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                <title>Scientists - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>अंतरिक्ष केन्द्र व वैज्ञानिकों की सुरक्षा में न हो चूक</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वरिष्ठ सलाहकार व वैज्ञानिक तपन मिश्रा ने जिस तरह अपने खिलाफ हुई जानलेवा साजिशों का पर्दाफाश किया है वह बेहद सनसनीखेज है। वैज्ञानिक ने दावा किया है कि उन्हें मारने के लिए 2017 से 2020 तक तीन बार कोशिश की गई। जिनमें आर्सेनिक ट्राई एक्साईड देने के अलावा घर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/do-not-miss-the-safety-of-space-center-and-scientists/article-21023"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-01/tapan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वरिष्ठ सलाहकार व वैज्ञानिक तपन मिश्रा ने जिस तरह अपने खिलाफ हुई जानलेवा साजिशों का पर्दाफाश किया है वह बेहद सनसनीखेज है। वैज्ञानिक ने दावा किया है कि उन्हें मारने के लिए 2017 से 2020 तक तीन बार कोशिश की गई। जिनमें आर्सेनिक ट्राई एक्साईड देने के अलावा घर में साँप छोड़ना भी शामिल है। केमिकल की मात्रा कम होने के कारण उनकी जान बच गई, परंतु शारीरिक तौर पर उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इस मामले को पूरी गंभीरता से लेकर अंतिरक्ष केन्द्र व वैज्ञानिकों की सुरक्षा अचूक करने की आवश्यकता है। प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और देशों की आपसी शत्रुता के दौरान वैज्ञानिकों पर जानलेवा हमलों की साजिश को से इंकार नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">शत्रु देशों द्वारा दूसरे देशों की फौज में जासूसों की घुसपैठ से लेकर वैज्ञानिक खोजों की गुप्त जानकारी हासिल करने का इतिहास काफी पुराना है। फिर जब कोई देश उन्नति कर रहा तब उसका निशाने पर आना स्वाभाविक ही है। सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वह समय पर जरूरी कदम उठाकर सुरक्षा को सुनिश्चित करे। तपन मिश्रा ने यह भी कहा है कि उनको जहर दिए जाने की आशंका के चलते एक साथी डॉयरेक्टर व गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने उन्हें पहले ही सचेत कर दिया था। इससे साफ होता है कि श्री मिश्रा द्वारा किए गए खुलासे उनकी कोई मनघडंÞत कहानी नहीं हैं, इसके बारे में गृह मंत्रालय तक को भी खबर थी। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि जब तीन साल पहले गृह मंत्रालय के किसी अधिकारी को इस बारे में पता था तब वैज्ञानिकों को मारने की कोशिश की तीन घटनाएं कैसे घटित हो गर्इं?</p>
<p style="text-align:justify;">सवाल यह भी उठता है कि संबंधित अधिकारी को सब कुछ पता होने के बाद आखिर वैज्ञानिक की सुरक्षा को लेकर किए गए प्रबंधों में ढील क्यों रही? जिसके चलते साजिशकर्ता आगे बढ़ता रहा। श्री मिश्रा ने दावा किया है कि इन साजिशों का उद्देश्य व्यापारिक स्तर पर राडार बनाने वाले वैज्ञानिकों को किनारे करना है। वरिष्ठ वैज्ञानिक के आरोपों में कितनी सच्चाई है इसका पता तो जांच के बाद ही लग सकेगा, लेकिन अंतरिक्ष केन्द्र के वैज्ञानिकों की सुरक्षा के लिए गुप्तचर और सुरक्षा एजेंसियों को अपनी ड्यूटी करने में कोई चूक नहंी करनी चाहिए। शत्रु देशों द्वारा दूसरे देशों की फौज में जासूसों की घुसपैठ से लेकर वैज्ञानिक खोजों की गुप्त जानकारी हासिल करने का इतिहास काफी पुराना है। फिर जब कोई देश उन्नति कर रहा तब उसका निशाने पर आना स्वाभाविक ही है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Jan 2021 09:50:54 +0530</pubDate>
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                <title>देश में वैज्ञानिकों की कमी ?</title>
                                    <description><![CDATA[वैज्ञानिकों को लुभाने की सरकार की अनेक कोशिशों के बावजूद देश के लगभग सभी शीर्ष संस्थानों में वैज्ञानिकों की कमी बनी हुई है। वर्तमान में देश के 70 प्रमुख शोध-संस्थानों में 3200 वैज्ञानिकों के पद खाली हैं। बैंगलुरु के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआइआर) से जुड़े संस्थानों में सबसे ज्यादा 177 पद रिक्त हैं। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/lack-of-scientists-in-the-country/article-11892"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/scientists-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों को लुभाने की सरकार की अनेक कोशिशों के बावजूद देश के लगभग सभी शीर्ष संस्थानों में वैज्ञानिकों की कमी बनी हुई है। वर्तमान में देश के 70 प्रमुख शोध-संस्थानों में 3200 वैज्ञानिकों के पद खाली हैं। बैंगलुरु के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआइआर) से जुड़े संस्थानों में सबसे ज्यादा 177 पद रिक्त हैं। पुणे की राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला में 123 वैज्ञानिकों के पद खाली हैं। देश के इन संस्थानों में यह स्थिति तब है, जब सरकार ने पदों को भरने के लिए कई आकर्षक योजनाएं शुरू की हुई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इनमें रामानुजम शोधवृत्ति, सेतु-योजना, प्रेरणा-योजना और विद्यार्थी-वैज्ञानिक संपर्क योजना शामिल हैं। महिलाओं के लिए भी अलग से योजनाएं लाई गई हैं। इनमें शोध के लिए सुविधाओं का भी प्रावधान है। इसके साथ ही परदेश में कार्यरत वैज्ञानिकों को स्वदेश लौटने पर आकर्षक पैकेज देने के प्रस्ताव दिए जा रहे हैं। बावजूद न तो छात्रों में वैज्ञानिक बनने की रुचि पैदा हो रही है और न ही स्वदेश से वैज्ञानिक लौट रहे हैं। इसकी पृष्ठभूमि में एक तो वैज्ञानिकों को यह भरोसा पैदा नहीं हो रहा है कि जो प्रस्ताव दिए जा रहे है, वे निरंतर बने रहेंगे ? दूसरे नौकरशाही द्वारा कार्यप्रणाली में अड़ंगों की प्रवृत्ति भी भरोसा पैदा करने में बाधा बन रही है। शोध-संस्थानों में वैज्ञानिकों की इस कमी की जानकारी संसद में पूछे गए एक सवाल के जबाव में पृथ्वी एवं विज्ञान मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने बीते सत्र में दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा परिदृश्य में कोई भी देश सक्षमता हासिल वैज्ञानिक उपलब्धियों से ही कर सकता है। मानव जीवन को यही उपलब्धियां सुखद और समृद्ध बनाए रखने का काम करती हैं। भारत में युवा उत्साहियों या शिक्षित बेरोजगारों की भरमार हैं, बावजूद वैज्ञानिक बनने या मौलिक शोध में रुचि लेने वाले युवाओं की संख्या कम ही है। इसकी प्रमुख वजहों में एक तो वैज्ञानिकों को हम खिलाड़ी, अभिनेता, नौकरशाह और राजनेताओं की तरह रोल मॉडल नहीं बना पा रहे हैं। सरकार विज्ञान से ज्यादा महत्व खेल को देती है। दूसरे उस सूचना तकनीक को विज्ञान मान लिया गया है, जो वास्तव में विज्ञान नहीं है, बावजूद इसके विस्तार में प्रतिभाओं को खपाया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिक प्रतिभाओं को तवज्जो नहीं मिलना भी प्रतिभाओं के पलायन का एक बड़ा कारण है। जाहिर है, हमें ऐसा माहौल रचने की जरुरत है, जो मौलिक अनुसंधान व शोध-संस्कृति का पर्याय बने। इसके लिए हमें उन लोगों को भी महत्व देना होगा, जो अपने देशज ज्ञान के बूते आविष्कार में तो लगे हैं, लेकिन अकादमिक ज्ञान नहीं होने के कारण, उनके आविष्कारों को वैज्ञानिक मान्यता नहीं मिल पाती है। हाल ही में कर्नाटक के किसान गणपति भट्ट ने पेड़ पर चढ़कर नारियल व सुपारी तोड़ने वाली मोटरसाइकल बनाई हैं। लेकिन इस आविष्कार को न तो विज्ञान सम्मत माना गया और न ही गणपति भट्ट को अशिक्षित होने के कारण केंद्र या राज्य सरकार से सम्मानित किया गया। यह व्यवहार प्रतिभा का अनादर है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे नेता संसद में विज्ञान पर चर्चा तो कम करते हैं, लेकिन विज्ञान की उपलब्धियों के उद्घाटन और विज्ञान समोरोहों में मुख्य अतिथि की भागीदारी करने से नहीं चूकते ? हर वर्ष जनवरी के पहले सप्ताह में भारतीय वैज्ञानिकों और विज्ञान को प्रोत्साहित करने व उनकी वार्षिक उपलब्धियां सामने लाने की दृष्टि से बड़ा जलसा दिल्ली के विज्ञान भवन में होता है। इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हमेशा प्रधानमंत्री रहते हैं। दुनिया में भारत के अलावा कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां विज्ञान संबंधी कार्यक्रमों का उद्घाटन राजनेता करते हों ? ऐसे समारोहों में वैज्ञानिक से ज्यादा राजनीतिज्ञों को महत्व देने से श्रेष्ठ वैज्ञानिकों का आत्म-सम्मान आहत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा वैज्ञानिक कार्य -संस्कृति पर नौकरशाही का दबदबा होने के कारण संभव हो रहा है। दरअसल हमारे यहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सरकार का प्रभुत्व है, लिहाजा उसमें जोखिम उठाने की इच्छाशक्ति का अभाव है। यहां गौरतलब है कि 1930 में जब देश में फिरंगी हुकूमत थी, तब देश में वैज्ञानिक शोध का बुनियादी ढांचा न के बराबर था। विचारों को रचनात्मकता देने वाला साहित्य भी अपर्याप्त था। अंगे्रजी शिक्षा शुरुआती में दौर में थी। बावजूद सीवी रमन ने साधारण देशी उपकरणों के सहारे देशज ज्ञान और भाषा को आधार बनाकर काम किया और भौतिक विज्ञान में नोबेल दिलाया। सत्येंद्रनाथ बसु ने आइंस्टीन के साथ काम किया।</p>
<p style="text-align:justify;">मेघनाथ साहा, रामानुजम, पीसी रे और होमी जहांगीर भाभा ने अनेक उपलब्धियां पाईं। रामानुजम के एक-एक सवाल पर पी-एचडी की उपाधि मिल रही हैं। एपीजे कलाम और के. शिवम जैसे वैज्ञानिक भी मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा लेकर महान वैज्ञानिक बने हैं। लेकिन अब उच्च शिक्षा में तमाम गुणवत्तापूर्ण सुधार होने और अनेक प्रयोगशालाओं के खुल जाने के बावजूद गंभीर अनुशीलन का काम थमा है। उपलब्धियों को दोहराना मुमकिन नहीं हो रहा। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में हम पश्चिम के प्रभुत्व से छुटकारा नहीं पा, पा रहे ? हालांकि मंगल अभियान इस दिशा में अपवाद के रुप में पेश आया है, जिसे स्वदेशी तकनीक से अंतरिक्ष में छोड़ा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल बीते 70 सालों में हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी अवधारणाओं का शिकार हो गई है, जिसमें समझने-बुझने के तर्क को नकारा जाकर रटने की पद्धति विकसित हुई है। दूसरे संपूर्ण शिक्षा को विचार व ज्ञानोन्मुखी बनाने की बजाय, नौकरी अथवा कैरियर उन्मुखी बना दयिा गया है। मसलन शैक्षिक उपलब्धियों को व्यक्ति केंद्रित बना दिया गया, जो संकीर्ण सोच और निजी विशेषज्ञता को बढ़ावा देती हैं। नए आविष्कार या अनुसंधानों की शुरुआत अकसर समस्या के समाधान से होती है, जिसमें उपलब्ध संसाधनों को परिकल्पना के अनुरुप ढालकर क्रियात्मक अथवा रचनात्मक रुप दिया जाता है। यही वैचारिक स्त्रोत आविष्कार के आधार बनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किंतु हमारी शिक्षा पद्धति से इन कल्पनाशील वैचारिक स्त्रोतों को तराशने का अध्यापकीय कौशल कमोबेश नदारद है, लिहाजा कल्पनाशीलता कुंठित हो रही है। अंग्रेजी का दबाव भी नैसर्गिक प्रतिभाओं को कुंठित कर रहा है। हमारे राजनेताओं में इस जड़ता को तोड़ने की इच्छाशक्ति का अभाव है। जिन रूस, चीन और जापान से हम वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं, उनसे हमें सबक लेने की जरुरत है कि उनकी विज्ञान व तकनीकी शिक्षाओं के माध्यम अपनी मातृभाषाएं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां अनुसंधान और आविष्कार के काम विश्वविद्यालय स्तर पर ही शुरु हो जाते हैं। यदि कोई गैर अकादमिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति किसी आविष्कार को साकार रूप देता हैं, तो उसकी उपलब्धि को विश्वविद्यालय और विज्ञान शोध संस्थान हाथो-हाथ ले लेते हैं। जबकि हमारे यहां ऐसे आविष्कारक, अपने मॉडलों का प्रदर्शन मंत्रियों और नौकरशाहों के दरबारों में कर-करके थक-हार जाते हैं। उनकी शैक्षिक अज्ञानता का उपहास उड़ाकर उनकी वैचारिक कल्पनाशीलता के पंख मरोड़ दिए जाते हैं। देश में जब तक वैज्ञानिक कार्य संस्कृति के अनुरुप माहौल नहीं बनेगा, तब तक दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा में आगे निकलना मुश्किल तो होगा ही हमारे युवा भी बड़ी संख्या में वैज्ञानिक बनने की दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रमोद भार्गव</strong></p>
<p> </p>
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                <pubDate>Fri, 20 Dec 2019 20:01:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरियाणा में 28 को प्री, 3 जुलाई को मानसून </title>
                                    <description><![CDATA[हिसार (संदीप सिंहमार)। तपती गर्मी और उमस से हरियाणावासियों को जल्द ही राहत मिलने की उम्मीद है। प्रदेश में अगले दो दिन में प्री-मानसून दस्तक देगा, और यदि बंगाल की खाड़ी से आ रहा मानसून की सक्रियता इसी प्रकार रही तो 3 जुलाई को प्रदेश में मानसून का आगमन हो जाएगा। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/pre-28-in-haryana-monsoon-on-3rd-july/article-1676"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/mansoon1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>हिसार (संदीप सिंहमार)।</strong> तपती गर्मी और उमस से हरियाणावासियों को जल्द ही राहत मिलने की उम्मीद है। प्रदेश में अगले दो दिन में प्री-मानसून दस्तक देगा, और यदि बंगाल की खाड़ी से आ रहा मानसून की सक्रियता इसी प्रकार रही तो 3 जुलाई को प्रदेश में मानसून का आगमन हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मानसून का आगमन इस बार उत्तरी हरियाणा से होते हुए दक्षिणी में प्रवेश करेगा। अगस्त के आखिरी सप्ताह तक प्रदेश में मानसून की सक्रियता बनी रहने की संभावना है। यह प्री-मानसून की बारिश फसलों के लिए वरदान साबित होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">मौसम वैज्ञानिकों की मानें, प्री-मानसून के चार दिन बाद ही 3 जुलाई को मानसून की पहली बारिश फरीदाबाद व पलवल क्षेत्र में होगी। इसके बाद मानसून का प्रवाह करनाल व कुरुक्षेत्र से होता हुए प्रदेशभर के विभिन्न जिलों में फैल जाएगा। संभावना है कि हिसार, फतेहबाद और सिरसा में जुलाई के दूसरे सप्ताह में मानसून की बारिश होगी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">फरीदाबाद के बाद कुरुक्षेत्र पहुंचेगा मानसून</h2>
<p style="text-align:justify;">पिछले वर्ष की तुलना में इस बार प्रदेश में मानसून समय पर आने और बारिश का आंकड़ा भी सामान्य ही रहने की संभावना है। मानसून के दौरान प्रदेश में औसत वर्षा 460 मिलीमीटर होनी चाहिए, जोकि अभी तक की मानसून की सक्रियता के अनुसार 440 से अधिक रहने की उम्मीद है।<br />
<strong>– डॉ. राज सिंह, प्रभारी, हकृवि मौसम विज्ञान विभाग</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 27 Jun 2017 02:07:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इस बार बेहद कम है सफेद मक्खी का प्रकोप</title>
                                    <description><![CDATA[राहत। केंद्रीय कपास अनुसंधान द्वारा 3 राज्यों में किए गए सर्वे रिपोर्ट में हुआ खुलासा कृषि वैज्ञानिकों व किसानों ने ली राहत की सांस सरसा(सुनील वर्मा)। हरियाणा, राजस्थान व पंजाब में कपास की फसल में सफेद मक्खी अभी आर्थिक कगार से कम है। केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र व कृषि वैज्ञानिकों ने प्रथम सर्वे का कार्य पूरा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/very-short-white-fly-outbreak/article-1521"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/crop-1.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">राहत। केंद्रीय कपास अनुसंधान द्वारा 3 राज्यों में किए गए सर्वे रिपोर्ट में हुआ खुलासा</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>कृषि वैज्ञानिकों व किसानों ने ली राहत की सांस</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा(सुनील वर्मा)। </strong>हरियाणा, राजस्थान व पंजाब में कपास की फसल में सफेद मक्खी अभी आर्थिक कगार से कम है। केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र व कृषि वैज्ञानिकों ने प्रथम सर्वे का कार्य पूरा कर लिया है। इस सर्वे में मौजूदा समय में कपास की फसल में आर्थिक कगार से कम होने पर फसलों को कोई नुकसान नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्यादा सफेद मक्खी का प्रकोप नहीं होने से कृषि वैज्ञानिकों व किसानों ने राहत की सांस ली है। गौरतलब है कि कपास की फसल में सफेद मक्खी से निपटने के लिए प्रबंध नीति तैयार की गई है, जिससे सफेद मक्खी से समय पर फसल को बचाया जा सके। केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र सरसा, कृषि विभाग व कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिक इस नीति पर कार्य कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले दो वर्ष पूर्व में सफेद मक्खी से काफी नुकसान हुआ, जिसके चलते प्रदेश सरकार किसानों को सफेद मक्खी से प्रभावित जिलों में मुआवजा भी बांट रही है, जिसके लिए 967 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि मंजूर हुई थी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">प्रथम सर्वे का कार्य पूरा</h2>
<p style="text-align:justify;">सफेद मक्खी से फसल को बचाने के लिए हरियाणा, राजस्थान, पंजाब में वैज्ञानिकों ने सर्वे किया, जिसमें सफेद मक्खी आर्थिक कगार से कम मिली यानी सफेद मक्खी नाममात्र 3-4 मिली, जिससे फसलों को मौजूदा समय में कोई नुकसान नहीं है। इसके लिए किसानों को वैज्ञानिकों ने सचेत रहने की सलाह दी है। अगर इससे ऊपर आकर सफेद मक्खी बढ़ती है तो किसानों को तुंरत प्रभाव से नीम की स्प्रे करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>हरियाणा, राजस्थान व पंजाब में सफेद मक्खी अभी आर्थिक कगार पर है। इससे फसलों को नुकसान नहीं है। अभी प्रथम सर्वे रिपोर्ट आई है। कृषि वैज्ञानिक समय समय पर आगे भी सर्वे करते रहेंगे, जिससे सफेद मक्खी के प्रकोप को रोका जा सके।</em><br />
<em><strong>डॉ. दलीप मोंगा, निदेशक, केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र सरसा</strong></em></p>
<h2 style="text-align:justify;">एडीओ को दिया प्रशिक्षण</h2>
<p style="text-align:justify;">केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र में जिले में तैनात एडीओ (कृषि विकास अधिकारी) को प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें 70 एडीओ को सफेद मक्खी फैलने पर किसानों की कैसे मदद करनी है। वहीं कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार किस कीटनाशक का प्रयोग करना है। वहीं किसानों को जानकारी देने के लिए परजीवी जैसे एनकारशिया व एरीटमोसीरस व परभक्षी लेडीबर्ड भृंग, क्राइसोपा का संरक्षण व संवर्धन करने के लिए बताया जाएगा। क्योंकि ये प्राकृतिक तौर पर सफेद मक्खी के बच्चे व प्यूपो को खाते हैं इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।</p>
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                <pubDate>Fri, 23 Jun 2017 00:59:14 +0530</pubDate>
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