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                <title>Human Rights - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>फांसी की सजा पर रोक लगे: मानवाधिकार समूह</title>
                                    <description><![CDATA[वाशिंगटन (एजेंसी)। सऊदी अरब में हाल में दी गई फांसी के बाद संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और मानवाधिकार समूहों ने इस देश में मौत की सजा को समाप्त करने की मांग की है। मानवाधिकार कार्यकर्ता विशेष रूप से नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों के लिए फांसी को फिर से शुरू करने के सऊदी फैसले से चिंतित […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/death-penalty-human-rights-group/article-40340"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-11/united-nations1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन (एजेंसी)।</strong> सऊदी अरब में हाल में दी गई फांसी के बाद संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और मानवाधिकार समूहों ने इस देश में मौत की सजा को समाप्त करने की मांग की है। मानवाधिकार कार्यकर्ता विशेष रूप से नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों के लिए फांसी को फिर से शुरू करने के सऊदी फैसले से चिंतित है , इसे ‘गहरा अफसोसजनक कदमह्व बताया। उन्होंने याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया भर में मौत की सजा पर रोक लगाने के लिए देशों के व्यापक सहमति के कुछ दिनों बाद ही नशीली दवाओं और अन्य आरोपों पर यह फिर शुरू हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">मानवाधिकार के उच्चायुक्त (संरा) कार्यालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि नशीली दवाओं के अपराधों के लिए मौत की सजा देना ‘अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और मानकों के साथ असंगत’ है। सऊदी अरब में 10 नवंबर से अब तक ड्रग के आरोप में मारे गए 17 लोगों को मौत की सजा दी गयी जिनमें तीन पाकिस्तानी थे। इन तीन में से आखिरी मन्नत खान का बेटा गुलजार खान था, जिसकी फांसी की पुष्टि 22 नवंबर को यूएन आॅफिस आॅफ द हाई कमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स (ओएचसीएचआर) ने की थी। उसे हेरोइन की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>क्या है मामला</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">ओएचसीएचआर के एक प्रवक्ता एलिजाबेथ थ्रॉसेल ने कहा कि इस महीने की शुरूआत से सऊदी अरब में मौत की सजा लगभग रोजाना हो रही है , जब सऊदी अधिकारियों ने नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों के लिए मौत की सजा के उपयोग पर 21 महीने की अनौपचारिक रोक को समाप्त कर दिया। जिन लोगों को आज तक मौत की सजा दी गई उनमें तीन पाकिस्तानियों के अलावा चार सीरियाई, तीन जॉर्डन और सात सउदी नागरिक शामिल है। कार्यालय के पास इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि कितने लोग मौत की सजायाफ्ता थे क्योंकि सऊदी अरब में फांसी होने के बाद इनकी पुष्टि होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान ने हालांकि कभी भी इस तरह की फांसी का विरोध नहीं किया है। यह देखते हुए कि नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों के लिए इन पाकिस्तानी नागरिकों की फांसी देश के मानवाधिकार आयोग द्वारा जनवरी 2021 में नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों के लिए मौत की सजा पर रोक लगाने की घोषणा के बाद पहली बार हुई थी, एमनेस्टी इंटरनेशनल (एआई) ने इन फांसी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे ‘जीवन के अधिकार पर कठोर हमला’ करार दिया। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के लिए एआई के कार्यवाहक उप निदेशक डायना सेमन ने कहा, ‘देश में मौत की सजा में वृद्धि सऊदी अधिकारियों के तथाकथित प्रगतिशील सुधार एजेंडे के पीछे छिपे असली चेहरे को उजागर करती है।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 29 Nov 2022 12:36:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>निर्भीक पत्रकारिता का सर्वोच्च स्वर: बीबीसी</title>
                                    <description><![CDATA[इस समय विश्व का अधिकांश भाग हिंसा, संकट, सत्ता संघर्ष, साम्प्रदायिक व जातीय हिंसा तथा तानाशाही आदि के जाल में बुरी तरह उलझा हुआ है। परिणाम स्वरूप अनेक देशों में आम लोगों के जान माल पर घोर संकट आया हुआ है। मानवाधिकारों का घोर हनन हो रहा है। लाखों लोग विस्थापित होकर अपने घरों से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/bbc-pinnacle-of-fearless-reporting/article-10459"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-09/human-rights-bbc-pinnacle-of-fearless-reporting.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इस समय विश्व का अधिकांश भाग हिंसा, संकट, सत्ता संघर्ष, साम्प्रदायिक व जातीय हिंसा तथा तानाशाही आदि के जाल में बुरी तरह उलझा हुआ है। परिणाम स्वरूप अनेक देशों में आम लोगों के जान माल पर घोर संकट आया हुआ है। मानवाधिकारों का घोर हनन हो रहा है। लाखों लोग विस्थापित होकर अपने घरों से बेघर होने के लिए मजबूर हैं। ऐसे कई देशों में बच्चों व महिलाओं की स्थिति खास तौर पर अत्यंत दयनीय है। सीरिया, यमन व अफगानिस्तान जैसे देश तो लगभग पूरी तरह तबाह हो चुके हैं। ऐसे में किस देश की आम जनता पर क्या गुजर रही है इसकी सही जानकारी जुटा पाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। ले देकर मीडिया ही एक ऐसा स्रोत है जिससे किसी भी घटना अथवा विषय की सही जानकारी हासिल होने की उम्मीद लगाई जा सकती है। परन्तु दुर्भाग्यवश संकटग्रस्त विभिन्न देशों का मीडिया भी अपनी निष्पक्षता व विश्वसनीयता खो चुका है या खोता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व में बढ़ते जा रही पूर्वाग्रही व पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का आलम यह है कि अनेक पक्ष के लोगों ने अपनी मनमानी डफली बजाने के लिए अपने कई निजी टीवी चैनल शुरू कर दिए हैं तथा अपने प्रवक्ता रुपी कई अखबार व पत्रिकाएं प्रकाशित कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त सत्ता का गुणगान करने व पूर्वाग्रही विचार रखने वाले अनेक कथित लेखकों को भी मैदान में उतारा गया है जो सत्ता के गुणगान करने तथा सत्ता के आलोचकों पर हमलावर होने जैसी अपनी सरकारी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इसी प्रकार मुख्य धारा के कई टीवी चैनल्स के अनेक एंकर टीवी पर युद्धोन्माद फैलाने व साम्प्रदायिकता परोसने के विशेषज्ञ बन गए हैं। झूठी खबरें तक प्रकाशित करना इनके लिए साधारण सी बात है। पत्रकारिता पर छाते जा रहे इस गंभीर संकट का एक दुष्प्रभाव यह भी पड़ रहा है कि ईमानदार, अच्छे, ज्ञानवान व पत्रकारिता के मापदंडों पर खरे उतरने वाले अनेक ऐसे पत्रकार जो अपने मीडिया संस्थान के स्वामी के साथ अपने जमीर का सौदा नहीं कर सके और पत्रकारिता को व्यवसायिकता पर तरजीह देने का साहस किया ऐसे अनेक पत्रकार बड़े बड़े चाटुकार व सत्ता की गोद में खेलने वाले मीडिया संस्थानों से नाता तोड़ कर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए हुए हैं और पत्रकारिता जैसे पवित्र व जिम्मेदाराना पेशे की अस्मिता की रक्षा करने में लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मीडिया पर छाए अनिश्चितता के इस दौर में भी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कुछ मीडिया संस्थान ऐसे भी हैं जो पत्रकारिता की अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहे हैं। यदि आज के दौर में इस तरह के जिम्मेदार मीडिया हॉउस न हों तो कोई भी ऐसा दूसरा स्रोत नहीं जो हमें संवेदनशील स्थानों की सही जानकरी दे सके। ऐसे ही एक कर्तव्यनिष्ठ मीडिया घराने का नाम है बीबीसी। 1922 में सर्वप्रथम ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के नाम से स्थापित तथा अपनी स्थापना के मात्र 5 वर्षों बाद अर्थात 1927 में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कापोर्रेशन के नाम से जाना जाने वाला मीडिया संस्थान अपनी स्थापना के समय से ही अपनी विश्वसनीयता, निर्भीकता तथा बेबाकी के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध रहा है। बीबीसी सबसे तेज की नीति पर चलने के बजाए सबसे विश्वसनीय होने की नीति पर चलता रहा है। जनभागीदारी के आधार पर चलने वाला यह संस्थान हमेशा ही दबाव मुक्त रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक निष्पक्ष और बेलाग लपेट की पत्रकारिता करने की जितनी कुबार्नी बी बी सी को देनी पड़ी है उतनी किसी दूसरे मीडिया घराने के लोगों को नहीं देनी पड़ीं। आज भी बीबीसी सीरिया, अफगानिस्तान, इराक, फिलिस्तीन, पाकिस्तान, म्यांमार, यमन, कश्मीर तथा ब्लूचिस्तान जैसे संवेदनशील इलाकों की रिपोर्टिंग पूरी ईमानदारी व जिम्मेदारी के साथ करने का प्रयास कर रहा है। हालांकि बीबीसी को पत्रकारिता के वास्तविक सिद्धांतों पर चलने का खमियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। अकेले अफगानिस्तान में ही 1990 से शुरू हुए गृह युद्ध में अब तक बीबीसी के पांच पत्रकारों की हत्या हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल जिस पक्ष को निष्पक्ष व जिम्मेदार पत्रकारिता नहीं भाती वही पक्ष बीबीसी का बैरी हो जाता है। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों अफगानिस्तान पर एक विस्तृत रिपोर्टिंग करते हुए बीबीसी ने यह दावा किया कि अफगानिस्तान में पिछले महीने एक हजार तालिबानी लड़ाके मारे गए। परन्तु तालिबान और अफगान सरकार दोनों ने ही मारे गए लोगों के बीबीसी के आंकड़ों की वैधता पर सवाल उठाए। तालिबान ने कहा कि वो पिछले महीने एक हजार लड़ाकों के मारे जाने के बीबीसी के दावों को पूरी तरह खारिज करता है और इसे निराधार मानता है। जबकि अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि बीबीसी के इस शोध की गंभीरतापूर्वक समीक्षा किए जाने की जरूरत है और गंभीर रिसर्च के साथ जमीनी हकीकतों को रिपोर्ट में शामिल किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि बीबीसी का कहना है कि वह अपने पत्रकारिता के सिद्धांतों पर खड़ी है। इसी प्रकार सीरिया में एक दोहरे हवाई हमले को लेकर रूस को कटघरे में खड़ा करने की भूमिका बीबीसी ने बड़ी ही जिम्मेदारी से निभाई। इनदिनों कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति के बाद राज्य में पैदा हालात की रिपोर्टिंग भी बीबीसी द्वारा बड़े ही बेबाक तरीके से की जा रही है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि चाटुकार व दलाल मीडिया के वर्तमान दौर में नि:संदेह बी बी सी निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकारिता का आज भी सर्वोच्च स्वर है।<br />
<strong><em>तनवीर जाफरी</em></strong></p>
<p> </p>
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                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Sep 2019 21:21:12 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>ट्रम्प ने किम से वार्ता में मानवाधिकारों के दुरूपयोग का मसला भी उठाया</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त सैन्य अभ्यास को समाप्त करने की घोषणा वाशिंगटन (एजेंसी): अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उत्तर कोरिया नेता किम जोंग उन के साथ इस सप्ताह सिंगापुर में हुए ऐतिहासिक शिखर बैठक के दौरान प्योंगयांग सरकार द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन का मसला भी उठाया। व्हाईट हाउस की प्रवक्ता साराह सैंडर्स ने संवाददाताओं को गुरुवार को यह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/trump-raised-the-issue-of-misuse-of-human-rights-in-talks-with-kim/article-4190"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/kin-jom.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">संयुक्त सैन्य अभ्यास को समाप्त करने की घोषणा</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन (एजेंसी):</strong></p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उत्तर कोरिया नेता किम जोंग उन के साथ इस सप्ताह सिंगापुर में हुए ऐतिहासिक शिखर बैठक के दौरान प्योंगयांग सरकार द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन का मसला भी उठाया। व्हाईट हाउस की प्रवक्ता साराह सैंडर्स ने संवाददाताओं को गुरुवार को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा,“जैसा कि राष्ट्रपति ने पहले ही सार्वजनिक रूप से कहा है … उन्होंने उत्तरी कोरियाई शासन के मानवाधिकारों के दुरूपयोग के मसले को उठाया है।”</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि गत मंगलवार को सिंगापुर में सेंटोसा द्वीप के केपेला होटल में श्री ट्रम्प और श्री किम के बीच ऐतिहासिक मुलाकात हुई। दोनों देशों के बीच हुए शिखर बैठक में उत्तर कोरिया ने अमेरिका के साथ एक ऐतिहासिक समझौता कर कोरियाई प्रायद्वीप से परमाणु हथियार समाप्त करने की दिशा में काम करने और दोनों देशों के बीच शांति एवं समृद्धि की प्रतिबद्धता जतायी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रम्प ने दक्षिण कोरिया के साथ किए जाने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास को समाप्त करने की घोषणा की है। साथ ही श्री ट्रम्प ने उत्तर कोरिया को सुरक्षा गारंटी प्रदान करने का भी आश्वासन दिया है।</p>
<p> </p>
<p> </p>
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                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 15 Jun 2018 09:43:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चीन का मानवाधिकारों पर कुठाराघात</title>
                                    <description><![CDATA[चीन ने माओ के नेतृत्व में 1949 में कम्युनिस्ट विचारधारा को आत्मसात किया, लेकिन मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता को ताक पर रखकर। साम्यवादी विचारधारा का उद्भव ही पूंजीवादी विचारधारा के विरुद्ध हुआ था, ताकि समाज के शोषित, मजदूरों इत्यादि को समाज में समान पायदान पर रखा जा सके और समानता के मूल्य को स्थापित किया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/atrocity-on-human-rights-by-china/article-2439"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/china1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चीन ने माओ के नेतृत्व में 1949 में कम्युनिस्ट विचारधारा को आत्मसात किया, लेकिन मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता को ताक पर रखकर। साम्यवादी विचारधारा का उद्भव ही पूंजीवादी विचारधारा के विरुद्ध हुआ था, ताकि समाज के शोषित, मजदूरों इत्यादि को समाज में समान पायदान पर रखा जा सके और समानता के मूल्य को स्थापित किया जा सके। लेकिन अपने को साम्यवादी देश कहने वाले चीन ने राजनीतिक व्यवस्था में केंद्रीयकरण की पद्धति को अपनाया। उसने मानवीय गरिमा और मानवीय मूल्यों को स्थापित करने वाले स्वतंत्रता और समानता जैसे तत्वों को गौण कर दिया। वर्तमान में चीन की छवि अंतर्राष्ट्रीय जगत में एक तानाशाही देश के रुप में चित्रित है और नोबल विजेता ‘ली शोओबो’ के मामले में चीन का घृणित चेहरा विश्व के समक्ष उजागर हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल नोबल पुरस्कार विजेता ली शोआबो की कैंसर से जूझते हुए 13 जुलाई 2017 को मृत्यु हो गई। ली शोआबो चीन में लोकतंत्र के पुरोधा थे। 2008 में चीन में लोकतांत्रिक व्यवस्था और मानवाधिकारों की मांग की याचिका देने के पश्चात् उन्हें गिरफ्तार किया गया और 2009 में मुकदमा चलाकर 11 वर्ष की सजा के तहत जेल में डाल दिया गया और उनकी पत्नी शिया को घर में नजरबंद कर उनके पति, रिश्तेदारों और संपूर्ण विश्व से संपर्क तोड़ दिया। सजा काटने के दौरान जेल में वे लीवर कैंसर से जूझते रहे और इलाज के अभाव में कैंसर आखिरी स्टेज में पहुंच गया। फलस्वरूप चीन ने उनको जुलाई 2017 में रिहा कर दिया और चीन उनके इलाज का ढोंग करता रहा कि वो सही ढंग से इलाज कर रहा है। लेकिन जब चीन ने जर्मनी और अमेरिकी डॉक्टरों की सलाह को नजरअंदाज करते हुए उनके इलाज हेतु उन्हें चीन से बाहर जाने की इजाजत नहीं दी, जबकि वे लिवर कैंसर के आखिरी स्टेज से जूझ रहे थे और यहां तक कि वेंटिलेटर की सुविधा भी मुहैया नहीं करवाई गई। इस तरह विश्व के समक्ष चीन का घृणित चेहरा उजागर हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन मानवाधिकारों को किस प्रकार कुचलने का षड्यंत्र रचता है, उसको इस प्रकार समझा जा सकता है। शोओबो की मृत्यु के पश्चात् चीन ने एक तरफ अपने यहां इंटरनेट को बाधित कर रखा है, ताकि सूचना का आदान-प्रदान न हो सके और सरकारी नियंत्रण में एक अपराधी की भांति उनका अंतिम संस्कार शनिवार (15 जुलाई) को किया गया और एक फोटोग्राफ जारी कर यह बताने का प्रयास किया गया कि उनकी पत्नी सहित कुछ रिश्तेदार अन्येष्टि में सम्मिलित हुए है, लेकिन शोओबो परिवार के अधिवक्ता के अनुसार अन्येष्टि कहां हुई और कौन सम्मिलित हुआ, किसी को नहीं पता।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन द्वारा अपने कुकृत्यों पर परदा डालने हेतु नोबल शांति पुरस्कार चयन समिति की प्रमुख बेरिट एंडरसन को शोओबो की अन्तेयष्टि में सम्मिलित होने हेतु वीजा को कुतर्कों के आधार पर खारिज कर दिया। हालात यह हैं कि चीन उनकी पत्नी शिया को भी आजाद करने से डरता है। चीन को भय है कि उनका क्रूरतम चेहरा विश्व के समक्ष ली शिया के माध्यम से उजागर न हो जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन से वैसे तो मानवाधिकार उल्लंघन की खबरें हमेशा ही सुर्खियों में रही हैं, लेकिन वर्तमान का घटनाक्रम इसकी पुष्टि करता है। जब चीन अपने महत्वाकांक्षी हितों की पूर्ति हेतु अपने नागरिकों के मानवाधिकारों पर कुठाराघात कर सकता है, तो अपने पड़ोसियों भारत और भूटान उसके लिए क्या मायने रखते हैं। चीन, भारत के साथ कई दिनों से भारत, भूटान और चीन त्रिकोणीय जंक्शन पर गतिरोध बनाए हुए है। अब हालत यह हैं कि युद्ध की धमकी देकर चीन ने थककर भारत के सैनिकों की भांति तिब्बत, सिक्किम सीमा पर तंबू गाड़ दिया है। अर्थात् दोनों ओर के सैनिकों ने सीमा के पास तंबू गाड़कर एक-दूसरे के समक्ष पहरा दे रहे हैं। चीन की शर्त यह है कि जब भारत वहां से सैनिक हटाएगा, तभी बातचीत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन जिस प्रकार का दुर्व्यवहार चीनी नागरिकों से करता है, इस प्रकार के कृत्यों से तो वही के नागरिकों के सब्र का बांध टूट जाएगा और चीन का विखंडन निश्चित ही होगा। चीन ने साम्राज्यवादी नीति के तहत दूसरे राष्ट्रों पर कुदृष्टि डालकर अतीत मेंं जबरन कब्जा किया। उनका भी स्वतंत्र होने का रास्ता साफ हो जाएगा। इतिहास गवाह है कि कोई भी राष्ट्र तानाशाही के दम पर लंबे समय तक अपने पूर्ववत स्वरूप में कभी कायम नहीं रहा। उदाहरण के रुप में आधुनिक युग में जर्मनी और इटली को देखा जा सकता है। तो हमें यह भी देखने को मिला कि तानाशाही अंग्रेज भी, भारतीयों के जबरदस्त विरोध के पश्चात अपनी सत्ता को भारत में बचाने में नाकामयाब रहे, तो साम्यवादी देश सोवियत संघ भी नब्बे के दशक में स्वयं को विखंडित होने से नहीं रोक पाया और उससे टूटकर कई देश बने जैसे यूक्रेन, बेलारूस, लिथुआनिया, आर्मेनिया, एस्टोनिया, लातविया, कजाकिस्तान आदि।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे तो चीन ने साम्यवादी शासन व्यवस्था को अपनाकर यह दुनिया के समक्ष जताने का प्रयास किया कि साम्यवाद के जनक मार्क्स के सिद्धांतों को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। लेकिन वास्तव में चीन ने तो साम्यवादियों का चोला पहनकर साम्यवादी विचारधारा के साथ भी छल किया और चीन केन्द्रित विचारधारा का निर्माण कर केवल चीन के हितों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ति करने का प्रयास किया है। उसके लिए अपने नागरिकों और पड़ोसी देशों के हित गौण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन यह भूल जाता है कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण जैसे कि प्राचीन राजनीति विज्ञान के विद्वान “प्लेटो कहते हैं कि वहां रहने वाले नागरिकों से होता है, न कि वृक्ष और चट्टानों से।” ऐसे में चीन इतना नासमझ कैसे है कि अपने नागरिकों को मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित कर रहा है। जहां राज्य स्तर पर नासमझी वाले निर्णय लिए जाते है, वहां तो किसी भी राज्य को भारी कीमत चुकानी पड़ती है और जहां तक भारत को गीदड़भभकी देने का चीन प्रयास करता है, तो उसे याद रखना चाहिए कि भारत सवा अरब जनसंख्या वाला विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसके राष्ट्राध्यक्ष यदि किसी विषय को संपूर्ण विश्व के समक्ष रखते हैं, तो वह पूरे मुल्क की एक सुर में आवाज होती है। ऐसे में एक तानाशाही और अधिनायकवादी देश, विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश से मुकाबला नहीं कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>चीन से वैसे तो मानवाधिकार उल्लंघन की खबरें हमेशा ही सुर्खियों में रही हैं, लेकिन वर्तमान का घटनाक्रम इसकी पुष्टि करता है। जब चीन अपनी महत्वाकांक्षी हितों की पूर्ति हेतु अपने नागरिकों के मानवाधिकारों पर कुठाराघात कर सकता है, तो अपने पड़ोसियों भारत और भूटान उसके लिए क्या मायने रखते हैं। चीन, भारत के साथ कई दिनों से भारत, भूटान और चीन त्रिकोणीय जंक्शन पर गतिरोध बनाए हुए है।</em></p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>अनीता वर्मा</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Jul 2017 03:59:06 +0530</pubDate>
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                <title>पत्थरबाजों के मानवाधिकार</title>
                                    <description><![CDATA[यह भारत जैसे ही देश में संभव है कि आतंकवादियों को संरक्षण देने वाले किसी व्यक्ति को मुआवजा देने की सिफारिश कोई आयोग करे। जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार आयोग ने एक अजीबो-गरीब फैसला दिया है। आयोग ने राज्य सरकार से सेना द्वारा मानव ढाल बनाए गए पत्थरबाज फारूख अहमद डार को मुआवजा के तौर पर 10 लाख […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/human-rights-of-people-which-stone-throwing/article-2280"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/stone-throwing.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">यह भारत जैसे ही देश में संभव है कि आतंकवादियों को संरक्षण देने वाले किसी व्यक्ति को मुआवजा देने की सिफारिश कोई आयोग करे। जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार आयोग ने एक अजीबो-गरीब फैसला दिया है। आयोग ने राज्य सरकार से सेना द्वारा मानव ढाल बनाए गए पत्थरबाज फारूख अहमद डार को मुआवजा के तौर पर 10 लाख रुपए देने की अनुशंसा की है। सेना ने बीते नौ अप्रैल को इस कश्मीरी युवक को पत्थरबाजी के जुर्म में जीप के आगे बांधा था। कश्मीर के बीड़वाह में 9 अप्रैल को चुनाव के दौरान जब हालात बेकाबू हो गए तो मेजर नितिन गोगोई ने मजबूरीवश ऐसा किया।</p>
<p style="text-align:justify;">कश्मीरी युवक डार को जीप से बांधा और मानव ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया। इस बुद्धिमत्ता से पत्थरबाजों और सुरक्षाबलों के बीच जो झड़प हो रही थी, वह एकाएक थम गई। आयोग ने मुआवजे की सिफारिश करके पत्थरबाजों को प्रोत्साहित करते हुए भविष्य में इन्हें उकसाए रखने की भूमिका रचने का काम किया है। जब गैरकानूनी एवं राष्ट्रद्रोही काम करने पर भी मुआवजा मिलने लग जाएगा, तो भला कश्मीरी युवक पत्थरबाजी करने से क्यों बाज आएंगे ? हैरानी है कि मुआवजे की पृष्ठभूमि में अंतर्निहित यह सवाल आयोग के अध्यक्ष को समझ नहीं आया?</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ इसी तर्ज का काम जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार ने बुरहान बानी की मौत का मुआवजा देकर किया है। बुरहान के भाई खालिद बानी को 3 लाख का मुआवजा दिया गया। यह मुआवजा महबूबा मुफ्ती की उस सरकार ने दिया, जो भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से वजूद में है। विचारधारा में विरोधाभास के बावजूद इस बेमेल गठबंधन की है, यह चौंकाने वाली कार्यवाही और भाजपा की चुप्पी हैरानी में डालने वाली है। सत्ता में बने रहने का यह लालच कश्मीर को कहां ले जाकर छोड़ेगा, फिलहाल कहना मुश्किल है।</p>
<p style="text-align:justify;">खैर, आयोग और सरकार दोनों ही आतंकियों को मुआवजा देकर उन्हें राष्ट्रद्रोह के लिए अनवरत उकसाए रखने का काम कर रहे हैं। कमोवेश यही काम राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला ने फारूख अहमद डार के पक्ष में उसे जीप से बांधने की फोटो और वीडियो को ट्वीट करके कर दिया था। इसके बाद मुद्दा गरमा गया। 15 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 53 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। इसके बाद इस विवाद में बुकर पुस्कार विजेता अरुंधति रॉय और अभिनेता परेश रावल भी कूद पड़े थे। अरुंधति के कश्मीरियों के समर्थन पर परेश ने कहा था कि कश्मीर में पत्थबाजों की बजाय अरुंधति को बांधा जाना चाहिए था। यही मामला तब और गरमागया था, जब सेना ने मेजर गोगोई को पुरस्कार देकर सम्नानित कर दिया था। इसके बाद सेना प्रमुख विपिन रावत ने नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों की आलोचना को दरकिनार करते हुए सफाई दी कि ‘भारतीय सेना आमतौर से मानव कवच का प्रयोग नहीं करती है, लेकिन अधिकारियों को परिस्थितियों के अनुसार कुछ तात्कालिक कठोर कदम उठाने पड़ते हैं।‘</p>
<p style="text-align:justify;">अलगाववादियों द्वारा पत्थरबाजों को उकसाए रखने का काम धन देकर लगातार हो रहा है। हुर्रियत के नेताओं के बयानों पर गौर करें तो पता चलता है कि पत्थरबाजों को उकसाने का काम सुनियोजित ढंग से हो रहा है। कुछ समय पहले टीवी समाचार चैनल आज तक ने एक स्टिंग आॅपरेशन के जरिए यह हैरतअंगेज खुलासा किया था कि हुर्रियत के नेताओं के तार पाकिस्तान से जुड़े हैं और वे वहां से धन तथा दूसरे संसाधन लेकर पत्थरबाजों को सेना के विरुद्घ उकसाकर घाटी का माहौल बिगाड़ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन नेताओं की चरमपंथी बातों से कश्मीरी युवक गुमराह होते हैं और आतंकियों की मदद धार्मिक उन्माद में आकर करने लग जाते हैं। इस राष्ट्रविरोधी खुलासे के बावजूद इन नेताओं को सरकारी सुविधाएं और सुरक्षा के साधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इनके वह बैंक खाते भी अब तक सीज नहीं किए गए हैं, जिनमें हवाला के जरिए पाकिस्तान से धन आता है। एनआईए ने आज तक के खुलासे के बाद अलगाववादियों पर शिकंजा कसा जरूर है, लेकिन यह कार्यवाही पर्याप्त नहीं कही जा सकती है? यही वजह है कि कश्मीर में अघोषित युद्घ का वातावरण बना हुआ है, जिसका दर्दनाक परिणाम निहत्थे व निर्दोष अमरनाथ यात्रा पर गए श्रद्घालुओं पर हुए हमले के रूप में देखने में आया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अलगाववादियों पर ढिलाई का ही परिणाम है कि कश्मीर में अराजकता निरंतर फैल रही है। नतीजतन जम्मू-कश्मीर के पूंछ सेक्टर में भारत की जमीन में आकर पाकिस्तानी सेना और आतंकी कायराना हमले करने में लगे हुए हैं। रोजाना जवान शहीद हो रहे हैं। यहां तक कि शहीदों के शवों को भी अंग-भंग किया जा रहा है। श्रीनगर के नौहट्टा इलाके में जामिया मस्जिद के पास हुई घटना में एक बेकाबू भीड़ ने डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को ड्यूटी पर तैनात रहते हुए मार डाला था। पंडित पर पत्थरों और लाठियों से बेरहमी से हमला बोलकर उनकी हत्या कर दी गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में सवाल उठता है कि जो मानवाधिकारों के वाकई में असली उल्लंघनकर्ता हैं, उन्हें मुआवजा और संरक्षण किसलिए? भारतीय दंड संहिता के मुताबिक तो ये देशद्रोह के आरोप में सजा के हकदार है। आतंकवाद और अलगाववाद जब नागरिकों के शांति से जीने के अधिकार में दखल देते है, तब राज्य को उनसे निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत पड़ती है, ऐसे में यदि सुरक्षाबलों से ज्यादती भी हो जाए तो उसे नजरअंदाज करना पड़ता है। लेकिन भारत में मानवाधिकार संगठन सुरक्षाबलों की बजाय आतंकियों की पैरवी करते दिखाई दे रहे हैं। डार को मुआवजे की सिफारिश और बुरहान बानी के परिजनों को राज्य सरकार द्वारा मुआवजा दिया जाना इसी श्रृंखला की विस्मित कर देने वाली कड़ियां हैं। जबकि कश्मीर में आतंकवाद मानवाधिकारों और लोकतंत्र पर खतरे के रूप में उभरा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पंजाब में भी इसी तरह का आतंकवाद उभरा था। लेकिन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की दृढ़ इच्छा शक्ति ने उसे नेस्तनाबूद कर दिया था। कश्मीर का भी दुष्चक्र तोड़ा जा सकता है, यदि वहां की सरकार मजबूत इरादे वाली होती। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती दुधारी तलवार पर सवार हैं। एक तरफ तो उनकी सरकार भाजपा से गठबंधन के चलते केंद्र सरकार को साधती दिखती है, तो दूसरी तरफ हुर्रियत की हरकतों को नजरअंदाज करती है। इसी कारण वह हुर्रियत नेताओं के पाकिस्तान से जुड़े सबूत मिल जाने के बावजूद कोई कठोर कार्यवाही नहीं कर पा रही हैं। नतीजतन राज्य के हालात नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। महबूबा न तो राज्य की जनता का भरोसा जीतने में सफल रही हैं और न ही कानून व्यवस्था को इतना मजबूत कर पाई हैं कि अलगाववादी व आतंकी खौफ खाने लग जाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">साफ है, महबूबा में असरकारी पहल करने की इच्छाशक्ति नदारद है। भाजपा के लिए भी साझा सरकार का यह सौदा कालांतर में महंगा पड़ सकता है। गोया, केंद्र सरकार व भारतीय जनता पार्टी को आत्मावलोकन करते हुए जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी हालातों का पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है। क्योंकि केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर भाजपा के सत्ता में होने के बावजूद आतंक, अलगाव व हिंसा का कुचक्र कश्मीर में जारी है। सैनिक और श्रद्घालुओं पर जिस तरह से कहर जारी है, उसे देश अब बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। लिहाजा पूर्ण बहुमत वाली भाजपा से इस मोर्च पर निर्णायक कार्यवाही की जल्द अपेक्षा है। वक्त की यही मांग है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong><br />
प्रमोद भार्गव</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Jul 2017 03:39:22 +0530</pubDate>
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