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                <title>Waste - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>अब बिना हाथ लगाए दूसरे डस्टबिन में पलटा जा सकेगा बायो मेडिकल वेस्ट</title>
                                    <description><![CDATA[सरसा सहित पूरे हरियाणा से आठ मॉडल इंस्पायर अवॉर्ड की राष्ट्रीय प्रदर्शनी में होंगे प्रदर्शित छात्रा परमिंद्र का ‘अस्पताल में कचरा इकट्ठा करने और प्रबंधन का स्मार्ट तरीका’ मॉडल राष्टÑीय प्रदर्शनी के लिए चयनित सरसा(सच कहूँ/सुनील वर्मा)। अस्पताल, नर्सिंग होम और पैथोलॉजी सेंटर से बायो मेडिकल वेस्ट निकालने वाले कर्मियों को अब संक्रमण का डर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/now-bio-medical-waste-can-be-put-in-another-dustbin-without-touching-hands/article-31124"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-02/bio-medical-waste.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><strong>सरसा सहित पूरे हरियाणा से आठ मॉडल इंस्पायर अवॉर्ड की राष्ट्रीय प्रदर्शनी में होंगे प्रदर्शित</strong></h4>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>छात्रा परमिंद्र का ‘अस्पताल में कचरा इकट्ठा करने और प्रबंधन का स्मार्ट तरीका’ मॉडल राष्टÑीय प्रदर्शनी के लिए चयनित</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा(सच कहूँ/सुनील वर्मा)।</strong> अस्पताल, नर्सिंग होम और पैथोलॉजी सेंटर से बायो मेडिकल वेस्ट निकालने वाले कर्मियों को अब संक्रमण का डर नहीं सताएगा और बायो मेडिकल वेस्ट से भरे डस्टबिन को बिना हाथ लगाए सुरक्षित तरीके से दूसरे बड़े डस्टबीन में पलटा जा सकेगा। जी हां ऐसा संभव कर दिखाया है डबवाली उपमंडल के गांव मांगेआना के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के आठवीं कक्षा के छात्र परमिन्द्र सिंह ने अपने मॉडल के माध्यम से। परमिन्द्र सिंह का बनाया गया ‘अस्पताल में कचरा इकट्ठा करने और उसके प्रबंधन का स्मार्ट तरीका’ पर आधारित मॉडल का चयन नेशनल इंस्पायर अवार्ड प्रदर्शनी के लिए हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर यहां पर उपरोक्त मॉडल विजेता बनता है तो यह राष्ट्रपति भवन में आयोजित प्रवर्तन उत्सव में प्रदर्शित होगा। परमिन्द्र सिंह की अविश्वसनीय उपलब्धि पर जिला शिक्षा अधिकारी संत कुमार बिश्नोई, जिला विज्ञान विशेषज्ञ डा. मुकेश कुमार, जिला गणित विशेषज्ञ नीरज पाहूजा, सहायक शिक्षा खेल अधिकारी अनिल कुमार, डिंग डाइट के जीव विज्ञान प्रवक्ता चन्द्रप्रकाश, स्कूल के डीडीओ आन्नद सहित अन्य लोगों ने परमिन्द्र सिंह व उनके गाइड भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता तरसेम सिंह को बधाई दी।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>राष्ट्रीय स्तर पर चयनित मॉडल को राष्ट्रपति भवन में आयोजित प्रवर्तन उत्सव में प्रदर्शित किया जायेगा व सम्बन्धित विद्यार्थी को माननीय राष्टÑपति महोदय के हाथों से पुरस्कृत होने का मौका मिलेगा। साथ ही राष्टÑीय स्तर पर चयनित चुनिन्दा विद्यार्थियों को विदेश यात्रा भी करवाई जाती है। </em><br />
<strong><em>-डॉ. मुकेश कुमार, जिला विज्ञान विशेषज्ञ, सरसा। </em></strong></p>
<p><em>विद्यार्थियों में सृजनशीलता व रचनात्मक सोच की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए इंस्पायर अवार्ड मानक योजना को शुरू किया गया है। जो विद्यार्थियों के नवाचारी प्रोत्साहन के लिए यह एक अभिनव योजना है। </em><br />
<strong><em>– संत कुमार बिश्नोई, जिला शिक्षा अधिकारी, सरसा।</em></strong></p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>7 विद्यार्थियों का चयन राज्य स्तरीय प्रदर्शनी के लिए हुआ: डॉ. मुकेश</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जिला विज्ञान विशेषज्ञ और इंस्पायर अवार्ड मानक के नोडल अधिकारी डॉ. मुकेश कुमार ने बताया कि 21 दिसंबर 2021 को आॅनलाइन जिला स्तरीय इंस्पायर अवार्ड मानक प्रदर्शनी में सरसा जिला से 77 चयनित विद्यार्थियों ने भाग लिया था, जिसमें से 7 विद्यार्थियों का चयन राज्य स्तरीय प्रदर्शनी के लिए हुआ था। एक व दो फरवरी को आॅनलाइन मानक कंपटीशन एप के माध्यम से राज्यस्तरीय इंस्पायर प्रदर्शनी में प्रदेशभर से 62 चयनित विद्यार्थियों ने भाग लेकर अपने मॉडल प्रदर्शित किये। जिनमें से 20 जिलों के 8 मॉडल राष्टÑीय प्रदर्शनी के लिए चयनित किये गये हैं। इनमें सरसा के परमिन्द्र सिंह द्वारा बनाया गया मॉडल भी शामिल है। जोकि सरसा जिले के लिए गर्व की बात है। परमिन्द्र सिंह मांगेआना स्कूल का आठवीं कक्षा का छात्र है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हरियाणा से यह आठ मॉडल हुए <em>राष्ट्रीय  </em>प्रदर्शनी के लिए चयनित</strong></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>विद्यार्थी नाम                                            मॉडल का नाम</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>स्वास्तिक चौहान                         सड़क के लिए स्वचालित गड्ढे की मरम्मत प्रणाली</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>कुशाग्र बब्बर                             इलेक्ट्रिक सॉकेट के अंदर स्किन सेंसर</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>परमिन्द्र सिंह                       अस्पताल में कचरा इकट्ठा करने और उसके प्रबंधन का स्मार्ट तरीका</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>पृथ्वी                     मौजूदा विद्युत फिटिंग के माध्यम से प्रत्येक कमरे में आॅक्सीजन युक्त हवा की आपूर्ति</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>राहुल                                          कपास की फसल खींचने वाला</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>अंजली                                    लकड़ी के भार वाहक बॉक्स बनाने के लिए</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>सागर                                         अति संवेदनशील विद्युत क्षेत्र डिटेक्टर</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>विशाल कुमार                       पढ़ने और लिखने के लिए ऊंचाई समायोज्य बेंच</strong></li>
</ul>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 26 Feb 2022 10:20:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देशव्यापी समस्या बन रहा कूड़ा निपटान</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में आम लोगों की कॉलोनियों के पास कूड़ा डंप बनाने की सख्त शब्दों में निंदा करते हुए संबंधित अथॉरिटी को फटकार लगाई है। अदालत ने सख्त शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि क्यों नहीं उप राज्यपाल के भवन के सामने कूड़Þा डंप बना दिया जाए। नि:संदेह इस टिप्पणी से सिर्फ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/countrywide-problem-is-the-waste/article-5235"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/no-discrimination-with-women-on-the-name-of-religion1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में आम लोगों की कॉलोनियों के पास कूड़ा डंप बनाने की सख्त शब्दों में निंदा करते हुए संबंधित अथॉरिटी को फटकार लगाई है। अदालत ने सख्त शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि क्यों नहीं उप राज्यपाल के भवन के सामने कूड़Þा डंप बना दिया जाए। नि:संदेह इस टिप्पणी से सिर्फ दिल्ली के ही नहीं बल्कि पूरे देश के मध्य वर्गीय व गरीबों का दर्द झलकता है। महानगरों से लेकर छोटे-बड़Þे शहरों में कूड़ा समस्या की बजाए आफत बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली में कूड़े के पहाड़ बनाए जा रहे हैं फिर भी मामले का हल नहीं हो सका। अथॉरिटी ने अपने सिर से बोझ उतारने के लिए कूड़ा डंप आम लोगों की आबादी के नजदीक बना दिए, जिसका लोगों ने विरोध किया। यही हाल पूरे देश का है। प्रशासन कूड़Þा डंप के लिए ऐसी जगह चुनता है जो पास के क्षेत्र से दूर होती है लेकिन नजदीक रहने वाले लोग अधिकारियों को नजर नहीं आते। सत्ता तक पहुंच वाले लोगों से प्रशासन को डर रहता है। आम लोग जिनके पास अपनी रोजी-रोटी से ही फुर्सत नहीं का भी हल नहीं वह धरना-प्रदर्शन के लिए कहां से समय निकाल सकते हैं, अगर विरोध कर जेल चले जाएं तो परिवार को रोटी के लाले पड़ जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रशासन इन लोगों की लाचारी का फायदा उठाकर मनमानी करता है। फिर यह मजबूर लोग कूड़े का कहर भयानक बीमारियों के रूप में झेलते हैं। सर गंगा राम अस्पताल के एक सर्वेक्षण मुताबिक दिल्ली की 50 फीसदी आबादी को कैंसर का खतरा है चाहे वह बीड़ी-सिगरेट का सेवन न भी करते हों। राजधानी जो खूबसूरती व सफाई की मिसाल होनी चाहिए वह कूड़े की समस्या से दो-चार हो रही है। पूरे देश के लिए कूड़े के निपटारे संबंधी स्पष्ट व ठोस नीति होनी चाहिए ताकि कोई प्रॉजैक्ट समय पर पूरा हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रशासन की जल्दबाजी के कारण व सही नीतियां न होने के कारण प्रॉजैक्ट विवादों में आ जाते हैं, जिस कारण 6 महीनों में होने वाला कार्य 2-4 वर्ष के लिए लटक जाता है। दिल्ली जैसे महानगरों के लिए ऐसे प्रॉजैक्ट में देरी घातक सिद्ध होगी। छोटे-बड़े शहरों में कूड़ा डंप का विरोध हो रहा है। कहीं न कहीं यह मामले चुनावी मुद्दे बनने लगे हैं। सफाई किसी देश के विकास व तंदरूस्ती की पहली शर्त है व इसके लिए लोगों के स्वास्थ्य व हितों की बलि नहीं ली जा सकती। सरकारें अपनी जिम्मेवारी निभाएं व जनता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें। कुछ लोगों का कूड़ा किसी अन्य के लिए बीमारी न बनने दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट की नसीहत से शिक्षा लेनी चाहिए।</p>
<p> </p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/countrywide-problem-is-the-waste/article-5235</link>
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                <pubDate>Tue, 07 Aug 2018 20:45:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्लास्टिक कचरे से मुक्ति कब तक</title>
                                    <description><![CDATA[वर्तमान में प्लास्टिक कचरा बढ़ने से जिस प्रकार से प्राकृतिक हवाओं में प्रदूषण बढ़ रहा है, वह मानव जीवन के लिए तो अहितकर है ही, साथ ही हमारे स्वच्छ पर्यावरण के लिए भी विपरीत स्थितियां पैदा कर रहा है। हालांकि इसके लिए समय-समय पर सरकारी सहयोग लेकर गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा जागरण अभियान भी चलाए […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/how-long-do-you-get-rid-of-plastic-waste/article-3376"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/plastic.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान में प्लास्टिक कचरा बढ़ने से जिस प्रकार से प्राकृतिक हवाओं में प्रदूषण बढ़ रहा है, वह मानव जीवन के लिए तो अहितकर है ही, साथ ही हमारे स्वच्छ पर्यावरण के लिए भी विपरीत स्थितियां पैदा कर रहा है। हालांकि इसके लिए समय-समय पर सरकारी सहयोग लेकर गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा जागरण अभियान भी चलाए जा रहे हैं, परंतु परिणाम उस गति से मिलता दिखाई नहीं देता। ऐसे में प्रश्न यह आता है कि गैर सरकारी संस्थाओं के यह अभियान अपेक्षित परणिाम क्यों नहीं दे पा रहे हैं। इसके पीछे की कहानी कहीं केवल कागज तो नहीं हैं। भारत में कागजों में काम होने की बीमारी लगातार बढ़ रही है। कागजों के आंकड़ों को वास्तविक धरातल पर उतारा जाता है, तो कहीं भी काम दिखाई नहीं देता। प्लास्टिक मुक्ति का अभियान गैर सरकारी संस्थाओं ने बलि चढ़ा दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में यह भी चिंतन का विषय है कि हमारी सामाजिक चेतना के कम होने के कारण हम चैतन्यता के नाम पर शून्य की तरफ ही बढ़ते जा रहे हैं। अगर प्लास्टिक प्रदूषण बढ़ने की यही गति बरकरार रही तो एक दिन हमें शुद्ध हवा से वंचित होना पड़ सकता है। हम जानते हैं कि वर्तमान में वायु प्रदूषण के चलते हमारे शरीर में कई प्रकार के विषैले कीटाणु प्रवेश कर रहे हैं, जो हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं और नई-नई बीमारियां जन्म ले रही हैं। भारत में कई बीमारियां केवल गंदगी के कारण हो रही हैं, चाहे वह प्लास्टिक कचरे से उत्पन्न गंदगी हो या फिर इसके कारण जाम नालियों के गंदे पानी से प्रदूषण से पैदा होने वाले वातावरण से पैदा होने वाली गंदगी हो।</p>
<p style="text-align:justify;">प्लास्टिक पॉलीथिन में बहुत से लोग घर का कचरा भरकर बाहर फैंक रहे हैं, जिसे हमारी गौमाता खाती है और हम जाने-अनजाने में गौहत्या का पाप कर रहे हैं। इसके साथ ही बहुत बड़ा सच यह भी है कि प्लास्टिक पॉलीथिन और खाद्य सामग्री में उपयोग आने वाले प्लास्टिक के सामान रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल के कारण हमें जहर भरे खाना खाने के लिए विवश कर रहे हैं। इसके कारण हमारा स्वास्थ्य विकरालता की ओर जा रहा है। इसमें प्लास्टिक कचरे का बहुत बड़ा योगदान है। हालांकि हमारे देश में स्वच्छ भारत अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन क्या हम जानते हैं कि प्लास्टिक कचरा स्वच्छ भारत अभियान की दिशा में बहुत बड़ा अवरोधक बनकर सामने आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्लास्टिक कचरे से मुक्ति पाने के लिए भाजपा की छत्तीसगढ़ सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाया है। पहले 2014 में छत्तीसगढ़ की सरकार ने पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाकर इससे मुक्ति का सूत्रपात किया था और अब प्लास्टिक से निर्मित प्रचार सामग्री और खाद्य पदार्थों के लिए उपयोग में लाई जाने वाली डिस्पोजल वस्तुओं पर भी पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। छत्तीसगढ़ सरकार का यह कदम सभी राज्यों के लिए एक पाथेय है। हम जानते हैं कि छत्तीसगढ़ क्षेत्र लम्बे समय से पिछड़ा हुआ क्षेत्र माना जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है, छत्तीसगढ़ से यह पिछड़ेपन का ठप्पा धीरे-धीरे हटने लगा है। सरकार द्वारा चलाए जा रहे अभियानों के कारण वहां की जनता में चेतना जगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिसका असर दिखाई देने लगा है। प्लास्टिक कचरे के बारे में यह सबसे बड़ा सच है कि यह वास्तव में आयातित कचरा है। हमारे देश में कागज और कपड़े के बैग ही प्रचलन में रहते थे, लेकिन विदेशियों की नकल करने के कारण हम भी प्लास्टिक का उपयोग करने की ओर प्रवृत होते चले गए। यही प्रवृति आज हमारे देश की सबसे विकराल समस्या बनकर उभर रही है। हमने एक कहावत भी सुनी है कि अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता, यह सोच किसी प्रकार से भारतीय संस्कृति का संवाहक नहीं हो सकता। यह सोच विदेशों की नकल है। आज प्लास्टिक कचरे का उपयोग भी कुछ इसी तर्ज पर किया जा रहा है। लोग अपना काम बनाने के लिए प्लास्टिक के सामानों का प्रयोग कर रहे हैं, और बाद में यही सामान कचरा बन जाता है, जो जनता के लिए गंभीर समस्याओं को पैदा कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कचरा फैंकने वाले लोगों का इतना नहीं मालूम कि यह कचरा हमारे लिए भी समस्या बन रहा है। देश के लिए गंभीर स्थिति पैदा कर रहा है। इस स्थिति को और आगे बढ़ने से रोकने के लिए छत्तीसगढ़ की सरकार ने अभूतपूर्व कदम उठाया है, लेकिन क्या सरकार के कदम उठाने मात्र से यह सफल हो सकेगा। नहीं हो सकता। इसके लिए जनता की भागीदारी भी बहुत मायने रखती है। वास्तव में जिस देश की जनता अपने देश के प्रति तादात्म्य स्थापित करते हुए कार्य करती है, वह देश बहुत सुंदर और स्वच्छ होता है। हम भारत देश के निवासी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए हमारे आचरण और कार्य में भारतीय संस्कृति का प्रदर्शन होना चाहिए। हमारी संस्कृति यही कहती है कि सर्वे भवन्तु सुखिन: अर्थात सभी सुखी हों, लेकिन आज के दौर में हमें यह भी चिंतन करना होगा कि क्या हमारे कार्यों से जनता को सुख की अनुभूति होती है, हम देश को स्वस्थ बनाने के लिए अपनी ओर से कितना योगदान दे रहे हैं, अगर इसका उत्तर नहीं में है तो हमारे अंदर भारतीयता का अभाव है। लोग कितना भी कहें कि हम भारतीय नागरिक हैं, लेकिन जब तक हमारी दिनचर्या में भारतीयता दिखाई नहीं देगी, तब तक हम भारतीय नहीं हैं। आज हम देख रहे हैं कि हम भारत के नागरिक ही जाने अनजाने में एक दूसरे के लिए समस्याओं का निर्माण करते जा रहे है। यह गति लगातार बढ़ती जा रही है। देश में वातावरणीय समस्याओं का प्रादुर्भाव हमारी अपनी देन है, जो जाने या अनजाने में हमने ही पैदा की हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हम यह भी जानते हैं कि प्लास्टिक कचरे के कारण जिन बस्तियों में पानी भर जाता है, उसका एक मात्र कारण भी तो हम ही हैं। नालियां जाम होने की वजह से ही ऐसे हालात बन रहे हैं। स्वच्छ हवा प्रदान करने वाले पेड़ पौधे भी प्रदूषित वातावरण का शिकार हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में हमें ताजी हवा कैसे मिल सकती है। आज यह सबसे बड़ा सवाल है। इस सवाल का एक मात्र जवाब यही है कि हमें चैतन्य शक्ति का जागरण करके देश को स्वच्छ वातावरण देने के लिए प्लास्टिक कचरे से मुक्ति पाना है। अगर हम ऐसा कर सके तो यह तय है कि हमारा देश फिर से तरो ताजा हवा प्रदान करने वाला देश बन जाएगा। इसके लिए सरकार की योजना में हमें भी पूरी तरह से सहभागी बनना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>-सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></em></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Oct 2017 05:28:47 +0530</pubDate>
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                <title>बाढ़ की विभीषिका!</title>
                                    <description><![CDATA[दक्षिणी-पश्चिमी मानसून में एकाएक आई तेजी की वजह से इस समय देश के उत्तर तथा उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने वहां का जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। उत्तराखंड, ओडिशा, बिहार, असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश आदि राज्य बाढ़ की चपेट में हैं। दुखद है कि बाढ़ का यह स्वरुप धीरे-धीरे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/flood-of-the-cataclysmic/article-2454"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/flood.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दक्षिणी-पश्चिमी मानसून में एकाएक आई तेजी की वजह से इस समय देश के उत्तर तथा उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने वहां का जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। उत्तराखंड, ओडिशा, बिहार, असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश आदि राज्य बाढ़ की चपेट में हैं। दुखद है कि बाढ़ का यह स्वरुप धीरे-धीरे जानलेवा होता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">केवल पूर्वोत्तर से अब तक सौ से अधिक लोगों के मरने की खबरें आई हैं। सबसे बुरा असर प्रभावित इलाकों के ग्रामीण समाज तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। जलप्लावन की वजह से अनेक गांव तबाह हो चुके हैं, लाखों लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। बेजुबान पशुओं के लिए भी यह बाढ़ आफत साबित हो रही है। वहीं, लाखों हेक्टेयर भूमि पर खड़ी फसलें भी नष्ट हो चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, बरसात के महीने में बाढ़ आना कोई नई बात नहीं है। जून से सितंबर तक दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के चार महीने की समयावधि में होने वाली अत्यधिक वर्षा से उत्पन्न बाढ़ की वजह से मुख्यत: उत्तर तथा पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में हालात नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दृश्य कुछ पल के लिए मरघट-सा हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक तरफ, लोगों के समक्ष सुरक्षित स्थानों पर जाकर अपने जीवन को बचाने की चुनौती होती है, वहीं इसके पश्चात प्रभावित आबादी के बीच भोजन, पेयजल, दवा जैसी मूलभूत सुविधाओं को प्राप्त करने की व्याकुलता भी बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा समय में नदियों के उफान पर बहने के कारण करोड़ों लोगों का जनजीवन प्रभावित हो गया है। रेल की पटरियों और सड़कों पर पानी भर जाने से यातायात व्यवस्था पूरी तरह ठप हो चुकी है। जबकि, मूसलाधार बारिश की वजह से संचार व्यवस्था भी बाधित हो चुकी है। एनडीआरएफ की कई टीमें तत्काल सहायता के लिए उपलब्ध कराई जा रही हैं, ताकि लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में बाढ़ की विभीषिका से प्रतिवर्ष लाखों लोग हताहत होते हैं। इसके अलावा इस आपदा से बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि भी होती है। गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी, महानन्दा, दामोदर, हुगली, गंडक, कावेरी, कृष्णा, सतलुज आदि नदियाँ देश में बाढ़ का कारण बन रही हैं। ये सारी नदियाँ प्राय: हर साल तबाही लाकर अनगिनत परिवारों की जिंदगी सूनी करती हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाली आबादी तो हर साल इसी डर के साये में अपना जीवन व्यतीत करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में लगभग 400 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ के खतरे वाला है, जिसमें से प्रतिवर्ष औसतन 77 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित होता है। हर साल लगभग 35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की फसलें नष्ट हो जाती हैं। योजना आयोग के एक अनुमान के अनुसार, देश में प्रतिवर्ष औसतन 1,439 लोग बाढ़ के कारण मारे जाते हैं। जबकि, इस वजह से फसलों, मकानों, मवेशियों तथा व्यक्तिगत-सार्वजनिक संपत्तियों का बड़े पैमाने पर नुकसान भी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब यह है कि देश के किसी भी हिस्से में जब भी बाढ़ आती है तो हमारे सामने नदियों की मंद पड़ी गति का प्रश्न खड़ा हो जाता है। दरअसल, देश में बारहमासी नदियों के साथ-साथ बरसाती नदियां भी प्रदूषण की मानक रेखा से ऊपर बह रही हैं। गाद-मलबों की अधिकता होने के कारण नदियों की प्राकृतिक गति सुस्त पड़ गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में, हल्की बारिश होने पर भी नदियां जल संग्रहण नहीं कर पाती हैं और बाढ़ के फैलाव का सबसे बड़ा कारण बन जाती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट की मानें, तो देश की 445 नदियों में से 275 नदियां अभी भी प्रदूषित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बढ़ते औद्योगीकरण, कल-कारखाने से अनियंत्रित मात्रा में निकलते अशोधित अपशिष्ट तथा सीवरेज से निकलने वाली गंदगियों की वजह से देश के हर कोने में नदियां प्रदूषण के बोझ से दबी जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में लगता है कि सरकार की नदी जोड़ो परियोजना भी निरर्थक साबित होगी, क्योंकि गाद-मलबों की अधिकता की वजह से नदियां अब सतत रुप से ना तो प्रवाहित हो पा रही हैं और ना ही उनमें अब जल धारण करने की क्षमता ही शेष है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक, सरकार ने गंगा और यमुना जैसी चंद नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए करोड़ों रुपये की योजनाओं को मूर्त रूप दिया है, किन्तु सैकड़ों नदियां आज भी सरकारी उपेक्षा की शिकार हैं। यही उपेक्षित नदियां बाढ़ को आमंत्रण दे रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक, बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। लेकिन, इसके लिए आवश्यक दशाओं के निर्माण में मानव और उसकी स्वार्थपरक क्रियाओं को किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं आँका जा सकता। दरअसल, यह सब नतीजा है विकास के उस आधुनिक दृष्टिकोण का, जिसके तहत मानव प्रकृति को अपना मित्र समझने की बजाय, गुलाम समझ रहा है। वनों की अधिकता मृदा को जकड़े रखती है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन कृषिगत तथा औद्योगिक आवश्यकता की पूर्ति की खातिर जंगलों का बड़े पैमाने पर सफाया हो रहा है। ऐसे भू-क्षेत्र बाढ़ के जल को रोके रखने में अक्षम होते हैं, नतीजा तबाही आती है। वर्षा के आगमन से पूर्व जलस्रोतों से गादों की सफाई होनी चाहिए थी। लाखों तालाब तथा डोभा का निर्माण कराये जाने के साथ लोगों को ‘वर्षा जल संग्रहण’ के लिए जागरुक किया जाना चाहिए था। लेकिन, यह सब नहीं किया गया। नतीजा, हमारे सामने है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, बाढ़ आने पर पर्यावरणविदों तथा देश के कथित बौद्धिक वर्ग के लोगों के बीच विकास और पर्यावरण में संतुलन विषय पर चचार्ओं और चिंतन का दौर शुरू हो जाता है, लेकिन बाढ़ का पानी जैसे-जैसे कम होता जाता है, उसी अनुपात में पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा भी गौण होने लगता है। 2013 में उत्तराखंड, 2014 में जम्मू-कश्मीर तथा 2015 में तमिलनाडु में आई बाढ़ जनित विपदा के बाद उम्मीद थी कि मौजूदा हालात बदलेंगे,</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात होता नजर आया है। मशहूर पर्यावरणविद सुंदरलाल बहगुणा, जल-पुरुष राजेन्द्र सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर जैसे लोग लंबे समय से इस दिशा में सरकार को आगाह करने का काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी बातों को न तो सुना जाता है और न तो उसपर चर्चा ही होती है। आज जरुरत है विकास के सततपोषणीय स्वरुप को अपनाने की।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, प्राकृतिक आपदाएं प्रकृति की एक नियमित प्रक्रियाएं होती हैं। ऐसा नहीं है कि पहले प्रकृति में ये सारी क्रियाएं नहीं होती थीं, लेकिन उसकी सीमा निश्चित थी और उससे नुकसान भी नाममात्र का होता था। अब विकास की अंधी दौड़ में हम शायद यह भूल गए हैं कि वैकासिक आवश्यकताओं की पूर्ति के दौरान प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा न करने पर कालांतर में हमें प्रकृति के कोप का भाजन बनना पड़ता है। विगत कुछ वर्षों में भूकंप, सुनामी, बाढ़, सूखा जैसी आपदाओं ने धरा पर क्षणिक समयंतराल में दस्तक देना शुरू किया है, जिससे हर साल लाखों लोग हताहत होते हैं। दूसरी तरफ, आपदा प्रबंधन के ठोस और तात्कालिक उपाय के अभाव में सुरक्षित बचे लोग भी जान गवां देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विकसित देशों में आपदा प्रबंधन एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता है, जबकि विकासशील देशों में इसपर गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा है। जरुरी यह है कि आपदाओं से निपटने की रणनीति के तहत सबसे पहले नागरिकों को जागरुक किया जाय।</p>
<p style="text-align:justify;">आमतौर पर देखा यह जाता है कि आवश्यक जानकारी व जागरुकता के अभाव में जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग घबराहट अथवा उपाय न सूझता देख अपना बहुमूल्य जीवन गंवा देते हैं। बहरहाल, हम प्रकृति संरक्षक बनकर आपदाओं को आने से रोक तो नहीं सकते, किंतु उसके असर को कम-से-कम जरुर कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुधीर कुमार</strong></p>
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</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Jul 2017 22:22:21 +0530</pubDate>
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                <title>पौली में बरसाती पानी की मार, 200 एकड़ में फसलें डूबी</title>
                                    <description><![CDATA[ग्रामीणों की धान, बाजरा और ज्वार की फसलें बर्बाद प्रशासन से बार-बार गुहार के बाद भी नहीं समाधान जुलाना (सच कहूँ न्यूज)।जैसे ही बरसात का मौसम आता है, पौली गाँव के किसानों के माथे पर चिंता की लक ीरें खिंच जाती हैं, क्योंकि पौली-लिजवानां कलां ड्रैन की सफाई नहीं होने से गाँव की अधिकतर भूमि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/rain-water-in-polly-waste-of-paddy-millet-and-tide-crops/article-2174"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/crops.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">ग्रामीणों की धान, बाजरा और ज्वार की फसलें बर्बाद</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>प्रशासन से बार-बार गुहार के बाद भी नहीं समाधान</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>जुलाना (सच कहूँ न्यूज)।</strong>जैसे ही बरसात का मौसम आता है, पौली गाँव के किसानों के माथे पर चिंता की लक ीरें खिंच जाती हैं, क्योंकि पौली-लिजवानां कलां ड्रैन की सफाई नहीं होने से गाँव की अधिकतर भूमि जलमग्न हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">गत दिनों हुई बरसात से पौली लिजवानां कलां ड्रैन पौली गाँव के खेतों में ओवरफ्लो हो गई है, जिससे 200 एकड़ से ज्यादा फसल पानी में डूब गई, जबकि यहां पर ग्रामीणों द्वारा धान, ज्वार और बाजरा की बिजाई की हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा किसानों ने ईख की खेती भी की हुई थी। जो अब बारिश के पानी से जलमग्न हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि गेहूँ के सीजन में भी उनकी फसल इसी तरह से बर्बाद हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि लिजवानां कलां, अकालगढ़ हथवाला आदि गाँवों का ढलान पौली गाँव की तरफ ज्यादा होने के कारण सारा बारिश का पानी उनके गाँव की तरफ बहता है और खेतों में लगभग 3-4 फीट पानी भर जाता है। जिससे ग्रामीणों की फसल बारिश के पानी से बर्बाद हो जाती है, ऐसे में किसानों ने प्रशासन से उनकी समस्या का समाधान किए जाने की गुहार लगाई है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">1992 से बनी हुई है समस्या</h2>
<p style="text-align:justify;">गाँव पौली के कुलबीर, दलबीर, रोहिराम, जिले मलिक, सुनील, बिजेन्द्र ने बताया कि उनकी यह समस्या कोई आज या कल की नहीं बल्कि साल 1992 से यह समस्या बनी हुई है। इस बारे में कई बार जिला प्रशासन को अवगत करवाया जा चुका है,</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उनकी समस्या का कोई समाधान नहीं हो रहा है और हर वर्ष उनकी फसल बर्बाद हो रही है। ऐसे में किस प्रकार वे अपना व अपने परिवार का पालन पोषण करेंगे जबकि उनके पास खेती के अलावा कोई इंकम का साधन नहीं है। इसलिए प्रशासन द्वारा उनकी समस्या पर गंभीरता से संज्ञान लिया जाना चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">बिजली समस्या ने बढ़ाई परेशानी</h2>
<p style="text-align:justify;">ग्रामीणों ने बारिश व ड्रैन के पानी को निकालने के लिए बिजली विभाग से चार दिन के लिए 24 घंटे बिजली छोड़ने की मांग की है। लेकिन इसके बावजूद बिजली केवल 8 घंटे ही छोड़ी जा रही है। जिससे किसानों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पौली गाँव के किसानों की 200 एकड़ से ज्यादा फसल जलमग्न है। ड्रैन का पानी निकलवाने के लिए सिंचाई विभाग, बिजली विभाग व जिला प्रशासन को मिल चुके हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं हुआ है। किसानों की मांग है कि खेतों के पानी को जल्द से जल्द निकलवाने का प्रबंध करें।<br />
<em><strong>सुंदर, सरपंच पौली।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/rain-water-in-polly-waste-of-paddy-millet-and-tide-crops/article-2174</link>
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                <pubDate>Mon, 10 Jul 2017 02:22:52 +0530</pubDate>
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