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                <title>जायका स्पेशल: मिठाईयों एवं पकौड़ों के स्वाद से जाना जाता है गांव ‘पंजुआना’</title>
                                    <description><![CDATA[मिठाईयों की स्वादिष्टता एवं पकौड़ों की महक लोगों को खींच लाती हैं यहां
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/home-and-family/the-village-panjuana-is-famous-for-sweets-and-fritters/article-12928"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/village-panjuana.jpg" alt=""></a><br /><h2>मिठाईयों की स्वादिष्टता एवं पकौड़ों की महक लोगों को खींच लाती हैं यहां  | Sweets &amp; Fritters</h2>
<h3>संवाददाता राजू की प्रस्तुती</h3>
<p><strong>ओढां (सरसा)।</strong> <strong>(Sweets &amp; Fritters)</strong>  कहते हैं कि कुछ चीजें बनाने वालों के हाथों में कमाल का जादू होता है। जिसके चलते उनके द्वारा बनाई गई चीजें काफी दूर-दूर तक मशहूर हो जाती हैं। हरियाणा के सरसा जिले के गांव पंजुआना का नाम जुबान पर आते ही मिठाईयों की स्वादिष्टता एवं पकौड़ों की महक हर किसी को बरबस ही अपनी तरफ खींच लेती हैं। आज हम आपको रू-ब-रू करवा रहे हैं गांव पंजुआना की मिठाईयों एवं पकौड़ों की स्वादिष्टता से। नेशनल हाईवे-9 पर सरसा से करीब 10 किलोमीटर दूर बसे गांव पंजुआना को मिठाईयों व पकौड़ों के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। यहां की मिठाईयों एवं पकौड़ों की स्वादिष्टता की चर्चा न केवल काफी दूर-दूर तक फै ली हुई है अपितु लोग यहां से गुजरते समय ये चीजें बड़े चाव से खरीदते हैं।</p>
<h2>सेठ लक्ष्मणदास बत्रा एवं आत्मप्रकाश कामरा हैं तजुर्बेकार कारीगर |Sweets &amp; Fritters</h2>
<p>सच कहूँ संवाददाता ने मिठाईयां बनाने वाले कुछ दुकानदारों से इस विषय में जानकारी ली तो उन्होंने इसके स्वाद से पूरी तरह से वाकिफ करवाया। वैसे तो गांव में काफी लोग मिठाईयां बनाने का कार्य करते हैं लेकिन सेठ लक्ष्मणदास बत्रा एवं आत्मप्रकाश कामरा इस कार्य के पुराने एवं तजुर्बेकार कारीगर माने जाते हैं। सेठ लक्ष्मण दास ने बताया कि उन्होंने करीब 25 वर्ष पूर्व घर में परचून की दुकान खोली थी। दुकान पर बेचने के लिए उन्होंने घर में थोड़ी-बहुत मिठाईयां बनानी शुरू की। लोग मिठाईयां खरीदने लगे और इस प्रकार धीरे-धीरे उनका ये व्यवसाय बढ़ने लग गया। लक्ष्मण दास द्वारा बनाई गई मिठाई के स्वाद की चर्चा गांव के अलावा क्षेत्र में भी होने लग गई। उम्र के साथ ही लक्ष्मण दास ने अपने कार्य से दूरी बना ली लेकिन उनके बेटे गिरधर ने इन मिठाईयों के स्वाद को बरकार रखा हुआ है।</p>
<h2>गुणवता के साथ कोई समझौता नहीं | Sweets &amp; Fritters</h2>
<p>लक्ष्मण दास के यहां मिठाई बनाने वाले कारीगर सुनील कुमार ने बताया कि वह यहां पर वर्षांे से यहां पर कार्य कर रहा है। उनके यहां पर गुणवता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाता। यही कारण है कि लोग मिठाईयां खरीदने के लिए यहां स्पैशल तौर पर आते हैं। वहीं कर्मचंद कामरा के अनुसार ये कार्य उनके पिता आत्मप्रकाश ने शुरू किया था। उनके निधन के बाद उन्होंने करीब 25 वर्षांे से इस क ार्य को चलाया हुआ है। लोग दूर-दूर से उनके यहां से मिठाईयां व भुजिया खरीदने के लिए आते हैं। उनका प्रयास रहता है कि लोगों को उचित गुणवता के साथ-साथ मिठाईयों का पूरा स्वाद भी मिले। उन्होंने आज तक गुणवता के साथ कभी समझौता नहीं किया। यही कारण है कि उनके द्वारा बनाई गई मिठाईयां लोग दूर-दराज से खरीदने आते हैं।</p>
<h2>हरियाणा, पंजाब व राजस्थान तक फैली स्वाद की खुशबू</h2>
<p>पंजुआना की बनी मिठाईयों की चर्चा क्षेत्र में नहीं हरियाणा, पंजाब व राजस्थान तक फैली हुई है। नैशनल हाईवे पर स्थित होने के कारण यहां से गुजरने वाले लोग यहांं से मिठाईयां खरीदने के अलावा पकौड़ों का आनंद लेना नहीं भूलते। वैसे तो पंजुआना की काफी चीजें मशहूर हैं लेकिन यहां के शक्करपारे, भुजिया व पकौड़े काफी प्रसिद्ध हैं। कारीगर सुनील कुमार ने बताया कि सर्दियों में गाजरपाक, खोये की बर्फी, सोन हलवा व गज्जक एवं गर्मियों में शक्कर पारे, बालूशाही, मट्ठी विशेष तौर पर बनाई जाती है। उसने बताया कि वे गुणवता के साथ कभी समझौता नहीं करते। रानिया से स्पैशल मिठाई खरीदने के लिए आए गुलशन मिड्ढा ने बताया कि वे पिछले करीब 10 वर्षांे से यहां आ रहे हैं। घर या रिश्तेदारी में कोई भी सुअवसर हो लेकिन वे लक्ष्मण दास के सिवाय मिठाई कहीं से नहीं खरीदते।</p>
<h2>शीतल एवं मिट्ठे पानी के लिए भी चर्चित है गांव</h2>
<ul>
<li><strong>मिठाईयों के साथ शीतल एवं मिट्ठे पानी के लिए भी पंजुआना काफी चर्चित है।</strong></li>
<li><strong> गर्मियोें में थके हारे लोग कहीं रूके न रू कें लेकिन पंजुआना नहर पर जरूर रूकते हैं। </strong></li>
<li><strong>यहां पर लगे हैंडपंप का पानी इतना शीतल है कि लोग हाथ-मुंह धोकर अपनी सारी थकान भूल जाते हैं। </strong></li>
<li><strong>गांव पंजुआना के लोग करीब डेढ़ किलोमीटर दूर यहीं से पानी भरकर ले जाते हैं।</strong></li>
<li><strong> यहां के शीतल जल की चर्चा सैंकड़ों किलोमीटर दूर तक होती है।</strong></li>
</ul>
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                                                            <category>घर परिवार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Feb 2020 13:17:16 +0530</pubDate>
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                <title>गोरखालैंड मांग की धधकती आग</title>
                                    <description><![CDATA[लो दुनिया भर में प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र दार्जिलिंग आज अराजकता और हिंसा की चपेट में है। आंदोलन से जनजीवन अस्त-व्यस्त है और शहर से रौनक गायब है। आगजनी और हिंसा के कारण यहां आए पर्यटक खौफ और दहशत में हैं। इस बदतर हालात के लिए जितना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/gorkhaland-andolan-in-darjeeling/article-1413"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/gorkhaland-andolan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लो दुनिया भर में प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र दार्जिलिंग आज अराजकता और हिंसा की चपेट में है। आंदोलन से जनजीवन अस्त-व्यस्त है और शहर से रौनक गायब है।</p>
<p style="text-align:justify;">आगजनी और हिंसा के कारण यहां आए पर्यटक खौफ और दहशत में हैं। इस बदतर हालात के लिए जितना दोषी पश्चिम बंगाल की सरकार है ,उतना ही गोरखालैंड राज्य की मांग कर रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) दल भी। बहरहाल पश्चिम बंगाल की ममता सरकार राज्य के पहाड़ी इलाकों दार्जिलिंग के स्कूलों में बांग्ला भाषा थोपने की जल्दबाजी नहीं दिखायी होती, तो गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को भी विरोध की चिंगारी को दावानल में बदलने का मौका हाथ नहीं लगता।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक राज्य सरकार को अधिकार है कि वह शिक्षा का पाठ्यक्रम सुनिश्चित करे, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह क्षेत्रीय भावनाओं के साथ खिलवाड़ करे। वह भी तब, जब पहाड़ी इलाकों में भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर पहले से ही भावनाएं उफान पर हों। ऐसे संवेदनशील मसले पर निर्णय लेने से पहले उसे सहमतिपूर्ण वातावरण निर्मित करना चाहिए था।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर बात रायशुमारी की होती, तो दार्जिलिंग अराजकता और आग की लपटों की भेंट नहीं चढ़ता। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के आंदोलनकारियों के प्रति राज्य सरकार की सख्ती का नतीजा है कि 35 साल पुराने गोरखालैंड राज्य की मांग पुन: धधक उठी है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार द्वारा गोरखा टेरिटोरियल एडमिनिस्टेÑशन और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अधीन रहे नगर निगमों में आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों की जांच ने भी आंदोलन की आग में घी का काम किया है। इन परिस्थितियों के बीच गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के लिए अपना जनाधार बढ़ाने के लिए एक संवेदनशील मुद्दे की जरुरत थी, जिसे पश्चिम बंगाल की सरकार ने सहजता से उपलब्ध करा दिया। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा इसे हथियार बनाकर गोरखालैंड राज्य की मांग को धार दे रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक गोरखालैंड राज्य के मांग का मसला है, तो दार्जिलिंग प्रारंभ में पश्चिम बंगाल का हिस्सा नहीं था। इतिहास में जाएं तो 1865 में जब अंग्रेजों ने चाय का बागान शुरु किया, तो यहां बड़ी संख्या में मजदूर काम करने आए। उस वक्त कोई अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा नहीं थी, लिहाजा ये लोग खुद को गोरखा किंग के अधीन और इस इलाके को अपनी जमीन मानते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन आजादी के बाद भारत ने नेपाल के साथ शांति व दोस्ती के लिए 1950 का समझौता किया और सीमा विभाजन के बाद यह हिस्सा भारत में आ गया। उसके बाद से ही यहां के लोग अलग राज्य के निर्माण की मांग कर रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि बंगाली और गोरखा मूल के लोग सांस्कृतिक व ऐतिहासिक तौर पर एक-दूसरे से अलग मानते हैं और यही कारण है कि गोरखालैंड राज्य की मांग को बल मिल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">तथ्य यह भी कि ब्रिटिशकाल में दार्जिलिंग सिक्किम का हिस्सा हुआ करता था। बाद में उसका विलय बंगाल में कर दिया गया। लेकिन इसके बावजूद भी यहां के लोगों की संस्कृति, खान-पान व पहनावा बंगाल से भिन्न है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाषा से इतर अन्य मामलों में भी यहां के लोग स्वयं को बंगालियों से अलग मानते हैं। यह भिन्नता ही यहां के लोगों को अलग गोरखालैंड राज्य के लिए प्रेरित कर रही है। यहां के लोगों का तर्क है कि जब भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर देश में राज्यों का बंटवारा हुआ और मराठी बोलने वालों के लिए महाराष्ट्र और गुजराती बोलने वालों के लिए गुजरात राज्य का गठन हुआ, तो उसी आधार पर गोरखालैंड राज्य का गठन क्यों नहीं होना चाहिए?</p>
<p style="text-align:justify;">गोरखालैंड राज्य की मांग की शुरुआत गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नेता सुभाष घीसिंग ने की थी। उन्होंने 5 अप्रैल 1980 को गोरखालैंड नाम दिया। इसके बाद पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल बनाने पर राजी हुई। बेहतर होगा कि केंद्र, राज्य व गोरखा जनमुक्ति मोर्चा सभी मिलकर इस मसले पर गंभीरता से विचार कर समाधान का रास्ता तलाशें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-रीता सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                <pubDate>Mon, 19 Jun 2017 23:18:45 +0530</pubDate>
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