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                <title>Bitter Gourd - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Bitter Gourd RSS Feed</description>
                
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                <title>करेला: औषधीय गुणों से भरपूर, किसान मुनाफा भी कमाए खूब</title>
                                    <description><![CDATA[(Bitter Gourd) भारत में करेले की खेती सदियों से होती आ रही है। इसका ग्रीष्मकालीन सब्जियों में महत्वपूर्ण स्थान है। करेला अपने पौष्टिक एवं औषधीय गुणों के कारण काफी लोकप्रिय सब्जी है। मधुमेह के रोगियों के लिए करेला की सब्जी का सेवन बहुत लाभदायक है। इसके छोटे-छोटे टुकड़ें करके धूप में सुखाकर रख लिया जाता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/bitter-gourd-is-full-of-medicinal-properties-farmers-also-earn-a-lot-of-profit/article-31868"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/bitter-gourd.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>(Bitter Gourd)</strong> भारत में करेले की खेती सदियों से होती आ रही है। इसका ग्रीष्मकालीन सब्जियों में महत्वपूर्ण स्थान है। करेला अपने पौष्टिक एवं औषधीय गुणों के कारण काफी लोकप्रिय सब्जी है। मधुमेह के रोगियों के लिए करेला की सब्जी का सेवन बहुत लाभदायक है। इसके छोटे-छोटे टुकड़ें करके धूप में सुखाकर रख लिया जाता हैं। जिनका बाद में बेमौसम की सब्जी के रूप में भी उपयोग किया जाता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>उन्नत किस्में</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">हिसार सेलेक्शन, ग्रीन लांग, फैजाबाद स्माल, जोनपुरी झलारी, सुपर कटाई, सफेद लांग, आॅल सीजन, हिरकारी, भाग्य सुरूचि, मेघा-एफ-1, वरून-1, पूनम, तीजारावी, अमन नं. 24, नन्हा क्र-13।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>जलवायु</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">उत्पादन के लिए गर्म एवं आर्द्र जलवायु इसके लिए उपयुक्त है। करेले कि बढ़वार के लिए न्यूनतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस तथा 35-40 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बुवाई को समय</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रदेश में करेले की फसल का बुवाई का समय फरवरी-मार्च और जून-जुलाई माह सबसे उपयुक्त माना जाता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>बीज की मात्रा व नर्सरी</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">ग्रीष्म ऋतु की फसल हेतु बीज को बुवाई से पूर्व 12-18 घंटे तक पानी में रखते हैं। पॉलिथिन बैग में एक बीज प्रति बैग ही बोते है। बीज का अंकुरण न होने पर उसी बैग में दूसरा बीज पुन: लगा देना चाहिए। इन फसलों में कतार से कतार की दुरी 1-5 मीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 60-120 सेमी. रखनी चाहिए</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>रोपाई की विधि</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">बीजों को नालियों के दोनों तरफ बुवाई करते हैं। नालियों की सिंचाई करके मेढ़ों पर पानी की सतह से ऊपर 2.3 बीज एक स्थान पर इस प्रकार लगाए जाते हैं कि बीजों को नमी कैपिलटीमुखमेंट से प्राप्त हो। अंकुर निकल आने पर आवश्यकतानुसार छंटाई कर दी जाती है। बीज बोने से 24 घंटे पहले पानी में भिगोकर रखें। जिससे अंकुरण में सुविधा होती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>खाद एवं उर्वरक (Bitter Gourd)</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">उर्वरक देते समय ध्यान रखें की नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा सल्फर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय देनी चाहिए। शेष नाइट्रोजन की आधी मात्रा टाप ड्रेसिंग के रूप में बुवाई के 30-40 दिन बाद देनी चाहिए। फूल आने के समय इथरेल 250 पीपीएमासांद्रता का उपयोग करने से मादा फूलों की संख्या अपेक्षाकृत बढ़ जाती है और परिणामस्वरूप उपज में भी वृद्धि होती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>सिंचाई</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">फसल की सिंचाई वर्षा आधारित है। साधारणरूप से प्रति 8-10 दिनों बाद सिंचाई की जाती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>निराई-गुड़ाई</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">प्राथमिक अवस्था में निराई-गुड़ाई करके खेत को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। वर्षा ऋतु में इस फसल को डंडों या मचान पर चढ़ाना चाहिए। करेले की फसल ड्रीपइरिगेशन पर भी ले सकते है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>फसल की सुरक्षा</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">करेले की फसल में कीटों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है। किन्तु अधिक स्वस्थ फसल हेतु नियमित अन्तराल पर कुदरती कीट रक्षक का छिड़काव करते रहना चाहिए। ताकि फसल उपज ज्यादा एंव उत्तम गुणवत्ता के साथ प्राप्त हो सके।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>रैडबीटल</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">यह एक हानिकारक कीट है। जोकि करेला के पौधे पर प्रारम्भिक अवस्था पर आक्रमण करता है। यह कीट पत्तियों का भक्षण कर पौधे की बढ़वार को रोक देता है। इसकी सूंडी काफी खतरनाक होती है। जोकि करेला पौधे की जड़ों का काटकर फसल को नष्ट कर देती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>रोकथाम</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">रैडबीटल से करेला की फसल सुरक्षा हेतु पतंजलिनिम्बादी कीट रक्षक का प्रयोग अत्यन्त प्रभावकारी है। 5 लीटर कीट रक्षक को 40 लीटर पानी में मिला कर सप्ताह में दो बार छिड़काव करने से रैडबीटल से फसल को होने वाले नुक्सान से बचा जा सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>पाउडरी मिल्ड्यू रोग</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">यह रोग करेला पर एरीसाइफीसिकोरेसिएटम की वजह से होता है। इस कवक की वजह से करेले की बेल एंव पत्तियों पर सफेद गोलाकार जाल फैल जाते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं। इस रोग में पत्तियां पीली होकर सूख जाती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>उपचार</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">इस रोग से करेले की फसल को सुरक्षित रखने के लिए 5 लीटर खट्टी छाछ में 2 लीटर गौमूत्र तथा 40 लीटर पानी मिलाकर इस गोल का छिड़काव करते रहना चाहिए। प्रति सप्ताह एक छिड़काव के हिसाब से लगातार तीन सप्ताह तक छिड़काव करने से करेले की फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>एंथ्रेक्वनोज रोग</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">करेले की फसल में यह रोग सबसे ज्यादा पाया जाता है। इस रोग से ग्रसित पौधे की पत्तियों पर काले धब्बे बन जाते हैं, जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण क्रिया में असमर्थ हो जाता है। फलस्वरूप पौधे का विकास पूरी तरह से नहीं हो पाता।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>उपचार</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">रोग की रोकथाम हेतु एक एकड़ फसल के लिए 10 लीटर गौमूत्र में 4 किलोग्राम आडू के पत्ते एवं 4 किलोग्राम नीम के पत्ते व 2 किलोग्राम लहसुन को उबाल कर ठण्डा कर लें, 40 लीटर पानी में इसे मिलाकर छिड़काव करने से यह रोग पूरी तरह फसल से चला जाता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>करेले की तुड़ाई</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">सब्जी के लिए फलों को साधारण: उस समय तोड़ा जाता है, जब बीज कच्चे हों। यह अवस्था फल के आकार एवं रंग से मालूम की जा सकती है। जब बीज पकने की अवस्था आती हैं। तो फल पीले-पीले होकर रंग बदल लेते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>पैदावार</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">130 से 150 क्विवंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है। बीज उत्पादन के लिए प्रमाणित बीज के लिए 500 मीटर व आधारीय बीज के लिए 1000 मीटर अलगाव दूरी रखें। फल पूरी तरह पकने के बाद बीज निकालकर लग करें व सुखाकर अपरिपक्व कच्चा बीज अलग करें।</p>
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<p style="text-align:justify;">
</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कृषि</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 28 Mar 2022 14:40:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भरवां करेले बनाने की रेसिपी</title>
                                    <description><![CDATA[सामग्री: करेले 250 ग्राम, बेसन 100 ग्राम, तलने के लिए तेल 100 ग्राम, नींबू एक, चीनी 4-5 चम्मच, नमक, हल्दी पिसा धनिया, लाल मिर्च स्वाद के अनुसार। बनाने की विधि करेलों को छीलकर नमक लगाकर पानी डालकर उबाल लें। उबल जाने पर साफ पानी से धोकर निचोड़ लें। कड़ाही में थोड़ा-सा तेल डालकर बेसन में […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/home-and-family/stuffed-bitter-gourd-recipe/article-28268"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/bitter-gourd-recipe.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>सामग्री:</strong> करेले 250 ग्राम, बेसन 100 ग्राम, तलने के लिए तेल 100 ग्राम, नींबू एक, चीनी 4-5 चम्मच, नमक, हल्दी पिसा धनिया, लाल मिर्च स्वाद के अनुसार।</p>
<h4><strong>बनाने की विधि</strong></h4>
<ul>
<li><strong>करेलों को छीलकर नमक लगाकर पानी डालकर उबाल लें। </strong></li>
<li><strong>उबल जाने पर साफ पानी से धोकर निचोड़ लें। </strong></li>
<li><strong>कड़ाही में थोड़ा-सा तेल डालकर बेसन में नमक, हल्दी, मिर्च, धनिया, चीनी डालकर चलायें। </strong></li>
<li><strong>बेसन भुन जाय, तब नींबू का रस डाल दें। </strong></li>
<li><strong>अब तैयार मसाले को करेले में भर दें। </strong></li>
<li><strong>कड़ाही में तेल डालकर तल लीजिये। </strong></li>
<li><strong>कुरकुरा होने पर उतार लें। </strong></li>
<li><strong>खट्टे-मीठे चटपटे करेले तैयार हैं।</strong></li>
</ul>
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                                                            <category>घर परिवार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Nov 2021 06:00:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>करेला: ‘जहर ही जहर को मारता है’</title>
                                    <description><![CDATA[करेले में जहां भोजन को स्वादिष्ट बनाने के गुण हैं, वहीं इसमें अनेक औषधीय गुण भी हैं। अनेक रोगों में इसका उपयोग किया जाता है। यह पेट के लिए बहुत लाभदायक हे। इससे पित्त शान्त होने के साथ-साथ कब्ज भी दूर होता है। संसार भर में यह कहावत प्रचलित है कि ‘जहर ही जहर को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/many-benefits-of-bitter-gourd/article-28097"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/bitter-gourd.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">करेले में जहां भोजन को स्वादिष्ट बनाने के गुण हैं, वहीं इसमें अनेक औषधीय गुण भी हैं। अनेक रोगों में इसका उपयोग किया जाता है। यह पेट के लिए बहुत लाभदायक हे। इससे पित्त शान्त होने के साथ-साथ कब्ज भी दूर होता है। संसार भर में यह कहावत प्रचलित है कि ‘जहर ही जहर को मारता है’ क्योंकि सर्प के काटे का इलाज करने के लिए सर्प के विष का प्रयोग किया जाता हे। जो भी हो, करेला स्वाद में भले ही कड़वा होता है, किन्तु मधुमेह के रोगियों के लिए यह रामबाण औषधि है। स्वाद में कड़वा होते हुए भी यह शरीर के लिए मिठास भरा है क्योंकि इसके खाने से अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं और शरीर के तमाम विषैले कीटाणु मर जाते हैं। यह केवल कीटाणुओं को ही नहीं मारता बल्कि पाचन-क्रिया को भी ठीक रखता है। आइए, अब इसके कुछ औषधीय गुणों पर प्रकाश डालें।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">मधुमेह मधुमेह के रोगियों के लिए करेला प्रकृति का दिया हुआ वरदान हे। मधुमेह के रोगियों को करेले का रस 15 ग्राम तक ही मात्रा में लगभग 100 ग्राम पानी मिलाकर दिन में दो-तीन बार पीना चाहिए। इससे रोगी को काफी आराम मिलता है।</li>
<li style="text-align:justify;">कुछ प्रमुख चिकित्सकों का कहना है कि करेले के रस में इन्सुलिन जैसे तत्व होते हैं, इसलिए इससे रक्त औश्र मूत्र में शर्करा की मात्रा में कमी आती है। इसलिए मधुमेह के रोगियों को चाहिए कि वे अपने भोजन में जहां तक हो सके, किसी भी रूप में करेला खाने का प्रयत्न करें। मधुमेह के रोगी को नित्य प्रात:काल बिना कुछ खाये-पीये 4-5 करेलों का रस नियम से पीना चाहिए। इससे न केवल शरीर ही पुष्ट होता है बल्कि पेशाब में चीनी जाना भी बंद कर देता है।</li>
<li style="text-align:justify;">करेले को उबालकर पीने अथवा सूखे करेले का चूर्ण पानी के साथ लेने से भी लाभ होता हे। मधुमेह के रोगियों के लिए कष्ट देने वाली बात यह है कि अपने रोग के कारण वे जो भी भोजन ग्रहण करते हैं, उससे शरीर को पूरे पोषक तत्व प्राप्त नहीं होते। उनके लिए करेला एक ऐसी सब्जी है, जिससे उन्हें आवश्यक विटामिन और खनिज प्राप्त हो जाते हैं। विटामिनों में ए, बी और सी आदि होने के कारण रोगी मधुमेह के साथ अन्य अनेक रोगों से भी बचा रहता है। यदि वह करेले का रस नियमित रूप से लेता रहे तो तनाव और आंख में होने वाले कष्टों से भी बचा रहता है। कार्बोहाइड्रेटस के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि करेला लेने से चयापचय ठीक ढंग से होता रहता है और रोगी का संक्रमण से बचाव भी होता है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>हैजा</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">हैजा होने की स्थिति में करेले का रस लेने से फौरन लाभ होता है। चौथाई कप करेले का ताजा रस निकाल कर उसमें उतना ही पानी मिलाकर पीना चाहिए।</li>
<li style="text-align:justify;">हैजे के रोगी को करेले के रस में प्याज का रस और नीबू के रस की कुछ बुंदें मिलाकर देने से भी जल्दी लाभ होता है।</li>
</ul>
<h3><strong>बवासीर</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">खूनी बवासीर में 1-2 चम्मच करेले के रस में चीनी मिलाकर देते रहने से भी लाभ होता है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>पीलिया</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">पीलिया के रोगी को एक करेला मिक्सी में पीसकर सुबह-शाम उसका रस पिलाने से शीघ्र लाभ होता है।</li>
<li style="text-align:justify;">गैस और पाचन संबंधी समस्याओं में भी करेला उपयोगी सिद्ध होता है। इसके रस अथवा सब्जी का उपयोग करते रहना चाहिए।</li>
<li style="text-align:justify;">जिन छोटे बच्चों का जिगर खराब रहता है और पेट साफ नहीं रहता तथा पानी पीने से पेट फूल जाता है, उन्हें आयु के अनुसार एक या आधा चम्मच करेले का रस पिलाने से बढ़ा हुआ जिगर ठीक हो जाता है और पेट में भरा हुआ पानी भी साफ हो जाता है। करेले के रस में पानी मिलाकर देना चाहिए।</li>
<li style="text-align:justify;">बढ़ी हुई तिल्ली में करेले के रस का उपयोग करते रहने से वह ठीक हो जाती है। पेट के कीड़े भी करेले के रस के प्रयोग से समाप्त हो जाते हैं।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>गठिया</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">गठिया में करेले का रस दर्द और सूजनवाले स्थान पर लगाने से सूजन और दर्द में आराम मिलता है। जोड़ों के दर्द में करेले के पत्तों का रस भी मालिश के लिए उपयोगी है।</li>
<li style="text-align:justify;">करेले के पत्तों का रस भी दर्द वाले स्थान पर लगाने से लाभ होता है। गठिया के रोगी को करेले की सब्जी खानी चाहिए।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>कब्ज</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">करेले से होमियोपैथी में मदर टिंचर का निर्माण किया गया है। प्रतिदिन इसकी 5-7 बूंदें दिन में चार बार पानी में देने से कब्ज दूर हो जाता है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>रक्त और चर्म रोग</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">बहुत से चर्म रोग रक्त में गड़गड़ी के कारण होते हैं। दाद, खाज, खुजली आदि इसी प्रकार के रोग हैं। चर्म रोगियों को करेले के रस में नींबू का रस मिलाकर पीने से लाभ होता है। करेले का रस एक कप की मात्रा तक पिया जा सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>दमा और सांस की तकलीफ</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">दमा और सांस की तकलीफ वाले रोगी को करेले की सब्जी खानी चाहिए। प्राचीन काल से करेला इस रोग के लिए व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता रहा है। दमे के रोगी को करेले की बेल की जड़ के चूर्ण में शहद और तुलसी का रस मिलाकर देने से आराम मिलता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>रोग प्रतिरोधक</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">करेले में खनिज और विटामिन होने के कारण सब्जी अथवा रस के रूप में इसका उपयोग करते रहने से शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा हो जाती है। करेला भोजन को पचाकर भूख बढ़ाने में सहायक होता है। उन दिनों जब इनका मौसम नहीं रहता, के लिए करेलों के छोटे-छोटे टुकड़े काटकर सुखाए जा सकते हैं और उन्हें समय पर काम में लाया जा सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>कुछ अन्य उपयोग</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">करेले के पत्तों के रस में बच का थोड़ा-सा चूर्ण तथा शहद मिलाकर देने से उल्टी और दस्त होने लगते हैं और ब्रोंकायटिस के रोगी के श्वास नलिका की सूजन कम हो जाती है।</li>
<li style="text-align:justify;">करेले के पत्तों के रस मे सैंधव मिलाकर पीने से उल्टी होकर पित्त निकल जाता है।</li>
<li style="text-align:justify;">करेले के पत्तों का रस गर्म पानी के साथ पीने से उल्टी होकर पित्त निकल जाता है।</li>
<li style="text-align:justify;">करेले के पत्तों का रस गर्म पानी के साथ पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">करेले के पत्तों के रस में काली मिर्च पीसकर मिलाइए। यह लेप आंखों के बाहरी हिस्से पर लगाने से रतौंधी की बीमारी दूर होती है।</li>
<li style="text-align:justify;">करेले या उसके पत्तों के रस में एक चम्मच शक्कर मिलाकर दिन में दो बार लेने से बवासीर ठीक हो जाती है।</li>
<li style="text-align:justify;">करेले के पत्तों का रस नियमपूर्वक लेने से मधुमेह के रोगी को आराम मिलता है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>ककड़ी</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">आमतौर पर टमाटर, प्याज, खीरा आदि के साथ इसका प्रयोग सलाद के रूप में किया जाता है। ज्यादा ककड़ी खाने से पेट में गैस पैदा होती है, किन्तु यदि इसके साथ नमक और काली मिर्च तथा नींबू का रस प्रयोग किया जाए तो गैस पैदा नहीं होती।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>रोगोपचार</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">ककड़ी के रस का प्रयोग करने से मूत्र खुलकर आता है, इसलिए गर्मियों में होने वाली पेशाब की जलन आदि ककड़ी खाने से दूर होती है। गाजर या ककड़ी अथवा ककड़ी और शलजम का रस पीने से भी मूत्र खुलकर आता है और गुर्दे के रोग दूर होते हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">ककड़ी का रस त्वचा पर लगाने से रंग साफ होता है। चेहरे के दाग-धब्बे और मुंहासों में ककड़ी का रस लगाने तथा पीने से चेहरे का रंग निखरता है।</li>
<li style="text-align:justify;">ककड़ी काटकर उसमें शक्कर और नींबू का रस मिलाकर खाइए, इससे भी गर्मी में होने वाली पेशाब की तकलीफ में राहत मिलती है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>करौंदा</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">करौंदे का पौधा औसत ऊंचाई का होता है। करौंदे बेर के समान लाल, सफेद और पीले रंग के होते हैं। इन्हें सब्जी के रूप में पकाया जाता है, परंतु दाल, सब्जी आदि के साथ इसका प्रयोग अचार के रूप में अधिक होता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>रोगोपचार</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>मिर्गी के दौरे – </strong>करौंदे के पत्ते छाछ में पीसकर 15-20 दिन तक नित्य सेवन करने से मिर्गी के दौरे बंद हो जाते हैं। विशेष रूप से पित्त की अधिकतावाली मिर्गी में इसका अधिक उपयोग किया जा सकता है।</li>
<li style="text-align:justify;"><strong> करौंदे प्राय:</strong> के तेल में छौंककर रख लिये जाते हैं और कई दिन तक खराब नहीं होते। भोजन को पाचन और स्वादिष्ट बनाने में ये बहुत सहायक सिद्ध होते हैं। पेट का अफारा, अरुचि और भोजन पचाने की शिकायतें दूर होती हैं।</li>
</ul>
<p> </p>
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                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/news-brief/many-benefits-of-bitter-gourd/article-28097</link>
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                <pubDate>Wed, 03 Nov 2021 10:30:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Karela Ke Fayde: डायबिटीज ही नहीं इन बीमारियों का भी काल है करेला</title>
                                    <description><![CDATA[किडनी का स्टोन: किडनी स्टोन के पेशेंट को अपनी डाइट में करेले का सेवन जरूर करना चाहिए। इसमें आयुर्वेदिक गुण होने से पथरी टूट कर यूरिन के जरिए बाहर निकल जाती है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/health/bitter-gourd-is-beneficial-not-only-in-diabetes-but-also-in-diseases/article-22360"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-03/karela.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Karela Ke Fayde: डायबिटीज: </strong><strong>टाइप- 2</strong> डायबिटीज के रोगियों के लिए करेला वरदान स्वरूप है। यह शरीर में इंसुलिन बनाएं रखते हैं। साथ ही शुगर लेवल को कंट्रोल में रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>स्वस्थ लिवर:</strong> कई पौष्टिक गुणों से भरपूर करेला लिवर को स्वस्थ रखने में मदद करता है। यह लिवर को साफ कर इसकी कोशिकाओं को बनाने का काम करता है। इसके सेवन से लिवर स्वस्थ रहता है और इससे संबंधित परेशानियों के होने के चांचिस कम रहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>वजन घटाएं:</strong> करेला में विटामिन, कैल्शियम, आयरन, फाइबर, एंटी-आॅक्सीडेंट आदि गुण होते हैं। यह पाचन तंत्र मजबूत करने में मदद करता है। यह मेटाबॉलिज्म दर को बढ़ाकर कैलोरी को तेजी से बर्न करने में फायदेमंद होता है। ऐसे में वेट लूज करने में मदद मिलती है।</p>
<p><strong>Also Read:<a href="http://10.0.0.122:1245/karela-ki-kheti-farming-of-bitter-gourd/">करेले की खेती कैसे करे</a></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>किडनी का स्टोन:</strong> किडनी स्टोन के पेशेंट को अपनी डाइट में करेले का सेवन जरूर करना चाहिए। इसमें आयुर्वेदिक गुण होने से पथरी टूट कर यूरिन के जरिए बाहर निकल जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सांस से जुड़ी समस्याएं:  </strong>नियमित करेला खाने से थमा व ब सांस से जुड़ी समस्याओं से राहत मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कैंसर से बचाव:  </strong>इसमें एंटी-आॅक्सीडेंट, एंटी- बैक्टीरियल, एंटी- कैंसर आदि गुण होते हैं। एक रिसर्च के मुताबिक, करेला शरीर में कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने नहीं देता है।</p>
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                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/health/bitter-gourd-is-beneficial-not-only-in-diabetes-but-also-in-diseases/article-22360</link>
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                <pubDate>Wed, 17 Mar 2021 15:52:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>करेले की खेती &amp;#8211; Karela Ki Kheti Kaise Kare</title>
                                    <description><![CDATA[हमारे देश में करेला की खेती (Karela Ki Kheti) काफी समय से होती आ रही है। इसका ग्रीष्मकालीन सब्जियों में महत्वपूर्ण स्थान है। पौष्टिकता एवं अपने औषधीय गुणों के कारण यह काफी लोकप्रिय है । आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के अनुसार मधुमेह के रोगियों के लिये करेला की सब्जी का सेवन लाभदायक रहता है। इसके […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/culture-and-society/karela-ki-kheti-farming-of-bitter-gourd/article-1799"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/bitter-gourd.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हमारे देश में करेला की खेती (Karela Ki Kheti) काफी समय से होती आ रही है। इसका ग्रीष्मकालीन सब्जियों में महत्वपूर्ण स्थान है। पौष्टिकता एवं अपने औषधीय गुणों के कारण यह काफी लोकप्रिय है । आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के अनुसार मधुमेह के रोगियों के लिये करेला की सब्जी का सेवन लाभदायक रहता है। इसके फलों से सब्जी बनाई जाती है। इसके छोटे-छोटे टुकड़े करके धूप में सुखाकर रख लिया जाता हैं, जिनका बाद में बेमौसम की सब्जी के रूप में भी उपयोग किया जाता है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">जलवायु Climate Required for Karela Ki Kheti</h2>
<p style="text-align:justify;">करेला की खेती के लिए ठाम एवं आर्द्र जलवायु की जरूरत पड़ती है। करेला के पौधों की खासियत है कि यह अन्य कद्दू वर्गीय फसलों की अपेक्षा अधिक शीत सहन कर सकता है, पर अधिक वर्षा से फसल की उपज घट जाती है। करेला की खेती के लिए उत्तर एवं मध्य भारत की जलवायु अधिक अनुकूल मानी गई है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कैसे करें तैयारी Karela Ki Kheti Kaise Kare करेले की खेती कैसे करें</h2>
<p style="text-align:justify;">करेला की खेती के लिए ऐसी भूमि का चयन करना चाहिए, जिनमें अम्ल एवं नमक का प्रतिशत सामान्य से अधिक न हो अर्थात् भूमि का पी.एच. 6.5 से 8.00 के मध्य तथा मृदा में जीवांश का प्रतिशत अधिक से अधिक होना चाहिए, ताकि पौधों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध हो सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">करेले की खेती के लिए खेत की तैयारी करते समय 200 लीटर बायोगैस स्लरी अथवा 2000 लीटर संजीवक खाद खेत में डालकर 4-5 दिन पश्चात मिट्टी पलट हल से जुताई करें। इसके उपरान्त एक सप्ताह तक खेत को खुला छोड़ देते हैं। तत्पश्चात तीन से चार बार देशी हल से जुताई कर मेंडा (पटेला) लगाकर खेत को समतल करें,</p>
<p style="text-align:justify;">तत्पश्चात तीन-तीन फीट के अन्तराल पर 1 फीट गहरा तथा 2 फीट चौड़ा थावला बनाकर प्रत्येक थावले में 500 ग्राम वर्मी कम्पोस्ट तथा 50 ग्राम कॉपर सल्फेट पाउडर एवं 200 ग्राम राख मिलाकर थावले को मिट्टी से ढ़क देते हैं तथा खेत की सिंचाई कर लें। सिंचाई के 5-6 दिन पश्चात करेला बीजों की बुवाई थावले में कर दें। बुवाई करते समय प्रत्येक थावले में 4 से 5 बीज पौध हेतु डालें।</p>
<h2 style="text-align:justify;">किस्में Bitter Gourd Varieties</h2>
<h3 style="text-align:justify;">कोयम्बटूर लौग</h3>
<p style="text-align:justify;">यह दक्षिण भारत की किस्म है, इस किस्म के पौधे अधिक फैलाव लिए होते हैं। इसमें फल अधिक संख्या में लगते हैं तथा फल का औसत वजन 70 ग्राम होता है। इसकी उपज 40 क्विंटल प्रति एकड़ तक आती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कल्याणपुर बारहमासी</h3>
<p style="text-align:justify;">इस किस्म का विकास चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किया गया है, इस किस्म के फल आकर्षक एंव गहरे हरे रंग के होते हैं। इसे गर्मी एवं वर्षा दोनों ऋतुओं में उगाया जा सकता है, अर्थात् ये किस्म वर्ष भर उत्पादन दे सकती है। इसकी उपज 60-65 क्विंटल प्रति एकड़ तक आती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">हिसार सेलेक्शन</h3>
<p style="text-align:justify;">इस किस्म को पंजाब, हरियाणा में काफी लोकप्रियता हासिल है। वहां की जलवायु में इसकी उपज 40 क्विंटल प्रति एकड़ तक प्राप्त होती है।<br />
अर्का हरित: इसमें फलों के अन्दर बीज बहुत कम होते हैं। यह किस्म गर्मी एवं वर्षा दोनों ऋतुओं में अच्छा उत्पादन देती है। पतंजलि विषमुक्त कृषि विभाग ने अपने शोध प्रयोगों में पाया कि इसकी प्रत्येक बेल से 34 से 42 फल प्राप्त होते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">पूसा विशेष</h3>
<p style="text-align:justify;">यह किस्म बीज बुवाई के 55 दिन बाद फल देना प्रारम्भ कर देती है। इस किस्म के फल मध्यम, लम्बे, मोटे व हरे रंग के होते हैं। इसका गूदा मोटा होता है। फल का औसत भार 100 ग्राम तक होता है। पतंजलि विषमुक्त कृषि विभाग इस किस्म को फरवरी से जून माह के बीच उठाने की सलाह देता है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">खेत की सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई</h2>
<p style="text-align:justify;">Karela Ki Kheti: करेला की फसल में सिंचाई काफी महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है, अत: समय-समय पर सिंचाई अवश्य करते रहना चाहिए। चुंकि करेला की फसल ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में उगाई जाती है, जिस वजह से खरपतवार अधिक संख्या में उग जाते हैं। अत: इनको समय-समय पर खेत से निकालना बहुत जरूरी है। इसी प्रकार खेत का नियमित अन्तराल पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए, ताकि फसल पर फल-फूल अधिक से अधिक संख्या में आए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कुदरती खाद बनाएं</h2>
<p style="text-align:justify;">बीज बुवाई के 3 सप्ताह पश्चात जब करेला के पौधे में 3-4 पत्ते निकलना प्रारम्भ हो जाएं, उस समय 2000 लीटर बायोगैस स्लरी अथवा 2000 लीटर संजीवक खाद अथवा 40 किलो गोबर से निर्मित जीवामृत खाद प्रति एकड़ की दर से फसल को दें।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी बार जब पौधों पर फूल निकलने प्रारम्भ हो जाएं, उस समय पुन: उपरोक्त कुदरती खाद फसल को देनी चाहिए। इसी प्रकार जब करेला फसल की प्रथम तुड़ाई प्रारम्भ हो, उस समय 200 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट में 50 किलोग्राम राख मिलाकर फसल पर छिड़काव कर देना चाहिए, ताकि फसल की उपज अधिक से अधिक मिल सके।</p>
<h2 style="text-align:justify;">फसल की सुरक्षा कैसे करें</h2>
<p style="text-align:justify;">करेला की फसल में कीटों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है, किन्तु अधिक स्वस्थ फसल हेतु नियमित अन्तराल पर कुदरती कीट रक्षक का छिड़काव करते रहना चाहिए, ताकि फसल उपज ज्यादा एंव उत्तम गुणवत्ता के साथ प्राप्त हो सके।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रैड बीटल</h3>
<p style="text-align:justify;">यह एक हानिकारक कीट है, जोकि करेला के पौधे पर प्रारम्भिक अवस्था पर आक्रमण करता है। यह कीट पत्तियों का भक्षण कर पौधे की बढ़वार को रोक देता है। इसकी सूंडी काफी खतरनाक होती है, जोकि करेला पौधे की जड़ों को काटकर फसल को नष्ट कर देती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रोकथाम</h3>
<p style="text-align:justify;">रैड बीटल से करेला की फसल सुरक्षा हेतु पतंजलि निम्बादी कीट रक्षक का प्रयोग अत्यन्त प्रभावकारी है। 5 लीटर कीटरक्षक को 40 लीटर पानी में मिलाकर, सप्ताह में दो बार छिड़काव करने से रैड बीटल से फसल को होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">पाउडरी मिल्ड्यू रोग</h3>
<p style="text-align:justify;">यह रोग करेला पर एरीसाइफी सिकोरेसिएटम की वजह से होता है। इस कवक की वजह से करेले की बेल एंव पत्तियों पर सफेद गोलाकार जाल फैल जाते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं। इस रोग में पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कुदरती उपचार</h3>
<p style="text-align:justify;">इस रोग से करेला की फसल को सुरक्षित रखने के लिए 5 लीटर खट्टी छाछ में 2 लीटर गौमूत्र तथा 40 लीटर पानी मिलाकर, इस गोल का छिड़काव करते रहना चाहिए। प्रति सप्ताह एक छिड़काव के हिसाब से लगातार तीन सप्ताह तक छिड़काव करने से करेले की फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">एंथ्रेक्वनोज रोग</h3>
<p style="text-align:justify;">करेला फसल में यह रोग सबसे ज्यादा पाया जाता है। इस रोग से ग्रसित पौधे की पत्तियों पर काले धब्बे बन जाते हैं, जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण क्रिया में असमर्थ हो जाता है। फलस्वरुप पौधे का विकास पूरी पूरी तरह से नहीं हो पाता।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कुदरती उपचार</h3>
<p style="text-align:justify;">रोग की रोकथाम हेतु एक एकड़ फसल के लिए 10 लीटर गौमूत्र में 4 किलोग्राम आडू पत्ते एवं 4 किलोग्राम नीम के पत्ते व 2 किलोग्राम लहसुन को उबाल कर ठण्डा कर लें, 40 लीटर पानी में इसे मिलाकर छिड़काव करने से यह रोग पूरी तरह फसल से चला जाता है ।</p>
<h2 style="text-align:justify;">फसल की तुड़ाई कैसे और कब</h2>
<p style="text-align:justify;">करेला फलों की तुड़ाई कोमल अवस्था में करनी चाहिए, वैसे सामान्यत: बीज बुवाई के 90 दिन पश्चात फल तोड़ने लायक हो जाते हैं। फल तुड़ाई का कार्य सप्ताह में 2 या 3 बार करना चाहिए।करेले की उपज उपरोक्त निर्देशानुसार करेले की उपज 55 क्विंटल प्रति एकड़ तक प्राप्त की जा सकती है।</p>
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                                                            <category>संस्कृति एवं समाज</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/culture-and-society/karela-ki-kheti-farming-of-bitter-gourd/article-1799</link>
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                <pubDate>Fri, 30 Jun 2017 06:55:09 +0530</pubDate>
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