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                <title>culture - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>देश की संस्कृति एवं प्राचीन स्मारकों को संरक्षित करने का हो प्रयास: गहलोत</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि देश की समृद्ध संस्कृति, प्राचीन स्मारकों और ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित करने का हमारा प्रयास होना चाहिए। गहलोत रविवार को विश्व धरोहर दिवस पर अपनी शुभकामनाएं देते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि राजस्थान अपनी परंपराओं, किलों और पूजा स्थलों के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/efforts-should-be-made-to-preserve-the-countrys-culture-and-ancient-monuments-gehlot/article-23012"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-04/ashok-gehlot1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (सच कहूँ न्यूज)।</strong> राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि देश की समृद्ध संस्कृति, प्राचीन स्मारकों और ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित करने का हमारा प्रयास होना चाहिए। गहलोत रविवार को विश्व धरोहर दिवस पर अपनी शुभकामनाएं देते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि राजस्थान अपनी परंपराओं, किलों और पूजा स्थलों के साथ भारत की सांस्कृतिक विरासत में एक अद्वितीय स्थान रखता है। हमारी विविध और समकालिक विरासत को बचाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">विधानसभा अध्यक्ष डा सी पी जोशी ने भी सभी देश एवं प्रदेशवासियों को विश्व धरोहर दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं दी और कहा कि इस मौके देश एवं प्रदेश की इन अनमोल धरोहरों की स्वच्छता एवं सुरक्षा का संकल्प लेना चाहिए। इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा कि देश की गौरवमयी संस्कृति एवं विरासत के संरक्षण से मानव जाति के ज्ञान का भण्डार उन्नत होगा तथा बेहतर भारत के निर्माण का स्वप्न भी साकार हो सकेगा। अत: आइए, विश्व विरासत दिवस के अवसर पर देश -प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों को संजोए रखने एवं संरक्षण का संकल्प लें।</p>
<h4 style="text-align:justify;">गौरवमयी इतिहास के जीवंत दस्तावेज</h4>
<p style="text-align:justify;">भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा सतीश पूनियां ने इस अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए प्रदेशवासियों का आह्वान किया कि आज इस मौके अपने आस-पास की ऐसी इमारतें जो ऐतिहासिक आधार रखती हो, को हेरिटेज राजस्थान हेस्टेग के साथ शेयर करना चाहिए। केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने कहा कि हमारी अमूल्य संस्कृति एवं सभ्यता की परिचायक मूर्त एवं अमूर्त विरासतें हमारे ऐतिहासिक स्वरूप को साकार करती है। ये हमारे गौरवमयी इतिहास के जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि इस मौके इनकी सुरक्षा, संवर्धन और संरक्षण का संकल्प लिया जाना चाहिए।</p>
<h4 style="text-align:justify;">अनमोल धरोहरों के संरक्षण व संवर्धन का संकल्प लें</h4>
<p style="text-align:justify;">पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कहा कि ऐतिहासिक, पुरातात्विक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरें हमारी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं गौरवशाली इतिहास की पहचान है। हमारी इन अनमोल विरासतों को सहेजना एवं संवारना हम सबकी जिम्मेदारी है। विश्व धरोहर दिवस पर आइए, देश एवं प्रदेश की इन अनमोल धरोहरों के संरक्षण व संवर्धन का संकल्प लें। उपनेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र सिंह राठौड़ ने भी विश्व धरोहर दिवस पर सभी प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि इस अवसर पर हम सबको मिलकर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के संवर्धन और संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 18 Apr 2021 13:45:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>चंडीगढ़ में वीआईपी कल्चर पर लगी ब्रेक</title>
                                    <description><![CDATA[सड़क पर वीआईपी कल्चर नहीं चलेगा इसलिए कोई भी गाड़ी पर सेना, डॉक्टर, प्रेस, पुलिस, डीसी, मेयर, विधायक, चेयरमैन व अन्य कोई वीआईपी पद लिखेगा तो उसका चालान होगा। वहीं एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड को इस मामले में छूट दी गई है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/rating-culture-brakes-in-chandigarh/article-12808"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/vip-culture.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;"> गाड़ियों पर आर्मी, प्रेस, जज, मेयर इत्यादि लिखा मिला तो कटेगा चालान (Vip culture)</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>चंडीगढ़ (अनिल कक्कड़)।</strong> अपने सख्त यातायात नियम पालनों के लिए जाने जाते चंडीगढ़ शहर में अब वीआईपी कल्चर का भी चालान कटेगा। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेशों के बाद बुधवार से चंडीगढ़ में वाहनों पर प्रेस, आर्मी, पुलिस, डिप्टी मेयर इत्यादि जैसे स्टीकर दिखे मिले तो चालान होगा। इस बाबत चंडीगढ़ में जिन लोगों की गाड़ियों पर ऐसे स्टीकर हैं, वे अपने स्टीकर हटवाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।  बता दें कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा जारी आदेश में कहा गया है (Vip culture) कि सड़क पर हर व्यक्ति समान है। सड़क पर वीआईपी कल्चर नहीं चलेगा इसलिए कोई भी गाड़ी पर सेना, डॉक्टर, प्रेस, पुलिस, डीसी, मेयर, विधायक, चेयरमैन व अन्य कोई वीआईपी पद लिखेगा तो उसका चालान होगा। वहीं एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड को इस मामले में छूट दी गई है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">वीआईपी प्लेट लगा धौंस जमा रहे नन्हें-फन्ने खां</h3>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि चंडीगढ़ में अक्सर गाड़ियों पर वीआईपी स्टीकर लगा या प्रेस, आर्मी, पुलिस, मेयर इत्यादि जैसे स्टीकर लगा कर हर कोई अपनी धौंस जमाने में लगा था, जिस पर हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस अमोल रतन सिंह की बेंच ने सुनवाई के दौरान इस तरह के स्टिकर को मोटर व्हीकल एक्ट का उल्लंघन माना। जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह आदेश दिए। अपने पद की स्टिकर और प्लेट लगाना दरअसल धौंस या रौब जमाने का जरिया बन गया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">जस्टिम शर्मा ने सबसे पहले अपनी गाड़ी का स्टिकर उतरवाया</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">जस्टिस शर्मा ने कहा कि स्टिकर उतारने की शुरूआत उनकी गाड़ी से होनी चाहिए।</li>
<li style="text-align:justify;">उन्होंने तुरंत अपने स्टाफ को इसके आदेश भी दे दिए।</li>
<li style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान जस्टिस राजीव शर्मा ने कहा कि लोग अपनी गाड़ी पर विधायक, चेयरमैन, पुलिस, सेना और प्रेस लिखवा रहे हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">कुछ मामलों में लोगों ने हद कर दी है।</li>
<li style="text-align:justify;">कुछ लोग अपनी गाड़ी पर विधायक का पड़ोसी और पूर्व विधायक की पट्टी लगा रहे हैं।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">पूर्व विधायक कुलवंत बाजीगर ने सबसे पहले उतारा स्टीकर</h3>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा में राजनैतिक तौर पर गुहला चीका के पूर्व विधायक कुलवंत बाजीगर ने अपना पूर्व विधायक का स्टीकर गाड़ी से उतरवाया था। बाजीगर ने कहा कि अदालत के आदेश सबके लिए हैं और सर्वोपरि हैं। ऐसे में उन्होंने तुरंत अपने वाहन से स्टीकर उतरवाया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पूरे हरियाणा में राजनैतिक तौर पर कुलवंत बाजीगर ने अपनी गाड़ी से वीआईपी स्टीकर उतरवा कर मिसाल पेश की।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2020 20:35:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>विरोध प्रदर्शन की संस्कृति</title>
                                    <description><![CDATA[श्रम सुधारों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए आयोजित बंद में करदाताओं को 18 हजार करोड रूपए का नुकसान हुआ तो जाट आंदोलन के कारण 34 हजार करोड रूपए, और कर्नाटक में कावेरी जल विवाद पर विरोध प्रदर्शन के कारण 22-25 हजार करोड का नुकसान हुआ। जैसे-जैसे भारत प्रगति कर रहा है क्या उसमें […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/culture-of-protest/article-12683"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/protest-7.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;">
श्रम सुधारों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए आयोजित बंद में करदाताओं को 18 हजार करोड रूपए का नुकसान हुआ तो जाट आंदोलन के कारण 34 हजार करोड रूपए, और कर्नाटक में कावेरी जल विवाद पर विरोध प्रदर्शन के कारण 22-25 हजार करोड का नुकसान हुआ। जैसे-जैसे भारत प्रगति कर रहा है क्या उसमें ये विरोध प्रदर्शन उचित हैं? यह सच है कि संविधान ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार की गारंटी दी गयी है किंतु संविधान में दूसरे व्यक्ति के अधिकारों के अतिक्रमण की गारंटी नहीं दी गयी है और ये विरोध प्रदर्शनकारी भूल जाते हैं कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा को ही नकार देते हैं। ये विरोध प्रदर्शन अकर्मण्यता, अपने गुणगान, बाहुबल का प्रदर्शन, सहानुभूति प्राप्त करने या कठिन परिश्रम से बचने का छद्म आवरण बन गए हैं। लोकतत्र न तो भीडतंत्र है और न ही अयवस्था पैदा करने का लाइसेंस है। यह अधिकरों और कर्तव्यों, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन है।</h3>
<p> </p>
<h3 style="text-align:justify;">पूनम आई कौशिश</h3>
<h4 style="text-align:justify;">
आज के राजनीतिक वातावरण में चारों ओर विरोध प्रदर्शन (Protest) देखने को मिल रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों का कारण महत्वपूर्ण नहीं है। इनका उद्देश्य केवल अपना विरोध जताना है और यह विरोध जितना जोर-शोर से हो उतना अच्छा है। इन विरोध प्रदर्शनों की सफलता का पैमाना जनजीवन को अस्त-व्यस्त करना और लोगों को परेशानी पैदा करना है। आप कुछ भी भला-बुरा कहें किंतु आपको यह बात ध्यान में रखनी होगी कि आपकी स्वतंत्रता वहां समाप्त होती है जहां से अन्य लोगों की नाक शुरू होती है।<br />
इस सप्ताह भारत अपना 70वां गणतंत्र दिवस मनाएगा और इसमें विविधता में एकता की झलक देखने को मिलेगी किंतु साथ ही हमें हिंसक प्रदर्शन, बसों को जलाए जाना, पत्थरबाजी और जन-धन की हानि भी देखने को मिलेगी और इसका कारण नागरिकता संशोधन कानून का विरोध है। सामान्य चर्चा भी उग्र और सारहीन होती जा रही है। इसमें अपशब्दों का प्रयोग भी देखने को मिल रहा है। देश की राजधानी दिल्ली इसका विशिष्ट उदाहरण है जहां पर नागरिकता संशोधन कानून को लेकर पिछले एक माह से विरोध प्रदर्शन चल रहा है और अभी इसके समाप्त होने के आसार नहीं हैं।<br />
दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में सड़क पर धरने से लोगों को असुविधा हो रही है, यातायात ठप्प हो गया है और स्थानीय बाजार में दुकानें बंद हैं और सरकार का आरोप है कि इस विरोध के पीछे कांग्रेस का हाथ है जिससे वह अपने संकीर्ण राजनीतिक हित साधना चाहती है। देश में उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम कहीं भी जाओ सर्वत्र विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। कोई भी दिना बिना हड़ताल के नहीं गुजरता है। मोहल्ला, जिला या राज्य कहीं न कहीं धरने प्रदर्शन और बंद देखने को मिलते हैं और अब लोग इसे अपनी मानसिकता का हिस्सा मानने लग गए हैं और इसे एक छुट्टी के रूप में लेते हैं। हालांकि विभिन्न न्यायालयों ने इस पर प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए हैं।<br />
भारत में विरोध प्रदर्शन दैनिक जीवन का हिस्सा बन गए हैं। इससे प्रश्न उठता है कि हमारे प्रतिनिधिक लोकतंत्र के कार्यकरण में उनकी क्या भूमिका है। क्या वे अभियक्ति की स्वतंत्रता है। या वास्तव में मौलिक अधिकारों का दमन है। विरोध प्रदर्शनकारी इस सीमा तक क्यों बढ़ जाते हैं। क्या इनके कारण वैध होते हैं? क्या राज्य अन्याय या अतार्किक है? क्या सड़क पर धरना देना नए भारत में विरोध प्रदर्शन करने का नया व्याकरण बनेगा, क्या यह विरोध प्रदर्शन का नया तरीका है या अपने संगठन को एकजुट रखने और उसे अप्रसांगिक बनने से रोकने का प्रयास है? या ये विशुद्ध राजनीति है?<br />
एक समय था कि जब विरोध प्रदर्शन के लिए कई दिनों और महीनों की तैयारी करनी पड़ती थी किंतु आज के डिजिटल मीडिया मे विरोध प्रद्रर्शन तुरंत आयोजित हो जाते हैं। आपको ध्यान होगा कि निर्भया मामले में लोग एसएमएस के द्वारा एकजुट हो गए थे या संप्रग -2 के दौरन भ्रष्टाचार के दौरान लोग सोशल मीडिया के माध्यम से तुरंत एकजुट हो गए थे। परंपरागत विरोध प्रदर्शन की पहचान करना आसान था क्योंकि इसके पीछे कोई उद्देश्य होता था। किंतु आज इसमें ऐसे लोग भी शामिल हो जाते हैं जिसका विरोध प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं होता है और विरोध प्रदर्शन फैशनेबल बन गया है। कुछ लोग इन विरोध प्रदर्शनों को सब चलता है कहकर नकार देते हैं और कुछ लोग कहते हैं कि ‘की फरक पैंदा’ है। लोकमान्य तिलक के स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार से लेकर विरोध प्रदर्शन मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है तक भारत ने एक लंबी यात्रा तय कर है और आज समाज का हर दूसरा वर्ग विरोध प्रदर्शन के लिए तत्पर रहता है। 2009 से 2014 के बीच में विरोध प्रदर्शनों में 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई। देश में प्रतिदिन लगभग 200 विरोध प्रदर्शन होते हैं और अधिक साक्षर राज्यों में इनकी संख्या अधिक है। इन पांच वर्षों में 42 हजार विरोध प्रदर्शन हुए। सबसे अधिक विरोध प्रदर्शन छात्र संगठनों ने किए हैं जिनकी संख्या मे 148 प्रतिशत, सांप्रदायिक विरोध प्रदर्शनों में 92 प्रतिशत, सरकारी कर्मचारियों के विरोध प्रर्दशनों में 71 प्रतिशत, राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों में 42 प्रतिशत और मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों में 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। राजनीतिक दल और उनके सहयोगी संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन का हिस्सा 32 प्रतिशत है और यदि इसमें उनके छात्र निकायों और श्रम संगठनों को भी जोड़ दिया जाए तो वह 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। कर्नाटक में सर्वाधिक 12 प्रतिशत विरोध प्रदर्शन हुए और तमिलनाडू, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में मिलाकर 50 प्रतिशत विरोध प्रदर्शन हुए। अल्प विकसित उत्तर प्रदेश और बिहार में वर्ष 2009-2014 के दौरान 1 प्रतिशत से भी कम विरोध प्रदर्शन हुए जबकि इन दोनों राज्यों की जनसंख्या भारत की जनसंख्या का 25 प्रतिशत है। पूर्वोत्तर में असम में सर्वाधिक 17357 विरोध प्रदर्शन हुए।<br />
जब तक विरोध प्रदर्शनकारियों के पास उचित विकल्प न हो तब तक विरोध प्रदर्शन से अव्यवस्था और भीड़ द्वारा हिंसा ही पैदा होती है। फलत: मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और कारोबार को नुकसान पहुंचता है। राज्य व्यवस्था पंगु होती है, कारपोरेट और उद्योगों को ब्लैकमेल किया जाता है और लोगों को असुविधाएं पैदा होती हैं। धन का प्रवाह रूकता है और निवेशक भागते हैं और खुद विरोध प्रदर्शनकारी की रोजी-रोटी खतरे में आती है। इस संबंध मे हमें अमरीकी कानून से सबक लेना चाहिए जहां पर राजमार्ग या उसके निकट सार्वजनिक भाषण देने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है ताकि भीड़ के एकत्र होने से राजमार्ग बाधित न हो। एकत्र होने के अधिकार का प्रयोग इस तरह करना होता है जिससे अन्य कानूनी अधिकारों, हितों और लोगों तथा लोक व्यवस्था के लिए असुविधा पैदा न हो। ब्रिटेन में लोक व्यवस्था अधिनियम 1935 के अंतर्गत किसी व्यक्ति द्वारा वर्दी में विरोध प्रदर्शन एक अपराध है। अपराध निवारण अधिनियम 1953 में बिना कानूनी स्वीकृति के सार्वजनिक स्थान पर हथियार ले जाना एक अपराध है। इसी तरह संसद के सत्र के दौरान वेस्टमिंस्टर हाल के एक किमी के दायरे में 50 से अधिक व्यक्तियों की बैठक नहीं की जा सकती है।<br />
शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर कोई आपत्ति नहीं है किंतु बिना किसी विश्वसनीय राजनीतिक लक्ष्य के अनंतकाल तक विरोध प्रदर्शन से भारतीय लोकतंत्र की वैधता को ही नजरंदाज किया जाता है क्योंकि ऐसे विरोध प्रदर्शनों में कोई उचित विकल्प नहीं सुझाया जाता है। केवल अव्यवस्था और विरोध प्रदर्शनकारियों का दमन देखने को मिलता है। यह संदेश दिया जाना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति या समूह हिंसा की धमकी नहीं दे सकता है और यदि वह ऐसा करता है तो उसकी सुनवाई का लोकतांत्रिक अधिकार समाप्त हो जाएग। भविष्य के लिए स्पष्ट है कि विरोध प्रदर्शन में दादागिरी बंद की जानी चाहिए और विरोध प्रदर्शन के समीकरण बदले जाने चाहिए और उसके स्थान पर एक नया सामाजिक करार होना चाहिए। नागरिकों के अधिकार सर्वोपरि हैं। हमें इस प्रश्न पर ध्यान देना चाहिए: क्या हम विरोध प्रदर्शन वहन कर सकते हैं? इसका कारण और उद्देश्य दूर की बातें हैं। कभी न कभी हमे आगे आकर यह कहना पडेगा: बंद करो ये नाटक।</h4>
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                <pubDate>Wed, 22 Jan 2020 21:03:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बुद्धिजीवी बोले, देश की संस्कृति को रखें सहेज कर</title>
                                    <description><![CDATA[परिचर्चा। संस्कृति और आधुनिकता आमने-सामने सच कहूँ/देवीलाल बारना कुरुक्षेत्र। हिंदूस्तान में विशेष दिनों की बड़ी महत्ता है। कभी दीपावली के दीपों में पूरा हिंदूस्तान जगमग हो जाता है तो कभी ईद के मौके पर पूरा हिंदूस्तान आपस में गले मिलता है। कभी राखी का एक धागा भाई-बहन के प्रेम को मजबूत करने काम करता है […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h2>परिचर्चा। संस्कृति और आधुनिकता आमने-सामने</h2>
<p><strong>सच कहूँ/देवीलाल बारना</strong><br />
<strong>कुरुक्षेत्र।</strong> हिंदूस्तान में विशेष दिनों की बड़ी महत्ता है। कभी दीपावली के दीपों में पूरा हिंदूस्तान जगमग हो जाता है तो कभी ईद के मौके पर पूरा हिंदूस्तान आपस में गले मिलता है। कभी राखी का एक धागा भाई-बहन के प्रेम को मजबूत करने काम करता है तो कभी होली के पर्व पर सभी एक हो जाते हैं। हिंदूस्तान के अनेक पर्व ऐसे हैं जो प्रेम रूपी भाईचारे की जड़ों को ओर गहरा करने का कार्य करते हैं। वहीं आजकल वैलेंटाईन डे भी काफी प्रचलन में आ रहा है।</p>
<p>वैलेंटाईन-डे को भारतीय संस्कृति के मुताबिक सही नहीं ंमाना जाता। अंग्रेजी बोलने वाले देशों में ये एक पारंपरिक दिवस है, जिसमें प्रेमी एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम का इजहार वैलेंटाइन कार्ड़ भेजकर या फूल देकर करते हैं। ये दिन प्रेम पत्रों के वैलेंटाइन के रूप में पारस्परिक आदान-प्रदान के साथ गहरे से जुड़ा हुआ है। भारत की यदि बात करें तो यहां के लोगों को मानना है कि भारत की संस्कृति इस त्योहार को मनाने की इजाजत नहीं देती। वैलेंटाईन डे को लेकर विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे बुद्धिजीवियों से जब बात की गई तो उन्होंने इस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया दी।</p>
<h2>कोई स्थान ऐसा नहीं जहां प्रेम न हो: डा. हुड्डा</h2>
<p>शिक्षिका डॉ. प्रीतिका हुड्डा का कहना है कि दुनिया में कोई स्थान व प्राणी ऐसा नहीं जो प्रेम व स्रेह से रहित हो। हम ईश्वर से, देश से, माता-पिता से, अपने सगे संबंधियों से सबसे प्रेम करते हैं। स्वाभाविक है कि पुरुष व स्त्री के बीच भी प्रेम रहता है। प्रेम को मात्र विपरीत लिंग से जोड़ने की बजाय प्रेम के विस्तृत रूप को समझ कर हम बात करें तो यह समझ आता है कि प्रेम सबसे करें, प्रेम में न कोई अपेक्षा हो न तनाव, प्रेम के लिए जिएं लेकिन मरें नहीं।</p>
<h2>पश्चिमी सभ्यता को हिंदूस्तान में न पसारने दें पांव: मलिक</h2>
<p>75 वर्षीय हुकम चंद मलिक का कहना है कि आज हिंदूस्तान में पश्चिमी सभ्यता पांव पसारती जा रही है, जोकि देश की संस्कृति के लिए खतरनाक है। भारतीय संस्कृति इससे बिल्कुल अलग है। आज जो वैलेंटाईन डे मनाया जा रहा है। युवा इसे बेशक मनाएं लेकिन अपने माता-पिता व गुरुजनों से प्रेम जताकर। मलिक ने युवाओं से आह्वान किया कि वे देश की संस्कृति को जिंदा रखने का प्रयास करें व पश्चिमी सभ्यता को देश में पांव न पसारने दें।</p>
<h2>पता नी कित तै आया वैलेंटाईन-डे: रामकरण शर्मा</h2>
<p>वैलेंटाईन डे पर अपने विचार सांझा करते हुए शांति नगर निवासी रामकरण शर्मा ने ठेठ हरियाणवी में अपनी राय देते हुए कहा कि पता नी कित आया यू वैलेंटाईन डे। म्हारे उरै तो होली, दिवाली, सक्रांत अर तीज जिसे त्योहार होवैं सैं। इन त्योहारां नै मना कै देश मै भाईचारा अर प्रेम जागृत होवै सै। वैलेंटाईन नाम का यू विदेशी त्यौहार भारत मै मनाने का कोई औचित्य नही है।</p>
<h2>देश के साथ प्रम करें युवा: कश्यप</h2>
<p>आकाशवाणी कुरुक्षेत्र में युववाणी कार्यक्रम की प्रस्तुतकर्ता कविता कश्यप का कहना है कि आज जरूरत है कि हर युवा देश से प्रेम करे। जब हमारे अंदर देश प्रेम जागृत होगा तो हम देश को बहुत आगे ले जा सकते हैं।</p>
<h2>आधुनिकता की दौड़ में संस्कृति को न छोड दें पीछे: आरडी शर्मा</h2>
<p>80 वर्षीय आर.डी शर्मा ने कहा कि आज देश की संस्कृति को जीवित रखना बेहद जरूरी है। वैलेंटाईन जैसे त्योहारों के देश में आ जाने से देश की संस्कृति को काफी क्षति हुई है। उन्होने कहा कि जब हम पढ़ा करते थे तो हमे तो वैलेंटाईन नामक दिन का पता भी नही था। आधुनिकता की इस दौड में कभी हम अपनी संस्कृति को ही न पीछे छोड दें।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/debate-indian-culture/article-7674</link>
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                <pubDate>Wed, 13 Feb 2019 20:12:09 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरियाणा की फिल्म नीति से राज्य की संस्कृति का प्रसार होगा: मनोहर लाल</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा है कि प्रदेश की फिल्म नीति Haryana’s film policy से हरियाणवी संस्कृति का संवर्धन, सरंक्षण तथा प्रोत्साहन होगा। हरियाणा सरकार ने हाल ही में हरियाणा की फिल्म नीति को स्वीकृति दी थी। मनोहर लाल ने शनिवार को यहां हरियाणा भवन में संवाददाताओं से कहा कि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/haryanas-film-policy-will-spread-the-states-culture-manohar-lal/article-5821"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/manohar.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा है कि प्रदेश की फिल्म नीति <strong>Haryana’s film policy</strong> से हरियाणवी संस्कृति का संवर्धन, सरंक्षण तथा प्रोत्साहन होगा। हरियाणा सरकार ने हाल ही में हरियाणा की फिल्म नीति को स्वीकृति दी थी।</p>
<p>मनोहर लाल ने शनिवार को यहां हरियाणा भवन में संवाददाताओं से कहा कि फिल्म नीति से हरियाणवी आंचलिक संस्कृति का संवर्धन, संरक्षण होगा तथा इसे प्रोत्साहन मिलेगा।</p>
<p>उन्होंने कहा कि सभी संबंधित पक्षों से व्यापक बातचीत के बाद हरियाणा की फिल्म नीति तैयार की गयी है और इसमें राज्य की आंचलिक संस्कृति पर हरियाणवी भाषा-बोली में फिल्में बनाने को प्रोत्साहन दिया गया है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि हरियाणवी संस्कृति,हरियाणवी भाषा-बोली तथा हरियाणा क्षेत्र में फिल्म बनाने के लिए फिल्म नीति में अधिकतम दो करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि निश्चित की गयी है। एक सवाल के जवाब में श्री मनोहर लाल ने विपक्षी राजनैतिक दलों के बंद के आह्वान को आधारहीन बताते हुए कहा कि विपक्षी राजनैतिक दलों के पास कोई मुद्दा नहीं है। जनता से उन्हें कोई समर्थन नहीं मिल रहा है।</p>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Sep 2018 18:34:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारतीय संस्कृति का पक्ष रखने में सरकार रही नाकाम</title>
                                    <description><![CDATA[Government Fails In Favor Of Indian Culture सुप्रीम कोर्ट ने समलैगिंकता संबंधों को अपराधों के दायरे से बाहर करने का निर्णय लिया है। केन्द्र सरकार द्वारा देश की पुरातन संस्कृति संबंधी अपनी कोई ठोस दलील न देने के कारण सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी राय पर निर्णय सुनाया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इससे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/government-fails-in-favor-of-indian-culture/article-5769"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/government-fails-in-favor-of-indian-culture.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:justify;">Government Fails In Favor Of Indian Culture</h1>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने समलैगिंकता संबंधों को अपराधों के दायरे से बाहर करने का निर्णय लिया है। केन्द्र सरकार द्वारा देश की पुरातन संस्कृति संबंधी अपनी कोई ठोस दलील न देने के कारण सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी राय पर निर्णय सुनाया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले केन्द्र सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए कहा था लेकिन सरकार ने कोई भी आपत्ति जाहिर करने की बजाए सारी बात सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दी थी। अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दलील देकर निर्णय सुनाया है। अदालत ने आधुनिकता व बदले हुए जमाने की दलील दी है। जहां तक भारतीय संस्कृति का संबंध है इसमें नर-मादा के संबंधों को ही स्वीकृति दी गई है जो संसार की उत्पति के लिए प्राकृतिक प्रक्रिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक निजी आजादी का संबंध है देश के बहुत से कानूनों पर भी सवाल उठना स्वभाविक है। समलैगिंक संबंधों पीछे दलील पंंक्तिगत आजादी है तो हिन्दू विवाह एक्ट पर भी नई बहस छिड़ हो सकती है। निजी आजादी पर यह भी कहा जा सकता है कि हिन्दू के लिए एक से अधिक विवाह करवाने भी निजी आजादी के कारण जायज है। अगर पति किसी अन्य महिला के साथ विवाह करवाना चाहता है तो यह उसकी निजी आजादी बन जाएगी। इसी तरह केन्द्र सरकार तीन तलाक प्रथा खत्म करने के लिए कानून बनाने पर जोर दे रही है लेकिन निजी आजादी की बात आते ही एक मुस्लमान के लिए भी एक से अधिक विवाह करवाना कोई गैर कानूनी नहीं माना जा सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">निजी आजादी को मान्यता देने के साथ ड्रग्स लेना भी कोई अपराध नहीं होगा। बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते, सुबह के समय उठना नहीं चाहते, बुजुर्गों की संभाल नहीं करना चाहते हैं, निजी आजादी बच्चों को यह सब करने की स्वीकृति देगी। असलीयत यह है कि बिना मर्यादा के कुछ भी संभव नहीं। माता-पिता बच्चों का पालन-पोषण एक मर्यादा के तहत कर उसे अच्छा इन्सान बनाते हैं। सूर्य, चन्द्रमा, धरती, तारे, दिन-रात, ऋतु सभी मर्यादा में चलते हैं। अगर इनकी मर्यादा बिगड़ जाए तो तबाही हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सृष्टि का दारोमदार एक मर्यादा में बंधा हुआ है। भारतीय संस्कृति ने रिश्तों की पवित्र प्रणाली बनाकर पूरे विश्व का नेतृत्व किया है। पश्चिमी लोग पूर्वी सभ्यता की अहमीयत को स्वीकार कर रहे हैं। अदालत के निर्णय पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती लेकिन भारतीय संस्कृ ति व सामाजिक ढ़ांचे का गौरव कभी फीका नहीं पड़ेगा। यह केवल धार्मिक मान्यताएं नहीं अपितु सामाजिक व वैज्ञानिक महत्व का भी विषय है।</p>
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                <pubDate>Fri, 07 Sep 2018 13:14:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है, यह अध्यात्म-जगत की सबसे बड़ी घटना के रूप में जाना जाता है। पश्चिमी देशों में गुरु का कोई महत्व नहीं है, वहां विज्ञान और विज्ञापन का महत्व है परन्तु भारत में सदियों से गुरु का महत्व रहा है। यहां की माटी एवं जनजीवन में गुरु को […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/important-role-of-guru-in-indian-culture/article-5024"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/guru-punima.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है, यह अध्यात्म-जगत की सबसे बड़ी घटना के रूप में जाना जाता है। पश्चिमी देशों में गुरु का कोई महत्व नहीं है, वहां विज्ञान और विज्ञापन का महत्व है परन्तु भारत में सदियों से गुरु का महत्व रहा है। यहां की माटी एवं जनजीवन में गुरु को ईश्वरतुल्य माना गया है, क्योंकि गुरु न हो तो ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग कौन दिखायेगा? गुरु ही शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और वे ही जीवन को ऊर्जामय बनाते हैं। जीवन विकास के लिए भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु की सन्निधि, प्रवचन, आशीर्वाद और अनुग्रह जिसे भी भाग्य से मिल जाए उसका तो जीवन कृतार्थता से भर उठता है। क्योंकि गुरु बिना न आत्म-दर्शन होता और न परमात्म-दर्शन। इन्हीं की प्रेरणा से आत्मा चैतन्यमय बनती है। गुरु भवसागर पार पाने में नाविक का दायित्व निभाते हैं। वे हितचिंतक, मार्गदर्शक, विकास प्रेरक एवं विघ्नविनाशक होते हैं। उनका जीवन शिष्य के लिये आदर्श बनता है। उनकी सीख जीवन का उद्देश्य बनती है। अनुभवी आचार्यों ने भी गुरु की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए लिखा है- गुरु यानी वह अर्हता जो अंधकार में दीप, समुद्र में द्वीप, मरुस्थल में वृक्ष और हिमखण्डों के बीच अग्नि की उपमा को सार्थकता प्रदान कर सके।</p>
<p style="text-align:justify;">
आषाढ़ की समाप्ति और श्रावण के आरंभ की संधि को आषाढ़ी पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा अथवा गुरु पूर्णिमा कहते हैं। गुरु पूर्णिमा आत्म-बोध की प्रेरणा का शुभ त्योहार है। यह त्योहार गुरु-शिष्य के आत्मीय संबंधों को सचेतन व्याख्या देता है। काव्यात्मक भाषा में कहा गया है- गुरु पूर्णिमा के चांद जैसा और शिष्य आषाढ़ी बादल जैसा। गुरु के पास चांद की तरह जीए गये अनुभवों का अक्षय कोष होता है। इसीलिये इस दिन गुरु की पूजा की जाती है इसलिए इसे ‘गुरु पूजा दिवस’ भी कहा जाता है। प्राचीन काल में विद्यार्थियों से शुल्क नहीं वसूला जाता था अत: वे साल में एक दिन गुरु की पूजा करके अपने सामर्थ्य के अनुसार उन्हें दक्षिणा देते थे। महाभारत काल से पहले यह प्रथा प्रचलित थी लेकिन धीरे-धीरे गुरु-शिष्य संबंधों में बदलाव आ गया। कहा गया है कि अगर आप गुरु की ओर एक कदम बढ़ाते हैं तो गुरु आपकी ओर सौ कदम बढ़ाते हैं। कदम आपको ही उठाना होगा, क्यों यह कदम आपके जीवन को पूर्णता प्रदत्त करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">
भारतीय संस्कृति में गुरु का बहुत ऊंचा और आदर का स्थान है। माता-पिता के समान गुरु का भी बहुत आदर रहा है और वे शुरू से ही पूज्य समझे जाते रहे हैं। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समान समझ कर सम्मान करने की पद्धति पुरातन है। ‘आचार्य देवोभव:’ का स्पष्ट अनुदेश भारत की पुनीत परंपरा है और वेद आदि ग्रंथों का अनुपम आदेश है। ऐसी मान्यता है कि हरिशयनी एकादशी के बाद सभी देवी-देवता चार मास के लिए सो जाते हैं। इसलिए हरिशयनी एकादशी के बाद पथ प्रदर्शक गुरु की शरण में जाना आवश्यक हो जाता है। परमात्मा की ओर संकेत करने वाले गुरु ही होते हंै। गुरु एक तरह का बांध है जो परमात्मा और संसार के बीच और शिष्य और भगवान के बीच सेतु का काम करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन गुरुओं की छत्रछाया में से निकलने वाले कपिल, कणाद, गौतम, पाणिनी आदि अपने विद्या वैभव के लिए आज भी संसार में प्रसिद्ध हंै। गुरुओं के शांत पवित्र आश्रम में बैठकर अध्ययन करने वाले शिष्यों की बुद्धि भी तद्नुकूल उज्ज्वल और उदात्त हुआ करती थी। सादा जीवन, उच्च विचार गुरुजनों का मूल मंत्र था। तप और त्याग ही उनका पवित्र ध्येय था। लोकहित के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देना और शिक्षा ही उनका जीवन आदर्श हुआ करता था। प्राचीन काल में गुरु ही शिष्य को सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों तरह का ज्ञान देते थे लेकिन आज वक्त बदल गया है। आजकल विद्यार्थियों को व्यावहारिक शिक्षा देने वाले शिक्षक को और लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान देने वाले को गुरु कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षक कई हो सकते हैं लेकिन गुरु एक ही होते हैं। हमारे धर्मग्रंथों में गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा गया है कि जो शिष्य के कानों में ज्ञान रूपी अमृत का सींचन करे और धर्म का रहस्योद्घाटन करे, वही गुरु है। यह जरूरी नहीं है कि हम किसी व्यक्ति को ही अपना गुरु बनाएं। योग दर्शन नामक पुस्तक में भगवान श्रीकृष्ण को जगतगुरु कहा गया है क्योंकि महाभारत के युद्ध के दौरान उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश दिया था। माता-पिता केवल हमारे शरीर की उत्पत्ति के कारण हंै लेकिन हमारे जीवन को सुसंस्कृत करके उसे सर्वांग सुंदर बनाने का कार्य गुरु या आचार्य का ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
पहले गुरु उसे कहते थे जो विद्यार्थी को विद्या और अविद्या अर्थात आत्मज्ञान और सांसारिक ज्ञान दोनों का बोध कराते थे लेकिन बाद में आत्मज्ञान के लिए गुरु और सांसारिक ज्ञान के लिए आचार्य-ये दो पद अलग-अलग हो गए। भारत के महान दार्शनिक ओशो ने जब यह कहा कि हमारी शिक्षण संस्थाएं अविद्या का प्रचार कर रही हैं तो लोगों ने आपत्ति की लेकिन वे बात सही कह रहे थे। आज हमारे विद्यालयों में ज्ञान का नहीं बल्कि सूचनाओं का हस्तांतरण हो रहा है। विद्यार्थियों का ज्ञान से अब कोई वास्ता नहीं रहा इसलिए आज हमारे पास डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, न्यायाधीश, वैज्ञानिक और वास्तुकारों की तो एक बड़ी भीड़ जमा है लेकिन ज्ञान के अभाव में चरित्र और चरित्र के बिना सुंदर समाज की कल्पना दिवास्वप्न बन कर रह गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">
शिक्षा का संबंध यदि चरित्र के साथ न रहा तो उसका परिणाम यही होगा। परंतु इस मूल प्रश्न की ओर कौन ध्यान दे? सत्ताधारी लोग अपने पद को बनाये रखने के लिए शिक्षा का संबंध चरित्र की बजाय रोजगार से जोड़ना चाहते हैं। जो लोग शिक्षा का संबंध रोजगार से जोड़ने की वकालत करते हैं वे वस्तुत: शताब्दियों तक अपने लिए राज करने की भूमिका तैयार कर रहे हैं और उनके तर्क इतने आकट्य हैं कि सामान्य व्यक्ति को महसूस होता है कि समाज के सबसे अधिक हिंतचिंतक यही लोग हैं। यही कारण है कि देश में आज जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है, अनैतिकता और अराजकता फैलती जा रही है, हिंसा और आतंक बढ़ता जा रहा है, भ्रष्टाचार और अपराध जीवनशैली बन गयी है। इसका मूल कारण गुरु को नकारकर, चरित्र को नकारकर हमने केवल भौतिकता को जीवन का आधार बना लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">
पिछले सात दशक से हम उल्टी गिनती गिन रहे हैं। उसी का परिणाम है कि न पानी की समस्या सुलझी न रोजी-रोटी की। न उन्नत चिकित्सा सुलभ हो पा रही है न शिक्षा को उन्नत बना पाये है। चंद लोगों की भव्य अट्टालिकाएं अवश्य खड़ी हो गई हैं। यदि हमें भारत में लोकतांत्रिक पद्धति को सफल बनाना है तो चरित्र उसकी पहली शर्त है। महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि हम हिंदुस्तान में कौन-सी पद्धति लागू करें बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हम चरित्रवान व्यक्ति पैदा करें।</p>
<p style="text-align:justify;">
पाठ्य पुस्तकों में कुछ नीतिपरक श्लोकों को जोड़ने अथवा बच्चों को तोते की तरह गायत्री मंत्र रटाने या अंग्रेजी शैली में योग को ‘योगा’ करने से न तो चरित्र निर्माण होता है और न भावी पीढ़ी में ज्ञान का हस्तांतरण ही संभव है। ज्ञान तो गुरु से ही प्राप्त हो सकता है लेकिन गुरु मिलें कहां? अब तो ट्यूटर हैं, टीचर हैं, प्रोफेसर हैं पर गुरु नदारद हैं। गुरु के प्रति अविचल आस्था ही वह द्वार है जिससे ज्ञान का हस्तांतरण संभव है। हमें इन तथ्यों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सच है कि आज हम जिस सामाजिक और आर्थिक परिवेश में सांस ले रहे हैं वहां इन पुरानी व्यवस्थाओं की चर्चा निरर्थक है परंतु इनके सार्थक और शाश्वत अंशों को तो हम ग्रहण कर ही सकते हैं।सिर्फ धन कमाने या रोजी-रोटी चला लेने से मनुष्य जीवन में सुखी नहीं रह सकता। यह सुखी रहने का बाहरी भौतिक उपाय है।</p>
<p><span style="text-align:justify;">अपनी आत्मा को जानना और भगवान को पाना ही सच्चा सुख है। यद्यपि गुरुओं के महागुरु भगवान स्वयं प्रत्येक व्यक्ति के हृदय-गुहा में विराजमान हैं तथापि बिना किसी बाहर के योग्य गुरु की मदद के हम अपनी आत्मा को नहीं जान सकते। यह आध्यात्मिक गुरु ही अन्तरात्मा के बंद द्वार खोलता है और हमें भगवान से साक्षात्कार कराता है।</span><span style="text-align:justify;">माँ का ज्ञान और शिक्षक द्वारा दिया गया ज्ञान बाहर का ज्ञान है, वस्तुओं का ज्ञान है परन्तु आध्यात्मिक गुरु द्वारा दिया गया ज्ञान आंतरिक ज्ञान है। वह भीतर के अंधकार को दूर कर उसे प्रकाशित करता है। बाहर की वस्तुओं का कितना भी हमें ज्ञान प्राप्त हो जाए हम कितने भी बड़े पद पर हों, कितना भी हमारे पास पैसा हो परन्तु बिना भीतर के ज्ञान सब कुछ व्यर्थ है। बाहरी ज्ञान, मन-बुद्धि का ज्ञान-विज्ञान है परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान मन से परे भगवान का ज्ञान है।</span></p>
<p style="text-align:justify;">परन्तु विडम्बना यह है कि जिस प्रकार गुरु रूपी माँ की महिमा और सम्मान में गिरावट आई है, रोजगार दिलाने वाले शिक्षकों का अवमूल्यन हुआ है। उसी प्रकार भगवान से मिलाने वाले आध्यात्मिक गुरुओं का भी अवमूल्यन हो रहा है। आज नकली, धूर्त, ढोंगी, पाखंडी, साधु-संन्यासियों और गुरुओं की बाढ़ ने असली गुरु की महिमा को घटा दिया है। असली गुरु की पहचान करना बहुत कठिन हो गया है। भगवान से मिलाने के नाम पर, मोक्ष और मुक्ति दिलाने के नाम पर, कुण्डलिनी जागृति के नाम पर, पाप और दु:ख काटने के नाम पर, रोग-व्याधियां दूर करने के नाम पर और जीवन में सुख और सफलता दिलाने के नाम पर हजारों धोखेबाज गुरु पैदा हो गये हैं जिनको वास्तव में कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">
जो स्वयं आत्मा को नहीं जानते वे दूसरों को आत्मा पाने का गुर बताते हैं। तरह-तरह के प्रलोभन देकर धन कमाने के लिए शिष्यों की संख्या बढ़ाते हैं। जिसके बाड़े में जितने अधिक शिष्य हों वह उतना ही बड़ा और सिद्ध गुरु कहलाता है। मूर्ख भोली-भाली जनता इनके पीछे-पीछे भागती है और दान-दक्षिणा देती है। ऐसे धन-लोलुप अज्ञानी और पाखंडी गुरुओं से हमें सदा सावधान रहना चाहिए। कहावत है कि ‘पानी पीजै छान के और गुरु कीजै जान के।</p>
<p style="text-align:justify;">’ सच्चा गुरु ही भगवान तुल्य है। इसीलिए कहा गया है कि ‘गुरु-गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपनो जिन गोविंद दियो मिलाय।’ यानी भगवान से भी अधिक महत्व गुरु को दिया गया है। यदि गुरु रास्ता न बताये तो हम भगवान तक नहीं पहुंच सकते। अत: सच्चा गुरु मिलने पर उनके चरणों में सब कुछ न्यौछावर कर दीजिये। उनके उपदेशों को अक्षरश: मानिये और जीवन में उतारिये। सभी मनुष्य अपने भीतर बैठे इस परम गुरु को जगायें। यही गुरु-पूर्णिमा की सार्थकता है तथा इसी के साथ अपने गुरु का भी सम्मान करें।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Jul 2018 03:23:48 +0530</pubDate>
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                <title>शिक्षा बनाम लोक संस्कृति</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/education-public-culture/article-4305"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/lakhe.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हाल ही में राजस्थान के समाचार पत्रों में एक खबर पढ़ने को मिली कि राजस्थान सरकार ने निर्णय किया है कि आने वाले शिक्षा सत्र में राजस्थान शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त सभी सरकारी व गैर सरकारी प्रारम्भिक व माध्यमिक स्कूलों में हर शनिवार को सामाजिक सरोकार से जुड़ी शिक्षा प्रदान की जायेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिये माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने शिविरा पंचाग जारी किया है। शिक्षा विभाग के स्कूलों में प्रथम शनिवार को किसी महापुरूष के जीवन से सम्बन्धित प्रेरक जानकारी दी जायेगी। दूसरे शनिवार को दादी, नानी से जुड़ी प्रेरक कहानियां सुनायी जायेंगी। माह के तीसरे शनिवार को संत, महात्माओं, धर्मगुरूओं के प्रवचन करवाये जायेगें। चौथे शनिवार को महाकाव्यों पर प्रश्रोत्री होगी। पांचवे शनिवार को प्रेरक नाटकों का मंचन व राष्ट्रभक्ति गीतो का गायन होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षा विभाग से उक्त आदेश जारी होते ही कई शिक्षक संगठनो ने सरकार के इस आदेश का यह कह कर विरोध करना शुरू कर दिया कि इससे शिक्षा का भगवाकरण होगा। मेरी नजर में सरकार का यह एक अच्छा कदम है। आज के दौर में विद्यार्थी दर्जनों किताबो व कापियों से भरे भारी भरकम बस्तो का बोझ उठाये मानसिक रूप से इतने दब चुके है कि उन्हे समाजिक गतिविधियों का ज्ञान ही नहीं रहता है। छात्र दिन भर अपनी पढ़ाई की चिंता में डूबा रहता है। आज छात्र बोर्ड की परीक्षा में 500 में 499 अंक प्राप्त करने लगा है। पहले के समय में प्रथम श्रेणी से पास होने वाला श्रेष्ठ छात्र माना जाता था। छात्रों के 70-75 प्रतिशत अंक आना तो बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। ऐसे में आज के समय में छात्रों के मध्य पढ़ाई को लेकर भारी प्रतिस्पर्धा चल रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज हर बच्चे के अभिभावक भी चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में सर्वाधिक अंक लाये। बच्चे भी अभिभावकों के दबाव में दिन भर किताबों में डूबे रहने लगे हैं। ऐसे में बच्चो की पूरी दुनिया किताबो के बस्तों व स्कूल तक ही सिमट कर रह गयी है। आज बच्चे को घर में क्या हो रहा है, क्या सामाजिक रीति-रिवाज, मान्यतायें है इससे उन्हे कोई सरोकार नहीं हैं। बच्चों की पूरी दुनिया तो अधिकाधिक अंक प्राप्त करने का प्रयास करने तक ही रह गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में राजस्थान सरकार का निर्णय एक नयी आस जगाता है। इस निर्णय से बच्चों को अपनी संस्कृति को, अपने स्थानीय रीति-रिवाजों को निकट से जानने, समझने का मौका तो मिलेगा ही उनकी जिन्दगी में एक नया नवाचार भी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले के समय में छोटे बच्चे गांव के स्कूल में पढ़ते थे तब आज की तरह स्मार्ट फोन का जमाना नहीं था। उस वक्त सभी बच्चे रात में सोने से पहले घर के बड़े बुर्जुगों, दादी, नानी से कहानियां सुनते थे। गर्मी की छुट्टियों में बच्चे जब अपनी ननिहाल जाते थे तो उनको सबसे अधिक उत्सुकता नानी से कहानियां सुनने की होती थी। नानी भी बच्चों को बड़े चाव से कहानियां सुनाती थी। उस जमाने के बुर्जुगों को बहुत सारी कहानियां याद रहती थी जो रोजाना बच्चों को सोने से पहले सुनाया करती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">स्कूलों में महापुरूषों के जीवन पर चर्चा करना, प्रेरक कहानियां सुनाना, धर्मगुरूओं के प्रवचन सुनाना, महाकाव्यों पर प्रश्रोत्री, प्रेरक नाटकों का मंचन करना कतई गलत नहीं हैं। हम जब स्कूल में पढ़ते थे तो गांव के स्कूल में प्रतिवर्ष दो-तीन नाटको का मंचन किया जाता था। स्कूल में खेले जाने वाले नाटकों के सभी पात्र स्कूल के अध्यापक व विद्यार्थी निभाते थे। कई दिन पहले से नाटक का रिहर्सल शुरू हो जाता था। नाटक देखने पूरा गांव उमड़ पड़ता था। नाटक के माध्यम से स्कूल में कुछ अतिरिक्त आय हो जाती थी जिससे गरीब बच्चों की फीस, किताब, कापी व ड्रेस की व्यवस्था की जाती थी। उसमें से कुछ पैसा स्कूल के कमरों में सफेदी करने पर भी खर्च किया जाता था। सफेदी बच्चे स्वंय ही करते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के तकनीकी युग में बच्चे अपने महापुरूषों, बड़ों-बुर्जुगों को भूलते जा रहे हैं। स्कूलों में महापुरूषो के जीवन पर चर्चा की जायेगी तो बच्चों में उनके बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होगी। हमारे झुंझुनू जिले के खेतड़ी में स्वामी विवेकानन्द जी ने तीन बार यात्रा की थी व कई दिनों तक यहां ठहरे थे। उनको भगवाबाना व स्वामी विवेकानन्द नाम भी शिकागो धर्म सम्मेलन में जाते वक्त खेतड़ी के राजा अजीतसिंह जी द्वारा ही प्रदान किया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">मगर आज इस बात का ज्ञान कितने विद्यार्थियों को है। स्कूलों में जब महापुरूषों के जीवन पर चर्चा होगी तब स्वामी विवेकानन्द जी का प्रसंग जरूर आयेगा व विद्यार्थियों को उनके बारे में पता लग सकेगा। इसी प्रकार की अन्य पे्ररणादायक बातों से छात्र रूबरू होगें। स्कूलों में धर्मगुरू छात्रों को धर्म से जुड़ी सामाजिक एकता की बाते बतायेंगें तो उनकी सोच का दायरा बढ़ेगा। धर्म कोई भी हो सभी धर्मो में समाज को एकसूत्र में पिरोने की बातें होती हंै। कोई भी धर्म समाज को तोड़ने की शिक्षा नहीं देता हैं। सभी धर्म शान्ति के मार्ग पर चलने की राह दिखाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के प्रतियोगिता के दौर में मनुष्य एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी बन कर रह गया है। वर्तमान समय में स्कूल शिक्षा का केन्द्र ना होकर पढ़ाई के कारखाने बन चुके हैं। हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा उसके पड़ोसी के बच्चे से अधिक अंक प्राप्त करें।</p>
<p style="text-align:justify;">ऊंची पढ़ाई पढ़ कर बड़े पद पर काम करें। अभिभावक प्रतिस्पर्धी के चक्कर में यह भी नहीं देखता की उसका बच्चा क्या पढ़ना चाहता है। उसकी किस विषय में रूचि है। बच्चों को उनकी रूचि का विषय नहीं मिलने पर सही ढ़ंग से पढ़ नहीं पाते हैं, उपर से कम अंक लाने पर घर वालों का डर। ऐसे माहौल में बच्चा अवसाद की स्थिति में आ जाता है व कई बार इसी प्रकार के तनाव के चलते वह गलत कदम उठा लेता है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान का कोटा शहर कोचिंग के क्षेत्र में देश की सबसे बड़ी मंडी बन चुका हैं। यहां प्रतिवर्ष लाखों छात्र पढ़ने आते हैं मगर तनाव के चलते प्रतिवर्ष दर्जनो छात्र आत्महत्या भी कर लेते हैं। हालांकि यहां से हर साल कई टापर भी निकलते हैं मगर आत्म हत्या करने वाले उनपर एक बदनुमा दाग बन जाते है। यहां पढ़ने वाले छात्र द्वारा आत्म हत्या करने का कारण पढ़ाई का दवाब रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन छात्रों के घरवाले उनपर लाखों रुपए खर्च कर उन्हे कोटा इस आस में पढ़ने भेजते हैं कि वहां जाकर वह प्रतियोगी परीक्षा अवश्य पास कर लेगा ऐसे में परीक्षा में असफल होने पर वे मानसिक दबाव में आकर गलत कदम उठा लेते हैं। जिसका खामियाजा उनके अभिभावकों को जिन्दगी भर उठाना पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की शिक्षा मात्र किताबी व कम्प्यूटर वाली रह गयी है। शिक्षा में व्यावहारिक पक्ष गायब हो गया है। शिक्षा का पूर्णत: व्यावसायी करण हो चुका है। इस प्रकार की शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों से व्यावहारिकता की उम्मीद करना बेमानी है। सरकारों को शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन कर इसे व्यवहारिक, रोजगारपरक व सामाजिक समरसता वाली बनाने की दिशा में कदम उठाने चाहिये ताकि शिक्षा पूर्ण करने के बाद मात्र सरकारी नौकरी की आश ना रख अपने स्वरोजगार पर भी ध्यान केन्द्रित कर सके। जिससे शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती संख्या पर काबू पाया जा सके।</p>
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                <pubDate>Tue, 19 Jun 2018 08:11:07 +0530</pubDate>
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                <title>भारत का स्वतंत्रता दिवस, हमारी जीवन रेखा</title>
                                    <description><![CDATA[भारत एक विशाल सभ्यता-संस्कृति वाला देश है। पहले से ही भारत की सीमा उत्तर में हिमालय पर्वत, हिंदु कुश पर्वत, दक्षिण में कन्या कुमारी, पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तक थी। इसके अंतर्गत वर्तमान अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश भौगोलिक क्षेत्र के अंग थे। उस समय संयुक्त परिवार की भावना सामाजिक जीवन की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-independence-day/article-3123"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/india-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत एक विशाल सभ्यता-संस्कृति वाला देश है। पहले से ही भारत की सीमा उत्तर में हिमालय पर्वत, हिंदु कुश पर्वत, दक्षिण में कन्या कुमारी, पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तक थी। इसके अंतर्गत वर्तमान अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश भौगोलिक क्षेत्र के अंग थे। उस समय संयुक्त परिवार की भावना सामाजिक जीवन की ईकाई थी। राजनैतिक सजगता इसका मार्गदर्शक थी। विशाल देश होने के कारण अनेक समस्याएं भी थी। विदेशी शक्तियों के कारण विकट परिस्थितियां भी आर्इं। विरोध-प्रतिरोध का संघर्ष भी चलता रहा, लेकिन पराधीनता को स्वीकार नहीं किया।</p>
<p style="text-align:justify;">बहुत से वंश व उनके बीच हुए युद्धों के बाद राज्य एक-दूसरे में विलय होते गए। अंत में पानीपत के तीसरे युद्ध 1761 ई. में मराठा शक्ति को हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार पराधीनता का मार्ग प्रदर्शित हुआ। भारत में यूरोपियन व्यापारिक कंपनियों ने राजीतिक सत्ता के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। अंत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अपने उद्देश्य में सफल हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">बंगाल, बिहार, उड़ीसा, सूरत इसके व्यापारिक केंद्र थे। कंपनी अपने आर्थिक हितों के लिए स्वार्थ के साथ मिलकर षड्यंत्र करने लगे। बंगाल का नवाब अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद उसका उत्तराधिकारी सुराजुदोला नवाब बना। नवाब का आंतरिक षड्यंत्रकारी विरोधी मीरजाफर को कंपनी ने अपनी ओर कर लिया। इस षड्यंत्र योजना का कर्ता-धर्ता लार्ड क्लाइव था, जोकि कंपनी का गवर्नर था।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्वासघात और षड्यंत्रकारी सैनिक महत्वहीन 23 जून 1757 प्लासी के युद्ध के मैदान मे क्लाइव जीत गया। कंपनी ने अपनी राजनैतिक सत्ता स्थापित की। लार्ड वैलजली 1798-1805, लार्ड डलहौजी 1848-56 तक ब्रिटिश कंपनी भारत की सर्वाेच्च शक्ति बन गई।</p>
<p style="text-align:justify;">कंपनी ने राजनैतिक शक्ति को बढ़ाने के साथ-साथ भारत के सामाजिक, धार्मिक राजस्व, परंपराएं, शिक्षा, सांस्कृतिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया। लार्ड मैकाले जैसे ब्रिटिशवादी ने इस प्रकार के सुझाव रखे कि ‘‘भारतीय बाहर से भले भारतीय दिखाई दें, लेकिन संस्कारों में पश्चिमी होंगे’’। इस प्रकार भारत ब्रिटिश के अधीन हो गया और कुछेक क्रांतिकारी इस बात को सहन नहीं कर पाए।</p>
<p style="text-align:justify;">1857 की क्र ांति बंगाल में मंगल पाण्डे ने शुरू की। अंग्रेजों ने इसे सैनिक विद्रोह का नाम दिया है। इसके प्रमुख भारतीय नेता कुंवर सिंह, बहादुरशाह जफर, रानी झांसी, तांत्या टोपे, नाना साहब, नेताओं ने नेतृत्व किया। वास्तव में यह क्र ान्ति मध्य भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि जनआक्रोश था। इससे हरियाणा प्रदेश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक शोध जानकारी देते हैं कि ‘भारत का यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था।’ भले ही ब्रिटिश शक्ति कुछ देसी राज्यों के सहयोग से इसे दबाने में सफल हो गई, लेकिन भारतीय पराधीनता को खत्म करने के लिए संघर्षशील रहे। फिर अंग्रेजों ने अपनी नीति में बदलाव किया और ‘बांटोे और राज्य करो’ की नीति अपनाई।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक महान विद्वानों ने भारत में सांस्कृतिक एकता और स्वाभिमान को जगाया। पराधीनता को खत्म करने का अह्वान किया। केशवचंद्र, स्वामी दयानंद, रामकिशन परमाहंस, विवेकानंद के अतिरिक्त अनेक संस्थाओं ने योगदान दिया। इससे राष्टÑीय भावनाएं उदृत हुई। अग्रेजों के विरूद्ध आवाजें उठने लगी कि हमारी निर्धनता का मूल कारण अंग्रेज है। प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व क्रान्तिकारी गतिविधियां तेज हो चुकी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकमान्य तिलक, श्यामकृष्ण वर्मा, वीर सावरकर आदि देशभक्तों के अतिरिक्त बंगाल में क्रान्तिकारी गतिविधियां तेज हो गई। विरेन्द्र घोष, नलिनी बाक्ची, खुदीराम, कनहाई, रासबिहारी घोष, सचिन्द्र सन्याल के अलावा भारत के अन्य भागों में कई नौजवान क्रान्तिकारियों ने आजादी के लिए संघर्ष किया।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रथम विश्व युद्ध 1914-18 में भारतीयों ने अंग्रेजों को साम्राज्यवाद के विरूद्ध सहयोग दिया। रोलेट एक्ट पास करके अंग्रेजों ने भारतीयों से विश्वासघात किया। सारे भारत में इसका विरोध हुआ। महात्मा गांधी अंग्रेजों के न्याय में विश्वास रखते थे, लेकिन बाद में वे उनके विरोधी हो गये। इसके लिए उन्होंने असहयोग आन्दोलन 1920-22 का कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेशियों वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई। काले कानून के विरूद्ध पंजाब में भी रोष प्रकट किया गया। लेकिन अमृतसर में जलियांवाले बाग में विरोध हो रहा था, लेकिन जनरल डायर ने शान्त विरोध पर गोलियां चला दी। इस नरसंचार में अनेक लोग मारे गये, जिसमें बच्चे, बूढेÞ शामिल थे। सारे देश में अशान्ति का वातावरण हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">1930-32 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चला, जिसका उद्देश्य ‘नमक कानून’ तोड़ना था। इसके लिए महात्मा गांधी ने डांडी यात्रा की। इससे पूरे भारत में राष्टÑीय चेतना जागृत हुई। लेकिन दूसरी तरफ क्रांतिकारी समूह के देशभक्तों 23 मार्च 1931 में भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू ने असैम्बली हाल के बम्ब फैंका, जिस कारण उन्हें फांसी की सजा दी गई। इससे सारा भारत शोक में डूब गया।</p>
<p style="text-align:justify;">1939-45 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया। अंग्रेजी सरकार ने भारत से सहयोग लोकतन्त्र की रक्षा के उद्देश्य से मांगा, लेकिन महात्मा गांधी तथा भारतीय नेताओं ने इन्कार कर दिया। 1942 में महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ आरम्भ कर दिया और कहा कि ‘‘ये मेरे जीवन का अन्तिम संघर्ष है। अब नहीं तो कभी नहीं।’’ इससे आजादी की लहर अपने चरम पर पहुंच गई।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटिश शक्ति ने युद्ध समाप्ति के बाद राजनैतिक गतिरोध को खत्म करने के लिए अनेक सुझाव और आश्वासन दिये। सरकार ने ‘वेवल योजना’, ‘क्रिप्स योजना’ और ‘कैबिनेट मिशन’ भेजे, लेकिन कोई हल नहीं निकला।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटिश सत्ता ‘बांटो और राज्य करो’ के नीति पर कार्य कर रही थी, जोकि साम्प्रदायिकता पर आधारित थी। सर्वप्रथम सर सैयद अहमद खान मुस्लमानों के हितों की संरक्षा के लिए अंग्रेजों के सहयोगी बन गए। 1906 में मुस्लिम लीग राजनीतिक दल का गठन हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि ‘‘मुस्लमान अल्पसंख्यक हैं, हिंन्दु बहुसंख्यक हैं। दोनों की सांस्कृतियां अलग-अलग हैं। इस तरह ये दो अलग राष्टÑ हैं। इसलिए दो राष्टÑ एक तलवार की म्यान में नहीं आ सकते।’’ इस तरह अलग पाकिस्तान की मांग रखी गई, जबकि भारतीय नेता भारत की एकता व अखंडता चाहते थे। मगर फैसला यही हुआ कि भारत-पाकिस्तान दो अलग-अलग राष्टÑ बन जाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वक्त इंग्लैण्ड में सरकार बदल गई। लार्ड एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी के अधीन सरकार का गठन हुआ, जोकि भारत के प्रति उदार नीति रखते थे। वायसराय माउण्ट बेटन को भारत का वायसराय बनाकर भेजा गया। 1948 तक भारत को स्वाधीनता का वायदा किया गया। अनेक भारतीय नेताओं, मुस्लिम लीग नेताओं से विचार-विमर्श हुआ। अंत में माउंट बेटन योजना तैयार हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटिश संसद में स्वीकृत हुई और भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 स्वीकृत किया गया। पंजाब बंगाल का विभाजन हुआ। भारत और पाकिस्तान दो अलग स्वतंत्र राज्य बने। अंत में 15 अगस्त 1947 हमारा देश आजाद हो गया। हमारे अनेक नौजवानों की कुर्बानियों का परिणाम है। हमारी जीवन रेखा है, जिसमें अनेक भारत की वीरांगनाओं ने आजादी के लिए संघर्ष किया, कुर्बानी दी, जिन्हें हम भूल नहीं सकते, जैसे रखी बाई, दुर्गा भाभी, रेणुका सेन, कमला चटर्जी, लीला कमाल, इंदुमति सिंह कल्याणी देवी। इसके अलावा आजाद हिंद का नारा भी हम भूल नहीं सकते।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>जय-जय-जय जी हिंद, </strong></em><br />
<em><strong>तोपों-बंदूक हथियारों से आजाद करो जी हिंद,</strong></em><br />
<em><strong>हिंद हमारी जान, भारत बने हम हिंद के, </strong></em><br />
<em><strong>हिंद के लिए कुर्बान।।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. हरीश चंद झण्डई</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Aug 2017 01:35:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दांव पर आदिवासियों का जीवन</title>
                                    <description><![CDATA[गत माह पहले प्रकाशित नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि कोलम (आंध्रप्रदेश और तेलंगाना), कोरगा (कर्नाटक), चोलानायकन (केरल), मलपहाड़िया (बिहार), कोटा (राजस्थान), बिरहोर (ओडिसा) और शोंपेन (अंडमान और निकोबार) के विशिष्ट संवेदनशील आदिवासी समूहों की तादाद घट रही है और आदिवासी बच्चों की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से दोगुना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/life-of-tribals-at-stake/article-2996"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/tribals.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गत माह पहले प्रकाशित नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि कोलम (आंध्रप्रदेश और तेलंगाना), कोरगा (कर्नाटक), चोलानायकन (केरल), मलपहाड़िया (बिहार), कोटा (राजस्थान), बिरहोर (ओडिसा) और शोंपेन (अंडमान और निकोबार) के विशिष्ट संवेदनशील आदिवासी समूहों की तादाद घट रही है और आदिवासी बच्चों की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से दोगुना स्तर पर पहुंच गयी है। रिपोर्ट के मुताबिक जनजातीय बच्चों की मृत्यु दर 35.8 है, जबकि राष्ट्रीय औसत दर 18.4 फीसद है। इसी तरह जनजातीय शिशु मृत्यु दर 62.1 फीसद है, जबकि राष्ट्रीय शिशु मृत्यु दर 57 फीसद है। यह आंकड़ा भारत की सांस्कृतिक विविधता पर मंडराते किसी खतरे से कम नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">गत वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘द स्टेट आफ द वर्ल्डस इंडीजीनस पीपुल्स’ नामक रिपोर्ट में भी कहा गया कि मूलवंशी और आदिम जनजातियां भारत समेत संपूर्ण विश्व में अपनी संपदा, संसाधन और जमीन से वंचित व विस्थापित होकर विलुप्त होने के कगार पर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खनन कार्य के कारण हर रोज हजारों जनजाति परिवार विस्थापित हो रहे हैं और उनकी सुध नहीं ली जा रही है। विस्थापन के कारण उनमें गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी बढ़ रही है। परसंस्कृति ग्रहण की समस्या ने भी उन्हें दोराहे पर खड़ा कर दिया है, जिससे न तो वे अपनी संस्कृति बचा पा रहे हैं और न ही आधुनिकता से लैस होकर राष्ट्र की मुख्यधारा में ही शामिल हो पा रहे हैं। बीच की स्थिति के कारण उनकी सभ्यता और संस्कृति दोनों दांव पर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह तथ्य है कि भारत में ब्रिटिश शासन के समय सबसे पहले जनजातियों के सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। ईसाईयत के बढ़ते प्रभाव के कारण हिन्दू संगठन भी उठ खड़े हुए और जनजातियों के बीच धर्म प्रचार आरंभ कर दिए। हिन्दू धर्म के प्रभाव के कारण जनजातियों में भी जाति व्यवस्था के तत्व विकसित हो गये। आज उनमें भी जातिगत विभाजन के समान ऊंच-नीच का एक स्पष्ट संस्तरण विकसित हो गया है, जो उनके बीच अनेक संघर्षों और तनावों को जन्म दे रहा है। इससे जनजातियों की परंपरागत सामाजिक एकता और सामुदायिकता खतरे में पड़ गयी है। आज स्थिति यह है कि धर्म परिवर्तन के कारण बहुत से आदिवासियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत की उत्तर पूर्वी तथा दक्षिणी भागों की जनजातियों में कितने ही व्यक्ति अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा के रुप में स्वीकार कर अपनी मूलभाषा का परित्याग कर दिया है। जनजातियों की संस्कृति पर दूसरा हमला कारपोरेट जगत और सरकार की मिलीभगत के कारण भी हो रहा है। जंगल को अपनी मातृभूमि समझाने वाले जनजातियों के इस आशियाने को उजाड़ने का जिम्मा खुद सरकारों ने उठा लिया है। एक रिपोर्ट में आदिवासी जनसमुदाय की दशा पर ध्यान खींचते हुए कहा गया है कि इनकी आबादी विश्व की जनसंख्या की महज 5 फीसदी है, लेकिन दुनिया के 90 करोड़ गरीब लोगों में मूलवासी लोगों की संख्या एक तिहाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर विकसित देश अमेरिका की ही बात करें, तो यहां आम आदमी की तुलना में जनजातीय समूह के लोगों को तपेदिक होने की आशंका 600 गुना अधिक है। उनके आत्महत्या करने की आशंका भी 62 फीसदी ज्यादा है। आॅस्ट्रेलिया में जनजातीय समुदाय का कोई बच्चा किसी अन्य समूह के बच्चे की तुलना में 20 साल पहले मर जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नेपाल में अन्य समुदाय के बच्चे से जनजातीय समुदाय के बच्चे की आयु संभाव्यता का अंतर 20 साल, ग्वाटेमाला के 13 साल और न्यूजीलैण्ड में 11 साल है। विश्व स्तर पर देखें तो जनजातीय समुदाय के कुल 50 फीसदी लोग टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित हैं। इस संख्या में और भी इजाफा होने के आसार हैं। चिंता की बात यह भी है कि जनजातीय समूह सभ्य कहे जाने वाले लोगों के निशाने पर हैं। अमेरिका हो या भारत हर जगह विकास के नाम पर उनके जंगलों को उजाड़ा जा रहा है। जंगल उजाड़े जाने से उनका जीवन पूरी तरह असुरक्षित हो गया है और उन्हें अपनी सुरक्षा और रोजी-रोजगार के लिए अपने मूलस्थान छोड़ना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>आज भारत की उत्तर पूर्वी तथा दक्षिणी भागों की जनजातियों में कितने ही व्यक्ति अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा के रुप में स्वीकार कर अपनी मूलभाषा का परित्याग कर दिया है। जनजातियों की संस्कृति पर दूसरा हमला कारपोरेट जगत और सरकार की मिलीभगत के कारण भी हो रहा है।</em></p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong><em>–</em>रीता सिंह</strong></em></p>
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                <pubDate>Wed, 09 Aug 2017 03:37:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रक्षाबंधन: बहनों की रक्षा के संकल्प का पर्व</title>
                                    <description><![CDATA[भारत विविध धर्म, भाषा व संस्कृतियों से सुसज्जित विविधताओं वाला देश है, वहीं विविधता में एकता इसकी सबसे बड़ी खासियत भी है। दैनंदिनी में समय-समय पर दस्तक देने वाले पर्व-त्योहार यहां क्षीण हो रहे पारिवारिक व सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने में अहम भूमिका अदा करते हैं। ये पर्व-त्योहार मानव जीवन में विभिन्न कारणों से बनने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/raksha-bandhan-festival-for-defence-of-the-sisters/article-2946"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/rakhi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत विविध धर्म, भाषा व संस्कृतियों से सुसज्जित विविधताओं वाला देश है, वहीं विविधता में एकता इसकी सबसे बड़ी खासियत भी है। दैनंदिनी में समय-समय पर दस्तक देने वाले पर्व-त्योहार यहां क्षीण हो रहे पारिवारिक व सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने में अहम भूमिका अदा करते हैं। ये पर्व-त्योहार मानव जीवन में विभिन्न कारणों से बनने वाली नीरसता के बादल को पीछे छोड़ खुशियों की वर्षा कराने में बड़ी सहभागिता निभाते हैं। इसके साथ ही, सामाजिक संतुलन स्थापित करने तथा लोगों में सामाजिकता बढ़ाने में पर्व-त्योहारों का बड़ा महत्व रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज, भाई-बहन के निश्छल प्रेम को समर्पित रक्षाबंधन का पावन पर्व है। प्यारी बहन के कोमल हाथों से प्यारे भाई की कलाई पर बंधने वाली लच्छेदार राखियाँ या रेशम का धागा एक दूसरे के लिए प्रेम, सुरक्षा व समर्पण के उच्च आदर्शों को जीवनभर के लिए समाहित किये हुए है। विश्वास की यह डोर जितनी मजबूत होगी, आपसी रिश्ते उतने ही मजबूत होंगे। भाई-बहन का प्यार अटूट होता है। बचपन में गुड्डे-गुड्डियों के साथ खेलते-खेलते दोनों कब बड़े हो जाते हैं, मालूम ही नहीं पड़ता लेकिन, एक दूसरे के प्रति प्यार दिनोंदिन बढ़ता जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाई-बहन का रिश्ता चिरकाल तक स्थाई रहता है। भाई की सफलता पर सबसे ज्यादा खुशी बहन को होती है, तो बहन की घर से विदाई के वक्त सबसे ज्यादा तकलीफ भाई ही महसूस करता है। हालांकि, यह त्योहार भाई-बहन को प्रत्येक वर्ष एक-दूसरे के पास लाकर खुशियों की सौगात देने को एक बड़ा अवसर सृजित करता है। वर्ष में एक बार आने वाला यह पर्व एक महान संदेश भी दे जाता है। यदि इस दिन हर एक भाई ना सिर्फ अपनी बहन बल्कि, दूसरों की भी बहनों की सुरक्षा का संकल्प लेता है तो, शायद यह रक्षाबंधन के महान पर्व को सबसे बड़ी सार्थकता प्रदान करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा संकल्प इसलिए आवश्यक है कि आज हम अपनी बहनों की रक्षा तथा सम्मान का संकल्प तो ले रहे हैं, लेकिन समाज की अन्य महिलाओं के साथ घरेलू, सामाजिक अथवा शारीरिक हिंसा करने से बाज नहीं आ रहे हैं। महिलाओं को प्रताड़ित करते समय हम यह भूल जाते हैं कि वे भी किसी की प्यारी बहन हैं। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों का यह दोहरा रवैया भले ही उनकी अकड़ की निशानी हो, लेकिन महिलाओं के लिए सुरक्षित परिवेश बनाने में इस तरह की संकीर्ण व दोहरी मानसिकता सामाजिक मूल्य व संस्कृति के मार्ग में बड़ी बाधा उत्पन्न कर रही हैं। ऐसे में निश्चय ही हमारा यह संकल्प देश की ‘आधी आबादी’ को उचित सम्मान दिला पाएगा। साथ ही, समाज में घटने वाली असामाजिक घटनाओं में भी निश्चित रुप से कमी आएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन एक उत्सव है, जिस अवसर पर बहनें अपने भाई से अधिक उत्साहित नजर आती हैं। ऐसे शुभ अवसर पर भाई भी राखी बंधवाने के बाद अपनी बहन को उपहार देने की कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। विभिन्न कारणों की वजह से जब भाई ऐसे आयोजन में शरीक न हो पाने की विवशता व्यक्त करता है, तो बहनें डाक द्वारा भाई को राखी के साथ अपना प्यार भेज देती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल क्रांति के बाद अब आॅनलाइन शॉपिंग वेबसाइट के जरिये भी राखी भेजने का चलन बढ़ गया है। देश की रक्षा को प्रतिबद्ध सैनिक इस अवसर पर भी अपने घर नहीं आ पाते, इसलिए बहनें उनको राखी भेजने से नहीं चुकतीं। ‘सिस्टर फॉर जवान्स’ एक ऐसा ही अभियान है, जिसके माध्यम से देशभर के विभिन्न शहरों से राखियों का संग्रह कर सैनिकों के पास भेजा जा रहा है, जिसमें उनकी सलामती की दुआ तो है ही, साथ ही ऐसे अवसर पर अपनी बहन की आने वाली याद को कुछ हद तक कम करने का प्रयास भी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कन्या भ्रूण-हत्या तथा पुत्र-मोह की अधिकता की वजह से भारतीय समाज में लिंगानुपात असमान हुआ है, जिससे सामाजिक असंतुलन बढ़ा है, वहीं दूसरी तरफ परिवार में हो रहे लिंग-आधारित भेदभाव की वजह से बालिकाओं के सर्वांगीण विकास में बाधा पहुंची है। स्त्री-पुरुष के असमान अनुपात का नतीजा है कि रक्षाबंधन में भी कई भाइयों की कलाई सूनी रह जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, आज महिलाओं में जागरुकता बढ़ी है, इसलिए पढ़ी-लिखी व समझदार किशोरी या महिलाएं इस दिन अनाथाश्रम, कारागार या मलिन बस्तियों में जाकर लोगों को राखी बांधती है, जो सभ्य समाज की एक बड़ी निशानी है। रक्षाबंधन के अवसर पर पेड़-पौधों को भी कच्चा धागा बांधकर उसकी रक्षा लेने के संकल्प का रिवाज भी भारतीय समाज के अनेक हिस्सों में प्रचलित है। निश्चय है, यह कदम प्रकृति-संरक्षण की दिशा में अनूठा प्रयास है।</p>
<p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन एक धर्मनिरपेक्ष पर्व है। धर्म कोई भी हो, रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन को एक-दूजे के सम्मान व सुरक्षा में खड़े रहने की शिक्षा ही देता है। अत: इस पावन अवसर पर हम अपनी और समाज की अन्य बहनों की सुरक्षा व सम्मान का संकल्प ले सकते हैं। यही इस पर्व का मूल है और इसकी सार्थकता भी इसी से है।</p>
<p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन एक धर्मनिरपेक्ष पर्व है। धर्म कोई भी हो, रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन को एक-दूजे के सम्मान व सुरक्षा में खड़े रहने की शिक्षा ही देता है। अत: इस पावन अवसर पर हम अपनी और समाज की अन्य बहनों की सुरक्षा व सम्मान का संकल्प ले सकते हैं। यही इस पर्व का मूल है और इसकी सार्थकता भी इसी से है।</p>
<p style="text-align:justify;">
<strong>–<em>सुधीर कुमार</em></strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/raksha-bandhan-festival-for-defence-of-the-sisters/article-2946</link>
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                <pubDate>Mon, 07 Aug 2017 03:48:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसी भी मुद्दे अथवा विवाद का हल सिर्फ बातचीत: मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। चीन के साथ चल रहे डोकलाम विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इशारों में चीन को घेरा है। नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि मुश्किल मुद्दों, विवादों को सिर्फ बातचीत के रास्ते ही सुलझाया जा सकता है। उन्होंने खुद को प्राचीन भारत की परंपरा में यकीन करने वाला बताया। मोदी ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/conversation-the-solution-of-any-issue-modi/article-2907"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/modi-in-meeting.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली।</strong> चीन के साथ चल रहे डोकलाम विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इशारों में चीन को घेरा है। नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि मुश्किल मुद्दों, विवादों को सिर्फ बातचीत के रास्ते ही सुलझाया जा सकता है। उन्होंने खुद को प्राचीन भारत की परंपरा में यकीन करने वाला बताया। मोदी ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘यह एक पुरानी भारतीय अवधारणा है जिसमें संवाद और बहस पर विचारों के आदान-प्रदान के मॉडल को अपनाया गया है। जिसमें किसी भी मुद्दे को बातचीत के जरिए हल किया जाता था।’</p>
<p>‘संवाद-ग्लोबल इनिशिएटिव ऑन कॉन्फ्लिक्ट अवॉयडेंस एंड एंटरटेनमेंट कॉन्शियसनेस’ कार्यक्रम को वीडियो मैसेज के जरिए संबोधित करते हुए पीएम ने कहा, “21वीं सदी में दुनिया के सभी देश एक-दूसरे से जुड़े हुए और एक-दूसरे पर निर्भर हैं। फिर भी यह सदी आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन (climate change) जैसी वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही है। मुझे भरोसा है कि इसका हल एशिया की सबसे पुरानी बातचीत और चर्चा की परंपरा से ही निकलेगा।”</p>
<h2>भारत-चीन के बीच सिक्किम में सीमा विवाद</h2>
<p>गौरतलब है कि भारत-चीन के बीच सिक्किम में सीमा विवाद काफी बढ़ चुका है। चीन, भूटान के डोकलाम में सड़क बना रहा है और भारत ने इसका जोरदार विरोध कर रहा है।</p>
<p>भूटान का डोकलाम पठार भारत (सिक्किम), चीन, भूटान के ट्राइजंक्शन पर है। डोकलाम को चीन डोंगलांग कहता है। इस इलाके में चीन की दखलंदाजी और सड़क बनाकर अपनी स्थिति मजबूत करने से भारत और भूटान को परेशानी है।</p>
<p>मोदी ने कहा, “तर्क शास्त्र (डिबेट) प्राचीन भारत का ही कॉन्सेप्ट है, बातचीत और चर्चा के जरिये इसे पाया गया और यह विवादों को खत्म करने और विचारों को एक-दूसरे से साझा करने का मॉडल बना।”<br />
– “भारत में मानवता का लंबा इतिहास रहा है, कई धर्मों, सभ्यताओं और अध्यात्म में इसकी गहरी जड़ें हैं। इसके रास्ते ही हमनें कई सवालों के जवाब खोजे हैं।”</p>
<p> </p>
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                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sat, 05 Aug 2017 03:34:43 +0530</pubDate>
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