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                <title>भारत से संबंध सामान्य करने के लिए इमरान ने संयुक्त राष्ट्र से लगायी गुहार</title>
                                    <description><![CDATA[खान ने संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षकों को नियंत्रण रेखा के नजदीक जाने देने की मांग भी की। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा कि जब भारत के साथ उनके देश का रिश्ता सामान्य हो जाएगा तब दुनिया को पाकिस्तान की सही आर्थिक क्षमता का अहसास होगा।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/imran-appealed-to-un-to-normalize-relations-with-india/article-12705"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/pm-imran-khan.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">भारत के साथ युद्ध जैसी तनावपूर्ण स्थिति नहीं (PM Imran Khan)</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>इस्लामाबाद (सच कहूँ न्यूज)।</strong> आर्थिक तंगी का सामना कर रहे पाकिस्तान ने भारत से संबंधों को सामान्य करने के लिए संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से हस्तक्षेप करने की गुहार लगायी है। (PM Imran Khan) पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि मौजूदा समय में भारत के साथ युद्ध जैसी तनावपूर्ण स्थिति नहीं है, लेकिन इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका को दोनों परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच तनाव कम करने के लिए काम करना चाहिए। दैनिक समाचार पत्र डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक श्री खान ने स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की बैठक से इतर बुधवार को अंतरराष्ट्रीय मीडिया परिषद को दिए गए एक साक्षात्कार में यह बात कही।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें इस बात की चिंता है</li>
<li style="text-align:justify;">भारत अपने घरेलू विरोध-प्रदर्शनों से ध्यान भटकाने के लिए सीमा पर तनाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">शांति और स्थिरता के बिना आर्थिक विकास संभव नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘दो परमाणु हथियार संपन्न देश कभी संघर्ष के बारे में नहीं सोच सकते इसलिए संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका को इस दिशा में कदम उठाने चाहिए। खान ने संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षकों को नियंत्रण रेखा के नजदीक जाने देने की मांग भी की। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा कि जब भारत के साथ उनके देश का रिश्ता सामान्य हो जाएगा तब दुनिया को पाकिस्तान की सही आर्थिक क्षमता का अहसास होगा। खान ने कहा कि शांति और स्थिरता के बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के साथ हमारे संबंध अच्छे नहीं हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">जब ये सामान्य होंगे तो दुनिया को पाकिस्तान की रणनीतिक आर्थिक क्षमता के बारे में पता चलेगा।</li>
</ul>
<p> </p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi</a><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/"> News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</strong></p>
<p><span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title=""> </span></span></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतरराष्ट्रीय ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Jan 2020 18:34:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चिंता बढ़ाते पाक-मालदीव संबंध</title>
                                    <description><![CDATA[सार्क के सदस्य देश मालदीव ने भारत के पारम्परिक शत्रु पाकिस्तान के साथ ऊर्जा के क्षेत्र में समझौता कर भारत के लिए चिंता का नया द्वार खोल दिया हैं। मालदीव की सरकारी विद्युत कंपनी स्टेलको ने पिछले दिनों देश की ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के साथ यह समझौता किया है। मालदीव में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/pak-maldives-relations-increasing-anxiety-2/article-4830"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/pak.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सार्क के सदस्य देश मालदीव ने भारत के पारम्परिक शत्रु पाकिस्तान के साथ ऊर्जा के क्षेत्र में समझौता कर भारत के लिए चिंता का नया द्वार खोल दिया हैं। मालदीव की सरकारी विद्युत कंपनी स्टेलको ने पिछले दिनों देश की ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के साथ यह समझौता किया है। मालदीव में चीन के निरंतर बढ़ रहे प्रभाव से भारत पहले ही चिंतित है, ऐसे में पाक-मालदीव की जुगलबंदी से नई दिल्ली की परेशानी और बढ़ेगी। हेलीकॉप्टर और वर्क परमिट के मुद्दे पर जारी तनाव के बीच मालदीव ने पाकिस्तान के साथ ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में समझौता कर यह साफ कर दिया है कि मालदीव भारत के हितों से कोई सरोकार नहीं रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">
विशिष्ट भौगोलिक एवं सामरिक संरचना के चलते मालदीव भारत के लिए खासा महत्वपूर्ण है। तटीय प्रदेश केरल से केवल तीन सौ किमी की दूरी पर स्थित होने के कारण मालदीव जैसे देश में पाकिस्तान की पैठ बढ़ती है तो भारत को उत्तरी-पूर्वी राज्यों के साथ-साथ दक्षिण से नई सामरिक चुनौतियों का सामना करना पडेÞगा। हिन्द महासागार के रास्ते पश्चिम एशिया से चीन और पूर्वी एशिया की ओर जाने वाला मार्ग इसी द्वीप क्षेत्र से होकर निकलता हैं। इस क्षेत्र का उपयोग भारत व्यापारिक यात्राओं के लिए भी करता है, ऐसे में हिन्द महासागर में अपनी स्थिति मजबूत करने और दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए मालदीव के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना भारत के लिए जरूरी भी है। साल 2000 में चीन द्वारा यहां सैन्यबेस बनाए जाने का मुद्दा भी उठा था। बीच में ऐसी खबर भी आई थी कि चीन ने तत्कालीक राष्ट्रपति अब्दुल गयूम के सामने पनडुब्बियों के सैनिक अड्डे के निर्माण हेतू कुछ द्वीपों के खरीद किए जाने का प्रस्ताव रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन भारत की कड़ी आपत्ति के चलते मालदीव चीन के प्रस्ताव पर आगे नहीं बढ़ा। देखा जाए तो मालदीव में भारत की नीति हमेशा से ही ढुलमुल रवैये वाली रही है । पड़ोसी पहले की नीति पर चलने वाली मोदी सरकार ने भी अपने चार साल के कार्यकाल में मालदीव की लगभग उपेक्षा ही की है। साल 2012 में भारत समर्थक मोहम्मद नशीद की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार के विरूद्ध जब प्रदर्शनों और विरोध का सिलसिला शुरू हुआ तब नशीद भारत से सहयोग की उम्मीद लगाए हुए थे उस वक्त भारत ने नशीद का सहयोग करने के बजाए इसे मालदीव का आंतरिक मामला कहकर चुप्पी साध ली।भारत ने नाशीद की बर्खास्तगी की आलोचना करने के बजाए मोहम्मद वहीद हसन की सरकार को बधाई देकर न केवल नाशीद के जख्मों पर नमक छिड़का बल्कि मालदीव में हुए अलोकतांत्रिक सत्ता परिर्वतन पर भी अपनी मुहर लगा दी। इसी प्रकार जब मालदीव में कट्टरपंथियों द्वारा हिंदू संग्राहलय को तोड़ा गया तब भी भारतीय नेतृत्व चुप्पी साधे रहा। भारत की चुप्पी का परिणाम यह हुआ कि मालदीव ने भारत की नराजगी की परवाह किये बिना माले स्थित इब्राहिम नासीर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को विकसित किए जाने संबंधित समझौता बिना किसी कारण के रद्द कर दिया। पिछले दिनों भी मालदीव के एक अखबार ने भारत को सबसे बड़ा दुश्मन बताया और कहा कि पीएम मोदी मुस्लिम विरोधी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
देखा जाए तो साल 2012 में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही मालदीव में भारत विरोधी भावनाओं का विस्तार होने लगा है। मौजूदा राष्ट्रपति अबदुल्ला यामीन की कार्यशैली पूरी तरह भारत विरोधी रही है। यामीन के बारे में यहां तक कहा जा रहा है कि वह अपने देश में भारत की किसी तरह की भागीदारी पंसद नहीं करते हैं। पिछले दिनों उन्होंने भारतीयों के लिए वर्क परमिट जारी करना बंद कर दिया था जिसकी वजह से वहां उन परियोजनाओं का काम प्रभावित हो रहा है, जिसमें भारत की भागीदारी है। वर्क परमिट, डॉर्नियर सर्विलांस एयरक्राफ्ट और नौसेना के हेलीकॉपटर से जुड़े मुद्दों को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। डार्नियर सर्विलांस एयरक्राफ्ट की तैनाती के भारत के प्रस्ताव को यामीन सरकार द्वारा स्वीकार नहीं किए जाने के पीछे एक वजह पाकिस्तान को भी बताया जा रहा है। पाकिस्तान ने उसे इसी तरह के एयरक्राफ्ट मुहैया कराने का प्रस्ताव किया है। साल 2013 में भारत की ओर से उपहार में दिए गए दो धु्रव एडवांस लाईट हेलिकॉप्टर को रखने की समय सीमा बढाने से इंकार कर दिया था। यामीन ने इस साल के आंरभ में ही साफ कह दिया था कि भारत अपने हेलिकॉप्टर और पायलटों को वापस बुला ले।</p>
<p style="text-align:justify;">
पाक-मालदीव का ताजा ऊर्जा समझौता ऐसे वक्त में हुआ है, जबकि सटेलको की बहुत सी परियोजनाओं का संचालन चीनी कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि मालदीव को पाकिस्तान के साथ समझौता करने की जरूरत क्यों आन पड़ी। दूसरा, पाकिस्तान वित्तीय रूप से भी मालदीव को किसी तरह की मदद पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। उसके खुद की अर्थव्यवस्था अब तक के सबसे खराब दौर से गुजर रही है। ऐसे में मालदीव भारत की शर्त पर पाकिस्तान से संबंध बढ़ा कर वहां से क्या हासिल करना चाहता है? तृतीय, सबसे बड़ा प्रश्न समझौते के वक्त को लेकर उठ रहा है। मालदीव ने पाकिस्तान के साथ समझौता ऐसे वक्त में किया है जबकि भारत के न केवल पाकिस्तान के साथ बल्कि मालदीव के साथ भी संबंध अब तक के सबसे निचले स्तर तक पहुंच गए है। पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा उरी में किए गए आतंकी हमले के बाद जब भारत ने पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन को रद्द करने की मांग की थी तो केवल मालदीव ही ऐसा देश था जिसने भारत के निर्णय का विरोध किया था। ऐसे विपरीत वक्त में पाकिस्तान के साथ मालदीव का बिजली समझौता भारत के लिए चिंता का सबब बन सकता है। भारत की चिंता का एक बड़ा कारण यह भी है कि मालदीव का उपयोग पाकिस्तान भारत के खिलाफ जासूसी के लिए कर सकता है, जिससे इस क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और भी जटील हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">
उक्त हालात इस लिए भी चिंताजनक है क्यों कि संकट के समय भारत ने मालदीव की मदद की। साल 1988 में जब पिपुल्स लिबरेशन आगेर्नाइजेशन आॅफ तमिल इल्म से जुडे आतंकवादियों ने मालदीव पर हमला किया तो तात्कालिक राष्ट्रपति अब्दुल गयूम ने भारत सरकार से सहायता की याचना की। इस पर भारत सरकार ने ‘आॅपरेशन कैक्टस’ के तहत सेना भेजकर आतंकवादियों को खदेड़ने में मालदीव की मदद की है।उसके समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भारत वहां नेशनल पुलिस एकेडमी के निर्माण में सहयोग कर रहा है। इसके अलावा समुद्री डाकुओं से सुरक्षा के लिए भारत ने वहां अपने युु़द्ध पोत तैनात कर रखे हैं।  इससे पहले साल 2015 में भी मालदीव की संसद ने विदेशी नागरिकों को अपने देश में भूमि खरीदने संबंधी अधिकार देकर भारत के सामने एक तरह का खतरा पैदा कर दिया है। इस अधिकार के तहत कोई भी विदेशी नागरिक मालदीव की अर्थव्यवस्था में एक अरब डॉलर का निवेश करके भूमि का स्थाई मालिक बन सकता है। प्रर्यटन पर आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण मालदीव ने आयात-निर्यात नियमों में कई प्रकार की ढील दे रखी हैं। इसकी आड़ में जिहादी तत्व बेनामी व फर्जी कंपनियों के मार्फत मालदीव में धन एकत्रित करते हैं। बाद में इसी धन का प्रयोग श्रीलंका, केरल और तमिलनाडू में विध्वसंक गतिविधियों में किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसे अलावा मालदीव में एक हजार से अधिक ऐसे द्वीप हंै, जो पूरी तरह निर्जन और विरान है। जिनकी निगरानी और सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम मालदीव सरकार ने नहीं कर रखा है। ऐसी स्थिति में भारत का चिंतित होना लाजमी है। कोई संदेह नहीं कि मालदीव से भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ रही हैं। पाक-मालदीव के बीच बढ़ते संबंध भारत के सामने नई मुश्किल पैदा करेगे इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है। फिर भी, इस तथ्य को नहीं भुलना चाहिए कि मालदीव सार्क का महत्वपूर्ण सदस्य है, दक्षिण एशिया में अगर भारत को अपना प्रभुत्व बनाए रखना है तो उसे हर हाल में मालदीव को साथ रखना ही होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>एन.के. सोमानी</strong></p>
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                <pubDate>Sat, 14 Jul 2018 06:00:44 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मोदी सरकार में पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंधों में भी आयी खटास : कांग्रेस</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली (वार्ता) विदेश नीति का कांग्रेस मॉडल सबसे बेहतर है लेकिन मोदी सरकार ने इसे नजरअंदाज किया है जिससे कई राष्ट्रों के साथ हमारी मित्रता कमजोर पडी है और नेपाल तथा भूटान जैसे पडोसियों के साथ भी संबंधों में खटास आयी है! कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने 84वें महा अधिवेशन में विदेश नीति के प्रस्ताव […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/modi-government-also-came-in-relations-with-neighboring-countries-congress/article-3591"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/congress.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली (वार्ता) </strong>विदेश नीति का कांग्रेस मॉडल सबसे बेहतर है लेकिन मोदी सरकार ने इसे नजरअंदाज किया है जिससे कई राष्ट्रों के साथ हमारी मित्रता कमजोर पडी है और नेपाल तथा भूटान जैसे पडोसियों के साथ भी संबंधों में खटास आयी है! कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने 84वें महा अधिवेशन में विदेश नीति के प्रस्ताव पर हुई चर्चा के दौरान यह बात कहते हुए आरोप लगाया कि मोदी सरकार की अपनी कोई विदेश नीति नहीं है और उसने कांग्रेस सरकारों द्वारा स्थापित महत्वपूर्ण विदेश नीति को भी चौपट कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश नीति संबंधी प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद इस पर हुई चर्चा में हिस्सा लेते हुए पार्टी के युवा नेता गौर गोगोई ने कहा कि नेपाल, भूटान, बंगलादेश, मालदीव, श्रीलंका आदि के साथ हमारे पहले से बहुत अच्छे संबंध रहे हैं लेकिन मोदी सरकार में इन संबंधों में खटास आयी है और पहले जैसे मधुरता नहीं रही है। उन्होंने कांग्रेस मॉडल की विदेश नीति को सबसे बेहतर करार दिया और आहवान किया कि इसे ही आगे बढाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि देश और दुनिया बदल रही है इसलिए बदले परिवेश में हमें भी बदलने की जरूरत है और ग्लोबलाइजेशन की जगह अब प्रोफेसनलाइजेशन को महत्व दिया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">पार्टी के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला ने कहा कि निर्गुट आंदोलन कांग्रेस की देन है और पंडित नेहरू जब बोलते थे तो दुनिया उनको सुनने के लिए उत्सुक रहती थी। मोदी सरकार पाकिस्तान को लेकर बड़े दावे करती है और सर्जिकल स्ट्राइक को बडी और पहली उपलब्धि बताती रही है लेकिन जब सेना प्रमुख ने कहा ऐसे काम पहले भी हुए तो सरकार के तेवर कुछ हल्के पडे। यह सरकार सिर्फ प्रचार पर भरोसा करती है और विदेश नीति में उसी का इस्तेमाल करती है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 18 Mar 2018 04:08:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>अन्तरजातीय संबंधों में अंतर्द्वंद्व मिटाना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तरभारत में पिछले कई महीनों से आत्म-सम्मान के लिए हत्याओं का सिलसिला भयानक रूप लेता जा रहा है। उधर, शिक्षा व आर्थिक प्रगति के चलते भारतीय समाज में जमीन-आसमान का परिवर्तन हो चुका है। आज से चालीस वर्ष पहले का भारत पारिवारिक व जातिगत बंधनों में रहना पसंद करता था। जहां परिवार, रिश्तेदार, अपना गौत्र, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/editorial/interlude-will-be-erased-in-inter-regional-relations/article-3547"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-02/relestion.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उत्तरभारत में पिछले कई महीनों से आत्म-सम्मान के लिए हत्याओं का सिलसिला भयानक रूप लेता जा रहा है। उधर, शिक्षा व आर्थिक प्रगति के चलते भारतीय समाज में जमीन-आसमान का परिवर्तन हो चुका है। आज से चालीस वर्ष पहले का भारत पारिवारिक व जातिगत बंधनों में रहना पसंद करता था। जहां परिवार, रिश्तेदार, अपना गौत्र, जाति व गांव को लोग अपने-आपको एक ईकाई की तरह ही मानते थे, लेकिन अब चालीस साल पुराना वह समाज बदल चुका है। इस बदलाव में सबसे क्रांतिकारी भूमिका संचार माध्यमों, जिनमें टीवी, इंटरनेट, अखबारों ने निभाई है। बदलाव अपने साथ जहां परिवर्तन की नई हवा लाते हैं, वहीं ये कई दफा एक समस्या भी बनते हैं। देश में आत्मसम्मान के लिए हत्याओं के अपराध बढ़ रहे हैं। हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान कोई भी प्रदेश इससे अछूता नहीं, जहां इस तरह के अपराध न हो रहे हों।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी लोग अपने सामाजिक रीति-रिवाजों से जुड़ी प्रतिष्ठा के चलते नवयुवकों के आपसी संबंधों पर मरने-मारने पर उतारु हैं। सरकार देश में जातिवादी, वर्गवादी व्यवस्था का अंत चाहती है। सरकार ने प्रावधान किया है कि यदि युवा अन्तरजातीय शादी करते हैं, तब उन्हें शगुन या प्रोत्साहन के तौर पर एक लाख रुपए दिया जाएगा। भारतीय समाज की पुरानी पीढ़ी अन्तरजातीय संबंधों को नफरत से देखती है। वह नहीं चाहती कि उनके पुत्र-पुत्रियां विवाह पूर्व आपस में किसी को अपनी पसंद बनाएं। प्रौढ़ व वृद्ध पीढ़ी युवाओं को ऐसे युगलों के खिलाफ उकसाती भी है, जो समाज में अन्तरजातीय विवाह करने की राह पर चलते हैं, न्यायालय के आदेशों पर अन्तरजातीय विवाह करने वालों के लिए सुरक्षित घर व सुरक्षा की व्यवस्था भी सरकारें कर रही हैं, लेकिन सब विफल है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां जो सामाजिक टकराव है, इसे सरकार, युवाओं एवं पुरानी पीढ़ी को मिलकर सुलझाना होगा। सबसे पहले देश में जाति की ऊंच-नीच के मानसिक बंधनों को गिराना होगा। यह सब तब संभव है, जब आरक्षण व जातिवादी राजनीति पर प्रतिबंध लगे। लोगों में सही धार्मिक शिक्षा व आधुनिक शिक्षा का अर्थ जाए, जो यह समझा सके कि मनुष्य एक-समान है। कोई उच्च अथवा नीच जाति या कुल नहीं है। साथ ही यह भी माहौल बने कि जो व्यक्ति बुरे कर्म करता है, जैसे नशा करना, वेश्यावृति करना, बेइमानी, भ्रष्टाचार करने वाले लोगों से नफरत की जाए, अन्यथा कोई व्यक्ति नफरत के लायक नहीं। समाज को समझना होगा कि सामाजिक जीवन सदैव परिवर्तनशील रहता है। अत: यह किसी एक मान्यता व विचारों में बंधा नहीं रह सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">लोग शिक्षा, पूंजी हासिल ही इसलिए करते हैं कि वह पहले से बेहतर जीवन जी सकें। सबसे हिल-मिल सकें, ऐसे में पुरानी मान्यताओं पर सिमटकर अपराध करना उचित नहीं। युवाओं को भी सोचना होगा, चूंकि समाज की अंत:संबंधों के प्रति नफरत का कारण वासनापूर्ण संबंध हैं। जहां प्रेम या शादी का विचार न होकर यौन संबंधों को जीना मात्र होता है, जोकि समाज को आत्मसम्मान के लिए हत्या करने के लिए उकसाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अत: युवाओं को चाहिए कि वह भी अच्छी शिक्षा हासिल कर अपने लिए व परिवार के लिए समाज में एक सम्मानजनक स्थान हासिल करें। वह नौकरी, व्यापार, पेशेवर कोई भी हो सकता है। महज विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण को ही जीवन का लक्ष्य न बनाएं, चूंकि अब देखा जा रहा है कि किशोर उम्र में ही युवक-युवतियां भटक रहे हैं, जो उनके अपने जीवन व तरक्की के लिए भी कोई अच्छी पहल नहीं कही जा सकती।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Feb 2018 01:48:10 +0530</pubDate>
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                <title>‘बेहतर रिश्तों के लिए बॉर्डर पर शांति जरूरी’</title>
                                    <description><![CDATA[डोकलाम विवाद के बाद भारत-चीन ने माना नई दिल्ली (एजेंसी)। भारत-चीन ने सिक्किम सेक्टर के डोकलाम और लद्दाख में हाल ही में हुए सैन्य टकराव के बाद पहली बार बॉर्डर पर हालात का रिव्यू किया। इसके लिए बीजिंग में मीटिंग हुई। इसमें इस बात पर सहमति जताई कि बेहतर रिश्तों के के लिए शांति बनाए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/peace-needed-on-border-for-better-relations/article-3526"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/army-1.jpg" alt=""></a><br /><h2>डोकलाम विवाद के बाद भारत-चीन ने माना</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> भारत-चीन ने सिक्किम सेक्टर के डोकलाम और लद्दाख में हाल ही में हुए सैन्य टकराव के बाद पहली बार बॉर्डर पर हालात का रिव्यू किया। इसके लिए बीजिंग में मीटिंग हुई। इसमें इस बात पर सहमति जताई कि बेहतर रिश्तों के के लिए शांति बनाए रखना जरूरी है। बीजिंग स्थित इंडियन एंबेसी से शुक्रवार को जारी एक स्टेटमेंट में यह जानकारी दी गई। वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कन्सल्टेशन एंड को-आॅर्डिनेशन की 10वें दौर की मीटिंग में दोनों देशों के बीच बॉर्डर पर हालात का रिव्यू किया गया। इसके बाद जारी स्टेटमेंट में कहा गया, “बातचीत क्रिएटिव और पॉजिटिव तरीके से हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने भारत-चीन सीमा के सभी सेक्टरों में हालात का रिव्यू किया और दोनों ने इस बात पर रजामंदी जताई कि दोनों तरफ से रिश्तों की मजबूती के लिए बॉर्डर पर शांति बनाए रखना जरूरी है।”</p>
<p style="text-align:justify;">इस मीटिंग में दोनों देशों की सेनाओं के बीच बेहतर रिश्ते बनाने के लिए विचार साझा करने पर भी चर्चा हुई।  मीटिंग में भारत की ओर से फॉरेन मिनिस्ट्री के ज्वाइंट सेक्रेटरी (ईस्ट एशिया) प्रणय वर्मा और चीन की ओर से एशियाई मामलों के डिपार्टमेंट के डायरेक्टर जनरल शियाओ कुआन शामिल हुए। इसके अलावा दोनों ओर से डिप्लोमैट्स और मिलिट्री आॅफिशियल्स ने भी बातचीत की।  बता दें कि भारत और चीन के बीच का बॉर्डर पर विवाद 3,488 किमी लंबी लाइन आॅफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर है। डिब्बीक्या था डोकलाम विवाद?डोकलाम में विवाद 16 जून को तब शुरू हुआ था, जब इंडियन ट्रूप्स ने वहां चीन के सैनिकों को सड़क बनाने से रोक दिया था। हालांकि चीन का दावा था कि वह अपने इलाके में सड़क बना रहा था। इस एरिया का भारत में नाम डोका ला है जबकि भूटान में इसे डोकलाम कहा जाता है। चीन दावा करता है कि ये उसके डोंगलांग रीजन का हिस्सा है। भारत-चीन का जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक 3488 ‘े लंबा बॉर्डर है। इसका 220 ‘े हिस्सा सिक्किम में आता है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Nov 2017 05:28:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>समय की कसौटी पर भारत-अमेरिका संबंध</title>
                                    <description><![CDATA[इतिहास के गर्भ में जाएं तो आजादी से पूर्व भारत और अमेरिका के संबंध बेहतर नहीं थे। उसका प्रमुख कारण दोनों देशों के बीच लाखों मील की दूरी और ब्रिटिश शासकों की कुटिल कूटनीति थी जो भारत को अन्य देशों के सम्पर्क में आने देना नहीं चाहते थे। द्वितीय विश्वयुद्घ के समय तक अमेरिकी नागरिकों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/hindi-article-on-india-america-relations/article-1775"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/india-us.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इतिहास के गर्भ में जाएं तो आजादी से पूर्व भारत और अमेरिका के संबंध बेहतर नहीं थे। उसका प्रमुख कारण दोनों देशों के बीच लाखों मील की दूरी और ब्रिटिश शासकों की कुटिल कूटनीति थी जो भारत को अन्य देशों के सम्पर्क में आने देना नहीं चाहते थे। द्वितीय विश्वयुद्घ के समय तक अमेरिकी नागरिकों की भारत के बजाए चीन और जापान में कहीं ज्यादा दिलचस्पी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राज्य अमेरिका का आप्रवास नियम भी भारतीय हितों के विरुद्घ था। इस नियम के तहत भारतीय लोगों का अमेरिका में बसना दुष्कर कार्य था। हालांकि कहा जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए इंग्लैंड पर दबाव बनाया था। लेकिन सच यह है कि रुजवेल्ट ने भारत को बहुत सीमित औपनिवेशिक स्वराज दिए जाने के पक्षधर थे।</p>
<p style="text-align:justify;">याद रखना होगा कि 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए जब ब्रिटिश सरकार ने अमेरिकी फौजों का उपयोग किया तो अमेरिका की सरकार ने इसका विरोध नहीं किया। 1945 के सेनफ्रांसिस्को सम्मेलन में सोवियत विदेशमंत्री ने मुखर रुप से भारत को स्वतंत्रता दिए जाने की बात कही लेकिन अमेरिकी प्रतिनिधियों ने चुप्पी साध रखी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता के उपरांत भारत-अमेरिकी संबंधों की नींव जरुर पड़ी, लेकिन उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को लेकर दोनों देशों के बीच दूरियां बनी रही। भारत साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और रंगभेद के खिलाफ था, जबकि अमेरिका खुलकर ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन व हालैंड जैसे साम्राज्यवादी राष्ट्रों का समर्थन कर रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति भी अमेरिका को पसंद नहीं थी। भारत की गुटनिरपेक्ष नीति के कारण ही तत्कालीन अमेरिकी उपराष्ट्रपति निक्सन ने प्रतिक्रियास्वरुप पाकिस्तान को सैनिक सहायता देने की वकालत की। दिसंबर 1947 में भारत द्वारा कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्रसंघ में समाधान के लिए प्रस्तुत किए जाने पर अमेरिका ने उसका खुलकर समर्थन किया।</p>
<p style="text-align:justify;">1950 के कोरिया युद्ध में अमेरिका के समर्थन में भारतीय सैनिक दस्ते का शामिल न होना, 1952 में भारत-जापान संधि, 1954 में पाकिस्तान-अमेरिका संधि, गोवा का प्रश्न ऐसे ढेरों कारण थे जिससे भारत-अमेरिका के बीच तनातनी बनी रही।</p>
<p style="text-align:justify;">जुलाई, 2005 में भारत के प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह की अमेरिकी यात्रा के दौरान नाभिकीय ऊर्जा समझौता हुआ। दिसंबर, 2006 में अमेरिकी कांग्रेस ने परमाणु सहयोग समझौते को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक विधेयक को मंजूरी दी और 10 अक्टूबर, 2008 को दोनों देशों ने वाशिंगटन में असैनिक नाभिकीय करार पर हस्ताक्षर किए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समझौते ने भारत-अमेरिका को एक-दूसरे के निकट ला दिया। लेकिन परमाणु दायित्व कानून को लेकर अमेरिका की नाराजगी बनी रही। अमेरिका ने भारत और ईरान के बीच 4.2 बिलियन डॉलर की लागत से तैयार होने वाली प्रस्तावित गैस पाइप लाइन को लेकर भी ऐतराज जताया। लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती ताकत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफल कूटनीति ने आर्थिक हितों की पूर्ति और शक्ति-संतुलन बिठाने के लिए अमेरिका को भारत के निकट आने के लिए विवश कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसका श्रेय काफी हद तक भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है जिन्होंने अपने नेतृत्व के दम पर वैश्विक क्षितिज पर भारत की साख को मजबूत किया है। आज अगर अमेरिका भारत के साथ सैन्य समझौता को आकार देने के साथ एनएसजी में भारत की सदस्यता का खुलकर समर्थन कर रहा है तो यह रेखांकित करता है कि भारत की विदेश नीति में बदलाव के एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है जिसके संवाहक नरेंद्र मोदी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-रीता सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/article/hindi-article-on-india-america-relations/article-1775</link>
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                <pubDate>Thu, 29 Jun 2017 23:46:39 +0530</pubDate>
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                <title>बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत-जापान संबंध</title>
                                    <description><![CDATA[याद होगा दिसंबर, 2015 में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत की यात्रा पर आए थे तो कहा था कि दोनों देशों के रिश्तों की कलियां फूलों में बदल गयी हैं। अब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की यात्रा कर संबंधों को सुगंधियों से भर दिया है। दोनों देशों के बीच नौ द्विपक्षीय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/india-japan-relations-in-the-changing-global-landscape/article-341"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-11/abu-modi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">याद होगा दिसंबर, 2015 में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत की यात्रा पर आए थे तो कहा था कि दोनों देशों के रिश्तों की कलियां फूलों में बदल गयी हैं। अब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की यात्रा कर संबंधों को सुगंधियों से भर दिया है। दोनों देशों के बीच नौ द्विपक्षीय सहयोग संधियों समेत उस असैन्य परमाणु समझौते पर भी मुहर लगी है, जिसका भारत को वर्षों से इंतजार था। असैन्य परमाणु समझौता इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत ऐसा पहला देश है जिसने अभी तक एनपीटी (परमाणु हथियार अप्रसार संधि) पर हस्ताक्षर नहीं किया है, के बावजूद भी जापान ने उससे एटमी करार को आकार दिया है। गौरतलब है कि जापान अभी तक इस निर्णय पर कायम था कि जब तक भारत परमाणु हथियार अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेगा तब तक उसके साथ एटमी करार नहीं होगा। इधर, भारत भी इस संधि पर हस्ताक्षर के लिए तैयार नहीं था। कारण, भारत की नजर में यह संधि भेदभावपूर्ण है। यहां जानना आवश्यक है कि जब 1998 में भारत ने पोखरण परमाणु परीक्षण को अंजाम दिया तब भारत पर आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध थोपने वाले देशों में जापान भी शामिल था। लेकिन मोदी की कूटनीतिक करामात का नतीजा है कि जापान अपने रुख में परिवर्तन लाया। जापान के समर्थन के बाद अब भारत का पक्ष मजबूत होगा और उम्मीद है कि चीन भी विरोध के केंचुल से बाहर निकलने को मजबूर होगा। गौरतलब है कि चीन एनएसजी में भारत के प्रवेश का विरोध कर रहा है। जापान से असैन्य परमाणु संधि होने के बाद अब भारत को भी परमाणु परीक्षणों पर एकतरफा रोक का वादा, जो उसने 2008 में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से किया है उसे निभाना होगा। असैन्य परमाणु संधि के अलावा दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष, पर्यावरण एवं कृषि क्षेत्र में भी सहयोग के कई अहम समझौते हुए हैं जिससे भारत में जापानी निवेश बढ़ेगा और रेलवे एवं परिवहन क्षेत्र का बुनियादी ढांचा मजबूत होगा। दो समझौते अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए भी हुए हैं जिनमें एक समझौता इसरो और जापानी स्पेस एजेंसी जाक्सा के बीच हुआ है जिससे आउटर स्पेस में सैटलाइट नेविगेशन एवं खगोलीय खोज में मदद मिलेगी। मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया को धार देने के लिए भी दोनों देशों ने हाथ मिलाए हैं। याद होगा जापानी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान मारुति सुजुकी द्वारा विनिर्मित कारों के आयात के एलान के साथ ही 83 हजार करोड़ रुपए का मेक इन इंडिया कोष स्थापित करने का फैसला किया जा चुका है। अब भारत-जापान के बीच असैन्य परमाणु करार होने से दक्षिणी चीन सागर में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप पर लगाम लगेगा और संभवत: इसी बौखलाहट में वह भारत को चेतावनी दे रहा है। लेकिन सच तो यह है कि चीन हतोत्साहित है और अब उस पर अपनी हद में रहने का दबाव बढ़ गया है। कहना गलत नहीं होगा कि भारत और जापान के साथ आने से भारत की पूर्वोंन्मुख नीति को नई धार मिली है। यह सच्चाई भी है कि भारत और जापान दोनों हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और चीन सागर में चीन की बढ़ती दादागिरी से परेशान हैं। एक कहावत है कि शत्रु का शत्रु मित्र होता है। अगर ऐसे में भारत और जापान के बीच निकटता बढ़ती है तो यह स्वाभाविक ही है। वैसे भी गौर करें तो भारत और जापान का 1400 साल पुराना संबंध है। कारोबारी लिहाज से संपूर्ण दक्षिण एशिया में जापान सबसे बड़ा दाता और भारत सर्वाधिक जापानी आधिकारिक विकास सहायता यानी ओडीए प्रा΄त करने वाला देश है। वह भारत को 1986 से ही अनुदान देता आ रहा है। जापानी ओडीए भारत के त्वरित आर्थिक विकास प्रयत्नों विशेषकर उर्जा, पारगमन, पर्यावरण और मानवीय जरुरतों से जुड़ी परियोजनाओं को सहायता प्रदान करता है। भारत की सभी मेट्रो रेल परियोजनाएं भी जापानी आधिकारिक विकास सहायता की ही घटक हैं। जापान भारत के दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा में भी भागीदार है। यह गलियारा 90 अरब डॉलर की एक वृहत आधिकारिक संरचना परियोजना है जो जापान के वित्तीय और तकनीकी सहयोग से फलीभूत हो रहा है। गौरतलब है कि दिसंबर 2006 में इस परियोजना के एमओयू पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किया। 2011 में इस परियोजना के क्रियान्वयन हेतु मंत्रिमंडल ने दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा विकास निगम ने 18500 करोड़ रुपए की मंजूरी प्रदान की। इस पर काम तेजी से हो रहा है। गौरतलब है कि समर्पित मालभाड़ा गलियारा यानी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर भी जापान द्वारा वित्तपोषित है। यह गलियारा भारतीय रेलवे की एक महत्वकांक्षी परियोजना है जो देश के दो सबसे व्यस्त मार्गों पश्चिमी गलियारा व पूर्वी गलियारा की परिवहन आवश्यकताओं को अगले 20 वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। दिसंबर 2009 में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने इस गलियारे के निर्माण पर अपनी प्रतिबद्घता जताई है।<br />
इस परियोजना में पश्चिमी गलियारा के निर्माण हेतु जापान ने ‘आर्थिक भागीदारी की विशेष शर्तांे’ के तहत ओडीए कर्ज के द्वारा इनके वित्त पोषण को स्वीकार किया। आज की तारीख में भारत में दाइची सांक्यों, हिताची, सुजुकी, पैनासोनिक, यामाहा मोटर, मात्सुशिता जैसी सैकड़ों कंपनियां हैं जो भारत के विकास में सहायक बनी हुई हैं। गौर करना होगा कि जापान अपनी विदेशनीति का पुनर्निरुपण कर रहा है। वह भारत के साथ अपने हित मूल्य और रणनीति का साम्य देख रहा है ताकि वह एशिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। भारत के साथ असैन्य परमाणु करार को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। <em>अरविंद जयतिलक</em></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 12 Nov 2016 22:44:47 +0530</pubDate>
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