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                <title>Dementia - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Dementia: डिमेंशिया का खतरा भांप लेती हैं आंखें! जरूर लें चिकित्सक का परामर्श!</title>
                                    <description><![CDATA[Dementia Symptoms and causes: नई दिल्ली। आंखें भगवान द्वारा दिया गया एक बेहतरीन तोहफा है। आप ही सोचें कि यदि आंखें न होतीं तो क्या होता! खूबसूरत दुनिया देखने से हम महरूम हो जाते, अपने जज्बात जाहिर करने से चूक जाते। लेकिन क्या आंखें हमारा यही दर्द बयां करने में समर्थ हैं तो इसका जवाब […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/eyes-can-sense-the-risk-of-dementia-be-sure-to-consult-a-doctor/article-67735"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-02/dementia.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Dementia Symptoms and causes: नई दिल्ली। आंखें भगवान द्वारा दिया गया एक बेहतरीन तोहफा है। आप ही सोचें कि यदि आंखें न होतीं तो क्या होता! खूबसूरत दुनिया देखने से हम महरूम हो जाते, अपने जज्बात जाहिर करने से चूक जाते। लेकिन क्या आंखें हमारा यही दर्द बयां करने में समर्थ हैं तो इसका जवाब है नहीं, क्योंकि आंखें और भी बहुत कुछ बताती हैं। Dementia</p>
<p style="text-align:justify;">हममें से बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनकी आंखें ठीक-ठाक हैं और वो बेफिक्र रहते हैं। सोच यही कि चश्मा नहीं लगा, कॉन्टैक्ट लेंस नहीं लगा, तो चिंता कैसी? लेकिन एक शोध बताता है कि रेगुलर चेकअप जरूरी है। अगर आप चश्मा नहीं पहनते हैं, तो भी आपको ऑप्टोमेट्रिस्ट के पास जांच के लिए जाना जरूरी है। एक शोध तो यही बताता है। ब्रिटिश जर्नल्स ऑफ ऑप्थोमोलॉजी में एक शोध छपा, जो डिमेंशिया और आंखों से संबंधित था। यह सालों के रिसर्च पर आधारित था।</p>
<p style="text-align:justify;">शोध में पता चला कि हमारी आंखें हमारे मस्तिष्क को हमारे आस-पास की चीजों के बारे में बहुत सारी जानकारी देती हैं। इससे ये साबित हुआ कि हमारी आंखों और मस्तिष्क के बीच का संबंध बहुत मजबूत होता है। शोध में पाया गया कि आई हेल्थ भी डिमेंशिया और कॉग्निटिव गिरावट का एक प्रारंभिक संकेतक हो सकता है। स्टडी में 2006 से 2010 के बीच जांची गईं आंखों की दास्तान थी और फिर 2021 में इन्हीं लोगों को जांचा गया, तो रिजल्ट सामने आया। यूके बायोबैंक की इस रिसर्च स्टडी में 55-73 वर्ष की आयु के 12,364 वयस्क शामिल हुए। Dementia</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिभागियों का 2006 और 2010 के बीच बेसलाइन पर मूल्यांकन किया गया और 2021 की शुरूआत तक उन पर नजर रखी गई। ये देखने के लिए कि क्या सिस्टमैटिक डिजीज (प्रणालीगत बीमारियों) से डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है? यहां सिस्टमैटिक डिजीज से मतलब डायबिटीज, हृदय रोग और डिप्रेशन से था। पाया गया कि जो लोग इन समस्याओं से पीड़ित थे या फिर उम्र संबंधित एएमडी (मैक्यूलर डिजनरेशन, जिसमें धुंधला दिखने लगता है) से जूझ रहे थे, उनमें डिमेंशिया का जोखिम सबसे अधिक था।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन लोगों को कोई नेत्र रोग नहीं था, उनकी तुलना में जिन लोगों को आयु-संबंधित मैक्यूलर डिजनरेशन था, उनमें 26% जोखिम बढ़ा था, मोतियाबिंद वाले लोगों में 11% जोखिम बढ़ा था और मधुमेह से संबंधित नेत्र रोग वाले लोगों में 61% जोखिम बढ़ा था। इससे स्पष्ट होता है कि अगर कोई डायबिटीज से पीड़ित है, किसी को हार्ट संबंधी दिक्कत है या फिर डिप्रेशन का शिकार है, तो उसे नियमित तौर पर आंखों की जांच करानी चाहिए। Dementia</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही गर्भवती को भी चिकित्सक इसकी सलाह देते हैं। इस दौरान हार्मोनल चेंजेस होते हैं। कइयों को धुंधलेपन की शिकायत होती है, तो कुछ ड्राई आइज से जूझ रही होती हैं। ऐसी स्थिति में भी चिकित्सक की सलाह जरूरी होती है। एक और चीज जो आज की लाइफस्टाइल से जुड़ गई है, वो है स्क्रीन टाइम। तो जिसका भी मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर वक्त ज्यादा बीतता है, उन्हें नियमित चेकअप कराना चाहिए। हाल ही में भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) रोहतक ने एक स्टडी के आधार पर कहा कि भारत में औसतन लोग साढ़े तीन घंटे स्क्रीन देखते हुए गुजारते हैं। पुरुषों का औसत स्क्रीन टाइम 6 घंटे 45 मिनट है, जबकि महिलाओं का औसत स्क्रीन टाइम 7 घंटे 5 मिनट है। ये भी खतरे का ही सबब है। अगर ऐसा है, तो जल्द से जल्द ऑप्टोमेट्रिस्ट से अपॉइंटमेंट लेना जरूरी हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब बात आती है कि आखिर आंखों का ख्याल हम कैसे रख सकते हैं। फंडा एक ही है, अच्छा और पोषक खाएं। विटामिन ए का इनटेक बढ़ाएं। पोषक तत्वों से भरपूर पौधों-फलों, सब्जियों, मेवों, बीजों, साबुत अनाज और फलियों को अपनी डाइट में शामिल करें। गाजर को पारंपरिक रूप से आंखों के लिए सबसे अच्छी सब्जी माना जाता है, तो वहीं शकरकंद, बादाम, पत्तेदार साग, पपीता और बीन्स भी दृष्टि का ख्याल रखने में माहिर हैं। Dementia</p>
<p><a title="सड़क पर भटकते मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की साध संगत ने की संभाल" href="http://10.0.0.122:1245/sadh-sangat-took-care-of-a-mentally-ill-person-wandering-on-the-road/">सड़क पर भटकते मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की साध संगत ने की संभाल</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                                            <category>विचार</category>
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                <pubDate>Fri, 28 Feb 2025 12:41:44 +0530</pubDate>
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                <title>Dementia : बदलती जीवनशैली से डिमेंशिया से पीड़ित हो रहे बुजुर्ग</title>
                                    <description><![CDATA[Dementia डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा। जैसे जैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगी है वैसे वैसे ही डिमेंशिया (Dementia) की बीमारी का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। डिमेंशिया के लिए बहुत कुछ हमारी आज की सामाजिक व्यवस्था व सामाजिक परिवेश बनता जा रहा है। एक ओर एकल परिवार, अपने में खोये रहना और दिन प्रतिदिन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/dementia/article-58559"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/whatsapp-image-2024-06-11-at-10.35.47-am.jpeg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;"><strong>Dementia</strong></h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा।</strong> जैसे जैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगी है वैसे वैसे ही डिमेंशिया (Dementia) की बीमारी का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। डिमेंशिया के लिए बहुत कुछ हमारी आज की सामाजिक व्यवस्था व सामाजिक परिवेश बनता जा रहा है। एक ओर एकल परिवार, अपने में खोये रहना और दिन प्रतिदिन की भागम भाग है तो दूसरी ओर पढ़ने पढ़ाने की आदत कम होना एक प्रमुख कारण है। गूगल गुरु ने तो सबकुछ बदल कर ही रख दिया है। दुनिया में डिमेंशिया प्रभावितों की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की माने तो अगले 25 सालों में डिमेंशिया की रोगियों की संख्या में तीन गुणा बढ़ोेतरी हो जाएगी। डिमेंशिया खासतौर से बुजुर्गों की होने वाली बीमारी है। इसमें मनोभ्रंस की स्थिति हो जाती है और भूलने या निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। इसमें बुजुर्ग धीरे धीरे अपनी याददास्त को खोने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के संदर्भ में यह इसलिए गंभीर हो जाती है कि चीन और जापान की तरह भारत में भी आने वाले सालों में बुजुर्गों की संख्या अधिक हो जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के देशों में डिमेंशिया की बीमारी से पांच करोड़ लोग जूझ रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक डिमेंशिया से प्रभावितों की संख्या 15 करोड़ से अधिक होने की संभावना है। दुनिया के देशों में हर साल करीब 10 लाख लोग इस बीमारी की गिरफ्त में आ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल एक समय लोगों में लिखने-लिखाने और पढ़ने-पढ़ाने की आदत होती थी। किस्सा गोई की परंपरा थी तो गांवों-शहरों में चौपालें होती थी। बड़े बुजुर्ग वहां बैठकर मौहल्ले में घटने वाली घटनाओं पर नजर रखते थे वहीं आपसी चर्चा, ताश, चौपड़, शतरंज आदि खेल, गाना-बजाना या इसी तरह की गतिविधियां चलती रहती थी। इसके अपने फायदें भी थे। बड़े बुजुर्गों की इस चौपाल से जहां मौहल्ले की सुरक्षा चाक चोबंद रहती थी वहीं मौहल्ले में असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगता था। बडे-बुजुर्गों की व्यस्तता के साथ ही आपसी दुख दर्द को भी साझा किया जाता था तो समस्या के समाधान खोजने के साझा प्रयास होते थे। काफी हद तक मन का बोझ भी कम हो जाता था। पर आज हालात इसके ठीक विपरीत होते जा रहे हैं। चौपालों की परंपरा तो लगभग खत्म ही हो गई है। ले देकर ड्राइंम रुम संस्कृति रह गई है। उसमें भी अब सोशियल मीडिया और कम्प्यूटर-मोबाईल ने एक ही कमरें को अलग अलग हिस्सोें में बांट कर रख दिया है। सब अपने अपने मोबाईल पर अंगूलियां घुमाने में व्यस्त रहते हैं और एक दूसरे से बात करने, सुनने और सुनाने का तो समय ही नहीं रह गया है। इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अध्ययन में सामने आया है कि लिखने-लिखाने और पढ़ने-पढ़ाने की आदत से बुजुर्गों को डिमेंशिया (Dementia) की बीमारी से काफी हद से बचाया जा सकता है। पढ़ने-पढ़ाने से व्यक्ति किताबों की दुनिया में खो जाता हैं। इससे उसे अलग तरह का ही अनुभव होता है। पढ़ने-पढ़ाने या लिखने लिखाने की आदत से डिमेंशिया की बीमारी का खतरा 11 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। जिसे हम हॉबी कहते हैं वह हॉबी यानी कि चित्रकारी, कुछ गाना बजाना, गुनगुनाना, अखबार पढ़ना, किताबों की दुनिया से जुड़ना आदि से भी डिमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है। दरअसल जितना अधिक बुजुर्गों का गतिविधियों में इनवोल्वमेंट होगा उतनी ही अधिक संभावनाएं डिमेंशिया के खतरे को कम करने में होगी। परिवार जनों के साथ नियमित रूप से संवाद कायम रखने यानी कि हंसने बोलने, खेलने-खिलाने से भी डिमेंशिया का खतरा कम होता जाता है। इसके साथ ही बुजुर्गों का सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी से भी बहुत कुछ राहत मिल सकती है। बुजुर्गों को किसी ना किसी गतिविधि से जोेड़कर उसमें सक्रिय किया जाता है तो डिमेंशिया के शिकार होने की संभावनाएं कम होती जाएगी। आज भूलने भुलाने की आदत तो युवाओं तक में देखने को मिलने लगी है। ऐसे में बुजुर्गों की सक्रियता को बनाए रखना आवश्यक हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">डिमेंशिया के बढ़ते खतरे को देखते हुए गैरसरकारी संगठनों, सामाजिक सस्थानों आदि को भी सक्रिय होना होगा क्योंकि आने वाले समय में यह समस्या और अधिक बढ़ेगी। ऐसे में मनोविश्लेषकों, चिकित्सकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि को अधिक गंभीरता से प्रयास करने होंगे। एकल परिवार, नौकरी के कारण एक दूसरे से दूरी, प्रतिस्पर्धा के चलते अलग तरह की कुंठा और मानसिक परेशानी सबको परेशान करने लगी है। समय रहते इसका हल खोजना होगा।</p>
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                <pubDate>Tue, 11 Jun 2024 10:58:49 +0530</pubDate>
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