों की कमी की वजह से पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पक्षियों की कई प्रजातियां दिल्ली का रूख करने से कतराने लगी हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हाल ही में अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि दिल्ली कभी पक्षियों की आबादी को लेकर मशहूर हुआ करती थी किन्तु आज स्थिति विपरीत है, पेड़-पौधों व पक्षियों के लिए यहां जगह कम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
सुखद स्थिति यह है कि आम जन अब पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों के महत्व को लेकर जागरूक हुआ है और दिल्ली में भी उत्तराखण्ड के करीब पांच दशक पुराने चिपको आन्दोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपककर इन्हें जीवनदान देने के लिए आन्दोलन शुरू हुआ। हम इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि दिल्ली में यहां की आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से नौ लाख पेड़ों की कमी है और यहां स्वस्थ जीवन के लिए प्राणवायु अब बहुत कम बची है। स्वच्छ प्राणवायु के अभाव में लोग तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का संक्रमण, न्यूमोनिया, लकवा इत्यादि के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हम प्रकृति से अपने हिस्से की आॅक्सीजन तो ले लेते हैं किन्तु प्रकृति को उसके बदले में लौटाते कुछ भी नहीं। दरअसल एक पेड़ सालभर में लगभग सौ किलो आॅक्सीजन देता है जबकि एक व्यक्ति को वर्षभर में साढ़े सात सौ किलो आॅक्सीजन की जरूरत होती है। नीम, बरगद, पीपल जैसे बड़े छायादार वृक्ष, जो 50 साल या उससे ज्यादा पुराने हों, उनसे तो प्रतिदिन 140 किलो तक आॅक्सीजन मिलती है। इस हिसाब से अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि ऐसे छायादार पुराने वृक्ष काटने से पर्यावरण को कितनी भारी क्षति पहुंचती है और यही वजह है कि ऐसे छायादार वृक्ष अपने आसपास के परिवेश में लगाने की प्राचीन भारतीय परम्परा रही है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>योगेश कुमार गोयल</strong></p>
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<p> </p>
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                <pubDate>Wed, 25 Jul 2018 05:02:01 +0530</pubDate>
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                <title>घटा लिंगानुपात तो पंचायत ने उठाया ऐतिहासिक कदम</title>
                                    <description><![CDATA[अहमदपुर दारेवाला में बेटी जन्म पर 2100 रुपए मिलेगी प्रोत्साहन राशि सच क हूँ-अनिल गोरीवाला। लिंगानुपात में सुधार लाने के लिए अब पंचायतों ने भी कमर कस ली है। बेटियां पहले कोख में मार दी जाती, कुछ जन्म के बाद हालात यह है लिंगानुपात में असमानताएं चिंता बनी है। जो लोग पहले बेटों के लिए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/historical-steps-raised-by-the-panchayat-on-decreasing-gender-ratio/article-4349"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/anil-01.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">अहमदपुर दारेवाला में बेटी जन्म पर 2100 रुपए मिलेगी प्रोत्साहन राशि</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच क हूँ-अनिल</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>गोरीवाला।</strong> लिंगानुपात में सुधार लाने के लिए अब पंचायतों ने भी कमर कस ली है। बेटियां पहले कोख में मार दी जाती, कुछ जन्म के बाद हालात यह है लिंगानुपात में असमानताएं चिंता बनी है। जो लोग पहले बेटों के लिए रोते ओर फिर बेटे के लिए बहू न मिलने पर परेशान होते हैं। बहरहाल सकून इस बात का है हालात अब पहले के मुकाबले बदल गए है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेटी बचाओ बेटी पढाओ अभियान के तहत गांव की पंचायत ने मिसाल पैदा की है। जहां हरियाणा के एक गांव ने भ्रूण हत्या को रोकने और बेटी को बचाने के लिए ऐतिहासिक पहल की हैं। वहीं गांव में किसी भी परिवार में बेटी पैदा होने पर उस बेटी को 2100 रुपये की उपहार राशि पंचायत की ओर से दी जाएगी। खंड मंडी डबवाली के 3800 की आबादी वाले गांव अहमदपुर दारेवाला की पंचायत का बेटियों के हित में एक ऐतिहासिक फैसले का फरमान जारी किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल ग्राम पंचायत द्वारा गांव में बेटियों के लिंगानुपात में कमी को देखते हुए पंचायत ने चिंता जाहिर की और एक कड़ा फैसला लिया हैं। जहां पर पंचायत ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत गांव में लगातार गिरते लिंगानुपात के स्तर को सुधारने के लिए बेटी के जन्म पर 2100 रुपए प्रोत्साहन राशि दिए जाने का प्रस्ताव पास किया है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">1000 लड़कों के पीछे महज 850 लड़कियां: सरपंच</h2>
<p style="text-align:justify;">सरपंच शारदा देवी ने बताया कि यह फैसला इस लिए लिया गया है क्योंकि गांव में लिंगानुपात में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। गांव में महज 1000 लड़कों के पीछे 850 लड़कियां हैं जो कि चिंता का विषय है। जिस घर में बेटी पैदा होगी उस बेटी के सम्मान के रूप में पंचायत द्वारा 2100 रुपये की राशि दी जाएगी ताकि गांव में बेटियों की संख्या बढ़ सके ।</p>
<h2 style="text-align:justify;">ग्राम पंचायत का फैसला सराहनीय: चरणजीत</h2>
<p style="text-align:justify;">आदर्श युवा क्लब के प्रधान चरणजीत मेहरड़ा ने बताया कि गांव की ग्राम पंचायत ने जो बेटी के जन्म पर 2100 रुपए प्रोत्साहन राशि देने का फैसला लिया है यह बहुत सराहनीय कदम है। क्लब इस फैसले का स्वागत करता है क्योंकि पिछले काफी सालों से दारेवाला में लिंगानुपात चिंता का विषय बना हुआ था।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 21 Jun 2018 08:57:04 +0530</pubDate>
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                <title>बादलों के बरसने की घट रही है क्षमता</title>
                                    <description><![CDATA[वैसे तो इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने अच्छी बारिश की उम्मीद जगाई है, लेकिन इसके बाद उसकी दूसरी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। 50 वर्षों के अध्ययन पर केंद्रित इस रिपोर्ट के अनुसार, मौसम में जो बादल पानी बरसाते हैं, उनकी सघनता धीरे-धीरे घट रही है। इस नाते कमजोर मानसून की आशंका भी जता […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/cloud-rainy-season-is-decreasing/article-1373"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/rain-21.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वैसे तो इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने अच्छी बारिश की उम्मीद जगाई है, लेकिन इसके बाद उसकी दूसरी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। 50 वर्षों के अध्ययन पर केंद्रित इस रिपोर्ट के अनुसार, मौसम में जो बादल पानी बरसाते हैं, उनकी सघनता धीरे-धीरे घट रही है। इस नाते कमजोर मानसून की आशंका भी जता दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे आशय यह निकलता है कि देश में मानसून में बारिश का प्रतिशत लगातार घट रहा है। दरअसल जो बादल पानी बरसाते हैं, वे आसमान में छह से साढ़े छह हजार फीट की ऊंचाई पर होते हैं। 50 साल पहले ये बादल घने भी होते थे और मोटे भी होते थे। परंतु अब साल-दर-साल इनकी मोटाई और सघनता कम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि यह अध्ययन सही है तो देश के नीति-नियंताओं को चेतने की जरूरत है, क्योंकि हमारी खेती-किसानी और 70 फीसदी आबादी मानसून की बरसात से ही रोजी-रोटी चलाती है और देश की समूची आबादी को अनाज, दालें और तिलहन उपलब्ध कराती है। देश के ज्यादातर व्यवसाय भी कृषि आधारित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">देश की जीडीपी में कृषि का योगदान 15 फीसदी है, फिर भी किसान आर्थिक असुरक्षा की चपेट में है। इसी कारण किसान की आत्महत्या का सिलसिला जारी है। दरअसल हमारे यहां अभी भी मौसम की भविष्यवाणी असलियत के आइने में ठीक नहीं बैठती, इसलिए मौसम विभाग के अनुमानों पर संदेह बना रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्येक साल अप्रैल-मई में मानसून आ जाने की अटकलों का दौर शुरू हो जाता है। यदि औसत मानसून आये तो देश में हरियाली और समृद्धि की संभावना बढ़ती है और औसत से कम आये, तो पपड़ाई धरती और अकाल की क्रूर परछाईयां देखने में आती हैं। मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार यदि 90 प्रतिशत से कम बारिश होती है, तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">90-96 फीसदी बारिश इस दायरे में आती है। 96-104 फीसदी बारिश को सामान्य मानसून कहा जाता है। यदि बारिश 104-110 फीसदी होती है, तो इसे सामान्य से अच्छा मानसून कहा जाता है। 110 प्रतिशत से ज्यादा बारिश होती है, तो इसे अधिकतम मानसून कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियों को सटीक इसलिए नहीं माना जाता, क्योंकि वह अनुमानों पर खरी नहीं उतरती हैं। 2016 में मौसम विभाग ने 106 प्रतिशत बारिश की भविष्यवाणी की थी। पानी बरसा तो इतना ही, लेकिन महाराष्ट्र का मराठवाड़ क्षेत्र और तमिलनाडू सूखे रह गए। 2015 में विभाग ने 93 प्रतिशत बारिश होने की भविष्यवाणी की थी, किंतु हुई 86 प्रतिशत।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी तरह 2014 में 93 प्रतिशत की भविष्यवाणी थी, किंतु रह गई 89 प्रतिशत। गत आठ साल के आंकड़ों में एक भी साल भविष्यवाणी सटीक नहीं बैठी। इसलिए मौसम विभाग के अनुमान भरोसे के लायक नहीं होते। यदि किसान इन भविष्यवाणियों के आधार पर फसल बोए, तो उसे नाकों चने चबाने पड़ जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर हमारे मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान आसन्न संकटों की क्यों सटीक जानकारी देने में खरे नहीं उतरते? क्या हमारे पास तकनीकी ज्ञान अथवा साधन कम हैं, अथवा हम उनके संकेत समझने में अक्षम हैं? मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो जब उत्तर-पश्चिमी भारत में मई-जून तपता है और भीषण गर्मी पड़ती है, तब कम दाब का क्षेत्र बनता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस कम दाब वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के निकट से हवाएं दौड़ती हैं। दूसरी तरफ धरती की परिक्रमा सूरज के इर्द-गिर्द अपनी धुरी पर जारी रहती है। निरंतर चक्कर लगाने की इस प्रक्रिया से हवाओं में मंथन होता है और उन्हें नई दिशा मिलती है। इस तरह दक्षिणी गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही पलटकर कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैंं।</p>
<p style="text-align:justify;">ये हवाएं भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकराकर दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवेश करता है और दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर ओडिशा, पश्चिम-बंगाल, बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल-प्रदेश हरियाणा और पंजाब तक चलती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली हवाएं आन्ध्र-प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्टÑ, मध्य-प्रदेश और राजस्थान में बरसती हैं। इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कश्यप सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज का प्रभाव भी पड़ता है। प्रशांत महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाएं भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं। वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती है, तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमण्डल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊंचाईयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिये कम्प्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इनसे जो आंकड़ें इकट्ठे होते हैं, उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है। हमारे देश में 1875 में मौसम विभाग की बुनियाद रखी गई थी। आजादी के बाद से मौसम विभाग में आधुनिक संसाधनों का निरंतर विस्तार होता चला आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">विभाग के पास 550 भू-वेधशालाएं, 63 गुब्बारा केन्द्र, 32 रेडियो पवन वेधशालायें, 11 तूफान संवेदी, 8 तूफान सचेतक रडार और 8 उपग्रह चित्र प्रेषण एवं ग्राही केन्द्र हैं। इसके अलावा वर्षा दर्ज करने वाले 5 हजार पानी के भाप बनकर हवा होने पर निगाह रखने वाले केन्द्र, 214 पेड़-पौधों की पत्तियों से होने वाले वाष्पीकरण को मापने वाले, 38 विकिरणमापी एवं 48 भूकंपमापी वेधशालाएं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बरसने वाले बादल बनने के लिये गरम हवाओं में नमी का समन्वय जरूरी होता है। हवाएं जैसे-जैसे ऊंची उठती हैं, तापमान गिरता जाता है। अनुमान के मुताबिक प्रति एक हजार मीटर की ऊंचाई पर पारा 6 डिग्री नीचे आ जाता है। यह अनुपात वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत ट्रोपोपॉज तक चलता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस परत की ऊंचाई यदि भूमध्य रेखा पर नापें तो करीब 15 हजार मीटर बैठती है। यहां इसका तापमान लगभग शून्य से 85 डिग्री सेन्टीग्रेट नीचे पाया गया है। यही परत धु्रव प्रदेशों के ऊपर कुल 6 हजार मीटर की ऊंचाई पर भी बन जाती है और तापमान शून्य से 50 डिग्री सेन्टीग्रेट नीचे होता है। इसी परत के नीचे मौसम का गोला या ट्रोपोस्फियर होता है, जिसमें बड़ी मात्रा में भाप होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भाप ऊपर उठने पर ट्रोपोपॉज के संपर्क में आती है। ठंडी होने पर भाप द्रवित होकर पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें बनाती है। पृथ्वी से 5-10 किलोमीटर ऊपर तक जो बादल बनते हैं, उनमें बर्फ के बेहद बारीक कण भी होते हैं। पानी की बूंदें और बर्फ के कण मिलकर बड़ी बूंदों में तब्दील होते हैं और वर्षा के रूप में धरती पर टपकना शुरू होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे यहां एक ओर अरब सागर है और दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी है और इन सब के ऊपर हिमालय के शिखर हैं। इस कारण देश का जलवायु विविधतापूर्ण होने के साथ प्राणियों के लिये बेहद हितकारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसीलिए पूरे दुनिया के मौसम वैज्ञानिक भारतीय मौसम को परखने में अपनी बुद्घि लगाते रहते हैं। इतने अनूठे मौसम का प्रभाव देश की धरती पर क्या पड़ेगा, इसकी भविष्यवाणी करने में हमारे वैज्ञानिक क्यों अक्षम रहते हैं, इस सिलसिले में ऐसा माना जाता है कि आयातित सुपर कम्प्यूटरों की भाषा ’अलगोरिथम’ वैज्ञानिक ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कम्प्यूटर भले ही आयातित हों, लेकिन इनमें मानसून के डाटा स्मरण में डालने के लिये जो भाषा हो, वह देशी हो, हमें सफल भविष्यवाणी के लिये कम्प्यूटर की देशी भाषा विकसित करनी होगीऊ क्योंकि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिमालय भारत में हंै, अमेरिका अथवा ब्रिटेन में नहींऊ लिहाजा जब हम वर्षा के आधार श्रोत की भाषा पढ़ने व संकेत परखने में सक्षम हो जाएंगे तो मौसम की भविष्यवाणी भी सटीक बैठेगी?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-प्रमोद भार्गव </strong></p>
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                <pubDate>Sun, 18 Jun 2017 23:23:23 +0530</pubDate>
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