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                <title>वैश्विक खाद्य सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिका, ईयू की बैठक</title>
                                    <description><![CDATA[वाशिंगटन (एजेंसी)। अमेरिका और यूरोपीय संघ(ईयू) यूक्रेन में जारी रूसी विशेष सैन्य अभियान के मद्देनजर वैश्विक खाद्य सुरक्षा की संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (टीटीसी) के साथ बैठक करेंगे। अमेरिका, यूरोपीय आयोग और यूरोपीय परिषद प्रशांत व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए 15-16 मई को पेरिस के पास […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/us-eu-meet-to-tackle-global-food-security-challenges/article-33471"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/european-union.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन (एजेंसी)।</strong> अमेरिका और यूरोपीय संघ(ईयू) यूक्रेन में जारी रूसी विशेष सैन्य अभियान के मद्देनजर वैश्विक खाद्य सुरक्षा की संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (टीटीसी) के साथ बैठक करेंगे। अमेरिका, यूरोपीय आयोग और यूरोपीय परिषद प्रशांत व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए 15-16 मई को पेरिस के पास सेगवे टेक्नोलॉजी हब में अपनी दूसरी मंत्रिस्तरीय बैठक आयोजित कर रहे हैं। आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा कि हम (अमेरिका, यूरोपीय संघ और व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद) यूक्रेन में रूसी हमले की वजह से उत्पन्न वैश्विक खाद्य सुरक्षा चुनौतियों पर से निपटने के प्रयासों के तहत नीतिगत संवाद स्थापित कर रहे हैं।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 May 2022 13:44:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>निर्यात से पहले देश की जरूरत हो पूरी</title>
                                    <description><![CDATA[वैश्विक संकट के दौर में भारत की खेती और किसानी रिकार्ड दर्ज कराने की ओर अग्रसर हैं। देश के किसानों की मेहनत, कृषि वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन और केंद्र सरकार की नीतियों के चलते ऐसा संभव हो रहा है। खाद्यान्नों से लेकर तिलहन, दलहन, गन्ना आदि के उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि होने का अनुमान हैं। भारत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/the-countrys-need-should-be-met-before-export/article-33456"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/indian-exports.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वैश्विक संकट के दौर में भारत की खेती और किसानी रिकार्ड दर्ज कराने की ओर अग्रसर हैं। देश के किसानों की मेहनत, कृषि वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन और केंद्र सरकार की नीतियों के चलते ऐसा संभव हो रहा है। खाद्यान्नों से लेकर तिलहन, दलहन, गन्ना आदि के उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि होने का अनुमान हैं। भारत में खाद्यान्नों के भंडार और रिकार्ड उत्पादन को देखते हुए वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न निर्यात बढ़ाने का भी अच्छा मौका है। भारत इस अवसर का लाभ उठाकर गेहूं की अच्छी कीमतों का लाभ किसानों को दे सकता है। वैश्विक स्तर पर कोरोना के साथ ही रूस और यूक्रेन युद्ध के चलते खाद्यान्न की मांग में बढ़ोतरी हुई है। वहीं दूसरी तरफ विश्व के कई स्थानों पर सूखे ने वैश्विक उत्पादन को कम कर दिया है, जिससे मांग में तेजी से वृद्धि हुई है। यही वजह है कि विश्व खाद्य लागत रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, दुनिया के दो बड़े गेहूं उत्पादक रूस व यूक्रेन करीब तीस फीसदी गेहूं आपूर्ति विश्व बाजार में करते रहे हैं, दोनों के युद्ध में उलझने से आपूर्ति शृंखला में बाधा उत्पन्न हुई है। फलत: अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूं की मांग बढ़ी है। एमएसपी से अधिक दाम मिलने से किसानों के चेहरों पर तो मुस्कान है लेकिन आम उपभोक्ताओं की चिंताएं बढ़ गई हैं। निस्संदेह महंगाई के दौर में लंबे समय तक इस स्थिति का बना रहना चिंता की बात होगी। खुदरा बाजार में आटे की कीमत तैंतीस रुपये पहुंचना लोगों की मुश्किल बढ़ाने वाला है क्योंकि एक साल की अवधि में यह वृद्धि करीब तेरह प्रतिशत के करीब है। इतना ही नहीं महंगे गेहूं से बेकरी उत्पादों की कीमतें भी बढ़ रही हैं। निस्संदेह, गेहूं निर्यात में वृद्धि के अल्पकालिक लाभ तो हो सकते हैं लेकिन सरकार को अपनी घरेलू प्राथमिकताओं का फिर से मूल्यांकन करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा न हो कि देश में खाद्यान्न कीमतें अनियंत्रित हो जायें। वह स्थिति बेहद खराब होगी कि हमें फिर से महंगे दामों पर गेहूं का आयात करना पड़े। इस स्थिति को हर हालत में टालने के प्रयास जरूरी हैं। सवा अरब से ज्यादा लोगों की खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करना आसान काम नहीं है। यूक्रेन संकट के पहले ग्लोबल मार्केट में भारतीय गेहूं का रेट 300-310 डॉलर प्रति टन था जो कुछ दिन में ही बढ़कर 360 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है। अगर यही हालात रहे तो अगले कुछ दिनों में ये 400 डॉलर प्रति टन पहुंच जाएगा। ये किसान और भारत दोनों के लिए अच्छा है। ध्यान रहे कि भारत में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है, जिसकी खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करना हर सरकार का प्राथमिक दायित्व है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद ही हमें निर्यात को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। सरकार को याद रखना होगा कि देश में कोरोना संकट के चलते सरकारी स्टॉक में पहले के मुकाबले कम गेहूं है, इस बार पैदावार में गिरावट आई है और सरकारी खरीद में भी परिस्थितिवश कमी आई है।</p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 May 2022 09:53:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर करारोपण की नयी वैश्विक संधि बनी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। वैश्विक स्तर पर काम करने वाली बड़ी कंपनियों पर करारोपण की एक न्यूनतम दर के बारे में शुक्रवार को एक वैश्विक समझौते पर 136 देशों की सहमति बनी। इस सहमति के दो अंग हैं। इनके तहत ऐसी कंपनियों पर न्यूनतम 15 प्रतिशत की दर से कर लगाया जाएगा और प्रत्येक देश को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/new-global-treaty-on-taxation-of-multinational-companies/article-27510"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-10/google-apple-fb.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> वैश्विक स्तर पर काम करने वाली बड़ी कंपनियों पर करारोपण की एक न्यूनतम दर के बारे में शुक्रवार को एक वैश्विक समझौते पर 136 देशों की सहमति बनी। इस सहमति के दो अंग हैं। इनके तहत ऐसी कंपनियों पर न्यूनतम 15 प्रतिशत की दर से कर लगाया जाएगा और प्रत्येक देश को अपने क्षेत्र में ऐसी कंपनियों के अर्जित राजस्व तथा लाभ पर कर लगाने का अधिकार होगा, चाहे वे वहां भौतिक रूप से उपस्थित न हों। विश्लेषकों की राय में इससे गूगल तथा अमेजन जैसे मंचों का कर दायित्व बढ़ सकता है। विकसित औद्योगिक देशों के पेरिस स्थित संगठन ओईसीडी- आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के तत्वावधान में लंबी बातचीत के बाद इस समझौते पर आज सहमति बनी। बातचीत में 140 शामिल थे।</p>
<p style="text-align:justify;">मीडिया चैनलों की रिपोर्ट के अनुसार एस्टोनिया हंगरी और सबसे महत्वपूर्ण आयरलैंड इस समझौते पर आज राजी हुए। रिपोर्टों के मुताबिक आयरलैंड के रुख के कारण समझौता अटका हुआ था। वार्ता में शामिल चार देशों पाकिस्तान, श्रीलंका, केन्या और नाइजीरिया ने इस पर भी हस्ताक्षर नहीं किए हैं। आयरलैंड के समझौते में शामिल होने के साथ ही इससे ओईसीडी और जी20 के सभी सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त हो गया है । इस समझौते में शामिल देश विश्व अर्थव्यवस्था में 90 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी रखते हैं । यह समझौता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के कई देश अपने यहां निवेश आकर्षित करने के लिए कर की दरें निम्न रखते हैं। इससे कर छूट की होड़ सी लगी रहती है। बड़ी कंपनियां इसका फायदा उठाने के लिए अपना लाभ उन देशों में दिखाती थीं, जहां कर की दरें बहुत कम होती हैं। इससे सरकारों के राजस्व की हानि होती थी और अर्थव्यवस्थाओं पर प्रतिकूल असर होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नए समझौता 2 स्तंभों पर खड़ा किया गया है ।इसमें पहला एक न्यूनतम कर का स्तंभ है जो 15 प्रतिशत रखा गया है। इसके अलावा सदस्य देशों को अपने क्षेत्र में बड़ी अंतरराष्ट्रीय इन्टरनेट कंपनियों के अर्जित किए गए लाभ के एक हिस्से पर कर लगाने का अधिकार प्राप्त होगा। अमेरिका में बिडेन सरकार के गठन के बाद वैश्विक न्यूनतम कर की पहल को एक गति मिली ।अमेरिकी प्रशासन के सहयोग से न्यूनतम वैश्विक कर के प्रस्ताव को शक्तिशाली जी7 समूह का समर्थन प्राप्त हुआ और जुलाई में इस पर मोटी सहमति बन गई थी, हालांकि उस समय आयरलैंड इससे सहमत नहीं हुआ था। हरलैंड में कंपनी कर की दर 12.50 प्रतिशत है। थाईलैंड में कर की दर कम होने के कारण ही फेसबुक एप्पल और गूगल जैसी कंपनियों ने अपने यूरोपीय मुख्यालय आयरलैंड में रखे हुए हैं। ओईसीडी के महासचिव मेथियस फोरमैन ने एक बयान में कहा यह एक कारगर और संतुलित बहुपक्षीय व्यवस्था की बड़ी जीत है। उन्होंने कहा कि आज के समझौते से हमारी अंतरराष्ट्रीय कर व्यवस्था पहले से अधिक निष्पक्ष बनेगी और अच्छे ढंग से काम करेंगी।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 Oct 2021 10:46:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैश्विक कारकों पर रहेगी निवेशकों की नजर</title>
                                    <description><![CDATA[मुंबई (एजेंसी)। वैश्विक दबाव में घरेलू शेयर बाजारों में बीते सप्ताह रही गिरावट के बाद आने वाले सप्ताह में भी निवेशकों की नजर मुख्यत: विदेशी कारकों पर ही रहेगी। विदेशों में कोविड-19 के डेल्टा संस्करण के मामले बढ़ने से गत सप्ताह बाजार में चिंता रही। इस सप्ताह निवेशकों के सतर्कता बरतने की उम्मीद है। साथ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/business/investors-will-keep-an-eye-on-global-factors/article-25480"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-07/investors-will-keep-an-eye-on-budget-economic-survey.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>मुंबई (एजेंसी)।</strong> वैश्विक दबाव में घरेलू शेयर बाजारों में बीते सप्ताह रही गिरावट के बाद आने वाले सप्ताह में भी निवेशकों की नजर मुख्यत: विदेशी कारकों पर ही रहेगी। विदेशों में कोविड-19 के डेल्टा संस्करण के मामले बढ़ने से गत सप्ताह बाजार में चिंता रही। इस सप्ताह निवेशकों के सतर्कता बरतने की उम्मीद है। साथ ही घरेलू स्तर पर महामारी तथा टीकाकरण की प्रगति और आठ प्रमुख उद्योग क्षेत्र के आँकड़ों का असर भी बाजार पर दिखेगा। घरेलू शेयर बाजार के लिए पिछला सप्ताह उतार-चढ़ाव भरा रहा। बीएसई का सेंसेक्स 164.26 अंक यानी 0.31 प्रतिशत की साप्ताहिक गिरावट में शुक्रवार को 52,975.80 अंक पर और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 67.35 अंक यानी 0.42 प्रतिशत लुढ़ककर सप्ताहांत पर 15,856.05 अंक पर बंद हुआ।</p>
<blockquote class="wp-embedded-content"><p><a href="http://10.0.0.122:1245/now-salary-will-come-in-your-account-even-on-holiday-rbi-is-making-big-changes-from-august-1/">अब छुट्टी के दिन भी आपके खाते में आएगी सैलरी, आरबीआई कर रहा है एक अगस्त से बड़े बदलाव</a></p></blockquote>
<p><iframe class="wp-embedded-content" title="“अब छुट्टी के दिन भी आपके खाते में आएगी सैलरी, आरबीआई कर रहा है एक अगस्त से बड़े बदलाव” — Sach kahoon - Best Online Hindi News" src="http://10.0.0.122:1245/now-salary-will-come-in-your-account-even-on-holiday-rbi-is-making-big-changes-from-august-1/embed/#?secret=nqDrQ0za6d%23?secret=sfgZMyRG8R" width="500" height="282" frameborder="0"></iframe></p>
<h4 style="text-align:justify;">वीरवार और शुक्रवार को रही तेजी</h4>
<p style="text-align:justify;">बुधवार को बकरीद के अवकाश के कारण बाजार में चार दिन ही कारोबार हुआ। सोमवार और मंगलवार को सेंसेक्स और निफ्टी लाल निशान में बंद हुये जबकि गुरुवार और शुक्रवार को तेजी रही। मझौली और छोटी कंपनियों के सूचकांक भी नुकसान में बंद हुये। सप्ताह के दौरान बीएसई का मिडकैप 0.47 प्रतिशत फिसलकर 23,021.14 अंक पर और स्मॉलकैप 0.14 प्रतिशत की गिरावट में 26,425.91 अंक पर आ गया।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 25 Jul 2021 12:34:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धरती की पुकार को अनसुना करना बंद करे इंसान</title>
                                    <description><![CDATA[हिंदू धर्मशास्त्रों में धरती को मां के सदृश्य माना गया है और यही धरती मां सभी की शरणस्थली भी है। साथ ही साथ इस धरा में मौजूद संसाधन उपहार के रूप में समान रूप से सभी प्राणियों को मिलें हैं। न किसी को ज्यादा और न किसी को कम। इसके अलावा पृथ्वी किसी भी प्राणी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/global-warming/article-8741"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-04/global-warming.jpg" alt=""></a><br /><p>हिंदू धर्मशास्त्रों में धरती को मां के सदृश्य माना गया है और यही धरती मां सभी की शरणस्थली भी है। साथ ही साथ इस धरा में मौजूद संसाधन उपहार के रूप में समान रूप से सभी प्राणियों को मिलें हैं। न किसी को ज्यादा और न किसी को कम। इसके अलावा पृथ्वी किसी भी प्राणी के साथ किसी भी तरह का भेदभाव भी नहीं करती। न सामाजिक रूप से, न आर्थिक रूप से और न ही अन्य किसी रूप में। साथ में ही प्रकृति में उपलब्ध संसाधन जल, नदी, पहाड़, खनिज संपदा और वन पर सभी का समान अधिकार है, बिना किसी संवैधानिक और राजनीतिक हस्तक्षेप के और इन संसाधनों का उपयोग करके हम अपना सर्वांगीण विकास तो कर सकते हैं।</p>
<p>लेकिन अगर चाह भी लें, तो इन प्रकृति प्रदत्त बहुमूल्य सम्पदाओं में वृद्धि नहीं कर सकते। लेकिन इनके संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। मानवीय पहुंच में सौरमंडल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जहां जीवन है, जहां पहाड़, झरने, नदी और तमाम जीव-जंतु पाएं जाते हैं। इतना ही नहीं सामंजस्य पूर्ण जीवन पृथ्वी पर व्यतीत करने के लिए इनमें आपसी तालमेल और मधुर समन्वय होना बेहद लाजिमी है। लेकिन मानव की बढ़ती भोग-विलासिता की इच्छा, लालच और लापरवाही ने न केवल दूसरे निर्दोष जीव-जंतुओं और प्राणियों का जीवन संकट में डाल दिया है, अपितु सम्पूर्ण धरा को ही काल के ग्रास में झोंक दिया है।</p>
<p>यहां यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज ब्लू प्लेनेट मानवीय लालसा और लापरवाही की वजह से ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण की चपेट से कराह रहा है। जो पृथ्वी मानवीय जीवन को आधार देने का कार्य सैकड़ों सदियों से करती आई है, वह मां रूपी धरती आज अपने बच्चों से पुकार लगा रही, कि वह उसे बचा लें। तो यह स्थिति काफी विकट और भयावह है। वर्तमान दौर में हमारी धरती कई रूपों में दवाब महसूस कर रहीं। जनसंख्या की बढ़ोतरी ने प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक बोझ बढ़ा दिया है। अत: अभी भी वक्त है कि जीव-जंतुओं के संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ने के साथ-साथ अक्षय ऊर्जा से चलने वाले वाहन और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग शुरू किया जाए। विदेशों की तर्ज पर साइकिल का उपयोग कर काम धंधे निपटाएं जाएं। प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम किया हो। पौधारोपण को बढ़ाया जाए। हर व्यक्ति उक्त प्रयास अपने स्तर पर करे तब इससे पूरी अवाम भी पृथ्वी को बचाने के लिए प्रोत्साहित होगी। नहीं तो विकास की चकाचौंध में विनाश भी छिपा होता, यह तो सर्वविदित है।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/global-warming/article-8741</link>
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                <pubDate>Sat, 27 Apr 2019 09:23:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देश की महान शख्सियतों को ग्लोबल प्राइड अवार्ड</title>
                                    <description><![CDATA[सम्मान। एंटी करप्शन फाउंडेशन आफ इंडिया द्वारा ऐतिहासिक अवार्ड कार्यक्रम का आयोजन करनाल(सच कहूँ/विजय शर्मा)। एंटी करप्शन फाउंडेशन आफ इंडिया द्वारा करनाल में ऐतिहासिक अवार्ड समारोह का आयोजन किया गया। सर्वपल्ली डॉ. राधा कृष्णन की पुण्यतिथि के अवसर पर देशभक्ति से ओतप्रोत श्रद्धाजंलि एंव ग्लोबल प्राइड अवार्ड सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। विख्यात पंजाबी गायक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/global-pride-award/article-8586"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-04/global-pride-award.jpg" alt=""></a><br /><h2>सम्मान। एंटी करप्शन फाउंडेशन आफ इंडिया द्वारा ऐतिहासिक अवार्ड कार्यक्रम का आयोजन</h2>
<p><strong>करनाल(सच कहूँ/विजय शर्मा)।</strong></p>
<p>एंटी करप्शन फाउंडेशन आफ इंडिया द्वारा करनाल में ऐतिहासिक अवार्ड समारोह का आयोजन किया गया। सर्वपल्ली डॉ. राधा कृष्णन की पुण्यतिथि के अवसर पर देशभक्ति से ओतप्रोत श्रद्धाजंलि एंव ग्लोबल प्राइड अवार्ड सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। विख्यात पंजाबी गायक मेहताब विर्क मुख्यातिथि, मिस इण्डिया व सेलिब्रिटी एंकर सिमरन डिनज आहूजा, आल इंडिया अचीवर्स कॉन्फ्रेंस के निदेशक अभिषेक बच्चन, ह्यूमन राइट्स इंटरनेशनल फेडरेशन की राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष नेहा शर्मा अति विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अतिथियों का स्वागत राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेंद्र अरोड़ा, नेशनल चीफ डायरेक्टर गुरजीत सिंह, सरंक्षक बलजीत सल्याण एंव नेशनल चीफ सेक्रेटरी सुमित ललित ने किया।</p>
<p>मंच संचालन नेशनल पी आर ओ स्वाति गोयल काम्बोज ने किया। ग्लोबल प्राइड अवार्ड व नेशनल प्राइड टीचर अवार्ड से सुरैया बानो, डॉ नन्दिनी तिवारी, एडवोकेट रमेश खेमू राठौड, पुष्पा गरोथिया, शालू सिंह, सुनीता रानी, कबीर सिंह, श्वेता माहेश्वरी, फातिमा खानम, अजीत सिंह, जितेंद्र सिंह, अर्चना लाल, मोनिका राय, रेनु पंवार, कविता सिंह पार्थ, कोमल भाटी, गौरव पाहवा, डॉ शिल्पी चौहान, के के शुक्ला, प्रकाश चंद जमनानी, विनोद कुमार, गुरप्रीत सिंह, रोजी हंजराह, विकास सचदेवा, रमनप्रीत सिंह, पूजा सिंह, राजकुमार, जूनियर राजेश खन्ना, गुरमीत सिंह, हेमा ठाकुर, प्रशांत स्वामी, डॉ शिव कुमार शर्मा, कुणाल चानना, गौरव सांगवान, सागर मदान, काम्या चौधरी, प्रिया बजाज, सुरजीत सिंह, गुरजीत सिंह, सिद्दकी अहमद मियां,</p>
<p>नासिर हुसैन, कंचन कटारिया, पारुल गुप्ता, अजमेर लाठर, अमित कुमार, हिमांशु सलूजा, अश्वनी काम्बोज, गुरविंदर सिंह, प्रेमचंद लोधी, राजीव कुमार, सुरेश लोधी, सत्यप्रकाश, साद खान, मीता साहा, रमेश साहुवाला, प्रमोद नागपाल, अमर सिंह, देवीराम कौशिक, अशोक खरब, अंकित विजय, डॉ चरणजीत कौर, डॉ अनूप सिंह यादव, नंदिनी, रेनु सिंह, नवीन नागपाल, संतोष कुमार, विजेंदर सिंह फोगाट, वसीम अकरम मोल्लाह, कपिल अत्रेजा, रोमन सेन, रोबिन खलीफा, मनोज कुमार, संजय कुमार, गगनदीप सिंह, मुनीष भाटिया को सम्मानित किया गया।</p>
<h2>उत्कृष्ट शिक्षकों को नेशनल प्राइड टीचर अवार्ड</h2>
<p>कार्यक्रम के दौरान खुशी, सरताज संधू, मुस्कान सतीजा ने प्रस्तुतियां दी। इस अवसर पर देश की महान विभूतियों को ग्लोबल प्राइड अवार्ड एंव उत्कृष्ट शिक्षकों को नेशनल प्राइड टीचर अवार्ड से सम्मानित किया। अतिथियों द्वारा सर्वपल्ली राधा कृष्णन को अपने शब्दों द्वारा श्रद्धाजंलि दी गई। फूलो की वर्षा के बीच अवाडीर्यों को सम्मानित किया गया।</p>
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                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/global-pride-award/article-8586</link>
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                <pubDate>Wed, 17 Apr 2019 20:31:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आतंकवाद एवं भगोड़ों के खिलाफ वैश्विक रणनीति बनाएं राजनयिक: वेंकैया</title>
                                    <description><![CDATA[आर्थिक विकास के वर्तमान चरण का प्रभावी संकलन बनाना चाहिए (Diplomatic: Terrorism creates a global strategy: Venkaiah) नयी दिल्ली  (वार्ता) उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने रविवार को कहा कि राजनयिकों को आतंकवाद, काला धन और भगोड़े अपराधियों के खिलाफ वैश्विक रणनीति बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। नायडू ने विदेशों में भारतीय मिशनों के प्रमुखों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/diplomatic-terrorism-creates-a-global-strategy-venkaiah/article-4603"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/venkaiah.jpg" alt=""></a><br /><h1>आर्थिक विकास के वर्तमान चरण का प्रभावी संकलन बनाना चाहिए</h1>
<p><strong>(Diplomatic: Terrorism creates a global strategy: Venkaiah)</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली  (वार्ता) </strong></p>
<p style="text-align:justify;">उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने रविवार को कहा कि राजनयिकों को आतंकवाद, काला धन और भगोड़े अपराधियों के खिलाफ वैश्विक रणनीति बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। नायडू ने विदेशों में भारतीय मिशनों के प्रमुखों के साथ बैठक को संबोधित करते हुए यहां कहा कि देश की विदेश नीति के अनूठे खजाने और कालातीत मूल्यों के साथ आर्थिक विकास के वर्तमान चरण का प्रभावी संकलन बनाना चाहिए।उन्होंने कहा, “हमें देश के अनूठे खजाने और कालातीत मूल्यों को ऊपर उठाकर भारत की कहानी लिखने और समकालीन भारत में आर्थिक विकास और परिवर्तनीय गति के वर्तमान चरण के उत्साह को जीवंत बनाने की जरूरत है।</p>
<h1>सतर्क रहने की जरूरत</h1>
<p style="text-align:justify;">”उन्होंने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के ओजस्वी नेतृत्व की सराहना करने के साथ ही उनके दो सहयोगियों एम जे अकबर और जनरल वी के सिंह की भी जमकर प्रशंसा की। नायडू ने कहा कि भारतीय विदेश नीति ने राजनयिकों के लिये नये मानक स्थापित किये हैं और पिछले चार वर्षों में इसमें लगभग पूरे विश्व को शामिल करके एक असाधारण रणनीति सुनिश्चित की है।उन्होंने मिशन प्रमुखों से कहा कि दुनियाभर के देशाें की राजधानियों में भारत के प्रतिनिधि के तौर पर उन्हें सतर्क रहने की जरूरत है।</p>
<p>Diplomatic Terrorism Creates Global Strategy</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/diplomatic-terrorism-creates-a-global-strategy-venkaiah/article-4603</link>
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                <pubDate>Mon, 02 Jul 2018 00:40:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हमने रंगों को भी बेरंग कर दिया</title>
                                    <description><![CDATA[हम काले हैं, तो क्या हुआ, दिलवाले हैं…’ मोहम्मद रफी का ये गाना सुनने में तो हमें बहुत अच्छा लगता है, लेकिन जब यही गाना हमारे समाज की सच्चाई से हमें रुबरु कराता है, तो हम इसे सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। समाज की तमाम कुरीतियों और भेदभाव पर तो चर्चा हो जाती है, […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-apartheid/article-2364"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/child1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हम काले हैं, तो क्या हुआ, दिलवाले हैं…’ मोहम्मद रफी का ये गाना सुनने में तो हमें बहुत अच्छा लगता है, लेकिन जब यही गाना हमारे समाज की सच्चाई से हमें रुबरु कराता है, तो हम इसे सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। समाज की तमाम कुरीतियों और भेदभाव पर तो चर्चा हो जाती है, परन्तु रंग-भेद पर चर्चा…?</p>
<p style="text-align:justify;">रंग-भेद की समस्या सिर्फ हमारे देश की समस्या नहीं है, ये एक वैश्विक समस्या है और हमारे समाज की तो यही खासियत है कि हम उन मामलों मे जरूर हस्तक्षेप करते हैं, जो वैश्विक होती है। लेकिन जाने क्यों यह (रंग-भेद) समस्या वैश्विक होकर भी समाधान की मंजिल तक अब तक नहीं पहुंच पाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">कहने को बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि हम गोरे-काले रंगों में विश्वास नहीं करते। फिर क्यों आज का युवा समाज शादी के लिए लड़के या लड़की का रंग ही पहले देखता है? अगर हम रंगों में विश्वास नहीं करते, तो क्यों आज भी बाजार में चंद दिनों में गोरे करने की क्रीम और पाउडर अब-तक टिके हुए हैं?</p>
<p style="text-align:justify;">और दिन-प्रतिदिन अपना बाजार बढ़ा रहे हैं? हमारे मन में काले रंग के प्रति कितनी दुर्भावना है, इसके उदाहरण हमें आए-दिन राह चलते दिख जाते हैं। हमने अपने इस भेदभाव से भगवान को भी नहीं बख्शा। हमसे अधिकांश लोगों ने बचपन में अपनी दादी-नानी की तमाम कहानियों में सुना ही होगा कि भगवान श्री कृष्ण जी का रंग सांवला था,</p>
<p style="text-align:justify;">परन्तु एक बात जो सोचने वाली है, वह यह कि अब तक जितने भी सीरियल बने हैं, उनमें कृष्ण जी के बचपन के अवतार को सांवला क्यों नहीं दिखाया गया? अधिकांशत: सभी सीरियल्स में श्री कृष्ण जी का बचपन अवतार गोरा ही होता है। ऐसा नहीं कि ये रंग-विभेद सिर्फ एक ही धर्म में है! दुनिया के तमाम धर्मों में कहीं न कहीं इसका प्रभाव दिख ही जाता है। लेकिन जरूरत अभी दुनिया सुधारने की नहीं है, जरूरत है अभी अपने घर को संवारने की।</p>
<p style="text-align:justify;">हम अगर रंग-विभेद में विश्वास नहीं करते, तो क्यों हमारे सिनेमा और सीरियल (जिसे समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग देखता है) के नायक और नायिका सिर्फ गोरे रंगों के होते हैं? गोरे रंग के लिए हम इतने संवेदनशील हैं कि हम जन्म लिए बच्चे को भी अपनी मानसिकता का शिकार बना लेते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जो बच्चा अभी अपने परिवार जनों को ठीक से नहीं पहचानता, वे भी थोड़ा बड़े होने पर पाउडर लगाकर ही घर से बाहर जाने की जिद्द करता है। रिसर्च के मामले में शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र छूटा होगा, जहां हमारे देश में रिसर्च नहीं हुई है,</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अब तक रंगों के भेदभाव के मामले में किसी बड़ी रिसर्च एजेंसी का रिसर्च सामने नहीं आया। समाज का जो युवा तमाम गलत बातों पर क्रांतिकारी बनने को तैयार हो जाता है, उनमें से ही अधिकांश युवा कॉलेज कैम्पस में काले-गोरे रंगों के बीच दूरी बढ़ाने का काम करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमने फैशन एक्सपर्ट से यह तो खूब सुना होगा कि अगर आप काले हैं, तो ऐसे रंग के कपड़े न पहनें, लेकिन कभी यह क्यों नहीं सुना कि आप गोरे हैं, तो यह रंग के कपड़े न पहने! रंगों के इस भेद का शिकार न केवल लड़कियों को होना पड़ता है,</p>
<p style="text-align:justify;">बल्कि लड़के भी इस समस्या से जूझ रहे हैं। यहां एक बात यह भी गौर करने वाली है कि इस समस्या का समाधान समस्या में ही छुपा है। अगर सांवले रंग के लोग अपने रंग के कारण मन में बैठे डर को निकाल दे, तो आधी समस्या का समाधान हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हमें अपने रंग पर नहीं अपने काम पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए और रही बात समाज की, तो उसकी स्थिति ऐसी होगी कि उसको पड़ोसी का घर गंदा दिखता है, लेकिन अपने घर पर लगे शीशे की धूल नहीं दिखती।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुप्रीया सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-apartheid/article-2364</link>
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                <pubDate>Sun, 16 Jul 2017 22:11:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वैश्विक एकजुटता जरुरी</title>
                                    <description><![CDATA[2015 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में संपन्न जलवायु शिखर सम्मेलन में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए कहा था कि वह कार्बन उत्सर्जन की समस्या को पैदा करने में अपनी भूमिका को स्वीकार करते हैं और इससे निपटने के लिए अपनी जिम्मेदारी को लेकर वह सजग भी है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/global-solidarity-is-necessary-on-the-issue-of-climate-change/article-854"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/trump.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">2015 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में संपन्न जलवायु शिखर सम्मेलन में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए कहा था कि वह कार्बन उत्सर्जन की समस्या को पैदा करने में अपनी भूमिका को स्वीकार करते हैं और इससे निपटने के लिए अपनी जिम्मेदारी को लेकर वह सजग भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन, वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आश्चर्यजनक रूप से पेरिस जलवायु समझौते से हटने का ऐलान कर दिया है। उनका मानना है कि 2015 में जलवायु परिवर्तन को लेकर हुआ यह वैश्विक समझौता अमेरिका के साथ न्याय नहीं करता। उनका विश्वास है कि पेरिस समझौता चीन तथा भारत जैसे देशों को फायदा पहुंचाता है। लिहाजा, उन्होंने पेरिस समझौते से हटने का फैसला किया है। ट्रंप के इस अनोखे रवैये की वजह से विश्वभर में उनकी आलोचना हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, यह पहली दफा नहीं है, जब जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अमेरिका का रवैया एकपक्षीय व हतप्रभ भरा रहा है। इससे पहले भी, अमेरिका क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पर अपनी भूमिका से मुकर चुका है। गौरतलब है कि तब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने क्योटो संधि पर हस्ताक्षर किए थे मगर, क्लिंटन के बाद राष्ट्रपति बने जॉर्ज बुश ने इसे मंजूरी देने से मना कर दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार फिर, मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की पर्यावरणीय नीतियों को दरकिनार कर अमेरिका की दादागिरी तथा ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाली मानसिकता को उजागर करने की कोशिश की है। जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए, वैश्विक एकजुटता का होना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन, सवाल यह है कि अमेरिका, पेरिस जलवायु समझौते को स्वीकारने से मुकर क्यों रहा है?</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि, विकसित देशों की सततपोषणीय विकास से इतर, एकाधिकारवादी औद्योगिक विकास की चाह ही जलवायु परिवर्तन के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेवार रही है। दरअसल, ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए पेरिस सम्मेलन के अंतर्गत विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों की सहायतार्थ 2020 तक 100 बिलियन डॉलर का सलाना फंड बनाने की बात कही गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन, अब विकसित देशों का कहना है कि केवल विकसित ही नहीं, अपितु विकासशील देशों को भी इसमें योगदान देना होगा। डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया है कि पेरिस समझौता, अमेरिका की संपदा को दूसरे देशों में बांट रहा है। ट्रंप को डर है कि अमेरिका अगर इस समझौते को स्वीकार करता है तो, वहां 27 लाख नौकरियों का संकट उत्पन्न हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने, भारत के संबंध में यहां तक कह दिया कि भारत को उत्सर्जन कम करने के वास्ते करोड़ों रुपये बतौर सहायता मिलने वाले हैं। अगर, ट्रंप की आशंकाओं को कुछ क्षण के लिए अपनी जगह सही मान लिया जाए फिर भी, ट्रंप द्वारा ऐतिहासिक पेरिस समझौते को पूरी तरह नकार देना समझ से परे है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में पेरिस समझौते का विशिष्ट महत्व रहा है। इसमें, वैश्विक तापमान को कम करना, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन बनाकर सौर ऊर्जा पर बल देने तथा हर पांच साल में प्रत्येक देश की भूमिका की प्रगति की समीक्षा करने जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य शामिल रहे हैं। सत्ता परिवर्तन के बाद जिस तरह, अमेरिका ने अपना रंग बदला है, उससे, जलवायु परिवर्तन से निपटने के उद्देश्यों को आंशिक झटका जरुर लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन पर दो ध्रुवों पर बंटे विश्व को एक मंच पर लाने का एक बड़ा प्रयास 2015 के पेरिस सम्मेलन में किया गया। इस समझौते की प्रमुख बात यह रही थी कि इसमें जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने की जिम्मेदारी केवल विकसित या विकासशील नहीं अपितु, सभी देशों पर डाली गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समझौते के बारे में उस वक्त कहा था कि ‘पेरिस समझौते में ना कोई विजेता है और ना ही किसी की हार हुई है, पर्यावरण को लेकर न्याय की जीत हुई है और हम सब एक हरे भरे भविष्य पर काम कर रहे हैं।’</p>
<p style="text-align:justify;">पेरिस समझौते के तहत 190 से अधिक देशों ने वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का लक्ष्य रखा है। तापमान का यह स्तर इसलिए महत्व रखता है, क्योंकि वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2 डिग्री से ऊपर के तापमान से धरती की जलवायु में बड़ा बदलाव हो सकता है, जिसके असर से ग्लेशियर का पिघलना, समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ना, सूखा, दावानल और बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाएं दस्तक दे सकती हैं। जलवायु परिवर्तन इस सदी की प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय समस्या रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व बैंक के मुख्य अधिकारी रहे अर्थशास्त्री सर निकोलस स्टर्न ने जलवायु परिवर्तन के नतीजों की तुलना दो विश्व युद्धों के सामाजिक और आर्थिक परिणामों तथा बीसवीं सदी की आर्थिक मंदी के रुप में की थी। यह सच्चाई है कि वैश्विक ऊष्मण की वजह से, पृथ्वी पर उपस्थित सभी सजीवों का जीवन-यापन करना कठिन हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैश्विक ऊष्मण जैव-विविधता का सबसे बड़ा दुश्मन है। वैश्विक ऊष्मण की वजह से ही प्राकृतिक मौसम तथा जलवायु चक्र विच्छेद हो रहे हैं, जिस कारण पृथ्वी का कुछ हिस्सा, प्रतिदिन बाढ़, सूखा, भूस्खलन व अन्य जानलेवा आपदाओं से प्रभावित रहता है। इस वजह से, भौतिक तथा मानव संसाधन का बड़े पैमाने पर नुकसान भी हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुखद यह है कि पर्यावरण संरक्षण पर आयोजित तमाम सम्मेलनों तथा तरह-तरह के एक दिवसीय वार्षिक आयोजन के बावजूद, वायुमंडल के औसत तापमान में कमी आने की बजाय, बढ़ोतरी ही हो रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछली सदी के दौरान, धरती का औसत तापमान 1.4 फारेनहाइट बढ़ चुका है। जबकि, अगले सौ साल के दौरान, इसके बढ़कर 2 से 11.5 फारेनहाइट होने के अनुमान हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकसित देशों का रवैया सदैव एकपक्षीय, ढुलमुल व स्वार्थ भरा रहा है। 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के बाद से ही, कार्बन उत्सर्जन को लेकर विकसित देशों ने अपनी भूमिका से हटते हुए, विकासशील देशों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था। जलवायु परिवर्तन एक ऐसा विषय है, जिससे पूरा विश्व समान रुप से जुड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बावजूद इसके, इस संवेदनशील मुद्दे पर एकजुटता की बजाय, वैश्विक स्तर पर राजनीति हो रही है। समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़, सूखा जैसी आपदाओं की विभीषिका का दंश कोई एक देश या महादेश नहीं, अपितु समस्त मानव समाज झेल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भारत ने कार्बन उत्सर्जन में 2030 तक 33 से 35 फीसदी तक कटौती का एलान कर इस दिशा में पहल भी कर दी है। जरूरत इस बात की है कि पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपनी एकजुटता दिखाए। ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता की बजाय सौर, पवन, भूतापीय तथा जल ऊर्जा का विकास करना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में राहत योग्य बात होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, विभिन्न देशों को अपने नागरिकों के लिए एक साझा कार्यक्रम तैयार कर पर्यावरण संरक्षण के निमित्त अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी। सकारात्मक पहल कर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटा जा सकता है। संसार की आठ अरब आबादी पूरी जिम्मेदारी के साथ छोटी-छोटी बातों पर अमल कर जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">–<strong>सुधीर कुमार</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Jun 2017 21:55:30 +0530</pubDate>
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                <title>बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत-जापान संबंध</title>
                                    <description><![CDATA[याद होगा दिसंबर, 2015 में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत की यात्रा पर आए थे तो कहा था कि दोनों देशों के रिश्तों की कलियां फूलों में बदल गयी हैं। अब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की यात्रा कर संबंधों को सुगंधियों से भर दिया है। दोनों देशों के बीच नौ द्विपक्षीय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/india-japan-relations-in-the-changing-global-landscape/article-341"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-11/abu-modi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">याद होगा दिसंबर, 2015 में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत की यात्रा पर आए थे तो कहा था कि दोनों देशों के रिश्तों की कलियां फूलों में बदल गयी हैं। अब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की यात्रा कर संबंधों को सुगंधियों से भर दिया है। दोनों देशों के बीच नौ द्विपक्षीय सहयोग संधियों समेत उस असैन्य परमाणु समझौते पर भी मुहर लगी है, जिसका भारत को वर्षों से इंतजार था। असैन्य परमाणु समझौता इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत ऐसा पहला देश है जिसने अभी तक एनपीटी (परमाणु हथियार अप्रसार संधि) पर हस्ताक्षर नहीं किया है, के बावजूद भी जापान ने उससे एटमी करार को आकार दिया है। गौरतलब है कि जापान अभी तक इस निर्णय पर कायम था कि जब तक भारत परमाणु हथियार अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेगा तब तक उसके साथ एटमी करार नहीं होगा। इधर, भारत भी इस संधि पर हस्ताक्षर के लिए तैयार नहीं था। कारण, भारत की नजर में यह संधि भेदभावपूर्ण है। यहां जानना आवश्यक है कि जब 1998 में भारत ने पोखरण परमाणु परीक्षण को अंजाम दिया तब भारत पर आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध थोपने वाले देशों में जापान भी शामिल था। लेकिन मोदी की कूटनीतिक करामात का नतीजा है कि जापान अपने रुख में परिवर्तन लाया। जापान के समर्थन के बाद अब भारत का पक्ष मजबूत होगा और उम्मीद है कि चीन भी विरोध के केंचुल से बाहर निकलने को मजबूर होगा। गौरतलब है कि चीन एनएसजी में भारत के प्रवेश का विरोध कर रहा है। जापान से असैन्य परमाणु संधि होने के बाद अब भारत को भी परमाणु परीक्षणों पर एकतरफा रोक का वादा, जो उसने 2008 में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से किया है उसे निभाना होगा। असैन्य परमाणु संधि के अलावा दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष, पर्यावरण एवं कृषि क्षेत्र में भी सहयोग के कई अहम समझौते हुए हैं जिससे भारत में जापानी निवेश बढ़ेगा और रेलवे एवं परिवहन क्षेत्र का बुनियादी ढांचा मजबूत होगा। दो समझौते अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए भी हुए हैं जिनमें एक समझौता इसरो और जापानी स्पेस एजेंसी जाक्सा के बीच हुआ है जिससे आउटर स्पेस में सैटलाइट नेविगेशन एवं खगोलीय खोज में मदद मिलेगी। मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया को धार देने के लिए भी दोनों देशों ने हाथ मिलाए हैं। याद होगा जापानी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान मारुति सुजुकी द्वारा विनिर्मित कारों के आयात के एलान के साथ ही 83 हजार करोड़ रुपए का मेक इन इंडिया कोष स्थापित करने का फैसला किया जा चुका है। अब भारत-जापान के बीच असैन्य परमाणु करार होने से दक्षिणी चीन सागर में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप पर लगाम लगेगा और संभवत: इसी बौखलाहट में वह भारत को चेतावनी दे रहा है। लेकिन सच तो यह है कि चीन हतोत्साहित है और अब उस पर अपनी हद में रहने का दबाव बढ़ गया है। कहना गलत नहीं होगा कि भारत और जापान के साथ आने से भारत की पूर्वोंन्मुख नीति को नई धार मिली है। यह सच्चाई भी है कि भारत और जापान दोनों हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और चीन सागर में चीन की बढ़ती दादागिरी से परेशान हैं। एक कहावत है कि शत्रु का शत्रु मित्र होता है। अगर ऐसे में भारत और जापान के बीच निकटता बढ़ती है तो यह स्वाभाविक ही है। वैसे भी गौर करें तो भारत और जापान का 1400 साल पुराना संबंध है। कारोबारी लिहाज से संपूर्ण दक्षिण एशिया में जापान सबसे बड़ा दाता और भारत सर्वाधिक जापानी आधिकारिक विकास सहायता यानी ओडीए प्रा΄त करने वाला देश है। वह भारत को 1986 से ही अनुदान देता आ रहा है। जापानी ओडीए भारत के त्वरित आर्थिक विकास प्रयत्नों विशेषकर उर्जा, पारगमन, पर्यावरण और मानवीय जरुरतों से जुड़ी परियोजनाओं को सहायता प्रदान करता है। भारत की सभी मेट्रो रेल परियोजनाएं भी जापानी आधिकारिक विकास सहायता की ही घटक हैं। जापान भारत के दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा में भी भागीदार है। यह गलियारा 90 अरब डॉलर की एक वृहत आधिकारिक संरचना परियोजना है जो जापान के वित्तीय और तकनीकी सहयोग से फलीभूत हो रहा है। गौरतलब है कि दिसंबर 2006 में इस परियोजना के एमओयू पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किया। 2011 में इस परियोजना के क्रियान्वयन हेतु मंत्रिमंडल ने दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा विकास निगम ने 18500 करोड़ रुपए की मंजूरी प्रदान की। इस पर काम तेजी से हो रहा है। गौरतलब है कि समर्पित मालभाड़ा गलियारा यानी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर भी जापान द्वारा वित्तपोषित है। यह गलियारा भारतीय रेलवे की एक महत्वकांक्षी परियोजना है जो देश के दो सबसे व्यस्त मार्गों पश्चिमी गलियारा व पूर्वी गलियारा की परिवहन आवश्यकताओं को अगले 20 वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। दिसंबर 2009 में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने इस गलियारे के निर्माण पर अपनी प्रतिबद्घता जताई है।<br />
इस परियोजना में पश्चिमी गलियारा के निर्माण हेतु जापान ने ‘आर्थिक भागीदारी की विशेष शर्तांे’ के तहत ओडीए कर्ज के द्वारा इनके वित्त पोषण को स्वीकार किया। आज की तारीख में भारत में दाइची सांक्यों, हिताची, सुजुकी, पैनासोनिक, यामाहा मोटर, मात्सुशिता जैसी सैकड़ों कंपनियां हैं जो भारत के विकास में सहायक बनी हुई हैं। गौर करना होगा कि जापान अपनी विदेशनीति का पुनर्निरुपण कर रहा है। वह भारत के साथ अपने हित मूल्य और रणनीति का साम्य देख रहा है ताकि वह एशिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। भारत के साथ असैन्य परमाणु करार को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। <em>अरविंद जयतिलक</em></p>
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                <pubDate>Sat, 12 Nov 2016 22:44:47 +0530</pubDate>
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