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                <title>Literature: मीठा रिश्ता बुआ का</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/sweet-relation-of-bua/article-80914"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/literature.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Bua: बुआ के साथ रिश्ता बड़ा प्यारा और मीठा होता है। मुझे नहीं पता कि बुआ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है। हाँ, जो फूं-फूं करता है, उसे फुफ्फड़ कहते हैं, और उसी से “फुफ्फी” शब्द बना है। भुआ को सास “फुफेस” कहती है। भुआ उसी घर में जन्मी होती है, जहां वह अपने भाइयों और भाभियों के मूड को देखते हुए फेरा डालने की सोचती है। कई घरों में भुआ के आने को अच्छा नहीं माना जाता। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">यह धारणा बना रखी है कि भुआ कुछ न कुछ लेने ही आती है। भुआ लालची होती है। जबकि हकीकत यह है कि भुआ अपने मायके में चाहे जितनी अच्छी हो, उसे अपने मायके से मिलने वाले सम्मान की भूख होती है। मायके से मिले छोटे-मोटे उपहारों को वह अपनी बहुओं और ननदों को बड़े गर्व से दिखाती है। उसका माँ से जन्मा भाई, भाभियाँ, भतीजे-भतीजियाँ भुआ से हर बात छिपाते हैं। कोई नई चीज लाएँ, तो उसे भुआ से छुपाते हैं। जबकि भुआ अपने मायके की हर खुशी को अपनी खुशी से भी बढ़कर मानती है। यह वही भुआ है, जो कभी उस घर की बराबर की हिस्सेदार थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जमीन-जायदाद की मालिक थी। उसके बराबर के हक थे। लेकिन उसका हिस्सा यह कहकर काट दिया जाता है कि उसकी शादी में उसकी हिस्सेदारी की रकम खर्च हो गई थी। जबकि आजकल लोग बेटियों की शादी से ज्यादा बेटों की शादी पर खर्च करते हैं। फिर भुआ का हिस्सा कहां गया? कई लड़कियां तो शादी से पहले ही कमाई शुरू कर देती हैं। अपनी तनख्वाह को वे मायके की झोली में डाल देती हैं या अपनी शादी के लिए जोड़ लेती हैं। फिर भी वे अपना हिस्सा नहीं लेतीं। क्योंकि शादी के बाद, माता-पिता के चले जाने के बाद भी वे मायके से जुड़े रहती हैं। वे चाहती हैं कि हर तीज-त्योहार पर उनकी सुध ली जाए। मायके आने पर उनका खुले दिल से स्वागत हो। सुख-दुख में भाई-भतीजे उनके साथ खड़े हों। बहन हमेशा मायके से ठंडी हवा के झोंके की उम्मीद करती है। लेकिन आज के दौर में ऐसा नहीं होता। अपना हिस्सा छोड़ने के बाद भी बेटी-बहन को पराया समझा जाता है। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">मायके की खुशी सुनकर बहन का दिल खुशी से भर जाता है, लेकिन भाई-भाभियां उसे बताना भी नहीं चाहते। कई बेटियां तो बच्चों वाली होकर भी भाइयों के हक में बयान दे देती हैं। कथित लालची भुआ के इस त्याग की कोई कदर नहीं करता। इसे भाई-भतीजे अपना हक मानते हैं। फिर भी लोहड़ी-दिवाली पर वह मायके से मिठाई के डिब्बे की राह देखती है। करोड़ों की जायदाद त्यागने वाली बेटियों-बहनों की यह दशा आज आम हो गई है। दुनिया के नजरिए से भुआ का यह त्याग बहुत बड़ा है, लेकिन फिर भी उसकी कोई कदर नहीं करता। मेरे हिसाब से भुआ का रिश्ता सबसे ऊँचा है। हमारी अमीरी में भुआ का हिस्सा और उसकी दुआएँ बोलती हैं। कोई सुने या न सुने। Literature<br />
<strong>                                                                                                                -रमेश सेठी बादल</strong></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Feb 2026 15:19:39 +0530</pubDate>
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