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                <title>Earth's Atmosphere - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Earth's Atmosphere: पृथ्वी का वायुमंडल कैसे बचाता है हमारी जान? जानिए इसके हैरान करने वाले राज</title>
                                    <description><![CDATA[धरती से अंतरिक्ष तक का रोमांचक सफर – आखिर अंतरिक्ष कहाँ से शुरू होता है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/earths-atmosphere/article-87477"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/earth&#039;s-atmosphere.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Earth's Atmosphere:  अनु सैनी। </strong>क्या आपने कभी रात के आसमान को देखकर सोचा है कि आखिर अंतरिक्ष शुरू कहाँ से होता है? क्या 10 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ता हवाई जहाज अंतरिक्ष में होता है? या फिर चाँद तक पहुँचने के बाद ही अंतरिक्ष शुरू माना जाता है? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें धरती के ऊपर मौजूद वायुमंडल की पाँच परतों को समझना होगा। जिस तरह पृथ्वी के अंदर कई परतें होती हैं, उसी तरह पृथ्वी के ऊपर भी गैसों से बनी पाँच मुख्य परतें हैं। इन्हीं परतों की वजह से धरती पर जीवन संभव है। ये हमें साँस लेने के लिए हवा देती हैं, सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती हैं और अंतरिक्ष से आने वाले अधिकांश उल्कापिंडों को धरती तक पहुँचने से पहले ही जला देती हैं।<br />आइए अब एक-एक करके इन पाँचों परतों की यात्रा करते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">1. ट्रोपोस्फियर (Troposphere) – जीवन की परत</h3>
<p style="text-align:justify;">धरती की सतह से लगभग 8 से 12 किलोमीटर तक फैली पहली परत को ट्रोपोस्फियर या क्षोभमंडल कहा जाता है। यही वह परत है जहाँ इंसान, जानवर, पेड़-पौधे और लगभग सभी जीव रहते हैं। धरती के वायुमंडल का लगभग 75 प्रतिशत भाग और लगभग सारा जलवाष्प इसी परत में मौजूद होता है। यही वह जगह है जहाँ बादल बनते हैं, बारिश होती है, आँधी-तूफान आते हैं, बिजली चमकती है और इंद्रधनुष दिखाई देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो धरती का पूरा मौसम इसी परत में बनता और बदलता है।<br />जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा का दबाव और ऑक्सीजन कम होने लगती है। लगभग 5 किलोमीटर की ऊँचाई पर साँस लेना कठिन होने लगता है और 8 से 10 किलोमीटर की ऊँचाई पर बिना ऑक्सीजन के अधिक देर तक जीवित रहना लगभग असंभव हो जाता है। यात्री विमान सामान्यतः 9 से 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ते हैं। इस ऊँचाई पर हवा पतली होती है, जिससे ईंधन की बचत होती है और मौसम का प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम रहता है। यदि ट्रोपोस्फियर न होता, तो न बारिश होती, न नदियाँ बहतीं और न ही धरती पर जीवन संभव होता।</p>
<h4 style="text-align:justify;">2. स्ट्रैटोस्फियर (Stratosphere) – धरती की सुरक्षा ढाल</h4>
<p style="text-align:justify;">ट्रोपोस्फियर के ऊपर लगभग 12 से 50 किलोमीटर तक फैली दूसरी परत स्ट्रैटोस्फियर या समतापमंडल कहलाती है। इस परत में मौसम लगभग शांत रहता है। यहाँ बादल, बारिश और तूफान बहुत कम होते हैं। इसी कारण कुछ विशेष विमान और मौसम संबंधी गुब्बारे इस क्षेत्र तक पहुँचते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस परत की सबसे बड़ी विशेषता है ओज़ोन परत। यही ओज़ोन सूर्य से आने वाली खतरनाक पराबैंगनी (UV) किरणों का अधिकांश भाग रोक लेती है। यदि ओज़ोन परत न होती, तो त्वचा का कैंसर, आँखों की गंभीर बीमारियाँ और पौधों को भारी नुकसान होता। शायद धरती पर जीवन आज जैसा है, वैसा कभी विकसित ही नहीं हो पाता। ट्रोपोस्फियर में ऊपर जाने पर तापमान घटता है, लेकिन स्ट्रैटोस्फियर में इसके विपरीत ऊपर जाते-जाते तापमान बढ़ने लगता है। इसका कारण यही है कि ओज़ोन सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित करके वातावरण को गर्म करती है। यदि कोई व्यक्ति बिना स्पेस सूट के यहाँ पहुँच जाए, तो ऑक्सीजन की कमी और बेहद कम वायुदाब के कारण कुछ ही समय में उसकी जान खतरे में पड़ जाएगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">3. मेसोस्फियर (Mesosphere) – धरती की अग्नि ढाल</h4>
<p style="text-align:justify;">लगभग 50 से 85 किलोमीटर तक फैली तीसरी परत मेसोस्फियर या मध्यमंडल कहलाती है। यह पृथ्वी के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। अंतरिक्ष से आने वाले अधिकांश छोटे उल्कापिंड इसी परत में प्रवेश करते ही अत्यधिक गति के कारण हवा से टकराकर गर्म हो जाते हैं और जलकर नष्ट हो जाते हैं। रात के समय जो "टूटते तारे" दिखाई देते हैं, वे वास्तव में तारे नहीं बल्कि जलते हुए उल्कापिंड होते हैं।<br />इस परत का तापमान लगभग -90 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है, इसलिए यह पृथ्वी के वायुमंडल का सबसे ठंडा क्षेत्र माना जाता है। यहाँ हवा इतनी कम होती है कि बिना विशेष स्पेस सूट के साँस लेना असंभव है। हालाँकि हवा बहुत पतली होती है, लेकिन उल्कापिंड लगभग 40 से 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से प्रवेश करते हैं। इतनी अधिक गति के कारण उनके सामने की हवा अत्यधिक संपीड़ित होती है और वही उन्हें अत्यधिक गर्म कर देती है। इसी वजह से वे जलते हुए दिखाई देते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">4. थर्मोस्फियर (Thermosphere) – जहाँ से अंतरिक्ष का एहसास शुरू होता है</h4>
<p style="text-align:justify;">मेसोस्फियर के ऊपर लगभग 85 किलोमीटर से 600 किलोमीटर तक फैली चौथी परत थर्मोस्फियर कहलाती है। यहीं पर लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर कार्मान रेखा (Kármán Line) मानी जाती है, जिसे अधिकांश वैज्ञानिक अंतरिक्ष की शुरुआत मानते हैं।<br />इस परत में सूर्य की तीव्र ऊर्जा के कारण तापमान 1500 से 2000 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक हो सकता है। लेकिन यहाँ हवा इतनी विरल होती है कि यदि कोई वस्तु यहाँ हो, तो उसे उतनी गर्मी महसूस नहीं होगी जितनी पृथ्वी पर होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहीं पर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) लगभग 400 किलोमीटर की ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। कई उपग्रह भी इसी क्षेत्र में मौजूद रहते हैं। ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देने वाली अद्भुत रोशनी, जिसे ऑरोरा कहा जाता है, इसी परत में बनती है। यह सूर्य से आने वाले आवेशित कणों और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के बीच होने वाली क्रिया का परिणाम है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">5. एक्सोस्फियर (Exosphere) – अंतरिक्ष का द्वार</h4>
<p style="text-align:justify;">थर्मोस्फियर के ऊपर लगभग 600 किलोमीटर से लेकर लगभग 10,000 किलोमीटर तक फैली अंतिम परत एक्सोस्फियर कहलाती है। यह पृथ्वी के वायुमंडल और अंतरिक्ष के बीच की अंतिम सीमा है। यहाँ हवा इतनी कम होती है कि गैसों के कण एक-दूसरे से शायद ही कभी टकराते हैं। यहीं से पृथ्वी का वातावरण धीरे-धीरे समाप्त होकर अंतरिक्ष में मिल जाता है। इस क्षेत्र में कई संचार और मौसम उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। यदि कोई अंतरिक्ष यात्री इस क्षेत्र में बिना स्पेस सूट के पहुँच जाए, तो कुछ ही सेकंड में ऑक्सीजन की कमी और निर्वात के कारण उसका जीवित रहना असंभव होगा।</p>
<h4 style="text-align:justify;">आखिर अंतरिक्ष कहाँ से शुरू होता है?</h4>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित कार्मान रेखा को अंतरिक्ष की शुरुआत माना जाता है। इस ऊँचाई के बाद हवा इतनी कम हो जाती है कि सामान्य विमान उड़ नहीं सकते। इसलिए अंतरिक्ष तक पहुँचने के लिए रॉकेट का उपयोग किया जाता है। रॉकेट पहले ट्रोपोस्फियर, फिर स्ट्रैटोस्फियर, उसके बाद मेसोस्फियर और थर्मोस्फियर को पार करता है। लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पार करते ही वह तकनीकी रूप से अंतरिक्ष में प्रवेश कर जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">धरती का वायुमंडल केवल गैसों की परत नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा करने वाला एक अद्भुत कवच है। ट्रोपोस्फियर हमें साँस लेने की हवा और मौसम देता है, स्ट्रैटोस्फियर की ओज़ोन परत हमें सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती है, मेसोस्फियर उल्कापिंडों को जलाकर पृथ्वी की रक्षा करता है, थर्मोस्फियर अंतरिक्ष स्टेशन और ऑरोरा का घर है, जबकि एक्सोस्फियर हमें धीरे-धीरे अनंत अंतरिक्ष से जोड़ देता है। यही कारण है कि जब कोई रॉकेट पृथ्वी से उड़ान भरता है, तो वह केवल ऊपर नहीं जाता, बल्कि जीवन की रक्षा करने वाली इन पाँचों परतों को पार करके उस विशाल ब्रह्मांड में प्रवेश करता है, जिसे हम अंतरिक्ष कहते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 11:44:14 +0530</pubDate>
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