<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/peace/tag-3529" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>Peace - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/3529/rss</link>
                <description>Peace RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अमन के लिए युद्ध</title>
                                    <description><![CDATA[इस दौर की दिलचस्प बात यह भी है कि अमेरिका की राजनीति से ज्यादा विश्व में घटित अन्य घटनाएं भी अधिक महत्व रख रही हैं। ट्रम्प इस वर्ष फिर राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे हैं। अमेरिका के नेता चुनाव जीतने के लिए युद्ध को भी चुनावी रणनीति में रखते हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/editorial/war-for-peace/article-12310"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/war-for-peace.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी कहा जाता था कि अमन शांति चाहते हो तो युद्ध के लिए तैयार रहो लेकिन यह कहावत वर्तमान समय में फिट बैठती नजर नहीं आ रही। ईरान और अमेरिका में हालात ऐसे बने हुए हैं कि यदि उनके बीच जनरल कासिम की हत्या का मामला ठंडा नहीं पड़ा तब करोड़ों लोगों का भगवान ही रक्षक है। अमेरिका ने इराक में हमला कर ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद और भी कार्रवाईयां करने की धमकी दी है, दूसरी ओर ईरान ने जवाबी कार्रवाई की है। दरअसल अब यह मामला अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह गया। बल्कि यूरोप से लेकर एशिया तक चिंता का विषय बना हुआ है। इराक में अमेरिका ने उस वक्त हमला किया जब रूस, चीन और ईरान की सेनाएं संयुक्त युद्ध अभ्यास कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मकसद स्पष्ट है अमेरिकी हमले को रूस व चीन जैसी ताकतें बर्दाश्त नहीं करेंगी। ईराक भी ईरान का समर्थन करता दिख रहा है, जिसकी संसद ने अमेरिकी सेनाओं की ईराक से वापिसी का प्रस्ताव पास कर दिया है। यदि युद्ध हुआ तब रूस, चीन भी पीछे हटने वाले नहीं। उत्तरी कोरिया भी रूस और चीन के साथ जाने वाला है। इसी तरह यूरोपीय देशों का झुकाव अमेरिका की तरफ है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत सहित कई देशों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है, उधर अमेरिका अरब में तनाव को दो दशक पूर्व ही धार्मिक रंगत दी जा चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब सन 2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान में हमला किया था। सैन्य ताकतों के मामले में यदि ईरान कमजोर साबित हुआ तब रूस और चीन का दखल पूरे विश्व के लिए घातक साबित होगा। अत: ईरान जो इमेरिका से बदला लेने की हिमाकत कर रहा है वह बिना किसी तीसरे की शह के नहीं हो रहा। इस दौर की दिलचस्प बात यह भी है कि अमेरिका की राजनीति से ज्यादा विश्व में घटित अन्य घटनाएं भी अधिक महत्व रख रही हैं। ट्रम्प इस वर्ष फिर राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे हैं। अमेरिका के नेता चुनाव जीतने के लिए युद्ध को भी चुनावी रणनीति में रखते हैं। अमेरिकी ताकतें व ट्रम्प का सख्त रवैया दोनों मिलकर कोई बड़ा खतरा बन सकते हैं। अमेरिका का निर्णय लेने का यही तरीका रहा है कि वह तबाही के बाद ही घटना का अंदाजा लगाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सद्दाम हुसैन के कार्यकाल में ईराक के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई में अमेरिका ईराक के पास जैविक एवं रासायनिक हथियारों के आरोप साबित नहीं कर सका, जिनके कारण ईराक पर हमला किया गया था। अब ट्रम्प व रोहानी के तेवरों से यही लग रहा है कि अब अमन शांति के लिए मांगी जाने वाली दुआएं ही इस खतरे को टाल सकती हैं।</p>
<p> </p>
<p><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</strong><span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title=""><br />
</span></span></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/editorial/war-for-peace/article-12310</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/editorial/war-for-peace/article-12310</guid>
                <pubDate>Tue, 07 Jan 2020 20:20:23 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2020-01/war-for-peace.jpg"                         length="12670"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की पेशकश</title>
                                    <description><![CDATA[नार्वे की प्रधानमंत्री एरना सोलवर्ग की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच शांति स्थापना की उनकी पेशकश पर विचार किया जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी से मिलने से पूर्व उन्होंने प्रेस से बात की और नई दिल्ली में नार्वे के नए राजदूतावास भवन का उद्घाटन किया और […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">नार्वे की प्रधानमंत्री एरना सोलवर्ग की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच शांति स्थापना की उनकी पेशकश पर विचार किया जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी से मिलने से पूर्व उन्होंने प्रेस से बात की और नई दिल्ली में नार्वे के नए राजदूतावास भवन का उद्घाटन किया और इस प्रेस वार्ता में कहा कि भारत और पाकिस्तान को वार्ता करनी चाहिए और कश्मीर की समस्या का कोई सैनिक समाधान नहीं हो सकता है तथा यदि भारत और पाकिस्तान चाहें तो हम मध्यस्थता कर सकते हैं किंतु कश्मीर मुद्दे में किसी तीसरे पक्षकार की भागीदारी के प्रति भारत की संवेदनशीलता को देखते हुए वे अपने बयान से मुकर गयी और नई दिल्ली स्थित नार्वे के राजदूत ने एक ट्वीट कर स्पष्ट किया कि हमने न मध्यस्थता करने के लिए कहा गया है और न ही हमाने मध्यस्थता की पेशकश की है। इस संवेदनशील मुद्दे पर कूटनयिक असंतोष के मद्देनजर नार्वे द्वारामध्यस्थता की पेशकश वास्तव में गंभीर है और उनके इरादे स्पष्ट हैं। वे शांति स्थापना के लिए कार्य करना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नार्वे और स्वीडन मिलकर विश्व शांति के लिए नोबल पुरस्कार देते हैं। नार्वे एक समृद्ध और शांतिप्रिय देश है। विश्व खुशहाली सूचकांक में नार्वे पिछले 13 सालों से शीर्ष स्थान पर है। केवल पिछले वर्ष वह फिनलैंड के बाद दूसरे स्थान पर आया है। वहां पर सर्वोत्तम जीवन दशाएं हैं, जीवन प्रत्याशा ऊंची है तथा शिक्षा ओर स्वास्थ्य देखरेख व्यवस्थाएं सर्वोत्तम हैं और नार्वे मानता है कि उनके देश की जनता की तरह विश्व के अन्य देशों की जनता को भी शांति और सुरक्षा के साथ रहना चाहिए। आज के पारस्परिक निर्भर और वैश्विक दुनिया में संघर्ष और हिंसा अन्य देशों को भी प्रभावित करती है। नार्वे का मानना है कि हालांकि उसके पड़ोसी देश शांतिप्रिय हैं और वह विश्व के अशांत देशों से भौगोलिक दृष्टि से बहुत दूर है और इसीलिए शायद नार्वे शांति पर अधिक बल देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">शांति के बारे में अध्ययन के बारे में उनके यहां जोहान गालटुंग जैसे प्रसिद्ध विद्वान हुए हैं। 2018 में नार्वे ने कोलंबिया सरकार और वहां के विद्रोही समूह रिवोल्यूशनरी आर्म्ड फोर्सेस कोलंबिया के बीच शांति मध्यस्थता की। उससे पहले श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच शांति वार्ता में भाग लिया। श्रीलंका में वे सफल नहीं हुए क्योंकि श्रीलंका सरकार की सेनाओं को लिट्टे का विनाश करने की अुनमति दी गयी इसलिए नार्वे के प्रधानमंत्री की पेशकश स्वत: नहीं है अपितु यह सुविचारित राजनीतिक पहल है। हाल ही में 23 नवंबर 2018 को नार्वे के पूर्व प्रधानमंत्री बोंडेविक कश्मीर यात्रा पर आए थे और वे नियंत्रण रेखा पार कर वार्ता के लिए पाक अधिकृत कश्मीर भी गए। उन्होने सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूख जैसे हुर्रियत नेताओं से भी बात की तथा बोंडेविक की यात्रा भारत सरकार की सहमति के बिना नहीं हो सकती थी और ऐसा समझा जाता है कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का वरदहस्त प्राप्त था।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की विदेश नीति को ध्यान में रखते हुए नार्वे के प्रधानमंत्री ने भी बोंडेविक की यात्रा को राजकीय स्वीकृति नहीं दी। उन्होंने कहा कि बोंडेविक इंस्टीट्यूट फोर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन नामक एक प्राइवेट संस्था को चलाते हैं और उनकी यात्रा एक अध्ययन दौरा था जिसे उनकी सरकार की स्वीकृति नहीं मिली थी। नार्वे चाहता है कि भारत और पाकिस्तान वार्ता करें और भारतीय उपमहाद्वीप में स्थायी शांति स्थापित हो किंतु पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता के बारे में मोदी और उनकी सरकार कितनी गंभीर है?<br />
केन्द्र सरकार की स्वीकृति से बोंडेविक की यात्रा और सोलवर्ग द्वारा कश्मीर पर की गयी टिप्पणी पर विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया न आना और कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की पेशकश करने से लगता है भारत कश्मीर के मुद्दे पर अपने मित्र तथा शक्तिशाली और शांतिप्रिय देशों से परामर्श करना चाहता है और इस तरह से वह संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार आयोग की रिपोर्ट में कश्मीर के मुद्दे को उछाले जाने का प्रतिकार कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कश्मीर सहित किसी भी मुद्दे पर भारत के साथ वार्ता करने की अपनी इच्छा व्यक्त कर चुके हैं और उन्होने यह भी स्पष्ट किया कि वे संघर्ष को समाप्त करने के लिए हिंसा को अवैध घोषित करना चाहते हैं किंतु उनकी सेना आतंकवाद को निरंतर बढ़ावा दे रही है। भारत का कहना है कि आतंकवाद ओर वार्ता साथ साथ नहीं चल सकते हैं और वार्ता शुरू करने के लिए उसकी पूर्व शर्त है कि सीमा पार से हिंसा समाप्त हो और यही गतिरोध का मुख्य कारण है। सोलवर्ग की टिप्प्णी का मुख्य भाग यह है कि उन्होने कहा है कि भारत और पाकिस्तान को अपना रक्षा बजट कम करना चाहिए। स्वास्थ्य और शिक्षा पर अधिक व्यय करना चाहिए। ये दोनों पक्ष समझते हैं कि कश्मीर समस्या का सैनिक समाधान नहीं है और यदि पाकिस्तान के प्रध्धानमंत्री कहते हैं कि दक्षिण एशिया में हमें गरीबी का मुकाबला करना चाहिए न कि एक दूसरे का तो फिर हमें सैनिक व्यय के बारे में नार्वे के प्रधानमंत्री के सुझाव को ध्यान में रखना चाहिए जो अत्यधिक है और एक तरह से बहुमूल्य संसाधनों की आपराधिक बर्बादी है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या भारत और पाकिस्तान के समक्ष विकास का गुरूत्तर कार्य नहीं है? ये आंकडे सब कुछ स्पष्ट कर देते हैं। विश्व में प्रति वर्ष परमाणु हथियारों पर 100 बिलियन अमरीकी डॉलर खर्च किए जाते हैं जबकि विश्व से अत्यधिक गरीबी मिटाने और हर किसी को प्राथमिक शिक्षा देने पर भी 100 बिलियन अमरीकी डॉलर का ही खर्च आता है। भारत और पाकिस्तान द्वारा अपने रक्षा बजट में छोटी सी कटौती से भी स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए बहुत सा पैसा मिल सकता है। यह सिद्ध हो चुका है कि विकासशीलदेशों की अर्थव्यवस्था में बंदूक से बेकार चीज कोई नहीं है और उनके सामाजिक विकास में सबसे बड़ी बाधा युद्ध का वित्तीय भार है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डा. डीके. गिरी</strong><br />
<strong>प्रो. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, जेएमआई</strong></p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/article/peace-offer-between-india-and-pakistan/article-7388</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/article/peace-offer-between-india-and-pakistan/article-7388</guid>
                <pubDate>Fri, 18 Jan 2019 13:18:09 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी-जिनपिंग ने जताई  सीमा पर शांति बनाए रखने पर सहमति</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने द्विपक्षीय बैठक की जोहानसबर्ग (एजेंसी)।ब्रिक्स (भारत, ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका) शिखर सम्मेलन में शामिल होने दक्षिण अफ्रीका गए प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने द्विपक्षीय बैठक की। इस दौरान दोनों नेताओं ने हाल के दिनों में शुरू हुई बातचीत […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/modi-jinping-agree-on-consent-on-maintaining-peace-on-the-border/article-5022"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/pm-modi-jimping.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने द्विपक्षीय बैठक की</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>जोहानसबर्ग (एजेंसी)।</strong>ब्रिक्स (भारत, ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका) शिखर सम्मेलन में शामिल होने दक्षिण अफ्रीका गए प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने द्विपक्षीय बैठक की। इस दौरान दोनों नेताओं ने हाल के दिनों में शुरू हुई बातचीत की गति को बरकरार रखने और सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए संबंधित हितधारकों को उचित निर्देश देने पर सहमति व्यक्त की।</p>
<h2 style="text-align:justify;">नियमित रूप से अपने स्तर पर हमारे रिश्तों की समीक्षा करनी चाहिए:मोदी</h2>
<p style="text-align:justify;">मोदी तथा  जिनपिंग ने इस दौरान दोनों देशों के बीच करीबी विकास साझेदारी को समेकित तथा विकसित करने पर सहमति जताई। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से हटकर दोनों नेताओं के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान मोदी ने जिनपिंग से कहा, “इस गति को बनाए रखना महत्वपूर्ण है और इसके लिए हमें नियमित रूप से अपने स्तर पर हमारे रिश्तों की समीक्षा करनी चाहिए और जब भी आवश्यक हो उचित निर्देश देना चाहिए।”</p>
<h2>राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को इस वर्ष चीन भेजने की इच्छा जतायी</h2>
<p style="text-align:justify;">विदेश सचिव विजय गोखले ने बाद में संवाददाताओं को बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने  जिनपिंग के साथ मुलाकात के दौरान विशेष प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को इस वर्ष चीन भेजने की इच्छा जतायी। उन्होंने कहा, “दोनों नेताओं ने बातचीत के दौरान अप्रैल में वुहान में हुई अनौपचारिक बैठक के साथ-साथ जून में क़िंगदाओ में हुई अपनी मुलाकात को याद किया। दोनों नेता द्विपक्षीय जुड़ाव को मजबूत करने के लिए दोनों देशों के अधिकारियों द्वारा किए जा रहे प्रयासों से विशेष रूप से संतुष्ट थे।” उन्होंने कहा यह एक ‘बहुत ही लाभकारी’ बैठक रही।</p>
<h2>जिनपिंग ने  वर्ष 2019 में  भारत आने के  निमंत्रण को स्वीकारा</h2>
<p style="text-align:justify;">जिनपिंग ने मोदी से कहा कि वर्ष 2019 में अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने के उनके निमंत्रण को स्वीकार कर वह बहुत खुश हैं। यह दूसरा मौका होगा जब मैं भारत के अनौपचारिक दौरे पर जाउंगा। उन्होंने कहा, “ क़िंगदाओ में दोनों देश इस बात पर सहमत हुए थे कि चीन के रक्षा एवं नागरिक सुरक्षा मंत्री इस वर्ष भारत के दौरे पर जाएंगे। आज की बैठक में तय हुए है कि अगस्त और अक्टूबर महीने में क्रमश: दो दौरे होंगे।”</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतरराष्ट्रीय ख़बरें</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/international/modi-jinping-agree-on-consent-on-maintaining-peace-on-the-border/article-5022</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/international/modi-jinping-agree-on-consent-on-maintaining-peace-on-the-border/article-5022</guid>
                <pubDate>Fri, 27 Jul 2018 02:42:09 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-07/pm-modi-jimping.jpg"                         length="49841"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>घाटी में शांति के लिए सख्त कदम उठाए सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[तारकेश्वर मिश्र जम्मू कश्मीर में भाजपा-पीडीपी सरकार के गिरने के बाद से कश्मीर घाटी का दृश्य बदला हुआ दिखाई दे रहा है। रमजान के महीने में सीजफायर के दौरान आंतकी घटनाओं में एकाएक बढ़ोत्तरी ने प्रदेश व केंद्र सरकार की जमकर किरकिरी करवाई थी, लेकिन अब कश्मीर घाटी में राज्यपाल शासन लागू होते ही प्रशासन […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/government-takes-tough-steps-for-peace-in-the-valley/article-4502"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/artical-01.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>तारकेश्वर मिश्र</strong></p>
<p style="text-align:justify;">जम्मू कश्मीर में भाजपा-पीडीपी सरकार के गिरने के बाद से कश्मीर घाटी का दृश्य बदला हुआ दिखाई दे रहा है। रमजान के महीने में सीजफायर के दौरान आंतकी घटनाओं में एकाएक बढ़ोत्तरी ने प्रदेश व केंद्र सरकार की जमकर किरकिरी करवाई थी, लेकिन अब कश्मीर घाटी में राज्यपाल शासन लागू होते ही प्रशासन का नजरिया बदलने लगा। यासीन मलिक और मीर वाइज उमर फारुख को गिरफ्तार और सैयद अहमद शाह जिलानी को घर में नजरबंद करने जैसी कार्रवाई के साथ ये खबर भी आ गई कि अब घाटी में ब्लैक कैट कमांडो तैनात किए जा रहे हैं जो आतंकवादियों के सफाये के साथ ही अमरनाथ यात्रा के दौरान आने वाले लाखों यात्रियों की सुरक्षा का काम भी देखेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यपाल ने सभी दलों की बैठक बुलाकर राजनीतिक प्रक्रिया जारी रखने के संकेत भी दिए हैं। राज्यपाल शासन का अनुभव जम्मू कश्मीर को पहले भी हो चुका है लेकिन इस मर्तबा परिस्थितियां काफी अलग हैं क्योंकि पीडीपी-भाजपा गठबंधन टूटने की वजह वैचारिक मतभेद न होकर मुख्यमंत्री रहीं महबूबा मुफ्ती का पत्थरबाजों और अलगाववादियों के प्रति नरम रवैया बना।</p>
<p style="text-align:justify;">रमजान के उपरांत भी युद्धविराम जारी रखने की महबूबा की जिद के चलते भाजपा को गठबंधन तोडने का अवसर मिल गया। युद्धविराम के दौरान पत्थरबाजी और आतंकवादी घटनाओं में वृद्धि के कारण उसे आगे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं था। पीडीपी अपने रुख में बदलाव के लिए तैयार नहीं थी। सही बात ये है कि पीडीपी और भाजपा दोनों साथ रहते हुए असहज अनुभव कर रही थीं। यदि भाजपा ने गठबंधन नहीं तोड़ा होता तो महबूबा भी किसी दिन पत्रकार वार्ता बुलाकर भाजपा से दूर होने का ऐलान कर देतीं।</p>
<p style="text-align:justify;">उसकी भनक लगते ही भाजपा ने कमांडो एक्शन जैसी कार्रवाई करते हुए सरकार गिरवा दी। राज्यपाल शासन के बाद अब राज्य पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधीन आने से भाजपा को अपनी नीतियां लागू करने का अवसर मिल गया। यही वजह है कि ब्लैक कैट कमांडो तैनात करने जैसा फैसला लिया गया। इस फैसले से ये भी आभास होता है कि केंद्र सरकार अलगाववादियों से निबटने के लिए पूरी तैयारी कर रही है।<br />
कश्मीर के मामले में पाकिस्तान अंग्रेजों की भूमिका निभा रहा है जिसे चीन का खुला समर्थन है।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल राज्यपाल शासन लगते ही घाटी का माहौल बदलने के संकेत मिलने लगे हैं। शुरूवात होते ही सुरक्षा बलों ने कुछ आतंकवादियों को मार गिराया। हुर्रियत नेताओं द्वारा विरोध किये जाने पर उनकी गिरफ्तारी और नजरबंदी से लगने लगा है कि केंद्र उन सभी आरोपों को धो डालने के लिए तत्पर है जो महबूबा सरकार के रहते उसके दामन पर लगते रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">खबर है सेना एवं अन्य सुरक्षा बलों ने घाटी में पनाह लिए आतंकवादियों की पूरी सूची बना ली है। शीघ्र ही उनके विरुद्ध अभियान छेड़ा जाएगा। चूंकि ब्लैक कैट कमांडो विषम स्थितियों में भी अपने कार्य को सफलतापूर्वक करने हेतु प्रशिक्षित और अभ्यस्त रहते हैं इसलिए उनको मोर्चे पर उतारकर आतंकवादियों को ईंट का जवाब पत्थर से देने की रणनीति बनाली गई है। ऐसा करने से सुरक्षा बलों का हौसला भी बढ़ेगा जो राज्य सरकार के हस्तक्षेप और असहयोग की वजह से खुलकर अपने हाथ नहीं दिखा पा रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">अमरनाथ यात्रा के पहले सुरक्षा प्रबंध चाक-चौबंद करने की बेहद जरूरत है क्योंकि यात्रा के दौरान आतंकवादी वारदात से यात्रियों का ही नहीं पूरे देश का मनोबल गिरता है। ब्लैक कैट कमांडो को यदि आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई में लगा दिया जावे तो निश्चत रूप से ठोस नतीजे निकल सकते हैं। कड़वा सच ये है कि कश्मीर घाटी में तैनात राज्य के अधिकतर पुलिसकर्मी भी महबूबा मुफ्ती की तरह से ही अलगाववादियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। इसकी वजह डर भी हो सकता है किन्तु घाटी के भीतर भारत विरोधी भावनाएं काफी गहराई तक फैल चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नई पीढ़ी के नौजवानों के मन में अलगाववाद को मजहब के नाम पर इस तरह भर दिया गया जैसे आजादी के पहले पाकिस्तान बनाने का माहौल मुसलमानों में अंग्रेजों की मदद से पैदा किया गया था। वास्तव में कश्मीर को लेकर पूरा देश उद्वेलित है। वहां जिस तरह से अलगाववाद का फैलाव हुआ और सुरक्षा बलों के लोगों की जानें सस्ते में जाती गईं उससे देश में केंद्र सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही थी। लोग इस बात को लेकर हैरान थे कि प्रधानमंत्री अपने पहले वाले बयानों को कैसे भूल गए।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/article/government-takes-tough-steps-for-peace-in-the-valley/article-4502</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/article/government-takes-tough-steps-for-peace-in-the-valley/article-4502</guid>
                <pubDate>Tue, 26 Jun 2018 07:42:37 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-06/artical-01.jpg"                         length="130126"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शांति के नए युग का आगाज</title>
                                    <description><![CDATA[अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन की सिंगापुर शिखर वार्ता को न केवल कोरियाई प्रायद्वीप, बल्कि वैश्विक शांति स्थापना की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच दो दौर की वार्ता के बाद किम जोंग ने जहां पूर्णत परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए प्रतिबद्वता जताई […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/the-beginning-of-a-new-era-of-peace/article-4172"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/trump-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन की सिंगापुर शिखर वार्ता को न केवल कोरियाई प्रायद्वीप, बल्कि वैश्विक शांति स्थापना की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच दो दौर की वार्ता के बाद किम जोंग ने जहां पूर्णत परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए प्रतिबद्वता जताई है, तो वहीं बदले में अमेरिका ने उत्तर कोरिया को सुरक्षा की गांरटी दी है। शिखर वार्ता के बाद घोषित साझा दस्तावेज के मुताबिक अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच अब रिश्तों का नया दौर शुरू होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सिंगापुर के सैंटोसा द्वीप पर स्थित कैपेला होटल में दोनों नेताओं का मिलना कोरिया प्रायद्वीप के अमन व विश्व शांति के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा था। कहना गलत नहीं होगा कि उत्सुक्ता और विस्मय से भरपुर इस मेराथन वार्ता में गर्मजोशी के साथ-साथ, डोनाल्ड ट्रंप व किम जोंग-उन का बहुत कुछ दांव पर लगा था।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले दौर की मुलाकात समाप्त होने के बाद जब किम ने ट्रंप से अंग्रेजी में कहा ह्णनाइस टू मीट यू, मिस्टर प्रेजीडेंटह्ण तथा जवाब में ट्रंप ने किम से कहा ‘आई ट्रस्ट यू’ तभी इस बात का अहसास हो गया था कि दोनों नेता अतीत की कड़वाहट और पूर्वाग्रहों को त्याग कर खुले दिल से बातचीत कामन बनाकर सिंगापुर आए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस तरह से सिंगापुर में पुरानी तल्खी भूलकर ट्रंप और किम एक-दूसरे से गर्मजोशी सेमिले व बार-बार हाथ मिलाये उससे इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि सिंगापुर दस्तावेज में उल्लेखित शब्द देर-सवेर व्यावहारिक रूप लेंगे ही। द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने और कोरियाई प्रायद्वीप में पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण को लागू करने के उदेश्य के साथ जब ट्रंप और किम मिले तब इस बात की संभावना बहुत कम थी कि दोनों देशों के बीच किसी तरह का कोई करार अथवा डील हो सकेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यद्धपि सिंगापुर घोषणा, अस्पष्ट, संदेह बढ़ाने वाली और कूटनीतिक शब्दावली वाली डील है, जिसमें दोनों ही पक्षों की ओर से ऐसी कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं झलकती है, जिसका मूर्तरूप से आंकलन किया सके। डील पर संदेह के कई कारण है। प्रथम तो यह कि अब जब कि किम कोरिया प्रायद्वीप में निशस्त्रीकरण की प्रक्रिया को सैद्धातिंक तौर पर स्वीकार कर चुके हंै, ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि इसे व्यावहारिक रूप में कैसे लागू किया जाएगा। किम शुरू से ही इस प्रक्रिया को पश्चिमी देशों से आने वाले निवेश व व्यापार से जोड़कर देखते रहे हंै, जबकि डील में ट्रंप ने प्रतिबंधों को हटाने व उसमें ढील दिये जाने जैसी कोई बात नहीं की है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिबंधों के बारे में ट्रंप ने केवल इतना ही कहा कि जब यह सुनिश्चित हो जाएगा कि उत्तर कोरिया के परमाणु मिसाइल अब कारगर नहीं हैं, तो प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे। यानी किम के प्रोत्साहन व उत्तर कोरिया की पहल के लिए फिलहाल डील में कुछ नहीं है।द्वितीय, डील में उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों को नष्ट करने की कोई समय सीमा नहीं है और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि उत्तर कोरिया अपनी मिसाइल कार्यक्रम का परित्याग किस सीमा तक करेगा लेकिन यह उल्लेखनीय है कि वह ऐसा करने के लिए सहमति जता रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">डील पर एक प्रश्न यह भी उठ रहा है कि अमेरिका ने उत्तर कोरिया को सुरक्षा का जो भरोसा दिलाया है, उस भरोसे का कोई स्पष्ट रूप अब तक सामने नहीं आया है, अलबत्ता उसने दक्षिण कोरिया के साथ सांझा सैन्य अभ्यास रोक देने के संकेत जरूर दिये हैं। गौरतलब है कि इस सैन्य अभ्यास को लेकर किम जोंग-उन काफी नाराज थे और इसकी वजह से उन्होंने वार्ता से हट जाने की धमकी भी दी थी। दोनों नेताओं के बीच वार्ता के बाद करार के जिस स्वरूपपर हस्ताक्षर किए गए है, उसकी शब्दावली पर गौर करें तो देखेंगे कि वास्तव में जो समझौता हुआ है, वह लक्ष्य से कोसों दूर है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका चाहता था कि उत्तर कोरिया हमेशा के लिए पूर्ण परमाणु निरस्त्रीरकरण के लिए राजी हो परन्तु किम ने उत्तर कोरिया के पूर्ण और स्थायी तथा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप परमाणु निरस्त्रीरकरण की रजामंदी के बजाए कोरिया प्रायद्वीप के पूर्ण निरस्त्रीकरण के प्रयास की बात कही है। इसका एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि अमेरिका ने दक्षिण कोरिया की सुरक्षा के लिए जो परमाणु अस्त्र तैनात किए हुए है, उन्हें भी हटाया जाएगा। क्या अमेरिका ऐसा करेगा? सच तो यह है कि सिंगापुर घोषणा में परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकरअनिश्चितंता के वह तमाम तत्व मौजूद है जो भविष्य में दोनों देशों के बीच कड़वाहट का कारण बन सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा करार में परस्पर विश्वास बहाली की दिशा में आगे बढ़ने के किसी फार्मूलें की बात भी नहीं है। करार की पालना में उत्तर कोरिया परमाणु निरस्त्ररीकरण की दिशा में कोई कदम उठाता भी है तो ट्रंप सहजता से उस पर विश्वास कर लेंगे इसमें संदेह है। वार्ता से पहले जब उत्तर कोरिया ने अपनी परमाणु साइट क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने नष्ट करने की कार्रवाई की तो ट्रंप ने उत्तर कोरिया की इस कार्रवाई को खारीज कर दिया था। ट्रंप का मानना था कि यह केवल दिखावा था, क्योंकि वहां अंतरराष्ट्रीय प्रर्यवेक्षकों को जाने ही नहीं दिया गया। तृतीय, उत्तर कोरिया दोबारा कोई परीक्षण नहीं करेगा इसकी क्या गांरटी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी आंशका इसलिए बेजा नहीं है कि किम जोंग जिस उदेश्य व उम्मीद को लेकर बातचीत की टेबल तक आने के लिए राजी हुए थे वह अभी पूरी नहीं हुई है।वे अमेरिका के साथ ऐसी डील चाहते हंै, जो उनके देश की अर्थव्यवस्था एवं 2.5 करोड़ नागरिकों के हित में हो। ट्रंप ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंध फिलहाल जारी रहेंगे। लेकिन पिछले एक माह में किम जोंग-उन का जो व्यवहार व आचरण रहा है, उससे उन पर संदेह करने का फिलहाल कोई कारण नहीं दिखता है। सिंगापुर शिखर वार्ता के बाद अन्य देश क्या रियक्ट करते हैं, यह भी महत्वपूर्ण है, खासकर चीन, जापान व रूस ।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप इस मुलाकात को शांति कायम करने का एक मौका मान रहे हैं, वहीं दुनिया से अलग थलग रहने वाले उतर कोरिया के लिए शेष दुनिया से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। दरअसल दोनों ही नेताओं के लिए यह शिखर वार्ता उनके राजनीतिक जीवन के लिए एक संजीवनी की तरह थी। ट्रंप की लोकप्रियता देश के भीतर कम हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी सरकार के पास दिखाने के लिए बहुत कम उपलब्धियां है। वह चाहते हैं कि अगर वे उत्तर कोरिया को परमाणु कार्यक्रम से हटने के लिए राजी कर लेते हैं तो यह अतंरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसी घटना होगी जिसकी ध्वनि अगले कई वर्षोें तक सुनाई देगी। इस शिखर वार्ता के दौरान अगर वे कोरिया समस्या का स्थाई समाधान करने या उस दिशा में कोई महत्वपूर्ण पहल करने में सफल हो पाते हैं तो उनका कद न केवल अमेरिका के भीतर बल्कि वैश्विक जगत में बहुत ऊंचा हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ ऐसी ही मनोस्थिति किम जोंग की भी थी। मानवाधिकारों के हनन को लेकर वे अक्सर अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं का शिकार बनते रहे हैं। किम भी दक्षिण कोरिया की तरह अपने देश के नागरिकों को भी बेहतर जीवन सुविधाए देना चाहते हैं। यह तभी संभव है जब उत्तर कोरिया पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटे।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सिंगापुर घोषणा कोरिया प्रायद्वीप में शांति बहाली की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम जरूर है, पर शांति स्थापना की मंजिल अभी दूर है।लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई नेता किम जोेंग-उन ने शांति स्थपाना के जिस मार्ग पर चलने का मन बनाया है, वह आपसी सहयोग, त्याग और एक उदेश्य की मांग करता हैै। जाहिर है इसमें कई तरह के उतार-चढाव आएगें, सहमतियां-असहमतियां बनेगी और कठिन समझौते होंगे, पर 40 मिनट की बातचीत के बाद जब ट्रंप यह कहते कि दुनिया बड़ा बदलाव देखेगी। तो इस बात की उम्मीद बढ़ जाती है कि यह बदलाव सकारात्मक ही होगा ।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/article/the-beginning-of-a-new-era-of-peace/article-4172</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/article/the-beginning-of-a-new-era-of-peace/article-4172</guid>
                <pubDate>Fri, 15 Jun 2018 08:12:36 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-06/trump-1.jpg"                         length="92457"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘बेहतर रिश्तों के लिए बॉर्डर पर शांति जरूरी’</title>
                                    <description><![CDATA[डोकलाम विवाद के बाद भारत-चीन ने माना नई दिल्ली (एजेंसी)। भारत-चीन ने सिक्किम सेक्टर के डोकलाम और लद्दाख में हाल ही में हुए सैन्य टकराव के बाद पहली बार बॉर्डर पर हालात का रिव्यू किया। इसके लिए बीजिंग में मीटिंग हुई। इसमें इस बात पर सहमति जताई कि बेहतर रिश्तों के के लिए शांति बनाए […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/peace-needed-on-border-for-better-relations/article-3526"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/army-1.jpg" alt=""></a><br /><h2>डोकलाम विवाद के बाद भारत-चीन ने माना</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> भारत-चीन ने सिक्किम सेक्टर के डोकलाम और लद्दाख में हाल ही में हुए सैन्य टकराव के बाद पहली बार बॉर्डर पर हालात का रिव्यू किया। इसके लिए बीजिंग में मीटिंग हुई। इसमें इस बात पर सहमति जताई कि बेहतर रिश्तों के के लिए शांति बनाए रखना जरूरी है। बीजिंग स्थित इंडियन एंबेसी से शुक्रवार को जारी एक स्टेटमेंट में यह जानकारी दी गई। वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कन्सल्टेशन एंड को-आॅर्डिनेशन की 10वें दौर की मीटिंग में दोनों देशों के बीच बॉर्डर पर हालात का रिव्यू किया गया। इसके बाद जारी स्टेटमेंट में कहा गया, “बातचीत क्रिएटिव और पॉजिटिव तरीके से हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने भारत-चीन सीमा के सभी सेक्टरों में हालात का रिव्यू किया और दोनों ने इस बात पर रजामंदी जताई कि दोनों तरफ से रिश्तों की मजबूती के लिए बॉर्डर पर शांति बनाए रखना जरूरी है।”</p>
<p style="text-align:justify;">इस मीटिंग में दोनों देशों की सेनाओं के बीच बेहतर रिश्ते बनाने के लिए विचार साझा करने पर भी चर्चा हुई।  मीटिंग में भारत की ओर से फॉरेन मिनिस्ट्री के ज्वाइंट सेक्रेटरी (ईस्ट एशिया) प्रणय वर्मा और चीन की ओर से एशियाई मामलों के डिपार्टमेंट के डायरेक्टर जनरल शियाओ कुआन शामिल हुए। इसके अलावा दोनों ओर से डिप्लोमैट्स और मिलिट्री आॅफिशियल्स ने भी बातचीत की।  बता दें कि भारत और चीन के बीच का बॉर्डर पर विवाद 3,488 किमी लंबी लाइन आॅफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर है। डिब्बीक्या था डोकलाम विवाद?डोकलाम में विवाद 16 जून को तब शुरू हुआ था, जब इंडियन ट्रूप्स ने वहां चीन के सैनिकों को सड़क बनाने से रोक दिया था। हालांकि चीन का दावा था कि वह अपने इलाके में सड़क बना रहा था। इस एरिया का भारत में नाम डोका ला है जबकि भूटान में इसे डोकलाम कहा जाता है। चीन दावा करता है कि ये उसके डोंगलांग रीजन का हिस्सा है। भारत-चीन का जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक 3488 ‘े लंबा बॉर्डर है। इसका 220 ‘े हिस्सा सिक्किम में आता है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/peace-needed-on-border-for-better-relations/article-3526</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/peace-needed-on-border-for-better-relations/article-3526</guid>
                <pubDate>Sat, 18 Nov 2017 05:28:35 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-11/army-1.jpg"                         length="58935"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कश्मीर में शान्ति बहाली ही शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि</title>
                                    <description><![CDATA[कारगिल विजय दिवस विशेष | Kargil Victory Day Special 26 जुलाई 2017, 18वां कारगिल विजय दिवस, वो विजय दिवस जिसका मूल्य वीरों के रक्त से चुकाया गया! वो दिवस, जिसमें देश के हर नागरिक की आंखें विजय की खुशी से अधिक हमारे सैनिकों की शहादत के लिए सम्मान में नम होती हैं! 1999 के बाद से […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/peaceful-peace-in-kashmir-true-tributes-to-martyrs/article-2615"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/kargil.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:justify;">कारगिल विजय दिवस विशेष | Kargil Victory Day Special</h1>
<p style="text-align:justify;">26 जुलाई 2017, 18वां कारगिल विजय दिवस, वो विजय दिवस जिसका मूल्य वीरों के रक्त से चुकाया गया! वो दिवस, जिसमें देश के हर नागरिक की आंखें विजय की खुशी से अधिक हमारे सैनिकों की शहादत के लिए सम्मान में नम होती हैं! 1999 के बाद से भारतीय इतिहास में जुलाई का महीना हम भारतीयों के लिए कभी भी केवल एक महीना नहीं रहा और इस महीने की 26 तारीख कभी अकेली नहीं आई।</p>
<p style="text-align:justify;">26 जुलाई की तारीख अपने साथ हमेशा भावनाओं का सैलाब लेकर आती है। गर्व का भाव उस विजय पर जो हमारी सेनाओं ने हासिल की थी, श्रद्धा का भाव उन अमर शहीदों के लिए, जिन्होंने तिरंगे की शान में हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी! आक्रोश का भाव उस दुश्मन के लिए जो अनेकों समझौतों के बावजूद 1947 से आज तक तीन बार हमारी पीठ में छुरा घोंप चुका है!</p>
<p style="text-align:justify;">क्रोध का भाव उस स्वार्थी राजनीति, सत्ता और सिस्टम के लिए जिसका खून अपने ही देश के जवान बेटों की बली के बावजूद नहीं खौलता कि इस समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकाल सकें! बेबसी का भाव उन अनेक अनुत्तरित प्रश्नों से मचलते हृदय के लिए कि क्यों आज तक हम अपनी सीमाओं और अपने सैनिकों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हो पाए?</p>
<p style="text-align:justify;">उस मां के सामने असहाय होने का भाव, जिसने अपने जवान बेटे को तिरंगे में देखकर भी आंसू रोक लिए, क्योंकि उसे अपने बेटे पर अभिमान था कि वह अमर हो गया! उस पिता के लिए निशब्दता और निर्वात का भाव, जो अपने भीतर के खालीपन को लगातार देशाभिमान और गर्व से भरने की कोशिश करता है! उस पत्नी से क्षमा का भाव, जिसके घूंघट में छिपी आंसुओं से भीगी आंखों से आंख मिलाने की हिम्मत आज किसी भी वीर में नहीं!</p>
<p style="text-align:justify;">26 जुलाई अपने साथ यादें लेकर आती है टाइगर हिल, तोलोलिंग, पिम्पल काम्पलेक्स जैसी पहाड़ियों की। कानों में गूंजते हैं कैप्टन सौरभ कालिया, विक्रम बत्रा, मनोज पाण्डे, संजय कुमार जैसे नाम, जिनके बलिदान के आगे नतमस्तक है यह देश। 12 मई 1999 को एक बार फिर वो हुआ, जिसकी अपेक्षा नहीं थी। दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्रों में लड़ी गई थी वो जंग। 160 किमी के कारगिल क्षेत्र एलओसी पर चला था वो युद्ध।</p>
<p style="text-align:justify;">30000 भारतीय सैनिकों ने दुश्मन से लोहा लिया। 527 सैनिक व सैन्य अधिकारी शहीद हुए। 1363 से अधिक घायल हुए। 18000 ऊंची पहाड़ी पर 76 दिनों तक चला यह युद्ध भले ही 26 जुलाई 1999 को भारत की विजय की घोषणा के साथ समाप्त हो गया, लेकिन पूरा देश उन वीर सपूतों का ॠणी हो गया, जिनमें से अधिकतर 30 वर्ष के भी नहीं थे।</p>
<p style="text-align:justify;">“मैं या तो विजय के बाद भारत का तिरंगा लहरा के आऊंगा या फिर उसी तिरंगे में लिपटा आऊंगा” शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा के यह शब्द इस देश के हर युवा के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। कारगिल का पाइन्ट 4875 अब विक्रम बत्रा टॉप नाम से जाना जाता है, जोकि उनकी वीरता की कहानी कहता है और 76 दिन के संघर्ष के बाद जो तिरंगा कारगिल की सबसे ऊंची चोटी पर फहराया गया था, वो ऐसे ही अनेक नामों की विजय गाथा है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता का जश्न, वो पल लेकर आता है, जिसमें कुछ पाने की खुशी से अधिक बहुत कुछ खो देने से उपजे खालीपन का एहसास भी होता है, लेकिन इस विजय के 18 सालों बाद आज फिर कश्मीर सुलग रहा है। आज भी कभी हमारे सैनिक सीमा रेखा पर, तो कभी कश्मीर की वादियों में दुश्मन की ज्यादतियों के शिकार हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">युद्ध में देश की आन-बान और शान के लिए वीरगति को प्राप्त होना एक सैनिक के लिए गर्व का विषय है, लेकिन बिना युद्ध के कभी सोते हुए सैनिकों के कैंप पर हमला, तो कभी आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान अपने ही देशवासियों के हाथों पत्थरबाजी का शिकार होना कहां तक उचित है?</p>
<p style="text-align:justify;">अभी हाल ही के ताजा घटनाक्रम में जम्मू-कश्मीर पुलिस के डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को शब-ए-कद्र के जुलूस के दौरान भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। इससे पहले 10 मई 2017 को मात्र 23 वर्ष के आर्मी लेफ्टिनेन्ट उमर फैयाज की शोपियां में आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी, जब वे छुट्टियों में अपने घर आए थे और वे अभी छ: महीने पहले ही सेना में भर्ती हुए थे। इस प्रकार की घटनाओं से पूरे देश में आक्रोश है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारे सैनिकों की हैं, जिसे वे बखूबी निभाते भी हैं, लेकिन हमारे सैनिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी सरकार की है। हमारी सरकारें चाहे केंद्र की हो, चाहे राज्य की, क्या वे अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं? अगर हां, तो हमारे सैनिक देश की सीमाओं के भीतर ही वीरगति को क्यों प्राप्त हो रहे हैं? क्या सरकार की जिम्मेदारी खेद व्यक्त कर देने और पीड़ित परिवार को मुआवजा देने भर से समाप्त हो जाती है? कब तक बेकसूर लोगों की बली ली जाती रहेगी?</p>
<p style="text-align:justify;">समय आ गया है कि कश्मीर में चल रहे इस छद्म युद्ध का पटाक्षेप हो। सालों से सुलगते कश्मीर को अब एक स्थायी हल के द्वारा शांति की तलाश है। जिस दिन कश्मीर की वादियां फिर से केसर की खेती से लहलहाते हुए खेतों से खिलखिलाएंगी, जिस दिन कश्मीर के बच्चों के हाथों में पत्थर नहीं लैपटॉप होंगे और कश्मीर का युवा वहां के पर्यटन उद्योग की नींव मजबूत करने में अपना योगदान देकर स्वयं को देश की मुख्य धारा से जोड़ेगा, उस दिन कारगिल शहीदों को हमारे देश की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>डॉ. नीलम महेंद्र</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/article/peaceful-peace-in-kashmir-true-tributes-to-martyrs/article-2615</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/article/peaceful-peace-in-kashmir-true-tributes-to-martyrs/article-2615</guid>
                <pubDate>Wed, 26 Jul 2017 00:29:39 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-07/kargil.jpg"                         length="76746"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना कोष में दी 500,000 डॉलर की राशि</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना कोष में 500,000 डॉलर का योगदान दिया है और उसने उम्मीद जताई कि देशों द्वारा अधिक निधि दिए जाने से इस वैश्विक संस्था के शांति स्थापित करने के प्रयासों को बढ़ावा मिलेगा। दिसंबर 2005 में शांति स्थापना आयोग की शुरुआत से ही भारत इसका सदस्य रहा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/india-give-5-million-dollar-in-united-nations-peace-establishment-fund/article-1837"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/unitednation.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>संयुक्त राष्ट्र।</strong> भारत ने संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना कोष में 500,000 डॉलर का योगदान दिया है और उसने उम्मीद जताई कि देशों द्वारा अधिक निधि दिए जाने से इस वैश्विक संस्था के शांति स्थापित करने के प्रयासों को बढ़ावा मिलेगा। दिसंबर 2005 में शांति स्थापना आयोग की शुरुआत से ही भारत इसका सदस्य रहा है और अभी तक उसने शांति स्थापना कोष में 50 लाख डॉलर की राशि का योगदान दिया है। उसका ताजा योगदान 500,000 डॉलर का है।</p>
<h2>देशों में शांति स्थापित करने का उद्देश्य</h2>
<p>इस कोष की शुरुआत संघर्षग्रस्त देशों में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से संगठनों, गतिविधियों और कार्रवाइयों को समर्थन देने के लिए हुई थी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के उप स्थाई प्रतिनिधि तन्मय लाल ने यहां शांति स्थापना कोष की वार्षिक बैठक में कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि शांति स्थापना कोष अधिक संख्या में निधि आकर्षित में सक्षम होगा ताकि शांति स्थापित करने के संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों का जमीनी स्तर पर अधिक असर पड़ सके।</p>
<p> </p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतरराष्ट्रीय ख़बरें</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/international/india-give-5-million-dollar-in-united-nations-peace-establishment-fund/article-1837</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/international/india-give-5-million-dollar-in-united-nations-peace-establishment-fund/article-1837</guid>
                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 07:21:55 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-07/unitednation.jpg"                         length="72416"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        