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                <title>Representative - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>जनप्रतिनिधि की प्रामाणिकता पर संकट</title>
                                    <description><![CDATA[आमतौर पर चुनावी दौर में विभिन्न प्रत्याशियों द्वारा दलीय नीति और सिद्धांतों के अनुरूप वादों और इरादों के साथ जन समर्थन की आस की जाती है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखा गया है कि विभिन्न स्तरों पर होने वाले चुनाव के पश्चात निर्वाचित जनप्रतिनिधि (Representative) की कर्मचेतना पर ना जाने क्यों ग्रहण लग जाया करता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/crisis-on-the-authenticity-of-public-representative/article-48338"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/artical-hindi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आमतौर पर चुनावी दौर में विभिन्न प्रत्याशियों द्वारा दलीय नीति और सिद्धांतों के अनुरूप वादों और इरादों के साथ जन समर्थन की आस की जाती है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखा गया है कि विभिन्न स्तरों पर होने वाले चुनाव के पश्चात निर्वाचित जनप्रतिनिधि (Representative) की कर्मचेतना पर ना जाने क्यों ग्रहण लग जाया करता है। विभिन्न स्तरों पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपनी-अपनी घोषणाओं के क्रियान्वयन के प्रति उतने समर्पित दिखाई नहीं देते, जितने समर्पित मनोभावों को वे व्यक्त कर चुके होते हैं। ऐसी स्थिति में विवश होकर आम नागरिक एक निश्चित अंतराल तक स्वयं को पूर्ण रुप से असहाय स्थिति में पाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">निर्वाचन के बाद अधिकतर जन प्रतिनिधियों से आम नागरिकों को यह शिकायत होती है कि उनके द्वारा किए गए वादे यथासमय पूर्ण नहीं किए गए। ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधि की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। इन हालातों के चलते लोकतंत्र की राजनीति में राजनीतिज्ञों के प्रति जन विश्वास में आशातीत कमी आती दिखाई देती है। ऐसी स्थिति को बदलना समय की मांग है। सामान्य परिस्थितियों में यह स्वाभाविक रूप से अपेक्षित होता है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि जनमत के अभिमत के अनुरूप आचरण और व्यवहार करें। लेकिन जब सत्तापक्ष बहुमत के किनारे पर होता है तब जनप्रतिनिधि निर्णायक भूमिका में आ जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में उनकी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता के अनुरूप समर्थन अथवा विरोध कर दिया जाता है। दलीय अनुशासन सर्वथा गौण हो जाता है और निष्ठा सर्वोपरि होकर निर्णायक भूमिका का निर्वहन कर लिया करती है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में चंद चेहरों के इधर से उधर हो जाने पर विभिन्न राज्यों में सत्ता का उलटफेर होता चला आया है। वैसे दलबदल विरोधी कानून है लेकिन लोकतंत्र में अंतरात्मा की आवाज को आज भी सुना-अनसुना किया जाता है। इस समय राजनीतिक परिस्थितियों का ताना-बाना नित नए समीकरण बना रहा है। राजनीतिक वर्चस्व की खातिर अनुशासन को सर्वथा ताक पर रख दिया गया है। आम नागरिक की मन:स्थिति कुछ ऐसी हो चली है कि राजनीति के नाम पर सब कुछ सहन कर ही लिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल राजनीति के सिद्धांत और व्यवहार में एकरूपता दिखाई देनी चाहिए। राजनीति में सत्ता को जनहित का साधन करार दिया जाता है। लेकिन व्यावहारिक रूप से राजनीति को निवेश का सशक्त माध्यम समझ लिया गया है। धनबल और बाहुबल का निवेश जातीय तथा क्षेत्रीय तड़के के साथ किया जाने लगा है। इतना जरूर है कि आज भी विभिन्न राजनीतिज्ञ नीति और सिद्धांतों की बात करते जरूर हैं। इस प्रकार प्रकारांतर से ही सही लेकिन राजनीति में नीति और सिद्धांतों पर आधारित राजनीति की बातें तो की ही जाती हैं। आम नागरिकों के लिए यह सुकून का विषय है कि विभिन्न चुनावों में व्यापक जनहित के प्रति समर्पित भूमिका का निर्वहन करने के वादे के साथ जनमत के बहुमत की आशा की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बातें बहुत होती हैं, वादे बहुत किए जाते हैं और आश्वासन का सिलसिला तो निरंतर परवान चढ़ता ही रहता है। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर राजनीतिज्ञों की कथनी और करनी में जमीन आसमान के अंतर को देखा जा सकता है। यही नहीं चुनाव-दर-चुनाव वादे पर वादे करते हुए राजनीति की पतवार को अंतिम समय तक कोई छोड़ना भी नहीं चाहता। ऐसे अनेक अवसर आए हैं जब राजनीतिज्ञों द्वारा नीति और सिद्धांतों को सर्वथा ताक पर रख दिया गया। राजनीति में सक्रिय अधिकांश चेहरे अति महत्वाकांक्षा से ग्रस्त हैं। लाभ का पद पाने की प्रबल आतुरता कुछ इस कदर है कि उचित-अनुचित के अंतर को पाट दिया गया है। यह तथ्य बड़ा ही रोचक है कि स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व को पाने को आतुर शख्सियत ही सत्ता की आकांक्षी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहा तक समर्थकों का सवाल है, वे अवसर आने पर उसे भुनाने के आकांक्षी हैं। लेकिन मतदाता वर्ग ही ऐसा वर्ग है जो मात्र इतनी ही अपेक्षा करता है कि नेतृत्व द्वारा घोषित वादे काफी हद तक पूर्णता को प्राप्त कर लेवे। यदि ऐसा नहीं भी हो पाता है तो वह अगला कार्यकाल भी थोड़ी बहुत उपलब्धियों के चलते सोंपने की भावना मन में संजोए हुए होता है। अर्थात यह जरूरी नहीं कि कथनी और करनी में शत-प्रतिशत समानता हो। चंद उपलब्धियां ही पुन: निर्वाचन का आधार बन जाया करती हैं। आम मतदाता नेतृत्व की वादाखिलाफी को इतनी गंभीरता से नहीं लेता जितनी गंभीरता से उसे लेना चाहिए। परिणामस्वरूप जनप्रतिनिधि की निष्क्रियता उसके कार्यकाल में कभी बाधक नहीं बनी।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण है कि बुनियादी समस्याओं के निराकरण तथा सुविधाओं के विस्तार के नारे पर दशकों से चुनाव-दर-चुनाव जनसेवक चुने जाते रहे। लेकिन मूलभूत समस्याएं हर हाल में बरकरार रही। यह तर्क दिया जा सकता है कि निरंतर बढ़ती जनसंख्या के चलते उपलब्ध कराए गए संसाधन कम पड़ते गए। लेकिन सिक्के का एक पहलू यह भी तो है कि जनसंख्या एकाएक नहीं बढ़ी वरन उसका बढ़ना तय था। इस संदर्भ में पूर्व नियोजित व्यवस्था राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शितापूर्वक नहीं बनाई जा सकी। स्वतंत्रता के पश्चात लोकतंत्र के सात दशकों के इतिहास में आज भी बुनियादी समस्याओं के निराकरण को लेकर जनमत के समर्थन की आस की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह बड़ा अजीब लगता है कि आधारभूत सुविधा उपलब्ध कराने के नाम पर विकास करने और कराने का श्रेय लिया जाता है। इन हालातों के चलते जनप्रतिनिधि की भूमिका पर सवाल किए जा सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से मतदाता का बिखराव, मतदाता के मन की मुराद पूरी करने में बाधक सिद्ध होता रहा है। ऐसी राजनीति के दौर में जब कभी ऐसा अवसर आ जाए कि जनप्रतिनिधि निर्णायक भूमिका में आ जाए और सत्ता का नियंता बन जाए, तब अर्थशास्त्र का सिद्धांत लागू हो जाता है। बहुमत के लिए जनप्रतिनिधि की मांग सीमित पूर्ति के चलते बाजार भाव बढ़ा दिया करती है। आम नागरिक गली-गली और चौराहे-चौराहे चल रही चर्चा से चकित नहीं होता। प्रचलित बाजार भाव उसे उद्वेलित भी नहीं करते।</p>
<p style="text-align:justify;">और तो और ऐसी अवसरवादिता को क्षेत्रीय लाभ हानि का गणित लगाते भी नहीं अघाते। यही कारण है कि राजनीति का मूल स्वरूप दिनोंदिन विकृत होता जा रहा है। नीति और सिद्धांतों की बातें जमकर की जाती है लेकिन व्यावहारिक धरातल पर नीति और सिद्धांतों से राजनीतिज्ञों का कोई लेना देना नहीं रहा है। इन तमाम विसंगतियों का प्रबल प्रतिकार करने हेतु मतदाताओं को ही अपनी राजनीतिक शक्ति को जागृत करना होगा। निश्चित रूप से सोच समझकर विवेकपूर्वक किया गया मतदान जनप्रतिनिधि के निर्णायक होने पर मतदाता के हित में उसकी भूमिका को सुनिश्चित कर सकेगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>राजेंद्र बज, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</strong></p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Jun 2023 09:45:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>उच्च सदन की प्रतिनिधिता महज मान-सम्मान के लिए न हो</title>
                                    <description><![CDATA[पूर्व क्रिकेटर व राज्यसभा सदस्य सचिन तेंदुलकर व फिल्म अभिनेत्री रेखा की सदन में अनुपस्थिति का मुद्दा फिर चर्चा का विषय बन गया है। 2012 से लेकर अप्रैल 2017 तक सचिन कामकाज के 348 दिनों में सिर्फ 23 दिन व रेखा 18 दिन ही उपस्थित रही हैं, जबकि दोनों सदस्य एक करोड़ से अधिक राशि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/about-representative-of-rajya-sabha/article-2788"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/rajya-sabha.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पूर्व क्रिकेटर व राज्यसभा सदस्य सचिन तेंदुलकर व फिल्म अभिनेत्री रेखा की सदन में अनुपस्थिति का मुद्दा फिर चर्चा का विषय बन गया है। 2012 से लेकर अप्रैल 2017 तक सचिन कामकाज के 348 दिनों में सिर्फ 23 दिन व रेखा 18 दिन ही उपस्थित रही हैं, जबकि दोनों सदस्य एक करोड़ से अधिक राशि वेतन के रूप में ले चुके हैं। इनके अतिरिक्त कई और नामजद सदस्यों का हाल भी ऐसा ही है। राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनित किए जाते हैं। इन सीटों की संवैधानिक अहमियत इस बात से है कि देश के गैर राजनीतिक सफल लोगों को सबसे बड़े सदन में आकर सेवा करने का मौका मिले, किन्तु ज्यादातर सदस्यों का रुझान यह रहा है कि उन्होंने संसद के कामकाज में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बारे दशकों से चर्चा चलती आई है कि फिल्मी सितारों व कई अन्य क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियों को प्रतिनिधिता तो दे दी जाती है, किन्तु वह अपने पद की जिम्मेवारी निभाने के लिए इच्छाशक्ति ही नहीं रखते। सदन में सार्थक बहस में भाग लेने, मुद्दे उठाने पर ही इस संवैधानिक पद की गरिमा है। यह सीट चुपचाप बैठने अथवा सदा ही अनुपस्थित रहने के लिए नहीं है। सदन में प्रतिनिधिता महज मान-सम्मान के लिए नहीं होनी चाहिए, बल्कि सदस्य की मौजूदगी संबंधी कम से कम उपस्थिति अनिवार्य बनाई जाए। गैर राजनीतिक हस्तियां देश के विकास में बेहतर रोल अदा कर सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नामांकित सदस्यों को मिलने वाले वेतन व मान देय पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं तो उनके पदों को सिर्फ नाम की सीट ना बनाया जाए। बेशक सदन के सदस्य अनुपस्थित सदस्यों को बुलाने संबंधी पत्र लिख सकते हैं, किन्तु संविधान में संशोधन करके ऐसी तजवीज की जानी चाहिए कि सदन के सदस्यों की उपस्थिति संबंधी कोई ठोस जवाबदेही बनाई जा सके। लोगों की खून पसीने की कमाई से चलने वाली संसद की कार्रवाई जन हित के काम भी आ सके। केन्द्र व राज्य सरकारें अपने विभिन्न प्रोग्रामों के लिए ब्रांड अंबेसडर भी फिल्मी हस्तियों को नियुक्त कर देती हैं, किन्तु उक्त हस्तियों का उन्हें दिए गए क्षेत्रों से संबंधित कोई अनुभव अथवा शौंक ही नहीं होता। इसी कारण सरकार अपने ब्रांड अंबेसडर के माध्यम से अपनी योजना को लोकप्रिय बनाने व उसके सार्थक परिणाम हासिल करने में सफल नहीं होती। ब्रांड अंबेसडर भी उन हस्तियों को बनाया जाए, जो अपने क्षेत्र के साथ न्याय कर सके, समय दे सकें।</p>
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</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/"><br />
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 02 Aug 2017 04:27:15 +0530</pubDate>
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                <title>संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को संबोधित करेंगी ममता</title>
                                    <description><![CDATA[समारोह में शामिल होंगे दुनिया के पांच सौ प्रतिनिधि कोलकाता (एजेंसी)। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी संयुक्त राष्ट्र (संरा) के आमंत्रण पर नीदरलैंड्स जाएंगी, जहां वह संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को संबोधित करेंगी। सुश्री बनर्जी देश की पहली मुख्यमंत्री हैं, जिन्हें संरा ने अपने किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया है। वह नीदरलैंड्स की राजधानी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/mamta-address-to-united-nations-conference/article-1395"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/mamta.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">समारोह में शामिल होंगे दुनिया के पांच सौ प्रतिनिधि</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>कोलकाता (एजेंसी)।</strong> पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी संयुक्त राष्ट्र (संरा) के आमंत्रण पर नीदरलैंड्स जाएंगी, जहां वह संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को संबोधित करेंगी। सुश्री बनर्जी देश की पहली मुख्यमंत्री हैं, जिन्हें संरा ने अपने किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया है। वह नीदरलैंड्स की राजधानी हेग में 22 और 23 जून को आयोजित संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा समारोह में शामिल होंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2017 के लोक सेवा समारोह की थीम ‘दी फ्यूचर इज नाऊ : एस्सेलेरेटिंग पब्लिक सर्विस इन्नोवेशन फोर एजेंडा 2030’ है। समारोह में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से पांच सौ प्रतिनिधि शामिल होंगे। बता दें कि ममता सरकार की कन्याश्री योजना को अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा मिली थी तथा संरा की ओर से पुरस्कृत किया गया था। इसके अलावा सबुज साथी तथा युवाश्री योजनाओं को भी काफी लोकप्रियता मिली थी।</p>
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</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Mon, 19 Jun 2017 05:04:34 +0530</pubDate>
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