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                <title>Vice Presidential - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>जगदीप धनखड़ अगले उपराष्ट्रपति</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली l राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता जगदीप धनखड़ को देश‌ का अगला उप राष्ट्रपति चुन लिया गया है। संसद भवन में शनिवार को हुए उप राष्ट्रपति चुनाव में धनखड़ को 528 मत मिले हैं। चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को 182 मत लेने में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/jagdeep-dhankhar-the-next-vice-president-of-india/article-36370"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-08/jagdeep-dhankhar-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली l</strong> राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता जगदीप धनखड़ को देश‌ का अगला उप राष्ट्रपति चुन लिया गया है। संसद भवन में शनिवार को हुए उप राष्ट्रपति चुनाव में धनखड़ को 528 मत मिले हैं। चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को 182 मत लेने में कामयाब रही। उप राष्ट्रपति चुनाव अधिकारी और लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी दी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ग्रामीण पृष्ठभूमि से उभरे धनखड़ दूसरे सर्वोच्च पद के लिए निर्वाचित</h3>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान के झुंझनू जिले के एक गांव में जन्मे और वहीं पले-बढ़े नवनिर्वाचित उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के करियर की पहली पसंद वकालत थी। उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा में भारतीय राजनीति के कई रंगों का अनुभव किया और इस दौरान केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के सदस्य लेकर राज्यपाल पद की जिम्मेदारी संभालते हुए अब वह देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद की जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं। वर्ष 1951 में 18 मई को ठिकाना गांव जन्मे धनखड़ माता केसरी देवी और पिता गोकल चंद की चार संतानों में दूसरे नंबर के थे। उनकी पांचवी कक्षा की पढ़ाई ठिकाना गांव में ही हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">मिडिल स्तर की शिक्षा के लिए वह गरथाना गये। उन्होंने चित्ताैढ़ गढ़ सैनिक स्कूल में भी शिक्षा ग्रहण की। वहां बारहवीं कक्षा तक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने भौतिक शास्त्र से स्नातक तक पढ़ाई की और राजस्थान विश्वविद्यालय से वकालत डिग्री हासिल की। बारहवीं की कक्षा के बाद उनका चयन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के साथ-साथ राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के लिए भी हो गया था लेकिन उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से बीएससी और एलएलबी की डिग्री ली। स्नातक के बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा भी उत्तीर्ण की थी लेकिन वकालत को अपना करियर बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने 1979 में राजस्थान बार काउंसिल की सदस्यता ली और 1990 में उच्च न्यायालय वरिष्ठ अधिवक्ता नामित किये गये। फरवरी 1979 में सुदेश धनखड़ के साथ पाणिग्रहण संस्कार हुआ और उनके परिवार में पुत्र दीपक और पुत्री कामना आयीं। पुत्र दीपक का 14 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वकालत करते समय वह सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे।<br />
वह इस दौरान उच्चतम न्यायालय में भी वकील के रूप में अपनी सेवायें देते थे और देश के अन्य न्यायालयों में भी उन्होंने मुकदमे लड़े। वह उच्च न्यायालय बार एसोसियेशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">धनखड़ ने राजनीतिक यात्रा दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल से शुरू की थी और बाद में कांग्रेस में शामिल हुए। राजनीति में उनका आखिरी पड़ाव भारतीय जनता पार्टी रही। वह 1979 के बीच झुंझनू लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे और इस दौरान विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर सरकार में मंत्री रहे। जनता दल के विभाजन के बाद वह श्री एच डी देवगौड़ा के खेमे में चले गये थे। जनता दल में वह मुख्य रूप से देवीलाल के करीबी थे और देवीलाल ने ही उन्हें झुंझने से चुनाव लड़वाया था। केन्द्र में नरसिंह राव सरकार बनने के बाद वह कांग्रेस में चले गये थे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">वह बाद में कांग्रेस में शामिल हाे गये और 1953 से 1958 तक किशनगढ़ विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 2003 में भाजपा का ध्वज उठा लिया।</h3>
<p style="text-align:justify;">मोदी सरकार में जुलाई 2019 में उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया था, जहां उन्होंने जनता के राज्यपाल के रूप में सक्रियता दिखाई। इसको लेकर उनका ममता सरकार से तनाव भी दिखा लेकिन उन्हें उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा से पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी के साथ दार्जिलिंग में राजभवन में उनकी मुलाकात चर्चा में रही थी। धनखड़ के इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने मतदान में भाग नहीं लिया जाे उनके प्रति तृणमूल के समर्थन के रूप में देखा गया और विपक्ष के उम्मीदवार श्रीमती मार्गरेट अल्वा ने इसको निराशा भी जतायी थी।<br />
धनखड़ 10 अगस्त को वर्तमान उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू का कार्यकाल संपन्न होने के बाद इस पद और इसके साथ ही राज्य सभा के सभापति की जिम्मेदारी संभालेंगे।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Aug 2022 20:40:18 +0530</pubDate>
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                <title>उपराष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार का दांव</title>
                                    <description><![CDATA[राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। विशेषकर बिहार की राजनीति के तो कहने ही क्या? वहां आज जो हो रहा है, हो सकता है भविष्य में वह नहीं हो। सिद्धांतों को ताक पर रखकर की जा रही ऐसी राजनीति के द्वारा हम देश को किस दिशा की ओर ले जाने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/nitish-kumars-bets-in-vice-presidential-election/article-2155"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/nitish-kumar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। विशेषकर बिहार की राजनीति के तो कहने ही क्या? वहां आज जो हो रहा है, हो सकता है भविष्य में वह नहीं हो। सिद्धांतों को ताक पर रखकर की जा रही ऐसी राजनीति के द्वारा हम देश को किस दिशा की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। क्या यह दिशा देश के भविष्य को आयाम दे पाएगी, अगर नहीं तो ऐसी राजनीति करने के पीछे ऐसी कौन सी मजबूरी है, जिसे राजनीतिक दल छोड़ नहीं पा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हम जानते ही हैं कि आज सत्ता केन्द्रित राजनीति का वर्चस्व ही दिखाई देता है, ऐसी राजनीति के माध्यम से देश का भला कभी नहीं हो सकता। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार कभी राजद और कांगे्रस के विरोध में खड़े दिखाई दिए तो बाद में उन्ही के साथ गलबहियां करते हुए नजर आए। सिद्धांतों को बलि चढ़ाने वाली ऐसी राजनीति देश में कब तक चलती रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, इसके साथ ही उपराष्ट्रपति के लिए समर्थन देने की भी राजनीतिक तैयारियां की जाने लगीं हैं। राष्ट्रपति चुनाव में जहां राजग उम्मीदवार रामनाथ कोविन्द को राजग के अलावा नीतीश कुमार यानी जनता दल यूनाइटेड का समर्थन मिला है, वहीं उपराष्ट्रपति के चुनाव में नीतीश कुमार ने राजनीतिक पैंतरेबाजी दिखाते हुए विपक्ष के साथ रहने की बात कही है।</p>
<p style="text-align:justify;">नीतीश कुमार के इस कदम को राजनीतिक क्षेत्र में एक तीर से कई निशाने साधने जैसा ही कहा जा रहा है। नीतीश कुमार ने जहां राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन देकर राजग को खुश किया है, वहीं विपक्षी दलों के मुंह बंद करने के लिए, खासकर लालू प्रसाद यादव को चुप रखने के लिए उपराष्ट्रपति चुनाव में संप्रग समर्थित उम्म्ीदवार को समर्थन देने की घोषणा की है। इससे भले ही उम्मीदवार जीते या हारे, नीतीश कुमार ने अपना पांसा फैंक दिया है। नीतीश कुमार द्वारा यह कदम बहुत ही सोच विचार कर उठाया हुआ लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रपति पद के लिए नीतीश द्वारा राजग प्रत्याशी को समर्थन दिए जाने से जहां विपक्षी दल नीतीश पर निशाना साधने की मुद्रा में आ गए थे, वहीं उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्षी दलों के साथ दिखाई देने से नीतीश कुमार ने शब्द बाण चलाने वाले नेताओं के बाणों की दिशा उनके स्वयं की ओर ही कर दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब ऐसे में नीतीश कुमार विपक्ष की आलोचना से बच जाएंगे। नीतीश कुमार द्वारा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में अलग-अलग भूमिका निभाने से उनकी राजनीति करने के तरीके पर यह सवाल जरुर खड़ा होता है कि वह सैद्धांतिक राजनीति का कौन सा रुप दिखा रहे हैं। क्या वर्तमान राजनीति का यही सिद्धांत है? अगर यही स्वरुप है तो इस प्रकार की राजनीति को खत्म होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि नीतीश कुमार के लिए ऐसा करना राजनीतिक मजबूरी भी हो सकती है। क्योंकि बिहार में मात्र नीतीश कुमार के दल की ही सरकार नहीं है, बल्कि बिहार की सरकार में राष्ट्रीय जनता दल और कांगे्रस का भी सहयोग है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए फिलहाल कांगे्रस और राजद को साथ लेकर चलना एक मजबूरी भी हो सकती है। विधायकों की संख्या को देखा जाए जाए तो यह मजबूरी इतनी बड़ी भी नहीं हैं कि नीतीश के भविष्य पर ज्यादा प्रभाव पड़े।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि नीतीश कुमार का बिहार में इन दोनों से ज्यादा प्रभाव है, किसी भी प्रकार से यह दोनों नीतीश का साथ छोड़ते हैं तो उन्हें ज्यादा हाथ पैर नहीं मारने होंगे, क्योंकि नीतीश की पार्टी को बहुमत प्राप्त करने के लिए मात्र 15 विधायकों की जरुरत होगी, जो उन्हें आसानी से प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन नीतीश कुमार ने बिहार में जो छवि बनाई है, उसे वे आसानी से तोड़ना नहीं चाहेंगे। ऐसे में वह भ्रष्टाचार के आरोप से घिर चुके लालू प्रसाद यादव की पार्टी से दूर होने का रास्ता अपना सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राष्ट्रपति चुनाव में राजग का समर्थन करके एक प्रकार से यह संकेत तो दे ही दिया है कि वह विपक्ष की नीतियों से ज्यादा प्रसन्न नहीं हैं, लेकिन इसके साथ ही उपराष्ट्रपति के चुनाव में अलग राह पकड़ना उनको सिद्धांत विहीन राजनीतिज्ञ ही निरुपित कर रहा है। बिहार में नीतीश के सामने आज की सबसे बड़ी परेशानी यही है कि लालू प्रसाद यादव की राजद के साथ मिलकर सरकार चलाने में उनकी छवि पर भी आंच आ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">लालू प्रसाद यादव का परिवार जिस प्रकार से आय से अधिक संपति के मामले में फंसता हुआ दिखाई दे रहा है, उससे लालू के परिवार का बचकर निकलना कठिन है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि लालू और उनके परिवार ने जो संपत्ति अर्जित की है, उस पर आय से अधिक संपत्ति का मामला तो बनता ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">लालू प्रसाद यादव भले ही इसे राजनीतिक बदले की कार्यवाही कह रहे हों, लेकिन इस सत्य को लालू भी भली भांति जानते हैं कि जहां आग लगती है, धुआं भी वहीं से उठता है। लालू प्रसाद यादव वर्तमान में लाख सफाई दें, लेकिन वह भ्रष्टाचार के मामले में दोषी हैं, इस बात को वह स्वयं भी नकारने की स्थिति में नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लालू प्रसाद यादव को यह ज्ञात होना चाहिए कि उन पर भ्रष्टाचार का मामला लम्बे समय से चल रहा है, और उसी समय यह बात भी सामने आ गई थी कि लालू और उसके परिवार पर आय से अधिक संपत्ति है, हालांकि अब चूंकि जांच हो रही है, तब सारा मामला एकदम साफ हो जाएगा। पर इतना तो तय है कि लालू प्रसाद यादव ने भ्रष्टाचार करके अपने पद का दुरुपयोग किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्पष्ट कर चुके हैं कि कानून अपना काम करे, वे अपना काम कर रहे हैं। पर जिस सरकार के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री बेनामी संपत्ति जमा करने के मामले में आय कर विभाग की जांच का सामना कर रहे हों, उस सरकार के मुखिया की परेशानी का अंदाजा लगाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">तो बात चल रही थी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में समर्थन की तो राजग की ओर से रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी घोषित होते ही नीतीश कुमार ने प्रसन्नता व्यक्त की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">तब लगा कि कोविंद के बिहार का राज्यपाल रहने के दौरान दोनों के बीच गहरे संबंध रहे होंगे और शायद उसी के नाते वे व्यक्तिगत तौर पर खुशी का इजहार कर रहे हैं, या हो सकता है उन्होंने राज्यपाल के तौर पर कोविंद का नाता बिहार से होने की याद दिलाना चाहा हो। यह भी हो सकता है कि कोविंद के बहाने नीतीश दलितों के बीच अपनी पैठ बढ़ाना चाह रहे हों।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस की पहल पर सत्रह विपक्षी दलों ने मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद के लिए अपना उमीदवार घोषित किया, तो लगा कि नीतीश अब शायद पुनर्विचार कर सकते हैं, क्योंकि कोविंद की तरह मीरा कुमार भी दलित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर, मीरा कुमार का बिहार से कहीं ज्यादा गहरा नाता है, वे बिहार से पांच बार सांसद रह चुकी हैं। लेकिन नीतीश टस से मस नहीं हुए। फिर, उपराष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने विपक्ष के साथ रहने का भरोसा क्यों दिलाया है, जबकि किसी तरफ से कोई उम्मीदवार घोषित नहीं हुआ है?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></p>
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</p><p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Mon, 10 Jul 2017 00:01:19 +0530</pubDate>
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