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                <title>घुसपैठिए रोहिंग्याओं की घर वापसी जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[असम में अवैध रूप से रह रहे सात रोहिंग्या घुसपैठियों की वापसी का सिलसिला सरकार का स्वागत योग्य कदम है। सात रोहिंग्याओं को प्रत्यर्पित कर म्यांमार भेजा जाएगा। हालांकि यह संख्या बहुत कम है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के अनुसार ही 14,000 रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं। जबकि इनके अनाधिकृत तौर से रहने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/intruder-rohingyas-homecoming-required/article-6135"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/rohingya-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">असम में अवैध रूप से रह रहे सात रोहिंग्या घुसपैठियों की वापसी का सिलसिला सरकार का स्वागत योग्य कदम है। सात रोहिंग्याओं को प्रत्यर्पित कर म्यांमार भेजा जाएगा। हालांकि यह संख्या बहुत कम है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के अनुसार ही 14,000 रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं। जबकि इनके अनाधिकृत तौर से रहने की संख्या करीब 40,000 है। फिलहाल जिन सात अवैध आव्रजकों को वापस भेजा जाएगा, वे असम के सिलचर जिले के एक बंदीगृह में रह रहे हैं। इन्हें मणिपुर में मोरेह सीमा की पोस्ट पर म्यांमार प्रशासन को सौंपा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इन घुसपैठियों को म्यांमार के राजनयिकों का काउंसलर एक्सेस दिया गया था। इसी के जरिए इनकी सही पहचान कर घर वापसी हो रही है। इनकी म्यांमार के नागरिक होने की पुष्टि तब हुई, जब इस देश के रखाइन राज्य का प्रमाणिक पता मिला। हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने इनकी वापसी पर आपत्त्ति जताई है। वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार हनन का कथित बहाना बनाकर वकील प्रशांत भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय में इनके भारत में ही बने रहने के बाबत एक याचिका दायर की है। इस पर फिलहाल सुनवाई नहीं हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में गैरकानूनी ढंग से घुसे रोहिंग्या किस हद तक खतरनाक साबित हो रहे हैं, इसका खुलासा अनेक रिपोर्टों में हो चुका है, बावजूद भारत के कथित मानवाधिकारवादी इनके बचाव में बार-बार आगे आ जाते हैं। जबकि दुनिया के सबसे बड़े और प्रमुख मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि म्यांमार से पलायन कर भारत में शरणार्थी बने रोहिंग्या मुसलमानों में से अनेक ऐसे हो सकते हैं, जिन्होंने म्यांमार के अशांत रखाइन प्रांत में हिंदुओं का नरसंहार किया है?</p>
<p style="text-align:justify;">रोहिग्ंयाओं ने 25 अगस्त 2017 को इस प्रांत के दो ग्रामों में 99 हिंदुओं की निर्मम हत्या कर उन्हें धरती में दफन कर दिया था। रोहिंग्या आतंकियों ने अगस्त 2017 में रखाइन में पुलिस चौकियों के साथ म्यांमार के गैरमुस्लिम बौद्ध और हिंदुओं पर कई जानलेवा हमले किए थे। इस हमले में हजारों बौद्ध और हिंदु मारे गए थे। नतीजतन म्यांमार सेना ने व्यापक स्तर पर आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाया। जिसके परिणामस्वरूप करीब 7 लाख रोहिंग्याओं को पलायन करना पड़ा। इनमें से 40,000 से भी ज्यादा भारत में घुसपैठ करके शरण पाने में सफल हो गए, शेष बांग्लादेश चले गए।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र ने सेना की इस कार्रवाई को जातीय सफाया करार दिया था । सैनिकों पर रोहिंग्याओं की हत्या और उनके गांव नेस्तनाबूद करने के आरोप लगे थे। इसके उलट सेना ने भी रोहिंग्याओं पर ऐसे ही आरोप लगाए थे। इनमें उत्तरी रखाइन में हिंदुओं के कत्लेआम का मामला भी शामिल है। बाद में संगठन की रिपोर्ट से पुष्टि हुई है कि रोहिंग्याओं ने दो ग्रामों मोंगडाव और मंग सेक में 99 हिंदुओं को मार डाला था। इनमें ज्यादातर महिला और बच्चे थे। संगठन को यह जानकारी इन ग्रामों में किसी तरह बचे रह गए आठ हिंदुओं ने दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने पिछले साल रोहिंग्या मुसलमानों को देश में नहीं रहने देने की नीति पर शीर्ष अदालत में एक हलफनामा देकर साफ कर दिया था कि रोहिंग्या गैर कानूनी गतिविधियों में शामिल हैं। ये अपने साथियों के लिए फर्जी पेनकार्ड, वोटर आईडी और आधार कार्ड उपलब्ध करा रहे हैं। कुछ रोहिंग्या मानव तस्करी में भी शामिल हैं। इन पर इंसानी मांस खाने के भी आरोप हैं। यह मांस खाते हुए ये यूट्यूब पर देखे जा सकते है। देश में करीब 40,000 रोहिंग्या रह रहे हैं, जो सुरक्षा में सेंध लगाने का काम कर रहे हैं। इनमें से कई आतंकवाद में लिप्त हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इनके पाकिस्तान और आतंकी संगठन आईएस से भी संपर्क है। ये संगठन देश में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। देश में जो बौद्ध धर्मावलंबी हजारों साल से शांतिपूर्वक रह रहे हैं, उनके लिए भी ये हिंसा का सबब बन सकते हैं। 2015 में बोधगया में हुए बम विस्फोट में पाकिस्तान स्थित आंतकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने रोहिंग्या मुस्लिमों को आर्थिक मदद व विस्फोटक सामग्री देकर इस घटना को अंजाम दिया था। वैसे भी भारत के किसी भी हिस्से में रहने व बसने का मौलिक अधिकार भारतीय नागरिकों को है, घुसपैठियों को नहीं। किसी भी पीड़ित समुदाय के प्रति उदारता मानवीय धर्म है, लेकिन जब घुसपैठिए देश की सुरक्षा और मूल्य भारतीय समुदायों के लिए ही संकट बन जाएं, तो उन्हें खदेड़ा जाना ही बेहतर है।</p>
<p style="text-align:justify;">गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने संसद में जानकारी दी थी, कि सभी राज्यों को रोहिंग्या समेत सभी अवैध शरणार्थियों को वापस भेजने का निर्देश दिया है। सुरक्षा खतरों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। आशंका जताई गई है कि जम्मू के बाद सबसे ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी हैदराबाद में रहते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें जम्मू-कश्मीर में रह रहे म्यांमार के करीब 15,000 रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान करके उन्हें अपने देश वापस भेजने के तरीके तलाश रही है। रोहिंग्या मुसलमान ज्यादातर जम्मू और साम्बा जिलों में रह रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी तरह आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में 3800 रोहिंग्यों के रहने की पहचान हुई है। ये लोग म्यांमार से भारत-बांग्लादेश सीमा, भारत-म्यांमार सीमा या फिर बंगाल की खाड़ी पार करके अवैध तरीके से भारत आए हैं। आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के अलावा असम, पश्चिम बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर लगभग 40,000 रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जम्मू-कश्मीर देश का ऐसा प्रांत है, जहां इन रोहिंग्या मुस्लिमों को वैध नागरिक बनाने के उपाय तत्कालीन महबूबा मुफ्ती सरकार द्वारा दिए गए थे। इसलिए अलगाववादी इनके समर्थन में उतर आए थे। इसी प्रेरणा से श्रीनगर, जबलपुर और लखनऊ में इनके पक्ष में प्रदर्शन भी हुए थे। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को प्रस्तुत शपथ-पत्र में साफ कहा है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत देश में कहीं भी आने-जाने, बसने जैसे मूलभूत अधिकार नहीं दिए जा सकते हैं। ये अधिकार सिर्फ देश के नागरिकों को ही प्राप्त हैं। इन अधिकारों के संरक्षण की मांग को लेकर रोहिंग्या सुप्रीम कोर्ट में गुहार भी नहीं लगा सकते, क्योंकि वे इसके दायरे में नहीं आते हैं। जो व्यक्ति देश का नागरिक नहीं है, वह या उसके हिमायती देश की अदालत से शरण कैसे मांग सकता है ?</p>
<p style="text-align:justify;">2012 से देश में इन्होंने अवैध तरीकों से प्रवेश किया था। कई ने पैन कार्ड व वोटर आईडी भी बनवा लिए। इसी पहलू के बूते पांच साल से भी ज्यादा वर्षों से रह रहे शरणार्थियों ने भारत सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट से मानवीय आधार पर वापस भेजने की योजना को टालने का अनुरोध किया है। ऐसी परिस्थिति में संयुक्त राष्टÑ और मानवाधिकार संगठन भारत पर दबाव डाल रहे हैं कि वह इन मुसलमानों को योजनाबद्ध तरीके से भारत में बसाने का काम करे।</p>
<p style="text-align:right;">प्रमोद भार्गव</p>
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                <pubDate>Fri, 05 Oct 2018 09:13:11 +0530</pubDate>
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                <title>न्यायपालिका की स्वतंत्रता आवश्यक</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/freedom-of-judiciary-required/article-5012"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/judiciary.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत के अगले होने वाले मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने हाल ही में न्यायपालिका की समस्याओं का विश्लेषण किया और विशेषकर इसलिए भी कि न्यायपालिका में लोगों का अत्यधिक विश्वास है। ऐसे समय में जब राजनीतिक व्यवस्था से लोगों का विश्वास समाप्त हो रहा है संभवतया न्यायपालिका ही एकमात्र ऐसा अंतिम स्तंभ है जिस पर लोग निर्भर रह सकते हैं। तीसरा रामनाथ गोयंका स्मारक व्याख्यान देते हुए न्यायमूर्ति गोगोई ने एक ऐसी न्यायपालिका का पक्ष लिया जो अग्रलक्षी हो तथा न्यायधीश न्याय प्रदान करने मे अग्रणी भूमिका निभा रहे हों। उन्होंने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि मामलों के त्वरित निपटान के माध्यम से न्याय प्रदान करना संभव नहीं हो सका क्योंकि न्यायधीश ऐसे कामगार बन गए जिनके पास साधन नहीं हैं अर्थात बड़ी संख्या में लंबित मामलों के निपटान के लिए अपेक्षित अवसंरचना नहीं है। वस्तुत: आज ऐसी स्थिति बन गयी है कि यदि न्यायपालिका में विशेषकर निचले स्तर पर समुचित सुविधाएं उपलब्ध नहीं करायी गयी तो लोगों का न्यायपालिका में से विश्वास उठ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि न्यायपालिका ने सामाजिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक क्षेत्र में ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं जिससे देश की तस्वीर ही बदल गयी है। भ्रष्टाचार से संबंधित निर्णयों का उच्चतम न्यायालय ने स्वागत किया है और दोषी तथा कुछ राजनेताओं और उच्च पदाधिकारियों को दंडित किया गया है। किसी भी देश में न्यायपालिका संविधान की अभिरक्षक और लोगों के मूल अधिकारों की गारंटीदाता होती है। इसे राज्य का न केवल सबसे पवित्र स्तंभ माना जाता है अपितु ऐसी आधारशिला भी माना जाता है जिस पर सभ्यताओं का विकास होता है। विभिन्न सिद्धान्तों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को स्वीकार किया गया है ताकि सामाजिक समानता, राजनीतिक विकास, शांति और प्रगति सुनिश्चित हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में न्यायपालिका विभिन्न दौरों से गुजरती है और उनमें से एक दौर आवश्यकता के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है जिसमें न्यायापालिका की भूमिका की उपेक्षा की गयी। किंतु न्यायिक आंदोलन के बाद न्यायपालिका की गरिमा बहाल होने लगी। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि न्यायपालिका देश की सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और न्यायधीश इस कार्य में अग्रणी रहते हैं क्योंकि इस संबंध में उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त है। न्यायपालिका द्वारा उठाए गए अनेक कदमों से लोगों में विश्वास बहाल हुआ है कि सरकार का यह अंग कार्यपालिका और विधायिका की तुलना में सर्वोत्तम अंग है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में न्यायालयों में विशेषकर निचले न्यायालयों में मामलों के लंबित रहने का कारण सरकार की उपेक्षा है और सरकार ने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया है। इसका कारण संसाधनों की कमी बताया जा सकता है किंतु लोगों को अब संदेह होने लगा है कि इस उपेक्षा का कारण यह भय है कि मामलों के त्वरित निपटान से सरकार के कुकृत्यों का पदार्फाश होगा। हाल के वर्षों में न्यायिक सक्रियता बढ़ी है और इसके बारे में अनेक प्रश्न उठे हैं। किंतु कानूनी विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि ऐसा दृष्टिकोण आवश्यक है और समाज के हित में है। तथापि न्यायालयों को इस बात को ध्यान में रखना होगा कि वे अपनी न्यायिक कृत्यों की सीमा का उल्लंघन न करें और कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्रों में अतिक्रमण न करें।</p>
<p style="text-align:justify;">तथापि संवैधानिक और सांविधिक उपबंधों के उल्लंघन के मामलों में न्यायपालिका द्वारा हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई ऐसा नीतिगत निर्णय लिया जाता है जिसका किसी कानून के साथ टकराव हो या जो लोक हित में न हो तो न्यायालय को इस पर विचार करना चाहिए। हालांकि यह कार्यपालिका का क्षेत्र है। जब एक से अधिक विकल्प उपलब्ध हों और सरकार उनमें से कोई निर्णय नीतिगत निर्णय लेती हो तो न्यायालयों को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और ऐसे नीतिगत मामलों में अपील लटकानी नहीं चाहिए। इसका उदाहरण बाल्को बनाम भारत संघ 2002 है। न्यायालयों द्वारा न्याय निर्णयन के लिए जो भी मार्ग अपनाया जाएं वह न्यायिक सिद्धान्तों के अनुरूप हो। आज न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस संस्था पर अधिक ध्यान देने और समाज में स्वतंत्रत भूमिका निभाने की है। निचली अदालतों में अवसंरचना में सुधार के लिए अधिक धनराशि की आवश्यकता है। फास्ट टैÑक न्यायालयों की स्थापना की जानी चाहिए और राज्यों की राजधानी से अलग अन्य शहरों मे उच्च न्यायालयों की पीठ स्थापित की जानी चाहिए। न्यायालयों को त्वरित न्याय देना चाहिए और इसे लोगों की पहुंच में रहना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा माना जाता है कि धनी और प्रभावशाली लोग निचली अदालतों में सौदेबाजी करते हैं और इस आशंका को दूर किया जाना चाहिए। देश सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर आगे बढ़ रहा है इसलिए आम आदमी को यह आश्वासन दिया जाना चाहिए कि न्यायपालिका धन, बल बाहुबल या किसी अन्य शक्ति द्वारा प्रभावित नहीं की जा सकती है और इसके लिए उच्च न्यायपालिका को जिला और उपमंडल न्यायालय पर निगरानी रखनी चाहिए। इसके अलावा न्यायिक अधिकारियों और न्यायधीशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के कथित आरोपों की गंभीरता से जांच की जानी चाहिए। राजनेताओं और नौकरशाहों में भ्रष्टाचार आम बात है। किंतु न्यायपालिका के बारे में ऐसी धारणा नहीं है। लोगों को विश्वास है कि न्यायपालिका बिना किसी भय या पक्षपात के न्याय प्रदान करेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि न्यायिक सक्रियता बढने का कारण सरकार का अकुशल कार्यकरण और विभिन्न क्षेत्रों में नीतियों और नियमों का लागू न होना है। न्यायपालिका की पहुंच बढ़ायी जानी चाहिए ताकि लोगों को न्याय मिल सके। यदि तथाकथित न्यायिक सक्रियता का समुचित विश्लेषण किया जाए तो यह सामाजिक न्याय की दृष्टि से उचित नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा माना जाता है कि आगामी वर्षों में सामाजिक आर्थिक बदलाव और समाज को सुदृढ़ करने में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी और यह न्याय, समानता और भ्रातृत्व के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेगी। तथापि सबसे बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है कि क्या न्यायपालिका अपनी वास्तविक स्वतंत्रता बनाए रखेगी या नहीं। इस संदर्भ में पूर्व मुख्य न्यायधीश आरएम लोढ़ा के ये शब्द उल्लेखनीय हैं मुझे विश्वास है कि देश में सुदृढ कानून का शसन होगा क्योंकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोगों के मन में विश्वास पैदा करती है कि देश में न्यायपालिका है और यदि कार्यपालिका या किसी अन्य द्वारा उनके साथ कुछ गलत किया जाता है तो न्यायपालिका उनके बचाव के लिए आगे आएगी।</p>
<p style="text-align:left;">धुर्जति मुखर्जी (इंफा)</p>
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                <pubDate>Wed, 25 Jul 2018 15:14:40 +0530</pubDate>
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                <title>गंगा स्वच्छता: पहल ही नहीं, सख्ती भी आवश्यक</title>
                                    <description><![CDATA[सेंट्रल पॉल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा सफाई पर विभिन्न परियोजनाओं के मद में लगभग 20 हजार करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा चुके हैं। फिर आज क्या हम इस स्थिति में पहुंचे है कि गंगा को स्वच्छ नदी का दर्जा दे सकें? विडंबना यह है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण जैसी संस्था […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ganga-hygiene-not-only-initiative-but-also-strictly-required/article-2412"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/ganga1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सेंट्रल पॉल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा सफाई पर विभिन्न परियोजनाओं के मद में लगभग 20 हजार करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा चुके हैं। फिर आज क्या हम इस स्थिति में पहुंचे है कि गंगा को स्वच्छ नदी का दर्जा दे सकें? विडंबना यह है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण जैसी संस्था गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए समय-समय पर चिंतित और प्रयासरत है,</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन दुर्भाग्यवश सामाजिक और राजनीतिक सरोकार की कमी की वजह से गंगा अभी भी अस्वच्छ है। कागजी आंकड़ों पर भी आज तक हमारी सरकारें यह बाताने को तैयार नहीं है कि गंगा कितनी स्वच्छ और निर्मल हुई?</p>
<p style="text-align:justify;">गंगा मंत्रालय का गठन बस दिखावा और छलावा ही साबित हो रहा है। सबसे बड़ी बात, जब तक गंगा की सफाई को लेकर सामाजिक सरोकारिता से जुड़े लोग और सामान्य जनमानस कदम उठाता प्रतीत नहीं होगा, गंगा की पूर्ण रूप से सफाई नहीं हो सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार पुन: गंगा को निर्मल बनाने के लिए राष्टÑीय हरित प्राधिकरण ने फैसला लिया है कि गंगा में हरिद्वार से उन्नाव के बीच कचरा फैंकने वालों पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाए, लेकिन विचारणीय तथ्य यह है कि जुर्माना लगाने का यह खेल नया तो नहीं है! जुर्माना पहले भी लगता आया है, लेकिन किसी सरकार या संस्था ने यह जहमत नहीं उठाई कि कितना जुर्माना वसूला गया और इस कदम से गंगा स्वच्छ कितनी हुई। यह आज तक पता नहीं चला।</p>
<p style="text-align:justify;">नदियों पर हमारा कल निर्भर करता है, जिसके प्रति हमारे समाज में शनै:-शनै: जागरूकता फैल रही है, लेकिन बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चिंता व्यक्त की थी, वह यह दिखाती है कि केंद्र की राजग सरकार नदियों के संरक्षण की दिशा में सचेत है।</p>
<p style="text-align:justify;">नदियों के प्रति हमें और हमारे समाज को ही नहीं, बल्कि कल-कारखानों को संचालित करने वालों को भी स्वच्छ बनाए रखने की दिशा में कार्य करना होगा, कुछ स्वार्थ पूर्ति की खातिर आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय करना कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नर्मदा के उद्गम स्थल से बीते दिनों देश के प्रधानमंत्री ने नदियों के भविष्य को लेकर जो चिंता की लकीर खींची थी, उससे लगता है कि अब वक्त की मांग है कि समाज द्वारा नदियों को बचाने के लिए सार्थक विचार-विमर्श हो।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ वर्ष पूर्व केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा था कि देश के लगभग नौ सौ से ज्यादा कस्बों और शहरों का अमूमन 70 फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। फिर यह देश का दुर्भाग्य है कि देश आने वाले समय की चिंता छोड़कर मात्र वर्तमान दौर की लड़ाई में आंखें मूंदकर आगे बढ़ रहा है। सबसे बड़े स्तर पर कारखाने और मिल नदियों की जान के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह हमारे समाज के समक्ष विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिन नदियों को हम मां का दर्जा देते हैं, उन्हें ही हमने हमने मल-मूत्र विसर्जन का अड्डा बनाकर रख दिया है। नदियों में सीवरेज छोड़ने की वजह से नदियां आज नालों के रूप में रूपांतरित होती जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर देश की 70 फीसद नदियां प्रदूषित हैं और मरने के मुहाने पर खड़ी हैं, फिर इनको बचाने के लिए धरती पर एक बार फिर किसी को भागीरथ बनना होगा, और यह काम हमारे नीति-नियंता से अच्छा कोई और नहीं कर सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार फिर राष्टÑीय हरित प्राधिकरण का यह फैसला काफी सराहनीय है कि गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए 100 मीटर के क्षेत्र को ‘नो डेवलपमेंट जोन’ घोषित कर दिया जाए। यह घोषणा तब और अधिक कारगर सिद्ध होगी, जब स्थानीय प्रशासन और सरकारी रहनुमाई तंत्र के लोग अपने हितों को त्याग दें। इसलिए सर्वप्रथम आवश्यकता है कि सामाजिक सरोकार की दृष्टि को पैदा करना, जो धीरे-धीरे समाज से स्वहित के कारण गुम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ हरिद्वार से उन्नाव के मध्य गंगा नदी के किनारे 500 मीटर तक कचरा फैंकने पर 50 हजार का जुर्माना ठोकने की बात कही गई है, लेकिन हमारे देश में मात्र अगर फरमान जारी होने पर लोग सुधर जाते, तो आज देश की स्थिति कुछ ओर होती। इसलिए सर्वप्रथम समाज के लोगों को अपनी सामाजिक जिम्मेवारियों के प्रति वफादार होना पड़ेगा, तभी कुछ सकारात्मक पहल अंजाम तक पहुंच सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-महेश तिवारी</strong></p>
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                <pubDate>Tue, 18 Jul 2017 01:48:45 +0530</pubDate>
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