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                <title>greenery - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Greenery: हरियाली का विकास और विनाश</title>
                                    <description><![CDATA[Greenery: शिमला योजना को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए 11 अगस्त की तारीख तय की है। भले ही यह मामला विचारधीन है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई से पहले ही जो टिप्पणी की है वह वर्तमान संदर्भ में एक बहुत ही प्रासंगिक और तत्काल आवश्यकता की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/development-and-destruction-of-greenery/article-50629"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/greenery.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Greenery: शिमला योजना को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए 11 अगस्त की तारीख तय की है। भले ही यह मामला विचारधीन है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई से पहले ही जो टिप्पणी की है वह वर्तमान संदर्भ में एक बहुत ही प्रासंगिक और तत्काल आवश्यकता की ओर भी इशारा करती है। कोर्ट ने कहा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन आवश्यक है। मामला यह है कि शिमला योजना को लेकर एनजीटी ने 2017 में जो गाइडलाइन जारी की थी, वर्तमान हिमाचल सरकार जो योजना जारी कर रही थी, वह एनजीटी की गाइडलाइन के विपरीत थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मुद्दा यह है कि राज्य सरकार जिस प्रकार की योजना लागू करने का प्रयास कर रही है, उससे तय है कि हरियाली पर कुल्हाड़ी चलेगी। विकास परियोजना से पर्यावरण प्रभावित होना तय है। यहां एनजीटी की आपत्तियों को उचित समझना चाहिए। सत्ताधारी दलों के हित इसी बात में सुरक्षित हैं कि नए निर्माणों से विकास की छवि जनता के समक्ष पेश करें। वोट बैंक की लालसा में पर्यावरण को अनदेखा नहीं करना चाहिए। जहां तक ​​एनजीटी की समझ और दृष्टिकोण का प्रश्न है, यह सरकारी संस्था राजनीतिक पक्षपात से रहित है। एनजीटी भाजपा सरकार की योजना पर भी सवाल उठा चुका है और अब कांगे्रस सरकार के कार्य पर भी आपत्ति जताई है।</p>
<p style="text-align:justify;">गलत रणनीति के तहत होने वाले विकास कार्यों को रोकना एनजीटी का कार्य है, जिसे वह बिना स्वार्थ के कर भी रहा है। भ्रष्टाचार के कारण बिल्डर ऐसे नक्शों को पास करने में जल्दबाजी कर रहे हैं जहां पेड़ों, पहाड़ों, झीलों और झरनों की प्राकृतिक छटा और प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। अवैध खनन ने भूखंडों की सुंदरता और प्राकृतिक स्वरूप को बदल दिया है। कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतें बन चुकी हैं। केंद्र और राज्य में विभिन्न पार्टियों की सरकार होने के कारण और राजनीतिक एकजुटता की कमी के कारण अब तक कोई संयुक्त अभियान नहीं चल सका।</p>
<p style="text-align:justify;">पहाड़ों में होटलों का निर्माण हो गया हैं, होटलों की भीड़ में धार्मिक स्थल नजर नहीं आते। होटलों के साथ आधुनिक जीवन शैली ने धार्मिक संस्कृति को धुंधला कर दिया है। शायद इसी कारण मध्य प्रदेश की एक धार्मिक संस्था ने अपने एक मंदिर को विश्व विरासत का दर्जा देने से इनकार कर दिया है, क्योंकि वहां होटल बनने से धार्मिक संस्कृति को ठेस पहुंचने का खतरा था। जहां तक ​​शिमला योजना की बात है तो जंगलों, पहाड़ों, झीलों, नदियों को नुक्सान पहुंचाने वाली परियोजनाओं को रोकना जरूरी है क्योंकि पर्यावरण न केवल मानव जीवन है बल्कि संस्कृति का भी अभिन्न अंग भी है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="सरकारी स्कूलों के 50 हेडमास्टर प्रशिक्षण के लिए आईएमएम अहमदाबाद रवाना" href="http://10.0.0.122:1245/imm-leaves-for-ahmedabad-for-training-fifty-headmasters-of-government-schools/">सरकारी स्कूलों के 50 हेडमास्टर प्रशिक्षण के लिए आईएमएम अहमदाबाद रवाना</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Jul 2023 12:24:31 +0530</pubDate>
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                <title>पर्यावरण: घटती हरियाली, बढ़ता प्रदूषण</title>
                                    <description><![CDATA[देश की राजधानी दिल्ली में सरकार द्वारा हजारों पेड़ काटने की अनुमति प्रदान किए जाने को लेकर विवाद खड़ा होने के बाद अंतत: दिल्ली सरकार द्वारा यह तर्क देते हुए राजधानी में पेड़ काटने के सभी आदेश रद्द कर दिए गए हैं कि पेड़ काटने के नियमों के उल्लंघन का मामला सामने आया है। राष्ट्रीय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/environment-decreasing-greenery-increasing-pollution/article-5001"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/pollution.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की राजधानी दिल्ली में सरकार द्वारा हजारों पेड़ काटने की अनुमति प्रदान किए जाने को लेकर विवाद खड़ा होने के बाद अंतत: दिल्ली सरकार द्वारा यह तर्क देते हुए राजधानी में पेड़ काटने के सभी आदेश रद्द कर दिए गए हैं कि पेड़ काटने के नियमों के उल्लंघन का मामला सामने आया है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) द्वारा भी दक्षिणी दिल्ली की कालोनियों के पुनर्विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई पर अस्थायी रोक लगाई जा चुकी है तथा दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पेड़ों की कटाई पर रोक लगाते हुए सरकार से सवाल किए हैं कि क्षतिपूरक वनीकरण नीति के तहत लगाए जाने वाले 10 छोटे पौधे एक बड़े पेड़ की बराबरी कैसे कर सकते हैं? कड़ी फटकार लगाते हुए हाईकोर्ट द्वारा दो टूक शब्दों में कहा गया कि दक्षिणी दिल्ली की सरकारी आवासीय कालोनियों के पुनर्निर्माण के नाम पर 16500 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव इस शहर को मरने के लिए छोड़ देने जैसा है। वैसे सरकारी परियोजनाओं के तहत 3300 पेड़ अब तक काटे भी जा चुके हैं। कैग की एक रिपोर्ट पर नजर डालें तो दिल्ली पहले से ही करीब नौ लाख पेड़ों की कमी से जूझ रही है और दूसरी ओर शहरीकरण की कीमत पर सरकारी आदेशों पर साल दर साल हजारों हरे-भरे विशालकाय वृक्षों का सफाया किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले 5-6 वर्षों के दौरान दिल्ली में नए आवासीय परिसर, भूमिगत पार्किंग, व्यापारिक केन्द्र खोलने और मार्गों को चौड़ा करने के लिए करीब बावन हजार छायादार वृक्षों का अस्तित्व मिटाया जा चुका है और इन्हीं पांच वर्षों के प्रदूषण के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि इस दौरान हरियाली घटने से दिल्ली में वायु प्रदूषण करीब चार सौ फीसदी बढ़ा है। अब मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है, जलवायु संकट गहरा रहा है और इन पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने का एक ही उपाय है वृक्षों की अधिकता। वायु प्रदूषण हो या जल प्रदूषण अथवा भू-क्षरण, इन समस्याओं से केवल ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर ही निपटा जा सकता है लेकिन इसके बावजूद दिल्ली में प्रदूषण की भयावह स्थिति होने पर भी साढ़े सोलह हजार वृक्षों को काटने का निर्णय सरकारी नीतियों पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">संभवत: इसीलिए दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पेड़ काटे जाने की मंजूरी देने पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या दिल्ली इस हालत में है कि वो इतने वृक्षों का विनाश झेल लेगी और क्या आवासीय परियोजना के लिए राजधानी में हजारों पेड़ काटे जाने को देश बर्दाश्त करेगा? पिछले कुछ समय में पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई रिपोर्टों में स्पष्ट हो चुका है कि दिल्ली दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार है। हर साल दिल्ली में करीब पांच हजार लोग वायु प्रदूषण के कारण दम तोड़ देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इतनी बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाने की योजना के विरोध में स्वर बुलंद होने पर सरकारी एजेंसियों द्वारा तर्क दिया गया कि जितने पेड़ काटे जाने हैं, उसके बदले 10 गुना वृक्ष लगाए जाएंगे किन्तु वृक्षारोपण के मामले में सरकारी निष्क्रियता के मामले किसी से छिपे नहीं हैं। कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2015-17 के बीच दिल्ली में 13018 वृक्ष काटे गए थे और उसके बदले 65090 पौधे लगाए जाने थे किन्तु लगाए गए मात्र 21048 पौधे और इनमें भी बहुत सारे सजावटी पौधे लगाकर खानापूर्ति कर दी गई। मामला सामने आने पर शहरी विकास मंत्रालय द्वारा रटा-रटाया जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया गया कि मंत्रालय कम पेड़ लगाने के मामले की जांच कराएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मैट्रो निर्माण के दौरान भी हजारों पेड़ काटे गए थे किन्तु उसके बदले नए पौधे लगाने के दावों के बावजूद पौधे नहीं लगाए गए। वैसे भी पेड़ों को काटने के बदले जो पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से महज दस फीसदी ही बचे रह पाते हैं और ये छोटे-छोटे पौधे प्रदूषण से निपटने तथा वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने में मददगार साबित नहीं होते। इन पौधों को वृक्ष का रूप लेने में 8-10 साल लग जाते हैं और नीम, बरगद तथा पीपल जैसे वृक्षों को फलने-फूलने में तो 25-30 साल का समय लग जाता है, तब तक पर्यावरण के साथ क्या होगा? ऐसे में पहले से ही पर्यावरण प्रदूषण से बुरी तरह जूझ रही दिल्ली में हजारों छायादार पेड़ काटे जाने से आपातकालीन स्थिति पैदा हो सकती है। किसी भी क्षेत्र में वातावरण को शुद्ध बनाए रखने के लिए वहां वन क्षेत्र 33 फीसदी होना चाहिए किन्तु दिल्ली में यह सिर्फ 11.88 फीसदी है और दिल्ली से सटे इलाकों फरीदाबाद, नोएडा तथा गाजियाबाद की हालत तो बहुत बुरी है, जहां वन क्षेत्र क्रमश: 4.32, 2.43 तथा 1.89 फीसदी ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
ऊंचे और पुराने वृक्ष काटे जाने से दिल्ली में पक्षियों की 15 प्रजातियों का जीवन भी खतरे में है। दरअसल दिल्ली में स्पॉटेड आउलेट, कॉपरस्मिथ बारबेट, ब्राउन हेडेड बारबेट, अलेवजेंडर पैराकीट, रोडविंग पैराकीट, ग्रेटर प्लेनबैक वुडपैकर, ग्रे हॉर्नबिल, ब्लैक काइट, ब्लैक शोल्डर काइट, एशियन पैराडाइज फ्लाईकैचर इत्यादि पक्षियों की 15 प्रजातियां ऐसी हैं, जो ऊंचे दरख्तों पर घोंसला बनाते हैं और अपने खान-पान तथा रहन-सहन की आदतों के चलते ऊंचे पेड़ों पर ही रहना पसंद करते हैं, इनमें कुछ प्रजातियां दुर्लभ पक्षियों की भी हैं। ऐसे ऊंचे वृक्ष काटे जाने से इन पक्षियों का घर भी उजड़ता है और पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि ऊंचे दरख्तों की कमी की वजह से पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पक्षियों की कई प्रजातियां दिल्ली का रूख करने से कतराने लगी हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हाल ही में अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि दिल्ली कभी पक्षियों की आबादी को लेकर मशहूर हुआ करती थी किन्तु आज स्थिति विपरीत है, पेड़-पौधों व पक्षियों के लिए यहां जगह कम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
सुखद स्थिति यह है कि आम जन अब पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों के महत्व को लेकर जागरूक हुआ है और दिल्ली में भी उत्तराखण्ड के करीब पांच दशक पुराने चिपको आन्दोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपककर इन्हें जीवनदान देने के लिए आन्दोलन शुरू हुआ। हम इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि दिल्ली में यहां की आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से नौ लाख पेड़ों की कमी है और यहां स्वस्थ जीवन के लिए प्राणवायु अब बहुत कम बची है। स्वच्छ प्राणवायु के अभाव में लोग तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का संक्रमण, न्यूमोनिया, लकवा इत्यादि के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हम प्रकृति से अपने हिस्से की आॅक्सीजन तो ले लेते हैं किन्तु प्रकृति को उसके बदले में लौटाते कुछ भी नहीं। दरअसल एक पेड़ सालभर में लगभग सौ किलो आॅक्सीजन देता है जबकि एक व्यक्ति को वर्षभर में साढ़े सात सौ किलो आॅक्सीजन की जरूरत होती है। नीम, बरगद, पीपल जैसे बड़े छायादार वृक्ष, जो 50 साल या उससे ज्यादा पुराने हों, उनसे तो प्रतिदिन 140 किलो तक आॅक्सीजन मिलती है। इस हिसाब से अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि ऐसे छायादार पुराने वृक्ष काटने से पर्यावरण को कितनी भारी क्षति पहुंचती है और यही वजह है कि ऐसे छायादार वृक्ष अपने आसपास के परिवेश में लगाने की प्राचीन भारतीय परम्परा रही है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>योगेश कुमार गोयल</strong></p>
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<p> </p>
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                <pubDate>Wed, 25 Jul 2018 05:02:01 +0530</pubDate>
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                <title>बाढ़: प्राकृतिक आपदा में आदमी</title>
                                    <description><![CDATA[देश के ज्यादातर क्षेत्र में मानसून ने जोरदार दस्तक दे दी है, लेकिन कई इलाके बाढ़ में डूबने की त्रासदी झेल रहे हैं। इस कारण ऊंचे इलाकों में तो हरियाली दिख रही है, किंतु निचले क्षेत्रों में फसले चौपट हो गई हैं। असम के करीमगंज जिले में सुप्राकांधी गांव ने जल समाधि ले ली है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/flood-man-in-natural-disaster/article-2890"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/flood.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश के ज्यादातर क्षेत्र में मानसून ने जोरदार दस्तक दे दी है, लेकिन कई इलाके बाढ़ में डूबने की त्रासदी झेल रहे हैं। इस कारण ऊंचे इलाकों में तो हरियाली दिख रही है, किंतु निचले क्षेत्रों में फसले चौपट हो गई हैं। असम के करीमगंज जिले में सुप्राकांधी गांव ने जल समाधि ले ली है। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में 7 गैंडे समेत 90 वन्य प्राणी और 80 लोग अब तक मारे जा चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बाढ़ का संकट झेल रहे असम का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दौरा करना पड़ा है। राजस्थान और गुजरात का भी बुरा हाल है। जयपुर एवं उदयपुर समेत 23 जिले बाढ़ग्रस्त घोषित किए गए हैं। 64 लोग अमर्यादित लहरों ने लील लिए हैं। लोगों को बचाने के लिए सेना को बुलाना पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जालोर जिले की पथमेड़ा गोशाला में पानी भर जाने से 536 गायों की मौत हो गई। करीब 14 हजार कमजोर वृद्ध व बीमार नर गोवंश बाढ़ की चपेट में है। यहां केंद्रीय मंत्री स्मृती इरानी और मुख्यमंंत्री वसुंधरा राजे ने नौका से बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का जायजा लिया। प्रधानमंत्री के गृह प्रदेश गुजरात में और भी बुरा हाल है। यहां अब तक 218 लोग मारे जा चुके हैं। बनासकांठा जिला भी बाढ़ की चपेट में है। यहां एक परिवार के मकान में पानी भर जाने से 17 लोग काल के गाल में समा गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बाढ़ की कमोबेश यही तस्वीर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में है। बद्रीनाथ में भू-स्खलन जारी है। नदी-नाले उफान पर हैं। कई बड़े बांधों के भर जाने के बाद दरवाजे खोल देने से त्रासदी और भयावह हो गई है। घरों, सड़कों, बाजारों, खेतों और रेल पटरियों के डूब जाने से अरबों रुपए की संपत्ति नष्ट हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">बाढ़ की त्रासदी अब देश में नियमित हो गई है। जो जल जीवन के लिए जीवनदायी वरदान है, वही अभिशाप साबित हो रहा है। इन आपदाओं के बाद केंद्र और राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन पर अरबों रुपए खर्च करती हैं। करोड़ों रुपए बतौर मुआवजा देती हैं, बाबजूद आदमी है कि आपदा का संकट झेलते रहने को मजबूर बना हुआ है। बारिश का 90 प्रतिशत पानी तबाही मचाता हुआ अपना खेल खेलता हुआ समुद्र में समा जाता है। यह संपत्ति की बरबादी तो करता ही है, खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी बहाकर समुद्र में ले जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आफत की बारिश के चलते डूबने आने वाले अहमदाबाद, जयपुर, उदयपुर, बनासकांठा इत्यादि शहरों ने संकेत दिया है कि तकनीकी रूप से स्मार्ट सिटी बनाने से पहले शहरों में वर्षा जल की निकासी का समुचित ढांचा खड़ा करने की जरूरत है, लेकिन हमारे नीति नियंता हैं कि कुदरत के कठोर संकेतों से आंखें चुराने का काम कर रहे हैं। जबकि उत्तराखण्ड में देवभूमि और कश्मीर में हम तबाही देख चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस स्थिति से गुरूग्राम, चैन्नई, बैंग्लुरू और भोपाल भी गुजर चुके हैं। बावजूद इसके प्रलंयकारी बाढ़ की आशंकाओं को नजरअंदाज कर रहे हैं। बाढ़ की यह स्थिति शहरों में ही नहीं है, असम व बिहार जैसे वे राज्य भी झेल रहे हैं, जहां बाढ़ दशकों से आफत का पानी लाकर हजारों ग्रामों को डूबो देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आफत की यह बारिश इस बात की चेतावनी है कि हमारे नीति-नियंता, देश और समाज के जागरूक प्रतिनिधि के रूप में दूरदृष्टि से काम नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मसलों के परिप्रेक्ष्य में चिंतित नहीं हैं। 2008 में जलवायु परिवर्तन के अंतरसकारी समूह ने रिपोर्ट दी थी कि धरती पर बढ़ रहे तापमान के चलते भारत ही नहीं, दुनिया भर में वर्षाचक्र में बदलाव होने वाले हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसका सबसे ज्यादा असर महानगरों पर पड़ेगा। इस लिहाज से शहरों में जल-प्रबंधन व निकासी के असरकारी उपायों की जरूरत है। इस रिपोर्ट के मिलने के तत्काल बाद केंद्र की तत्कालीन संप्रग सरकार ने राज्य स्तर पर पर्यावरण सरंक्षण परियोजनाएं तैयार करने की हिदायत दी थी। लेकिन देश के किसी भी राज्य ने इस अहम् सलाह पर गौर नहीं किया। इसी का नतीजा है कि हम निरंतर जल त्रासदियां भुगतने को विवश हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यही नहीं शहरीकरण पर अंकुश लगाने की बजाय, ऐसे उपायों को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे उत्तरोतर शहरों की आबादी बढ़ती रहे। यदि यह सिलसिला इन त्रासदियों को भुगतने के बावजूद जारी रहता है, तो ध्यान रहे 2031 तक भारत की शहरी आबादी 20 करोड़ से बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगी। जो देश की कुल आबादी की 40 प्रतिशत होगी। ऐसे में शहरों की क्या नारकीय स्थिति बनेगी, इसकी कल्पना भी असंभव है?</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे, धरती के गर्म और ठंडी होते रहने का क्रम उसकी प्रकृति का हिस्सा है। इसका प्रभाव पूरे जैवमंडल पर पड़ता है, जिससे जैविक विविधता का आस्तित्व बना रहता है। लेकिन कुछ वर्षों से पृथ्वी के तापमान में वृद्घि की रफ्तार बहुत तेज हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे वायुमंडल का संतुलन बिगड़ रहा है। यह स्थिति प्रकृति में अतिरिक्त मानवीय दखल से पैदा हो रही है। इसलिए इस पर नियंत्रण संभव है। सयुंक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन समिति के वैज्ञानिकों ने तो यहां तक कहा था कि ‘तापमान में वृद्घि न केवल मौसम का मिजाज बदल रही है, बल्कि कीटनाशक दवाओं से निष्प्रभावी रहने वाले विषाणुओं-जीवाणुओं, गंभीर बीमारियों, सामाजिक संघर्षों और व्यक्तियों में मानसिक तनाव बढ़ाने का काम भी कर रही है। साफ है, जो लोग एक सप्ताह से ज्यादा दिनों तक बाढ़ का संकट झेलने को अभिशप्त हैं, वह जरूर संभावित तनाव की त्रासदी को भोग रहे होगें?</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, पर्यावरण के असंतुलन के कारण गर्मी, बारिश और ठंड का संतुलन भी बिगड़ता है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और कृषि की पैदावार व फसल की पौष्टिकता पर पड़ता है। यदि मौसम में आ रहे बदलाव से पांच साल के भीतर घटी प्राकृतिक आपदाओं और संक्रामक रोगों की पड़ताल की जाए तो वे हैरानी में डालने वाले हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तापमान में उतार-चढ़ाव से ‘हिट स्ट्रेस हाइपरथर्मिया‘ जैसी समस्याएं दिल व सांस संबंधी रोगों से मृत्युदर में इजाफा हो सकता है। पश्चिमी यूरोप में 2003 में दर्ज रिकॉर्ड उच्च तापमान से 70 हजार से अधिक मौतों का संबंध था। बढ़ते तापमान के कारण प्रदूषण में वृद्घि दमा का कारण है। दुनिया में करीब 30 करोड़ लोग इसी वजह से दमा के शिकार हैं। पूरे भारत में 5 करोड़ और अकेली दिल्ली में 9 लाख लोग दमा के मरीज हैं। अब बाढ़ प्रभावित समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दमा के मरीजों की और संख्या बढ़ना तय है।</p>
<p style="text-align:justify;">बाढ़ के दूषित जल से डायरिया व आंख के संक्रमण का खतरा बढ़ता है। भारत में डायरिया से हर साल करीब 18 लाख लोगों की मौत हो रही है। बाढ़ के समय रुके दूषित जल से डेंगू और मलेरिया के मच्छर पनपकर कहर ढाते हैं। तय है,बाढ़ थमने के बाद, बाढ़ प्रभावित शहरों को बहुआयामी संकटों का सामना करना होगा। बहरहाल जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबंध किया जाए कि उसका जल भराव नदियों और बांधों में हो, जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए कृषि आधारित देशज ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया जाए। क्योंकि ये आपदाएं स्पष्ट संकेत दे रही है कि अनियंत्रित शहरीकरण और कामचलाऊ तौर-तरीकों से समस्याएं घटने की बजाय बढ़ेंगी ही?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-प्रमोद भार्गव</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Aug 2017 22:44:48 +0530</pubDate>
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                <title>हरियाली के लिए महंगा साबित हो रहा है क्षेत्र का विकास</title>
                                    <description><![CDATA[भटिंड़ा-मुक्तसर सड़क के निर्माण के लिए तीन हजार वृक्षों पर कुल्हाड़ा भटिंडा (अशोक वर्मा)। भटिंडा क्षेत्र का विकास हरियाली के लिए महंगा साबित हो रहा है। क्योंकि चार चुफेरे बड़े स्तर पर वृक्षों की कटाई हो चुकी है। इसी क्रम में अब श्री मुक्तसर साहिब राष्ट्रीय मार्ग को चौड़ा करने के लिए तीन हजार के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/development-of-the-area-is-proving-expensive-for-greenery/article-1627"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/development.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">भटिंड़ा-मुक्तसर सड़क के निर्माण के लिए तीन हजार वृक्षों पर कुल्हाड़ा</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>भटिंडा (अशोक वर्मा)।</strong> भटिंडा क्षेत्र का विकास हरियाली के लिए महंगा साबित हो रहा है। क्योंकि चार चुफेरे बड़े स्तर पर वृक्षों की कटाई हो चुकी है। इसी क्रम में अब श्री मुक्तसर साहिब राष्ट्रीय मार्ग को चौड़ा करने के लिए तीन हजार के करीब वृक्षों पर कुल्हाड़ा चला दिया गया है। हालांकि यह आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता है, किन्तु अधिकारी इसे काफी कम बता रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेख्नीयहै कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल के वृक्ष न काटने के आदेशों पर पाबंदी के बाद 18 जून तक आवश्यक वृक्ष काटने की अनुमति दी गई थी। तय समय सीमा को देखते हुए सड़क पर लगे वृक्ष रातो रात काट दिए गए। भटिंडा क्षेत्र में सिर्फ यही सड़क बची थी, जिस पर हरियाली थी। वृक्ष काटने के बाद अब यह भी सफाचट दिखाई देने लगी है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">यातायात काफी बढ़ने के कारण हादसों की संख्या भी बढ़ने लगी थी</h2>
<p style="text-align:justify;">भटिंडा-श्री मुक्तसर साहिब सड़क को दो वर्ष पहले राष्ट्रीय मार्ग घोषित किया गया था। इसके बाद सड़क की चौड़ाई बढ़ाने की पेशकश तैयार की गई थी। सड़क पर यातायात काफी बढ़ने के कारण हादसों की संख्या भी बढ़ने लगी थी, जिसके मद्देनजर बादल सरकार द्वारा इस सड़क की दस मीटर तक चौड़ाई बढ़ाने का प्रोजेक्ट तैयार किया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रोजेक्ट पर तकरीबन 47 करोड़ रुपये की लागत का अनुमान लगाया गया था। इस राष्ट्रीय मार्ग की कुल लंबाई 51 किलोमीटर बनती है। भटिंडा जिले में इस मार्ग की लंबाई 16.5 किलोमीटर है, जबकि शेष भाग श्री मुक्तसर साहिब जिले के अधीन आता है। इस सड़क के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है। भटिंडा जिले में इस प्रोजेक्ट के नोडल अधिकारी एसडीओ प्रेम सिंह ने बताया कि भटिंडा साईड वाले 16.5 किलोमीटर में करीब 800 वृक्ष काटे गए हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">एसडीओ मनप्रीतम सिंह का दावा था कि उनके क्षेत्र में एक हजार वृक्षों की कटाई हुई</h2>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल की रोक खत्म होने के कारण जल्दी वृक्ष काटने पड़े हैं, क्योंकि सड़क के विकास का काम प्रभावित हो रहा था। इसी तरह ही श्री मुक्तसर साहिब से संबंधित एसडीओ मनप्रीतम सिंह का दावा था कि उनके क्षेत्र में एक हजार वृक्षों की कटाई हुई है। उन्होंने बताया कि इस सड़क का काम अगले तीन माह में मुकम्मल कर लिया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि यदि सड़क की चौड़ाई बढ़ानी है तो वृक्षों को काटना ही पड़ेगा। इससे पहले भी हजारों वृक्ष अखौती विकास की भेंट चढ़ चुके हैं। जानकार सूत्रों के मुताबिक भटिंडा जिले में सिर्फ सात हजार हैक्टेयर रकबा जंगल अधीन रह गया है, जोकि 1.89 फीसदी है। सरकारी नियमों के मुताबिक कुल क्षेत्रफल का 33 फीसदी रकबा हरियाली अधीन होना सही माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्णनीय है कि मालवे के दो अहम सड़क प्रोजेक्ट भटिंडा-जीरकपुर व भटिंडा अमृतसर सड़क को चहुमार्गी बनाने के लिए हजारों वृक्षों की बली दी गई है। इसी तरह अब भटिंडा शहर में बने ओवरब्रिजों के कारण वृक्ष काटने पड़े हैं। ताजा मामला भटिंडा-डबवाली सड़Þक पर रेलवे फ्लाईओवर के लिए वृक्षों की कटाई का है। भटिंडा-मलोट व भटिंडा-बादल सड़कों ने भी हरियाली को खोरा लगाया है। भटिंडा शहर में प्रमुख सड़कों के बीच से हरियाली को खत्म कर लोहे का डिवाइडर लगा दिया गया था।</p>
<h2 style="text-align:justify;">विकास के नाम पर विनाश नहीं होने चाहिए: नरूला</h2>
<p style="text-align:justify;">प्रदूषण को लेकर लोगों को जागरूक करने तथा शहर में तुलसी के पौधे वितरित करके पर्यावरण बचाओं मुहिम चला रहे भटिंडा विकास मंच के अध्यक्ष रकेश नरूल ने कहा कि विकास के नाम पर विनाश नहीं होना चाहिए। विकास इस ढंग से किया जाए कि कम से कम हरियाली प्रभावित हो। उन्होंने कहा कि गत पांच वर्षों दौरान भटिंडा में काफी वृक्षों को काटा गया है, जो कि मानवता के लिए घातक है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong><em>जो भी कटाई हो रही है, नियमों मुताबिक ही की जाती है। जितने वृक्ष काटे जाते हैं, उतने ही लगाए भी जाते हैं। </em></strong><br />
<strong><em>गुरपाल सिंह ढिल्लों डिवीजनल वन अधिकारी</em></strong></p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Jun 2017 01:02:24 +0530</pubDate>
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