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                <title>Women Reservation Bill: महिला आरक्षण बिल मील का पत्थर सिद्ध होगा</title>
                                    <description><![CDATA[Women Reservation Bill: बीते सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट (Central Cabinet) ने लोकसभा व विधानसभाओं में तैंतीस फीसदी आरक्षण को मंजूरी दी थी। इसके अगले दिन नई संसद में कामकाज का श्रीगणेश हुआ नारी शक्ति को उसके दशकों से लंबित अधिकार देने से हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने पुराने संसद भवन में अपने अंतिम […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/womens-reservation-bill-will-prove-to-be-a-milestone/article-52644"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/women-reservation-bill.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Women Reservation Bill: बीते सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट (Central Cabinet) ने लोकसभा व विधानसभाओं में तैंतीस फीसदी आरक्षण को मंजूरी दी थी। इसके अगले दिन नई संसद में कामकाज का श्रीगणेश हुआ नारी शक्ति को उसके दशकों से लंबित अधिकार देने से हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने पुराने संसद भवन में अपने अंतिम भाषण में कहा कि दोनों सदनों में अब तक 7500 से अधिक जन प्रतिनिधियों ने काम किया है, जबकि महिला प्रतिनिधियों की संख्या करीब 600 रही है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के योगदान ने सदन की गरिमा बढ़ाने में मदद की है। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चैधरी ने पिछले 75 सालों में कांग्रेस सरकारों के कामकाज का लेखा-जोखा पेश किया। इस दौरान सोनिया गांधी ने उन्हें महिला आरक्षण बिल की याद दिलाई थी। Women Reservation Bill</p>
<p style="text-align:justify;">इतिहास के पन्ने पलटे तो महिला आरक्षण बिल 1996 से ही अधर में लटका हुआ है। उस समय एचडी देवगौड़ा सरकार ने 12 सितंबर 1996 को इस बिल को संसद में पेश किया था। लेकिन पारित नहीं हो सका था। यह बिल 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश हुआ था। बिल में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस 33 फीसदी आरक्षण के भीतर ही अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए उप-आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था। इस बिल में प्रस्ताव है कि लोकसभा के हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को रोटेट किया जाना चाहिए। आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के जरिए आवंटित की जा सकती हैं। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण खत्म हो जाएगा।</p>
<h3>1998 में वाजपेयी सरकार ने पेश किया था | Women Reservation Bill</h3>
<p style="text-align:justify;">अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 1998 में लोकसभा में फिर महिला आरक्षण बिल को पेश किया था। कई दलों के सहयोग से चल रही वाजपेयी सरकार को इसको लेकर विरोध का सामना करना पड़ा। इस वजह से बिल पारित नहीं हो सका। वाजपेयी सरकार ने इसे 1999, 2002 और 2003-2004 में भी पारित कराने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुई। बीजेपी सरकार जाने के बाद 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार सत्ता में आई और डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।</p>
<p style="text-align:justify;">यूपीए सरकार ने 2008 में इस बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में पेश किया। वहां यह बिल नौ मार्च 2010 को भारी बहुमत से पारित हुआ। बीजेपी, वाम दलों और जेडीयू ने बिल का समर्थन किया था। यूपीए सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया। इसका विरोध करने वालों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल शामिल थीं। ये दोनों दल यूपीए का हिस्सा थे। कांग्रेस को डर था कि अगर उसने बिल को लोकसभा में पेश किया तो उसकी सरकार खतरे में पड़ सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">साल में 2008 में इस बिल को कानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था। इसके दो सदस्य वीरेंद्र भाटिया और शैलेंद्र कुमार समाजवादी पार्टी के थे। इन लोगों ने कहा कि वे महिला आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से बिल का मसौदा तैयार किया गया, वे उससे सहमत नहीं थे। इन दोनों सदस्यों की सिफारिश की थी कि हर राजनीतिक दल अपने 20 फीसदी टिकट महिलाओं को दें और महिला आरक्षण 20 फीसदी से अधिक न हो। साल 2014 में लोकसभा भंग होने के बाद यह बिल अपने आप खत्म हो गया। लेकिन राज्यसभा स्थायी सदन है, इसलिए यह बिल अभी जिंदा है। इसीलिए अब इसे लोकसभा में नए सिरे से पेश किय गया है और इस पर चर्चा जारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे लोकसभा में मौजूद 14 फीसदी व राज्यसभा में 12 फीसदी महिलाओं की स्थिति में अब सम्मानजक ढंग से इजाफा होगा। पहले संसद के विशेष सत्र को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे थे, अब लगता है कि विशेष सत्र बुलाना एक सार्थक कदम साबित होगा। राजग सरकार ने इस बिल का नाम नारी शक्ति वंदन अधिनियम रखा है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1974 में महिलाओं की स्थिति का आकलन करने वाली समिति ने महिला आरक्षण की वकालत की थी।</p>
<h3>2010 में संप्रग सरकार ने रास में पारित किया था | Women Reservation Bill</h3>
<p style="text-align:justify;">इस बीच विभिन्न सरकारों में इस विधेयक को सिरे चढ़ाने की कोशिश हुई। फिर वर्ष 2010 में संप्रग सरकार ने इस विधेयक को राज्यसभा में पारित किया था। लेकिन तब यूपीए सरकार में शामिल राजद, सपा व झामुमो आदि दलों ने इसमें जातिगत आरक्षण की मांग उठाकर विधेयक की गति थाम दी थी। वैसे सवाल उठाया जा सकता है कि वर्ष 2014 में महिला आरक्षण के मुद्दे को अपने घोषणापत्र में शामिल करने के बावजूद इसे मूर्त रूप देने में इतना वक्त क्यों लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या जब देश आम चुनाव की ओर बढ़ चुका है तब महिला आरक्षण के मुद्दे को अमलीजामा पहनाने की कवायद हुई है? एक पहलू यह भी है कि विधेयक के कानून का रूप लेने के बावजूद इसका क्रियान्वयन तब संभव होगा, जब देश में जनगणना के उपरांत होने वाला परिसीमन पूर्ण होगा। यानी महिला आरक्षण का लाभ आगामी आम चुनाव में संभव नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, जनप्रतिनिधि संस्थाओं में महिला आरक्षण की व्यवस्था होना भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में एक बड़ी घटना होगी। बेहतर होगा कि संसद के नये भवन में इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दल स्वस्थ चर्चा करें और आम सहमति बनाएं। इस तरह नया संसद भवन दोहरा इतिहास रचेगा। यद्यपि राजग सरकार ने विधेयक के मसौदे पर आधिकारिक स्तर पर विस्तृत जानकारी नहीं दी है, कयास लगाये जा रहे हैं कि इसके मूल स्वरूप को बरकरार रखने की कोशिश होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अब देखना होगा कि जिन मुद्दों पर लंबे समय तक महिला आरक्षण का विरोध किया जाता रहा है, उन्हें किस तरह संबोधित किया जाता है। हालांकि, तब विरोध करने वाले राजनीतिक दल फिलहाल दबाव बनाने की स्थिति में नहीं हैं। जिनके विरोध के चलते ही महिला आरक्षण बिल को पांच बार पारित करने की असफल कोशिश हो चुकी है। बहरहाल, इस बिल के पारित होने से देश में लैंगिक समानता आएगी। इस समय दुनिया में लोकतांत्रिक संस्थाओं में महिलाओं की औसतन हिस्सेदारी 26 फीसदी है, जबकि वर्तमान में भारत में यह प्रतिशत 15.21 है। वहीं राज्य विधानसभाओं में स्थिति और ज्यादा खराब है, किसी भी राज्य में 15 फीसदी महिलाओं की भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी नहीं बन पायी। Women Reservation Bill</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, नये विधेयक के कानून बनने के बाद भारतीय जनप्रतिनिधि संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी तैंतीस फीसदी हो जाएगी। वैसे तो देश के लोकतांत्रिक इतिहास में महिला जनप्रतिनिधियों की विशिष्ट भूमिका रही है। जिन्होंने न केवल सदन की गरिमा बनाने में बड़ी भूमिका निभाई, बल्कि अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों में रचनात्मक योगदान भी दिया। देश की संसद के दोनों सदनों में पिछले साढ़े सात दशकों में करीब छह सौ महिला जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति रही। बहरहाल, देर आए दुरुस्त आए, की तर्ज पर इसे भारतीय लोकतंत्र की शुभ शुरूआत कहा जा सकता है। PM Modi</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बावजूद उम्मीद करें कि जमीन से जुड़ी व महिला सरोकारों को प्रतिबद्ध महिलाएं ही जनप्रतिनिधि सदनों में पहुंचें। ऐसा न हो कि पहले से मौजूदा राजनीति में सक्रिय राजनीतिक घरानों के नेता इस पहल को अपने परिवार की महिलाओं के नाम पर राजनीति करने के अवसर में ही बदल दें। यह प्रयास आम महिलाओं के सशक्तीकरण की राह भी खोलेगा। कह सकते हैं कि करीब तीन दशक से अटके महिला आरक्षण बिल को मूर्त रूप देने का नैतिक साहस मोदी सरकार ने दिखाया है। Women Reservation Bill</p>
<p style="text-align:right;"><strong>तारकेश्वर मिश्र, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="India-Canada Relations: भारत-कनाडा के खराब होते रिश्ते चिंता का विषय" href="http://10.0.0.122:1245/worrying-relations-between-india-and-canada-are-worrying/">India-Canada Relations: भारत-कनाडा के खराब होते रिश्ते चिंता का विषय</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Thu, 21 Sep 2023 11:36:03 +0530</pubDate>
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                <title>विधानसभाओं की सुरक्षाओं में झोल</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश विधानसभा की सुरक्षा को भेदना लगभग नामुमकिन है, लेकिन फिर भी चूक सामने आ गई। इस घटना ने संसद पर हुए हमले की याद ताजा कर दी है। विधानसभा के परिसर में विस्फोटक मिलने से देश की राजनीति में हड़कंप मचा हुआ है। विधानसभा की कार्रवाई के दौरान नेता विपक्ष की सीट के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/defaults-in-the-security-of-the-assemblies/article-2328"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/security.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश विधानसभा की सुरक्षा को भेदना लगभग नामुमकिन है, लेकिन फिर भी चूक सामने आ गई। इस घटना ने संसद पर हुए हमले की याद ताजा कर दी है। विधानसभा के परिसर में विस्फोटक मिलने से देश की राजनीति में हड़कंप मचा हुआ है। विधानसभा की कार्रवाई के दौरान नेता विपक्ष की सीट के नीचे करीब 150 ग्राम पीईटीएन विस्फोटक सामाग्री का मिलना अमूल सुरक्षा के दावों की कलई खोलने के लिए प्रयाप्त है। पीईटीएन को दुनिया के सबसे खतरनाक विस्फोटकों में से एक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सवाल उठता है कि पीईटीएन विधानसभा के अंदर कैसे पहुंचा? इसे आतंकी साजिश कहा जाए, या फिर कुछ और? यह सवाल अब हर किसी को परेशान कर रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की सुरक्षा घेरे को भेदकर इतना आसान नहीं है। फिर यह सब कैसे संभव हुआ। गौरतलब है कि चुनाव जीतने के बाद से ही यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कई आतंकी संगठनों से धमकियां मिल चुकी हैं। उसी को ध्यान में रखते हुए उनकी और विधानसभा की सुरक्षा काफी मजबूत की गई है। बावजूद इसके इतनी बड़ी हिकामत की कोशिश हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">इस घटना से केंद्र सरकार भी हलकान है। सुरक्षा को लेकर बैठकों का दौर जारी है। फिलहाल पूरे मामले की जांच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी यानी एनआईए करेगी। उसके बाद ही पूरी सच्चाई का पता चल सकेगा। यूपी विधानसभा में मौजूदा सुरक्षा चूक के बाद अब पूरे देश की विधानसभाओं में कड़ी चुस्त सुरक्षा चौकसी की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। घटना के बाद योगी आदित्यनाथ ने सुरक्षा के बारे में जो ग्यारह सूत्र बताए हैं उस पर विचार करने की दरकार है। नाराजगी के लहजे में उन्होंने कहा है कि सबसे पहले तत्काल प्रभाव से देश के सबसे बड़े राज्य के सबसे पुराने विधानमंडल को महफूज किया जाए। राज्य की किसी भी संस्था की सुरक्षा समाज के भाईचारे सद्भाव से भी जुड़ी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर समाज में कदम-कदम पर नफरत और असुरक्षा होगी तो राज्य की संस्थाओं पर उसका असर भी जाएगा, इसलिए मुख्यमंत्री योगी के अल्पकालिक सुझावों को मानने के साथ दीर्घकालिक उपायों पर भी विचार होना चाहिए। विधानसभाएं शुरू होने से पहले सभी जांच एजेंसियों को सुरक्षा से जुड़ी जानकारियों को सीएम व विधानसभा अध्यक्षों को अवगत कराना चाहिए। सुरक्षा को लेकर अगर कोई शक-शुभा है तो प्रोग्राम में तब्दीली की जानी चाहिए। साथ ही उक्त स्थान पर अलर्ट घोषित किया जाए। घटनाओं का रोकने के लिए पूर्व में इस तरह के इंतजाम किए जा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि जो विस्फोटक यूपी विधानसभा में मिला है, उसका प्रयोग अधिकांश आतंकी संगठन करते हैं और अगर इसकी मात्रा पांच सौ ग्राम तक होती तो यह सदन को ध्वस्त करने के लिए काफी होता। पीईटीएन विस्फोटक को प्लास्टिक विस्फोटक भी कहते हैं। इसकी मारक क्षमता की बात करें, तो महज 50 से 100 ग्राम पाउडर एक कार या कमरे को उड़ाने के लिए पर्याप्त माना जाता है। यह आसानी से पकड़ में नहीं आता। मेटल डिटेक्टर और जासूसी कुत्ते भी फेल हो जाते हैं। पीईटीएन सफेद रंग का होता है, चीनी जैसा दिखता है, लेकिन धमाका करने में बेहद खतरनाक होता है। इस घटना की जांच इसलिए भी करने की मुकम्मल दरकार है कि इसका आशय और साजिश करने वालों के बारे में जानकारी मिल सके। उनके मकसद और मंशा की पड़ताल करने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक सवाल उठता है कि कौन है जो राजनीतिक-सामाजिक दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश को अस्थिर करना चाहता है। यह बात भी सर्वविधित है कि योगी के मित्रों की संख्या से कहीं ज्यादा उनके दुश्मनों की संख्या है। वह कईयों के आंखों में कांटों की भांति चुभ रहे हैं। हाल ही में उनको दुबई से भी जान से मारने की धमकी मिली थी। हालांकि उनकी सुरक्षा की समीक्षा समय-समय पर की जाती है। लेकिन पीईटीएन का मिलना सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। इशारा साफ कि योगी की सुरक्षा में कहीं न कहीं चूक हो रही है। विधानसभा में इस विस्फोटक सामग्री से होने वाली घटना का हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। बहुत बड़ी जनहानि हो सकती थी। इसलिए सटीक और पूरी जांच होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">केंद्र सरकार को इस घटना पर उचित कदम उठाना चाहिए। क्योंकि सुरक्षा किसी भी राज्य व्यवस्था का पहला कर्तव्य है और अगर वह कानून बनाने वालों और सरकार चलाने वालों की सुरक्षा नहीं कर पाएगी तो उन नागरिकों की सुरक्षा कैसे करेगी जिन्होंने उन्हें यह काम दिया है। देश के आम नागरिकों की सुरक्षा और विशिष्ट जनों की सुरक्षा में एक स्पष्ट नीति के तहत तर्कसंगत लोकतांत्रिक अनुपात होना चाहिए। यह शिकायतें आम हैं कि सुरक्षा बलों का बड़ा हिस्सा विशिष्ट जनों की सुरक्षा में लगा रहता है और आम नागरिक असुरक्षित रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जाहिर है इसके पीछे सुरक्षा व्यवस्था का विशिष्टीकरण और राजनीतिकरण भी काफी जिम्मेदार है, इसीलिए सुरक्षा व्यवस्था को समर्थ बनाने के लिए पुलिस सुधार का सुझाव अक्सर दिया जाता है। उस बारे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद विभिन्न राज्य उसे टाल रहे हैं। वजह साफ है कि सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में सुरक्षा से ज्यादा राजनीति से जुड़ गई है और जिन बेगुनाह और भले लोगों को जाति, धर्म, लिंग, पंथ और भाषा की परवाह करते हुए सुरक्षा दी जानी चाहिए वह उन्हें नहीं मिलती। उल्टे सुरक्षा उन्हें मिलती है जो राजनीतिक रूप से रसूखदार हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">संसद का मानसून सत्र 17 जुलाई से शुरू हो रहा है। इसलिए सभी जांच एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। यूपी विधानसभा के अंदर विस्फोटक मिलने के बाद दिल्ली में संसद भवन की सुरक्षा जांच की भी जांच पड़ताल की जा रही है। इसके लिए 60 लोगों की स्पेशल टीम और सात खोजी कुत्ते लगाए गए। मेटल डिटेक्टर और अन्य लेटेस्ट उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सेंट्रल हल समेत लोकसभा, राज्यसभा में सभी सीटों की जांच की जा रही है। 17 जुलाई से मानसून सेशन शुरू होगा, जो 12 अगस्त को समाप्त होगा। जहन में एक सवाल बार-बार उठता है कि जब कहीं कोई घटनाएं घट जाती हैं तभी जांच-पड़ताल का स्वांग क्यों किया जाता है। घटना के बाद सभी जांच एजेंसीज सर्तकता से काम करने का दम भरने लगती हैं, अलर्ट जारी कर दिया जाता है। मामला जैसे ही शांत होता है, कहानी फिर पुराने धर्रे पर आ जाती हैं। सतर्कता हमेशा एक जैसी क्यों नहीं रहती। अगर सुरक्षा व्यवस्था एक जैसी रहे, तो घटनाएं घटने की संभावनाएं न के बराबर होंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><em><strong>रमेश ठाकुर</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                <pubDate>Sun, 16 Jul 2017 03:16:13 +0530</pubDate>
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