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                <title>स्ट्रॉबेरी की फसल ने बनाई पहचान</title>
                                    <description><![CDATA[सरसा के गाँव शेखुखेड़ा के किसान बलकरण सिंह को उम्मीद से ज्यादा मिला उत्पादन सरसा (सुनील वर्मा)। स्ट्रॉबेरी एक महत्वपूर्ण नरम फल है जिसे विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु में उगाया जा सकता है। इसका पौधा कुछ ही महीनों में फल दे सकता है। इस फसल का उत्पादन बहुत लोगों को रोजगार दे सकता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/culture-and-society/employment-of-strawberry-crop-production/article-1526"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/stroberi.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">सरसा के गाँव शेखुखेड़ा के किसान बलकरण सिंह को उम्मीद से ज्यादा मिला उत्पादन</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा (सुनील वर्मा)।</strong> स्ट्रॉबेरी एक महत्वपूर्ण नरम फल है जिसे विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु में उगाया जा सकता है। इसका पौधा कुछ ही महीनों में फल दे सकता है। इस फसल का उत्पादन बहुत लोगों को रोजगार दे सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्ट्रॉबेरी एंटीआॅक्सिडेंट, विटामिन (सी), प्रोटीन और खनिजों का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोत है। हरियाणा राज्य जिला सरसा खण्ड ऐलनाबाद के गांव शेखुखेड़ा में जहां अमूमन लोग रबी, खरीफ व सब्जी की खेती करते हैं वही इस गांव का किसान बलकरण सिंह परंपरागत खेती के साथ-साथ 4 एकड़ भू-भाग पर स्ट्रॉबेरी की खेती कर अच्छा-खासा मुनाफा उठा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि सिंचाई के लिए मीठे पानी की भी आवश्यक्ता है। उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश से चैंडलर व आॅफरा किस्म के पौधे मंगवाकर अपनी 4 एकड़ भूमि में स्ट्रॉबेरी की खेती की तो उसे उम्मीद से ज्यादा उत्पादन मिला।</p>
<h2 style="text-align:justify;">खाद व उर्वरक</h2>
<p style="text-align:justify;">खाद एवं उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की जाँच के आधार पर करना चाहिए। साधारण रेतीली भूमि में 10 से 15 टन सड़ी गोबर की खाद प्रति एक की दर से भूमि तैयारी के समय बिखेर कर मिट्टी में मिला देनी चाहिए। भूमि तैयारी के समय 100 किग्रा. फास्फोरस व 60 किग्रा. पोटाश प्रति एकड़ डालना चाहिए। रोपाई के उपरांत टपका सिंचाई विधि द्वारा निम्नलिखित घुलनशील उर्वरकों को दिया जाना चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">सिंचाई</h2>
<p style="text-align:justify;">इस पौधे के लिए उत्तम गुणवत्ता (नमक रहित) का पानी होना चाहिए। पौधों को लगाने के तुरंत पश्चात् सिंचाई करना आवश्यक है। सिंचाई सूक्ष्म फव्वारों द्वारा की जानी चाहिए। यह सावधानी रखें कि सूक्ष्म फव्वारों से सिंचाई करते समय पौधा स्वस्थ एवं रोग/फफूंद रहित होना आवश्यक है। फूल आने पर सूक्ष्म फव्वारा सिंचाई को बदल कर टपका विधि द्वारा सिंचाई करें दें।</p>
<h2 style="text-align:justify;">लो टनल का उपयोग</h2>
<p style="text-align:justify;">पौधों को पाले से बचाने के लिए ऊपर उठी क्यारियों पर पॉलीथीन की पारदर्शी चद्दर जिसकी मोटाई 100-200 माइक्रोन हो, ढकना आवश्यक है। चद्दर को क्यारियों से ऊपर रखने के लिए बांस की डंडियां या लोहे की तार से बने हुप्स का उपयोग करना चाहिए। ढकने का कार्य सूर्यास्त से पहले कर दें व सूर्योदय उपरांत इस पॉलीथीन की चद्दर से हटा देेंं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">खर्च व आमदनी</h2>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि इस गांव में उन्होंने पहली बार स्ट्रॉबेरी की खेती की है, जिससे उसका खर्चा तीन से चार लाख रुपए प्रति एकड़ आया है। पहली बार ड्रिप सिस्टम लगवाने पर हमको अधिक खर्चा करना पड़ा था, लेकिन इस वर्ष हमारा यह खर्च भी बच जाएगा। स्ट्रॉबेरी की खेती करने के लिए एक एकड़ में 40 बैंड बनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बैंड में एक हजार के करीब पौधे लगते हैं। इस प्रकार एक एकड़ में कुल 40 हजार पौधे लगाए जाते हैं। एक पौधे की कीमत 3-4 रुपये के बीच पड़ती है। स्ट्रॉबेरी का उत्पादन 50 से 100 क्विटल प्रति एकड़ होता है जिसकी कीमत मंडियों में 100 से 300 रुपए प्रति किलो के हिसाब से लगती है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कठिनाई व सरकार से मांग</h2>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि हमें सबसे बड़ी कठिनाई का सामना तब करना पड़ा जब हमनें अपनी तैयार स्ट्रॉवेरी बेचने की कोशिश की तब हमें दूर-दराज की मंडियों दिल्ली, बठिंडा, गंगानगर, बीकानेर, मलोट व अबोहर की ओर जाना पड़ा। जहां पर हमको समय के साथ आर्थिक नुकसान भी भुगतना पड़ा। उन्होंने कहा की इस फल को प्लास्टिक के डिब्बों में रखना पड़ता है जो सरकार की ओर से सब्सिडी पर मिलते हैं। इस फल से खाने वाली चीजें जैसे- आइसक्रीम, टोफियां वगैरह भी बनाई जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने सरकार से मांग करते हुए कहा कि इस एरिया में भी इस तरह की फैक्ट्रियां स्थापित की जानी चाहिए ताकि प्रत्येक किसान इस आधुनिक खेती की ओर अग्रसर हो सके। सरकार कीओर से इस फल की बिजाई के लिए किसानों को सब्सिडी दी जानी चाहिए ताकि समय के अनुसार प्रत्येक किसान भी इस फसल से अच्छा खासा मुनाफा उठा सके।</p>
<h2 style="text-align:justify;">जहरमुक्त होती है घर में ही तैयार स्प्रे</h2>
<p style="text-align:justify;">किसान बलकरण सिंह ने बताया कि वह गेहूं की बिजाई भी आधुनिक तरीके से ही करता है जिसमें वह धान के अवशेषों को जलाने की बजाय आधुनिक मशीनों द्वारा मिट्टी में ही मिक्स कर देता है। उन्होंने कहा कि जहां आम लोगों द्वारा गेहूं की बिजाई के लिए 6 बार पानी लगाया जाता है वो केवल चार बार ही पानी लगाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्येक किसान द्वारा 4 बैग यूरिया प्रति एकड़ के हिसाब से गेहंू में डाली जा रही हैं लेकिन वह प्रति एकड़ 65 किलो यूरिया ही डालता है। इसके अलावा वह कभी भी खड़ी फसल को जहरीली सप्रे नहीं करता बल्कि घर में तैयार करके ही स्प्रे करता है जो जहर मुक्त होती है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">भूमि व जलवायु</h2>
<p style="text-align:justify;">इस फल का उत्पादन भिन्न प्रकार की जलवायु में किया जा सकता है। इसके फूलों व नाजुक फलों को पाले से बचाना जरूरी है। विभिन्न प्रकार की भूमि में इसको लगाया जा सकता है। परंतु रेतीली-दोमट भूमि इसके लिए सर्वोत्तम है। भूमि में जल निकासी अच्छी होनी चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">पौधे लगाने का समय</h2>
<p style="text-align:justify;">पौधों की रोपाई 10 सितम्बर से 10 अक्तूबर तक की जानी चाहिए। रोपाई के समय अधिक तापमान होने पर पौधों को कुछ समय बाद अर्थात् 20 सितम्बर तक शुरू किया जा सकता है।</p>
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                                                            <category>संस्कृति एवं समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 23 Jun 2017 01:42:21 +0530</pubDate>
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