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                <title>Farming News - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Farming with Bullocks: हरियाणा के पूंडरी के किसान शीशपाल बैलों से खेती कर बचा रहे परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[एक समय था जब खेती-बाड़ी का पूरा काम बैलों के सहारे होता था। खेतों की जुताई से लेकर अनाज की ढुलाई तक बैलगाड़ियों का ही उपयोग किया जाता था। खेत से खलिहान, खलिहान से घर और घर से बाजार तक किसानों की जिंदगी बैलों पर निर्भर थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/farmer-sheeshpal-of-pundri-haryana-is-saving-tradition-by-farming/article-87255"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-06/farmer-sishpal.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पूंडरी (कैथल), (सच कहूँ/कुलदीप नैन)। एक समय था जब खेती-बाड़ी का पूरा काम बैलों के सहारे होता था। खेतों की जुताई से लेकर अनाज की ढुलाई तक बैलगाड़ियों का ही उपयोग किया जाता था। खेत से खलिहान, खलिहान से घर और घर से बाजार तक किसानों की जिंदगी बैलों पर निर्भर थी। समय के साथ ट्रैक्टरों ने बैलों की जगह ले ली और परंपरागत खेती लगभग समाप्त होती चली गई। लेकिन आज भी कुछ किसान इस विरासत को संजोए हुए हैं। जी हाँ! हम बात कर रहे है कैथल जिले के पूंडरी हल्के के गांव रमाना के किसान शीशपाल की जोकि आज भी बैलों से परंपरागत खेती कर रहे हैं। Farming with Bullocks</p>
<p style="text-align:justify;">किसान शीशपाल बताते हैं कि वह रोजाना सुबह 3 बजे उठते हैं। सबसे पहले अपनी चार भैंसों का दूध निकालते हैं और सुबह 5 बजे से पहले बैलों के साथ खेत में काम शुरू कर देते हैं। गर्मी से बचाने के लिए वह सुबह 8 बजे तक ही बैलों से काम लेते हैं और इसके बाद उन्हें आराम दे देते हैं। गौरतलब है कि रमाना-रमानी गांव आज भी अपनी परंपरागत खेती के लिए जाना जाता है। यहां बड़ी संख्या में बैल पाए जाते हैं और कई किसान आज भी बैलों के सहारे खेती कर ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक कृषि पद्धति को जीवित रखे हुए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन दिनों किसान शीशपाल धान की फसल के लिए खेत में 'कद्दू' कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह पूरा काम वह हर साल बैलों की मदद से ही करते हैं। एक दिन में वह लगभग एक एकड़ खेत तैयार कर लेते हैं। उनके पास एक बैल है, जबकि दूसरा बैल भाई संजय का है। दोनों मिलकर बैलों के जरिए अपने खेतों का कार्य करते हैं। Farming with Bullocks</p>
<h3 style="text-align:justify;">पहले के जमाने में की जाती थी सांझी खेती, भाईचारा बढ़ता था  </h3>
<p style="text-align:justify;">शीशपाल बताते हैं कि पहले छोटे किसानों के पास एक-एक बैल होता था। ऐसे में किसान आपस में बैल साझा करके खेतों की जुताई करते थे। एक किसान के खेत का काम पूरा होने के बाद वही बैल दूसरे किसान के खेत में लग जाता था। इससे खेती भी आसानी से होती थी और गांवों में भाईचारे की भावना भी मजबूत रहती थी। लेकिन आधुनिक दौर में यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि आज ट्रैक्टरों ने हल और बैलों की जगह ले ली है, लेकिन छोटे किसानों के लिए ट्रैक्टर से धान के खेत तैयार करवाना महंगा पड़ता है। कई बार खेत में ट्रैक्टर धंसने का खतरा रहता है और खेत की ड्योल (मेढ़) भी टूट जाती है, जिसे दोबारा ठीक करने में अतिरिक्त मेहनत और खर्च करना पड़ता है। किसान ने बताया कि छोटे जमीदारों को तो मेहनत ही बचती है। उनके पास कम जमीन है, इसलिए वे ट्रैक्क्टर के स्थान पर बैलो से खेती करटे है और छोटी-छोटी बचतों की तरफ ध्यान देते है। Farming with Bullocks</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 10:24:47 +0530</pubDate>
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