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                <title>Monsoon farming - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Pearl Millet Farming: मानसून में करें बाजरे की वैज्ञानिक खेती, आइये जानते हैं कैसे? किसानों को मिलेगा अधिक लाभ,बढ़ेगी पैदावार</title>
                                    <description><![CDATA[खरीफ मौसम में बोई जाने वाली प्रमुख अनाज फसलों में बाजरा किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प के रूप में उभर रहा है। कम पानी में भी अच्छी उपज देने की इसकी क्षमता के कारण वर्षा आधारित और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के कृषकों के बीच इसकी खेती लगातार लोकप्रिय हो रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/pearl-millet-farming-do-scientific-farming-of-millet-in-monsoon/article-86939"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-06/bajre-ki-kheti.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नई दिल्ली। खरीफ मौसम में बोई जाने वाली प्रमुख अनाज फसलों में बाजरा किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प के रूप में उभर रहा है। कम पानी में भी अच्छी उपज देने की इसकी क्षमता के कारण वर्षा आधारित और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के कृषकों के बीच इसकी खेती लगातार लोकप्रिय हो रही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान वैज्ञानिक पद्धति से बाजरे की बुवाई और फसल प्रबंधन करें, तो उत्पादन के साथ-साथ आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। Pearl Millet Farming</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार बाजरे की बुवाई मानसून की पहली संतोषजनक वर्षा के बाद शुरू करनी चाहिए। जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के मध्य तक का समय इसकी बुवाई के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। इस अवधि में भूमि में पर्याप्त नमी होने से बीजों का अंकुरण बेहतर होता है और पौधों का विकास भी संतुलित रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छी पैदावार के लिए प्रमाणित एवं उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन आवश्यक है। बुवाई से पहले बीजों का फफूंदनाशी दवा से उपचार करने से बीजजनित रोगों की आशंका कम होती है तथा अंकुरण प्रतिशत में सुधार आता है। कृषि विशेषज्ञ किसानों को निर्धारित मात्रा में बीज उपचार करने की सलाह देते हैं, ताकि फसल प्रारंभ से ही स्वस्थ बनी रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">बुवाई सीड ड्रिल अथवा पारंपरिक कतार विधि से की जा सकती है। पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने से उन्हें पर्याप्त प्रकाश, वायु और पोषक तत्व मिलते हैं। यदि पौधे अधिक घने उग आएं तो अंकुरण के लगभग दो सप्ताह बाद अतिरिक्त पौधों को हटाकर संतुलित दूरी बनाए रखना लाभकारी रहता है। इससे पौधों में अधिक शाखाएं विकसित होती हैं और उत्पादन क्षमता बढ़ती है। Pearl Millet Farming</p>
<p style="text-align:justify;">फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना भी आवश्यक है। बुवाई के तीन से चार सप्ताह के भीतर पहली निराई-गुड़ाई करने से खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण मिलता है और पौधों की वृद्धि बेहतर होती है। सामान्यतः बाजरा वर्षा आधारित फसल है, लेकिन यदि वर्षा कम हो तो शुरुआती वृद्धि, कल्ले बनने और दाना विकसित होने के समय हल्की सिंचाई करने से उपज में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि उन्नत कृषि तकनीकों, संतुलित पोषण और समय पर फसल प्रबंधन अपनाकर किसान बाजरे की खेती को अधिक लाभदायक बना सकते हैं तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। Pearl Millet Farming</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 14:48:52 +0530</pubDate>
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