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                <title>Agricultural News - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Agricultural News RSS Feed</description>
                
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                <title>Sugar Price: चीनी की कीमत क्यों बढ़ रही है? विशेषज्ञों ने बताया ये बड़ा कारण!</title>
                                    <description><![CDATA[देश में चीनी की कीमतों में तेजी के बीच विशेषज्ञों ने कारण बताए हैं। गन्ना उत्पादन, चीनी रिकवरी और लीन सीजन को प्रमुख कारक बताया गया है। जानें एथेनॉल, बफर स्टॉक और चीनी बाजार पर पूरी जानकारी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/delhi/sugar-price-why-is-the-price-of-sugar-increasing-experts/article-90042"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-08/sugar-hike.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नई दिल्ली। देश में चीनी की कीमतों में आई तेजी को लेकर एथेनॉल उत्पादन पर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती कीमतों के लिए केवल एथेनॉल डायवर्जन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। उनके अनुसार गन्ने के उत्पादन में कमी, चीनी की रिकवरी घटने और पेराई के मौसमी चक्र जैसे कई कारकों का बाजार पर असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र सरकार घरेलू खपत को प्राथमिकता देते हुए चीनी उत्पादन, एथेनॉल निर्माण और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाती है। उत्पादन की स्थिति और उपलब्ध स्टॉक की लगातार समीक्षा के बाद ही अतिरिक्त मात्रा के उपयोग की अनुमति दी जाती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">देश की जरूरत पूरी करने के बाद होता है अन्य उपयोग</h3>
<p style="text-align:justify;">नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन के अनुसार, देश में हर वर्ष करीब 280 लाख टन चीनी की घरेलू आवश्यकता होती है। सरकार का पहला लक्ष्य इस मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना होता है। इसके बाद ही अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए अनुमति दी जाती है। उन्होंने बताया कि मौजूदा वर्ष में करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर सामग्री एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हुई, जबकि लगभग 7 लाख टन चीनी का निर्यात भी किया गया। इसके बावजूद घरेलू बाजार के लिए पर्याप्त भंडार उपलब्ध होने की बात कही गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में इस वर्ष लगभग 306 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। इसके अलावा पिछले वर्ष से बचा हुआ स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य स्थिति में देश के पास करीब 50 लाख टन या इससे अधिक का बफर स्टॉक रखने की व्यवस्था होती है। ऐसे में विशेषज्ञों का तर्क है कि बाजार में कीमतों की तेजी को केवल एथेनॉल के लिए चीनी के उपयोग से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। उनके अनुसार गन्ने की गुणवत्ता और चीनी रिकवरी में बदलाव जैसे कारक भी कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">एथेनॉल से चीनी उद्योग को मिली स्थिरता</h3>
<p style="text-align:justify;">एथेनॉल कार्यक्रम को भारतीय चीनी उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जाता है। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन आवश्यकता से अधिक हो जाता था, तब बाजार में कीमतें कमजोर पड़ती थीं। इसका असर चीनी मिलों की आय और किसानों के गन्ना भुगतान पर भी पड़ सकता था।</p>
<p style="text-align:justify;">अतिरिक्त चीनी के निर्यात में अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतें और प्रतिस्पर्धा कई बार चुनौती बनती थीं। ऐसे में अतिरिक्त संसाधनों को एथेनॉल उत्पादन में उपयोग करने की नीति ने उद्योग को एक वैकल्पिक बाजार उपलब्ध कराया। विशेषज्ञों का मानना है कि एथेनॉल से ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा, पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ईंधन के उपयोग को प्रोत्साहन जैसे फायदे भी जुड़े हैं। हालांकि, उत्पादन कम होने की स्थिति में सरकार एथेनॉल डायवर्जन और निर्यात की अनुमति पर नियंत्रण कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम के अनुसार, चीनी बाजार की मौजूदा स्थिति में गन्ने की गुणवत्ता और उत्पादन भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर भारत में इस समय गन्ना पेराई का लीन सीजन चल रहा है। मुख्य कटाई और पेराई का मौसम शुरू होने के बाद चीनी उत्पादन बढ़ने और बाजार में नई आपूर्ति आने की संभावना रहती है। इससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">महाराष्ट्र और तमिलनाडु में बेहतर क्यों है रिकवरी?</h3>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में गन्ने की फसल अवधि का चीनी रिकवरी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। उत्तर भारत में कई क्षेत्रों में गन्ना लगभग 10 से 11 महीने में तैयार हो जाता है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में फसल को करीब 13 से 14 महीने तक खेत में रहने दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लंबी फसल अवधि से गन्ने में शर्करा का संचय बेहतर हो सकता है, जिससे रिकवरी बढ़ती है। महाराष्ट्र में चीनी रिकवरी लगभग 13 से 14 प्रतिशत तक पहुंचने की बात कही जाती है। तमिलनाडु में गन्ने की फसल अवधि कुछ क्षेत्रों में 18 महीने तक पहुंच सकती है। इसी कारण वहां प्रति हेक्टेयर गन्ना उत्पादकता देश के उच्च स्तरों में शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. हरिओम ने उत्तर भारत के किसानों को गन्ने के साथ अंतरवर्ती खेती अपनाने की सलाह दी। उनके अनुसार, धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ना लगाकर उसके बीच गेहूं, सरसों, मसूर, चना, सब्जियां या अन्य उपयुक्त फसलें उगाई जा सकती हैं। बिहार कृषि विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, गन्ने के साथ लौकी, करेला, नेनुआ, भिंडी और मूंग जैसी फसलें लेने से गन्ने के उत्पादन पर जरूरी नहीं कि नकारात्मक प्रभाव पड़े। इससे किसानों को अतिरिक्त उत्पादन और आय का अवसर मिल सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>दिल्ली</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 15:44:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Cotton Cultivation: हल्की बारिश से खेतों में खिली कपास, कृषि विशेषज्ञों ने जारी की किसानों को अहम सलाह</title>
                                    <description><![CDATA[खरीफ मौसम में समय पर मिलने वाली हल्की वर्षा को कृषि विशेषज्ञ फसलों के लिए सबसे उपयोगी प्राकृतिक संसाधनों में मानते हैं। भिवानी क्षेत्र में हाल में हुई वर्षा ने विशेष रूप से कपास की फसल को नई ऊर्जा प्रदान की है। इस समय अधिकांश खेतों में कपास पौधों की बढ़वार के चरण में है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/cotton-bloomed-in-the-fields-due-to-light-rain-agricultural/article-87879"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/cotton-cultivation.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भिवानी (इन्द्रवेश)। खरीफ मौसम में समय पर मिलने वाली हल्की वर्षा को कृषि विशेषज्ञ फसलों के लिए सबसे उपयोगी प्राकृतिक संसाधनों में मानते हैं। भिवानी क्षेत्र में हाल में हुई वर्षा ने विशेष रूप से कपास की फसल को नई ऊर्जा प्रदान की है। इस समय अधिकांश खेतों में कपास पौधों की बढ़वार के चरण में है। ऐसे में मिट्टी में बढ़ी नमी, पोषक तत्वों की उपलब्धता और तापमान में आई संतुलित कमी पौधों के स्वस्थ विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर रही है। इससे आने वाले समय में बेहतर शाखा विकास, फूल बनने की प्रक्रिया और उत्पादन क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। Cotton Cultivation</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि विशेषज्ञों के अनुसार क्षेत्र में कपास की अधिकांश बुवाई मई के मध्य तक पूरी हो चुकी थी। वर्तमान में पौधे सक्रिय वृद्धि की अवस्था में हैं। हल्की बारिश के कारण पहले से डाली गई उर्वरक सामग्री मिट्टी में अच्छी तरह घुलकर जड़ों तक पहुंच सकेगी। इससे पौधों की पोषण क्षमता बढ़ेगी और उनकी बढ़वार अधिक संतुलित होगी। धान और विभिन्न सब्जी फसलों को भी इस प्राकृतिक नमी का लाभ मिलने की उम्मीद है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि सभी फसलों पर वर्षा का प्रभाव समान नहीं है। कुछ किसानों का कहना है कि ग्वार और बाजरे वाले खेतों में हल्की वर्षा के बाद मिट्टी की ऊपरी सतह पर पपड़ी बनने की समस्या दिखाई दी है। ऐसी स्थिति में समय पर हल्की गुड़ाई या निराई करने से मिट्टी भुरभुरी बनी रहती है और जड़ों तक हवा तथा नमी का बेहतर संचार होता है। यदि कहीं पानी रुकता है तो उसे शीघ्र निकालना भी आवश्यक है, क्योंकि जलभराव से पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि विज्ञान केंद्र की विशेषज्ञों ने किसानों को अनावश्यक कीटनाशकों के प्रयोग से बचने की सलाह दी है। उनका कहना है कि बिना आवश्यकता बार-बार स्प्रे करने से केवल हानिकारक कीट ही नहीं, बल्कि फसलों की रक्षा करने वाले मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं। इससे भविष्य में कीट प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है तथा उत्पादन लागत भी अनावश्यक रूप से बढ़ जाती है। इसलिए खेतों में पहले पैरामोन ट्रैप लगाकर कीटों की वास्तविक संख्या का आकलन करना चाहिए। आर्थिक क्षति स्तर से अधिक प्रकोप मिलने पर ही वैज्ञानिक सलाह के अनुसार उचित कीटनाशक का प्रयोग करना बेहतर रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सब्जी उत्पादक किसानों को भी इस वर्षा से राहत मिली है। बैंगन, घीया और तोरी जैसी फसलों में नमी बढ़ने से पौधों की वृद्धि बेहतर रहने की संभावना है। यदि आगे भी नियमित वर्षा होती रही तो कई क्षेत्रों में सिंचाई के लिए खारे पानी पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे फसलों की गुणवत्ता, उत्पादन तथा मिट्टी के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में मानसून सामान्य बना रहता है और किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुसार फसल प्रबंधन अपनाते हैं, तो खरीफ मौसम की प्रमुख फसलों से बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। Cotton Cultivation</p>
<h3 style="text-align:justify;">विशेषज्ञ की सलाह</h3>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिक तरीके से करें फसल प्रबंधन: कपास सहित सभी खरीफ फसलों में नियमित खेत निरीक्षण करें। जलभराव बिल्कुल न होने दें और मिट्टी की नमी के अनुसार सिंचाई का निर्णय लें। कीट नियंत्रण के लिए पहले पैरामोन ट्रैप या अन्य निगरानी साधनों का उपयोग करें। केवल आवश्यकता होने पर ही अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें ताकि मित्र कीट सुरक्षित रहें और उत्पादन लागत भी नियंत्रित रहे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">महत्वपूर्ण तथ्य</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">हल्की वर्षा से मिट्टी में नमी बढ़ने पर उर्वरकों का अवशोषण बेहतर होता है।</li>
<li style="text-align:justify;">कपास की बढ़वार के समय पर्याप्त नमी पौधों के विकास के लिए लाभकारी मानी जाती है।</li>
<li style="text-align:justify;">खेतों में लंबे समय तक पानी रुकने से जड़ संबंधी रोगों का खतरा बढ़ सकता है।</li>
<li style="text-align:justify;">वर्षा के बाद खरपतवार तेजी से उगते हैं, इसलिए समय पर निराई-गुड़ाई आवश्यक है।</li>
<li style="text-align:justify;">एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाने से उत्पादन लागत घटती है और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है।</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 17:42:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Farming with Bullocks: हरियाणा के पूंडरी के किसान शीशपाल बैलों से खेती कर बचा रहे परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[एक समय था जब खेती-बाड़ी का पूरा काम बैलों के सहारे होता था। खेतों की जुताई से लेकर अनाज की ढुलाई तक बैलगाड़ियों का ही उपयोग किया जाता था। खेत से खलिहान, खलिहान से घर और घर से बाजार तक किसानों की जिंदगी बैलों पर निर्भर थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/farmer-sheeshpal-of-pundri-haryana-is-saving-tradition-by-farming/article-87255"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-06/farmer-sishpal.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पूंडरी (कैथल), (सच कहूँ/कुलदीप नैन)। एक समय था जब खेती-बाड़ी का पूरा काम बैलों के सहारे होता था। खेतों की जुताई से लेकर अनाज की ढुलाई तक बैलगाड़ियों का ही उपयोग किया जाता था। खेत से खलिहान, खलिहान से घर और घर से बाजार तक किसानों की जिंदगी बैलों पर निर्भर थी। समय के साथ ट्रैक्टरों ने बैलों की जगह ले ली और परंपरागत खेती लगभग समाप्त होती चली गई। लेकिन आज भी कुछ किसान इस विरासत को संजोए हुए हैं। जी हाँ! हम बात कर रहे है कैथल जिले के पूंडरी हल्के के गांव रमाना के किसान शीशपाल की जोकि आज भी बैलों से परंपरागत खेती कर रहे हैं। Farming with Bullocks</p>
<p style="text-align:justify;">किसान शीशपाल बताते हैं कि वह रोजाना सुबह 3 बजे उठते हैं। सबसे पहले अपनी चार भैंसों का दूध निकालते हैं और सुबह 5 बजे से पहले बैलों के साथ खेत में काम शुरू कर देते हैं। गर्मी से बचाने के लिए वह सुबह 8 बजे तक ही बैलों से काम लेते हैं और इसके बाद उन्हें आराम दे देते हैं। गौरतलब है कि रमाना-रमानी गांव आज भी अपनी परंपरागत खेती के लिए जाना जाता है। यहां बड़ी संख्या में बैल पाए जाते हैं और कई किसान आज भी बैलों के सहारे खेती कर ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक कृषि पद्धति को जीवित रखे हुए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन दिनों किसान शीशपाल धान की फसल के लिए खेत में 'कद्दू' कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह पूरा काम वह हर साल बैलों की मदद से ही करते हैं। एक दिन में वह लगभग एक एकड़ खेत तैयार कर लेते हैं। उनके पास एक बैल है, जबकि दूसरा बैल भाई संजय का है। दोनों मिलकर बैलों के जरिए अपने खेतों का कार्य करते हैं। Farming with Bullocks</p>
<h3 style="text-align:justify;">पहले के जमाने में की जाती थी सांझी खेती, भाईचारा बढ़ता था  </h3>
<p style="text-align:justify;">शीशपाल बताते हैं कि पहले छोटे किसानों के पास एक-एक बैल होता था। ऐसे में किसान आपस में बैल साझा करके खेतों की जुताई करते थे। एक किसान के खेत का काम पूरा होने के बाद वही बैल दूसरे किसान के खेत में लग जाता था। इससे खेती भी आसानी से होती थी और गांवों में भाईचारे की भावना भी मजबूत रहती थी। लेकिन आधुनिक दौर में यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि आज ट्रैक्टरों ने हल और बैलों की जगह ले ली है, लेकिन छोटे किसानों के लिए ट्रैक्टर से धान के खेत तैयार करवाना महंगा पड़ता है। कई बार खेत में ट्रैक्टर धंसने का खतरा रहता है और खेत की ड्योल (मेढ़) भी टूट जाती है, जिसे दोबारा ठीक करने में अतिरिक्त मेहनत और खर्च करना पड़ता है। किसान ने बताया कि छोटे जमीदारों को तो मेहनत ही बचती है। उनके पास कम जमीन है, इसलिए वे ट्रैक्क्टर के स्थान पर बैलो से खेती करटे है और छोटी-छोटी बचतों की तरफ ध्यान देते है। Farming with Bullocks</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 10:24:47 +0530</pubDate>
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                <title>Agricultural News: बारिश से हरी मिर्च और सब्जियों का भारी नुकसान</title>
                                    <description><![CDATA[मौसम में ठंडक, लेकिन किसानों की चिंता बढ़ी पक्का कलां (सच कहूँ/पुष्पिन्द्र सिंह)। Pakka Kalan News: लगातार बारिश ने जहां तापमान में कमी लाकर मौसम को सुहावना बना दिया है, वहीं इसने वैकल्पिक खेती करने वाले किसानों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। बारिश ने लोगों के चेहरों पर रौनक तो लाई, लेकिन सब्जियों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/heavy-loss-of-green-chillies-and-vegetables-due-to-rain/article-73304"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-07/pakka-kalan-news.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">मौसम में ठंडक, लेकिन किसानों की चिंता बढ़ी</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>पक्का कलां (सच कहूँ/पुष्पिन्द्र सिंह)।</strong> Pakka Kalan News: लगातार बारिश ने जहां तापमान में कमी लाकर मौसम को सुहावना बना दिया है, वहीं इसने वैकल्पिक खेती करने वाले किसानों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। बारिश ने लोगों के चेहरों पर रौनक तो लाई, लेकिन सब्जियों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। खेतों में पानी भरने से सब्जियों की फसलें लगभग नष्ट हो चुकी हैं, जिसके चलते सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। Agricultural News</p>
<h3 style="text-align:justify;">सब्जियों के दाम बढ़े</h3>
<p style="text-align:justify;">किसान इकबाल सिंह ने बताया कि उन्होंने गेहूं-धान के फसली चक्र से हटकर वैकल्पिक खेती को अपनाया था। इसके तहत उन्होंने हरी मिर्च, कद्दू, चौले और ग्वार जैसी सब्जियों की बिजाई की थीं। लेकिन बारिश के कारण खेतों में पानी जमा होने से उनकी फसलें बर्बाद हो गईं, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। इसी तरह, बलवीर सिंह ने बताया कि उन्होंने तीन कनाल खेत में हरी मिर्च की खेती की थी, जो बारिश की मार से पूरी तरह नष्ट हो गई। सब्जियों की पैदावार कम होने से बाजार में उनके दाम बढ़ गए हैं, जिसके चलते आम लोगों को महंगी सब्जियां खरीदनी पड़ रही हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सरकार से मुआवजे की मांग | Agricultural News</h3>
<p style="text-align:justify;">भारतीय किसान यूनियन सिद्धूपुर इकाई के अध्यक्ष जब्बरजंग सिंह ने सरकार से मांग की है कि वैकल्पिक खेती करने वाले किसानों को बारिश के कारण हुए फसली नुकसान के लिए उचित मुआवजा दिया जाए। उन्होंने कहा कि किसानों ने मेहनत और पूंजी लगाकर फसलें उगाई थीं, लेकिन प्राकृतिक आपदा के कारण उनकी मेहनत पर पानी फिर गया।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="बठिंडा में टूटा नाला, रातोंरात घरों में घुसा पानी, लोगों में मचा हड़कंप" href="http://10.0.0.122:1245/drain-broke-in-bathinda-water-entered-the-house-creating-panic-among-people/">बठिंडा में टूटा नाला, रातोंरात घरों में घुसा पानी, लोगों में मचा हड़कंप</a></p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 12 Jul 2025 11:26:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Agricultural News: गेहूं की फसल में एक गंभीर चुनौती, ऐसे कर सकते हैं बचाव</title>
                                    <description><![CDATA[डॉ. संदीप सिंहमार (सच कहूँ न्यूज़)। Rust Disease: गेहूं की फसल, जो विश्व में अनाज की एक प्रमुख उपज है, मानव आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, इसकी उत्पादन क्षमता को प्रभावित करने वाले अनेक रोग और कीट हैं। इनमें से एक खतरनाक रोग है “रतुआ रोग”, जिसे अंग्रेजी में “Rust Disease” के नाम […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/rust-disease-is-a-serious-challenge-in-wheat-crop-this-is-how-we-can-prevent-it/article-67581"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-02/wheat-crop.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. संदीप सिंहमार (सच कहूँ न्यूज़)।</strong> Rust Disease: गेहूं की फसल, जो विश्व में अनाज की एक प्रमुख उपज है, मानव आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, इसकी उत्पादन क्षमता को प्रभावित करने वाले अनेक रोग और कीट हैं। इनमें से एक खतरनाक रोग है “रतुआ रोग”, जिसे अंग्रेजी में “Rust Disease” के नाम से जाना जाता है। यह रोग विशेष रूप से गेहूं पर प्रभाव डालता है और इसे विभिन्न प्रकारों में वगीर्कृत किया जाता है: पीला रतुआ, भूरा रतुआ, काला रतुआ, गेहूं की पत्तीयों की जंग, और ब्लैक स्टेम रस्ट। Wheat Crop</p>
<h3 style="text-align:justify;">रतुआ रोग के प्रकार</h3>
<p style="text-align:justify;">रतुआ रोग के विभिन्न प्रकार हैं, जिनमें पीला रतुआ सबसे सामान्य और विध्वंसकारी है। यह रोग “पक्सीनिया स्ट्राईफारमिस” नामक फफूंद द्वारा उत्पन्न होता है। इसके अलावा भूरा रतुआ और काला रतुआ भी महत्वपूर्ण हैं। भूरा रतुआ गेहूं की फसल के लिए गंभीर खतरे का कारण बनता है, जबकि काला रतुआ गेहूं की पत्तियों और तनों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। इन रोगों के कारण फसल की पैदावार में कमी आती है और यह पूरी उपज को नष्ट कर सकती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रतुआ रोग के लक्षण | Wheat Crop</h3>
<p style="text-align:justify;">रतुआ रोग के लक्षण प्रारंभ में धीरे-धीरे दिखाई देते हैं। रोग का प्रभाव गेहूँ के पौधों की पत्तियों, तनों और कलियों पर पड़ता है। इसके लक्षण निम्नलिखित हो सकते हैं:</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>पत्तियों पर पीले धब्बे:</strong> इस रोग के कारण गेहूँ की पत्तियों पर पीले धब्बे या हलके भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। यह धब्बे धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं और पूरे पत्ते को प्रभावित करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>पत्तियों का मुरझाना:</strong> संक्रमित पत्तियाँ मुरझाकर सूखने लगती हैं। इस कारण पौधे की समग्र विकास प्रक्रिया प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>तनों का सड़ना:</strong> रोग के कारण गेहूँ के तने में सड़न होती है, जिससे पौधा कमजोर पड़ जाता है और गिर जाता है। इससे फसल का उत्पादन भी घट जाता है। Wheat Crop</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सिरों में काले धब्बे:</strong> गेहूँ के अनाज में भी इस रोग के कारण काले धब्बे दिखाई दे सकते हैं, जो पूरी फसल को नष्ट कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कमजोर वृद्धि:</strong> गेहूँ के पौधे की वृद्धि रुक जाती है और पौधा सामान्य रूप से बढ़ने के बजाय धीमा हो जाता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रतुआ रोग से बचाव के उपाय</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>1. रोगमुक्त बीज का उपयोग</strong>: रतुआ रोग से बचने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम है रोगमुक्त बीज का उपयोग। बीज को अच्छी तरह से उपचारित करना चाहिए, जिससे कि किसी प्रकार के रोगजनक का असर न हो।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>2. उचित जल निकासी:</strong> ऐसी मिट्टी में खेती करें जहां जल निकासी का उचित प्रबंध हो, जिससे पौधों की जड़ें सूखी और स्वस्थ रह सकें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>3. रासायनिक उपचार:</strong> इस रोग का नियंत्रण रासायनिक उपचार से भी किया जा सकता है। फफूंदी नाशक दवाओं जैसे “कार्बेन्डाजिम” या “मैनकोजेब” का छिड़काव रोग के फैलाव को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है। ये दवाएँ फफूंदी को नष्ट करने और पौधों को स्वस्थ रखने में मदद करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>4. खरपतवारों को हटाना:</strong> यह सुनिश्चित करें कि खेत में कोई भी खरपतवार न हो, क्योंकि ये रोग के वाहक हो सकते हैं। समय-समय पर खरपतवारों को निकालने से भी रोग के प्रसार को रोका जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>5. फसल चक्र:</strong> गेहूँ के बाद अन्य फसलें जैसे दालें या तिलहन लगाना, फसल चक्र का पालन करना और भूमि में पोषक तत्वों की कमी को दूर करना, इससे इस रोग के प्रभाव को कम किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>6. अच्छा वेंटिलेशन:</strong> फसल में पर्याप्त वेंटिलेशन सुनिश्चित करें ताकि नमी का स्तर नियंत्रित रहे और फफूंदी का विकास न हो।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>7. समय पर सिंचाई:</strong> सिंचाई का ध्यान रखें, परंतु अत्यधिक पानी से बचें। पानी की अधिकता से फफूंदी का विकास बढ़ सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ये हो सकता है प्रभावी उपाय</h3>
<p style="text-align:justify;">गोमूत्र और नीम का तेल मिलाकर तैयार किया गया मिश्रण भी एक प्रभावी उपाय है। इसे 10 लीटर गोमूत्र, 2 किलो नीम की पत्तियों, और 250 ग्राम लहसुन के काढ़े के साथ प्रति एकड़ छिड़कना चाहिए। ये प्राकृतिक समाधान न केवल फफूंद से लड़ने में मदद करते हैं बल्कि पौधों की वृद्धि को भी बढ़ावा देते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सावधानी से बचाव संभव | Wheat Crop</h3>
<p style="text-align:justify;">रतुआ रोग गेहूं की फसल के लिए एक गंभीर चुनौती है। यदि इसे समय पर नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह पूरी फसल के लिए विनाशकारी हो सकता है। इसलिए, किसान भाईयों को चाहिए कि वे अपने खेत में नियमित रूप से निरीक्षण करें, लक्षणों को पहचानें और उचित उपाय करें। रतुआ रोग के खिलाफ चेतावनी, नियंत्रण और उपचार के उपायों का पालन करके, हम गेहूं की उपज को बढ़ा सकते हैं और खाद्य सुरक्षा के लिए एक स्थिर भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं। कृषि में नवाचार और टिकाऊ प्रथाओं को अपनाने से यह रोग प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है, और इस प्रकार कृषि विकास को आगे बढ़ाया जा सकता है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="CM Rekha Gupta: एक्शन में नई सीएम रेखा! आम आदमी पार्टी के सभी नेताओं की सरकारी सुविधाएं बंद!" href="http://10.0.0.122:1245/government-facilities-of-all-aam-aadmi-party-leaders-stopped/">CM Rekha Gupta: एक्शन में नई सीएम रेखा! आम आदमी पार्टी के सभी नेताओं की सरकारी सुविधाएं बंद!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Feb 2025 15:23:18 +0530</pubDate>
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