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                <title>मुस्लिम बहुल देशों में फूट</title>
                                    <description><![CDATA[मलेशिया सम्मेलन से पाक और सऊदी अरब ने किया किनारा इस्लामाबाद (एजेंसी)। मुस्लिम (Muslim)बहुल देशों की एकजुटता को लेकर किए जा रहे दावों की कलई खुल गई है। पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में प्रमुख मुस्लिम देशों के सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। वहीं तुर्की ने सऊदी पर पाक के ऊपर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/disunity-in-muslim-majority-countries/article-11900"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/disunity-in-muslim-majority-countries.jpg" alt=""></a><br /><h2>मलेशिया सम्मेलन से पाक और सऊदी अरब ने किया किनारा</h2>
<p><strong>इस्लामाबाद (एजेंसी)।</strong> मुस्लिम <strong>(Muslim)</strong>बहुल देशों की एकजुटता को लेकर किए जा रहे दावों की कलई खुल गई है। पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में प्रमुख मुस्लिम देशों के सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। वहीं तुर्की ने सऊदी पर पाक के ऊपर दबाव बनाने का आरोप लगाया है। पाकिस्तान ने अपने निर्णय के पीछे ‘उम्माह’ में संभावित विभाजन की कुछ मुस्लिम देशों की चिंताओं को दूर करना बताया है। पाकिस्तानी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने ट्वीट में कहा कि पाकिस्तान उम्माह की एकता और एकजुटता में सहयोग जारी रखेगा।</p>
<h3>57 मुस्लिम देशों के संगठन से बताया बाहर Muslim</h3>
<p>सऊदी अरब ने कहा कि उसके नेता शिखर सम्मेलन में भाग नहीं ले रहे हैं। क्योंकि यह जेद्दा में स्थित मुस्लिम देशों के 57 सदस्यीय संगठन इस्लामिक सहयोग संगठन के तत्वावधान में नहीं बल्कि उसके बाहर आयोजित किया जा रहा है। पाकिस्तानी सेंट्रल बैंक ने इस साल जनवरी में सऊदी अरब से बैलेंस-आफ-पेमेंट सपोर्ट प्रोग्राम के हिस्से के रूप में अपना तीसरा और आखिरी एक अरब डॉलर का हिस्सा प्राप्त किया।</p>
<h3>खुद इमरान थे प्रस्तावकों में शामिल Muslim</h3>
<p>पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान, मलेशियाई प्रधानमंत्री और तुर्की के राष्ट्रपति के साथ शिखर सम्मेलन के पीछे प्रमुख प्रस्तावकों में शामिल थे। खान ने आखिरी क्षणों में इस सम्मेलन से अलग होने का निर्णय लिया। कुआलालंपुर में वीरवार से शुरू हुए चार दिवसीय सम्मेलन में इस्लामी दुनिया के कुछ ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा की जा रही है।</p>
<h3>तुर्की का दावा</h3>
<ul>
<li><strong>सऊदी अरब ने पाकिस्तान को थी चेतावनी </strong></li>
<li><strong>40 लाख पाकिस्तानियों को वापिस भेज देंगे</strong></li>
<li><strong>बेरोजगार बांग्लादेशियों को फिर से देंगे काम </strong></li>
<li><strong>अपने पैसे वापस भी मांगे वापिस</strong></li>
</ul>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Dec 2019 11:50:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आतंक पर मुस्लिम देशों का प्रहार</title>
                                    <description><![CDATA[अभी-अभी हुई आतंकवादी घटनाओं से मिस्त्र जरूर दहला पर उसने जो जवाबी कार्यवाही की उससे मिस्त्र की पूरी दुनिया में तारीफ हो रही है और यह बात मानी जा रही है कि आतंकवादियों के प्रति पूरी दुनिया मिस्त्र की तरह ही जवाबी कार्यवाही करे, आतंकवादियों और आतंकवादियों को संरक्षण देने वालों को दंड पात्र बनाये […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">अभी-अभी हुई आतंकवादी घटनाओं से मिस्त्र जरूर दहला पर उसने जो जवाबी कार्यवाही की उससे मिस्त्र की पूरी दुनिया में तारीफ हो रही है और यह बात मानी जा रही है कि आतंकवादियों के प्रति पूरी दुनिया मिस्त्र की तरह ही जवाबी कार्यवाही करे, आतंकवादियों और आतंकवादियों को संरक्षण देने वालों को दंड पात्र बनाये तो फिर मुस्लिम आतंकवाद का सामना किया जा सकता है, मुस्लिम आतंकवाद के जड़ में मटठा डाला जा सकता है। उल्लेखनीय है कि मिस्त्र के अंदर में जैसे ही आतंकवाद की बड़ी घटना घटी जिसमे लगभग एक दर्जन से अधिक वियतनामी पर्यटक मारे गये थे, वैसे ही मिस्त्र की सरकार ने पूरे क्षेत्र में तलाशी अभियान चलायी और खोज-खोज कर 40 अधिक आतंकवादियों, आतंकवादियों के संरक्षण देने वालों और आतंकवादियों के मजहबी गुरूओं को मार गिराया।</p>
<p style="text-align:justify;">खासकर आतंकवादियों को संरक्षण देने वाले और आतंकवादियों के मजहबी गुरूओं को भी मिस्त्र की पुलिस ने निशाना बनाया है। मिश्र की पुलिस ने अलग से बयान जारी कर कही है कि आतंकवादियों को संरक्षण देने वाले नागरिकों और आतंकवादियों को उपदेश देने वाले मजहबी गुरूओं का अपराध भी आतंकवादियों की श्रेणी में रखे जायेंगे और इसकी सजा भी मौत होगी। जानना यह भी जरूरी है कि मिस्त्र का पर्यटन मार्केट पूरी दुनिया में विख्यात है, दुनिया भर के पर्यटक मिस्त्र में आते हैं, मिस्त्र की अर्थव्यवस्था को एक बड़ा आधार पर्यटन बाजार देता है। पर मिस्त्र में मुस्लिम वदर हुड़ के बढ़ते प्रभाव और विभिन्न आतंकवादी संगठनों की आतंकवादी हिंसा के कारण मिस्त्र का पर्यटन बाजार भी प्रभावित हुआ है। दुनिया भर से मिस्त्र में आने वाले पर्यटक अब दूसरे देशों की ओर मुंह कर रहे हैं, यही कारण है कि मिस्त्र की पर्यटन अर्थव्यवस्था के उपर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। मिस्त्र कभी आधुनिक सोच वाला देश था पर मुस्लिम व्रदर हुड के प्रवेश के साथ ही साथ मिस्त्र में मजहबी कट्टरपंथ के हिंसक पंख लगे गये।</p>
<p style="text-align:justify;">सिर्फ मिस्त्र ही क्यों बल्कि अन्य मुस्लिम देश भी अब सचेत हो रहे हैं, आतंकवाद के खतरे को देख-समझ रहे हैं, आतंकवाद को आत्मघाती मान रहे हैं। दुनिया में कई ऐसे मुस्लिम देश हैं जो मुस्लिम आतंकवाद के प्रति वीरता दिखा रहहै, प्रति हिंसा को आधार बना कर मुस्लिम आतंकवाद को समाप्त करने का नया हथियार भी बनाया है। हम अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश का ही उदाहरण देख-समझ सकते थे। कभी बांग्लादेश भी कट्टरपंथ और आतंकवाद के आंकठ में डूबा हुआ था पर बांग्लादेश की सरकार ने मजहबी हिंसाओं के सामने हथियार नहीं डाले, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि बांग्लादेश ने कई आतंकवादी संगठनों के सरगनाओं को सरेआम फांसी पर लटका दिया, बांग्लादेश की सरकार ने यह नहीं सोची कि इससे उनका समर्थक वर्ग नाराज हो जायेगा या फिर कटटरपंथी समुदाय उनकी सत्ता को चाट जायेगा? पाकिस्तान का उदाहरण देख लीजिये। पाकिस्तान के अंदर भी दर्जनों लोगो को फांसी पर लटकाया जा चुका है जिन पर आतंकवादी घटनाओं के गंभीर आरोप थे। यद्यपि पाकिस्तान अभी भी दुनिया भर में आतंकवादियों की आउटसोर्सिग करता है फिर भी उसे अपने घर का आतंकवादी आत्मघाती लग रहे हैं, शांति के दुश्मन लग रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे बड़ा उदाहरण सउदी अरब का है। सउदी अरब कभी अपने आप को मुस्लिम देशों का नेता कहता था, सउदी अरब कभी इस्लाम के कट्टरपंथ का पैरवीकार था। दुनिया यह जानती है कि मुस्लिम कट्टरपंथ की हवा बहाने में सउदी अरब की कितनी बड़ी विनाशक भूमिका थी। अलकायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन सउदी अरब का ही नागरिक था। सउदी अरब का नागरिक ओसामा बिन लादेन अफगानिस्तान और पाकिस्तान जाकर हिंसक सरगना बन गया था, ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका पर हमला करा कर पांच हजार से अधिक लोगों को मार डाला था। बाद में अमेरिका ने पाकिस्तान के अंदर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। एक समय वह भी था जब मुस्लिम दृष्टिकोण पर सउदी अरब आंख मुंद कर पाकिस्तान का समर्थन करता था। जब आतंकवाद खुद सउदी अरब के लिए आत्मघाती साबित होने लगा, आतंकवाद जब शांति का दुश्मन बन बैठा तब सउदी अरब के शासकों की नींद टूटी, सउदी अरब की तरक्की खतरे में पड़ गयी, सउदी अरब ने अनेकानेक आतंकवादियों को फांसी पर लटका दिया।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>विष्णुगुप्त</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/attack-of-muslim-countries-on-terror/article-7169</link>
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                <pubDate>Wed, 02 Jan 2019 13:53:19 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>मानवीय योजनाओं की बजाए विकसित देशों का हथियार बनाने पर जोर</title>
                                    <description><![CDATA[मेरिका व रूस सहित विश्व के कुछ अन्य देश हथियारों की फैक्ट्री बन चुके हैं भले युद्ध व आतंकवाद से लड़ने के लिए हथियार जरूरी हैं लेकिन विकसित देशों के लिए जब हथियार आय का स्त्रोत बन जाएं तो विकासशील व गरीब देशों के लिए नई मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। अमेरिका व रूस सहित […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/emphasis-on-the-creation-of-weapons-of-developed-countries/article-6150"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/s-400-2.jpg" alt=""></a><br /><h2>मेरिका व रूस सहित विश्व के कुछ अन्य देश हथियारों की फैक्ट्री बन चुके हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">भले युद्ध व आतंकवाद से लड़ने के लिए हथियार जरूरी हैं लेकिन विकसित देशों के लिए जब हथियार आय का स्त्रोत बन जाएं तो विकासशील व गरीब देशों के लिए नई मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। अमेरिका व रूस सहित विश्व के कुछ अन्य देश हथियारों की फैक्ट्री बन चुके हैं जिनकी जीडीपी में हथियारों का बड़ा योगदान है। ताजा मामले में भारत ने रूस के साथ करीब 40,000 करोड़ के मिसाईल का सौदा किया है। इससे पहले ऐसे कई समझौते अमेरिका, फ्रांस व इज्रराइल के साथ किए हैं।हथियार भारत की जरूरत है। पाकिस्तान व चीन जैसे पड़ोसियों के मंसूबों को देखते हुए भारत हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता लेकिन भारत सहित अन्य देशों के आपसी टकराव ही विकसित देशों की आय बन गए हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">विकसित देशों ने खुद बना रखे हैं गुट</h2>
<p style="text-align:justify;">बेहद दुख की बात है कि जिस संस्था (संयुक्त राष्ट्र) का निर्माण ही दो विश्व युद्धों की बर्बादी को न दोहराने के लिए किया गया था उसी संस्था के सदस्य देश (अमेरिका, चीन, रूस व फ्रांस) हथियारों की फैक्टरियों को लगातार चला ही नहीं रहे बल्कि जो विकासशील देश हथियार खरीदने में देरी करते हैं उन पर शिकंसा भी कस देते हैं। इन आर्थिक नीतियों को देखते हुए आतंकवाद की कार्रवाईयां खेल प्रतीत होने लगी हैं। विकसित देशों ने खुद गुट बना रखे हैं और अपने-अपने साथी विकासशील देशों के साथ मित्रता के नाम पर अरबों के हथियार बेचे जा रहे हैं। विकासशील देशों का जितना पैसा हथियारों की खरीद में बह रहा है, उतने पैसे से उनके झुग्गियों में बसने वाले करोड़ों लोगों को शानदार घर बनाकर दिए जा सकते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, अनपढ़ता जैसी समस्याएं तो नजर भी नहीं आएंगी।</p>
<h2>नए-नए हथियारों का अविष्कार करने की बजाय कैंसर व अन्य भयानक बीमारियों को रोकने पर हो फोकस</h2>
<p>विश्व को केवल सुरक्षा की जरूरत नहीं बल्कि स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों, लैबोरेट्री, अस्पतालों, आधुनिक ट्रेनों व हवाई सेवाओं की आवश्यकता है। हथियारों की खरीद में प्रयोग किए जाने वाला पैसा भलाई कार्यों में इस्तेमाल किया जाए तो विश्व का नक्शा ही बदल जाएगा। परमाणु हथियारों का खात्मा करने के लिए विकसित देश पहल कर रहे हैं लेकिन लड़ाकू जहाज, मिसाइलों पर हो रहा खर्च आर्थिक बर्बादी ला रहे हैं। इस बर्बादी से आंखें नहीं फेरी जानी चाहिए। खुशहाल विश्व का सपना पूरा करना है तब केवल नए-नए हथियारों का अविष्कार करने की बजाय कैंसर व अन्य भयानक बीमारियों को रोकने के लिए खर्च करने की आवश्यकता है। युद्ध की बर्बादी कब होती है यह तो भविष्य की बात है लेकिन कैंसर जैसी बीमारियां हजारों जिंदगीयां लील रही हंै। विकसित देशों को नागरिक मुद्दों ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।</p>
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                <pubDate>Sat, 06 Oct 2018 09:29:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>विदेशों में ही क्यों बढ़ रही है हिन्दी की ताकत</title>
                                    <description><![CDATA[भारत एक है, संविधान एक है। लोकसभा एक है। सेना एक है। मुद्रा एक है। राष्ट्रीय ध्वज एक है। लेकिन इन सबके अतिरिक्त बहुत कुछ और है जो भी एक होना चाहिए। बात चाहे राष्ट्र भाषा हो या राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत- इन सबको भी समूचे राष्ट्र में सम्मान एवं स्वीकार्यता मिलनी चाहिए। राष्ट्र […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-is-the-power-of-hindi-growing-in-foreign-countries/article-5409"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/unnamed-file.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत एक है, संविधान एक है। लोकसभा एक है। सेना एक है। मुद्रा एक है। राष्ट्रीय ध्वज एक है। लेकिन इन सबके अतिरिक्त बहुत कुछ और है जो भी एक होना चाहिए। बात चाहे राष्ट्र भाषा हो या राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत- इन सबको भी समूचे राष्ट्र में सम्मान एवं स्वीकार्यता मिलनी चाहिए। राष्ट्र भाषा हिन्दी को आजादी के 72वर्ष बीत जाने पर भी अपने ही देश में घोर उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, जो राष्ट्रीय शर्म का विषय है, जबकि विश्व में हिन्दी की ताकत बढ़ रही है, जिसका ताजा प्रमाण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) द्वारा हिन्दी में ट्वीटर सेवा शुरू करना। देश के सम्मान में उस समय और अधिक इजाफा हुआ जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने ट्विटर पर हिंदी में अपना अकाउंट बनाया और हिंदी भाषा में ही पहला ट्वीट किया। पहले ट्वीट में लिखा संदेश पढ़कर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने फेसबुक पर भी हिंदी पेज बनाया है। साथ ही साथ साप्ताहिक हिन्दी समाचार भी सुने जा सकेंगे। भारत सरकार के प्रयत्नों से हिन्दी को विश्वस्तर पर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है, यह सराहनीय बात है। लेकिन भारत में उसकी उपेक्षा कब तक होती रहेगी?</p>
<p style="text-align:justify;">मॉरिशस में होने वाले 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में गोस्वामी तुलसीदास, महानकवि अभिमन्यु अनंत व गोपालदास के नाम पर सभागार बनाए गए हैं। विदेशमंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के इस कथन से एक नया विश्वास जगा है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी को मान्यता दिलाने के सरकार के प्रयास सफल होते दिखाई पड़ रहे हैं। आने वाले समय में विदेश मंत्रालय दुनिया भर में और खासकर गिरमिटिया देशों में हिंदी को बचाने के लिए और भी कदम उठाएगा। नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 से लेकर भोपाल में आयोजित 2015 के सम्मेलन तक बार-बार यह प्रश्न खड़ा होता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी कब अधिकारिक भाषा बनेगी। इसके लिये सबसे बड़ी बाधा 193 देशों के दो तिहाई सदस्य देशों की सहमति-समर्थन नहीं है बल्कि इन सभी देशों को इस पर होने वाले खर्च की है। इसी बाधा की वजह से जर्मनी और जापान की भाषा भी वह स्थान हासिल नहीं कर पाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे पहले 1977 में हिंदी में भाषण दिया था अटल बिहारी बाजपेयी ने। उस वक्त वे जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री थे और यूएन में भारत की अगुवाई कर रहे थे। संयुक्त राष्ट्र में किसी भी भारतीय के पहले हिंदी भाषण का पूरे देश में जोरदार स्वागत हुआ था। उनके भाषण की जगह-जगह चर्चा होती थी। इसके बाद उन्होंने सन 2002 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दोबारा इस अंतरराष्ट्रीय मंच से हिंदी में अपनी बात रखी थी। लेकिन प्रश्न यह है कि दोनों ही सक्षम नेताओं ने हिन्दी को अपने ही देश में क्यों उपेक्षित रहने दिया। क्या कारण है कि आजादी के 70 साल बाद भी सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं, यह देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय प्रतीकों की उपेक्षा एक ऐसा प्रदूषण है, एक ऐसा अंधेरा है जिससे ठीक उसी प्रकार लड़ना होगा जैसे एक नन्हा-सा दीपक गहन अंधेरे से लड़ता है। छोटी औकात, पर अंधेरे को पास नहीं आने देता। राष्ट्र-भाषा को लेकर छाए धूंध को मिटाने के लिये कुछ ऐसे ही ठोस कदम उठाने ही होंगे। विकास की उपलब्धियों से हम ताकतवर बन सकते हैं, महान नहीं। महान् उस दिन बनेंगे जिस दिन राष्ट्र भाषा, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्र-गान एवं राष्ट्र-गीत को उचित स्थान एवं सम्मान देंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">कितने दुख की बात है कि आजादी के 70 साल बाद भी हमारे दूर-दराज के जिलों में राज्य सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं। हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है। भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का अभिनव कार्य किया है। लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। भारत और अन्य देशों में 70 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी हिंदी बोलती व समझती है। किसी भी देश की भाषा और संस्कृति किसी भी देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। भाषा राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा प्रगति के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है।</p>
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                <pubDate>Thu, 16 Aug 2018 21:17:06 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी सरकार में पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंधों में भी आयी खटास : कांग्रेस</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली (वार्ता) विदेश नीति का कांग्रेस मॉडल सबसे बेहतर है लेकिन मोदी सरकार ने इसे नजरअंदाज किया है जिससे कई राष्ट्रों के साथ हमारी मित्रता कमजोर पडी है और नेपाल तथा भूटान जैसे पडोसियों के साथ भी संबंधों में खटास आयी है! कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने 84वें महा अधिवेशन में विदेश नीति के प्रस्ताव […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/modi-government-also-came-in-relations-with-neighboring-countries-congress/article-3591"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/congress.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली (वार्ता) </strong>विदेश नीति का कांग्रेस मॉडल सबसे बेहतर है लेकिन मोदी सरकार ने इसे नजरअंदाज किया है जिससे कई राष्ट्रों के साथ हमारी मित्रता कमजोर पडी है और नेपाल तथा भूटान जैसे पडोसियों के साथ भी संबंधों में खटास आयी है! कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने 84वें महा अधिवेशन में विदेश नीति के प्रस्ताव पर हुई चर्चा के दौरान यह बात कहते हुए आरोप लगाया कि मोदी सरकार की अपनी कोई विदेश नीति नहीं है और उसने कांग्रेस सरकारों द्वारा स्थापित महत्वपूर्ण विदेश नीति को भी चौपट कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश नीति संबंधी प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद इस पर हुई चर्चा में हिस्सा लेते हुए पार्टी के युवा नेता गौर गोगोई ने कहा कि नेपाल, भूटान, बंगलादेश, मालदीव, श्रीलंका आदि के साथ हमारे पहले से बहुत अच्छे संबंध रहे हैं लेकिन मोदी सरकार में इन संबंधों में खटास आयी है और पहले जैसे मधुरता नहीं रही है। उन्होंने कांग्रेस मॉडल की विदेश नीति को सबसे बेहतर करार दिया और आहवान किया कि इसे ही आगे बढाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि देश और दुनिया बदल रही है इसलिए बदले परिवेश में हमें भी बदलने की जरूरत है और ग्लोबलाइजेशन की जगह अब प्रोफेसनलाइजेशन को महत्व दिया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">पार्टी के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला ने कहा कि निर्गुट आंदोलन कांग्रेस की देन है और पंडित नेहरू जब बोलते थे तो दुनिया उनको सुनने के लिए उत्सुक रहती थी। मोदी सरकार पाकिस्तान को लेकर बड़े दावे करती है और सर्जिकल स्ट्राइक को बडी और पहली उपलब्धि बताती रही है लेकिन जब सेना प्रमुख ने कहा ऐसे काम पहले भी हुए तो सरकार के तेवर कुछ हल्के पडे। यह सरकार सिर्फ प्रचार पर भरोसा करती है और विदेश नीति में उसी का इस्तेमाल करती है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 18 Mar 2018 04:08:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>देशों के बीच बढ़ता बाड़ाबंदी का चलन</title>
                                    <description><![CDATA[संचार क्रान्ति और सहज आवागमन के चलते ज्यों-ज्यों दुनिया के देश एक-दूसरे के नजदीक आने लगे हैं, त्यों-त्यों दुनिया के देशों के बीच नफरत की दीवारें भी अधिक खड़ी होने लगी है। 1989 में बर्लिन की दीवार टूटने को सारी दुनिया के देशों ने शुभ संकेत के रुप में देखा और यह आशा बंधने लगी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/increasing-hatred-between-countries/article-3041"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/protest-6.jpg" alt=""></a><br /><p>संचार क्रान्ति और सहज आवागमन के चलते ज्यों-ज्यों दुनिया के देश एक-दूसरे के नजदीक आने लगे हैं, त्यों-त्यों दुनिया के देशों के बीच नफरत की दीवारें भी अधिक खड़ी होने लगी है। 1989 में बर्लिन की दीवार टूटने को सारी दुनिया के देशों ने शुभ संकेत के रुप में देखा और यह आशा बंधने लगी कि कोरिया आदि देश भी देर-सवेर एक हो जाएंगे। सपना तो आज भी भारत-पाक के एक होने के देखते रहे हैं, पर दुनिया के देशों के बीच मतभेद दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। आशा यह थी कि भूमण्डलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण और सूचना क्रान्ति एक-दूसरे को जोड़ने और अधिक नजदीक लाने में सहायक होंगे, परस्पर मतभेद कम होंगे, पर ठीक विपरीत आज आतंकवाद, अलगाववाद, सीमा विवाद, सत्ता संघर्ष कम होने के स्थान पर अधिक बढ़ा हैं।</p>
<p>जहां एक क्लिक पर दुनिया के किसी भी देश के बारे में ताजा तरीन जानकारी मिल सकती है, त्वरित जानकारी से सुख-दु:ख में भागीदार बन सकते हैं, वहीं तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी हो गया है कि आज दुनिया के देशों के बीच 60 दीवारें खड़ी हो गई है। अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मेक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के आदेश और यूरोपीय देशों के बीच दीवारों की तैयारियां सोचने को मजबूर कर देती है। अतिआधुनिक, प्रगतिशील होने, शिक्षा के अत्यधिक विस्तार और मानवतावादी होने का बाना पहनने के बावजूद आतंकवाद, पलायन और सीमा संघर्षों के चलते देशोें की सीमाओं पर बाड़ाबंदी चल पड़ी है। देशों में आतंकवादी गतिविधियां तेज हुई है।</p>
<p>1989 में बर्लिन की दीवार टूटने के बाद दुनिया के देशों के बीच 10 दीवारें रह गई थी, पर पिछले दिनों ही क्यूबेक यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि आज दुनिया के देशों के बीच दीवारों या बाड़ाबंदी की संख्या बढ़कर 60 हो गई है। जहां देशों के बीच नफरत और अलगाव की दीवारें कम होनी चाहिए थी, वहीं देशों के सीमाओं पर खिंचती दीवारें कुछ और ही कह रही है। हालांकि इसका सबसे दुर्भाग्यजनक और निराशाजनक पहलू शरणार्थी समस्या और शरणार्थियों द्वारा शरण देने वाले देश में असामाजिक गतिविधियों में लिप्त होने से देखा जा रहा है। इसके अलावा क्षणिक लाभ के लिए पाकिस्तान सहित कई देश अलगाववादियों के शिविर चलाकर प्रशिक्षित करने और दूसरे देश में अलगाववादी गतिविधियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से प्रायोजित कर अशांति का माहौल बनाया जा रहा है। आईएस व अन्य अतिवादियों के कारण भी स्थितियां खराब हुई है।</p>
<p>फ्रांस में शरणार्थियों के कारण आंतरिक आतंकवादी गतिविधियों के चलते दीवार बनाने का निर्णय करना पड़ा, फ्रांस द्वारा दीवार का निर्माण, हंगरी द्वारा सर्बिया क्रोएशिया सीमा पर दीवार, बुल्गारिया द्वारा तुर्की सीमा पर शरणार्थियों को रोकने के लिए दीवार, युनान द्वारा तुर्की सीमा पर शरणार्थियों के प्रवेश को रोकने के लिए दीवार बनाने का निर्णय लिया गया। इसी तरह से घुसपैट के चलते भारत पाक सीमा पर दीवार व बाड़, इजराइल फलस्तीन सीमा पर दीवार, सउदी अरब और इराक के बीच दीवार बाड़ बनाकर आईएस गतिविधियों को रोकना, उत्तर दक्षिण कोरिया के बीच दीवार जग जाहिर है। भारत बांग्लादेश सीमा पर बाड़ आदि सहित दुनिया के देशों द्वारा दीवार या बाड़बंदी को विकल्प के रुप में लिया जा रहा है। हांलाकि अमेरिका -मैक्सिको के बीच बन रही 3200 किमी दीवार को दुनिया की सबसे बड़ी दीवार माना जा रहा है। भारत द्वारा भी बांग्लादेश सीमा पर 2700 किमी बाड़ घुसपैठ को रोकने की बनाई गई है वहीं भारत पाक सीमा पर 750 किमी लंबी बाड़ है।</p>
<p>एक-दूसरे के पडोसी देश होने के नाते विवादों का आपसी समझ से हल खोजने की जगह कंकरीट की दीवारों या लोहे की बाड़ से रोकने का तरीका किसी भी प्रकार से उचित नहीं हो सकता। पर ज्यों ज्यों हथियारों का व्यापार बढ़ता जाएगा, हथियार उत्पादक देश आपसी मतभेदों को बढ़ावा देते हुए अपने कारोबारी हित साधते रहेंगे। दुनिया के देशों को नफरत की दीवार की जगह प्रेम का व्यवहार अपनाना होगा, तभी सही मायनें में दुनिया प्रगतिशील, मानवतावादी बन सकेगी।</p>
<p><em><strong>-डॉ़ राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong></em></p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Fri, 11 Aug 2017 03:20:43 +0530</pubDate>
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                <title>दूसरे देशों में बसने की योजना बनाने वाले वयस्कों में भारत दूसरे नंबर पर</title>
                                    <description><![CDATA[ 35 लाख लोग बना रहे प्रवास करने की योजना संयुक्त राष्ट्र। भारत के लिए खतरे की घंटी है। भारत उन देशों में दूसरे नंबर पर है जहां वयस्क दूसरे देशों में बसने की योजना बना रहे हैं और अमेरिका तथा ब्रिटेन उनके पसंदीदा देश हैं। इन लोगों में ज्यादातर पुरूष, युवा, अविवाहित, ग्रामीण इलाकों में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/india-on-second-number-of-adults-planning-to-settle-in-other-countries/article-2288"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/india-3.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;"> 35 लाख लोग बना रहे प्रवास करने की योजना</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>संयुक्त राष्ट्र।</strong> भारत के लिए खतरे की घंटी है। भारत उन देशों में दूसरे नंबर पर है जहां वयस्क दूसरे देशों में बसने की योजना बना रहे हैं और अमेरिका तथा ब्रिटेन उनके पसंदीदा देश हैं। इन लोगों में ज्यादातर पुरूष, युवा, अविवाहित, ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हैं और माध्यमिक शिक्षा कर चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र की प्रवासन एजेंसी अंतरराष्ट्रीय प्रवास संगठन (आईओएम) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि दुनियाभर में वयस्क आबादी के 1.3 फीसदी या छह करोड़ 60 लाख लोगों ने कहा कि वे अगले 12 महीनों में स्थाई तौर पर प्रवास करने की योजना बना रहे हैं। रिपोर्ट में 2010-2015 अवधि के लिए दुनियाभर में लोगों के प्रवास करने के इरादों का विश्लेषण किया गया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> 13 लाख लोग हैं विदेश जाने की तैयारी में</h3>
<p style="text-align:justify;">दूसरे देशों में बसने की योजना बनाने वाले लोगों में अमेरिका के बाद सबसे लोकप्रिय देश हैं ब्रिटेन, सउदी अरब, फ्रांस, कनाडा, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका। प्रवास करने की योजना बनाने वालों में से आधे लोग सिर्फ 20 देशों में रहते हैं जिसमें पहले नबंर पर नाइजीरिया और दूसरे नंबर पर भारत है। इसके बाद कांगो, सूडान, बांग्लादेश और चीन का नंबर आता है। 48 लाख लोगों के साथ भारत में सबसे अधिक 35 लाख लोग प्रवास करने की योजना बना रहे हैं और 13 लाख लोग तैयारी कर रहे हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">नाइजीरिया में भी 51 लाख लोग हैं तैयार</h3>
<p style="text-align:justify;">नाइजीरिया में सबसे अधिक 51 लाख लोग अपने देश से बाहर बसने की योजना बना रहे हैं। इसके बाद 41 लाख लोगों के साथ कांगो और 27-27 लाख लोगों के साथ चीन तथा बांग्लादेश का नंबर आता है। पश्चिम अफ्रीका, दक्षिण एशिया और उत्तर अफ्रीका ऐसे क्षेत्र हैं जहां सबसे अधिक लोगों के प्रवास करने की संभावना है। यह अध्ययन गैलप वर्ल्ड पोल द्वारा एकत्रित किए गए अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों पर आधारित है।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Jul 2017 06:16:36 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी 3 देशों के दौरे के बाद स्वदेश लौटे</title>
                                    <description><![CDATA[आखिरी पड़ाव में मंगलवार को नीदरलैंड्स में नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी 3 देशों के दौरे के अपने आखिरी पड़ाव में मंगलवार को नीदरलैंड्स पहुंचे। मोदी ने हेग में भारतीय कम्युनिटी के बीच भोजपुरी में स्पीच शुरू की। उन्होंने कहा दुनिया के जिन-जिन देशों में भारतीयों को ले जाया गया, वहां 150 साल बीत गए, पीढ़ियां गुजर […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/modi-returns-home-after-3-countries-visit/article-1695"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/modi-16.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">आखिरी पड़ाव में मंगलवार को नीदरलैंड्स में</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली:</strong> नरेंद्र मोदी 3 देशों के दौरे के अपने आखिरी पड़ाव में मंगलवार को नीदरलैंड्स पहुंचे। मोदी ने हेग में भारतीय कम्युनिटी के बीच भोजपुरी में स्पीच शुरू की। उन्होंने कहा दुनिया के जिन-जिन देशों में भारतीयों को ले जाया गया, वहां 150 साल बीत गए, पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन भारतीयों ने अपनी परंपरा को बरकरार रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए मैं उनको बधाई देता हूं। दुनिया के हर कोने में हिंदुस्तानी राष्ट्रदूत हैं। पासपोर्ट का रंग बदलने से खून के रिश्ते नहीं बदलते हैं। मोदी ने डच पीएम मार्क रूटे से मुलाकात की। बाद में मोदी क्वीन मैक्सिमा और किंग विलियम एलेक्जेंडर से विला एकेनहॉर्स्ट में मिले। मोदी पुर्तगाल, अमेरिका और नीदरलैंड्स विजिट पूरी करने के बाद दिल्ली रवाना हो गए।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jun 2017 02:46:30 +0530</pubDate>
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