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                <title>Cancer Day: सरकार के पास गरीबी मिटाने की इच्छाशक्ति है?</title>
                                    <description><![CDATA[इसी उद्देश्य से दुनियाभर में लोगों को कैंसर होने के संभावित कारणों के प्रति जागरूक करने, प्राथमिक स्तर पर कैंसर की पहचान करने और इसके शीघ्र निदान तथा रोकथाम के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिवर्ष 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवसष् मनाया जाता है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/government-has-the-will-to-eradicate-poverty-2/article-12916"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/cancer.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">(Cancer Day)</h2>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>वैसे तो कैंसर कई प्रकार का होता है और हर प्रकार के कैंसर के होने के कारण भी अलग-अलग होते हैं किन्तु इस बीमारी के कुछ ऐसे मुख्य कारक होते हैं, जिनकी वजह से किसी को भी कैंसर का खतरा हो सकता है। वजन बढ़ना या मोटापाए शारीरिक सक्रियता का अभावए अधिक मात्रा में अल्कोहल तथा नशीले पदार्थों का सेवन करनाए पौष्टिक आहार न लेनाए नियमित व्यायाम न करना इत्यादि इन कारणों में शामिल हो सकते हैं। कैंसर एक ऐसी खामोश बीमारी हैए जिसके कभी-कभार कोई लक्षण सामने नहीं आते किन्तु कैंसर के अक्सर जो लक्षण सामने आते हैं, उनकी जानकारी होना बहुत जरूरी है।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">कैंसर एक ऐसा शब्द है, जिसे अपने किसी परिजन के लिए डॉक्टर के मुंह से सुनते ही परिवार के तमाम सदस्यों के पैरों तले की जमीन खिसक जाती है। दरअसल परिजनों को अपने परिवार के उस सदस्य को हमेशा के लिए खो देने का डर सताने लगता है। बढ़ते प्रदूषण तथा पोषक खानपान के अभाव में यह बीमारी एक महामारी के रूप में तेजी से फैल रही है। कैंसर के संबंध में यह जान लेना बेहद जरूरी है कि यह बीमारी किसी भी व्यक्ति को किसी भी उम्र में हो सकती है लेकिन अगर इसका सही समय पर पता लगा लिया जाए तो उपचार संभव है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि हमारे देश में पिछले बीस वर्षों के दौरान कैंसर के मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है। प्रतिवर्ष कैंसर से पीड़ित लाखों मरीज मौत के मुंह में समा जाते हैं और माना जा रहा है कि वर्ष 2020 तक कैंसर के मरीजों की संख्या एक करोड़ की संख्या को भी पार कर जाएगी। हालांकि कुछ वर्ष पूर्व तक कैंसर को एक असाध्य अर्थात लाइलाज रोग के रूप में जाना जाता था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कैंसर के उपचार की दिशा में क्रांतिकारी खोजें हुई हैं और अब अगर समय रहते कैंसर की पहचान कर ली जाए तो उसका उपचार किया जाना काफी हद तक संभव हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनियाभर में कैंसर के मामलों को कम करने के लिए कैंसर तथा उसके कारणों के प्रति लोगों को जागरूक किए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि वे इस बीमारी व इसके लक्षणों और इसके भयावह खतरे के प्रति जागरूक रहें। दरअसल कैंसर के करीब दो तिहाई मामलों का बहुत देर से पता चलता है और कई बार तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसी उद्देश्य से दुनियाभर में लोगों को कैंसर होने के संभावित कारणों के प्रति जागरूक करने, प्राथमिक स्तर पर कैंसर की पहचान करने और इसके शीघ्र निदान तथा रोकथाम के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिवर्ष 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवसष् मनाया जाता है। दरअसल कैंसर आज न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में एक ऐसी भयानक बीमारी बन चुका है कि तमाम प्रयासों के बावजूद इसके मरीजों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है तथा लाखों लोग हर साल इस बीमारी के कारण बेमौत मारे जा रहे हैं। इसी वजह से वर्ष 2005 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिवर्ष 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाने का निर्णय लिया गया ताकि लोगों को इस भयानक बीमारी से होने वाले नुकसान के बारे में बताया जा सके और ज्यादा से ज्यादा जागरूक किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल कैंसर से लड़ने का सबसे बेहतर और मजबूत तरीका यही है कि लोगों में इसके बारे में जागरूकता होए जिसके चलते जल्द से जल्द इस बीमारी की पहचान हो सके और शुरूआती चरण में ही इस बीमारी का इलाज संभव हो। यदि कैंसर का पता शीघ्र ही लगा लिया जाए तो उसके उपचार पर होने वाला खर्च बहुत कम हो जाता है लेकिन इसकी पहचान अगर विकसित दशा में होती है तो उपचार की लागत कई गुना बढ़ जाती है। कैंसर के तीसरे या चौथे चरण में पहुंच जाने की स्थिति में मरीज का इलाज मुश्किल हो जाता है और खर्च भी अपेक्षाकृत काफी बढ़ जाता है। ऐसे मरीजों के लंबा जीवन जीने की उम्मीदें भी कम हो जाती है। यही वजह है कि जागरूकता के जरिये इस बीमारी को शुरूआती दौर में ही पहचान लेना बेहद जरूरी माना गया है क्योंकि ऐसे मरीजों के इलाज के बाद उनके स्वस्थ एवं सामान्य जीवन जीने की संभावनाएं काफी ज्यादा होती हैं। हालांकि देश में कैंसर के इलाज की तमाम सुविधाओं के बावजूद अगर हम इस बीमारी पर लगाम लगाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं तो इसके पीछे इस बीमारी का इलाज महंगा होना एक बहुत बड़ी समस्या है। वैसे देश में जांच सुविधाओं का अभाव भी कैंसर के इलाज में एक बड़ी बाधा है, जो बहुत से मामलों में इस बीमारी के देर से पता चलने का एक अहम कारण होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक जीवनशैली, नियमित व्यायाम न करना, भोजन की शुद्धता पर ध्यान न देना, प्रदूषित वातावरण इत्यादि कई ऐसे अहम कारण हैं, जो शरीर में कैंसर विकसित होने के प्रमुख कारक हो सकते हैं। कैंसर के संबंध में यह जान लेना बेहद जरूरी है कि आखिर यह है क्या हमारे शरीर की कोशिकाएं जब अनियंत्रित होकर अपने आप तेजी से बढ़ने लगती हैं तो कोशिकाओं के समूह की उस अनियंत्रित वृद्धि को ही कैंसर कहते हैं। जब ये कोशिकाएं टिश्यू को प्रभावित करती हैं तो कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाता है और ऐसी स्थिति में कैंसर काफी घातक हो जाता है। वैसे तो कैंसर के सौ से भी ज्यादा प्रकार हैं लेकिन ब्रेन कैंसर के अलावा पुरूषों में मुख्यत: मुंह व जबड़ों का कैंसर, फेफड़े का कैंसर, पित्त की थैली का कैंसर, पेट का कैंसर, लीवर कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर होता है जबकि महिलाओं में होने वाले कैंसर में स्तन तथा ओवेरियन कैंसर प्रमुख हैं। दुनिया भर में कैंसर से लड़ने और इस पर विजय पाने के चिकित्सीय उपाय हो रहे हैं और चिकित्सा के क्षेत्र में शोधकतार्ओं के प्रयासों के चलते कैंसर का प्रारम्भिक स्टेज में इलाज अब संभव है। यही कारण है कि 1990 के बाद से कैंसर से मरने वालों की संख्या में करीब 15 फीसदी की कमी आई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कीमोथैरेपी रेडिएशन थैरेपी, बायोलॉजिकल थैरेपी, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट इत्यादि के जरिये कैंसर का इलाज होता है किन्तु यह इलाज प्राय: इतना महंगा होता है कि एक गरीब व्यक्ति इतना खर्च उठाने में सक्षम नहीं होता। इसलिए जरूरत इस बात की महसूस की जाती रही है कि ऐसे मरीजों का इलाज सरकारी अस्पतालों में हो या निजी अस्पतालों मेंए सरकार ऐसे मरीजों के इलाज में यथासंभव सहयोग करे। हालांकि दिल्ली स्थित एम्स में कैंसर के इलाज की सारी सुविधाएं हैं और हरियाणा में झज्जर के बादली क्षेत्र में बाढ़सा स्थित एम्स में भी कैंसर के इलाज की सुविधाएं शुरू हो चुकी हैं किन्तु देशभर में कैंसर के मरीजों की संख्या जिस गति से बढ़ रही हैए उसके दृष्टिगत केवल सरकारी अस्पतालों के भरोसे कैंसर मरीजों के इलाज की कल्पना बेमानी ही होगी।</p>
<p style="text-align:right;"><em><strong>-योगेश कुमार गोयल</strong></em></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Feb 2020 20:17:19 +0530</pubDate>
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                <title>वोट, गरीबी और महंगाई</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/votes-poverty-and-inflation/article-12900"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/poverty.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में राष्ट्रीय नागरिकता कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जैसे मुद्दों से चाहे देश की राजनीति गर्माई हुई है लेकिन दिल्ली चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि देश में अगर कोई सबसे बड़ा मुद्दा या समस्या है तो वह है गरीबी और मंहगाई। आज जिनती भी पार्टियां अपने चुनाव घोषणा-पत्र जारी कर रही हैं, उनमें ‘सस्ता’ शब्द केन्द्र बिन्दू की तरह उभर कर सामने आता है, जिससे साफ है कि आम आदमी प्रतिदिन की जरूरतों को पूरी करने में सक्षम नहीं रहा है। दिल्ली चुनावों के लिए भाजपा व कांग्रेस अपना-अपना चुनाव घोषणा-पत्र जारी कर चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा ने 2 रूपये प्रति किलो आटा देने, के साथ-साथ कई अन्य लोग लुभावने वायदे किए हैं। इधर कांग्रेस के वायदे भी अलग नहीं हैं। कांग्र्रेस ने एमए पास बेरोजगारों को 7500 रूपये प्रति महीना भत्ता देने, बुजुर्गे को नि:शुल्क बस यात्रा व 300 यूनिट तक नि:शुल्क बिजली व लड़कियों को पीएचडी तक की शिक्षा नि:शुल्क देने की बात कही है। इससे पहले आम आदमी पार्टी की सरकार सस्ती बिजली व पानी देने के वायदों के साथ सत्ता में आई थी। कांग्रेस व भाजपा सस्ते में आम आदमी पार्टी से एक कदम आगे निकलने की कोशिशें कर रही हैं। राजनीति पार्टियों के मापदंड दोहरे नजर आ रहे हैं। जितनी आलोचना एक-दूसरे की अन्य मुद्दों पर होती उतनी कभी भी महंगाई, बेरोजगारी व गरीबी पर नहीं होती। देश के अंदर प्रतिदिन ही लोग गरीबी व बेरोजगारी के कारण आत्महत्याएं कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भूखमरी व अन्य कई समस्याओं में अभी भी हमारा देश गरीब देशों की श्रैणी में आता है। जनता का धर्माें-मजहबों के झगड़ों व अन्य राजनीतिक पैंतरेबाजियों के साथ कोई लेना-देना नहीं है। लोग रोजगार व बुनियादी सुविधाएं चाहते हैं। दिल्ली के चुनाव दिल्ली के मतदाताओं की अलग मानसिकता के कारण देश से अलग है। यहां लोग सरकार से काम व मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करने की उम्मीद रखते हैं। इसी कारण ही सभी पार्टियों का जोर ‘सस्ते’ पर लगा हुआ है। अगर राजनीतिज्ञ लोगों को अन्य मुद्दों पर भरमाने की बजाय गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर ईमानदारी व वचनबद्धता के साथ काम करें तो यह मामले थोड़े समय में ही हल हो सकते हैं। अच्छा हो अगर पार्टियां पैंतरेबाजी खेलने की बजाय सार्वजनिक मुद्दों को पहल दे। इन मुद्दों से कोई भी पार्टी मुंह नहीं मोड़ सकती। आमजन की बेहतरी को केवल चुनाव जीतने की मजबूरी की बजाय सेवा भावना के साथ किया जाए तो आदर्शों की उपलब्धि कोई मुश्किल काम नहीं।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 02 Feb 2020 21:52:00 +0530</pubDate>
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                <title>सरकार के पास गरीबी मिटाने की इच्छाशक्ति है</title>
                                    <description><![CDATA[डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशेवर लोग प्रति माह लाखों रूपए कमाते हैं किंतु उन पर कर नहीं लगाया जाता। इसी तरह शेयर बाजार में बड़े-बड़े खिलाडी मोटी रकम कमाते हैं किंतु वे इस आय को आयकर विभाग की नजरों से बचा देते हैं। करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि गरीब लोगों को प्रभावित करती है क्योंकि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/government-has-the-will-to-eradicate-poverty/article-12807"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/poverty.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशेवर लोग प्रति माह लाखों रूपए कमाते हैं किंतु उन पर कर नहीं लगाया जाता। इसी तरह शेयर बाजार में बड़े-बड़े खिलाडी मोटी रकम कमाते हैं किंतु वे इस आय को आयकर विभाग की नजरों से बचा देते हैं। करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि गरीब लोगों को प्रभावित करती है क्योंकि उनकी संपत्ति में वृद्धि शेयर बाजार और भूसंपदा में वृद्धि से जुडी होती है जिससे रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते और न ही यह विकास कार्यों में सहायक होती है।</h2>
<h3 style="text-align:justify;">
धुर्जति मुखर्जी</h3>
<p style="text-align:justify;">
</p><h4 style="text-align:justify;">भारत सहित तीसरी दुनिया के अधिकतर देशों में असमानता बढ़ती जा रही है। विभिन्न देशों की सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा विभिन्न विकास कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं इसके बावजूद असमानता बढ़ती जा रही है। साथ ही राजनेता हमेशा ऐसी योजनाएं लाने का दावा करते हैं जिससे समाज के गरीब वर्गों को लाभ पहुंचता है किंतु विभिन रिपोर्टों से पता चलता है कि इसका लाभ गरीब और सीमान्त वर्गों तक नहीं पहुंच रहा है और इस परिदृश्य में फिलहाल बदलाव आने की संभावना भी नहीं है क्योंकि भारत जैसे अधिकतर लोकतत्रों में राजनेताओं और उद्योगपतियों के बीच सांठगांठ मजबूत है इसलिए स्वाभाविक है कि आगामी वर्षों में भी विकास का अधिकतर लाभ समृद्ध वर्गों तक ही पहुंचेगा। इसके साथ ही भारत और अन्य देशों में निजीकरण की मांग रखी जा रही है जिसके चलते स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की मुनाफा कमाने की प्रवृति से गरीब लोगों को नुकसान पहुंचेगा और भारत में ऐसा पहले ही देखने को मिल रहा है।<br />
टाइम टू केयर नामक ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार देश में 1 प्रतिशत जनसंख्या के पास 95.3 करोड लोगों की संपत्ति से चौगुनी संपत्ति है। देश के 106 अरबपतियों के पास 28.9 लाख करोड रूपए की संपत्ति है जो 2018-19 के 24.4 लाख करोड के बजट से अधिक है। देश में शीर्ष 1 प्रतिशत जनसंख्या की संपत्ति में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि निचले तबके के 50 प्रतिशत लोगों की संपत्ति में केवल 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। भारत सहित लगभग सभी देशों में सामाजिक और आर्थिक असंतोष आम बात हो गयी है और भ्रष्टाचार, संवैधानिक मूल्यों के उल्लंघन, बुनियादी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि आदि के मुद्दों पर भी असंतोष और बढ़ जाता है। इसलिए ऐसी अर्थव्यवस्थाओं में अरबपतियों और बडे व्यावसायिक घरानों को अघिक लाभ पहुंच रहा है और आम आदमी को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड रहा है।<br />
ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट 2018 के अनुसार इस सहस्राब्दि की शुरूआत से देश में संपत्ति में प्रति वर्ष 9.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो विश्व औसत 6 प्रतिशत से अधिक है। किंतु ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार इस संपत्ति का लाभ धनी वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग ने अधिक उठाया है। इस रिपोर्ट मे यह भी कहा गया है कि विभिन्न देशों की सरकारें सबसे धनी लोगों और कंपनियों पर कम टैक्स लगा रही है। इसलिए इतना राजस्व अर्जित नहीं हो रहा है जिससे गरीब वर्ग को बुनियादी सुविधाएं, स्वास्थ्य और शिक्षा उपलब्ध करायी जा सके। किंतु इस बात को ध्यान में रखे बिना कि हमारी जनसंख्या का एक बडा भाग गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहा है पत्रकारों सहित विभिन दबाव डालने वाले संगठन कल्याण कार्यों पर व्यय में कटौती और निजीकरण् की वकालत कर रहे हैं। जबकि वे जानते हैं कि देश में निजी क्षेत्र पूरी तरह बेईमान है और उसका उद्देश्य गलत तरीकों से पैसा बनाना होता है।<br />
हैरानी की बात है कि 15 अगस्त 2019 तक देश में केवल 5.87 करोड आय कर विवरणी भरी गयी। राजस्व विभाग द्वारा जारी कर विवरणियों के अनुसार मूल्यांकन वर्ष 2018-19 में करोडपति करदाताओं की संख्या 97689 थी। हमारी अर्थव्यवस्था अमरीका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद पांचवीं सबसे बडी अर्थव्यवस्था है किंतु यहां राजस्व संग्रहण की स्थिति अच्छी नहीं है। प्रश्न उठता है कि क्या कर संग्रहण विवेकपूर्ण ढंग से किया जा रहा है या केवल वेतनभोगी वर्ग से कर लिया जा रहा है।<br />
डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशेवर लोग प्रति माह लाखों रूपए कमाते हैं किंतु उन पर कर नहीं लगाया जाता। इसी तरह शेयर बाजार में बडेÞ-बड़े खिलाडी मोटी रकम कमाते हैं किंतु वे इस आय को आयकर विभाग की नजरों से बचा देते हैं। करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि गरीब लोगों को प्रभावित करती है क्योंकि उनकी संपत्ति में वृद्धि शेयर बाजार और भूसंपदा में वृद्धि से जुडी होती है जिससे रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते और न ही यह विकास कार्यों में सहायक होती है। भारत सहित विभिन देशों की सरकारें उन लोगों की अधिक चिंता करती है जो राजनीतिक दलों को और चुनाव प्रचार के लिए पैसे देते हैं और गरीबों के बजाय उनके हितों को प्राथमिकता दी जाती है।<br />
खपत व्यय में कमी तथा बढ़ती बेरोजगारी बताती है कि हालांकि गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की संख्या में कमी आयी हो किंतु समाज के गरीब लोगों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्ट है कि उनकी आजीविका के साधन समाप्त होते जा रहे हैं। स्थिति का आकलन सामान्यतया समृद्ध ग्रामीण क्षेत्रों को ध्यान में रखकर किया जाता है किंतु देश के पिछडे क्षेत्रों में स्थिति वास्तव में काफी निराशाजनक है। सरकार विशेषकर आदिवासियों और दलितों की स्थिति और उनकी आजीविका पर ध्यान नहीं देती है। फिलहाल अमीर और गरीब, शहरी और ग्रामीण जनता, औद्योगिक कामगार और किसान के बीच असमानता कम होने की संभावना नहीं है और इसका कारण यह है कि पूंजीवादी सरकार ग्रामीण क्षेत्र और सीमान्त वर्ग के लोगों की आजीविका में सुधार लाने की इच्छुक नहीं है। राजनेताओं और नौकरशाहों में विकेन्द्रीकरण की प्रवृति नहीं है। इसलिए निर्देश शीर्ष स्तर से आते हैं जिसके चलते जनता की वास्तविक समस्याओं को नहीं सुना जाता है और उनकी उपेक्षा होती है।<br />
दूसरी ओर गरीबी हटाने में एक अन्य बडी अड़चन सरकार के पास संसाधनों की कमी है। बजट से पूर्व उद्योगपतियों, व्यापारिक संगठनों के साथ अनेक बैठकें होती हैं किंतु कृषक संगठनों या पंचायत प्रतिनिधियों के साथ ऐसी बैठकें कम ही होती हैं और इसीलिए व्यावसायिक वर्ग की मांगों पर ध्यान दिया जाता है और उन्हें रियायत दी जाती है और कृषक समुदाय की उपेक्षा की जाती है। जब तक रणनीति में बदलाव नहीं किया जाता और विकास रणनीति में ग्रामीण क्षेत्र कृषि और कृषि उद्योगों पर बल नही दिया जाता आय और जीवन शैली में असमानता बनी रहेगी। भारत और भारत जैसे देशों में जहां पर सच्चा लोकतंत्र नहीं है, वहां पर वर्तमान पीढ़ी के राजनेताओं से ऐसी आशा नहीं की जा सकती।</h4>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2020 20:33:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भुखमरी और खाद्यान की बर्बादी</title>
                                    <description><![CDATA[एक तरफ उसे खाद्यान्न भंडारण क्षमता में पर्याप्त वृद्धि करनी
 चाहिए ताकि अन्न की बर्बादी का सिलसिला रुक सके।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/starvation-and-food-waste/article-10804"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-10/poverty.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">खाद्यान, भुखमरी एवं गरीबी की समस्या से निपटने के लिए हर वर्ष 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मानते हुए 4 दशक होने वाले हैं लेकिन भुखमरी, कुपोषण एवं खाद्य सुरक्षा को लेकर अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिले है। विश्व के तकरीबन 1.3 अरब लोग आज भी गरीबी के दलदल में फंसे हुए हैं। यदि गरीबी और भुखमरी के मोर्चे पर भारत की बात की जाये तो यहाँ की भी स्थिति को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। ताजा वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के मुताबिक 2006 से 2016 के बीच 27.1 करोड़ लोग गरीबी से मुक्त हुए हैं लेकिन इसके बावजूद आज भी करीब 37 करोड़ लोग गरीब हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में इस समय भूखे सोने वाले लोगों की कुल संख्या 79.5 करोड़ है जिसमें से 19.4 करोड लोग भारत में रहते हैं। उपरोक्त आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि पूरी दुनिया के एक तिहाई गरीब एवं एक चौथाई भूखे व्यक्ति भारत में रहते हैं। यह बड़ी विडम्बना की बात है कि एक ओर साल दर साल देश में खाद्यान्न का उत्पादन रिकॉर्ड स्तरों को छू रहा है वहीं दूसरी तरफ देश की एक बड़ी आबादी को भूखे पेट सोने को मजबूर होना पड़ रहा है। देश में खाद्यान्न की बर्बादी और करोड़ों लोगों के समक्ष भुखमरी की विवशता की स्थिति को देखते हुए ही कुछ वर्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन यूपीए सरकार को सलाह दी थी कि अन्न को सड़ाने से अच्छा है कि उसे गरीबों में बांट दिया जाए। यह और बात है कि सरकार ने उस सलाह को दरकिनार कर दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, मौजूदा स्थिति यह है कि प्रतिवर्ष सरकार का खाद्यान्न भंडार बढ़ता जा रहा है और उस अनुपात में उनका वितरण नहीं हो रहा है। ऐसे में सरकार को दो उपायों पर एक साथ काम करने की जरूरत है। एक तरफ उसे खाद्यान्न भंडारण क्षमता में पर्याप्त वृद्धि करनी चाहिए ताकि अन्न की बर्बादी का सिलसिला रुक सके। दूसरी तरफ सार्वजनिक वितरण प्रणाली में मौजूद भ्रष्टाचार और अन्य खामियों को दूर करते हुए जरूरतमंदों तक अन्न की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">सच यह है कि खेती-किसानी और गरीबों से जुड़ी समस्याओं को लेकर सरकारें कभी गंभीर पहल नहीं करतीं। शायद यही वजह है कि अनाज की बबार्दी को रोकने के मसले पर औपचारिक कवायदों से आगे बात अभी तक नहीं बढ़ पाई है। भारत में भी भुखमरी एवं गरीबी उन्मूलन के लिए एक नहीं अपितु अनेक सरकारी योजनाएं संचालित हो रही हैं। लेकिन फिर भी कोई सकारात्मक परिणाम नजर नहीं आ रहे हैं। यह विचारणीय प्रश्न है कि आखिर हमारी योजनाओं में क्या कमी है, जो हम गरीबी एवं भुखमरी के उन्मूलन में नाकामयाब हो रहे हैं। दरअसल सरकार ने निर्धनता उन्मूलन के लिए जो योजनाएं चलाई हैं उनमें भ्रष्टाचार का घुन लगा हुआ है। जिस कारण आम तौर पर इसका लाभ गरीबों को नहीं मिल पाता। जरूरत है इन अनियमितताओं पर शिकंजा कसने की तभी देश के प्रत्येक व्यक्ति की थाली में दो वक्त की रोटी पहुंच पायेगी और उनके चेहरे पर मुस्कान आयेगी।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 15 Oct 2019 21:21:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गरीबी का संबोधन मिटे</title>
                                    <description><![CDATA[गरीबी केवल भारत की ही नहीं, बल्कि दुनिया की एक बड़ी समस्या है, एक अभिशाप है। दुनियाभर में फैली गरीबी के निराकरण के लिए ही संयुक्त राष्ट्र में साल 1992 में हर साल 17 अक्टूबर को गरीबी उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई। सभी देशों में गरीबी और निर्धनता उन्मूलन की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/poverty-alleviation/article-6320"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/poverty-alleviation.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गरीबी केवल भारत की ही नहीं, बल्कि दुनिया की एक बड़ी समस्या है, एक अभिशाप है। दुनियाभर में फैली गरीबी के निराकरण के लिए ही संयुक्त राष्ट्र में साल 1992 में हर साल 17 अक्टूबर को गरीबी उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई। सभी देशों में गरीबी और निर्धनता उन्मूलन की जरूरत पर जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए इस दिन को नामित किया था। इस दिन कई देशों द्वारा गरीबी उन्मूलन के लिए प्रयास, विकास एवं विभिन्न कार्यों व योजनाओं को जारी किया जाता है। गरीबी एक गंभीर बीमारी है, किसी भी देश के लिए गरीबी अत्यधिक निर्धन होने की समस्या होती है। जब किसी राष्ट्र के लोगों को रहने को मकान, जीवन निर्वाह के लिये जरूरी भोजन, कपड़े, दवाइयां आदि जैसी चीजों की कमी महसूस होती है, तो वह राष्ट्र गरीब राष्ट्र की श्रेणी में आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन एक बहस चली कि गरीबी की परिभाषा क्या है? धनहीन, चरित्रहीन या विवेकहीन या जो व्यवहार नहीं जानता हो अथवा जिसकी समाज में कोई इज्जत न हो। ये सब मापदण्ड अभी मनुष्य के दिमाग में आये नहीं हैं। वह तो बस गरीब उसको मानता है जिसके पास धन उसकी जरूरत से कम हो या जो दो वक्त की रोटी की जुगाड़ नहीं कर सकता। जो अपनी बूढ़ी मां का इलाज नहीं करवा सकता। जो अपने बच्चों की फीस नहीं भरवा सकता। गरीबी व्यक्ति को बेहतर जीवन जीने में अक्षम बनाता है। गरीबी के कारण व्यक्ति को जीवन में शक्तिहीनता और आजादी की कमी महसूस होती है। गरीबी उस स्थिति की तरह है, जो व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने में अक्षम बनानी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अनेकों चेहरे हैं जो व्यक्ति, स्थान और समय के साथ बदलते रहते हैं। गरीबी ऐसी त्रासदी एवं दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति है जिसका कोई भी अनुभव नहीं करना चाहता। एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि गरीबी कोई दैवीय अभिशाप नहीं है बल्कि यह मानवजाति द्वारा रचित सबसे बड़ी समस्या है। विश्व में सुरसा की तरह मुँह फैलाती हुई गरीबी शासनतंत्र की विफलता का भी द्योतक हैं। क्योंकि गरीबी से संबन्ध सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष की मासिक या सालाना आय से नहीं बल्कि स्वास्थ्य, राजनीतिक भागीदारी, देश की संस्कृति और सामाजिक संगठनों की उन्नति से भी है। भारत में गरीबी का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, कमजोर कृषि, भ्रष्टाचार, रूढ़िवादी सोच, जातिवाद, अमीर-गरीब में ऊंच-नीच, नौकरी की कमी, अशिक्षा, बीमारी आदि हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसके बावजूद भारत में मौजूद सबसे ज्यादा संख्या मे किसान ही इस गरीबी के दंश को झेलने के लिए मजबूर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार की गलत नीतियों, खराब कृषि और बेरोजगारी की वजह से लोगों को भोजन की कमी से जूझना पड़ता है। यही कारण है की महंगाई ने भी पंख फैला रखे हैं। वहीं भारत में बढ़ती जनसंख्या भी गरीबी का एक प्रमुख कारण है। अधिक जनसंख्या मतलब अधिक भोजन, पैसा और घर की जरूरत। मूल सुविधाओं की कमी के कारण गरीबी ने तेजी से अपने पांव पसारे हैं। अत्यधिक अमीर और भयंकर गरीब ने अमीर और गरीब के बीच की खाई खोद रखी है।<br />
सरकार भी ऐसे ही लोगों को गरीब मानती है जिनकी वार्षिक आय सरकार के निर्धारित आंकड़ों से कम हो। लेकिन गरीबी केवल आर्थिक ही नहीं होती। बुद्धिजीवी हर आदमी को, यहां तक कि हर देश को, तुलनात्मक दृष्टि से गरीब मानते हैं। दार्शनिक गरीब उसको मानता है जो भयभीत है, जो थक गया है, जो अपनी बात नहीं कह सकता। साधारण आदमी, झोंपड़ी में रहने वाले को गरीब और महल में रहने वाले को अमीर मानता है।</p>
<p style="text-align:justify;">खैर! यह सत्य है कि गरीब की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। तब गरीबी की रेखा क्या? क्यों है? गरीबी को खत्म करने में जो चीज सबसे अहम है वो है असमानता को दूर करना। अगर ऐसा नहीं होता है तो गरीबों के लिए विकास का कोई मतलब नहीं होगा। एक आजाद मुल्क में, एक शोषणविहीन समाज में, एक समतावादी दृष्टिकोण में और एक कल्याणकारी समाजवादी व्यवस्था में यह गरीबी रेखा नहीं होनी चाहिए। यह रेखा उन कर्णधारों के लिए ह्वशर्म की रेखा है, जिसको देखकर उन्हें शर्म आनी चाहिए। यहां प्रश्न है कि जो रोटी नहीं दे सके वह सरकार कैसी? जो अभय नहीं बना सके, वह व्यवस्था कैसी? जो इज्जत व स्नेह नहीं दे सके, वह समाज कैसा? जो शिष्य को अच्छे-बुरे का भेद न बता सके, वह गुरु कैसा?</p>
<p style="text-align:justify;">अगर तटस्थ दृष्टि से बिना रंगीन चश्मा लगाए देखें तो हम सब गरीब हैं। जैसे भय केवल मृत्यु में ही नहीं, जीवन में भी है। ठीक उसी प्रकार भय केवल गरीबी में ही नहीं, अमीरी में भी है। यह भय है आतंक मचाने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से जहां है वहां से नीचे उतर जाने का, प्रियजनों की सुरक्षा का। जब चारों तरफ अच्छे की उम्मीद नजर नहीं आती, तब मनुष्य नैतिकता की ओर मुड़ता है तब भय शक्ति देता है। कारण, उस समय सभी कुछ दांव पर होता है। गरीबी भी शक्ति होती है, भय भी शक्ति होता है। कायरता में से ही साहस पैदा होता है। हर व्यक्ति में अभी तक इतनी सोच नहीं बन सकी। लेकिन हमारे कदम तो उस ओर बढ़ें। दुर्भाग्य है, शासन व्यवस्थाओं पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग</strong></p>
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                <pubDate>Thu, 18 Oct 2018 10:13:10 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>गरीबी की बदहाली पर मौन सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[1.26 अरब जनसंख्या की 25 फिसदी से ज्यादा अभी भी गरीबी रेखा से नीचे रहते है भारत एक तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के बावजूद भी भारत की अधिकतम जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। विश्व की लगभग 20 फीसदी जनसंख्या भारत में निवास करती है। गरीबी चारों तरफ फैली हुई […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/silence-government-on-poverty-reduction/article-6262"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/reduction.jpg" alt=""></a><br /><h2>1.26 अरब जनसंख्या की 25 फिसदी से ज्यादा अभी भी गरीबी रेखा से नीचे रहते है</h2>
<p style="text-align:justify;">भारत एक तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के बावजूद भी भारत की अधिकतम जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। विश्व की लगभग 20 फीसदी जनसंख्या भारत में निवास करती है। गरीबी चारों तरफ फैली हुई एक व्यापक स्थिति है। जो आजादी के बाद से एक बड़ी चिंता हमेशा बनी हुई है। स्वन्त्रता प्राप्ति के बाद आज भी गरीबी देश में एक लगातार बढ़ता हुआ खतरा है। ये 21वीं शताब्दी है और गरीबी आज भी लगातार बढ़ रही है। 1.26 अरब जनसंख्या की 25 फिसदी से ज्यादा अभी भी गरीबी रेखा से नीचे रहते है। यह देश के लिए खतरा नही है तो क्या है। और साथ ही साथ भारत की प्रगति में बाधक है हालांकि यह ध्यान देने योग्य है कि पिछले दशक में गरीबी के स्तर में काफी गिरावट आई है ।</p>
<h2>भारत खपत और आय दोनों के आधार पर गरीबी के स्तर को मापता है।</h2>
<p style="text-align:justify;">एक देश का स्वास्थ्य भी उन लोगों के मानकों पर निर्धारित होता है जो राष्ट्रीय आय और घरेलू उत्पाद के अलावा उस देश के लोगों के स्तिथि पर आधारित होता हैं। इस प्रकार गरीबी किसी भी देश के विकास में एक बड़ा धब्बा बन जाती है। गरीबी को एक ऐसी स्थिति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें एक व्यक्ति जीवन यापन के लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ होता है। इन बुनियादी जरूरतों में शामिल हैं, भोजन, कपड़े और मकान। गरीबी वो स्थिति है जो लोगों को जीने के लिये आवश्यक मानकों का वहन नहीं करती। गरीबी वो दुश्चक्र है जो आमतौर पर परिवार के सभी सदस्यों को शामिल करती है। अत्यधिक गरीबी के कारण अंतत: व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। भारत में गरीबी अर्थव्यवस्था, अर्द्ध-अर्थव्यवस्था और परिभाषाओं के सभी आयामों को ध्यान में रखते हुए परिभाषित की गई है जो अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के अनुसार तैयार की जाती हैं। भारत खपत और आय दोनों के आधार पर गरीबी के स्तर को मापता है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">सरकार के साथ साथ हम सभी को भी इस मुहिम में भाग लेने की आवश्यकता है जिससे की गरीबी से निजात पाया जा सके।</li>
<li style="text-align:justify;">सरकार के द्वारा गरीबी उन्मूलन के लिए बिभिन्न प्रकार की सरकारी योजनाए बनाई गयी है।</li>
<li style="text-align:justify;">जैसे पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली), मनरेगा और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना इत्यादि।</li>
<li style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा था की “गरीबी दैवीय अभिशाप नही मानवीय सृष्टि है” अर्थात अगर हम सच मुच ठान ले तो गरीबी से छुटकारा पाया जा सकता है।</li>
<li style="text-align:justify;">हमारे देश के सभी लोगो को अमीरों और गरीबों के बीच की रेखा को पूरी तरह से मिटाने के प्रयासों का कड़ाई से अनुसरण करने की आवश्यकता है</li>
<li style="text-align:justify;">प्रयासों को जबरदस्त ढंग से पालन करने की आवश्यकता है। जिससे की गरीबी ज्यादा से ज्यादा कम हो सके।</li>
</ul>
<h2 style="text-align:justify;">रिपोर्ट के मुताबिक 10 में से हर तीसरा व्यक्ति गरीब है</h2>
<p style="text-align:justify;">भारत गरीबी के स्तर पर उपभोग और आय दोनों के आधार पर निर्णय लेता है। उपभोग का मापन मुद्रा के उस भाग से किया जाता है जो लोगों द्वारा घर की आवश्यक चीजों को खरीदने पर व्यय किया जाता है और आय की गणना विशेष व्यक्तियों द्वारा कमायी जाने वाली आय के अनुसार होती है। एक अन्य अवधारणा है जिसका यहां उल्लेख करना आवश्यक है वो है गरीबी रेखा की अवधारणा। ये गरीबी रेखा भारत के साथ ही अन्य राष्ट्रों में गरीबी मापने के मानक के रुप में कार्य करती है। गरीबी रेखा आय के न्यूनतम स्तर को बताती है। जो एक परिवार के जीवन यापन के लिये आवश्यक आधारभूत जरुरतों को पूरा करने के लिये जरुरी होती है। सी रंगराजन समिति 2014 के अनुसार भारत में गरीबी रेखा के नीचे उन लोगों को रखा गया है जिनकी आय ग्रामीण क्षेत्रों में 32 रुपये प्रतिदिन तथा कस्बों और शहरों में 47 रुपये प्रतिदिन है। रिपोर्ट के मुताबिक 10 में से हर तीसरा व्यक्ति गरीब है यनि देश के करीब 30 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे तथा 70 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से ऊपर है। खपत उस धन कारण मापा जाता है जो आवश्यक वस्तुओं पर घर से खर्च होता है और आय एक विशेष परिवार द्वारा अर्जित आय के हिसाब से गिना जाता है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>भारत यादव बीएचयू</strong></p>
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<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/silence-government-on-poverty-reduction/article-6262</link>
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                <pubDate>Mon, 15 Oct 2018 09:17:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत में गरीबी के आंकड़ों का मायाजाल</title>
                                    <description><![CDATA[भारत गरीबी के चंगुल से निकलने के किये सतत् प्रयासरत है। गरीबी उन्मूलन की विभिन्न योजनाओं के चलते देश में गरीबी हटने के आशा जनक संकेत तो कम से कम यही बता रहे हैं। इसे आंकड़ों का मायाजाल कहें या वास्तविकता मगर गरीबी के लगातार हटने के समाचारों से भारत को निश्चय ही सुकून मिला […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/poverty-figures-in-india/article-6034"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/bharth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत गरीबी के चंगुल से निकलने के किये सतत् प्रयासरत है। गरीबी उन्मूलन की विभिन्न योजनाओं के चलते देश में गरीबी हटने के आशा जनक संकेत तो कम से कम यही बता रहे हैं। इसे आंकड़ों का मायाजाल कहें या वास्तविकता मगर गरीबी के लगातार हटने के समाचारों से भारत को निश्चय ही सुकून मिला है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2018 बहुआयामी वैश्विक गरीबी सूचकांक रपट की मानें तो वित्त वर्ष 2005-06 से 2015-16 के बीच के एक दशक में भारत में 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल गए हैं। इस समय देश की आबादी लगभग 135 करोड़ है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया भर में 1.3 अरब लोग बहुआयामी गरीबी में जीवन बिता रहे हैं, जो कि 104 देशों की कुल आबादी का एक-चौथाई हिस्सा है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में दस बरसों की अवधि में गरीब लोगों की संख्या घटकर आधी रह गई है, जो 55 फीसदी से घटकर 28 फीसदी हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट में कहा गया भारत में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में गरीबों की संख्या सर्वाधिक है। करीब 19.6 करोड़ की आबादी वाले इन चारों दरिद्र राज्यों में पूरे भारत के आधे से ज्यादा गरीब रहते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली, केरल और गोवा में गरीबों की संख्या सबसे कम है। भारत की गरीबी आज भी आंकड़ों के भ्रम जाल में उलझी हुई है। आजादी के 71 सालों के बाद भारत में गरीब और गरीबी पर लगातार अध्ययन और खुलासा हो रहा है। अब तक यही कहा जा रहा था कि सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी देश में गरीबी कम होने का नाम नहीं ले रही है। मगर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अलावा भी एक अन्य अध्ययन रपट की बात पर विश्वास करें तो भारत में हर मिनट 44 लोग गरीबी की रेखा से निकल कर बाहर आरहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यही स्थिति बनी रही तो चार साल बाद गरीबी का आंकड़ा न्यूनतम पर पहुँच जायेगा।<br />
रिपोर्ट के मुताबिक अत्यंत गरीबी के दायरे में वह आबादी आती है जिसके पास जीवनयापन के लिए रोजाना 1.9 डॉलर (करीब 125 रुपये) भी नहीं होते । नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के एक प्रवक्ता के अनुसार पिछले 10 सालों में देश में हुए आर्थिक विकासों पर नजर डालें तों 2030 तक अत्यधिक गरीबी को खत्म करने के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें नियमित तौर पर 7 से 8 फीसदी की विकास दर बना कर रखनी होगी। रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस वर्षों में दक्षिण एशिया के देशों जैसे भारत, इंडोनेशिया, बांगलादेश, फिलीपींस, चीन और पाकिस्तान में लोगों की आय तेजी से बढ़ी है। इसके चलते दुनिया भर में गरीबी में कमी आयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं वैश्विक स्तर पर गरीबी को कम करने में भारत व चीन की भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।<br />
विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया में करीब 76 करोड़ गरीब हैं इनमें भारत में करीब 22.4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। भारत के 7 राज्यों छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और यूपी में करीब 60 प्रतिशत गरीब अबादी रहती है। 80 प्रतिशत गरीब भारत के गांवों में रहते हैं। लोकसभा में भारत सरकार द्वारा दी गई एक जानकारी के अनुसार करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करते हैं। इनमें से अनुसूचित जनजाति के 45 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के 31.5 प्रतिशत के लोग इस रेखा के नीचे आते हैं। हालांकि, गरीबी मापने में अंतर के कारण अत्यंत गरीब आबादी में कमी का आकलन भारत सरकार के अपने आकलन से मेल नहीं करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">नीति आयोग ने हाल ही में अपने एक प्रस्तुतिकरण में कहा था कि साल 2022 तक देश को गरीबी, गंदगी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता-इन छह समस्याओं से निजात दिलाने के लिए जमीन तैयार कर ली जाएगी। जब देश 2022 में स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ मना रहा होगा। विभिन्न स्तरों पर गरीबी खत्म किये जाने के दावे स्वतंत्र विश्लेषक सही नहीं मानते हैं। मगर यह अवश्य कहा जा सकता है कि पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन के प्रयास जरूर सिरे चढ़े हैं। सरकारी स्तर पर यदि ईमानदारी से प्रयास किये जाएं और जनधन का दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो सकता है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>बाल मुकुन्द ओझा</strong></p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Sep 2018 15:08:56 +0530</pubDate>
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                <title>आंकड़ों में उलझी भारत की गरीबी</title>
                                    <description><![CDATA[बाल मुकुन्द ओझा भारत की गरीबी आज भी आंकड़ों के भ्रम जाल में उलझी हुई है India, Poverty, Figures, Complicated। आजादी के 71 सालों के बाद भारत में गरीब और गरीबी पर लगातार अध्ययन और खुलासा हो रहा है। अब तक यही कहा जा रहा था कि सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी देश […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-poverty-figures-complicated/article-4566"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/garibi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बाल मुकुन्द ओझा </strong></p>
<p style="text-align:justify;">भारत की गरीबी आज भी आंकड़ों के भ्रम जाल में उलझी हुई है India, Poverty, Figures, Complicated। आजादी के 71 सालों के बाद भारत में गरीब और गरीबी पर लगातार अध्ययन और खुलासा हो रहा है। अब तक यही कहा जा रहा था कि सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी देश में गरीबी कम होने का नाम नहीं ले रही है। मगर एक विदेशी संस्था की बात पर विश्वास करें तो भारत में हर मिनट 44 लोग गरीबी की रेखा से निकल कर बाहर आ रहे हैं। यही स्थिति बनी रही तो चार साल बाद गरीबी का आंकड़ा न्यूनतम पर पहुँच जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
अमेरिकी शोध संस्था की ओर से भारत में गरीबी को लेकर जारी ताजा आंकड़े मोदी सरकार को सुकून देने वाले हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले कुछ साल में भारत में गरीबों की संख्या बेहद तेजी से घट रही हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि भारत के ऊपर से सबसे ज्यादा गरीब देश होने का ठप्पा भी खत्म हो गया है। देश में हर मिनट 44 लोग गरीबी रेखा के ऊपर निकल रहे हैं। यह दुनिया में गरीबी घटने की सबसे तेज दर है।यह दावा अमेरिकी शोध संस्था ब्रूकिंग्स के ब्लॉग, फ्यूचर डेवलपमेंट में जारी रिपोर्ट में किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार देश में 2022 तक 03 फीसदी से कम लोग ही गरीबी रेखा के नीचे होंगे। वहीं 2030 तक बेहद गरीबी में जीने वाले लोगों की संख्या देश में न के बराबर रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन में कहा गया है, ह्यहमारे अनुमान के अनुसार मई 2018 के आखिर में नाइजीरिया में लगभग 8.7 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में जीवन यापन कर रहे थे। भारत में यह संख्या 7.3 करोड़ है। इसके अनुसार नाइजीरिया में हर मिनट छह लोग अत्यधिक गरीबी के दायरे में आते जा रहे हैं जबकि भारत में गरीबी लगातार कम हो रही है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रायोजित टिकाऊ विकास लक्ष्यों का मकसद 2030 तक दुनियाभर से गरीबी हटाना है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो वर्ष 2004 से 2011 के बीच भारत में गरीब लोगों की संख्या 38.9 फीसदी से घट कर 21.2 फीसदी रह गई। वर्ष 2011 में भारत में लोगों की क्रय क्षमता 1.9 डॉलर (करीब 125 रुपये) प्रति व्यक्ति के करीब रही। रिपोर्ट के मुताबिक अत्यंत गरीबी के दायरे में वह आबादी आती है जिसके पास जीवनयापन के लिए रोजाना 1.9 डॉलर (करीब 125 रुपये) भी नहीं होते। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि देश में तेज आर्थिक विकास के चलते गरीबी घटी है।</p>
<p style="text-align:justify;">नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के एक प्रवक्ता के अनुसार पिछले 10 सालों में देश में हुए आर्थिक विकासों पर नजर डालें तों 2030 तक अत्यधिक गरीबी को खत्म करने के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें नियमित तौर पर 07 से 08 फीसदी की विकास दर बना कर रखनी होगी। रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस वर्षों में दक्षिण एशिया के देशों जैसे भारत, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, फिलिपींस, चीन और पाकिस्तान में लोगों की आय तेजी से बढ़ी है। इसके चलते दुनिया भर में गरीबी में कमी आयी है। वहीं वैश्विक स्तर पर गरीबी को कम करने में भारत व चीन की भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">
विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया में करीब 76 करोड़ गरीब हैं इनमें भारत में करीब 22.4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। भारत के 7 राज्यों छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और यूपी में करीब 60 प्रतिशत गरीब अबादी रहती है। 80 प्रतिशत गरीब भारत के गांवों में रहते हैं। लोकसभा में भारत सरकार द्वारा दी गई एक जानकारी के अनुसार हमारे देश की जनसंख्या सवा सौ करोड़ से ज्यादा है। इसमें करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करते हैं। इनमें से अनुसूचित जनजाति के 45 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के 31.5 प्रतिशत के लोग इस रेखा के नीचे आते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, गरीबी मापने में अंतर के कारण अत्यंत गरीब आबादी में कमी का आकलन भारत सरकार के अपने आकलन से मेल नहीं करेगी। नीति आयोग ने हाल ही में अपने एक प्रस्तुतिकरण में कहा था कि साल 2022 तक देश को गरीबी, गंदगी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता-इन छह समस्याओं से निजात दिलाने के लिए जमीन तैयार कर ली जाएगी। जब देश 2022 में स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ मना रहा होगा।विभिन्न स्तरों पर गरीबी खत्म किये जाने के दावे स्वतंत्र विश्लेषक सही नहीं मानते है। मगर यह अवश्य कहा जा सकता है कि पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन के प्रयास जरूर सिरे चढ़े हंै। सरकारी स्तर पर यदि ईमानदारी से प्रयास किये जायें और जनधन का दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-poverty-figures-complicated/article-4566</link>
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                <pubDate>Sat, 30 Jun 2018 07:56:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गरीबी की भेंट चढ़ा पूरा परिवार ,  परिवार के 5 सदस्यों की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[चार भाई-बहनों समेत खुद खाया जहर  मरने वालों में दो भाई नाबालिग थे कपूरथला । गरीबी के कारण 21 साल के एक व्यक्ति ने कथित तौर पर अपने चार छोटे भाई-बहनों को जहर मिला बर्गर खिला दिया और खुद भी अपनी जान दे दी। मरने वाले चार सभी बच्चे नाबालिग थे और उसमें दो लड़कियां […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/5-family-members-suicides-due-to-poverty/article-1474"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/note.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">चार भाई-बहनों समेत खुद खाया जहर</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong> मरने वालों में दो भाई नाबालिग थे</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>कपूरथला ।</strong> गरीबी के कारण 21 साल के एक व्यक्ति ने कथित तौर पर अपने चार छोटे भाई-बहनों को जहर मिला बर्गर खिला दिया और खुद भी अपनी जान दे दी। मरने वाले चार सभी बच्चे नाबालिग थे और उसमें दो लड़कियां शामिल थीं। यह घटना मंगलवार रात यहां के लक्ष्मी नगर इलाके में हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संदीप शर्मा ने बताया कि 21 वर्षीय अभिमन्यु का परिवार भयंकर गरीबी में था, जिसके कारण उसे इस प्रकार का कदम उठाना पड़ा। शर्मा ने बताया कि अभिमन्यु बाजार से बर्गर लाया था और कथित तौर पर इसमें कोई जहरीला पदार्थ मिला दिया और सभी बच्चों से इसे खाने को कहा। उसने खुद भी यह जहरीला बर्गर खाया और अपनी जान दे दी। चिकित्सा अधिकारी अनूप मेघ के मुताबिक अनु(18 वर्ष), अर्चना (8 वर्ष)और अर्शु (15)ने स्थानीय सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया, जबकि अभिमन्यु और अनुराग (12), जो शारीरिक तौर पर अक्षम थे, की जालंधर के अस्पताल में मौत हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अभिमन्यु ने अपनी सात साल की बहन आरती को भी यह बर्गर खिलाया था, जो इस समय अस्पताल में भर्ती है। आरती को बर्गर खाने के बाद जल्दी ही उल्टी हो गई थी। मरने वाले अभिमन्यु ने एक चिट्ठी छोड़ी है, जिसमें लिखा है, ‘पापा, मैं आपको याद कर रहा हूं और मुझे यह सब करने के लिए माफ कर देना, क्योंकि हम सब परिवार पर बोझ थे।’ मृतक के पिता किशोर ठाकुर इस घटना के समय शहर में नहीं थे। वह पेशे से नाई हैं। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया कर लिया है और मामले की जांच कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                            <category>देश</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 21 Jun 2017 07:13:55 +0530</pubDate>
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