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                <title>अब बेटियां बराबर की हकदार</title>
                                    <description><![CDATA[सर्वोच्च न्ययालय ने महिलाओं के हक में बड़ा निर्णय दिया है। इस फैसले से चारों ओर खुशी की लहर है। न्यायालय ने कहा है कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी का बेटे के बराबर का हक है, थोड़ा भी कम नहीं। कोर्ट ने कहा कि बेटी जन्म के साथ ही पिता की संपत्ति में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/now-daughters-have-equal-rights/article-17710"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/center-answers-in-supreme-court-on-syl-issue1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सर्वोच्च न्ययालय ने महिलाओं के हक में बड़ा निर्णय दिया है। इस फैसले से चारों ओर खुशी की लहर है। न्यायालय ने कहा है कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी का बेटे के बराबर का हक है, थोड़ा भी कम नहीं। कोर्ट ने कहा कि बेटी जन्म के साथ ही पिता की संपत्ति में बराबर की हकदार हो जाती है। जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या करते हुए कहा है कि बेटी को पैतृक संपत्ति पर बराबरी के हक से वंचित नहीं किया जा सकता। बेटी चाहे हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में हुए संशोधन से पहले पैदा हुई हो या बाद में, उसे बेटे के समान ही बराबरी का हक है। वास्तव में जब महिलाएं सामाजिक रिश्तों को ताक पर रखकर अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग करती भी थीं तो हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून 2005 कई महिलाओं के सामने अड़चन पैदा किया करता था। इस वजह से बीते 15 सालों में महिलाओं की एक बड़ी संख्या पैतृक संपत्ति में अपना अधिकार मांगने से वंचित रह गई।</p>
<p style="text-align:justify;">ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही दो फैसलों प्रकाश बनाम फूलमती (2016) और दनाम्मा उर्फ सुमन सरपुर बनाम अमन (2018) में विरोधाभास के बाद कानूनी व्यवस्था तय करने के लिए मामला तीन न्यायाधीशों को भेजा गया था। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, एस अब्दुल नजीर और एमआर शाह की पीठ ने फैसले में कहा, चूंकि बेटी को जन्म से संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होता है। इसलिए संशोधित कानून लागू होने की तिथि को पिता का जीवित होना जरूरी नहीं है। तीन सदस्यीय पीठ के अध्यक्ष जस्टिस अरुण मिश्रा ने यह दोहराया कि बेटा तब तक बेटा होता है जब तक उसे पत्नी नहीं मिलती है, लेकिन बेटी जीवनपर्यंत बेटी रहती है। उनके कथन में बेटियों का अपने माता-पिता के प्रति आजीवन स्नेह का भाव नजर आया। उनके इस उद्गार से जाहिर होता है कि बेटियां अपने माता-पिता से भावनात्मक रूप से बेटों के मुकाबले कहीं ज्यादा जुड़ी होती हैं। इस टिप्पणी में अतिशयोक्ति और अपवाद भी हो सकते हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा न्यायिक सुधार किया है, जो न सिर्फ बेटी को बराबर का पैतृक अधिकार देता है, बल्कि लैंगिक न्याय को भी नए सिरे से परिभाषित करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2000 में विधि आयोग ने एक रपट में उल्लेख किया कि आम आदमी के फायदे के लिए सभी तरह के संपत्ति-कानून बनाने चाहिए, क्योंकि संपत्ति का अधिकार मनुष्य की आजादी और विकास के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। आयोग ने उस कानून को बदलने की भी अनुशंसा की, जो हिंदू अविभाजित संयुक्त परिवार में महिलाओं को सह-कानूनी उत्तराधिकारी होने को रोकता है। तब तक यह अधिकार पुरुष वंशजों, उनकी माताओं, पत्नियों और अविवाहित बेटियों को ही हासिल था। बहरहाल 2005 में संसद ने आयोग की रपट का संज्ञान लिया तथा उसे स्वीकार करते हुए हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में संशोधन पारित किया। नतीजतन बेटी को भी पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सेदार मान लिया गया, लेकिन फिर एक पेंच रह गया।</p>
<p style="text-align:justify;">संशोधित कानून के मुताबिक, यदि 9 सितंबर, 2005 को बेटी का पिता जीवित होगा, तभी कानून लागू होगा। पिता के दिवंगत होने की स्थिति में बेटी वंचित ही रहेगी। अब सर्वोच्च अदालत के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सभी भ्रमों, स्थितियों और सवालों पर विराम लगा दिया है। फैसला दिया गया है कि पैतृक संपत्ति में सह-हिस्सेदारी हिंदू महिला का जन्म से ही अधिकार है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। अगर वसीयत लिखने से पहले पिता की मौत हो जाती है तो सभी कानूनी उत्तराधिकारियों को उनकी संपत्ति पर समान अधिकार होगा। हिंदू उत्तराधिकार कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों का चार श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया है और पिता की संपत्ति पर पहला हक पहली श्रेणी के उत्तराधिकारियों का होता है। इनमें विधवा, बेटियां और बेटों के साथ-साथ अन्य लोग आते हैं। हरेक उत्तराधिकारी का संपत्ति पर समान अधिकार होता है। इसका मतलब है कि बेटी के रूप में आपको अपने पिता की संपत्ति पर पूरा हक है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसमें कोई दो राय नहीं है कि बदलते समय में भी हमारे देश में बेटियों को पराया समझा जाता है, इसलिए इन्हें लोग अपनी संपत्ति का हकदार नहीं मानते हुए अपनी संपत्ति को बेटों के नाम कर देते हैं। लेकिन शादी के बाद किस लड़की पर क्या मुसीबत आ जाए कि उसे अपनी पैतृक संपत्ति की कब बेहद जरूरत पड़ जाए, यह कोई नहीं विचारता है। लेकिन हमारे देश में पैतृक संपत्ति के विवाद के जितने मामले, लड़ाई-झगड़े भाइयों के सामने आते हैं, उतने या यूं कहें कि भाई-बहनों के नामात्र के ही होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बेटियों को उनकी पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर हकदार बनाने के लिए हाल ही में एक शानदार फैंसला सुनाया है, लेकिन हमारे देश की लड़कियां अपने माता-पिता की संपत्ति पर कभी भी हक जमाने की कोशिश नहीं करतीं। हां, कुछ लड़कियां शादी के बाद दहेज लोभियों के दबाव में अपनी पैतृक संपत्ति से अपना हिस्सा मांगने की मांग करती हों। लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उन लड़कियों को राहत मिल सकती है, जो किसी मजबूरी के कारण अपनी पैतृक संपत्ति पाना चाहती हो या फिर उनकी पैतृक संपत्ति के गलत रिश्तेदारों, रास्ता भटक चुके भाइयों द्वारा इसका दुरुपयोग का खतरा हो।</p>
<p style="text-align:justify;">सामाजिक ढांचा और कानूनी पक्ष यह है कि बेटी का ससुराल की संपत्ति में भी कोई अधिकार नहीं होता। विवाह में कटुता आने पर पति अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से महज गुजारा भत्ता ही देता है, मगर ससुराल की चल-अचल संपत्ति पर उसका हक नहीं होता। ऐसे में अपनी पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलने से उसकी स्थिति मजबूत होगी। कोर्ट ने इस मामले में सरकार का पक्ष भी जानना चाहा था और सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने केस में कोर्ट के फैसले पर सहमति जताते हुए इसे बेटियों का मौलिक अधिकार जैसा माना। सर्वोच्च न्यायालय से ये फैसला आते ही सोशल मीडिया में तमाम प्रतिक्रियाएं हुईं। किसी ने इसे उनके सम्मान से जोड़ा तो कोई इसे बराबरी का अधिकार मान रहा है। खैर हर किसी ने तहेदिल से इसको अपनाया, जो दशार्ता है कि अब लोगों की सोच में काफी बदलाव आ रहा है। असल में यह फैसला बदलती सोच का प्रतीक है। बेटी अपना हक ले या छोड़े, यह उसका फैसला होगा। अगर उसे जरूरत हो और तब भी उसे अधिकार न मिले तो यह अन्याय होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सांसद व वकील मीनाक्षी लेखी के शब्दों में, इस फैसले को खुशी से स्वीकार किया जा रहा है। यह हमारे परिवार और समाज की ताकत दिखाता है कि समय के अनुसार हमें बदलना भी आता है। बराबरी के अधिकार को हम सही मायनों में मानते हैं और नियमों के अनुसार अपनी जिंदगी को बदलने की क्षमता रखते हैं। अब यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर कितने लोग अमल करते हुए बेटा-बेटी में अंतर न समझते हुए, अपनी बेटी या बेटियों को भी पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाते हैं? कानून के जानकार मानते हैं कि भारतीय सामाजिक स्थिति के मद्देनजर यह एक महत्वपूर्ण फैसला है, जिसके दूरगामी परिणाम सामने आयेंगे और इससे महिलाओं की समाज में स्थिति मजबूत होगी। निश्चय ही शीर्ष अदालत के फैसले से विवाहित बेटियों को संबल मिलेगा। देखा जाए तो यह निर्णय तो संविधान में तब जोड़ा जाना चाहिए था, जब संविधान पर बहस चल रही थी और समानता को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखा गया था। चलिए देर आयद, दुरुस्त आयद।</p>
<p style="text-align:justify;">                                                                                                               <strong>-राजेश माहेश्वरी</strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Aug 2020 09:54:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नगर निगमों को अधिक अधिकार देने की खबरें बकवास: विज</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर गृह मंत्री अनिल विज ने बीजेपी की जीत का दावा किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली की जनता अरविंद केजरीवाल की देश विरोधियों के साथ खड़े होने वाली छवि से नाराज हैं और बीजेपी को सत्ता में देखना चाहते हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h2 style="text-align:center;">विज ने कहा कि वे मीडिया में आई खबरों से सहमत नहीं है (Anil Vij)</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ/अनिल चंडीगढ़।</strong> प्रदेश के गृह, स्वास्थ्य एवं स्थानीय निकाय मंत्री अनिल विज (Anil Vij) ने शुक्रवार को कुछ अखबारों में नगर निगमों को अधिक अधिकार दिए जाने संबंधी छपी खबरों को खारिज कर दिया है। विज ने कहा है कि नगर निगमों को ज्यादा अधिकार देने को लेकर अब तक ना तो मंत्री समूह, पार्टी या उनसे कोई चर्चा हुई है। विज अपने कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए विज ने कहा कि वे मीडिया में आई खबरों से सहमत नहीं है। जब मामला उनके सामने आएगा तो देखा जाएगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर गृह मंत्री अनिल विज ने बीजेपी की जीत का दावा किया</h3>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा में डीएसपी को हरियाणा प्रशासनिक सेवा के बराबर दर्जा देने के लिए सवाल पर विज ने कहा कि इसका एक प्रस्ताव बनाकर मुख्यमंत्री को मंजूरी के लिए भेजा गया है। दिल्ली के निर्भया रेप केस में आरोपियों के द्वारा डेथ वारंट भी गृह मंत्री अनिल विज ने स्वागत किया। उन्होंने कहा कि निर्भया मामला सामने आने के बाद कानून में बदलाव किया गया था। ताकि लोगों को जल्द से जल्द न्याय मिले लेकिन कुछ तकनीकी दिक्कतों के चलते इसमें देरी हो गई है लेकिन अब सब कुछ साफ हो गया है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर गृह मंत्री अनिल विज ने बीजेपी की जीत का दावा किया।</li>
<li style="text-align:justify;"> दिल्ली की जनता अरविंद केजरीवाल की देश विरोधियों के साथ खड़े होने वाली छवि से नाराज हैं</li>
<li style="text-align:justify;">बीजेपी को सत्ता में देखना चाहते हैं।</li>
</ul>
<p> </p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/report-giving-more-rights-to-municipal-corporations-is-rubbish/article-12564</link>
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                <pubDate>Fri, 17 Jan 2020 20:32:44 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजनीति में भागीदारी बढ़ाएं महिलाएं: प्रतिभा सुमन</title>
                                    <description><![CDATA[-महिला आयोग की चेयरपर्सन ने किया महिलाओं के कानूनी अधिकार पुस्तक का विमोचन -जाट कॉलेज में सर्च-राज्य संसाधन केन्द्र हरियाणा द्वारा सेमीनार आयोजित रोहतक(सच कहूँ न्यूज)। महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हुए राजनीति में आना चाहिए ताकि वे महिला सशक्तिकरण के कानूनों की मांग को मजबूती से उठा सकें। यह बात हरियाणा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h2 style="text-align:justify;">-महिला आयोग की चेयरपर्सन ने किया महिलाओं के कानूनी अधिकार पुस्तक का विमोचन</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;">-जाट कॉलेज में सर्च-राज्य संसाधन केन्द्र हरियाणा द्वारा सेमीनार आयोजित</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>रोहतक(सच कहूँ न्यूज)।</strong> महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हुए राजनीति में आना चाहिए ताकि वे महिला सशक्तिकरण के कानूनों की मांग को मजबूती से उठा सकें। यह बात हरियाणा राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन प्रतिभा सुमन ने बुधवार को जाट कॉलेज के सभागार में भारत ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा महिलाओं के कानूनी अधिकार विषय पर आयोजित जागरूकता सेमिनार को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि लोकसभा, राज्यसभा व विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बहुत ही कम है जिसके कारण महिलाओं के मुद्दों पर विचार-विमर्श बहुत कम हो पाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके मुद्दों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, इसलिए महिलाओं को राजनीति में अपनी भागीदारी को बढ़ाना चाहिए ताकि वे अपने पक्ष को मजबूती से रख सकें। जिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी करमिन्दर कौर ने कहा कि दुनिया में किसी न किसी रूप में भेदभाव होता रहा है। महिलाओं के साथ भी हर वर्ग में भेदभाव हो रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि समाज को मानसिकता बदलते हुए महिलाओं को सम्मान देना होगा, तभी सार्थक समाज का निर्माण हो सकता है। एसएचओ गरिमा श्योराण ने कहा कि पुराने समाज में महिलाएं घर तक सीमित रहती थीं। वर्तमान में महिलाओं ने घर की चार दीवारी को लांघ ली है, लेकिन उनके सामने जागरुकता के साथ अनेक समस्याएं भी आ गई हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">अब एकल परिवार के कारण माता-पिता बच्चों पर नहीं दे पाते ध्यान</h2>
<p style="text-align:justify;">अब एकल परिवार होने के कारण माता-पिता बच्चों पर बहुत कम ध्यान दे पा रहे हैं। जिस कारण महिलाओं के साथ आपराधिक मामले बढ़ते जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने महिलाओं की समस्या को ओर ज्यादा बढ़ा दिया है। चेयरपर्सन ने छात्राओं का आह्वान किया कि वे अत्याचार को सहन न करें। जब भी कोई उन्हें परेशानी आए अपने अधिकारों का प्रयोग करें। महिलाएं ही अपने आत्मविश्वास से स्वयं की स्थिति को बदल सकती हैं। इस अवसर पर प्राचार्या डॉ. संगीता दलाल, डॉ. शबनम राठी, डॉॅ. सुशीला डबास, डॉ. मीनल मलिक, डॉ. जसमेर सिंह, डॉ. शीशपाल, विमलेश कुमारी, डॉ. आरएस दहिया मौजूद रहे।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/release-of-legal-rights-book/article-7670</link>
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                <pubDate>Wed, 13 Feb 2019 19:20:23 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>लोकतंत्र में हिंसक बनते संवैधानिक अधिकार</title>
                                    <description><![CDATA[लोकतंत्र में हमारे अधिकार हिंसक क्यों बन रहे हैं। हम संविधान उसके विधान और व्यवस्था को हाथ में लेकर खुद न्यायी क्यों बनना चाहते हैं। संविधान में लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात रखने की पूरी आजादी है। हर वह व्यक्ति, संस्था, समूह, दल और संगठन अपनी बात वैचारिक रुप से रख सकता है। यह लोकतांत्रिक […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में हमारे अधिकार हिंसक क्यों बन रहे हैं। हम संविधान उसके विधान और व्यवस्था को हाथ में लेकर खुद न्यायी क्यों बनना चाहते हैं। संविधान में लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात रखने की पूरी आजादी है। हर वह व्यक्ति, संस्था, समूह, दल और संगठन अपनी बात वैचारिक रुप से रख सकता है। यह लोकतांत्रिक तरीके से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के जरिए भी हो सकता है। अपनी बात रखने के लिए हमारे पास संसद, राज्य विधानसभाएं, संबंधित विभाग और अधिकारी भी हैं। लेकिन हम फिर भी हिंसा का रास्ता क्यों अपनाते हैं। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में आरक्षण की मांग कर रहे निषाद पार्टी के समर्थकों ने जिस तरह का नंगा नाच किया उसे किसी भी तरह से लोेकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। गाजीपुर में उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा थी। पुलिस वहां से वापस लौट रही थी। अटवा मोड पर निषाद पार्टी की तरफ से आरक्षण की मांग को लेकर प्रदर्शन चल रहा था। जिसकी वजह से पूरी सड़क जाम थी। पुलिस लोगों को समझा-बुझा कर रास्ता खुलवाना चाहती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उसी दौरान भीड़ हिंसक हो गयी और पुलिस पर पथराव करने लगी जिसकी वजह से सुरेश वत्स की मौत हो गयी। अब भला पुलिस का दोष क्या था? पुलिस पर पथराव की जरुरत क्या थी? पुलिस क्या प्रदर्शनकारियों पर लाठी बरसा रही थी? या फिर फायरिंग कर रही थी? अगर वहां ऐसा कुछ नहीं था तो भीड़ को हिंसक बनने की क्या आवश्यकता थी? क्या पथराव और हिंसा से आरक्षण मिल जाएगा? उत्तर प्रदेश में भीड़ की हिंसा का शिकार कोई पहला पुलिसकर्मी नहीं हुआ। हाल में बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को भी माब लिंिचंग का शिकार होना पड़ा। इसके पूर्व समाजवादी सरकार में प्रतापगढ़ में सीओ जियाउल हक और मथुरा में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी के साथ एक एसएचओ की मौत हो चुकी है। सवाल उठता है कि हम पुलिस को अपने से अलग क्यों समझते हैं। हम अपना गुस्सा पुलिस पर क्यों उतारते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह जघन्य वारदात पूर्वांचल के उस जिले में हुई जहां से सबसे अधिक लोग सेना और यूपी पुलिस में कार्यरत हैं। हमारे दिमाग में शायद यह बात घर कर गई है कि पुलिस सरकार की कठपुतली होती है। वह उसी के इशारे पर नाचती है और भीड़ पर जरुरत पड़ने पर लाठियां भांजती है। लूट, हत्या, डकैती या सामाजिक अपराध से बचाने के लिए पुलिस हमारा साथ नहीं देती। अगर पुलिस हमारे साथ हमेशा खड़ी रहती है तो उसके साथ हमें और समाज को नजरिया बदलना होगा। पुलिस को मित्रवत देखना होगा साथ ही पुलिस को भी अपनी सोच बदलनी होगी। सत्ता के लिए पुलिस का उपयोग भी बंद करना होगा। गाजीपुर में जो कुछ हुआ उसमें पुलिस को कोई गुनाह नहीं है। वहां पुलिस ने बेहद संयम बरता है।उसे अपनी आत्मरक्षा करने का पूरा अधिकार है। वह चाहती तो भीड़ पर पथराव के जबाब में फायरिंग कर सकती थी। उसके बाद की स्थिति क्या होती इसका जबाब निषाद पार्टी के लोगों के पास है। पता नहीं कितने बेगुनाह मारे जाते। पूरा विपक्ष सरकार पर अभी लामबंद है तब यह राष्टीय राजनीति का मसला बन जाता। पूरी यूपी पुलिस कटघरे में होती। संसद से लेकर सड़क तक राजनैतिक लामबंदी देखी जाती। क्योंकि सामने लोकसभा का आम चुनाव है।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चित रुप से यह प्रदर्शन भी निषाद पार्टी की तरफ से लोकसभा चुनावों को ध्यान में रख कर किया गया था। समय भी उचित चुना गया था क्योंकि उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गाजीपुर आ रहे थे। यह सब सरकार का ध्यान खींचने के लिए किया गया था। हम इसका समर्थन करते हंै यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार था। लेकिन अच्छी बात तब थी जब भीड़ ंिहंसक न होती। पुलिस वालों पर वेवजह पथराव न किए जाते। लोकतंत्र तभी संवृृद्ध और मजबूत बन सकता है जब हमारे अंदर वैचारिकता जिंदा होगी। हम हिंसा के जरिए किसी समस्या का समाधान नहीं निकाल सकते हैं। जरा सोचिए बुलंदशहर में माब लिंिचंग का शिकार हुए इंस्पेक्टर सुबोध सिंह हों या फिर गाजीपुर में सुरेश वत्स की मौत यह पूरे देश को शर्मसार करती है। हम सरकार या सत्ता से बाहर रख कर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकते हैं। जितनी अधिक सरकार की जिम्मेदारी है उससे कहीं अधिक विपक्ष की बनती है। क्या समाजवादी सरकार में इस तरह की घटनाएं नहीं हुई थी। सिर्फ वर्दी धारण करने भर से कोई व्यक्ति हिंसक और हिटलर नहीं बन जाता। वह हमारी संवैधानिक व्यवस्था का एक अंग होता है। उसका भी अपना परिवार और सपना होता है। जरा सोचिए अगर कोई अपना असमय हादसे का शिकार हो जाता है तो हमारी उम्मीद टूट जाती है। फिर सुबोध सिंह और सुरेश सिंह क्या इंसान नहीं थे। उनका अपने परिवार, बच्चों, मां-बाप और पत्नी के प्रति कोई दायित्व नहीं था। उनकी कोई उम्मीद और सपना नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में बढ़ती भीड़ की हिंसा ससंद और आम लोगों के साथ टीवी डिबेट का अहम शब्द बन गया है। सवाल उठता है कि इस तरह की हिंसा के पीछे कौन है? समय रहते हम उन्हें पहचान क्यों नहीं पाते। उकसावे की राजनीति के पीछे मकसद क्या होता है। सरकारों की बदनामी या और कुछ। सरकारों का दोष क्या कहा जा सकता है। लेकिन सरकारें अपनी जिम्मेदारी और से बच नहीं सकती। राज्य की योगी सरकार ने पीडि़त परिवार को 50 लाख की सरकारी सहायता और परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी के अलावा पेंशन का एलान किया है। सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती है। सवाल उठता है कि जब निषाद पार्टी ने प्रदर्शन की घोषणा कर रखी थी तो उस समय जिला प्रशासन का खुफिया विभाग क्या कर रहा था? प्रदर्शन इतना हिंसक होगा इसकी जानकारी उसे क्यों नहीं लगी? जबकि उस समय पीएम मोदी का दौरा था। इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषियों के लिखाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। प्रदर्शन के आयोजकों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। समाज, सत्ता, विपक्ष को पुलिस के प्रति नजरिया बदलना होगा।</p>
<h3 style="text-align:right;">प्रभुनाथ शुक्ल</h3>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Jan 2019 11:09:15 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>विशेष: अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[विश्वभर में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने व उनके योगदान को राष्ट्र निर्माण में सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में इस दिवस को मनाने की शुरूआत की थी। जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों के शिक्षा व संवैधानिक अधिकार का संरक्षण, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/protection-of-rights-of-minorities/article-7027"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/minorities-day.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्वभर में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने व उनके योगदान को राष्ट्र निर्माण में सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में इस दिवस को मनाने की शुरूआत की थी। जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों के शिक्षा व संवैधानिक अधिकार का संरक्षण, आर्थिक सशक्तिकरण, महिला सशक्तिकरण, समान अवसर, कानून के तहत सुरक्षा व संरक्षण, कीमती परिसम्पत्तियों की सुरक्षा व आयोजना प्रक्रिया में सहभागिता प्रदान करना था। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ ने अल्पसंख्यकों को एक वैश्विक परिभाषा के तहत परिभाषित भी किया, जिसके अनुसार, ‘किसी राष्ट्र या राज्य में रहने वाला ऐसा समुदाय जो संख्याबल में कम हों तथा जो सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक रूप से निर्बल हो एवं जिनकी भाषा, धर्म, जाति बहुसंख्यकों से भिन्न होने के बाद भी राष्ट्र के निर्माण, विकास, एकता, संस्कृति, परंपरा व भाषा को बनाये रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हों, ऐसे किसी भी समुदाय को राष्ट्र व राज्य में अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक होने का आधार धर्म और भाषा को माना गया है। भारत की कुल जनसंख्या का अनुमानत: 19 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदायों का है। इसमें मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी शामिल हैं। जैन, बहाई और यहूदी अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन इन्हें संबंधित संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। भारत सरकार ने अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 1978 में अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया था। इसे बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के तहत कानून के रूप में 1992 में पारित किया गया। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को वर्ष 2006 जनवरी में यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अधीन कर दिया। इसे वे सारे संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जो दीवानी अदालतों को हैं। इस आयोग का गठन भारत के लिए इसलिए भी महत्व रखता है, क्योंकि पूरे यूरोप के किसी भी राष्ट्र में ऐसा कोई आयोग नहीं है। आज भारत के कई अन्य राज्यों में भी राज्य अल्पसंख्यक आयोग हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों के विकास के लिए शैक्षिक अधिकार और उनकी भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत विशेष प्रावधान किए गए हैं। देश की प्रत्येक इकाई में रह रहे सभी अल्पसंख्यकों को उनकी भाषा, लिपि तथा संस्कृति के संरक्षण का अधिकार है तथा देश में ऐसे कोई भी कानून व नीतियां नहीं बनाई जाएंगी, जिनसे इन अल्पसंख्यकों की संस्कृति, भाषा व लिपि का शोषण हो। सभी धार्मिक, भाषायी व सामुदायिक अल्पसंख्यकों के साथ किसी भी राज्य शिक्षा संस्थान में भेदभाव नहीं किया जाएगा और न ही उन पर किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा थोपी जाएगी। सभी धार्मिक, भाषायी तथा सामुदायिक अल्पसंख्यक देश की प्रत्येक इकाई में अपनी इच्छानुसार कोई भी शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए स्वतंत्र हैं। किसी भी धार्मिक, भाषायी व सामुदायिक अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित शैक्षिक संस्थानों को राज्य द्वारा अनुदान प्रदान करने में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन, सवाल है कि अल्पसंख्यकों को इतने अधिकार और उनका संरक्षण उपलब्ध कराये जाने के बाद भी देश में यह समुदाय अशिक्षित व असक्षम रहकर अत्याचार झेलने को क्यों मजबूर है? आंकड़ों के अनुसार देश का हर चौथा भिखारी व सबसे अधिक अनपढ़ अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय ही है। अल्पसंख्यक समुदायों में मुसलमान 2.8 फीसदी, ईसाई 8.8 फीसदी और सिख 6.4 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। भारत में मुस्लिम समुदाय की कुल आबादी 14.23 फीसदी हैं व उनकी भिखारियों की आबादी में 24.9 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इसके अलावा सच्चर आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो चुकी है। केवल अल्पसंख्यकों को अधिकार उपलब्ध कराने से उनका कायाकल्प संभव नहीं है जब तक तयशुदा अधिकारों की अनुपालना नहीं होगी तब तक उनकी स्थिति में परिवर्तन आना मुश्किल है।<br />
आवश्यकता है कि भारत में जम्मू-कश्मीर, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, पंजाब और लक्षद्वीप में अल्पसंख्यक पर होने वाली लड़ाइयों का अंत करके इस शब्द को पुनर्परिभाषित कर देना अधिक बेहतर होगा ताकि अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक के विवाद को सुलझाकर वास्तविक अर्थों में सुनिश्चित होने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा हेतु अविलंब कदम उठाए जा सकें।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>देवेन्द्रराज सुथार</strong></p>
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                <pubDate>Tue, 18 Dec 2018 08:33:28 +0530</pubDate>
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                <title>जनता के अधिकारों की जीत</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित जंतर मंतर पर आंदोलनकारी, अब फिर पहले की तरह अपनी आवाज उठा सकेंगे। जंतर-मंतर और बोट क्लब पर धरना, प्रदर्शन पर लगी रोक को सर्वोच्च न्यायालय ने शर्तों के साथ हटाने का आदेश दिया है। हाल ही में इस मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि दिल्ली में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/public-rights-wins/article-5035"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/public-right.jpg" alt=""></a><br /><p>राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित जंतर मंतर पर आंदोलनकारी, अब फिर पहले की तरह अपनी आवाज उठा सकेंगे। जंतर-मंतर और बोट क्लब पर धरना, प्रदर्शन पर लगी रोक को सर्वोच्च न्यायालय ने शर्तों के साथ हटाने का आदेश दिया है। हाल ही में इस मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि दिल्ली में प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने कहा कि भारत जैसे गुंजायमान लोकतंत्र में ये अधिकार बेहद अहम हैं। ये अधिकार इसलिए भी अहम है, क्योंकि आम नागरिक अपने विरोध के जरिये सीधे अपनी बात सरकार तक पहुंचाते हैं और उनकी भागीदारी महसूस होती है।</p>
<p>अदालत ने अपना आदेश देते हुए इस बात को जरूर माना कि एनजीटी के फैसले में जो तर्क थे, वे सही हैं, लेकिन पूरी तरह से प्रदर्शन पर पाबंदी समस्या का समाधान नहीं है। जस्टिस ए.के. सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने आदेश में स्पष्ट तौर पर कहा कि धरने और प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार है। सरकार इसमें वाजिब पाबंदी भी लगा सकती है लेकिन इसमें संतुलन की जरूरत है। प्रदर्शन के अधिकार और शांतिपूर्ण जीवन जीने के लोगों के अधिकार के बीच संतुलन कायम करना होगा। धरना, प्रदर्शन इस तरह से हो कि आस-पास रहने वालों को कोई परेशानी न हो। अदालत ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे दो महीने के अंदर अन्य एजेंसी के साथ मिलकर इस संबंध में एक आदर्श आचारसंहिता और तंत्र तैयार करें, ताकि सीमित संख्या में होने वाले प्रदर्शन धरना आदि को नियंत्रित किया जा सके।</p>
<p>शीर्ष अदालत के इस फैसले से सबसे ज्यादा खुशी उन लोगों को हुई है, जो शांतिपूण ढंग से सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए राजधानी दिल्ली में इकट्ठा होते हैं। जंतर-मंतर और बोट क्लब पर धरना, प्रदर्शन की पाबंदी हटने से वाकई लोकतंत्र की जीत हुई है। अदालत के इस आदेश से लोगों की आवाज अब फिर से संसद तक पहुंच सकेगी। इस आवाज को कोई दबा नहीं सकेगा।पर्यावरण संबंधी नियमों का उल्लंघन और प्रदूषण का हवाला देते हुए पिछले साल अक्टूबर में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने सरकार को यहां के आयोजनों पर तुरंत रोक लगाने का आदेश दिया था। एनजीटी के इस आदेश के बाद दशकों से तरह-तरह के आंदोलनों के स्थल रहे जंतर मंतर पर सभी तरह के धरने-प्रदर्शन बंद हो गए।</p>
<p>एनजीटी के आदेश का सहारा लेते हुए दिल्ली पुलिस ने यहां स्थित सभी टेंटों को तोड़ दिया और आंदोलनकारियों से यह जगह खाली करा ली। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर पाबंदी के एनजीटी के इस आदेश को चुनौती दी पूर्व सैनिकों ने। वे इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में ले गए और अदालत से आदेश की समीक्षा करने को कहा। अदालत ने पहले तो दोनों पक्षों की बात गंभीरता से सुनी और उसके बाद एक ऐसा फैसला दिया, जिसमें दोनों पक्षों के मौलिक अधिकारों की हिफाजत हो रही है। इस आदेश से जहां पर्यावरण संबंधी नियमों का उल्लंघन और प्रदूषण नहीं होगा, तो वहीं आंदोलनकारियों के धरने-प्रदर्शन पर भी रोक नहीं लगेगी। जनसंघर्षों की अभिव्यक्ति का मंच बन गए जंतर मंतर पर रैलियों और प्रदर्शनों पर पाबंदी, निश्चित तौर पर उन लोगों के लिए निराशा का सबब थी, जो अपनी मांगे लोकतांत्रिक तरीके से सरकार के सामने उठाते रहे हैं।</p>
<p>यह ऐसा मंच था, जहां से उनकी आवाज संसद से लेकर पूरे देश में सुनाई देती थी। एक जमाना था जब राजपथ से सटे वोट क्लब पर रैलियां और प्रदर्शन हुआ करते थे। हाई कोर्ट के निर्देश के बाद साल 1993 में सरकार ने जंतर-मंतर को धरना स्थल के लिए सुनिश्चित किया। करीब पांच हजार लोगों की क्षमता वाला यह ऐतिहासिक स्थल तब से कई बड़े आंदोलनों का गवाह रहा है। चाहे निर्भया के सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या के विरोध का आंदोलन हो या फिर लोकपाल की मांग को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे का आंदोलन, गोया कि ये सभी बड़े आंदोलन यहीं परवान चढ़े और कई अपने मुकाम तक भी पहुंचे। जंतर मंतर देश भर के मजदूरों, किसानों, मानवाधिकार संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों के विरोध और असहमति का आंगन रहा है। यहां धरना-प्रदर्शन, आंदोलन कर वह अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाते हैं। बड़े विरोध-प्रदर्शनों के अलावा कई छोटे विरोध प्रदर्शन, धरने जंतर मंतर पर इस लिए चलते हैं कि सरकार उनकी मांगों पर सहानुभूति से विचार करे और इनका समाधान करे। देश भर से लोग यहां तभी आते हैं, जब कहीं उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। गर यह जगह भी उनसे छिन जाएगी, तो वह कहां से अपनी आवाज सरकार के कानों तक पहुंचाएंगे।</p>
<p>नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में जंतर मंतर पर एकत्रित होकर धरना देने पर भले ही रोक लगा दी थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान जैसी वैकल्पिक जगह पर स्थानांतरित करने का सरकार को निर्देश दिया था। एनजीटी ने लाउडस्पीकर की आवाज और वायु प्रदूषण को आधार बनाते हुए जगह बदलने का फैसला दिया था, पर नई जगह पर तो पुरानी जगह से भी ज्यादा लोग रहते हैं। जंतर मंतर के पास तो काफी कम रिहायशी इलाका है। जंतर मंतर से कहीं अधिक आबादी रामलीला मैदान के पास है। सड़कें बहुत अधिक चौड़ी नहीं है। मैदान के पास एक कॉलेज, दो अस्पताल, सिविक सेंटर और कुछ स्कूल चलते हैं। बड़ी रैलियों के समय रामलीला मैदान को आसपास के क्षेत्रों से पार्किंग शिफ्ट करने के साथ, ट्रैफिक को डायवर्ट करना पड़ता है। रोज प्रदर्शन होने की वजह से यहां ध्वनि प्रदूषण के साथ वायु प्रदूषण भी बढ़ रहा है। गाड़ियों के जाम लगने की भी समस्या है। यहीं नहीं जंतर मंतर के आसपास खाने, रहने, पेयजल, शौचालय और सफाई की अच्छी व्यवस्था है, लेकिन यह सब रामलीला ग्राउंड में नहीं है। सैद्धांतिक तौर पर एनजीटी का आदेश भले ही अच्छा था, पर व्यावहारिक तौर पर रामलीला मैदान में भी इस तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं।</p>
<p>सच बात तो यह है कि ध्वनि और वायु प्रदूषण राजधानी दिल्ली में हर जगह है। गंदगी और प्रदूषण को ही आधार बनाकर बोट क्लब पर होने वाली रैलियों, धरनों-प्रदर्शनों को प्रतिबंधित कर दिया गया था और उन्हें संसद के नजदीक जंतर मंतर रोड पर अस्थायी स्थल के तौर पर इजाजत दी गई थी। यही समस्या अब रामलीला मैदान के आसपास रहने वाले रहवासियों को आ रही है। वायु प्रदूषण कानून के हिसाब से तो यहां भी धरने-प्रदर्शन नहीं हो सकते। तर्कसंगत बात तो यह होती कि संबंधित प्राधिकरण अपनी जिम्मेदारियों का सही निर्वहन करते हुए धरने-प्रदर्शनों और रैलियों को व्यवस्थित करते। कोशिश करते कि जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन भी चलते रहें और वायु एवं ध्वनि प्रदूषण भी न हो। कमोबेश यही बात अब सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया आदेश में कही है। धरने-प्रदर्शनों और रैलियों को व्यवस्थित, नियंत्रित किया जाए, तो किसी को भी परेशानी नहीं आएगी। संबंधित अधिकारियों द्वारा अपनी जिम्मेदारी न निभाने के कारण जंतर-मंतर के लोग समस्याओं का सामना कर रहे थे। यदि वे अपनी जिम्मेदारियों का सही तरह से पालन करते, तो आज शीर्ष अदालत को इस आदेश देने की जरूरत ही नहीं पड़ती।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय का हालिया आदेश, जहां जन संघर्षों की हिफाजत करता है, वहीं जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के हक में भी है। इस आदेश से हमारे गौरवशाली लोकतंत्र और जनता के अधिकारों की जीत हुई है। अदालत ने लोगों का शांतिपूर्वक तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का उनका अधिकार, उन्हें दोबारा वापस दे दिया है। केंद्र की मोदी सरकार ने दिल्ली पुलिस का गलत इस्तेमाल करते हुए जंतर-मंतर में स्थायी तौर पर धारा 144 लगवा दी थी। जो कि एक लोकतांत्रिक देश में रहने वाले नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था। लोकतंत्र में जनता को और तमाम सामाजिक-राजनीतिक संगठनों को सत्ता के केंद्र के नजदीक जाकर अपनी आवाज उठाने और शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है और उनका यह अधिकार, उनसे कोई नहीं छीन सकता। जंतर-मंतर और वोट क्लब पर धरना, प्रदर्शन पर लगी रोक हर मायने में असंवैधानिक थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश से हटाकर देश के नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की है। जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:right;">जाहिद खान</p>
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                <pubDate>Sat, 28 Jul 2018 05:07:20 +0530</pubDate>
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                <title>बच्चों के अधिकार किसी दल की प्राथमिकता क्यों नहीं?</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बाल मजदूरी और अंधविश्वास बचपन के बैरी तो हैं ही साथ में कुबेर तंत्र बनती राजनीति भी बचपन के दुश्मन ही बन गए हैं, क्योंकि सरकारी नीतियां बचपन को बचाने और सही दिशा देने में नाकाफी साबित हो रहीं हैं। सड़कों पर घूमते बच्चे बदलते भारत की तस्वीर है, जिस […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-childrens-rights-are-not-the-priority-of-any-party/article-3488"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/child.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बाल मजदूरी और अंधविश्वास बचपन के बैरी तो हैं ही साथ में कुबेर तंत्र बनती राजनीति भी बचपन के दुश्मन ही बन गए हैं, क्योंकि सरकारी नीतियां बचपन को बचाने और सही दिशा देने में नाकाफी साबित हो रहीं हैं। सड़कों पर घूमते बच्चे बदलते भारत की तस्वीर है, जिस ओर एयरकंडीशन में बैठी हमारी लोकतांत्रिक राजशाही व्यवस्था शायद देखना नहीं चाहती।</p>
<p style="text-align:justify;">इनका अपना कोई ठिकाना भी नहीं होता, कभी कोई फुटपाथ जिन बच्चों का बिस्तर, फ्लाईओवर जिनका छत और किसी तरह भूख शांत करना जिनका दैनिक उद्देश्य होता है, उनकी तरफ शायद हमारी व्यवस्था ने कानून बनाने के बाद कभी झांकने की कोशिश की ही नहीं। यह बदलते देश का नया वर्तमान है? बिता लोकतांत्रिक भूतकाल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पढ़ने-लिखने की उम्र में कचरे के ढ़ेर से कचरा उठाते बच्चे, अखबार, फूल, कलम बेचते बच्चे, कलाबाजियां दिखाता भारत का भविष्य वर्तमान में कहीं भी दिख जाएगा। केवल पेट भरने के सिवाय अन्य जिम्मेदारियों से उनके माता-पिता भी मजबूरीवश पल्ला झाड़ लेते हैं, तो सरकारें भी अच्छे दिन बहुरने का वादा कर अपने सामाजिक कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में लगता यही है, क्या लोकतंत्र में इन बच्चों के लिए कोई जगह नहीं क्या। ऐसे में सवालों की फेहरिस्त फिर लंबी हो जाती है, क्योंकि दिमागी बुखार, निमोनिया, डायरिया और अन्य बीमारियों की वजह से आजादी के सत्तर साल बाद भी हर वर्ष सैकड़ों बच्चे मारे जाते हैं। लेकिन इन मौतों के बावजूद सरकारें सबक सीखने को तैयार नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में शायद नीति-नियंत्रणकर्ता ही इन प्रश्नों के उत्तर ढूढ़ने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि वोटबैंक की राजनीति के वे बच्चे हिस्सेदार नहीं होते। वरना शायद उनकी मलिन दशा और दिशा देखकर भारतीय राजनीति को शर्म आती, और उनके लिए भी कोई न कोई सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन होता। जैसा कि लैपटॉप, और मोबाइल रूपी लॉलीपॉप 10वीं और 12वीं के छात्रों के लिए बांटा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में गरीबी के कारण भी बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र की 2014 में आई रिपोर्ट के अनुसार विश्व के बेहद गरीब 120 करोड़ लोगों में से लगभग एक तिहाई बच्चे हमारे देश के हैं। यह आज की स्थिति है, फिर वर्तमान राजनीति से क्या उम्मीद की जाए। 1959 में बाल अधिकारों की घोषणा को स्वीकारने में लगभग पचास साल लग लगें।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पता चलता है, कि लोकतंत्र में सियासतदारों ने बच्चों के भविष्य और जीवन को कितना अहमियत दिया है। सड़क पर जीवन बिताने वाले बच्चों की संख्या मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दस लाख, तो वहीं गैर सरकारी संगठनों डॉन बॉस्को नैशनल फोरम और यंग एट रिस्क की ओर से देश के 16 शहरों में 2013 में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार महानगरों में सबसे ज्यादा बच्चे फुटपाथों पर रहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिनके अनुसार दिल्ली में सबसे ज्यादा 69976 बच्चे , मुंबई में 16059, कोलकाता में 8287 ,चेन्नई में 2374 और बेंगलूरु में 7523 बच्चे फुटपाथ पर रहते हैं। ये चंद उदाहरण हैं, यह स्थिति पूरे देश की शायद है ही नहीं। स्थितियां इससे बदत्तर होगी। बाल अधिकार के तहत जीवन का अधिकार, पहचान, भोजन, पोषण, स्वास्थ्य, और शिक्षा शामिल है। फिर जब देश के बच्चें सड़कों पर जीवन जीने को विवश हैं, फिर उन्हें क्या पहचान राजनीति दिला सकी, और फिर किस संवैधानिक स्वतंत्र और समानता की बात की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह बड़ा प्रश्न है। बच्चे तो आजादी से ही इन अधिकारों से वंचित दिखते हैं। क्या इनको अपने अधिकारों के हिस्से का 5 फीसद भी हक देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल्यों की बात करने वाली रहनुमाई व्यवस्था दिला पाई। बच्चा कोई भी हो, चाहे गरीब या अमीर। वह देश की अनमोल धरोहर होता है, जिसके कंधों पर ही देश का भविष्य अड़िग होता है, लेकिन अफसोस कि वास्तविक परिदृश्य में आजादी के सत्तर वर्षों में राजनीति ने इन बच्चों के लिए शायद शून्य बाटे सन्नाटा के बराबर ही काम कर सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">कहते हैं न, भूखे पेट भजन न हो गोपाला, जब देश से भुखमरी, और कुपोषण मिट ही नहीं रहा। फिर शिक्षा के अधिकार से क्या मिला, वह इस कहावत से समझा जा सकता है। हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे कर्तव्यों से मुख तो हमारा समाज भी मोड़ रहा है, वह इन बच्चों को रुपए एक की भीख देकर ही अपनी सामाजिक और नैतिक जिम्मेवारियों से छुटकारा पा लेता है, यह रवायत भी उचित नहीं। अब जब चुनावी धुन भले ही राज्य चुनावों की बज चुकी है, तो क्या राजनीति बच्चों के अधिकारों के बारे में बात करने की सार्थक पहल करेगी। यह देखने वाला विषय होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे बीते समय की राजनीति और नेशनल सेम्पल सर्वे की रिपार्ट देखकर लगता नहीं, कि राजनीति बच्चों के अधिकारों को लेकर सचेत होने वाली है, क्योंकि एक रिपोर्ट के मुताबिक दो तिहाई लोग पोषण के सामान्य मानक से कम खुराक प्राप्त कर पाते हैं। वहीं गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार कुपोषित और कम वजन के बच्चों की आबादी का लगभग 40 फीसद हिस्सा विश्व में भारत से ही आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जो बच्चों के अधिकारों की हवाई किला बनाने वाली व्यवस्था की नीतियों पर सवालिया प्रश्न खड़ी करती है, कि अगर बच्चों के भविष्य को सँवारने के लिए कदम उठाए जा रहें हैं, फिर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट को किस विकास के पैमाने से नापे। जिसके अनुसार झारखंड में पांच वर्ष तक के 47.8 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर खनिज संपदा से भरे प्रदेश की यह स्थिति है। ऐसे में अन्य प्रदेशों की हालत कितनी पतली होगी, इसका सहज आंकलन किया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे झारखंड में हैं। वहीं एक साल तक के बच्चों की मौत के मामले में उत्तर प्रदेश पूरे देश में पहले नंबर पर है। फिर बच्चों का भविष्य किस दल की प्राथमिकता में है, यह समझना कोई दूर की कौड़ी नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-लेखक महेश तिवारी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Nov 2017 04:09:19 +0530</pubDate>
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                <title>जीएसटी से महंगाई नहीं बढ़ेगी : जेटली</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/gst-will-not-increase-inflation-jaitley/article-1683"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/arun-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> वित्त मंत्री अरूण जेटली ने वस्तु एवं सेवा कर(जीएसटी) को लेकर किसी प्रकार की राजनीति नहीं किये जाने का आग्रह करते हुए कहा है कि इससे महंगाई नहीं बढ़ेगी और लोगों को आसान कर व्यवस्था का फायदा मिलेगा। जेटली ने मंगलवार को यहां एक टेलीविजन चैनल के कार्यक्रम में भाग लेते हुए लोगों की जीएसटी को लेकर उठायी जा रही सभी संकायों को दूर किया। उन्होंने कहा कि नई कर व्यवस्था से देश में 17 प्रकार के कर खत्म हो जायेंगे और सभी राज्यों में समान का एक दाम होगा। आजादी के बाद सबसे बड़े आर्थिक सुधार के रूप में देखा जा रहा जीएसटी एक जुलाई से लागू हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जीएसटी को ‘गेम चेंजर’ बताया है। जेटली ने कहा कि जीएसटी सबके योगदान और सहयोग के बाद लागू हो रहा है और इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। जीएसटी के लागू होने से महंगाई नहीं बढ़ेगी और देश और लोगों को आसान कर व्यवस्था का लाभ मिलेगा। इसके लागू होने से कच्चे बिल का खेल खत्म हो जाएगा। लघु और मध्यम उद्यमियों, कारोबारियों और मर्चेंट्स सबके लिए कर विवरणी भरना और आंकलन करना आसान होगा। इससे कारोबार मजबूत होने के साथ ही रोजगार सृजन में भी मदद मिलेगी। नोटबंदी से बैंकिंग तंत्र में कितना पैसा वापस आया, इसके आंकड़े देने में हो रही देरी के लिए वित्त मंत्री ने कहा कि रिजर्व बैंक को नोट गिनने की प्रक्रिया में ज्यादा समय लग रहा है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कर तय करने का अधिकार</h2>
<p style="text-align:justify;">लाखों-करोड़ रुपये के नोट गिनने में काफी समय लगता है। रिजर्व बैंक आधुनिक मशीनों और प्रक्रिया से नोटों की गिनती कर रहा है और जल्दी ही इसके अधिकारी आंकड़ा जारी कर दिया जाएगा। जेटली ने कहा कि नई कर व्यवस्था के लागू होने से अप्रत्यक्ष ही नहीं प्रत्यक्ष कर वसूली पर भी असर पड़ेगा। नई व्यवस्था में सबसे ऊंची दर 28 प्रतिशत कुछ चीजों पर ही कर लगेगी। पुरानी व्यवस्था में 31 से लेकर 33 प्रतिशत तक कर लगता था। जीएसटी परिषद ने वस्तुओं पर कर की क्या दर हो इस संबंध में मिले सुझावों के बाद व्यापक विचार-विमर्श के उपरांत ही एक-एक वस्तु के लिये स्लैब तय किये है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूरे देश में दरों पर सहमति बन गई है। सभी राज्यों और केन्द्र ने किस वस्तु पर कितना कर लगाया जाये यह मिलकर तय किया है। उन्होंने कहा कि अचल संपत्ति क्षेत्र पर जीएसटी का खासा असर होगा। देश में कालेधन के बड़े हिस्सा इसी क्षेत्र में लेन-देन होता है। जीएसटी परिषद इसके लिए अगले साल कोई प्रभावी तरीका निकालने पर काम कर रही है। राज्यों ने पेट्रोलियम उत्पाद और शराब के कर दरों को छोड़ने से इन्कार किया है जिसकी वजह से जीएसटी में इन पर कोई फैसला न हो पाया है। परिषद के पास आगे चलकर इनकी कर तय करने का अधिकार होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 27 Jun 2017 07:08:25 +0530</pubDate>
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                <title>सीमा के पास बढ़ी मदरसों की संख्या: बीएसएफ</title>
                                    <description><![CDATA[पढ़ाने के लिए आने वाले लोग इस राज्य के नहीं हमने पंजाब में तैनाती बढ़ाई: महानिदेशक जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने राजस्थान में पाकिस्तान की सीमा से लगे इलाकों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में तेजी से वृद्धि होने पर चिंता जताई है। बल के महानिदेशक केके शर्मा ने कहा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/number-of-madrasas-increased-near-the-border-bsf/article-1609"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/border1.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">पढ़ाने के लिए आने वाले लोग इस राज्य के नहीं</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>हमने पंजाब में तैनाती बढ़ाई: महानिदेशक</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (सच कहूँ न्यूज)।</strong> सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने राजस्थान में पाकिस्तान की सीमा से लगे इलाकों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में तेजी से वृद्धि होने पर चिंता जताई है। बल के महानिदेशक केके शर्मा ने कहा कि पिछले दस साल में अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों में मस्जिदों व मदरसों की संख्या में वृद्वि देखी गई है। इन स्थानों से जो संदेश आ रहे हैं वे शांति के नहीं है। उन्होंने कहा कि हमने पिछले दस साल में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में वृद्वि दर्ज की है लेकिन इन पर कार्रवाई करना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">शांति के संदेश नहीं आ रहे</h3>
<p style="text-align:justify;">हम स्थानीय प्रशासन को इस बारे में सूचना देते हैं क्योंकि इन स्थानों के निर्माण का नियमन राज्य सरकार करती है। उन्होंने कहा कि इन मदरसों में पढ़ाने के लिए आने वाले लोग और मौलवी इस राज्य के नहीं हैं, जिससे पता चलता है कि इन स्थानों से जो संदेश आ रहे हैं वे शांति के नहीं हैं। शर्मा ने कहा कि राजस्थान में सीमा पार से तस्करी पंजाब, जम्मू कश्मीर के मुकाबले कम है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान में सीमा शांतिपूर्ण है। शर्मा ने कहा कि हमने पंजाब में तैनाती बढ़ाई है इसलिए राजस्थान के श्रीगंगानगर में कुछ दबाव है और वहां भी हमने अपनी बल की तैनाती को मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि सीमा सुरक्षा बल सीमा की सुरक्षा को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में जुटा हुआ है। उन्होंने कहा कि सीमा सुरक्षा बल एक व्यापक समन्वित सीमा प्रबंधन प्रणाली जम्मू-कश्मीर में पायलट आधार पर लागू करने के बाद पाकिस्तान सीमा पर भी इसे लागू करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 25 Jun 2017 07:36:27 +0530</pubDate>
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