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                <title>Nepal flash floods - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Nepal flash floods RSS Feed</description>
                
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                <title>Nepal flood crisis: नेपाल की विनाशकारी बाढ़: प्राकृतिक आपदा से आगे बढ़कर देखें नेपाल की पीड़ा</title>
                                    <description><![CDATA[नेपाल में हिमखंड टूटने और विनाशकारी बाढ़ के बाद जलवायु न्याय का मुद्दा तेज हुआ है। नेपाल ने जलवायु क्षति के लिए 5 अरब डॉलर की सहायता की मांग उठाई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/nepal-flood-crisis-nepals-devastating-floods-look-beyond-the-natural/article-90784"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-09/nepal-flood-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Nepal flood crisis: नेपाल में हिमखंडों के टूटने और उनसे आई विनाशकारी बाढ़ ने जलवायु परिवर्तन के उस भयावह पक्ष को सामने ला दिया है, जिसकी चेतावनी वैज्ञानिक लंबे समय से देते रहे हैं। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी क्षेत्रों में आई तबाही ने जनजीवन, बुनियादी ढांचे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। इस संकट के बाद नेपाल ने मानवीय सहायता और दान तक अपनी मांग सीमित रखने के बजाय जलवायु क्षति के लिए मुआवजे का सवाल अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मांग जलवायु न्याय की उस बहस को आगे बढ़ाती है, जिसमें कम उत्सर्जन करने वाले देशों को जलवायु संकट का अधिक नुकसान झेलने की स्थिति पर सवाल उठाए जाते हैं। नेपाल का तर्क है कि वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उसका योगदान बेहद कम है, फिर भी हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने और हिमनदों के तेजी से पिघलने का असर उसे गंभीर रूप से झेलना पड़ रहा है। ऐसे में बड़ी मात्रा में हरितगृह गैसों का उत्सर्जन करने वाले देशों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">नेपाल ने जलवायु परिवर्तन से होने वाली क्षति और नुकसान के लिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय कोष से 5 अरब डॉलर की सहायता की मांग भी उठाई है। हालांकि यह राशि उसे मिलना तय नहीं है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति, नियमों और उपलब्ध वित्तीय संसाधनों के अनुरूप प्रक्रिया से गुजरना होगा। नेपाल ने चीन से भी नाराजगी जताई है। उसका आरोप है कि तिब्बत क्षेत्र में हिमखंड टूटने की घटना की समय पर सूचना नहीं मिलने से सीमावर्ती क्षेत्रों में लोगों को पर्याप्त तैयारी और सुरक्षित स्थान पर जाने का अवसर नहीं मिला। ऐसी घटनाओं में समय पर चेतावनी जीवन बचाने में निर्णायक भूमिका निभाती है। इसलिए हिमालयी देशों के बीच आपदा सूचना साझा करने की मजबूत व्यवस्था अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">जलवायु संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। हिमालय में हिमनदों के पिघलने से लेकर समुद्र के बढ़ते जलस्तर, अनियमित वर्षा, भीषण गर्मी और बाढ़ तक इसके प्रभाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई दे रहे हैं। पिछले कई दशकों से वैज्ञानिक चेताते रहे हैं कि कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से वातावरण में हरितगृह गैसों की मात्रा बढ़ी है। इसका सीधा संबंध धरती के बढ़ते औसत तापमान से है।</p>
<p style="text-align:justify;">2015 में पेरिस में हुए जलवायु समझौते का लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना और उसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास करना था। दुनिया ने अक्षय ऊर्जा बढ़ाने और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने के संकल्प भी लिए हैं। फिर भी वास्तविकता यह है कि ऊर्जा जरूरत, आर्थिक हित और भू-राजनीतिक तनाव इन प्रयासों को कठिन बना रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों के दौरान कई देशों में ऊर्जा सुरक्षा की चिंता बढ़ी, जिससे जीवाश्म ईंधनों की मांग को भी सहारा मिला।</p>
<p style="text-align:justify;">वैश्विक उत्सर्जन में चीन, अमेरिका और भारत की हिस्सेदारी बड़ी है। इसलिए इन देशों की भूमिका जलवायु परिवर्तन से निपटने में निर्णायक है। हालांकि किसी एक देश को किसी विशिष्ट प्राकृतिक आपदा के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक और कानूनी दृष्टि से जटिल विषय है। जलवायु क्षति अनेक देशों के लंबे समय के सामूहिक उत्सर्जन और बदलती जलवायु परिस्थितियों का परिणाम होती है। इसीलिए नेपाल की मांग को भावनात्मक आरोप के बजाय व्यापक जलवायु न्याय के प्रश्न के रूप में देखना अधिक उचित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका पेरिस समझौते से बाहर हुआ था, जबकि जो बाइडन के कार्यकाल में वह दोबारा समझौते में शामिल हुआ। ट्रंप ने 2025 में दूसरी बार राष्ट्रपति पद संभालने के बाद फिर अमेरिका को पेरिस समझौते से बाहर करने की प्रक्रिया शुरू की। इससे वैश्विक जलवायु प्रयासों को लेकर चिंता बढ़ी है। दुनिया के समृद्ध देशों पर ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी अधिक होने के कारण उनसे वित्तीय और तकनीकी सहयोग की अपेक्षा स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">नेपाल की त्रासदी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि जलवायु परिवर्तन का भार उन देशों पर भी पड़ रहा है, जिनका इसमें योगदान बहुत कम रहा है। अब समय आ गया है कि जलवायु सम्मेलनों में घोषणाओं से आगे बढ़कर नुकसान की भरपाई, आपदा पूर्व चेतावनी, हिमालयी अनुसंधान और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा के लिए ठोस वित्तीय व्यवस्था बनाई जाए। नेपाल की मांग इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण आवाज है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रमोद भार्गव (यह लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
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                <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 12:17:27 +0530</pubDate>
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