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                <title>Education System - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Education System RSS Feed</description>
                
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                <title>जगी शिक्षा के सुचारू होने की उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[संपादकीय : प्रकाश सिंह पूरा वर्ष 2020, कोरोना से लड़ते गुजर गया, बिजनेस व्यापार के बाद कोरोना का सबसे बुरा असर शिक्षा पर पड़ा। स्कूल-कॉलेज बंद होने की वजह से 2020 में वार्षिक परिक्षाएं (Annual examinations) नहीं हो सकी। शिक्षा बोर्डों (Boards) व विश्वविद्यालयों (Universities) ने बिना परीक्षा छात्रों को अगली कक्षा में कम्रोन्नत कर दिया। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h4><strong>संपादकीय : प्रकाश सिंह</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">पूरा वर्ष 2020, कोरोना से लड़ते गुजर गया, बिजनेस व्यापार के बाद कोरोना का सबसे बुरा असर शिक्षा पर पड़ा। स्कूल-कॉलेज बंद होने की वजह से 2020 में वार्षिक परिक्षाएं <strong>(<span lang="en" xml:lang="en">Annual examinations</span>)</strong> नहीं हो सकी। शिक्षा बोर्डों <strong>(Boards)</strong> व विश्वविद्यालयों <strong>(Universities) </strong>ने बिना परीक्षा छात्रों को अगली कक्षा में कम्रोन्नत कर दिया। 2021 में भी कोरोना का कहर जारी है लेकिन राहत की बात ये है कि इस वर्ष कोरोना से बचाव की वैक्सीन ईजाद कर ली गई है। वैक्सीन लगना शुरू हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री <strong>(Central Education Minister)</strong> निशंक पोखरियाल ने भी शिक्षा सत्र को संभालने के लिए सीबीएसई की परीक्षाओं का समय 4 मई से 10 जून के बीच घोषित कर दिया है। भले ही इस वर्ष शिक्षा सत्र स्कूलों में 12 की बजाय 14 महीने का हो गया है लेकिन छात्रों एवं अभिभावकों को उम्मीद बंधी है कि उनकी शिक्षा सुचारू हो रही है। कोरोना में स्कूलों ने ऑनलाइन <strong>(Online)</strong> कक्षाओं का प्रबंध किया है, सरकार व अभिभावक भी कोशिशों में रहे हैं कि बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">ऑनलाइन शिक्षा व्यवहारिक शिक्षा का विकल्प तो बनी है परन्तु यह उतनी कारगर नहीं है जितनी की कक्षा में बैठकर शिक्षक से आमने-सामने बैठकर छात्र पढ़कर अपनी शिक्षा पूरी करते हैं। ऑनलाइन शिक्षा में सबसे ज्यादा मुश्किलें <strong>(<span lang="en" xml:lang="en">Difficulties</span>)</strong> उन लोगों को आई हैं जिनके बच्चों के पास मोबाइल या इंटरनेट की सुविधा नहीं है। इंटरनेट से सरकारी स्कूलों व ग्रामीण छात्रों की शिक्षा शहरों में मलिन बस्तियों के बच्चों की शिक्षा तो नामात्र हो सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">मई से जून के बीच सीबीएसई की 10वीं व 12वीं की परीक्षाओं के बीच ही नीट व जेईईई की प्रवेश परीक्षाएं आती हैं, इन पर भी सरकार को निर्णय लेना होगा, क्योंकि 12वीं के हजारों छात्र इन परीक्षाओं में भी बैठते हैं। अभी तक नीट व जेईईई पर सरकार ने कोई निर्णय नहीं लिया है। कोरोना काल में हालांकि बच्चे पूरा साल घरों में ही रहे हैं, फिर भी बाल मनोविज्ञान है कि उन्हें गर्मी की छुट्टियां मिल जाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार बच्चों की गर्मी की छुट्टियों के लिए उन्हें मनोवैज्ञानिक तौर पर समझाना होगा कि सत्र 2020-21 में पूरा साल उन्हें छुट्टियां रही हैं, स्कूल तो महज परीक्षा के लिए खुले हैं। अगर कोरोना वायरस काबू में आ जाता है। परीक्षा के बाद स्कूलों/ कॉलेजों/ विश्वविद्यालयों में सांस्कृतिक एवं मनोरंजक, खेलकूद की गतिविधियों को करवाया जाए, तत्पश्चात नए सत्र में शिक्षण कार्य शुरू हों। फिलहाल यह काफी राहत भरा है कि सरकार नागरिकों के प्रति उनके बच्चों की शिक्षा से संबंधित चिंताओं का निवारण करने के लिए प्रतिबद्ध है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Jan 2021 21:13:15 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>अनाथ हो रही शिक्षा व्यवस्था</title>
                                    <description><![CDATA[इन दिनों ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे देश में शिक्षा व्यवस्था अनाथ हो गई है। आधा दर्जन से अधिक राज्यों के स्कूल शिक्षा बोर्ड व सीबीएसई की परीक्षाओं के पेपर लगातार लीक हो चुके हैं। परीक्षा रद्द करने व दोबारा करवाने की घोषणा हो रही है। करोड़ों विद्यार्थी जिन्होंने साल भर मेहनत की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/orphaning-education-system/article-3666"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/education.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इन दिनों ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे देश में शिक्षा व्यवस्था अनाथ हो गई है। आधा दर्जन से अधिक राज्यों के स्कूल शिक्षा बोर्ड व सीबीएसई की परीक्षाओं के पेपर लगातार लीक हो चुके हैं। परीक्षा रद्द करने व दोबारा करवाने की घोषणा हो रही है। करोड़ों विद्यार्थी जिन्होंने साल भर मेहनत की वह परेशान हैं। बुधवार को सीबीएसई का दसवीं का गणित का पेपर लीक हो गया। इससे पूर्व सीबीएसई का ही 12वीं का अर्थ शास्त्र का पेपर लीक हो गया था। पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड का 12वीं का गणित का पेपर लीक हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">यही हाल हरियाणा का है पिछले कई वर्षों में बिहार में बोर्ड की वार्षिक परीक्षाआें का गलत परिणाम जारी करने के चलते बिहार बदनाम हो गया था लेकिन अब बिहार व अन्य राज्यों में कुछ ज्यादा अंतर नहीं रहा। केंद्र व राज्य सरकारों में बैठे नेता शिक्षा क्षेत्र में हो रही इस बदहाली के लिए जरा भी चिंतित नहीं है शायद शिक्षा क्षेत्र राजनीति नीति जैसा चटपटा नहीं है। विद्यार्थी सीधे तौर पर वोटर नहीं हैं। महज बेबस विद्यार्थी हैं, जिन्होंने अपने हितों की न तो खुद लड़ाई लड़नी है और न ही इनके अभिभावकों का कोई शक्तिशाली संगठन है जो सरकार या शिक्षा विभाग को कटघरे में खड़ा कर सके। सरकार व विपक्ष में उच्च पदों पर बैठे लोग इस गंभीर मुद्दे पर चुप हैं। राजनेता बच्चों को देश का भविष्य तो बताते हैं लेकिन इस भविष्य से हो रहे खिलवाड़ पर चुप्पी साधे बैठे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षा प्रणाली का जो बुरा हाल इन सालों में हुआ वह शायद ही पहले कभी हुआ हो। अध्यापक पात्रता परीक्षा से लेकर एसएससी के पेपर लीक भी चर्चा में हैं। राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान अध्यापक पात्रता परीक्षा के परिणाम पर रोक लगा दी है। विद्यार्थियों को यह भरोसा नहीं रहा कि परीक्षा एक ही प्रयास से संपूर्ण हो सकेगी। शिक्षा देश व विकास का हिस्सा है। इस मुद्दे पर भी ठोस चर्चा व कार्रवाई होनी चाहिए। आज तकनीक का युग है जिसके प्रयोग से परीक्षा के रहस्य को कायम रखना कठिन नहीं। दो-तीन दशक पूर्व रेलगाड़ियों पर आने वाले पेपर भी सुरक्षित रहते थे, अब सील बंद विशेष वाहनों व तकनीकी पासवर्ड लगे कम्पयूटरों से भी चोरी हो रहे हैं। शिक्षा का स्तर कायम रखना सरकार की जिम्मेदारी है। इसे केवल अधिकारियों पर छोड़ने की बजाय सरकार के उच्च अधिकारी खुद भी रूचि लेकर सुधार करें चूंकि शिक्षा विकास का पैमाना है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Mar 2018 03:03:12 +0530</pubDate>
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                <title>शिक्षा व्यवस्था की अमानवीयता</title>
                                    <description><![CDATA[शिक्षा की बदहाली और अमानवीयता को लेकर आज देशभर में चर्चा का बाजार गर्म है। दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को अमानवीय बताया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि शिक्षा प्रणाली एक मशीन हो गई है जोकि क्लोन तैयार करने में लगी हुई है और व्यक्तित्व को पीछे छोड़ दिया है। पीठ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/inhumanity-of-education-system/article-2307"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/education.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">शिक्षा की बदहाली और अमानवीयता को लेकर आज देशभर में चर्चा का बाजार गर्म है। दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को अमानवीय बताया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि शिक्षा प्रणाली एक मशीन हो गई है जोकि क्लोन तैयार करने में लगी हुई है और व्यक्तित्व को पीछे छोड़ दिया है। पीठ ने यह मौखिक टिप्पणी एक छात्र द्वारा खुदकुशी मामले की सुनवाई के दौरान की।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायलय ने भी कई बार हमारी शिक्षा प्रणाली की बदहाली पर सवाल उठाये हैं। सरकारें आती हैं और चली जाती हैं। सुधार के बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं। छात्रों के शत-प्रतिशत नामांकन की बात कही जाती है, मगर पढ़ाई बीच में छोड़ने और गुणवत्ता की बातें गौण हो जाती हैं। माननीय न्यायालय की किसी पीठ की शिक्षा के सम्बन्ध में टिप्पणी आने पर एक बार फिर शिक्षा की बदहाली की बेइंतहा चर्चा शुरू हो जाती है। कुछ दिनों तक पत्रावलियां इधर-उधर खिसकती हैं, राजनेताओं के बयान आते हैं और एक बार फिर जस की तस स्थिति हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूनेस्को सहित अनेक संस्थाओं ने अपनी रिपोर्टों में देश में बुनियादी शिक्षा को लेकर सवाल उठाये हैं और बताया है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भारी शैक्षिक विस्तार के बावजूद गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के कार्य में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां हमारी आधी से अधिक आबादी गरीबी में जीवन बसर कर रही है। रिपोर्टों में खुलासा किया गया है कि प्रारम्भिक शिक्षा का देहाती क्षेत्रों में हाल बहुत बुरा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में गुरूकुल की शिक्षा को आज भी याद किया जाता है। गुरूकुल की शिक्षा में हमारे आपसी सम्बन्धों, सामाजिक सांस्कृतिक एकता, गौरवशाली परम्पराओं को प्रमुखता से केन्द्र बिन्दु में रखा जाता था, ताकि बालक पढ़-लिखकर चरित्रवान बनें और उनमें नैतिक संस्कारों का समावेश हो। मगर आज की शिक्षा प्रणाली संस्कारों से हटकर अंक प्राप्ति तक सीमित होकर रह गई है। आज ज्ञान-विज्ञान का स्थान अंक अर्जित करने पर अधिक हो गया है। इसमें अर्थोपार्जन की भूमिका अधिक बढ़ गई है। भौतिक साधनों की प्राप्ति अहम हो गई है। देशसेवा, प्रेम और उच्च नैतिक मानदण्डों का इससे निरन्तर क्षरण हो रहा है। मूल्य आधारित शिक्षा का स्थान सुख-सुविधा ने ग्रहण कर लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की प्रारम्भिक शिक्षा की कमजोरियों के कारण ही हम शिक्षा की दौड़ में पिछड़े हैं और गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्राप्त करने के अभाव के कारण शिक्षा की बदहाली का रोना रो रहे हैं। बताया जाता है कि सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों एवं शिक्षा के अधिकार कानून के अमल में लाने के बाद स्कूलों में बच्चों के दाखिले की स्थिति में आशातीत सुधार परिलक्षित हुआ है। मगर गुणवत्तायुक्त शिक्षा में हम पिछड़ गये हैं। सरकारी स्कूलों के मामलों में निजी स्कूलों की स्थिति फिर भी अच्छी बताई जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">सक्षम लोग आज सरकारी विद्यालयों की अपेक्षा निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पठन-पाठन में अधिक रूचि लेते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि सरकारी स्कूल पुरानी परिपाटी का अनुसरण कर रहे हैं। अध्यापकों की पठन-पाठन के काम में उदासीनता और लापरवाही ज्यादा है। ग्रामीण विद्यालयों की हालत अधिक बुरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली आज भी अपने अस्तित्व के चक्रव्यूह में फंसी हुई है । यहाँ सरकार बदलते ही प्रत्येक पांच वर्षों में पाठ्य-पुस्तकें बदल दी जाती हैं। छात्र पुस्तक देखकर एक बारगी चकरा जाता है। कहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री की फोटो डाल दी जाती है तो कहीं निकालने के आदेश हो जाते है। सरकारें अपने हिसाब से महा पुरुषों की जीवनियां शामिल करती है। कहीं महाराणा प्रताप को महान बताया जाता है तो कहीं अकबर की महानता का बखान होता है। छात्र इसी चक्रव्यूह में खो जाने को मजबूर होता है। सरकारें अपने हिसाब से पाठ्यक्रम तय करती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन राजनीतिक प्रपंचों से ऊपर उठकर शिक्षा का मूलभूत स्वरूप परिवर्तित कर इसे रोजगारोन्मुखी बनाया जाएँ, ताकि छात्र क्लोन नहीं बनकर स्वाभिमानी बनें।</p>
<p><em><br />
यूनेस्को सहित अनेक संस्थाओं ने अपनी रिपोर्टों में देश में बुनियादी शिक्षा को लेकर सवाल उठाये हैं और बताया है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भारी शैक्षिक विस्तार के बावजूद गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के कार्य में हम बहुत पिछड़े हुए हैं।</em></p>
<p style="text-align:justify;">
<em><strong>बाल मुकुन्द ओझा</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/"><br />
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Jul 2017 03:28:35 +0530</pubDate>
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