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                <title>Defense - Sach Kahoon Hindi</title>
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                            <item>
                <title>रक्षा मंत्रालय ने बदला सर्विस रूल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की अधिकतम 65 वर्ष की</title>
                                    <description><![CDATA[चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) अधिकतम 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर रह सकते हैं। रक्षा मंत्रालय ने नौसेना, वायुसेना और थल सेना के सर्विस रूल में भी यह बदलाव किया है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/ministry-of-defense-changed-service-rule/article-12096"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/ministry-defense.jpg" alt=""></a><br /><h2>रक्षा मंत्रालय ने नौसेना, वायुसेना और थल सेना के सर्विस रूल में भी यह बदलाव किया है। <span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">Ministry of Defence</span></span></h2>
<h5>Edited By Vijay Sharma</h5>
<p><strong>नई दिल्ली (एजेंसी) ।</strong> चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) अधिकतम 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर रह सकते हैं। रक्षा मंत्रालय (<span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">Ministry of Defence</span></span>) ने नौसेना, वायुसेना और थल सेना के सर्विस रूल में भी यह बदलाव किया है। अभी सेना प्रमुख अधिकतम 62 वर्ष या तीन वर्ष के कार्यकाल (दोनों में से जो पहले आता हो) तक अपने पद पर रह सकते हैं। किसी सेना प्रमुख को सीडीएस बनाए जाने पर आयु सीमा का नियम आड़े न आए इसलिए रक्षा मंत्रालय ने सर्विसेस के नियमों में सुधार किया है।</p>
<h2>पद छोड़ने के बाद सरकारी और निजी पद नहीं ग्रहण कर सकते सीडीएस | <span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">Ministry of Defence</span></span></h2>
<p>कैबिनेट कमेटी ने मंगलवार को सीडीएस के पद को मंजूरी दी थी। यह रक्षा मंत्रालय के लिए मुख्य सैन्य सलाहकार के तौर पर काम करेंगे। सीडीएस अपना पद छोड़ने के बाद किसी भी सरकारी पद पर नहीं रह सकते हैं। पद छोड़ने के 5 साल बाद तक बिना पूर्व अनुमति के सीडीएस निजी पद भी ग्रहण नहीं कर सकते हैं।</p>
<h2>4 स्टार जनरल के बराबर होगा सीडीएस का ओहदा| <span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">Ministry of Defence</span></span></h2>
<ul>
<li><strong>कैबिनेट बैठक में तय किया गया था कि सीडीएस का पद 4 स्टार जनरल के बराबर होगा। </strong></li>
<li><strong>केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बताया था कि सीडीएस सरकार के प्रधान सैन्य सलाहकार होंगे। </strong></li>
<li><strong> लेकिन तीनों सेनाओं के प्रमुख पहले की तरह अपने क्षेत्र से संबंधित मामलों में रक्षा मंत्री को सलाह देते रहेंगे।</strong></li>
<li><strong>सीडीएस तीनों सेनाओं से संबंधित मुद्दों पर सरकार और सैन्य बलों के बीच संपर्क सेतु की तरह काम करेंगे। </strong></li>
<li><strong>इस पद पर नियुक्त किए जाने वाले अधिकारी पर, सेना के तीनों अंगों के बीच कामकाज में समन्वय स्थापित करने और वित्तीय मामलों में सलाह देने की जिम्मेदारी होगी।</strong></li>
</ul>
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<p>Ministry, Defense, Changed, Service, Rule</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Dec 2019 12:45:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भारतीय आर्यों के रक्ष पर सवार इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[इतिहास तथ्य और घटना के सत्य पर आधारित होता है। इसलिए इसकी साहित्य की तरह व्याख्या संभव, नहीं है। विचारधारा के चश्मे से इतिहास को देखना उसके मूल से खिलवाड़ है। गोया, अब उत्तर-प्रदेश के बागपत जिले के सिनौली गांव में भारतीय पुरातत्व विभाग ने जो उत्खनन किया है और इस उत्खनन में जो रामायण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/riding-history-on-the-defense-of-indian-aryans/article-4173"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/ayrns.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इतिहास तथ्य और घटना के सत्य पर आधारित होता है। इसलिए इसकी साहित्य की तरह व्याख्या संभव, नहीं है। विचारधारा के चश्मे से इतिहास को देखना उसके मूल से खिलवाड़ है। गोया, अब उत्तर-प्रदेश के बागपत जिले के सिनौली गांव में भारतीय पुरातत्व विभाग ने जो उत्खनन किया है और इस उत्खनन में जो रामायण और महाभारत में वर्णित रथों जैसे तीन रथ निकले हैं, इसके मूल से यदि पूर्वग्रही मानसिकता से छेड़छाड़ की गई तो यह इतिहास और भारतीय धरोहर की गरिमा को झुठलाना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि ये नए तथ्य अंग्रेजों और भारतीय वामपंथियों द्वारा लिखी उस अवधारणा को सर्वथा नकार रहे हैं, जिसमें बार-बार दावा किया जाता रहा है कि कथित आर्य घोड़ों से जूते रथों पर सवार होकर पश्चिम से भारत आए थे। इन आर्यों ने भारत पर आक्रमण कर यहां की पुरातन सभ्यता और संस्कृति को बुरी तरह रौंदा और भरतखंड के मालिक बन बैठे।</p>
<p style="text-align:justify;">किंतु अब सिनौली के मिट्टी के नीचे दबे जो प्रमाण सामने आए है, उनसे निश्चित हुआ है कि आर्यों के आक्रमण की कथित अवधारणा से भी करीब तीन हजार ईसा पूर्व हमारे पूर्वज रथ बना चुके थे। उस समय के राज-परिवार के लोग इनका आवागमन के लिए उपयोग करते थे। इस उत्खनन से हमारी वे प्राचीन मान्यताएं पुष्ट हो रही हैं, जो ऋृग्वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत में दर्ज होने के बावजूद नकारी जाती रही हैं। गोया, अब अंग्रेजों के लिखे इतिहास को बदलने का समय आ गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एससआई का जो दल डॉ संजय मंजुल के नेतृत्व में खुदाई में लगा है, उनका दावा है कि इन साक्ष्यों से महाभारत काल निर्धारण और हड़प्पा-युग में घोड़ों के अस्तित्व को स्वीकारने की उम्मीद बढ़ गई है। इस उत्खनन से पहले तक मेसोपोटामिया, जॉर्जिया और ग्रीक सभ्यता में रथ के प्रमाण मिले हैं, लेकिन अब हम कह सकते हैं कि इन सभ्ताओं की तरह भारत के लोग भी रथों का निर्माण व प्रयोग करते थे। दरअसल अंग्रेजों ने अभी तक यह धारणा गढ़ी हुई है कि आर्यों ने 1500-2000 वर्ष ईसा पूर्व भारत पर हमला किया। वे रथों से आए और यहां की सभ्यता को नेस्तनाबूद करते हुए नई सभ्यता की नींव रखी।</p>
<p style="text-align:justify;">इनका दावा था कि इस समय तक भारत में बैलगाड़ी तो थी, किंतु घोड़ा-गाड़ी नहीं थी। अलबत्ता अब इस खुदाई में मिले प्रमाणों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत में ईसा पूर्व 5000 साल पहले से ही रथ उपयोग में लाए जाते रहे थे। इस खोज के पूर्व पुरातत्वविद् बी लाल पुरातत्वीय-अनुवांशिक की आधार पर यह स्पष्ट कर चुके हैं कि हमारे डीएनए के गुण-सूत्रों में पिछले 12 हजार वर्ष से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। दिसंबर 2007 में भी सिनौली में एक साथ 160 नरकंकाल मिले थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इनकी कॉर्बन डेटिंग से यह खुलासा हुआ था कि ये चार से पांच हजार वर्ष प्राचीन हैं। ऐसे में रथ के साथ कंकाल और ताबूतों का मिलना, अंग्रेजों की आर्य संबंधी अवधारणा को पलटने के ठोस प्रमाण हैं। गोया, अब भारतीय इतिहास लेखन में जो भूलें बरतीं गई हैं, उन्हें सुधारा जाना आवश्यक हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">सिनौली ऐसा महत्वपूर्ण स्थल है, जहां शुरू से ही घर की बुनियाद कुआं या अन्य कोई गड्ढा खोदने पर शिव, महिशासुर-मर्दिनी, शाकुंभरी और चामुंडा देवी की मिट्टी की मूर्तियां मिलती रही हैं। इसीलिए इस पूरे क्षेत्र को टेराकोटा क्षेत्र का दर्जा दिया हुआ है। इनके अलावा यहां सिंधु घाटी की सभ्यता से मेल खाते मिट्टी के बर्तन, कंकाल, आभूषण, मूठ वाली तलवार, तांबे की कीलें और कंघियां मिले हैं। यहां जो ताबूत मिले हैं, उन ताबूतों के ऊपर तांबे से बने पशुपतिनाथ के मुहर जैसे चिन्ह भी मिले हैं, जो भगवान शिव की मान्यता के प्रतीक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कुरु जनपद की राजधानी हस्तिनापुर गंगा के किनारे थी और महाभारत का युद्धस्थल कुरुक्षेत्र यमुना नदी के किनारे था। कुरूक्षेत्र के निकट ही करनाल, पानीपत और सोनीपत हैं। इनके निकट ही सिनौली का वह क्षेत्र है, जो जहां उत्खनन में रथ मिले हैं। इससे यह उम्मीद है कि मिले रथ व कंकाल महाभारतकालीन हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बागपत का प्राचीन नाम वयाग्रप्रस्थ, सोनीपत का स्वर्णप्रस्थ, पानीपत का पर्णप्रस्थ और बरनावा का वाणार्वृत है। पांच में से ये ही वे चार गांव हैं, जो पांडवों ने दुर्योधन से मांगे थे, लेकिन दुर्योधन ने सुई की नोक के बराबर भी भूमि पांण्डवों को देने से मना कर दिया था। अंतत: इसकी परिणति महाभारत युद्ध के रूप में सामने आई।</p>
<p style="text-align:justify;">ऋृग्वेद के पहले मंडल के दूसरे अध्याय में स्पष्ट उल्लेख है कि अग्नि और जल के वेग से युक्त किया हुआ रथ बहुत दूर स्थित स्थानों पर भी तुरंत पहुंचता है। यानी वैदिक काल में ऐसे भी रथ थे, जो घोड़ों के अलावा अग्नि और जल की ऊर्जा से संचालित होते थे। इसे ही अश्व-शक्ति कहा गया, जो इंजन के आविष्कार के बाद होर्स पावर के नाम से जानी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी आध्याय के एक अन्य मंत्र में कहा गया है कि जैसे मनुष्य पहले कुंए को खोदकर उसके जल के उपयोग से संतुष्ट होता है, उसी तरह विद्वान लोग कलायंत्रों में अग्नि को जोड़कर उसकी सहायता से यंत्रों में जल को प्रवेश कराकर, उनको गतिमान कर अनेक कार्यों को सिद्ध करते हैं। वेदों में वर्णित इस वैज्ञानिकता को जब अंग्रेज मैकाले और जर्मन मैक्समूलर ने समझा तो वे हतप्रभ रह गए।</p>
<p style="text-align:justify;">वे जान गए कि भारत में यदि संस्कृत की महत्ता बनी रहती है और इसका प्रचार व विस्तार वैश्विक स्तर पर होता है तो ईसाई, धर्म और बाइबिल को खतरा उत्पन्न हो सकता है ? यूरोपियन ईसाई भी श्रेष्ठ धर्म के रूप में सनातन हिंदू धर्म और श्रेष्ठ भाषा के रूप में संस्कृत को अपना सकते हैं?</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 15 Jun 2018 08:17:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>भारत का महत्वपूर्ण रक्षा सहयोगी है इजराइल</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल की तीन दिवसीय यात्रा की। वे वहां भारत-इजराइल राजनयिक संबंधों की रजत जंयति वर्ष के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में मौजूद रहे। प्रधानमंत्री की इस यात्रा का मकसद केवल इतना ही नहीं था कि दोनों देश अपनी राजनयिक संबंधों की 25वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और प्रधानमंत्री को उसमें अपनी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-important-defense-partner-is-israel/article-2034"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/pm-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल की तीन दिवसीय यात्रा की। वे वहां भारत-इजराइल राजनयिक संबंधों की रजत जंयति वर्ष के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में मौजूद रहे। प्रधानमंत्री की इस यात्रा का मकसद केवल इतना ही नहीं था कि दोनों देश अपनी राजनयिक संबंधों की 25वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और प्रधानमंत्री को उसमें अपनी उपस्थ्तिि देनी है, बल्कि रजत जयंति वर्ष के इस अवसर को थोड़ी देर के लिए अलग रख दें, तब भी यह यात्रा कई मायनों में अलग रही।</p>
<p style="text-align:justify;">पहली बात तो यह है कि सात दशकों के बाद भारत के किसी प्रधानमंत्री ने यहुदी देश इजराइल का रूख किया। दूसरा, यह यात्रा केवल इजराइल तक ही सीमित है, फिलीस्तीनी को इस यात्रा से अलग रखा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब तक होता यह था कि इजराइल जाने वाले किसी भी भारतीय नेता या राजनयिक की यात्रा फिलीस्तीन की यात्रा के बाद ही संपन्न होती थी। इसकी वजह यह थी कि भारत में बड़ी संख्या में मुस्लमान निवास करते हैं इस लिए भारत ने अब तक फिलीस्तीन व इजराइल के बीच संतुलन साधकर चलने की नीति अपनाई हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह पहला अवसर होगा जबकि नरेंन्द्र मोदी केवल इजराइल जा रहे हैं, फिलिस्तीन नहीं। इसके अलावा तीसरी सबसे बड़ी बात यह है कि मोदी अमेरिका से लौटने के तुंरत बाद इजराइल गए है। यही वजह है कि इस यात्रा को भारत-इजराइल संबंधों में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने प्रोटोकॉल के इतर एयरर्पोट पहुंच कर जिस गरमजोशी से नरेंन्द्रमोदी का स्वागत किया उससे यह बयां हो गया कि इजराइल के भीतर भी इस यात्रा को लेकर कितनी उत्सुकता थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस तरह से बेंजामिन और मोदी बार-बार एक दूसरे को गले लगा रहे थे उससे बिल्कुल साफ हो गया था कि भारत के बदले हुए दृष्टिकोण पर इजराइल ने भी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 1992 में भारत-इजराइल के बीच राजनयिक संबंध उस समय शुरू हुए थे जब भारत में कांग्रेस की सरकार थी और पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे। लेकिन इन 25 वर्षों में दोनों देशों के बीच संबंध उस स्तर तक नहीं पहुंच पाए कि राष्ट्राध्यक्षों की आवाजाही का सिलसिला शुरू हो सके। यद्यपि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सितंबर 1950 में ही इजराइल को मान्यता दे दी थी फिर भी दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने में 70 वर्ष का समय लग गया। पहले भारत हमेशा फिलीस्तीन के पक्ष में खड़ा दिखाई देता था।</p>
<p style="text-align:justify;">1947 में यूएनओं में जब इजराइल को अलग देश बनाने के लिए फिलीस्तीन के विभाजन का प्रस्ताव रखा गया था तो भारत ने न केवल प्रस्ताव का विरोध किया था अपितु उसके खिलाफ वोट किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 1948 में जब इजराइल को यूएनआें का सदस्य बनाए जाने की बात आई तब भी भारत ने उस पर आपत्ति प्रकट की थी। अरब-इजराइल संघर्ष के दौरान भी भारत की विदेश नीति स्पष्ट रूप से अरब देशों का समर्थन करने की रही।</p>
<p style="text-align:justify;">स्व़ इंदिरा गांधी के कार्यकाल में फिलीस्तीनी आंदोलन के अगुआ नेता यासिर अराफात ने श्रीमति गांधी को अपनी छोटी बहन बताकर दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाईया प्रदान की थी। अभी मई माह में ही फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने भारत की यात्रा की थी यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कुछ महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन राजीव गॉधी के सत्ता में आने के बाद भारत के नजरिये में बदलाव आया। राजीव गांधी ने वर्ष 1985 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन के समय इजराइल के प्रधानमंत्री शायमन पेरेज से मिलकर संबंध बहाली की दिशा में कदम बढ़ाया।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय दोनों देशों के बीच कुछ औपचारिक करार हुए और संबंधों को सामान्य करने की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ी। अब प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के बाद इजराइल को लेकर भारत का नजरिया यकायक बदला है। यह उसी बदले हुए नजरिये का ही परिणाम है कि हमारे प्रधानमंत्री इजराइल जा रहे हंै, परन्तु फिलीस्तीन नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की रक्षा जरूरतों के लिहाज से भी इजराइल हमारे लिए महत्वपूर्ण है। वर्तमान में जबकी चीन काफी आक्रामक हो चला है तो ऐसे में भारत को उसकी सामरिक जरूरतों के लिहाज से एक सच्चे दोस्त की तलाश है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की यह तलाश इजराइल पर आकर समाप्त होती है। दोनों देशों के बीच रिश्ते का एक बड़ा कारण यह है कि इजराइल हमारा अहम रक्षा सप्लायर है। रूस के बाद इजराइल दूसरा ऐसा देश है जहां से भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए हथियार और तकनीक आयात करता है। आज भी इजराइल भारत को मिसाइल और ड्रोन विमान सहित अन्य सैन्य उपकरण प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण देश है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले पांच साल में इजराइल ने हर साल औसतन एक अरब डॉलर के हथियार भारत को बेचे हैं। हथियारों की खरीद दोनों देशों के बीच आपसी संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू रहा है। मोदी की यात्रा से पहले अप्रेल माह में भारत ने इजराइल की एयरो स्पेस इंड्रस्टीज के साथ डेढ़ अरब डॉलर के सौदे का करार किया है। भारत के चार युद्धपोतों पर बराक मिसाइल स्थापित करने का भी 630 करोड़ डॉलर का समझौता हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">संकट के समय भारत के अनुरोध पर इजराइल की त्वरित प्रतिक्रिया ने उसे भारत के लिए भरौसेमंद हथियार आपूर्ति करने वाले देश के तौर पर स्थापित किया हैंं। भारत के सामने जब भी कोई सामरिक संकट उपस्थित हुआ है तो उस वक्त इजराइल ने आगे बढ़कर हमारी मदद की है। 1962 के भारत-चीन युद्व के दौरान भी इजराइल भारत के साथ खडा था। वर्ष 1999 के करगिल संकट के समय भी भारत के अनुरोध पर इजराइल ने हथियार व दूसरी सैन्य तकनीक भारत को उपलब्ध करवाकर भारत का सहयोग किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भी इजराइल भारत को मिसाइल, एंटी मिसाइल सिस्टम, टोही विमान आदी की तकनीक दे रहा है। इसके अलावा इजराइल भारतीय नौ सेना को एंटी बैलिस्टिक मिसाइल भी देने को तैयार है। भारत को करीब 8,356 स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल देने के लिए भी इजराइल तैयार हो गया है, जो दुश्मन के टैंक को उसकी ही जमीन पर तबाह करने में सक्षम हैे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा इजराइल ने भारत को 10 हेरॉन टीपी यूएवी मानवरहित हवाई वाहन देने की हामी भरी है जिसकी मदद से भारतीय सेना की निगरानी करने और टोह लेने की क्षमता काफी बढ़ जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी की यात्रा से पहले भारत ने इजराइल के साथ 2 अरब डॉलर का एक बड़ा रक्षा सौदा किया है। जिसके तहत वह भारत को मिसाइल रक्षा प्रणाली की आपूर्ति करेगा। सतह से हवा में मार करने वाली ये आधुनिक मिसाइल 70 किलोमीटर तक की दूरी में एयरक्राफ्ट, मिसाइल और ड्रोन को ध्वस्त करने में सक्षम है।</p>
<p style="text-align:justify;">इजराइल की उन्नत कृषि तकनीक का भी भारत फायदा लेना चाहेगा। खुद इजराइल के कृषि विशेषज्ञों ने फसलों की पैदावर को बढ़ाने और सिंचाई के लिए जल संरक्षण संबंधित अपने तकनीकी अनुभव को भारतीय किसानों के साथ साझा करने का प्रस्ताव भी भारत को दिया हैं<br />
यद्धपि इजराइल एक ऐसा देश है जिससे भारत लंबे समय से कटा रहा है</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को एक नया आयाम मिलेगा इसमें सन्देह नहीं है। उम्मीद की जा रही है कि इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सैन्य और साइबर सुरक्षा पर समझौते हो सकते है। दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, सुरक्षा, कृषि , पानी और ऊर्जा सेक्टर में साथ मिलकर काम कर रहेंं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकी भारत की ओर से यह कहा जा रहा है कि रक्षा व्यापार इस दौरे के लिए पहलु नहीं है, लेकिन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाने की उम्मीदें है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-एन.के. सोमानी</strong></p>
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                <pubDate>Thu, 06 Jul 2017 22:37:11 +0530</pubDate>
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