<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/season/tag-2873" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>season - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/2873/rss</link>
                <description>season RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>Mausam: मौसम के बदलते रंग</title>
                                    <description><![CDATA[Mausam: पिछले दिनों पंजाब के होशियारपुर में जिस तरह से अचानक भारी बारिश ने तबाही मचाई, वह मैदानी क्षेत्र के लोगों के लिए आश्चर्यचकित करने वाली बात थी। यहां बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए, जिससे नौ लोगों की मौत हो गई। मोहाली के एक अस्पताल में पानी भर गया और मरीजों में भगदड़ मच […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/the-changing-colours-of-the-seasons/article-61041"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-08/rain.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Mausam: पिछले दिनों पंजाब के होशियारपुर में जिस तरह से अचानक भारी बारिश ने तबाही मचाई, वह मैदानी क्षेत्र के लोगों के लिए आश्चर्यचकित करने वाली बात थी। यहां बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए, जिससे नौ लोगों की मौत हो गई। मोहाली के एक अस्पताल में पानी भर गया और मरीजों में भगदड़ मच गई। इसी तरह हरियाणा में भारी बारिश के कारण समस्याएं पैदा हो गई। Mausam</p>
<p style="text-align:justify;">शहरी क्षेत्रों में तो बारिश मुसीबत बन जाती है, कुछ ही शहर ऐसे हैं जहां बारिश के पानी के लिए जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था है। लगभग सभी शहरों में समुद्र जैसे हालात बन जाते हैं। मौसम में बदलाव को देखते हुए सरकारों को नई सिरे से रणनीति बनानी चाहिए। बढ़ रही जनसंख्या के अनुसार निकासी प्रबंधों में भले ही वृद्धि हुई है लेकिन उसके अनुसार प्रबंध न होने के चलते मुश्किलें आ रही हैं। Mausam</p>
<p style="text-align:justify;">इसी प्रकार, गलत तरीके से नव-निर्माण होने से जंगलों, पहाड़ों और नदियों जैसे प्राकृतिक संसाधनों से छेड़छाड़ व अंधाधुंध दोहन से बाढ़ की समस्या बढ़ गई है। बाढ़ से निपटने के लिए जहां सरकारों को सक्रिय होकर व नई रणनीति से कार्य करना होगा, वहीं आमजन को भी मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते में अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। अवैध निर्माण और अवैध कब्जों ने भी कई समस्याएं पैदा की हैं। ईमानदारी और प्रतिबद्धता ही सुधार का आधार है। Mausam</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Traffic Rules: बाइक व स्कूटर चलाने वालों हो जाओ सावधान…1 सितंबर से लागू हो रहा ये ट्रैफिक नियम.." href="http://10.0.0.122:1245/it-will-be-mandatory-for-the-pillion-rider-to-wear-a-helmet/">Traffic Rules: बाइक व स्कूटर चलाने वालों हो जाओ सावधान…1 सितंबर से लागू हो रहा ये ट्रैफिक नियम..</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/the-changing-colours-of-the-seasons/article-61041</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/the-changing-colours-of-the-seasons/article-61041</guid>
                <pubDate>Tue, 13 Aug 2024 15:44:16 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2024-08/rain.jpg"                         length="24144"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बरसात से किसानों के खिले चेहरे</title>
                                    <description><![CDATA[राहगीरों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा मानसा (सुखजीत मान)। पिछले कई दिनों से आसमान में चढ़ी धूल की पर्त से हुई बरसात से छुटकारा मिल गया है, जिले भर में बीती देर रात व सुबह हुई इस बरसात ने किसानों सहित हर वर्ग के चेहरे पर रौनके छा गई हैं। यह बरसात जहां कृषि […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/fresh-faces-of-farmers-in-rainy-season/article-4314"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/rain-2.jpg" alt=""></a><br /><h1>राहगीरों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>मानसा (सुखजीत मान)।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">पिछले कई दिनों से आसमान में चढ़ी धूल की पर्त से हुई बरसात से छुटकारा मिल गया है, जिले भर में बीती देर रात व सुबह हुई इस बरसात ने किसानों सहित हर वर्ग के चेहरे पर रौनके छा गई हैं। यह बरसात जहां कृषि सैक्टर में नरमे सहित सब्जियां व हरे चारों के लिए वरदान साबित होगीं वही गर्मी और धूल के कारण बीमार हो रहे लोगों के स्वास्थ्य में भी सुधार आएगा। किसानों का कहना है कि चाहे ही सरकार उनके साथ बिजली पानी बंद करके द्रोह कमा रही है परन्तु प्रकृति ने आज उनका साथ दिया है किसानों में चाहे इस बारिश के साथ खुशी की लहर है परन्तु शहरी क्षेत्रों में निचले स्थानों पर पानी भर गया जिस कारण राहगीरों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">मानसा के सिनेमा रोड, बस स्टैंड चौंक, भाई नगर मोहल्ला, अंडर ब्रिज, त्रिवेणी मंदिर रोड, गौशाला रोड, जवाहरके रोड आदि सहित ओर कई स्थानों पर पानी जमा हो गया। सड़कों पर जमा पानी के कारण राहगीर मुश्किलों के साथ जूझते नजर आए।</p>
<p style="text-align:justify;">दोपहिया वाहन चालकों को अधिक परेशानी झेलनी पड़ी। नगर कौंसिल अध्यक्ष मनदीप सिंह गोरा ने कहा कि बरसात के पानी से शहर निवासियों को निजात दिलाने की उनकी कोशिश जारी है। उन्होंने कहा कि पद संभालते ही शहर के सीवरेज की सफाई का काम शुरू करवा दिया था जो जारी है। जोहड़ की खुदवाई का काम भी लगातार चल रहा है, जिससे बरसातों का पानी इस जोहड़ में आकर रुक सके। अंडर ब्रिज में से पानी निकालने के लिए भी मोटरें चलाईं गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बुढलाडा में हुई सबसे अधिक बरसात</strong><br />
बीती कल देर रात से रुक -रुक हुई बरसात ने मौसम में ठंडक पैदा कर दी है। मौसम विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट अनुसार जिले में सबसे अधिक बरसात बुढलाडा में 15.2 एमएम दर्ज की गई है जबकि भीखी में सबसे कम 5.2 एमएम बारिश हुई है । इसके अलावा मानसा में 6.6 एमएम, सरदूलगढ़ में 6.4 एमएम व बरेटा में 7.2 एमएस बरसात मौसम विभाग ने दर्ज की है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/punjab/fresh-faces-of-farmers-in-rainy-season/article-4314</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/state/punjab/fresh-faces-of-farmers-in-rainy-season/article-4314</guid>
                <pubDate>Tue, 19 Jun 2018 09:42:17 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-06/rain-2.jpg"                         length="252185"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बादलों के बरसने की घट रही है क्षमता</title>
                                    <description><![CDATA[वैसे तो इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने अच्छी बारिश की उम्मीद जगाई है, लेकिन इसके बाद उसकी दूसरी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। 50 वर्षों के अध्ययन पर केंद्रित इस रिपोर्ट के अनुसार, मौसम में जो बादल पानी बरसाते हैं, उनकी सघनता धीरे-धीरे घट रही है। इस नाते कमजोर मानसून की आशंका भी जता […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/cloud-rainy-season-is-decreasing/article-1373"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/rain-21.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वैसे तो इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने अच्छी बारिश की उम्मीद जगाई है, लेकिन इसके बाद उसकी दूसरी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। 50 वर्षों के अध्ययन पर केंद्रित इस रिपोर्ट के अनुसार, मौसम में जो बादल पानी बरसाते हैं, उनकी सघनता धीरे-धीरे घट रही है। इस नाते कमजोर मानसून की आशंका भी जता दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे आशय यह निकलता है कि देश में मानसून में बारिश का प्रतिशत लगातार घट रहा है। दरअसल जो बादल पानी बरसाते हैं, वे आसमान में छह से साढ़े छह हजार फीट की ऊंचाई पर होते हैं। 50 साल पहले ये बादल घने भी होते थे और मोटे भी होते थे। परंतु अब साल-दर-साल इनकी मोटाई और सघनता कम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि यह अध्ययन सही है तो देश के नीति-नियंताओं को चेतने की जरूरत है, क्योंकि हमारी खेती-किसानी और 70 फीसदी आबादी मानसून की बरसात से ही रोजी-रोटी चलाती है और देश की समूची आबादी को अनाज, दालें और तिलहन उपलब्ध कराती है। देश के ज्यादातर व्यवसाय भी कृषि आधारित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">देश की जीडीपी में कृषि का योगदान 15 फीसदी है, फिर भी किसान आर्थिक असुरक्षा की चपेट में है। इसी कारण किसान की आत्महत्या का सिलसिला जारी है। दरअसल हमारे यहां अभी भी मौसम की भविष्यवाणी असलियत के आइने में ठीक नहीं बैठती, इसलिए मौसम विभाग के अनुमानों पर संदेह बना रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्येक साल अप्रैल-मई में मानसून आ जाने की अटकलों का दौर शुरू हो जाता है। यदि औसत मानसून आये तो देश में हरियाली और समृद्धि की संभावना बढ़ती है और औसत से कम आये, तो पपड़ाई धरती और अकाल की क्रूर परछाईयां देखने में आती हैं। मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार यदि 90 प्रतिशत से कम बारिश होती है, तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">90-96 फीसदी बारिश इस दायरे में आती है। 96-104 फीसदी बारिश को सामान्य मानसून कहा जाता है। यदि बारिश 104-110 फीसदी होती है, तो इसे सामान्य से अच्छा मानसून कहा जाता है। 110 प्रतिशत से ज्यादा बारिश होती है, तो इसे अधिकतम मानसून कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियों को सटीक इसलिए नहीं माना जाता, क्योंकि वह अनुमानों पर खरी नहीं उतरती हैं। 2016 में मौसम विभाग ने 106 प्रतिशत बारिश की भविष्यवाणी की थी। पानी बरसा तो इतना ही, लेकिन महाराष्ट्र का मराठवाड़ क्षेत्र और तमिलनाडू सूखे रह गए। 2015 में विभाग ने 93 प्रतिशत बारिश होने की भविष्यवाणी की थी, किंतु हुई 86 प्रतिशत।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी तरह 2014 में 93 प्रतिशत की भविष्यवाणी थी, किंतु रह गई 89 प्रतिशत। गत आठ साल के आंकड़ों में एक भी साल भविष्यवाणी सटीक नहीं बैठी। इसलिए मौसम विभाग के अनुमान भरोसे के लायक नहीं होते। यदि किसान इन भविष्यवाणियों के आधार पर फसल बोए, तो उसे नाकों चने चबाने पड़ जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर हमारे मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान आसन्न संकटों की क्यों सटीक जानकारी देने में खरे नहीं उतरते? क्या हमारे पास तकनीकी ज्ञान अथवा साधन कम हैं, अथवा हम उनके संकेत समझने में अक्षम हैं? मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो जब उत्तर-पश्चिमी भारत में मई-जून तपता है और भीषण गर्मी पड़ती है, तब कम दाब का क्षेत्र बनता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस कम दाब वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के निकट से हवाएं दौड़ती हैं। दूसरी तरफ धरती की परिक्रमा सूरज के इर्द-गिर्द अपनी धुरी पर जारी रहती है। निरंतर चक्कर लगाने की इस प्रक्रिया से हवाओं में मंथन होता है और उन्हें नई दिशा मिलती है। इस तरह दक्षिणी गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही पलटकर कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैंं।</p>
<p style="text-align:justify;">ये हवाएं भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकराकर दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवेश करता है और दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर ओडिशा, पश्चिम-बंगाल, बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल-प्रदेश हरियाणा और पंजाब तक चलती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली हवाएं आन्ध्र-प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्टÑ, मध्य-प्रदेश और राजस्थान में बरसती हैं। इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कश्यप सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज का प्रभाव भी पड़ता है। प्रशांत महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाएं भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं। वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती है, तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमण्डल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊंचाईयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिये कम्प्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इनसे जो आंकड़ें इकट्ठे होते हैं, उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है। हमारे देश में 1875 में मौसम विभाग की बुनियाद रखी गई थी। आजादी के बाद से मौसम विभाग में आधुनिक संसाधनों का निरंतर विस्तार होता चला आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">विभाग के पास 550 भू-वेधशालाएं, 63 गुब्बारा केन्द्र, 32 रेडियो पवन वेधशालायें, 11 तूफान संवेदी, 8 तूफान सचेतक रडार और 8 उपग्रह चित्र प्रेषण एवं ग्राही केन्द्र हैं। इसके अलावा वर्षा दर्ज करने वाले 5 हजार पानी के भाप बनकर हवा होने पर निगाह रखने वाले केन्द्र, 214 पेड़-पौधों की पत्तियों से होने वाले वाष्पीकरण को मापने वाले, 38 विकिरणमापी एवं 48 भूकंपमापी वेधशालाएं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बरसने वाले बादल बनने के लिये गरम हवाओं में नमी का समन्वय जरूरी होता है। हवाएं जैसे-जैसे ऊंची उठती हैं, तापमान गिरता जाता है। अनुमान के मुताबिक प्रति एक हजार मीटर की ऊंचाई पर पारा 6 डिग्री नीचे आ जाता है। यह अनुपात वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत ट्रोपोपॉज तक चलता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस परत की ऊंचाई यदि भूमध्य रेखा पर नापें तो करीब 15 हजार मीटर बैठती है। यहां इसका तापमान लगभग शून्य से 85 डिग्री सेन्टीग्रेट नीचे पाया गया है। यही परत धु्रव प्रदेशों के ऊपर कुल 6 हजार मीटर की ऊंचाई पर भी बन जाती है और तापमान शून्य से 50 डिग्री सेन्टीग्रेट नीचे होता है। इसी परत के नीचे मौसम का गोला या ट्रोपोस्फियर होता है, जिसमें बड़ी मात्रा में भाप होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भाप ऊपर उठने पर ट्रोपोपॉज के संपर्क में आती है। ठंडी होने पर भाप द्रवित होकर पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें बनाती है। पृथ्वी से 5-10 किलोमीटर ऊपर तक जो बादल बनते हैं, उनमें बर्फ के बेहद बारीक कण भी होते हैं। पानी की बूंदें और बर्फ के कण मिलकर बड़ी बूंदों में तब्दील होते हैं और वर्षा के रूप में धरती पर टपकना शुरू होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे यहां एक ओर अरब सागर है और दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी है और इन सब के ऊपर हिमालय के शिखर हैं। इस कारण देश का जलवायु विविधतापूर्ण होने के साथ प्राणियों के लिये बेहद हितकारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसीलिए पूरे दुनिया के मौसम वैज्ञानिक भारतीय मौसम को परखने में अपनी बुद्घि लगाते रहते हैं। इतने अनूठे मौसम का प्रभाव देश की धरती पर क्या पड़ेगा, इसकी भविष्यवाणी करने में हमारे वैज्ञानिक क्यों अक्षम रहते हैं, इस सिलसिले में ऐसा माना जाता है कि आयातित सुपर कम्प्यूटरों की भाषा ’अलगोरिथम’ वैज्ञानिक ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कम्प्यूटर भले ही आयातित हों, लेकिन इनमें मानसून के डाटा स्मरण में डालने के लिये जो भाषा हो, वह देशी हो, हमें सफल भविष्यवाणी के लिये कम्प्यूटर की देशी भाषा विकसित करनी होगीऊ क्योंकि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिमालय भारत में हंै, अमेरिका अथवा ब्रिटेन में नहींऊ लिहाजा जब हम वर्षा के आधार श्रोत की भाषा पढ़ने व संकेत परखने में सक्षम हो जाएंगे तो मौसम की भविष्यवाणी भी सटीक बैठेगी?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-प्रमोद भार्गव </strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/cloud-rainy-season-is-decreasing/article-1373</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/cloud-rainy-season-is-decreasing/article-1373</guid>
                <pubDate>Sun, 18 Jun 2017 23:23:23 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-06/rain-21.jpg"                         length="73034"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        