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                <title>Lucky Animal Squirrel - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Lucky Animal Squirrel: प्रकृति की चुपचाप सेवा करने वाली गिलहरियां</title>
                                    <description><![CDATA[Lucky Animal Squirrel: सुनील कुमार महला। हमारे आसपास मौजूद कई जीव ऐसे हैं, जिनकी भूमिका भले ही छोटी दिखाई दे, लेकिन उनका योगदान प्रकृति के संतुलन में बेहद महत्वपूर्ण होता है। गिलहरी उन्हीं जीवों में से एक है। पेड़ों पर फुर्ती से दौड़ती, कभी आंगनों में तो कभी पार्कों में दिखाई देने वाली यह नन्ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/squirrels-that-quietly-serve-nature/article-80583"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-01/lucky-animal-squirrel.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Lucky Animal Squirrel: सुनील कुमार महला। हमारे आसपास मौजूद कई जीव ऐसे हैं, जिनकी भूमिका भले ही छोटी दिखाई दे, लेकिन उनका योगदान प्रकृति के संतुलन में बेहद महत्वपूर्ण होता है। गिलहरी उन्हीं जीवों में से एक है। पेड़ों पर फुर्ती से दौड़ती, कभी आंगनों में तो कभी पार्कों में दिखाई देने वाली यह नन्ही जीव न केवल वातावरण की शोभा बढ़ाती है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। अक्सर हम इसे केवल एक सामान्य जानवर समझकर अनदेखा कर देते हैं, जबकि सच यह है कि गिलहरियाँ प्रकृति की अदृश्य संरक्षक हैं। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में गिलहरी को विशेष सम्मान प्राप्त है। रामायण का वह प्रसंग आज भी लोगों को प्रेरणा देता है, जब रामसेतु निर्माण के दौरान एक छोटी सी गिलहरी अपने सामर्थ्य के अनुसार कंकड़ और मिट्टी लाकर योगदान दे रही थी। जब कुछ वानरों ने उसे तुच्छ समझा, तब भगवान श्रीराम ने उसकी निष्ठा और प्रयास को महत्व दिया। यह कथा केवल आस्था से जुड़ी नहीं है, बल्कि यह संदेश देती है कि प्रकृति और समाज में किसी भी योगदान को छोटा नहीं माना जाना चाहिए। यही दृष्टिकोण हमें गिलहरी जैसे जीवों के प्रति अपनाने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिक दृष्टि से गिलहरियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इन्हें अक्सर ‘प्रकृति का माली’ कहा जाता है। गिलहरियाँ अपने भोजन के लिए बीज और मेवे इकट्ठा कर उन्हें जमीन में छिपा देती हैं। बाद में वे सभी स्थान याद नहीं रख पातीं, जिससे कई बीज मिट्टी में अंकुरित होकर नए पौधों और पेड़ों का रूप ले लेते हैं। इस स्वाभाविक प्रक्रिया से जंगलों का विस्तार होता है और पुनर्वनीकरण को बल मिलता है। इसके साथ ही गिलहरियाँ कीट-पतंगों और लार्वा को खाकर फसलों और पेड़ों को नुकसान से बचाने में भी मदद करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में पाई जाने वाली विशालकाय मलय गिलहरी, जिसे वैज्ञानिक रूप से रतुफा बाइकलर कहा जाता है, जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है। यह प्रजाति मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत के घने वनों में पाई जाती है। किसी क्षेत्र में इसकी उपस्थिति यह दर्शाती है कि वहां का वन पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ और संतुलित है। दुर्भाग्यवश, वनों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ता शहरीकरण और पारंपरिक झूम कृषि जैसी गतिविधियों ने इसके प्राकृतिक आवास को गंभीर खतरे में डाल दिया है। शोध बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों में इनके आवास क्षेत्र में भारी कमी आई है, जिससे इनकी संख्या लगातार घट रही है। आज औद्योगीकरण और प्रदूषण के इस दौर में गिलहरियों का अस्तित्व धीरे-धीरे संकट में पड़ता जा रहा है। पेड़ों की कमी, कंक्रीट का फैलाव और प्राकृतिक जल स्रोतों का सूखना इनके जीवन को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम इनके संरक्षण को गंभीरता से लें। पेड़ लगाना, पुराने वृक्षों को बचाना, शहरी क्षेत्रों में हरित स्थान विकसित करना और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील व्यवहार अपनाना इस दिशा में छोटे लेकिन प्रभावी कदम हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतत: गिलहरी हमें यह सिखाती है कि प्रकृति का संतुलन बड़े जीवों से ही नहीं, बल्कि छोटे प्राणियों से भी बनता है। उनकी चुपचाप की गई मेहनत, बीज बोने की आदत और पर्यावरण को संवारने की क्षमता हमें यह एहसास कराती है कि यदि हम प्रकृति के हर जीव का सम्मान करें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है। गिलहरियों का संरक्षण वास्तव में प्रकृति और मानव भविष्य की रक्षा का ही एक रूप है।<br />
(यह लेखक के अपने विचार हैं)</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Jan 2026 11:33:14 +0530</pubDate>
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