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                <title>Social - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Supreme Court : उम्मीदवारों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी दे राजनीतिक दल</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जताते हुए कहा कि पिछले 4 आम चुनावों में दागी उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/detail-candidates-criminal-history-on-sites-social-media-supreme-court/article-13011"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/nirbhaya-case-supreme-court-dismisses-akshays-curative-petition.jpg" alt=""></a><br /><h3>प्रत्याशियों के खिलाफ दायर मामलों की जानकारी अगले 72 घंटे में जाए |<strong>Supreme Court</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली(एजेंसी)।</strong> सुप्रीम कोर्ट <strong>(Supreme Court)</strong> ने राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जताते हुए कहा कि पिछले 4 आम चुनावों में दागी उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी है। कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव सुधारों को लेकर अहम फैसले में कहा- सभी राजनीतिक दल अपनी वेबसाइट पर आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों के चयन की वजह बताएं और उनके खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी अपलोड करें। साथ ही प्रत्याशियों के खिलाफ दायर मामलों की जानकारी अगले 72 घंटे में चुनाव आयोग को दी जाए।</p>
<h2>राष्ट्रीय अखबारों में प्रकाशित कराएं और फेसबुक-ट्विटर पर भी करें साझा</h2>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस एफ नरीमन की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि आदेश का पालन न होने पर चुनाव आयोग अपने अधिकार के मुताबिक राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई करे। साथ ही पार्टियां प्रत्याशियों के आपराधिक मामलों की जानकारी क्षेत्रीय-राष्ट्रीय अखबारों में प्रकाशित कराएं और फेसबुक-ट्विटर पर भी साझा करें। भाजपा नेता और वकील अश्वनी उपाध्याय ने राजनीति में अपराधीकरण रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने 2 माह पहले भी आदेश दिया था</h2>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने 25 नवंबर को चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए आदेश पारित करे। ताकि तीन महीने के अंदर राजनीतिक दलों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को टिकट देने से रोका जा सके। तब सीजेआई एसए बोबडे और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए यह आदेश दिया था। उपाध्याय की मांग थी कि पार्टियों को अपराधिक छवि वाले लोगों को चुनाव के टिकट देने से रोका जाए। साथ ही उम्मीदवार का आपराधिक रिकॉर्ड अखबारों में प्रकाशित कराने का आदेश दिया जाए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">जनहित याचिका में क्या था ?</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार भारत में राजनीति के अपराधीकरण में बढ़ोतरी हुई है।</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>और 24% सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>2009 के लोकसभा चुनाव में 15% प्रत्याशियों  ने आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>इन प्रत्याशियों में से 610 या 8% के खिलाफ गंभीर अपराध के मामले दर्ज थे।</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong> इसी तरह, 2014 में 8,163 प्रत्याशियों में से 1398 ने आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी ।</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>और इसमें से 889 के खिलाफ गंभीर अपराध के मामले लंबित थे।</strong></li>
</ul>
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<p>Detail, Candidates, Criminal, History, Sites, Social, Media, Supreme Court</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Feb 2020 12:11:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वकील को भारी पड़ गया सीएए का समर्थन, हुआ सामाजिक बहिष्कार!</title>
                                    <description><![CDATA[इमाम बोले-झगड़े का कारण दीन की बात | Social boycott मुरादाबाद (एजेंसी)। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में नागरिकता संशोधन अधिनियम और एनआरसी का समर्थन एक वकील का महंगा पड़ गया। दरअसल वकील सीएए और एनआरसी का विरोध करने वालों को समझा रहा था। इस पर लोगों ने पहले उसे पीटा। फिर उसका हुक्का पानी बंद […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/social-boycott-of-lawyer-for-supporting-caa/article-12568"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/social-boycott.jpg" alt=""></a><br /><h2>इमाम बोले-झगड़े का कारण दीन की बात | <span lang="en" xml:lang="en">Social boycott</span></h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>मुरादाबाद (एजेंसी)।</strong> उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में नागरिकता संशोधन अधिनियम और एनआरसी का समर्थन एक वकील का महंगा पड़ गया। दरअसल वकील सीएए और एनआरसी का विरोध करने वालों को समझा रहा था। इस पर लोगों ने पहले उसे पीटा। फिर उसका हुक्का पानी बंद कर सामाजिक बहिष्कार (<span lang="en" xml:lang="en">Social boycott</span>) कर दिया गया। परेशान होकर पीड़ित ने पुलिस से न्याय की गुहार लगाई है। पुलिस मामले की जांच कर रही है। जिले के मूंढापांडे क्षेत्र के गांव सिरस खेड़ा निवासी अधिवक्ता इदरीस अहमद ने पुलिस को शिकायत दी। शिकायती पत्र में उसने लिखा कि सिरसखेड़ा की चांद मस्जिद के इमाम अनीश मियां सीएए और एनआरसी के मुद्दों पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उसने आरोप लगाया कि जब उसने इमाम को ऐसा करने से रोका तो लोगों के साथ मिलकर उससे मारपीट की। इतना ही नहीं, अब उनका हुक्का पानी बंद कर दिया है। और उसके पूरे परिवार सहित सामाजिक और धार्मिक बहिष्कार भी कर दिया। इमाम ने गांव वालों को वकील के परिवार से बातचीत करने से भी मना किया है। इदरीश और उनके परिवार पर मस्जिद में नमाज पढ़ने और बाजार से सामान खरीदने तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया।</p>
<ul>
<li><strong>सामाजिक बहिष्कार के लिए बोले जाने का एक ऑडियो भी इदरीश ने कराया उपलब्ध </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>भरी पंचायत उसके परिवार का बहिष्कार का ऐलान कर रहे जामा मस्जिद के इमाम शाहिद </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>पीड़ित ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।</strong></li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">इमाम की दलील है</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>झगड़े की बात सही है, लेकिन झगड़े का कारण सीएए या एनआरसी नहीं।</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>झगड़े का कारण दीन की बात को लेकर है, जो काफी दिनों से चला आ रहा है। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>इमाम ने भी इदरीश के बेटे पर मारपीट का आरोप लगाया है।</strong></li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">पुलिस बोली</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>सामाजिक बहिष्कार संबंधी शिकायत मिली मिली है। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>प्रथम दृष्टया मामला आपसी झगड़े का दिखाई दे रहा है। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>जांच की जा रही है, जो भी तथ्य समाने आएंगे, उसी आधार पर कार्रवाई की जाएगी।</strong></li>
</ul>
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                <pubDate>Sat, 18 Jan 2020 11:42:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मीडिया की लाइमलाइट में रहने के लिए सोशल मीडिया पर सरकार को घेरते हैं अशोक खेमका !</title>
                                    <description><![CDATA[अशोक खेमका ने अपने 53वें तबादले से परेशान होकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा सच कहूँ/अनिल कक्कड़ चंडीगढ़ । टविटर पर अक्सर सरकार को घेरने वाले सीनियर आईएएस अधिकारी अशोक खेमका (Ashok Khemka) बेशक 53वां ट्रांसफर झेल चुके हैं और इससे वे अक्सर मीडिया में चर्चा का केंद्र भी रहते हैं लेकिन प्रदेश के अन्य सीनियर […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/ashok-khemka-surrounds-the-government-on-social-media/article-11829"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/ias-ashok-khemka.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:left;">अशोक खेमका ने अपने 53वें तबादले से परेशान होकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ/अनिल कक्कड़</strong><br />
<strong>चंडीगढ़ ।</strong> टविटर पर अक्सर सरकार को घेरने वाले सीनियर आईएएस अधिकारी अशोक खेमका <strong>(<span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">Ashok Khemka</span></span>)</strong> बेशक 53वां ट्रांसफर झेल चुके हैं और इससे वे अक्सर मीडिया में चर्चा का केंद्र भी रहते हैं लेकिन प्रदेश के अन्य सीनियर आईएएस अधिकारी खेमका के इन कारनामों को अलग तरीके से देखते हैं। वे मानते हैं अशोक खेमका ईमानदार हैं लेकिन मीडिया की लाइमलाइट के लिए शायद वे रास्ता भटक गए हैं। बता दें कि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने अपने 53वें तबादले से परेशान होकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाख खट्टर को पत्र लिखा।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>खेमका ने अपने पत्र में कहा कि दब्बू अधिकारी तो फलते-फूलते हैं, जबकि ईमानदार को मामूली भूमिकाएं दी जाती हैं।</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong> तीन दशक में खेमका का यह 53वां तबादला था। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>वर्ष 1991 बैच के अधिकारी ने खट्टर से उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने देने की अनुमति देने को कहा है।</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong> हरियाणा सरकार ने पिछले महीने खेमका का तबादला विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से अभिलेखागार विभाग में कर दिया था। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>खेमका ने लिखा है, ‘दब्बू और भ्रष्ट अधिकारी सक्रिय सेवा के दौरान खूब फलते-फूलते हैं।</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें पुरस्कार दे दिया जाता है।</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong> जबकि ईमानदार को छोटे और मामूली काम सौंपे जाते हैं।</strong></li>
</ul>
<h3>मुख्य सचिवालय के गलियारों में अक्सर अशोक खेमका की चर्चा</h3>
<p style="text-align:justify;">वहीं मुख्य सचिवालय के गलियारों में अक्सर अशोक खेमका की चर्चा होती है और ज्यादातर सीनियर आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के स्टैंड से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका मानना है कि अशोक खेमका को मीडिया अटैंशन के लिए बस एक ट्विट करने की जरूरत है। अधिकारियों का यह भी मानना है कि एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को कोई भी जिम्मेदारी दी जाती है तो वह उसे पूरी तरह निभाए, कुछ बेहतर करके दिखाए। और वहीं यदि कोई गड़बड़ नजर आती है तो उसे विभागीय स्तर पर चिट्ठी द्वारा या मीटिंग द्वारा बताया जाना चाहिए न कि सीधा मीडिया में उसे उछाला जाए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">खेमका ईमानदार हैं सरकार को उनकी सुननी चाहिए: विज</h2>
<p style="text-align:justify;">वहीं आईएएस खेमका के लिए प्रदेश के गृह मंत्री ने कहा कि वे ईमानदार हैं। अगर वे कोई सुझाव देना चाहते हैं या उनकी कोई शिकायत है तो सरकार को उनकी सुननी चाहिए। विज का इशारा मुख्यमंत्री मनोहर लाल की ओर था। हालांकि पीएम से मांगे गए समय पर उन्होंने कहा कि पहले उन्हें प्रदेश सरकार से बात करनी चाहिए।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Dec 2019 12:16:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोगों की जान ले रहा सोशल मीडिया</title>
                                    <description><![CDATA[महाराष्ट्र के धुले जिले में भीड़ द्वारा पांच लोगों की हत्या की गयी/Social Media पूनम आई कौशिश: सोशल मीडिया  (Social Media ) जान लेता है और कैसे? भीड़ द्वारा हत्याएं पुन: राजनीतिक और सामाजिक सुर्खियों में आ गयी हैं । भीड़ द्वारा महाराष्ट्र, कर्नाटक, त्रिपुरा, आंध्र, तेलंगाना, गुजरात और पश्चिम बंगाल सहित असम से लेकर तमिलनाडू तक […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/peoples-life-taking-social-media/article-4767"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/social-media.jpg" alt=""></a><br /><h2><strong>महाराष्ट्र के धुले जिले में भीड़ द्वारा पांच लोगों की हत्या की गयी/Social Media</strong></h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>पूनम आई कौशिश:</strong> सोशल मीडिया  (<strong>Social Media ) </strong>जान लेता है और कैसे? भीड़ द्वारा हत्याएं पुन: राजनीतिक और सामाजिक सुर्खियों में आ गयी हैं । भीड़ द्वारा महाराष्ट्र, कर्नाटक, त्रिपुरा, आंध्र, तेलंगाना, गुजरात और पश्चिम बंगाल सहित असम से लेकर तमिलनाडू तक नौ राज्यों में 17 मामलों में 27 निर्दोष लोगों की हत्या की गयी। इन मामलों में भीड़ पुलिस से भी तेजी से कार्यवाही करती है और अधिकारी प्रौद्योगिकी के माध्यम से ऐसी हत्याओं को रोकने के लिए तौर-तरीकों को नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के धुले जिले में भीड़ द्वारा पांच लोगों की हत्या की गयी और इसका कारण व्हाट्स ऐप पर बच्चों की खरीद-फरोख्त की झूठी अफवाह थी। जिसके चलते भीड़ ने इन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी। कुछ राज्यों ने ऐसी अफवाहों से आगह करने के लिए कुछ लोगों की सेवाएं ली हैं जो लाउडस्पीकर लेकर गांव-गांव जा रहे हैं और झूठी खबरों के खतरों के बारे में लोगों को बता रहे हैं। ये राज्य ऐसी हिंसा पर नियंत्रण लगाना चाहते हैं। इन घटनाओं से दुखी उच्चतम न्यायालय ने भीड़ द्वारा ऐसी हत्याओं को सभ्य समाज में अस्वीकार्य अपराध बताया है और कहा है कि कोई भी कानून को अपने हाथ में नहंी ले सकता है और ऐसी घटनाओं पर रोक की जिम्मेदारी राज्यों पर डाली है।</p>
<h2>राज्यों को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दिशा-निर्देश बनाने चाहिए/ <strong>Social Media</strong></h2>
<p style="text-align:justify;">न्यायालय ने कहा है कि राज्यों को ऐसी घटनाओं को रोकने ओर पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए दिशा-निर्देश बनाने चाहिए। न्यायालय गोरक्षकों पर नियंत्रण लगाने के लिए दिशा-निर्देश बनाने के संबंध में निर्देश देने की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह बताता है कि स्थानीय गुप्तचर सेवा कितनी अप्रभावी है। वह पुलिस को तनाव या भावी हमले के बारे में आगह नहंी कर पाती। यह सेवा ऐसे समूहों के पास हथियारों और उनमें शामिल व्यक्तियों के बारे में सूचना जुटाने में भी सक्षम नहीं है। ऐसी हत्याएं हमारी व्यवस्था की कमजोरी का संकेत है और यह बताता है कि देश में कानून का पालन नहीं हो रहा है। देश में घृणा और आक्रोश का एक नया पंथ स्थापित हो गया है। गुंडागर्दी द्वारा मौत और जघन्य अपराध किए जा रहे हैं और हम ऐसे तत्वों के बंदी बन गए हैं। यदि समय पर हस्तक्षेप किया जाता तो भीड़ द्वारा ऐसी हत्याओं को रोका जा सकता था। भीड़ द्वारा ऐसा उपद्रव कोई नई बात नहीं है और कुछ राज्यों में सत्तारूढ दल इसका उपयोग राजनीतिक साधन के रूप में कर रहे हैं और कई बार इसका उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है और कई बार अपनी राजनीतिक सत्ता को बचाए तथा अपने समर्थकों को बचाने के लिए ऐसी घटनाओं को नजदरंदाज किया जाता है।</p>
<h2>उत्तर प्रदेश के दादरी में एक मुसलमान की भीड़ द्वारा हत्या/ <strong>Social Media</strong></h2>
<p style="text-align:justify;">पिछले तीन वर्षों में ऐसी अनेक घटनाएं हुई। उत्तर प्रदेश के दादरी में एक मुसलमान की इस अफवाह के बाद भीड़ द्वारा हत्या कर दी गयी कि उसके फ्रिज में गोमांस है। उसके बाद गुजरात के उना में गोरक्षकों द्वारा चार दलितों की हत्या कर दी गयी। अलवर में गो की तस्करी के संदेह में पहलू खान और फरीदाबाद में जुनैद की हत्या की गयी। देश में गोहत्या और गोमांस भक्षण के मुद््दे पर ऐसी अनेक घटनाएं हुई। फिर प्रश्न उठता है कि क्या हमारे देश में अभी भी कानून का शासन है। हम भीड़ द्वारा हिंसा के बारे में इतने उदासीन क्यों हैं? ये उपद्रवी समाज और प्राधिकारियों से आगे कैसे बढ जाते हैं? हमारा समाज नैतिक दृष्टि से इतना भ्रष्ट कैसे बन गया कि ऐसी घटनाएं होने लग गयी। क्या हम ऐसी घटनाओं को पसंद करते हैं? कल तक गोरक्षकों द्वारा गोमांस को लेकर लोगों की हत्या की जा रही थी आज अफवाहों को लेकर ऐसी घटनाएं हो रही हैं और अब लगता है कि हमें हर समय अपने पहचान पत्र साथ में रखने चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">30 करोड़ से अधिक लोगों के पास व्हाट्स ऐप सुविधा/ <strong>Social Media</strong></h2>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में 100 करोड से अधिक सक्रिय मोबाइल फोन कनेक्श्न हैं और 30 करोड़ से अधिक लोगों के पास व्हाट्स ऐप सुविधा है। इसलिए सरकार को कोई उपाय नहंी सूझता कि वह झूठी खबरों के आधार पर किस तरह हिंसा पर अंकुश लगाए। ऐसी हिंसा पर अंकुश लगाना स्थानीय प्राधिकारियों पर छोड़ दिया जाता है। चेतावनी जारी की जाती हैं और गांव गांव जाकर जन जागरण का प्रयास किया जाता है। किंतु यह पर्याप्त नहंी है। जबकि सरकार दावा करती है कि वह भरसक प्रयास कर रही है। साथ ही सरकार को बलि के बकरे के रूप में व्हाट्स ऐप मिल गया है और वह व्हाट्स ऐप से कहती है कि वह ऐसे संदेशों पर रोक लगाए। इससे पता चलता है कि सरकार का दृष्टिकोण कितना अनुचित है और उसे आधुनिक संदेश भेजने वाले साधनों की समझ नहीं है। साथ ही सरकार ऐसी जघन्य हत्याओं के मामले में व्यापक मुद्दों का निराकरण करने में भी विफल ही है। भीड़ द्वारा हत्याएं कानून और व्यवस्था की समस्याएं हैं। किंतु उसके तीन मुख्य कारण हैं। पहला, जाति और पंथ पहचान। दूसरा, न्यायालय द्वारा भीड़ द्वारा हिंसा करने वालों को दंडित न किया जाना जहां पर राज्य के प्राधिकारी उपस्थित भी होते हैं, वे भीड़ को चुनौती देने में सक्षम नहीं होते हैं और तीसरा, कानून को लागू करने वाले हिंसा में भागीदार बन जाते हैं। कानून का शासन कमजोर हो गया है और इसका उदाहरण गोमांस पर प्रतिबंध लगाने के बारे में भीड़ द्वारा हिंसा है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">2019 के चुनावों के निकट आते हुए व्हाट्स ऐप ने अपना विस्तार कर दिया/ <strong>Social Media</strong></h2>
<p style="text-align:justify;">विडंबना देखिए। 2019 के चुनावों के निकट आते हुए व्हाट्स ऐप ने अपना विस्तार कर दिया है। राजनीतिक दल हजारों व्हाट्स ऐप वारियर को भर्ती कर रहे हैं जो कई मामलों में आपत्तिजनक संदेश फैलाते हैं। किंतु साथ ही सरकार और राजनीतकि दलों को सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफार्मों द्वारा दी जा रही सूचनाओं की सत्यता के बारे में जानने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके अलावा पुलिस बल को ऐसे क्षेत्रों की पहचान कर प्रभावी उपाय करने चाहिए और गलत सूचनाओं के संबंध में तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए। पुलिस बल को समाज में जागरूकता पैदा करनी चाहिए, उसका विश्वास जीतना चाहिए तथा भीड़ द्वारा हिंसा पर रोक लगानी चाहिए तथा अपहरणकतार्ओं आदि जैसे मुद््दों पर लोगों के भय को दूर करना चाहिए। भीड़ द्वारा हत्या के मामले में व्हाट्स ऐप को दोषी बताना बताता है कि सरकार नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मदोरियों को न निभाने का प्रयास कर रही है। वह जनता से जुड़ने के अवसर को भी खो रही है और दुष्प्रचार की समस्या और इस पर अंकुश लगाने के उपायों को नहीं समझ पा रही है। आशा की जाती है कि सरकार प्रौद्योगिकी कंपिनयों के साथ सहयोग कर प्रौद्योगिकी के प्रयोग से इस पर अंकुश लगाने के नए उपाय ढूंढेगी। किंतु यह तभी संभव है जब सरकार इस चुनौती का सामना करने के लिए इच्छाशक्ति दिखाए।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Jul 2018 02:40:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>अफवाहों व सोशल मीडिया का दुरुपयोग बन रहे तनाव का कारण</title>
                                    <description><![CDATA[अनपढ़ता और अफवाहें जब मिल जाएं तो यह उथल-पुथल मचा देती हैं। सोशल मीडिया ने अफवाहों को पंख लगा दिए हैं। असम में दो युवाओं को बच्चे उठाने वाले समझकर गांववासियों ने पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया। पिछले कई दिनों से असम में बच्चों को उठाने संबंधी अफवाहें फैल रहीं थी। दूसरी तरफ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">अनपढ़ता और अफवाहें जब मिल जाएं तो यह उथल-पुथल मचा देती हैं। सोशल मीडिया ने अफवाहों को पंख लगा दिए हैं। असम में दो युवाओं को बच्चे उठाने वाले समझकर गांववासियों ने पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया। पिछले कई दिनों से असम में बच्चों को उठाने संबंधी अफवाहें फैल रहीं थी। दूसरी तरफ प्रशासन व पुलिस तंत्र इतना सुस्त है कि ऐसी अफवाहों पर तब ध्यान देता है जब कोई बड़ा हादसा घटित हो जाए। पिछड़ापन इतना ज्यादा है कि जनता और प्रशासन के बीच बड़ी खाई पैदा हो गई है। (Artical)</p>
<p style="text-align:justify;">खासकर बंगाल, बिहार, उड़ीसा जैसे राज्यों में ग्रामीण क्षेत्र अनपढ़ता व अफवाहों के कारण बदतर परिस्थितियों से गुजर रहा है। पिछले महीनों में चोटी काटने की अफवाहों ने तब कई जानें ले ली जब किसी अज्ञात वृद्ध महिला की तरफ से चोटी काटने की अफवाह फैला दी गई। सोशल मीडिया ने ऐसी अफवाहों का प्रभाव कई गुणा बढ़ा दिया। सोशल मीडिया बुरा नहीं पर इसका दुरुपयोग बुरा है। यह प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह समझाए की मीडिया की आजादी व समाज की सुरक्षा के बीच किस तरह संतुलन रखना है।</p>
<p style="text-align:justify;">नि:सन्देह अफवाहें फैलाने वालों के खिलाफ कानूनन सजा का प्रावधान है लेकिन सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वालों की बड़ी गिनती इन कानूनों से ही अनभिज्ञ है। सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने संबंधी ऐसा कोई प्रबंध होना चाहिए कि इंटरनेट का कनैक्शन देने या मोबाइल फोन की खरीदारी के समय कानून संबंधी जानकारी लिखित रूप में दी जाए ताकि लोगों में जागरुकता के साथ-साथ कानून का भय भी पैदा हो। (Artical)</p>
<p style="text-align:justify;">कई पिछड़े क्षेत्रों में अनपढ़ता के कारण हिंसा इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि लोग आरोपी को कानून के हवाले करने की बजाय कबीलाई सोच अपनाकर सजा देने लगे हैं। कई जगहों पर निर्दोष व्यक्तियों को चोर समझकर मार दिया गया। भड़की जनता बेगुनाह लोगों की जान ले लेती है। भीड़ पर कोई कार्रवाई नहीं होती, मामला रफा-दफा हो जाता है। भीड़ की आड़ में असामाजिक तत्व अपराध कर जाते हैं। ऐसी घटनाएं भारतीय सभ्यता, कानून और सरकार के नाम पर कलंक हैं। इस विष य में प्रभावी शिक्षाा व कानून व्यवस्था के प्रबंध किए जाने आवश्यक हैं। (Artical)</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 Jun 2018 09:36:40 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>गौरक्षा को बनाया जाए सामाजिक मुद्दा</title>
                                    <description><![CDATA[गौवंश से होने वाले हादसों का मामला सच में ही गम्भीर है और इस पर विचार होना जरूरी भी है। जहां सड़कों पर घूमता बेपनाह गौवंश परेशानी का सबब है वहीं गौशालाओं में भी बीमारी की मार झेल रहा है। ऐसी हालत में आखिर पशु क्या करें।गौवंश को अवारा कह कर पुकारने वालो से मैं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/social-issues-to-be-made-in-gorkha/article-3501"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/cow.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गौवंश से होने वाले हादसों का मामला सच में ही गम्भीर है और इस पर विचार होना जरूरी भी है। जहां सड़कों पर घूमता बेपनाह गौवंश परेशानी का सबब है वहीं गौशालाओं में भी बीमारी की मार झेल रहा है। ऐसी हालत में आखिर पशु क्या करें।गौवंश को अवारा कह कर पुकारने वालो से मैं एक सवाल करना चाहता हूं कि इनकी इस हालत का जिम्मेवार कौन है? गांवो से शहर में धकेल दिये गये इस गौवंश को कौन सम्भाले यह एक बड़ा सवाल है। हादसों के बाद ठीकरा प्रशासन के सिर पर फूटता है, क्योंकि या तो यह किसी हादसे का शिकार होते हैं या इनके करण कोई हादसे का शिकार होता हैं। हरियाणा के हर बाजार में 20 से 30 के झुण्ड में घूम रहे इस गौवंश की पनाह का स्थाई हल ढूंढना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हर शहर व आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी संख्या 2000 तक भी हो सकती है, ऐसा भी अनुमान है। अगर यह अनुमान ठीक है तो 50000 से 100000 बेपनाह पशु हरियाणा की सड़कों पर हैं। बेपनाह पशु तो एक समस्या है, पर उनकी लगातार बढ़ती संख्या इस समस्या को और उलझाती जा रही है। ज्ञात रहे कि ये जंगल में अपनी संख्या नहीं बढ़ा रहे, गोपालक जो आप और हम है, इस बढ़ती हुई जनसंख्या के जिम्मेदार है। गौपालक गौवंश का पालन करते और दूध पीने के लालच में पहले बछड़ों को घर से बाहर धकेल देते हैं और दूध पीकर गाय को धकेल देते है। नन्दियों की संख्या शहरों में बढ़ती जा रही है, क्योंकि गांव में जब ये खेतों का नुक्सान करते लोग इन्हें शहरों और मण्डियों में धकेल देते है। कैसी मूर्खता है नील गाय, हिरण, खरगोश जैसे वन्य जीव सैकड़ों की संख्या में विचरण करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन पर हमारा कोई जोर नहीं, पर गौवंश को हम अपनी हदों से बाहर धकेल देते हैं।इस समस्या का हल इन्हें गौशालाओं में बंद करने से नहीं होगा, इन्हें अपनाने की सोच से आयेगा। अगर हर मन्दिर, हर गांव, हर बड़ा जमींदार एक गौवंश को अपना ले तो यह बेपनाह सड़कों से हटकर सम्मान सहित जीवन जी लेंगे, दूसरी ओर पशुपालन विकास अगर तुरन्त प्रभाव से गौपालकों की शिनाख्त करे और गौवंश के जन्म पर उनका रिकार्ड रखे, गायब होने पर जवाब-तलब करे तो वह दिन दूर नहीं जब समस्या का हल हो जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ हो गौवंश के मलमूत्र से होने वाले लाभ पर हर गांव में स्वास्थ्य चर्चा हो। ग्रामीणों को कम्पोस्ट बनाना सिखाया जाए, तो लोग गौवंश को घरों से बाहर नहीं धकेलेंगे। क्योंकि अधिकतर गौवंश को बाहर इसलिए धकेल दिया जाता है, क्योंकि दूध की कमी के कारण उनसे कोई आर्थिक लाभ नजर नहीं आता और लोग उसे बोझ समझने लगते हैं। अगर गौवंश से होने वाले लाभ की जानकारी लोगों तक पहुंचे तो वह इन्हें जरूर अपनाएंगे। सरकार व सामाजिक संगठनों को चाहिए कि जीवन दायिनी गाय पर चर्चा आरम्भ करें और गौरक्षा को एक सामाजिक मुद्दा बनाये और ऐसे प्रयास किए जायें कि लोग जान सके कि गाय एक सस्ता सुलभ स्वस्थदायिक जीव है। आओ सब मिलकर प्रयास करें,गौवंश पर लगे आवारा के धब्बे को,मिटाकर अपनाने का प्रयास करे,जब कभी ‘‘कल’’ हमसे पूछेगा,मानव रक्षक गौ कहा गई,तब क्या कहोगे कल से,हम निष्ठुर थे इतने कि,सड़के ’माँ’ को खा गई,हम चुपचाप देखते रहे,माँ तो अपना फर्ज निभा गई।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-लेखक आशीष सिंह</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Nov 2017 03:52:20 +0530</pubDate>
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                <title>भारत का स्वतंत्रता दिवस, हमारी जीवन रेखा</title>
                                    <description><![CDATA[भारत एक विशाल सभ्यता-संस्कृति वाला देश है। पहले से ही भारत की सीमा उत्तर में हिमालय पर्वत, हिंदु कुश पर्वत, दक्षिण में कन्या कुमारी, पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तक थी। इसके अंतर्गत वर्तमान अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश भौगोलिक क्षेत्र के अंग थे। उस समय संयुक्त परिवार की भावना सामाजिक जीवन की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-independence-day/article-3123"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/india-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत एक विशाल सभ्यता-संस्कृति वाला देश है। पहले से ही भारत की सीमा उत्तर में हिमालय पर्वत, हिंदु कुश पर्वत, दक्षिण में कन्या कुमारी, पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तक थी। इसके अंतर्गत वर्तमान अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश भौगोलिक क्षेत्र के अंग थे। उस समय संयुक्त परिवार की भावना सामाजिक जीवन की ईकाई थी। राजनैतिक सजगता इसका मार्गदर्शक थी। विशाल देश होने के कारण अनेक समस्याएं भी थी। विदेशी शक्तियों के कारण विकट परिस्थितियां भी आर्इं। विरोध-प्रतिरोध का संघर्ष भी चलता रहा, लेकिन पराधीनता को स्वीकार नहीं किया।</p>
<p style="text-align:justify;">बहुत से वंश व उनके बीच हुए युद्धों के बाद राज्य एक-दूसरे में विलय होते गए। अंत में पानीपत के तीसरे युद्ध 1761 ई. में मराठा शक्ति को हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार पराधीनता का मार्ग प्रदर्शित हुआ। भारत में यूरोपियन व्यापारिक कंपनियों ने राजीतिक सत्ता के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। अंत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अपने उद्देश्य में सफल हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">बंगाल, बिहार, उड़ीसा, सूरत इसके व्यापारिक केंद्र थे। कंपनी अपने आर्थिक हितों के लिए स्वार्थ के साथ मिलकर षड्यंत्र करने लगे। बंगाल का नवाब अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद उसका उत्तराधिकारी सुराजुदोला नवाब बना। नवाब का आंतरिक षड्यंत्रकारी विरोधी मीरजाफर को कंपनी ने अपनी ओर कर लिया। इस षड्यंत्र योजना का कर्ता-धर्ता लार्ड क्लाइव था, जोकि कंपनी का गवर्नर था।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्वासघात और षड्यंत्रकारी सैनिक महत्वहीन 23 जून 1757 प्लासी के युद्ध के मैदान मे क्लाइव जीत गया। कंपनी ने अपनी राजनैतिक सत्ता स्थापित की। लार्ड वैलजली 1798-1805, लार्ड डलहौजी 1848-56 तक ब्रिटिश कंपनी भारत की सर्वाेच्च शक्ति बन गई।</p>
<p style="text-align:justify;">कंपनी ने राजनैतिक शक्ति को बढ़ाने के साथ-साथ भारत के सामाजिक, धार्मिक राजस्व, परंपराएं, शिक्षा, सांस्कृतिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया। लार्ड मैकाले जैसे ब्रिटिशवादी ने इस प्रकार के सुझाव रखे कि ‘‘भारतीय बाहर से भले भारतीय दिखाई दें, लेकिन संस्कारों में पश्चिमी होंगे’’। इस प्रकार भारत ब्रिटिश के अधीन हो गया और कुछेक क्रांतिकारी इस बात को सहन नहीं कर पाए।</p>
<p style="text-align:justify;">1857 की क्र ांति बंगाल में मंगल पाण्डे ने शुरू की। अंग्रेजों ने इसे सैनिक विद्रोह का नाम दिया है। इसके प्रमुख भारतीय नेता कुंवर सिंह, बहादुरशाह जफर, रानी झांसी, तांत्या टोपे, नाना साहब, नेताओं ने नेतृत्व किया। वास्तव में यह क्र ान्ति मध्य भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि जनआक्रोश था। इससे हरियाणा प्रदेश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक शोध जानकारी देते हैं कि ‘भारत का यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था।’ भले ही ब्रिटिश शक्ति कुछ देसी राज्यों के सहयोग से इसे दबाने में सफल हो गई, लेकिन भारतीय पराधीनता को खत्म करने के लिए संघर्षशील रहे। फिर अंग्रेजों ने अपनी नीति में बदलाव किया और ‘बांटोे और राज्य करो’ की नीति अपनाई।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक महान विद्वानों ने भारत में सांस्कृतिक एकता और स्वाभिमान को जगाया। पराधीनता को खत्म करने का अह्वान किया। केशवचंद्र, स्वामी दयानंद, रामकिशन परमाहंस, विवेकानंद के अतिरिक्त अनेक संस्थाओं ने योगदान दिया। इससे राष्टÑीय भावनाएं उदृत हुई। अग्रेजों के विरूद्ध आवाजें उठने लगी कि हमारी निर्धनता का मूल कारण अंग्रेज है। प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व क्रान्तिकारी गतिविधियां तेज हो चुकी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकमान्य तिलक, श्यामकृष्ण वर्मा, वीर सावरकर आदि देशभक्तों के अतिरिक्त बंगाल में क्रान्तिकारी गतिविधियां तेज हो गई। विरेन्द्र घोष, नलिनी बाक्ची, खुदीराम, कनहाई, रासबिहारी घोष, सचिन्द्र सन्याल के अलावा भारत के अन्य भागों में कई नौजवान क्रान्तिकारियों ने आजादी के लिए संघर्ष किया।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रथम विश्व युद्ध 1914-18 में भारतीयों ने अंग्रेजों को साम्राज्यवाद के विरूद्ध सहयोग दिया। रोलेट एक्ट पास करके अंग्रेजों ने भारतीयों से विश्वासघात किया। सारे भारत में इसका विरोध हुआ। महात्मा गांधी अंग्रेजों के न्याय में विश्वास रखते थे, लेकिन बाद में वे उनके विरोधी हो गये। इसके लिए उन्होंने असहयोग आन्दोलन 1920-22 का कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेशियों वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई। काले कानून के विरूद्ध पंजाब में भी रोष प्रकट किया गया। लेकिन अमृतसर में जलियांवाले बाग में विरोध हो रहा था, लेकिन जनरल डायर ने शान्त विरोध पर गोलियां चला दी। इस नरसंचार में अनेक लोग मारे गये, जिसमें बच्चे, बूढेÞ शामिल थे। सारे देश में अशान्ति का वातावरण हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">1930-32 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चला, जिसका उद्देश्य ‘नमक कानून’ तोड़ना था। इसके लिए महात्मा गांधी ने डांडी यात्रा की। इससे पूरे भारत में राष्टÑीय चेतना जागृत हुई। लेकिन दूसरी तरफ क्रांतिकारी समूह के देशभक्तों 23 मार्च 1931 में भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू ने असैम्बली हाल के बम्ब फैंका, जिस कारण उन्हें फांसी की सजा दी गई। इससे सारा भारत शोक में डूब गया।</p>
<p style="text-align:justify;">1939-45 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया। अंग्रेजी सरकार ने भारत से सहयोग लोकतन्त्र की रक्षा के उद्देश्य से मांगा, लेकिन महात्मा गांधी तथा भारतीय नेताओं ने इन्कार कर दिया। 1942 में महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ आरम्भ कर दिया और कहा कि ‘‘ये मेरे जीवन का अन्तिम संघर्ष है। अब नहीं तो कभी नहीं।’’ इससे आजादी की लहर अपने चरम पर पहुंच गई।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटिश शक्ति ने युद्ध समाप्ति के बाद राजनैतिक गतिरोध को खत्म करने के लिए अनेक सुझाव और आश्वासन दिये। सरकार ने ‘वेवल योजना’, ‘क्रिप्स योजना’ और ‘कैबिनेट मिशन’ भेजे, लेकिन कोई हल नहीं निकला।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटिश सत्ता ‘बांटो और राज्य करो’ के नीति पर कार्य कर रही थी, जोकि साम्प्रदायिकता पर आधारित थी। सर्वप्रथम सर सैयद अहमद खान मुस्लमानों के हितों की संरक्षा के लिए अंग्रेजों के सहयोगी बन गए। 1906 में मुस्लिम लीग राजनीतिक दल का गठन हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि ‘‘मुस्लमान अल्पसंख्यक हैं, हिंन्दु बहुसंख्यक हैं। दोनों की सांस्कृतियां अलग-अलग हैं। इस तरह ये दो अलग राष्टÑ हैं। इसलिए दो राष्टÑ एक तलवार की म्यान में नहीं आ सकते।’’ इस तरह अलग पाकिस्तान की मांग रखी गई, जबकि भारतीय नेता भारत की एकता व अखंडता चाहते थे। मगर फैसला यही हुआ कि भारत-पाकिस्तान दो अलग-अलग राष्टÑ बन जाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वक्त इंग्लैण्ड में सरकार बदल गई। लार्ड एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी के अधीन सरकार का गठन हुआ, जोकि भारत के प्रति उदार नीति रखते थे। वायसराय माउण्ट बेटन को भारत का वायसराय बनाकर भेजा गया। 1948 तक भारत को स्वाधीनता का वायदा किया गया। अनेक भारतीय नेताओं, मुस्लिम लीग नेताओं से विचार-विमर्श हुआ। अंत में माउंट बेटन योजना तैयार हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटिश संसद में स्वीकृत हुई और भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 स्वीकृत किया गया। पंजाब बंगाल का विभाजन हुआ। भारत और पाकिस्तान दो अलग स्वतंत्र राज्य बने। अंत में 15 अगस्त 1947 हमारा देश आजाद हो गया। हमारे अनेक नौजवानों की कुर्बानियों का परिणाम है। हमारी जीवन रेखा है, जिसमें अनेक भारत की वीरांगनाओं ने आजादी के लिए संघर्ष किया, कुर्बानी दी, जिन्हें हम भूल नहीं सकते, जैसे रखी बाई, दुर्गा भाभी, रेणुका सेन, कमला चटर्जी, लीला कमाल, इंदुमति सिंह कल्याणी देवी। इसके अलावा आजाद हिंद का नारा भी हम भूल नहीं सकते।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>जय-जय-जय जी हिंद, </strong></em><br />
<em><strong>तोपों-बंदूक हथियारों से आजाद करो जी हिंद,</strong></em><br />
<em><strong>हिंद हमारी जान, भारत बने हम हिंद के, </strong></em><br />
<em><strong>हिंद के लिए कुर्बान।।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. हरीश चंद झण्डई</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Aug 2017 01:35:46 +0530</pubDate>
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                <title>गंगा स्वच्छता: पहल ही नहीं, सख्ती भी आवश्यक</title>
                                    <description><![CDATA[सेंट्रल पॉल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा सफाई पर विभिन्न परियोजनाओं के मद में लगभग 20 हजार करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा चुके हैं। फिर आज क्या हम इस स्थिति में पहुंचे है कि गंगा को स्वच्छ नदी का दर्जा दे सकें? विडंबना यह है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण जैसी संस्था […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ganga-hygiene-not-only-initiative-but-also-strictly-required/article-2412"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/ganga1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सेंट्रल पॉल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा सफाई पर विभिन्न परियोजनाओं के मद में लगभग 20 हजार करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा चुके हैं। फिर आज क्या हम इस स्थिति में पहुंचे है कि गंगा को स्वच्छ नदी का दर्जा दे सकें? विडंबना यह है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण जैसी संस्था गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए समय-समय पर चिंतित और प्रयासरत है,</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन दुर्भाग्यवश सामाजिक और राजनीतिक सरोकार की कमी की वजह से गंगा अभी भी अस्वच्छ है। कागजी आंकड़ों पर भी आज तक हमारी सरकारें यह बाताने को तैयार नहीं है कि गंगा कितनी स्वच्छ और निर्मल हुई?</p>
<p style="text-align:justify;">गंगा मंत्रालय का गठन बस दिखावा और छलावा ही साबित हो रहा है। सबसे बड़ी बात, जब तक गंगा की सफाई को लेकर सामाजिक सरोकारिता से जुड़े लोग और सामान्य जनमानस कदम उठाता प्रतीत नहीं होगा, गंगा की पूर्ण रूप से सफाई नहीं हो सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार पुन: गंगा को निर्मल बनाने के लिए राष्टÑीय हरित प्राधिकरण ने फैसला लिया है कि गंगा में हरिद्वार से उन्नाव के बीच कचरा फैंकने वालों पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाए, लेकिन विचारणीय तथ्य यह है कि जुर्माना लगाने का यह खेल नया तो नहीं है! जुर्माना पहले भी लगता आया है, लेकिन किसी सरकार या संस्था ने यह जहमत नहीं उठाई कि कितना जुर्माना वसूला गया और इस कदम से गंगा स्वच्छ कितनी हुई। यह आज तक पता नहीं चला।</p>
<p style="text-align:justify;">नदियों पर हमारा कल निर्भर करता है, जिसके प्रति हमारे समाज में शनै:-शनै: जागरूकता फैल रही है, लेकिन बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चिंता व्यक्त की थी, वह यह दिखाती है कि केंद्र की राजग सरकार नदियों के संरक्षण की दिशा में सचेत है।</p>
<p style="text-align:justify;">नदियों के प्रति हमें और हमारे समाज को ही नहीं, बल्कि कल-कारखानों को संचालित करने वालों को भी स्वच्छ बनाए रखने की दिशा में कार्य करना होगा, कुछ स्वार्थ पूर्ति की खातिर आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय करना कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नर्मदा के उद्गम स्थल से बीते दिनों देश के प्रधानमंत्री ने नदियों के भविष्य को लेकर जो चिंता की लकीर खींची थी, उससे लगता है कि अब वक्त की मांग है कि समाज द्वारा नदियों को बचाने के लिए सार्थक विचार-विमर्श हो।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ वर्ष पूर्व केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा था कि देश के लगभग नौ सौ से ज्यादा कस्बों और शहरों का अमूमन 70 फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। फिर यह देश का दुर्भाग्य है कि देश आने वाले समय की चिंता छोड़कर मात्र वर्तमान दौर की लड़ाई में आंखें मूंदकर आगे बढ़ रहा है। सबसे बड़े स्तर पर कारखाने और मिल नदियों की जान के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह हमारे समाज के समक्ष विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिन नदियों को हम मां का दर्जा देते हैं, उन्हें ही हमने हमने मल-मूत्र विसर्जन का अड्डा बनाकर रख दिया है। नदियों में सीवरेज छोड़ने की वजह से नदियां आज नालों के रूप में रूपांतरित होती जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर देश की 70 फीसद नदियां प्रदूषित हैं और मरने के मुहाने पर खड़ी हैं, फिर इनको बचाने के लिए धरती पर एक बार फिर किसी को भागीरथ बनना होगा, और यह काम हमारे नीति-नियंता से अच्छा कोई और नहीं कर सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार फिर राष्टÑीय हरित प्राधिकरण का यह फैसला काफी सराहनीय है कि गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए 100 मीटर के क्षेत्र को ‘नो डेवलपमेंट जोन’ घोषित कर दिया जाए। यह घोषणा तब और अधिक कारगर सिद्ध होगी, जब स्थानीय प्रशासन और सरकारी रहनुमाई तंत्र के लोग अपने हितों को त्याग दें। इसलिए सर्वप्रथम आवश्यकता है कि सामाजिक सरोकार की दृष्टि को पैदा करना, जो धीरे-धीरे समाज से स्वहित के कारण गुम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ हरिद्वार से उन्नाव के मध्य गंगा नदी के किनारे 500 मीटर तक कचरा फैंकने पर 50 हजार का जुर्माना ठोकने की बात कही गई है, लेकिन हमारे देश में मात्र अगर फरमान जारी होने पर लोग सुधर जाते, तो आज देश की स्थिति कुछ ओर होती। इसलिए सर्वप्रथम समाज के लोगों को अपनी सामाजिक जिम्मेवारियों के प्रति वफादार होना पड़ेगा, तभी कुछ सकारात्मक पहल अंजाम तक पहुंच सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-महेश तिवारी</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Tue, 18 Jul 2017 01:48:45 +0530</pubDate>
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