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                <title>PM Modi Meeting - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>BRICS Summit 2026:मोदी-शी मुलाकात पर दुनिया की नजर, भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत की कितनी उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[करीब सात साल बाद उनका भारत दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शी जिनपिंग अक्टूबर 2019 में आखिरी बार भारत आए थे। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात महाबलीपुरम में हुई थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/delhi/brics-summit-2026the-worlds-eyes-are-on-modi-xi-meeting-how/article-90981"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-09/brics-summit-2026.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नई दिल्ली (सच कहूँ)। भारत में होने वाले BRICS के 18वें शिखर सम्मेलन को लेकर दुनियाभर की नजरें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित मुलाकात पर टिकी हैं। चीन ने पुष्टि की है कि शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। करीब सात साल बाद उनका भारत दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शी जिनपिंग अक्टूबर 2019 में आखिरी बार भारत आए थे। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात महाबलीपुरम में हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके कुछ महीनों बाद पूर्वी लद्दाख में सीमा तनाव बढ़ा और जून 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प ने भारत-चीन संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया। गलवान की घटना के बाद दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय तक तनाव बना रहा।ऐसे में शी जिनपिंग का नई दिल्ली आना महज एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेना नहीं है। यह इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि दोनों देश पिछले कुछ वर्षों के तनाव के बाद रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य दिशा में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्यों खास है शी जिनपिंग का भारत दौरा?</h4>
<p style="text-align:justify;">गलवान घाटी की घटना के बाद भारत ने चीन से जुड़े निवेश, कारोबार और डिजिटल क्षेत्र में कई कड़े कदम उठाए। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों, लोगों की आवाजाही और कारोबारी गतिविधियों पर भी असर पड़ा। हालांकि पिछले कुछ समय से सीमा पर तनाव कम करने और द्विपक्षीय संबंधों में कुछ सामान्य गतिविधियां बहाल करने के प्रयास तेज हुए हैं। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना भारत-चीन संबंधों को पूरी तरह सामान्य नहीं किया जा सकता। ऐसे में नई दिल्ली में मोदी और शी की आमने-सामने बातचीत का सबसे अहम मुद्दा सीमा ही रहने की संभावना है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या मोदी और शी की द्विपक्षीय बैठक होगी?</h4>
<p style="text-align:justify;">BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक होने की पूरी संभावना है। अगर दोनों नेताओं की आमने-सामने बातचीत होती है तो यह दौरे का सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहलू होगा। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच संवाद जारी रहा है। अक्टूबर 2024 में कजान में मोदी और शी की मुलाकात के बाद सीमा पर तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़े। इसके बाद अगस्त 2025 में तियानजिन में SCO बैठक के दौरान भी दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अगस्त 2026 में भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक भी हुई। भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन की ओर से वांग यी ने सीमा विवाद सहित कई अहम मुद्दों पर बातचीत की। इससे साफ है कि शी का भारत दौरा अचानक बनी परिस्थितियों का परिणाम नहीं है। दोनों देश पहले से ही कई स्तरों पर बातचीत के जरिए रिश्तों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">सीमा विवाद पर क्या हो सकती है बातचीत?</h4>
<p style="text-align:justify;">मोदी-शी बैठक में सबसे संवेदनशील मुद्दा भारत-चीन सीमा विवाद होगा। हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि सीमा पर डिसएंगेजमेंट और सीमा विवाद का अंतिम समाधान दो अलग-अलग बातें हैं। डिसएंगेजमेंट का मतलब उन स्थानों से सैनिकों और सैन्य तैनाती को पीछे करना है, जहां दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं। इससे तत्काल टकराव की स्थिति कम होती है। लेकिन भारत-चीन का सीमा विवाद दशकों पुराना और काफी व्यापक है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए मोदी और शी की एक बैठक में सीमा विवाद का अंतिम समाधान निकलने की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। वास्तविक उपलब्धि यह हो सकती है कि दोनों नेता सीमा पर दोबारा 2020 जैसी स्थिति पैदा न होने देने पर सहमत हों, सैन्य और राजनयिक स्तर की बातचीत लगातार जारी रहे और दोनों देशों के बीच विश्वास धीरे-धीरे बहाल हो।</p>
<h4 style="text-align:justify;">चीन के साथ कारोबार बढ़ाने पर भी नजर</h4>
<p style="text-align:justify;">भारत और चीन के बीच व्यापार काफी बड़ा है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती व्यापार घाटा है। भारत चीन से बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन, सोलर उपकरण और औद्योगिक कंपोनेंट आयात करता है, जबकि चीन को भारत का निर्यात तुलनात्मक रूप से काफी कम है। भारत लंबे समय से चीन से भारतीय उत्पादों के लिए अपने बाजार को ज्यादा खोलने और जरूरी औद्योगिक सामान व कच्चे माल की सप्लाई को अधिक भरोसेमंद बनाने की मांग करता रहा है। भारत के लिए चीन से आर्थिक संबंध पूरी तरह खत्म करना व्यावहारिक नहीं है। कई भारतीय उद्योग चीनी मशीनरी, कंपोनेंट और कच्चे माल पर निर्भर हैं। ऐसे में भारत की रणनीति सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए जरूरी कारोबारी और निवेश संबंधों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाने की रही है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">चीनी कंपनियों के लिए भारत में क्या बदल सकता है?</h4>
<p style="text-align:justify;">2020 के बाद भारत में चीनी कंपनियों के निवेश और कारोबार पर सुरक्षा से जुड़ी जांच बढ़ी है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और अन्य क्षेत्रों में चीनी कंपनियां भारतीय बाजार में मौजूद हैं, लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों में भारत की सतर्कता अभी भी कायम है।<br />आने वाले समय में भारत की कोशिश ऐसे निवेश को बढ़ावा देने की हो सकती है, जिससे देश में उत्पादन, रोजगार, तकनीक और सप्लाई चेन मजबूत हों। यानी भारत चीनी पूंजी और तकनीक का इस्तेमाल करना चाहता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में कोई समझौता नहीं करना चाहता।</p>
<h4 style="text-align:justify;">नाथू ला से व्यापार बहाली भी अहम संकेत</h4>
<p style="text-align:justify;">अगस्त 2026 में सिक्किम के नाथू ला सीमा मार्ग से भारत-चीन सीमा व्यापार छह साल बाद दोबारा शुरू हुआ। कारोबार का आकार भले ही बहुत बड़ा न हो, लेकिन इसका कूटनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व काफी ज्यादा है। सीमा पर सुरक्षा को लेकर दोनों देशों की सतर्कता के बीच सीमा व्यापार और लोगों की आवाजाही को दोबारा शुरू करना इस बात का संकेत है कि दोनों सरकारें रिश्तों में कुछ सामान्य गतिविधियां वापस लाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या कोई बड़ी डील होने वाली है?</h4>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल ऐसी कोई पुष्टि नहीं है कि मोदी और शी की बैठक में कोई बड़ा मुक्त व्यापार समझौता, अंतिम सीमा समझौता या अरबों डॉलर की कोई बड़ी डील होने जा रही है। इसलिए सिर्फ शी के भारत दौरे को किसी बड़े समझौते से जोड़ना सही नहीं होगा।<br />हालांकि कूटनीति में हर उपलब्धि किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर के रूप में नहीं होती। अगर दोनों नेता कुछ अहम मुद्दों पर राजनीतिक दिशा तय करते हैं, तो उसका असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मसलन, दोनों देश—<br />-सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए सैन्य और राजनयिक संवाद मजबूत कर सकते हैं।<br />-भारतीय कंपनियों के लिए चीन के बाजार में बेहतर पहुंच पर काम कर सकते हैं।<br />-व्यापार घाटा कम करने और भारतीय निर्यात बढ़ाने की दिशा में कदम उठा सकते हैं।<br />-जरूरी औद्योगिक मशीनरी और कच्चे माल की सप्लाई को आसान बना सकते हैं।<br />-चीनी निवेश के लिए स्पष्ट और भरोसेमंद नियमों पर आगे बढ़ सकते हैं।<br />-वीजा, उड़ानों और लोगों की आवाजाही को सामान्य करने की दिशा में कदम उठा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इनमें से किसी भी क्षेत्र में ठोस प्रगति भारत-चीन संबंधों में सुधार का महत्वपूर्ण संकेत होगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">भारत को सबसे बड़ा फायदा क्या हो सकता है?</h4>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अगर चीन के साथ सीमा पर लंबे समय तक शांति बनी रहती है तो भारत अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं और सुरक्षा जरूरतों के बीच बेहतर संतुलन बना सकेगा। सीमा पर तनाव कम होने से दोनों देशों को लगातार भारी सैन्य तैनाती और उससे जुड़ी लागत को संभालने में भी राहत मिल सकती है। इसके अलावा चीन से आने वाली औद्योगिक मशीनरी, कंपोनेंट और कच्चे माल की सप्लाई अगर स्थिर होती है तो इसका सीधा असर भारतीय कंपनियों की लागत और उत्पादन पर पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत एक ओर अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड में काम करता है, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ अपने पुराने संबंध बनाए हुए है। इसके साथ ही BRICS और SCO जैसे मंचों पर चीन के साथ भी सहयोग करता है। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति की बड़ी ताकत है। ऐसे में मोदी-शी मुलाकात का असली महत्व किसी एक बड़ी घोषणा से ज्यादा इस बात में है कि क्या दोनों देश पिछले तनाव से आगे बढ़कर सीमा पर शांति, आर्थिक सहयोग और आपसी विश्वास की नई जमीन तैयार कर पाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 19:16:04 +0530</pubDate>
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