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                <title>पाकिस्तान में बदलाव की आवश्यकता</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/requires-a-change-in-pakistan/article-360"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/genral-bawa.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष राहील शरीफ ने अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद सेवामुक्ति ले ली है। दरअसल पाकिस्तान में लोकतंत्रीय राजनैतिक प्रणाली के बावजूद सेना सरकार पर हावी रहती आई है और बार-बार सैनिक हुकूमत बनती रही। पाकिस्तान के इतिहास में ऐसी कुछेक घटनाएं ही हैं जब किसी जनरल ने अपने पद के साथ अनावश्यक लगाव न रखा हो। जनरल जिया-उल हक और परवेज मुशर्रफ जैसे जनरलों ने तो सेना की कमान क्या संभाली कि सरकार का तख्ता ही पलट दिया। जनरल अयूब खान पाकिस्तान के पहले सैन्य कमांडर थे, जिन्होंने सत्ता पे कब्जा किया। इसी तरह याहिया खान भी सैन्य हुकूमत का एक और बदनुमा दाग थे। जनरल से शासक बने तानाशाहों ने संविधान को बुरी तरह से तोड़ा-मरोड़ा। ये तानाशाह अपनी मर्जी से अपना कार्यकाल बढ़ाते रहे। दरअसल भारत के साथ पाकिस्तान के तनाव व टकराव की वजह पाकिस्तान की राजनैतिक व्यवस्था की कमजोरियां हैं। लोकतंत्र के बावजूद इस देश में सेना जिस तरह अपना दबदबा बनाती रही है, उससे स्पष्ट है कि सरकार सेना की रहमदिली पर ही निर्भर करती है। पाकिस्तान की आजादी के बाद 70 सालों के समय में लगभग 35 सालों का समय सैनिक राज में ही गुजर गया। पाकिस्तान में लोकतंत्रीय सरकारों के तख्तापलट की शुरूआत सन् 1958 में मेजर जनरल सिकन्दर-मिर्जा ने प्रधानमंत्री फिरोजखान की सरकार का तख्तापलट कर की थी, जब सेना के कमांडर-इन-चीफ ने अपने-आपको शासक बना दिया। इसके बाद आर्मी स्टाफ जनरल जिया-उल-हक और सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने तख्तापलट की कार्रवाई को अंजाम दिया। इसके अलावा भी तख्तापलट की कोशिशें हुई। पाकिस्तान के राजनैतिक इतिहास से यह बात स्पष्ट है कि सेना लोकतंत्रीय सरकार पर हावी रही है, जबकि सरकारों ने उचित तरीके से लोकतंत्र व संविधान के अनुसार देश को चलाने की कोशिशें की। बार-बार के तनाव के बाद इस्लामाबाद प्रशासन ने भले ही अंतरराष्ट्रीय दबाव में हर बार भारत से बेहतर संबंध बनाने शुरू किए, लेकिन सेना को यह बात कभी रास नहीं आई। नवाज शरीफ व राहील शरीफ के संबंध भी सुखदायी नहीं रहे। परवेज से लेकर राहील शरीफ तक ये जनरल प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को धमकाते रहे। जब तक पाक सेना का सरकार पर दबदबा रहेगा, तब तक पाक सरकार से किसी समझौते व अमन की उम्मीद कम ही है। पाकिस्तान के शासन-प्रशासन में बुनियादी परिवर्तन आवश्यक हैं, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं हो सका कि राजनीतिज्ञों ने भारत विरोधी नीति त्याग दी हो, बल्कि पाकिस्तानी राजनैतिक पार्टियां सत्ता में बनी रहने के लिए कश्मीर का राग अलाप कर कट्टरपंथी लोगों व सेना को संतुष्ट करने का हर संभव प्रयास करती रही हैं। फिर भी यदि राहील शरीफ द्वारा चुपचाप अपना पद त्याग देने से पाक में सेना का दबाव घटा है, तो भारत-पाक संबंधों में माहौल बदलने के आसार बन सकते हैं। फिलहाल सरहद पर सख्ती से जवाब दिया जाना ही अमन पसंद भारत के पास एकमात्र रास्ता है।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Dec 2016 01:28:26 +0530</pubDate>
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