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                <title>Mansoon - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Punjab Weather: पंजाब, हरियाणा में झमाझम बारिश के आसार, मौसम विभाग ने जारी किया अलर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[सच कहूँ/संदीप सिंहमार। Punjab, Haryana Weather Update Today सावन के महीने में मॉनसूनी बारिश का इंतजार करने वाले लोगों को अब राहत व आफत दोनों एक साथ मिलने वाली हैं। भारत मौसम विभाग के अपडेटेड मौसम बुलेटिन के अनुसार बिहार वे तेलंगाना को छोड़कर वर्तमान में पूरे देश भर में तेज बारिश की संभावना बनी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/punjab-haryana-weather-update-today/article-49721"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/weather-news1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ/संदीप सिंहमार। </strong>Punjab, Haryana Weather Update Today सावन के महीने में मॉनसूनी बारिश का इंतजार करने वाले लोगों को अब राहत व आफत दोनों एक साथ मिलने वाली हैं। भारत मौसम विभाग के अपडेटेड मौसम बुलेटिन के अनुसार बिहार वे तेलंगाना को छोड़कर वर्तमान में पूरे देश भर में तेज बारिश की संभावना बनी हुई है। बारिश का यह दौर 10 जुलाई तक जारी रहेगा। यदि भारत मौसम विभाग के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो वर्तमान तक दक्षिण भारत में जहां औसत से कम बारिश हुई है। वहीं उत्तर भारत में औसतन रुप से बारिश दर्ज की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन दक्षिण व दक्षिण पश्चिम हरियाणा में अभी तक मानसून की बारिश शुरू हुई नहीं हुई है। शुक्रवार को सुबह होते ही गुरुग्राम में दिल्ली व एनसीआर में तेज बारिश का दौर शुरू हुआ। देखते ही देखते सड़कें दरिया बन गई। भारत मौसम विभाग के दिल्ली केंद्र से जारी हुए मौसम बुलेटिन के अनुसार तेलंगाना व बिहार को छोड़कर शेष भारत में अगले 4 दिनों तक तेज बारिश चलती रहेगी।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/home-remedies/">Home Remedies: बरसात के सीजन में कपड़ों की बदबू से हैं परेशान, तो अपनाएं ये टिप्स और आसान सा समाधान</a></p>
<h4 style="text-align:justify;">अमरनाथ यात्रा रोकी, बदरीनाथ हाईवे भी बंद | Punjab Weather</h4>
<p style="text-align:justify;">दूसरी तरफ भारी बारिश के चलते जम्मू कश्मीर में अमरनाथ यात्रा रोक दी गई है। वहीं बद्रीनाथ हाईवे पर भी पत्थर गिरने की वजह से हाईवे को रोकना पड़ा। उत्तराखंड के धारचूला क्षेत्र में बादल फटने से करीब 200 लोग फंस गए। रेस्क्यू करने गई एसडीआरएफ की टीम को भी बारिश के पानी में समस्या का सामना करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश में मध्यप्रदेश में वीरवार से हो रही गरज-चमक के साथ बारिश से बिजली गिरने के कारण अब तक 13 लोगों की मौत हो गई है। केरल में भी इतनी भारी बारिश हुई की सड़कों पर नाव चलती नजर आ रही है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">हरियाणा के 17 जिलों में तेज बारिश का अलर्ट | Punjab, Haryana Weather</h3>
<p style="text-align:justify;">मौसम विभाग के चंडीगढ़ केंद्र के मौसम बुलेटिन के अनुसार हरियाणा के 17 जिलों में तेज बारिश को लेकर येलो अलर्ट जारी किया गया है। इन जिलों में पंचकूला, कुरुक्षेत्र,कैथल, करनाल, यमुनानगर, अंबाला, चंडीगढ़,महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, झज्जर, गुरुग्राम, नुहं,फरीदाबाद, पलवल, रोहतक, पानीपत व सोनीपत शामिल है। क्षेत्रों में लगातार चार दिनों तक यानी 10 जुलाई तक तेज बारिश का येलो अलर्ट जारी रहेगा।</p>
<h4 style="text-align:justify;">दक्षिण व दक्षिण-पश्चिम हरियाणा में अभी बारिश के कोई आसार नहीं</h4>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा दक्षिण व दक्षिण-पश्चिम हरियाणा में 7 जुलाई से लेकर 10 जुलाई तक बारिश के कोई आसार नहीं है। इस दौरान शुक्रवार को दिन भर इन क्षेत्रों में मौसम परिवर्तनशील रहने के साथ-साथ सिर्फ गरज-चमक के साथ महज बूंदाबांदी हो सकती है। इन जिलों में हिसार, सरसा, फतेहाबाद, भिवानी, चरखी-दादरी व जींद शामिल है। इससे पहले भी प्रदेश भर में मॉनसून एक्टिव रहने के बावजूद भी इन जिलों में अब तक बारिश नहीं हुई है। सिर्फ हल्की बूंदाबांदी के कारण गर्मी से राहत जरूर मिली है। इसी तरह चलता रहा तो दक्षिण व दक्षिण पश्चिम हरियाणा में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">हिमाचल: मानसून की बारिश से कुल 352 करोड़ रुपये का नुकसान | Himachal weather</h3>
<p style="text-align:justify;">हिमाचल प्रदेश में पिछले 14 दिनों में मानसूनी बारिश से कुल 352 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। एक अधिकारी ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। महत्वपूर्ण कालका शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या -5 और धर्मपुर-कसौली सड़क के अलावा लगभग दो दर्जन सड़कें भूस्खलन और भारी बारिश के बाद फुटपाथों के धंसने से प्रभावित हैं। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार भारी बारिश के कारण भारी पत्थरों के ढहने, भूस्खलन, सड़कों के बह जाने और फुटवॉल के धंसने से लोक निर्माण विभाग और एनएचएआई को भारी नुकसान हुआ है। राज्य में हजारों संपर्क सड़कें बह गई हैं या मिट्टी का भारी कटाव हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">शुक्रवार को मानसून का केंद्र सोलन, सिरमौर और शिमला जिले की मध्य पहाड़ियां थीं। आज सुबह परमानो के पास फोरलेन पर भारी चट्टानें गिरने से कुछ चलते वाहन बाल-बाल बचे। भारी बारिश के कारण धरमौर कसौल सड़क भी बाधित हो गई है क्योंकि कनेक्टिंग रोड धंस गई है। पिछले 24 घंटों में टूरिस्ट रिजॉर्ट कसौली में 80 मिमी, धर्मपुर में 68 मिमी और अर्की में 60 मिमी बारिश हुई। मंडी के पंडोह में 45 मिमी और हमीपुर में 33 मिमी बारिश हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य लोक निर्माण विभाग को 200 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ। जल शक्ति विभाग (आईपीएच) को 127 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। लगभग 43 लोगों की मौत हो गई और लगभग 80 लोग घायल हो गए। चार लोग लापता हैं जिनमें से एक सड़क दुर्घटना में, दो डूबने से और एक बाढ़ में डूबने से लापता है। मानसून के कहर में दस घर पूरी तरह और 51 आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गये। राज्य में पशुओं की मौत का आंकड़ा 354 हो गया है. मानसून की शुरुआत के बाद 24 जून से 12 भूस्खलन, एक बादल फटने और 11 अचानक बाढ़ दुर्घटनाएं दर्ज की गईं।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Jul 2023 10:52:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>बाढ़ की विभीषिका!</title>
                                    <description><![CDATA[दक्षिणी-पश्चिमी मानसून में एकाएक आई तेजी की वजह से इस समय देश के उत्तर तथा उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने वहां का जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। उत्तराखंड, ओडिशा, बिहार, असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश आदि राज्य बाढ़ की चपेट में हैं। दुखद है कि बाढ़ का यह स्वरुप धीरे-धीरे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/flood-of-the-cataclysmic/article-2454"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/flood.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दक्षिणी-पश्चिमी मानसून में एकाएक आई तेजी की वजह से इस समय देश के उत्तर तथा उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने वहां का जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। उत्तराखंड, ओडिशा, बिहार, असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश आदि राज्य बाढ़ की चपेट में हैं। दुखद है कि बाढ़ का यह स्वरुप धीरे-धीरे जानलेवा होता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">केवल पूर्वोत्तर से अब तक सौ से अधिक लोगों के मरने की खबरें आई हैं। सबसे बुरा असर प्रभावित इलाकों के ग्रामीण समाज तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। जलप्लावन की वजह से अनेक गांव तबाह हो चुके हैं, लाखों लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। बेजुबान पशुओं के लिए भी यह बाढ़ आफत साबित हो रही है। वहीं, लाखों हेक्टेयर भूमि पर खड़ी फसलें भी नष्ट हो चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, बरसात के महीने में बाढ़ आना कोई नई बात नहीं है। जून से सितंबर तक दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के चार महीने की समयावधि में होने वाली अत्यधिक वर्षा से उत्पन्न बाढ़ की वजह से मुख्यत: उत्तर तथा पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में हालात नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दृश्य कुछ पल के लिए मरघट-सा हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक तरफ, लोगों के समक्ष सुरक्षित स्थानों पर जाकर अपने जीवन को बचाने की चुनौती होती है, वहीं इसके पश्चात प्रभावित आबादी के बीच भोजन, पेयजल, दवा जैसी मूलभूत सुविधाओं को प्राप्त करने की व्याकुलता भी बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा समय में नदियों के उफान पर बहने के कारण करोड़ों लोगों का जनजीवन प्रभावित हो गया है। रेल की पटरियों और सड़कों पर पानी भर जाने से यातायात व्यवस्था पूरी तरह ठप हो चुकी है। जबकि, मूसलाधार बारिश की वजह से संचार व्यवस्था भी बाधित हो चुकी है। एनडीआरएफ की कई टीमें तत्काल सहायता के लिए उपलब्ध कराई जा रही हैं, ताकि लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में बाढ़ की विभीषिका से प्रतिवर्ष लाखों लोग हताहत होते हैं। इसके अलावा इस आपदा से बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि भी होती है। गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी, महानन्दा, दामोदर, हुगली, गंडक, कावेरी, कृष्णा, सतलुज आदि नदियाँ देश में बाढ़ का कारण बन रही हैं। ये सारी नदियाँ प्राय: हर साल तबाही लाकर अनगिनत परिवारों की जिंदगी सूनी करती हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाली आबादी तो हर साल इसी डर के साये में अपना जीवन व्यतीत करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में लगभग 400 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ के खतरे वाला है, जिसमें से प्रतिवर्ष औसतन 77 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित होता है। हर साल लगभग 35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की फसलें नष्ट हो जाती हैं। योजना आयोग के एक अनुमान के अनुसार, देश में प्रतिवर्ष औसतन 1,439 लोग बाढ़ के कारण मारे जाते हैं। जबकि, इस वजह से फसलों, मकानों, मवेशियों तथा व्यक्तिगत-सार्वजनिक संपत्तियों का बड़े पैमाने पर नुकसान भी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब यह है कि देश के किसी भी हिस्से में जब भी बाढ़ आती है तो हमारे सामने नदियों की मंद पड़ी गति का प्रश्न खड़ा हो जाता है। दरअसल, देश में बारहमासी नदियों के साथ-साथ बरसाती नदियां भी प्रदूषण की मानक रेखा से ऊपर बह रही हैं। गाद-मलबों की अधिकता होने के कारण नदियों की प्राकृतिक गति सुस्त पड़ गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में, हल्की बारिश होने पर भी नदियां जल संग्रहण नहीं कर पाती हैं और बाढ़ के फैलाव का सबसे बड़ा कारण बन जाती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट की मानें, तो देश की 445 नदियों में से 275 नदियां अभी भी प्रदूषित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बढ़ते औद्योगीकरण, कल-कारखाने से अनियंत्रित मात्रा में निकलते अशोधित अपशिष्ट तथा सीवरेज से निकलने वाली गंदगियों की वजह से देश के हर कोने में नदियां प्रदूषण के बोझ से दबी जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में लगता है कि सरकार की नदी जोड़ो परियोजना भी निरर्थक साबित होगी, क्योंकि गाद-मलबों की अधिकता की वजह से नदियां अब सतत रुप से ना तो प्रवाहित हो पा रही हैं और ना ही उनमें अब जल धारण करने की क्षमता ही शेष है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक, सरकार ने गंगा और यमुना जैसी चंद नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए करोड़ों रुपये की योजनाओं को मूर्त रूप दिया है, किन्तु सैकड़ों नदियां आज भी सरकारी उपेक्षा की शिकार हैं। यही उपेक्षित नदियां बाढ़ को आमंत्रण दे रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक, बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। लेकिन, इसके लिए आवश्यक दशाओं के निर्माण में मानव और उसकी स्वार्थपरक क्रियाओं को किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं आँका जा सकता। दरअसल, यह सब नतीजा है विकास के उस आधुनिक दृष्टिकोण का, जिसके तहत मानव प्रकृति को अपना मित्र समझने की बजाय, गुलाम समझ रहा है। वनों की अधिकता मृदा को जकड़े रखती है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन कृषिगत तथा औद्योगिक आवश्यकता की पूर्ति की खातिर जंगलों का बड़े पैमाने पर सफाया हो रहा है। ऐसे भू-क्षेत्र बाढ़ के जल को रोके रखने में अक्षम होते हैं, नतीजा तबाही आती है। वर्षा के आगमन से पूर्व जलस्रोतों से गादों की सफाई होनी चाहिए थी। लाखों तालाब तथा डोभा का निर्माण कराये जाने के साथ लोगों को ‘वर्षा जल संग्रहण’ के लिए जागरुक किया जाना चाहिए था। लेकिन, यह सब नहीं किया गया। नतीजा, हमारे सामने है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, बाढ़ आने पर पर्यावरणविदों तथा देश के कथित बौद्धिक वर्ग के लोगों के बीच विकास और पर्यावरण में संतुलन विषय पर चचार्ओं और चिंतन का दौर शुरू हो जाता है, लेकिन बाढ़ का पानी जैसे-जैसे कम होता जाता है, उसी अनुपात में पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा भी गौण होने लगता है। 2013 में उत्तराखंड, 2014 में जम्मू-कश्मीर तथा 2015 में तमिलनाडु में आई बाढ़ जनित विपदा के बाद उम्मीद थी कि मौजूदा हालात बदलेंगे,</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात होता नजर आया है। मशहूर पर्यावरणविद सुंदरलाल बहगुणा, जल-पुरुष राजेन्द्र सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर जैसे लोग लंबे समय से इस दिशा में सरकार को आगाह करने का काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी बातों को न तो सुना जाता है और न तो उसपर चर्चा ही होती है। आज जरुरत है विकास के सततपोषणीय स्वरुप को अपनाने की।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, प्राकृतिक आपदाएं प्रकृति की एक नियमित प्रक्रियाएं होती हैं। ऐसा नहीं है कि पहले प्रकृति में ये सारी क्रियाएं नहीं होती थीं, लेकिन उसकी सीमा निश्चित थी और उससे नुकसान भी नाममात्र का होता था। अब विकास की अंधी दौड़ में हम शायद यह भूल गए हैं कि वैकासिक आवश्यकताओं की पूर्ति के दौरान प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा न करने पर कालांतर में हमें प्रकृति के कोप का भाजन बनना पड़ता है। विगत कुछ वर्षों में भूकंप, सुनामी, बाढ़, सूखा जैसी आपदाओं ने धरा पर क्षणिक समयंतराल में दस्तक देना शुरू किया है, जिससे हर साल लाखों लोग हताहत होते हैं। दूसरी तरफ, आपदा प्रबंधन के ठोस और तात्कालिक उपाय के अभाव में सुरक्षित बचे लोग भी जान गवां देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विकसित देशों में आपदा प्रबंधन एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता है, जबकि विकासशील देशों में इसपर गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा है। जरुरी यह है कि आपदाओं से निपटने की रणनीति के तहत सबसे पहले नागरिकों को जागरुक किया जाय।</p>
<p style="text-align:justify;">आमतौर पर देखा यह जाता है कि आवश्यक जानकारी व जागरुकता के अभाव में जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग घबराहट अथवा उपाय न सूझता देख अपना बहुमूल्य जीवन गंवा देते हैं। बहरहाल, हम प्रकृति संरक्षक बनकर आपदाओं को आने से रोक तो नहीं सकते, किंतु उसके असर को कम-से-कम जरुर कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुधीर कुमार</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Jul 2017 22:22:21 +0530</pubDate>
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                <title>बादलों के बरसने की घट रही है क्षमता</title>
                                    <description><![CDATA[वैसे तो इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने अच्छी बारिश की उम्मीद जगाई है, लेकिन इसके बाद उसकी दूसरी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। 50 वर्षों के अध्ययन पर केंद्रित इस रिपोर्ट के अनुसार, मौसम में जो बादल पानी बरसाते हैं, उनकी सघनता धीरे-धीरे घट रही है। इस नाते कमजोर मानसून की आशंका भी जता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/cloud-rainy-season-is-decreasing/article-1373"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/rain-21.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वैसे तो इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने अच्छी बारिश की उम्मीद जगाई है, लेकिन इसके बाद उसकी दूसरी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। 50 वर्षों के अध्ययन पर केंद्रित इस रिपोर्ट के अनुसार, मौसम में जो बादल पानी बरसाते हैं, उनकी सघनता धीरे-धीरे घट रही है। इस नाते कमजोर मानसून की आशंका भी जता दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे आशय यह निकलता है कि देश में मानसून में बारिश का प्रतिशत लगातार घट रहा है। दरअसल जो बादल पानी बरसाते हैं, वे आसमान में छह से साढ़े छह हजार फीट की ऊंचाई पर होते हैं। 50 साल पहले ये बादल घने भी होते थे और मोटे भी होते थे। परंतु अब साल-दर-साल इनकी मोटाई और सघनता कम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि यह अध्ययन सही है तो देश के नीति-नियंताओं को चेतने की जरूरत है, क्योंकि हमारी खेती-किसानी और 70 फीसदी आबादी मानसून की बरसात से ही रोजी-रोटी चलाती है और देश की समूची आबादी को अनाज, दालें और तिलहन उपलब्ध कराती है। देश के ज्यादातर व्यवसाय भी कृषि आधारित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">देश की जीडीपी में कृषि का योगदान 15 फीसदी है, फिर भी किसान आर्थिक असुरक्षा की चपेट में है। इसी कारण किसान की आत्महत्या का सिलसिला जारी है। दरअसल हमारे यहां अभी भी मौसम की भविष्यवाणी असलियत के आइने में ठीक नहीं बैठती, इसलिए मौसम विभाग के अनुमानों पर संदेह बना रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्येक साल अप्रैल-मई में मानसून आ जाने की अटकलों का दौर शुरू हो जाता है। यदि औसत मानसून आये तो देश में हरियाली और समृद्धि की संभावना बढ़ती है और औसत से कम आये, तो पपड़ाई धरती और अकाल की क्रूर परछाईयां देखने में आती हैं। मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार यदि 90 प्रतिशत से कम बारिश होती है, तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">90-96 फीसदी बारिश इस दायरे में आती है। 96-104 फीसदी बारिश को सामान्य मानसून कहा जाता है। यदि बारिश 104-110 फीसदी होती है, तो इसे सामान्य से अच्छा मानसून कहा जाता है। 110 प्रतिशत से ज्यादा बारिश होती है, तो इसे अधिकतम मानसून कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियों को सटीक इसलिए नहीं माना जाता, क्योंकि वह अनुमानों पर खरी नहीं उतरती हैं। 2016 में मौसम विभाग ने 106 प्रतिशत बारिश की भविष्यवाणी की थी। पानी बरसा तो इतना ही, लेकिन महाराष्ट्र का मराठवाड़ क्षेत्र और तमिलनाडू सूखे रह गए। 2015 में विभाग ने 93 प्रतिशत बारिश होने की भविष्यवाणी की थी, किंतु हुई 86 प्रतिशत।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी तरह 2014 में 93 प्रतिशत की भविष्यवाणी थी, किंतु रह गई 89 प्रतिशत। गत आठ साल के आंकड़ों में एक भी साल भविष्यवाणी सटीक नहीं बैठी। इसलिए मौसम विभाग के अनुमान भरोसे के लायक नहीं होते। यदि किसान इन भविष्यवाणियों के आधार पर फसल बोए, तो उसे नाकों चने चबाने पड़ जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर हमारे मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान आसन्न संकटों की क्यों सटीक जानकारी देने में खरे नहीं उतरते? क्या हमारे पास तकनीकी ज्ञान अथवा साधन कम हैं, अथवा हम उनके संकेत समझने में अक्षम हैं? मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो जब उत्तर-पश्चिमी भारत में मई-जून तपता है और भीषण गर्मी पड़ती है, तब कम दाब का क्षेत्र बनता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस कम दाब वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के निकट से हवाएं दौड़ती हैं। दूसरी तरफ धरती की परिक्रमा सूरज के इर्द-गिर्द अपनी धुरी पर जारी रहती है। निरंतर चक्कर लगाने की इस प्रक्रिया से हवाओं में मंथन होता है और उन्हें नई दिशा मिलती है। इस तरह दक्षिणी गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही पलटकर कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैंं।</p>
<p style="text-align:justify;">ये हवाएं भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकराकर दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवेश करता है और दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर ओडिशा, पश्चिम-बंगाल, बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल-प्रदेश हरियाणा और पंजाब तक चलती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली हवाएं आन्ध्र-प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्टÑ, मध्य-प्रदेश और राजस्थान में बरसती हैं। इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कश्यप सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज का प्रभाव भी पड़ता है। प्रशांत महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाएं भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं। वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती है, तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमण्डल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊंचाईयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिये कम्प्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इनसे जो आंकड़ें इकट्ठे होते हैं, उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है। हमारे देश में 1875 में मौसम विभाग की बुनियाद रखी गई थी। आजादी के बाद से मौसम विभाग में आधुनिक संसाधनों का निरंतर विस्तार होता चला आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">विभाग के पास 550 भू-वेधशालाएं, 63 गुब्बारा केन्द्र, 32 रेडियो पवन वेधशालायें, 11 तूफान संवेदी, 8 तूफान सचेतक रडार और 8 उपग्रह चित्र प्रेषण एवं ग्राही केन्द्र हैं। इसके अलावा वर्षा दर्ज करने वाले 5 हजार पानी के भाप बनकर हवा होने पर निगाह रखने वाले केन्द्र, 214 पेड़-पौधों की पत्तियों से होने वाले वाष्पीकरण को मापने वाले, 38 विकिरणमापी एवं 48 भूकंपमापी वेधशालाएं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बरसने वाले बादल बनने के लिये गरम हवाओं में नमी का समन्वय जरूरी होता है। हवाएं जैसे-जैसे ऊंची उठती हैं, तापमान गिरता जाता है। अनुमान के मुताबिक प्रति एक हजार मीटर की ऊंचाई पर पारा 6 डिग्री नीचे आ जाता है। यह अनुपात वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत ट्रोपोपॉज तक चलता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस परत की ऊंचाई यदि भूमध्य रेखा पर नापें तो करीब 15 हजार मीटर बैठती है। यहां इसका तापमान लगभग शून्य से 85 डिग्री सेन्टीग्रेट नीचे पाया गया है। यही परत धु्रव प्रदेशों के ऊपर कुल 6 हजार मीटर की ऊंचाई पर भी बन जाती है और तापमान शून्य से 50 डिग्री सेन्टीग्रेट नीचे होता है। इसी परत के नीचे मौसम का गोला या ट्रोपोस्फियर होता है, जिसमें बड़ी मात्रा में भाप होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भाप ऊपर उठने पर ट्रोपोपॉज के संपर्क में आती है। ठंडी होने पर भाप द्रवित होकर पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें बनाती है। पृथ्वी से 5-10 किलोमीटर ऊपर तक जो बादल बनते हैं, उनमें बर्फ के बेहद बारीक कण भी होते हैं। पानी की बूंदें और बर्फ के कण मिलकर बड़ी बूंदों में तब्दील होते हैं और वर्षा के रूप में धरती पर टपकना शुरू होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे यहां एक ओर अरब सागर है और दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी है और इन सब के ऊपर हिमालय के शिखर हैं। इस कारण देश का जलवायु विविधतापूर्ण होने के साथ प्राणियों के लिये बेहद हितकारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसीलिए पूरे दुनिया के मौसम वैज्ञानिक भारतीय मौसम को परखने में अपनी बुद्घि लगाते रहते हैं। इतने अनूठे मौसम का प्रभाव देश की धरती पर क्या पड़ेगा, इसकी भविष्यवाणी करने में हमारे वैज्ञानिक क्यों अक्षम रहते हैं, इस सिलसिले में ऐसा माना जाता है कि आयातित सुपर कम्प्यूटरों की भाषा ’अलगोरिथम’ वैज्ञानिक ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कम्प्यूटर भले ही आयातित हों, लेकिन इनमें मानसून के डाटा स्मरण में डालने के लिये जो भाषा हो, वह देशी हो, हमें सफल भविष्यवाणी के लिये कम्प्यूटर की देशी भाषा विकसित करनी होगीऊ क्योंकि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिमालय भारत में हंै, अमेरिका अथवा ब्रिटेन में नहींऊ लिहाजा जब हम वर्षा के आधार श्रोत की भाषा पढ़ने व संकेत परखने में सक्षम हो जाएंगे तो मौसम की भविष्यवाणी भी सटीक बैठेगी?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-प्रमोद भार्गव </strong></p>
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                <pubDate>Sun, 18 Jun 2017 23:23:23 +0530</pubDate>
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