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                <title>ममता की रैली: ममता को 13 दलों का साथ</title>
                                    <description><![CDATA[तृणमूल समेत लोकसभा में इनकी 118 सीटें कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों की एकजुटता दिखाने (Mamata Rally Mamta With 13 Parties) के लिए शनिवार को कोलकाता में महारैली की। रैली में कांग्रेस, बसपा, राकांपा समेत 13 पार्टियां इसमें शामिल हुईं। गुजरात के कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h1 style="text-align:justify;">तृणमूल समेत लोकसभा में इनकी 118 सीटें</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>कोलकाता।</strong> पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों की एकजुटता दिखाने (Mamata Rally Mamta With 13 Parties) के लिए शनिवार को कोलकाता में महारैली की। रैली में कांग्रेस, बसपा, राकांपा समेत 13 पार्टियां इसमें शामिल हुईं। गुजरात के कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने कहा कि विपक्ष के एकजुट होने का बड़ा संदेश है। 2019 में भाजपा और संघ को सत्ता से हटाने की चुनौती है। वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन ने कहा कि सांप्रदायिक ताकतों को क्षेत्रीय दल जवाब देंगे। ममता इस रैली को भाजपा के लिए आम चुनाव में ‘मौत की दस्तक’ बता चुकी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ममता को चिट्ठी लिखकर रैली का समर्थन किया है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">13 पार्टियों के नेता पहुंचे, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, द्रमुक अध्यक्ष स्टालिन, आंध्र के मुख्यमंत्री नायडू समेत कई नेताओं ने शिरकत की</h2>
<p style="text-align:justify;">रैली में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा (जेडीएस), राकांपा प्रमुख शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल, समाजवादी पार्टी प्रमुख (Mamata Rally Mamta With 13 Parties) अखिलेश यादव, लोकतांत्रिक जनता दल के नेता शरद यादव, जेएमएम प्रमुख हेमंत सोरेन, अरुणाचल के पूर्व मुख्यमंत्री गेगोंग अपांग, भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, राष्ट्रीय लोक दल के नेता अजीत सिंह, डीएमके नेता एमके स्टालिन और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला शामिल हुए। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी रैली में शिरकत की। गुजरात के कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी, पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल और बसपा के सतीश चंद्र मिश्रा भी रैली में शामिल हुए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">राहुल-सोनिया शामिल नहीं होंगे</h2>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी रैली में शामिल नहीं होंगे। कांग्रेस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी कोलकाता पहुंचे। <strong>राहुल ने कहा पूरा विपक्ष एक है:</strong> राहुल ने लिखा, ”पूरा विपक्ष एक है। मैं ममता दी को विपक्ष की एकता दिखाने के लिए समर्थन देता हूं। आशा है कि हम सब एकजुट भारत का शक्तिशाली संदेश देंगे।” राहुल ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, ”पूरा विपक्ष एकजुट है, हमारा मानना है कि सच्चा राष्ट्रवाद और विकास ही लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के पिलर को बचा सकता है, जिसे भाजपा और मोदी बर्बाद करने पर तुले हैं।”</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 19 Jan 2019 12:46:55 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>तीन तलाक पर राजनीतिक दलों का निराशाजनक रवैया</title>
                                    <description><![CDATA[नए साल के पहले ही दिन संसद से मुस्लिम महिलाओं के लिये निराशा से भरी खबर आई। असल में गुजरते साल के आखिरी दिन संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में तीन तलाक बिल पेश भी नहीं किया जा सका। कारण राजनीतिक विभेद, मुस्लिम मर्दों का तुष्टिकरण और हंगामे की निरंतर एवं शायद अन्तहीन परंपरा। कांग्रेस […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p>नए साल के पहले ही दिन संसद से मुस्लिम महिलाओं के लिये निराशा से भरी खबर आई। असल में गुजरते साल के आखिरी दिन संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में तीन तलाक बिल पेश भी नहीं किया जा सका। कारण राजनीतिक विभेद, मुस्लिम मर्दों का तुष्टिकरण और हंगामे की निरंतर एवं शायद अन्तहीन परंपरा। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों की पुरानी जिद बरकरार रही कि बिल संसद की स्थायी या प्रवर समिति को भेजा जाए।</p>
<p>नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने समिति में चर्चा के बाद सदन में बिल को पारित करने का आश्वासन दिया है, तो समिति के बजाय संसद में ही चर्चा करने में क्या दिक्कत है? राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश आसन से नसीहत देते रहे कि पूरा देश देख रहा है कि संसद के उच्च सदन में शोर और हंगामा मचाया जा रहा है। राष्ट्रीय महत्त्व का बिल है, जिसे लोकसभा में पारित किया जा चुका है और अब राज्यसभा में उस पर बहस की जानी है, लेकिन किसी भी सांसद के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। सभी की प्रतिबद्धताएं और उनके पूर्वाग्रह अपने-अपने हैं। राष्ट्र प्राथमिकता में रहता ही नहीं। अंतत: हंगामे और चीखा-चिल्ली के मद्देनजर राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।</p>
<h2>अदालत के फैसले के बावजूद 477 मुस्लिम औरतों को तीन तलाक का शिकार होना पड़ा।</h2>
<p style="text-align:justify;">तीन तलाक एक सियासी, मजहबी, चुनावी मुद्दा ही नहीं है, बल्कि सामाजिक और लैंगिक न्याय के मद्देनजर एक बेहद नाजुक सरोकार है। यह एक कुरीति भी है, जिसे कुरान में पाप माना गया है। तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में एक न्यायाधीश ने सवाल भी किया था कि जो कुरान में पाप है, वह कानून में भी पाप क्यों नहीं होगा? नतीजतन ऐसे पाप को अवैध, असंवैधानिक करार दिया गया था और इस मुद्दे पर कानून बनाने का सुझाव भी दिया था, लेकिन कुरीति इतनी है कि शीर्ष अदालत के फैसले के बावजूद 477 मुस्लिम औरतों को तीन तलाक का शिकार होना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या ऐसी दुरावस्था पर सरकार और संसद खामोश रह सकती थी? करीब 48 फीसदी मुस्लिम औरतें अशिक्षित हैं, करीब 82 फीसदी के पास कोई संपत्ति नहीं है, करीब 73 फीसदी गृहिणी हैं और करीब 45 फीसदी घरेलू हिंसा की शिकार हैं। क्या वे लैंगिक इंसाफ, गरिमा, सम्मान और सुरक्षित वैवाहिक जीवन की हकदार नहीं हैं? यह सामाजिक लड़ाई लड़ने के बजाय ज्यादातर विपक्षी दलों का आरोप है कि तीन तलाक के मुद्दे का अपराधीकरण किया जा रहा है। कांग्रेस की दलीलों को स्वीकार करते हुए सरकार ने तीन तलाक को जमानती बनाया, शौहर-बीवी के दरमियान समझौते लायक बनाया, तीन तलाक के संदर्भ में सिर्फ पीडित पत्नी या उसके सगे परिजन ही प्राथमिकी दर्ज करा सकेंगे। जमानत और समझौते के अधिकार प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को दिए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तीन तलाक के मुद्दे पर विभाजन और सियासी मतभेद राज्यसभा में स्पष्ट दिखाई दिए। मुस्लिम औरतों ने सोचा होगा कि तीन तलाक का बिल राज्यसभा में भी पारित हो जाएगा। यह कानून की शक्ल लेगा और उसके जरिए उन्हें वैवाहिक नरक से निजात मिलेगी। विडंबना है कि कानूनन आदेश तो सर्वोच्च न्यायालय पहले ही दे चुका है, लेकिन नए साल की पूर्व संध्या तक तीन तलाक जारी रहे हैं। मुस्लिम औरतों ने भी ख्बाव देखा होगा कि वे भी गरिमा और सम्मान से अपना दांपत्य जीवन जी सकेंगी, बच्चे भी लावारिस नहीं होंगे। परंपराओं से चली आ रही एक कुप्रथा के अंत की शुरूआत हो सकेगी। इस तरह नए साल में खुशियां बटोरने के सपने मुस्लिम महिलाओं ने भी देखे थे, लेकिन राज्यसभा में बिल ही पेश करने की नौबत नहीं आई। संसद में स्वास्थ्य, शिक्षा, कुपोषण, पर्यावरण और बुनियादी रोजगार सरीखे बेहद संवेदनशील मुद्दों पर सम्यक बहस होने के दिन ही लद चुके हैं। खानापूर्ति और दिखावे के लिए कुछ बिल शोर के बावजूद पेश किए जाते रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हंगामे और नारेबाजी के दौरान ही कुछ ही मिनटों में विधेयक ध्वनिमत से पारित घोषित कर दिए जाते रहे हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर वह भी नहीं हो सका। गौरतलब यह है कि एक पूरे समुदाय की आधी दुनिया का सरोकार है कि उसके वैवाहिक अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण मिले, लेकिन राजनीतिक दल शेष आधी दुनिया, यानी मुस्लिम मर्दों के भी वोट नहीं खोना चाहते, लिहाजा स्पष्ट विरोध के बजाय संसद में हंगामा मचाते हैं। नतीजतन उस चिल्ल-पौं में कई मकसद गुम होकर रह जाते हैं। यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रमुख विपक्ष ने लोकसभा में बहस की है, अपने संशोधन भी पेश किए हैं, 2017 में बिल का लोकसभा में ही कांग्रेस ने समर्थन किया था, तो राज्यसभा में सांप क्यों सूंघ जाता है? कांग्रेस ने जो बुनियादी सुझाव दिए थे, उन्हें नए बिल में पिरोया गया है। अब अधिकार मजिस्टेÑट को दिए गए हैं कि वह दोषी को जमानत दे सकते हैं। तलाकशुदा पत्नी या उसके परिजन ही एफआईआर दर्ज करा सकेंगे। सवाल है कि कांग्रेस और विपक्षी दल प्रवर समिति में और किन बिंदुओं पर चर्चा चाहते हैं? तीन तलाक के स्वेच्छाचारी मर्दों को जेल की सलाखों के पीछे क्यों न भेजा जाए?</p>
<p style="text-align:justify;">क्या कांग्रेस समेत विपक्ष मजिस्ट्रेट को भी मान्यता देने को तैयार नहीं हैं? पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान इंडोनेशिया, कतर, ईरान-इराक, संयुक्त अरब अमीरात, सूडान, मिस्र आदि 22 इस्लामी और अन्य देशों में तीन तलाक पर पाबंदी है या अदालती दखल के बिना यह संभव नहीं है, लेकिन हिंदोस्तान सरीखे धर्मनिरपेक्ष देश में करीब 8.4 करोड़ मुस्लिम औरतें तीन तलाक से पीड़ित या प्रभावित हैं। क्या मुस्लिम पत्नी के कोई मानवाधिकार नहीं हैं? या वे सड़क पर धक्के खाने को ही बनी हैं अथवा बच्चों समेत वे कहां जाएं? यदि संसद इन मुद्दों को संबोधित नहीं करेगी, तो पीड़ित मुस्लिम औरतें कहां जाएं? लोकसभा से बिल पारित होने के बाद उनकी उम्मीद जगी है, लेकिन अंतिम अग्पिरीक्षा राज्यसभा में ही होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">वहां बहुमत के लिए 123 सांसदों का समर्थन अनिवार्य है, लेकिन भाजपा के 73 सांसद मिलाकर एनडीए के पक्ष में कुल 86 सांसद हैं, जबकि कांग्रेस के 50 समेत यूपीए और अन्य को 108 सांसदों का समर्थन हासिल है। अब उच्च सदन में मानवीय भावनाओं के आधार पर ही पाले बदले जा सकते हैं। साफ है, सरकार के पास तीन तलाक बिल पर जारी अध्यादेश को संसद में पारित कराने के लिए सिर्फ 8 जनवरी तक का समय है. अगर सरकार इसे 8 जनवरी तक राज्यसभा में पारित नहीं करा पाई तो उसे फिर से अध्यादेश लाने पर विचार करना होगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>संतोष कमार भार्गव</strong></p>
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                <pubDate>Thu, 03 Jan 2019 13:02:24 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गड़बड़ी ईवीएम में या राजनीतिक दलों की सोच में ?</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मतदान के बाद ईवीएम के रखरखाव को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं और ईवीएम के जरिये धांधली के प्रयासों का मामला गर्मा गया है। कांग्रेस पार्टी द्वारा मतदान के बाद ईवीएम वाले स्ट्रांग रूम के आसपास सीसीटीवी की मरम्मत के बहाने लैपटॉप और मोबाइल फोन के साथ संदिग्धों को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/think-of-the-disturbances-in-evm-or-political-parties/article-6837"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/evm.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मतदान के बाद ईवीएम के रखरखाव को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं और ईवीएम के जरिये धांधली के प्रयासों का मामला गर्मा गया है। कांग्रेस पार्टी द्वारा मतदान के बाद ईवीएम वाले स्ट्रांग रूम के आसपास सीसीटीवी की मरम्मत के बहाने लैपटॉप और मोबाइल फोन के साथ संदिग्धों को देखे जाने और ईवीएम से छेड़छाड़ की गंभीर साजिश रचने के आरोप लगाए गए हैं और यह भी कहा गया है कि कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिनमें अधिकारी पिछले दरवाजे से स्ट्रांग रूम के अंदर जाते देखे गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रदेश में सागर तथा अनूपपुर में मतदान के दो-तीन बाद ईवीएम स्ट्रांग रूम में पहुंचने और भोपाल के स्ट्रांग रूम में तीन घंटे तक बिजली गुल रहने तथा उस दौरान सीसीटीवी काम न करने के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। अगर ये सभी आरोप सही हैं तो निश्चित रूप से यह बेहद गंभीर मामला है। हालांकि राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कांताराव द्वारा कहा गया है कि राज्य के स्ट्रांगरूम की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह पुख्ता है और स्ट्रांगरूम को सभी की उपस्थिति में सील किया गया है, सुरक्षा बलों की तैनाती है, इसलिए किसी तरह की आशंका नहीं होनी चाहिए। ईवीएम से छेड़छाड़ को लेकर उठ रहे आरोप नए नहीं हैं बल्कि अरसे से विपक्षी दल सदैव ईवीएम के विरोध में सुर बुलंद करते रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विधानसभा चुनावों तथा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में ईवीएम के बजाय मतपत्रों के इस्तेमाल को लेकर 17 राजनीतिक दलों के प्रस्ताव को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए गत दिनों अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया कि ऐसी धारणा गलत है कि ईवीम के बजाय मतपत्रों के जरिये चुनाव ज्यादा विश्वसनीय है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने स्पष्ट किया कि हर मशीन के ठीक या गलत होने की संभावना रहती है और यह उपयोग करने वालों पर निर्भर करता है कि वे उसका कैसे इस्तेमाल करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत की इस टिप्पणी के बाद ईवीएम के सही इस्तेमाल की जिम्मेदारी और जवाबदेही अब चुनाव आयोग तथा संबंधित अधिकारियों की ही है। इससे पहले तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ओमप्रकाश रावत बैलेट पेपर से मतदान कराए जाने की मांग को खारिज करते हुए कह चुके थे कि निष्पक्ष तथा पारदर्शी चुनावों के लिए देश में अत्याधुनिक वीवीपैट तथा ईवीएम मशीनों से ही मतदान कराया जाएगा। इसी वर्ष 27 अगस्त को निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव सुधार के मद्देनजर बुलाई गई मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की बैठक में सभी राष्ट्रीय व 51 राज्यस्तरीय राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया था और बैठक में आयोग द्वारा ईवीएम तथा वीवीपैट से जुड़ी समस्याओं का संज्ञान लेकर शंकाओं के संतोषजनक समाधान का आश्वासन देते हुए सकारात्मक संकेत दिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही उसके बाद भी कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल ईवीएम के विरोध का राग अलापते रहे हैं किन्तु आयोग के इस तर्क को अब सुप्रीम कोर्ट ने भी पुख्ता कर दिया है कि कुछ दलों के विरोध के चलते मतपत्रों पर वापस लौटना सही नहीं होगा। दरअसल आयोग नहीं चाहता कि बूथ कैप्चरिंग का दौर वापस आए। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त रावत कह चुके हैं कि आयोग ने सभी राजनीतिक दलों और लोगों को खुली चुनौती दी थी कि वे ईवीएम हैक करके दिखाएं किन्तु कोई आगे नहीं आया। उनका कहना है कि जो हारता है, वह किसी को तो जिम्मेदार ठहराता ही है, इसी तर्ज पर खेल में हारने पर रैफरी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है और चुनाव में हारने पर ईवीएम को।</p>
<p style="text-align:justify;">2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की धमाकेदार जीत हो या कुछ अन्य राज्यों के चुनावों में पार्टी की सरकार बनने का मामला, हर मौके पर ईवीएम पर संशय की उंगलियां उठाई गई लेकिन यही आवाजें उस वक्त खामोश रही, जब इन्हीं ईवीएम की बदौलत कुछ उपचुनावों में विपक्षी दलों ने प्रचण्ड जीत हासिल की। जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीत लीं तो ईवीएम अच्छी थी लेकिन जैसे ही पंजाब व गोवा में बुरी तरह शिकस्त हुई और दिल्ली एमसीडी व विधानसभा उपचुनाव में उनके प्रत्याशी हारे तो उनको लगने लगा कि इससे छेड़छाड़ की गई है। जब उनको न्यौता दिया गया कि वे आएं और इसमें छेड़छाड़ को साबित करें तो वे ऐसा नहीं कर पाए।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग पर हो भरोसा: हालांकि कुछ अवसर ऐसे आए हैं, जब ईवीएम के पूरी तरह सुरक्षित होने के दावों पर सवालिया निशान लगे थे लेकिन अब चुनाव आयोग द्वारा दिए जा रहे इस भरोसे पर तो यकीन करना ही चाहिए कि ईवीएम को इस तरह बनाया गया है कि उसमें गड़बड़ी नहीं हो सकती और अब आयोग ऐसी मशीनें भी तैयार करा रहा है, जो छेड़छाड़ होते ही स्वत: बंद हो जाएंगी, साथ ही वीवीपैट के जरिये मतदाता को उसके मत की जानकारी देने वाली पर्ची मुद्रित करने की भी व्यवस्था की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग द्वारा यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि ईवीएम के फेल होने का प्रतिशत मात्र 0.6 फीसदी ही है। ऐसे में हम इस तथ्य को भी कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं कि चुनाव आयोग विभिन्न अवसरों पर तमाम राजनीतिक दलों के साथ-साथ अन्य लोगों को भी ईवीएम हैक करने की चुनौती दे चुका है और आश्चर्य की बात है कि ईवीएम पर सवाल उठाने वाला कोई भी दल या कोई भी व्यक्ति इस चुनौती को स्वीकार करने की हिम्मत तक नहीं जुटा सका। ऐसे में ईवीएम की साख पर इस प्रकार के सवाल बार-बार उठाए जाने का आखिर क्या औचित्य है?</p>
<p style="text-align:right;"><strong>योगेश कुमार गोयल</strong></p>
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                <pubDate>Thu, 06 Dec 2018 08:53:10 +0530</pubDate>
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                <title>राजनीतिक दलों को ज्यादा वोट बैंक की फिक्र</title>
                                    <description><![CDATA[देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा एस.सी.-एस.टी. एक्ट के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता जाहिर करते हुए गत 20 मार्च को कुछ निर्देश दिए गए थे, जिसके विरोध में 2 अप्रैल को दलित समुदाय द्वारा भारत बंद के नाम पर देश के 20 राज्यों में हिंसा, अराजकता और आक्रामकता का ताण्डव किया गया था। हिंसा के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/political-parties-worry-about-the-vote-bank/article-5855"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/vote.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा एस.सी.-एस.टी. एक्ट के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता जाहिर करते हुए गत 20 मार्च को कुछ निर्देश दिए गए थे, जिसके विरोध में 2 अप्रैल को दलित समुदाय द्वारा भारत बंद के नाम पर देश के 20 राज्यों में हिंसा, अराजकता और आक्रामकता का ताण्डव किया गया था। हिंसा के उस तांडव के दौरान न केवल देशभर में अरबों रुपये की सम्पत्ति का नुकसान हुआ था बल्कि दर्जन भर लोग मौत के मुंह में भी समा गए थे। दरअसल अदालत ने एससीएसटी कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज होते ही किसी की तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी और गिरफ्तारी के बाद अग्रिम जमानत का प्रावधान भी कर दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत के इसी फैसले के विरोध में यह वर्ग सड़कों पर उतर आया था और इस वर्ग के प्रबल विरोध को देखते हुए गत दिनों केन्द्र सरकार ने मानसून सत्र के दौरान देश की सुप्रीम अदालत के फैसले को पलटते हुए आनन-फानन में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति संशोधन विधेयक 2018 को संसद में पारित करा दिया, जिसके बाद से सवर्ण वर्ग भी गुस्से से उबल रहा है और इसी गुस्से का इजहार करने के लिए 6 सितम्बर को भारत बंद का आयोजन किया गया। कई राज्यों में इसका व्यापक असर देखा भी गया। संतोषजनक बात यह रही कि सवर्ण वर्ग द्वारा आयोजित इस बंद के दौरान छिटपुट घटनाओं को छोड़कर हिंसा की अप्रैल के दलित प्रदर्शन जैसी कोई बड़ी घटनाएं सामने नहीं आई।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही राष्ट्रीय स्तर पर किसी संगठन द्वारा बंद का आव्हान नहीं किया गया था किन्तु फिर भी सवर्ण वर्ग के प्रदर्शन के व्यापक प्रभाव को देखते हुए अब अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति संशोधन विधेयक 2018 को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर जंग की शुरूआत होना तय है और इसके संकेत पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के बयानों से मिलने भी लगे हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी का कहना है कि इस एक्ट पर कोर्ट का फैसला आने के बाद ही उन्होंने कहा था कि इसे स्वीकार करना चाहिए लेकिन तब पार्टी ने उनकी बात नहीं सुनी। वहीं पूर्व मंत्री और भाजपा सांसद कलराज मिश्रा ने भी बयान दिया है कि जब एक बार फिर से इस कानून में बदलाव किया है, उसके बाद से सवर्ण समाज में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने तो यहां तक कहा है कि इस एक्ट का दुरूपयोग सवर्ण समाज के खिलाफ किया जा रहा है, सवर्ण समाज में फर्जी तरीके से पूरे परिवारों को इस एक्ट में फंसाया जा रहा है, पुलिस भी दबाव में काम कर रही है, जिससे सवर्ण समाज अपने आप को असंतुष्ट और असुरक्षित महसूस कर रहा है और इसीलिए अब इस एक्ट के विरोध में सवर्ण समाज विरोध प्रदर्शन कर रहा है। कई अन्य भाजपा नेता भी इसी प्रकार अपनी ही सरकार के फैसले का विरोध करने लगे हैं हालांकि सवर्ण समाज का कहना है कि वह किसी खास समुदाय के खिलाफ नहीं है लेकिन केन्द्र सरकार को सवर्ण समाज की भावना का भी सम्मान करना चाहिए। दरअसल सवर्ण समुदायों का कहना है कि दहेज प्रथा कानून की ही भांति एससीएसटी एक्ट का भी दुरुपयोग कर उन्हें झूठे मामलों में फंसाया जाता रहा है और इसीलिए ये लोग इस एक्ट पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को बहाल करने की मांग कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले के बाद स्पष्ट किया था कि उसने एस.सी.-एस.टी. एक्ट के किसी भी प्रावधान को कमजोर नहीं किया बल्कि सिर्फ निर्दोष व्यक्तियों को गिरफ्तारी से बचाने के लिए उनके हितों की रक्षा की है क्योंकि इस एक्ट के प्रावधानों का इस्तेमाल निदोर्षों को आतंकित करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि दलित आन्दोलन करने वालों ने उसके फैसले को सही ढ़ंग से पढ़ा ही नहीं और निहित स्वार्थी लोगों ने उन्हें गुमराह किया। दरअसल एससी-एसटी उत्पीड़न रोकथाम कानून इसीलिए अस्तित्व में लाया गया था ताकि सदियों से दमन के शिकार वंचित समाज को सामाजिक विसंगितयों तथा अन्याय से मुक्ति दिलाने के साथ दबंगों के उत्पीड़न से उनके आत्मस्वाभिमान की भी रक्षा की जा सके किन्तु पिछले कुछ वर्षों के दौरान दलित एक्ट का निदोर्षों के खिलाफ जिस बड़े पैमाने पर दुरूपयोग होता रहा है, उसके मद्देनजर अगर देश की सर्वोच्च अदालत ने कोई ऐसी पहल की, जिससे एक एक्ट की आड़ में निर्दोष व्यक्ति बेवजह जिल्लत के शिकार न हों तो इसमें किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी।</p>
<p style="text-align:justify;">
विड़म्बना यह है कि तमाम राजनीतिक दलों को सामाजिक सद्भावना से कहीं ज्यादा अपने वोट बैंक की फिक्र है और यही वजह रही कि 6 सितम्बर के बंद को लेकर न भाजपा, न कांग्रेस और न ही किसी अन्य प्रमुख राजनीतिक दल की ओर से अधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई क्योंकि अगर वे इसका समर्थन करते हैं तो दलित नाराज हो जाएगा और विरोध करते हैं तो सवर्ण कुपित होगा, इसलिए ऐसे मसलों पर चुप्पी साधकर सभी दल एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़कर भ्रम फैलाने में ही मशगूल रहते हैं।</p>
<p style="text-align:right;">योगेश गोयल</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Sep 2018 11:05:45 +0530</pubDate>
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                <title>ईवीएम की खराबी बनाम दलों की मानसिकता</title>
                                    <description><![CDATA[देश में एक बार फिर से विद्युतीय मतदान यंत्र यानी ईवीएम के विरोध में स्वर मुखरित होते हुए दिखाई दे रहे हैं। देश के सत्रह राजनीतिक दलों के नेता ईवीएम के बारे में गड़बड़ी होने का आरोप लगा रहे हैं। वर्तमान राजनीति की वास्तविकता यही है कि जो भी राजनीतिक दल चुनाव में पराजय का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/evm-malfunction-vs-mentality-of-parties/article-5169"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/evm.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में एक बार फिर से विद्युतीय मतदान यंत्र यानी ईवीएम के विरोध में स्वर मुखरित होते हुए दिखाई दे रहे हैं। देश के सत्रह राजनीतिक दलों के नेता ईवीएम के बारे में गड़बड़ी होने का आरोप लगा रहे हैं। वर्तमान राजनीति की वास्तविकता यही है कि जो भी राजनीतिक दल चुनाव में पराजय का सामना करता है, वह अपनी हार को स्वीकार न करते हुए कोई न कोई बहाने की तलाश करता है। वह ऐसा प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि उनकी पराजय में ईवीएम का ही हाथ है। अगर ऐसा होता तो स्वाभाविक रुप से पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से पराजित होकर सत्ता से बाहर नहीं होती, क्योंकि वह भी ईवीएम में गड़बडी कर सकती थी। वास्तविकता यही है कि राजनीतिक दल अपनी हार को छुपाने के लिए ही इस प्रकार के आरोप लगाने की राजनीति कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में ईवीएम को हटाकर जिस प्रकार से मत पत्रों से चुनाव कराने की कवायद की जा रही है, वह निश्चित रुप से मतदान की प्रक्रिया को बहुत धीमा करने वाला प्रयास ही कहा जाएगा। देश में जब बैलेट पेपर से चुनाव की प्रक्रिया होती थी, तब अनेक स्थानों से ऐसी खबरें भी आती थीं कि अमुक राजनीतिक दल के गुंडों ने मतदान केन्द्र पर कब्जा करके पूरे मत पत्रों पर अपनी पार्टी की मुहर लगाकर मतदान कर दिया। मत पत्रों के आधार पर किए जाने वाले चुनाव लोकतंत्र पर आधारित न होकर बाहुबल के आधार पर ही किए जाते हैं। मात्र इसी कारण ही कई क्षेत्रों से बाहुबली चुनकर भी आ जाते हैं। ईवीएम से मतदान होना निसंदेह समस्त चुनावी गड़बड़ियों पर रोक लगाने का काम करता है। क्योंकि प्रत्येक मतदान पर बीप की ध्वनि निकलने के पश्चात ही मत डाला जाता है, जिससे एक व्यक्ति किसी भी हालत में कई मत नहीं डाल सकता। इसलिए यह आसानी से कहा जा सकता है कि ईवीएम के बजाय मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की मांग लोकतंत्र को प्रभावित करने वाली ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">विगत लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद देश की जो राजनीतिक तसवीर बनी उससे कई राजनीतिक दलों के पैरों तले जमीन ही खिसक गई। कांग्रेस, सपा व बसपा का व्यापक जनाधार पूरी तरह से खिसक गया था। इसके बाद इन दलों के साथ ही आम आदमी पार्टी ने ईवीएम को लेकर ऐसा हंगामा किया कि जैसे यह परिणाम ईवीएम का कमाल है। इस समय ज्यादा विरोध होने के बाद चुनाव आयोग ने भी इन राजनीतिक दलों के बयानों को एक चुनौती के रुप में स्वीकार किया। चुनाव आयोग ने दिनांक तय करके कहा कि ईवीएम पूरी तरह से सुरक्षित हैं, किसी में दम हो तो ईवीएम को हैक करके दिखाए। इसके बाद इन सभी राजनीतिक दलों की बोलती बंद हो गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">ईवीएम हैक करने के लिए कोई भी राजनीतिक दल का प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ। इसका मतलब साफ था कि ईवीएम को लेकर जो हंगामा किया गया था, वह पूरी तरह से देश की जनता को गुमराह करने के लिए खेला गया ऐ नाटक ही था। जो दल चुनाव आयोग के बुलाने पर पहुंचे थे, उनके द्वारा कहा गया कि ईवीएम तो सही है, हम केवल ईवीएम का प्रदर्शन देखने आए थे। आज जो राजनीतिक दल ईवीएम पर सवाल उठाकर मत पत्रों से चुनाव कराने की बात कह रहे हैं, उन्होंने भी उस समय कुछ नहीं बोला, जब चुनाव आयोग ने बुलाया था। दिल्ली राज्य की सत्ता संभालने वाली आम आदमी पार्टी ने भी ईवीएम की निष्पक्षता को लेकर खूब हंगामा किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने तो ताल ठोकने वाले अंदाज में कहा था कि हम ईवीएम को हैक करके दिखाएंगे, इतना ही नहीं आप के विधायक सौरभ भारद्वाज ने यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया था कि ईवीएम को हैक कैसे किया जा सकता है, लेकिन बाद में उनकी भी हैकड़ी निकलती हुई दिखाई दी। वह भी इतना पीछे हट गए कि बाद में स्वर ही नहीं निकले।दिल्ली राज्य में व्यापक सफलता प्राप्त करने वाली आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को उस समय ईवीएम में किसी भी प्रकार की कोई गड़बड़ी नहीं दिखाई दी, जब दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को छप्पर फाड़ समर्थन दिया था। उसे वह जनता की जीत बताते हुए नहीं थक रहे थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि लोकसभा के चुनावों में ईवीएम खराब हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तविकता यही है कि ईवीएम में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी नहीं है और हो भी नहीं सकती, क्योंकि अगर गड़बड़ी होती तो आज प्रत्येक राजनीतिक दल के पास आईटी विशेषज्ञ हैं, जो कंप्यूटरी कृत मशीनों को हैक करना भी जानते हैं। उनके ये विशेषज्ञ ईवीएम को भी हैक करके दिखा सकते थे, लेकिन चूंकि ईवीएम में कोई गड़बड़ी थी ही नहीं तो फिर हैक कैसे की जा सकती थी।आज जिस प्रकार से मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की बात हो रही है, वह पराजित मानसिक अवस्था का ही प्रदर्शन माना जा रहा है। लोकसभा और विधानसभा में हारे हुए राजनीतिक दलों को मत पत्रों से चुनाव कराए जाने की मांग के बजाय उन बातों पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है, जिनके कारण वे पराजित हुए हैं। कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक स्थिति उसकी स्वयं की देन है, क्योंकि उसके शासनकाल में जिस प्रकार प्रतिदिन भ्रष्टाचार करने की खबरें आ रही थीं, उसके कारण देश की जनता व्यापक परिवर्तन करने का मन बना चुकी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा कांग्रेस ने देश में तुष्टिकरण का भी खेल खेला। लेकिन इसका लाभ भी कांग्रेस को नहीं मिल सका, क्योंकि देश में कई राजनीतिक दल आज भी खुलेआम तुष्टिकरण की भाषा बोलने में सिद्ध हस्त हो चुके हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता ने समझदारी दिखाई, और उसी के हिसाब से परिणाम सामने आए। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती की पार्टी लोकसभा में खाता भी नहीं खोल पाई थी, इसका मलाल उनकी बातों में दिखाई देता है। उत्तरप्रदेश में लोकसभा और विधानसभा के बाद बसपा की जो राजनीतिक स्थिति बनी, उसने बसपा के जनाधार को जमीन सुंघाने का काम किया। लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी हार ठीकरा ईवीएम पर फोड़ दिया। इसी प्रकार 2014 में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस और सपा केवल एक परिवार की पार्टी बनकर ही रह गई।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा सुनियोजित तरीके से मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की मांग की जा रही है। लोकसभा चुनाव के चार साल बाद भी वे देश की जनता का विचार नहीं जान पाएं हैं। जितना वे ईवीएम के लिए चिल्ला रहे हैं, उतना अपनी कार्यशैली में सुधार करने की कार्यवाही करते तो संभवत: जनता के मन में स्थान बना पाने में समर्थ होते। हार की समीक्षा की जानी चाहिए थी, लेकिन हमारे देश के राजनीतिक दलों ने समीक्षा न करके बहाने तलाशने प्रारंभ कर दिए। ईवीएम में गड़बड़ी का बहाना भी ऐसा ही है। जबकि सच यह है कि मत पत्रों के आधार पर होने वाले चुनावों में गड़बड़ी की संभावना अधिक रहती है, जिसे जनता भी जानती है और राजनीतिक दल भी जानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ईवीएम पर संदेह व्यक्त करने वाले राजनीतिक दलों का भ्रम दूर हो सके, इसके लिए चुनाव आयोग ने अब मतदान के बाद ऐसी पर्ची प्राप्त करने की सुविधा भी जोड़ दी है, जिसके आधार पर पता चल सके कि उसने किस पार्टी को मत दिया है। इसके बाद राजनीतिक दलों को संदेह समाप्त हो जाना चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि इन राजनीतिक दलों द्वारा मत पत्र से चुनाव कराए जाने के पीछे कुछ और ही मंशा है। यह भी हो सकता है कि इसके माध्यम से मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने जैसी कार्यवाही को अंजाम दिया जा सके। मतदाताओं को डरा, धमकाकर भगा दिया जाए और बाहुबल के सहारे एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में मतदान कराया जा सके। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि ईवीएम में खराबी नहीं है, खराबी तो राजनीतिक दलों की मानसिकता में है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></p>
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                <pubDate>Mon, 06 Aug 2018 10:24:33 +0530</pubDate>
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                <title>भाजपा को पटखनी देने क्षेत्रीय दलों से गठबंधन की जुगत में कांग्रेस</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/congress-in-the-wake-of-coalition-with-regional-parties/article-3932"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/rahul.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)। </strong>उत्तर प्रदेश में हाल के उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के खिलाफ संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार की जीत के बाद कांग्रेस आगामी 2019 के आम चुनाव में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा नीत सरकार को सत्ता से हटाने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ गठबंधन करने की रणनीित पर विचार कर रही है। विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस की उत्सुकता को उसकी पूर्व की ‘एकला चलो’ की नीति में बदलाव के रूप में देखा।</p>
<p style="text-align:justify;">पार्टी सूत्रों ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीटों पर संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार खड़ा करने की रणनीति की जबरदस्त सफलता के मद्दनेजर कांग्रेस समूचे देश में विभिन्न सीटों पर क्षेत्रीय विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की संभाव्यता पर गौर कर रही है। इसी सप्ताह कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि सभी राज्यों के लिए एक समान रणनीति नहीं हो सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल पार्टी 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा विरोधी मतों को अपनी ओर मिलाने की रणनीति पर काम कर रही है। सूत्रों ने कहा कि कांग्रेस करीब 400 लोकसभा सीटों पर क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन की संभावना पर नजर रखे हुए है।इसके अलावा वह इसी साल के अंत में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में अन्य विपक्षी दलों के साथ गठबंधन के लिए विचार कर रही है। इन दोनों राज्यों में वर्तमान में भाजपा की ही सरकारें हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि कांग्रेस मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी(बसपा) से गठबंधन की दिशा में काम कर रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता कमलनाथ एवं ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश में चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए बसपा प्रमुख मायावती और वरिष्ठ बसपा नेता सतीश मिश्रा से भी बात की है। छत्तीसगढ़ में भी भाजपा के विरोधी मतों को अपने खाते में बटोरने के लिए ऐसे ही गठबंधन का प्रयास किया जा रहा है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 Jun 2018 13:05:49 +0530</pubDate>
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                <title>कालेधन का विरोध करने वाली पार्टियां जवाब दे: भाजपा</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली:  भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कालेधन पर कार्रवाई के तहत पांच सौ और एक हजार रुपये के नोट को प्रचलन से बाहर किये जाने का प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा विरोध किये जाने पर कडी आपत्ति जताते हुये आज सवाल किया कि वे कालेधन के समर्थन में हैं या विरोध में। भाजपा अध्यक्ष अमित […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/parties-oppessing-black-money-shoud-answer-bjp/article-322"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-11/shah-amit.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली: </strong> भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कालेधन पर कार्रवाई के तहत पांच सौ और एक हजार रुपये के नोट को प्रचलन से बाहर किये जाने का प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा विरोध किये जाने पर कडी आपत्ति जताते हुये आज सवाल किया कि वे कालेधन के समर्थन में हैं या विरोध में।<br />
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि कांग्रेस ,बहुजन समाज पार्टी , समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी पांच सौ और एक हजार रुपये के नोट बंद किये जाने से एक दिन पहले (सात नवम्बर) तक कालेधन को लेकर रोज सवाल उठाती थी लेकिन अब जब कार्रवाई की गयी है तो हायतौबा मचायी जा रही है । उन्होंने कहा कि इन पार्टियों को बताना चाहिये कि वे आतंकवादियों , हवाला कारोबारियों तथा ड्रग व्यापारियों के समर्थन में हैं या खिलाफ। (वार्ता)</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Nov 2016 12:17:45 +0530</pubDate>
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