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                <title>Ethanol - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Sugar Price: चीनी की कीमत क्यों बढ़ रही है? विशेषज्ञों ने बताया ये बड़ा कारण!</title>
                                    <description><![CDATA[देश में चीनी की कीमतों में तेजी के बीच विशेषज्ञों ने कारण बताए हैं। गन्ना उत्पादन, चीनी रिकवरी और लीन सीजन को प्रमुख कारक बताया गया है। जानें एथेनॉल, बफर स्टॉक और चीनी बाजार पर पूरी जानकारी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/delhi/sugar-price-why-is-the-price-of-sugar-increasing-experts/article-90042"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-08/sugar-hike.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नई दिल्ली। देश में चीनी की कीमतों में आई तेजी को लेकर एथेनॉल उत्पादन पर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती कीमतों के लिए केवल एथेनॉल डायवर्जन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। उनके अनुसार गन्ने के उत्पादन में कमी, चीनी की रिकवरी घटने और पेराई के मौसमी चक्र जैसे कई कारकों का बाजार पर असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र सरकार घरेलू खपत को प्राथमिकता देते हुए चीनी उत्पादन, एथेनॉल निर्माण और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाती है। उत्पादन की स्थिति और उपलब्ध स्टॉक की लगातार समीक्षा के बाद ही अतिरिक्त मात्रा के उपयोग की अनुमति दी जाती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">देश की जरूरत पूरी करने के बाद होता है अन्य उपयोग</h3>
<p style="text-align:justify;">नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन के अनुसार, देश में हर वर्ष करीब 280 लाख टन चीनी की घरेलू आवश्यकता होती है। सरकार का पहला लक्ष्य इस मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना होता है। इसके बाद ही अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए अनुमति दी जाती है। उन्होंने बताया कि मौजूदा वर्ष में करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर सामग्री एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हुई, जबकि लगभग 7 लाख टन चीनी का निर्यात भी किया गया। इसके बावजूद घरेलू बाजार के लिए पर्याप्त भंडार उपलब्ध होने की बात कही गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में इस वर्ष लगभग 306 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। इसके अलावा पिछले वर्ष से बचा हुआ स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य स्थिति में देश के पास करीब 50 लाख टन या इससे अधिक का बफर स्टॉक रखने की व्यवस्था होती है। ऐसे में विशेषज्ञों का तर्क है कि बाजार में कीमतों की तेजी को केवल एथेनॉल के लिए चीनी के उपयोग से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। उनके अनुसार गन्ने की गुणवत्ता और चीनी रिकवरी में बदलाव जैसे कारक भी कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">एथेनॉल से चीनी उद्योग को मिली स्थिरता</h3>
<p style="text-align:justify;">एथेनॉल कार्यक्रम को भारतीय चीनी उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जाता है। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन आवश्यकता से अधिक हो जाता था, तब बाजार में कीमतें कमजोर पड़ती थीं। इसका असर चीनी मिलों की आय और किसानों के गन्ना भुगतान पर भी पड़ सकता था।</p>
<p style="text-align:justify;">अतिरिक्त चीनी के निर्यात में अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतें और प्रतिस्पर्धा कई बार चुनौती बनती थीं। ऐसे में अतिरिक्त संसाधनों को एथेनॉल उत्पादन में उपयोग करने की नीति ने उद्योग को एक वैकल्पिक बाजार उपलब्ध कराया। विशेषज्ञों का मानना है कि एथेनॉल से ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा, पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ईंधन के उपयोग को प्रोत्साहन जैसे फायदे भी जुड़े हैं। हालांकि, उत्पादन कम होने की स्थिति में सरकार एथेनॉल डायवर्जन और निर्यात की अनुमति पर नियंत्रण कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम के अनुसार, चीनी बाजार की मौजूदा स्थिति में गन्ने की गुणवत्ता और उत्पादन भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर भारत में इस समय गन्ना पेराई का लीन सीजन चल रहा है। मुख्य कटाई और पेराई का मौसम शुरू होने के बाद चीनी उत्पादन बढ़ने और बाजार में नई आपूर्ति आने की संभावना रहती है। इससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">महाराष्ट्र और तमिलनाडु में बेहतर क्यों है रिकवरी?</h3>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में गन्ने की फसल अवधि का चीनी रिकवरी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। उत्तर भारत में कई क्षेत्रों में गन्ना लगभग 10 से 11 महीने में तैयार हो जाता है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में फसल को करीब 13 से 14 महीने तक खेत में रहने दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लंबी फसल अवधि से गन्ने में शर्करा का संचय बेहतर हो सकता है, जिससे रिकवरी बढ़ती है। महाराष्ट्र में चीनी रिकवरी लगभग 13 से 14 प्रतिशत तक पहुंचने की बात कही जाती है। तमिलनाडु में गन्ने की फसल अवधि कुछ क्षेत्रों में 18 महीने तक पहुंच सकती है। इसी कारण वहां प्रति हेक्टेयर गन्ना उत्पादकता देश के उच्च स्तरों में शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. हरिओम ने उत्तर भारत के किसानों को गन्ने के साथ अंतरवर्ती खेती अपनाने की सलाह दी। उनके अनुसार, धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ना लगाकर उसके बीच गेहूं, सरसों, मसूर, चना, सब्जियां या अन्य उपयुक्त फसलें उगाई जा सकती हैं। बिहार कृषि विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, गन्ने के साथ लौकी, करेला, नेनुआ, भिंडी और मूंग जैसी फसलें लेने से गन्ने के उत्पादन पर जरूरी नहीं कि नकारात्मक प्रभाव पड़े। इससे किसानों को अतिरिक्त उत्पादन और आय का अवसर मिल सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 15:44:30 +0530</pubDate>
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