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                <title>Democracy - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Media Democracy : मीडिया लोकतंत्र की मर्यादा कायम रखे</title>
                                    <description><![CDATA[– Media Democracy – देश में लोकसभा चुनावों के लिए मतदान के दो चरण पूरे हो चुके हैं। पार्टियों द्वारा आज भी टिकट बांटने का कार्य जारी है। मीडिया भी चुनावों की हर बारीकी को पेश करने के लिए उतावला रहता है परंतु अति उत्साह में मीडिया का एक वर्ग भी लोकतंत्र (Media Democracy) के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/media-should-maintain-the-dignity-of-democracy/article-56979"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/media-day.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>– Media Democracy –</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">देश में लोकसभा चुनावों के लिए मतदान के दो चरण पूरे हो चुके हैं। पार्टियों द्वारा आज भी टिकट बांटने का कार्य जारी है। मीडिया भी चुनावों की हर बारीकी को पेश करने के लिए उतावला रहता है परंतु अति उत्साह में मीडिया का एक वर्ग भी लोकतंत्र (Media Democracy) के नियमों को नजरअंदाज कर रहा है। मीडिया इस बात को बड़ी तव्वजो दे रहा है कि किस धर्म को, किस जाति के नेता को टिकट दी गई। सुर्खियों में आम पढ़ा जाता है कि उस पार्टी ने जाट चेहरे पर दाव खेला, कहीं लिखा होता है पार्टी हिंदू चेहरे की तलाश कर रही है या सिख चेहरा ढूंढ रही है। ऐसा कुछ ही खत्री, कम्बोज और अन्य जातियों संबंधी धड़ाधड़ लिखा जाता है। ऐसी शब्दावली समाज में जातिवाद की ढीली पड़ रही पकड़ को फिर मजबूत करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पार्टी की अदरुनी रणनीति को जाहिर करने की होड़ में मीडिया भी उसी पिछड़ी सोच को उभारने का कार्य कर जाता है जिसे खत्म करने के लिए लोकतंत्र समानता की भावना और इंसानियत का आगे लाने के लिए प्रयत्नशील है। वास्तव में अंग्रेजों द्वारा चलाई गई संप्रदायिक चुनाव प्रणाली को हमारे आजाद लोकतंत्र और मानववादी संविधान ने खत्म कर दिया था। मीडिया फिर संप्रदायिक व जातिसूचक शब्द प्रयोग कर नई पीढ़ी की मानसिकता में जातिवाद की जड़ें गहरी करने का काम अनजाने में ही कर रहा है। बेशक पार्टियां टिकट बांटते समय धर्म, जाति को ध्यान में रखती हैं फिर भी पार्टियां अपनी इस कमजोरी को लोकतंत्र विरोधी होने के कारण सरेआम गाने से परहेज करती हैं। मीडिया को भी इस मामले में संयम और मर्यादा रखनी चाहिए।</p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Wed, 01 May 2024 10:00:39 +0530</pubDate>
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                <title>Lok Sabha Election : चुनाव तंत्र की बड़ी कमजोरी</title>
                                    <description><![CDATA[लोकसभा चुनावों (Lok Sabha Election) के लिए प्रचार जोरों पर हैं। इस बार चुनावों की खास बात यह है कि पार्टियों को सबसे अधिक जोर उम्मीदवार ढूंढने पर लगाना पड़ रहा है। दूसरी पार्टियों के नेताओं को धड़ाधड़ शामिल कर टिकटें भी साथ की साथ पकड़ा दी गई हैं। आमजन भी यह बात आसानी के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/lok-sabha-election-campaigning/article-56446"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/los-election-rajasthan1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लोकसभा चुनावों (Lok Sabha Election) के लिए प्रचार जोरों पर हैं। इस बार चुनावों की खास बात यह है कि पार्टियों को सबसे अधिक जोर उम्मीदवार ढूंढने पर लगाना पड़ रहा है। दूसरी पार्टियों के नेताओं को धड़ाधड़ शामिल कर टिकटें भी साथ की साथ पकड़ा दी गई हैं। आमजन भी यह बात आसानी के साथ कह देता है कि जिस नेता ने पार्टी बदली है उसकी टिकट भी पक्की है। मीडिया टिकट मिलने के आसार लिखता है और अगले दिन हकीकत में टिकट मिल भी जाती है। इसी तरह पार्टियां भी एक-दूसरे को देख-देखकर और सोच-सोचकर दे रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर दमदार नेता हो तो इंतजार करने की जरुरत ही ना पड़े। हैरानी की बात है कि अलग-अलग पार्टियों के पास सैकड़ों छोटे-बड़े नेता हैं परंतु काबित उम्मीदवार नहीं। वास्तव में पार्टियों के अनुसार नेता की योग्यता सिर्फ जीतना ही है। जीतने की होड़ में सिद्धांत नजरअंदाज हो जाते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान राजनीति में सिद्धांत व संस्कारों की कमी है। जीत-हार राजनीति का अंग होना चाहिए उद्देश्य नहीं। राजनीति मुख्य तौर पर जीत-हार से ऊपर होनी चाहिए पार्टियों को अपने सिद्धांतों पर पहरा देने वाले नेताओं पर भरोसा रखना चाहिए। बड़ी अच्छी बात है कि भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र देश है परंतु लोकतंत्र के सिद्धांत भी अपनाने जरुरी हैं।</p>
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                <pubDate>Wed, 17 Apr 2024 10:05:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>लोकतांत्रिक तरीके से हो समस्याओं का समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[देश में विभिन्न वर्गों से संबंधित संगठनों व प्रशासन के बीच टकराव शांत होने की बजाए उग्र होता जा रहा है। पंजाब-हरियाणा में भले ही किसानों का संघर्ष या सरकारी कर्मचारियों का प्रदर्शन हो, अक्सर ही उग्र रूप धारण कर लेता है। यहां तक कि कई बार हालात तनावपूर्ण भी बन जाते हैं। आजादी के 75 […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/solve-problems-democratically/article-48851"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/democracy-2-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में विभिन्न वर्गों से संबंधित संगठनों व प्रशासन के बीच टकराव शांत होने की बजाए उग्र होता जा रहा है। पंजाब-हरियाणा में भले ही किसानों का संघर्ष या सरकारी कर्मचारियों का प्रदर्शन हो, अक्सर ही उग्र रूप धारण कर लेता है। यहां तक कि कई बार हालात तनावपूर्ण भी बन जाते हैं। आजादी के 75 वर्ष बाद धरना-प्रदर्शनों में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होना बेहद चिंता का विषय है। इस मुद्दे पर राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक रुप से चर्चा होनी चाहिए। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जो गर्व की बात है। कुछ खामियों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र की ढ़ेरों उपलब्धियां भी हैं, लेकिन जहां तक लोकतंत्र का संबंध है यह केवल सरकार चुनने, चुनाव करवाने तक सीमित नहीं है। (Democracy)</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र (Democracy) में हर विचारधारा का सम्मान होना चाहिए। लोकतंत्र में विवेक, विचार और मंथन अति आवश्यक है, जहां विवेक से तर्कों पर चर्चा की जाती है। लोकतंत्र शारीरिक व भौतिक लड़ाई का नहीं बल्कि यह विचारधारा की लड़ाई है। यह भी यथार्थ है कि अंग्रेजों के शासनकाल के संघर्ष और वर्तमान दौर के संघर्षों को एक तराजू में नहीं तोला जा सकता। विदेशी शासकों की कार्यशैली और आजाद देश के शासनकाल में जमीन-आसमान का अंतर है। संविधान स्वतंत्र देश के नागरिकों को व्यक्तिगत व सामूहिक रुप से विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकर देता है। विरोध के साथ-साथ संवाद को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। सरकारें भी अपनी जिम्मेवारी से भाग नहीं सकतीं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारों को चाहिए कि विरोध-प्रदर्शन करने वाले संगठनों के साथ बातचीत कर उनकी मांगों को सुना जाए और समस्याओं का समाधान भी निकाला जाए। यह आजकल आम देखा गया है कि शुरुआती दौर में धरना-प्रदर्शन करने वालों पर कोई ध्यान ही नहीं दिया जाता, जब वे सरकार के जवाब के इंतजार में थक जाते हैं फिर उग्र होने की स्थिति पैदा होती है और अंत में सरकार संगठनों की कुछ मांगों को मान लेती है और धरना एक बार खत्म हो जाता है, लेकिन धरने की शुरुआत और खत्म होने के बीच जो कानून व्यवस्था बिगड़ने से आमजन को समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है तो सरकारों और संगठनों में तालमेल व बातचीत के तौर-तरीकों पर सवाल उठता है। (Democracy)</p>
<p style="text-align:justify;">यदि ऐसे संवेदनशील मामलों को सरकार गंभीरता से ले तो धरने-प्रदर्शनों को शुरुआती दौर में ही खत्म करवाया जा सकता है। यह भी वास्तविक्ता है कि विचार शक्ति का कोई मुकाबला नहीं। इस सिलसिल में अन्ना हजारे का आंदोलन एक स्पष्ट उदाहरण है, जिन्होंने शांतप्रिय तरीके से सरकार को हिला दिया था। लोकतंत्र में धरने, विरोध-प्रदर्शन की अहमियत को बरकरार रखने के साथ संवाद को मजबूत किया जाना ही लोकतंत्र की वास्तविक जीत है। सरकारों को भी केवल अनुभवों या राजनीतिक नफे-नुक्सान से ऊपर उठकर जनहित को पहल देनी चाहिए। (Democracy)</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Income Tax Slab: ITR भरने वालों के लिए नई गाइडलाइन… राहत या आफत?" href="http://10.0.0.122:1245/fm-nirmala-sitharaman-on-income-tax-in-hindi/">Income Tax Slab: ITR भरने वालों के लिए नई गाइडलाइन… राहत या आफत?</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 14 Jun 2023 17:39:12 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सशक्त विपक्ष के बिना लोकतंत्र अधूरा</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय लोकतंत्र के सम्मुख एक ज्वलंत प्रश्न उभर के सामने आया है कि क्या भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन हो गई है? आज विपक्ष इतना कमजोर नजर आ रहा है कि सशक्त या ठोस राजनीतिक विकल्प की संभावनाएं समाप्त प्राय: लग रही हैं। भले ही पूर्व दशकों में कांग्रेस भारी बहुमत में आया करती थी परन्तु […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/democracy-is-incomplete-without-a-strong-opposition/article-44226"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-03/indian-democracy-lost-in-political-decisions.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र के सम्मुख एक ज्वलंत प्रश्न उभर के सामने आया है कि क्या भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन हो गई है? आज विपक्ष इतना कमजोर नजर आ रहा है कि सशक्त या ठोस राजनीतिक विकल्प की संभावनाएं समाप्त प्राय: लग रही हैं। भले ही पूर्व दशकों में कांग्रेस भारी बहुमत में आया करती थी परन्तु छोटी-छोटी संख्या में आने वाले राजनीतिक दल लगातार सरकार को अपने तर्कों एवं जागरूकता से दबाव में रखते थे, अपनी जीवंत एवं प्रभावी भूमिका से सत्ता पर दबाव बनाते थे, यही लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण था। लेकिन अब ऐसी स्थिति समाप्त होती जा रही है। यह स्थिति अचानक तो नहीं आयी है? इसकी असली वजह क्या हो सकती है? आखिर विपक्ष इतना कमजोर एवं नकारा कैसे हो गया? इसका बड़ा कारण सभी विपक्षी दलों का पारिवारिक पार्टियों में तब्दील हो जाना भी है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ता संकट" href="http://10.0.0.122:1245/growing-crisis-due-to-melting-of-glaciers/">ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ता संकट</a></p>
<p style="text-align:justify;">140 करोड़ की आबादी वाले देश में विपक्ष के पास भाजपा का विरोध के अलावा कोई प्रखर मुद्दा नहीं है। लोकतंत्र में हालांकि यह कहा जाता है कि व्यक्तियों से बढ़कर संस्था या राजनीतिक दल का महत्व होता है परन्तु लोकतंत्र के इस पवित्र व मूल सिद्धान्त को विपक्ष ही समाप्त कर रहा है। आज देश में विपक्ष के पास कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं है, जो देश की ज्वलंत समस्याओं के समाधान के लिए अपनी स्वतंत्र सोच को उभार सकें। देश में बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव, महंगाई इत्यादि संबंधी ढेर सारी समस्याएं मुंह आड़े खड़ी हैं, लेकिन विपक्ष इन मुद्दों को प्रभावी तरीके से नहीं उठा पा रहा और जनता मौन होकर पिसती जा रही है। सशक्त विपक्ष के साथ प्रभावी, सक्षम, समर्थ एवं सर्वस्वीकार्य विपक्षी नेता भी लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसाकि आजादी के बाद ताकतवर कांग्रेस पार्टी के शासन में विपक्ष बहुत तेजस्वी एवं प्रभावी रहा है। वही विपक्ष अपनी साफ, पारदर्शी, नैतिक एवं राष्ट्रवादी राजनीतिक मूल्यों के बल पर आज स्पष्ट बहुमत से शासन कर रहा है। विपक्ष अपनी इस दुर्दशा के लिये खुद जिम्मेदार है। विपक्ष वैचारिक, राजनीतिक और नीतिगत आधार पर सत्तारूढ़ दल का विकल्प प्रस्तुत करने में नाकाम रहा है। उसने सत्तारूढ़ भाजपा की आलोचना की, पर कोई प्रभावी विकल्प नहीं दिया। किसी और को दोष देने के बजाय उसे अपने अंदर झांककर देखना चाहिए। मुद्दा विहीनता उसके लिए इतनी अहम रही है कि कई बार राष्ट्रीय मुद्दों पर उसने जुबान भी नहीं खोली। विपक्ष ने मजबूती से अपनी सार्थक एवं प्रभावी भूमिका का निर्वाह नहीं किया तो उसके सामने आगे अंधेरा ही अंधेरा है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Mar 2023 15:18:19 +0530</pubDate>
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                <title>लोकतंत्र में बस कल्चर</title>
                                    <description><![CDATA[भ्रष्टाचार व अपराधों के कारण बदनाम हो चुकी राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। लोकतंत्र विश्व की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक प्रणाली थी, लेकिन पूंजीवादी संस्कृति ने लोकतंत्र के आदर्शों व मूल्यों को बिल्कुल नीचा दिखा दिया है। ताजा प्रकरण झारखंड का है, जहां लोकतंत्र तमाशा बन गया है। सत्तापक्ष झारखंड मुक्ति मोर्चा के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/democracy-was-the-most-popular-political-system-in-the-world/article-37279"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-09/democracy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भ्रष्टाचार व अपराधों के कारण बदनाम हो चुकी राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। लोकतंत्र विश्व की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक प्रणाली थी, लेकिन पूंजीवादी संस्कृति ने लोकतंत्र के आदर्शों व मूल्यों को बिल्कुल नीचा दिखा दिया है। ताजा प्रकरण झारखंड का है, जहां लोकतंत्र तमाशा बन गया है। सत्तापक्ष झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विधानसभा सदस्यता रद्द होने से सरकार पर संकट गहरा रहा है। सत्तापक्ष पार्टी दलबदल से बचाव करने के लिए अपने विधायकों को बसों में लेकर घूम रही है। यही हाल कुछ माह पूर्व महाराष्टÑ में देखा गया था जब शिवसेना के विधायकों को असम लाया गया। अब यह रूटीन ही बन गया है कि जब सरकार को खतरा हो तब सत्ताधारी दल अपने विधायकों को गुप्त जगहों पर छिपा देता है। अभिव्यक्ति को महत्व देने वाला लोकतंत्र अब बसों की भागदौड़ की जंग में तब्दील हो गया है। वास्तव में राजनेताओं पर विश्वास सा नहीं रह गया।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ नहीं पता चलता कि ऊंट किस करवट बैठ जाए। यहां तक कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी यह भरोसा नहीं कि उनके विधायक उनके साथ खड़े रहेंगे या नहीं। पार्टियों को ज्यादा डर यही होता है कि उनके विधायक किसी लालच में आकर पार्टी न छोड़ जाएं। राजनीति इतनी ज्यादा कमजोर हो गई है कि विधायकों को कमरों में बंद करने की नौबत आ गई है। वास्तव में विधायक आदर्श नहीं कायम रख सके। अब वे अपने जुबान के पक्के नहीं रहे। इस मामले में पार्टियां भी अपनी जिम्मेवारी से बच नहीं सकतीं। पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं ने राजनीति को महज सत्ता प्राप्त करने का साधन बना लिया है। जनसेवा व राष्टÑ सेवा गौण हो गई। पार्टियां अपने नेताओं को राजनीति एक सेवा जैसे उच्च गुण, आदर्श व मूल्य नहीं सिखा सकीं। पार्टी के लिए विधायक केवल एक आंकड़ा बनकर रह गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि पार्टियों ने नेताओं को अनुशासन में रहकर सिद्धांतों का आदर्श सिखाया होता तो आज विधायकों के पार्टी छोड़ने का डर नहीं होता। पार्टी अपने नेता की एक-एक योग्यता चुनाव जीतने की क्षमता के तौर पर देखती है। जीतने वाले नेता की कमियों को छुपाया जाता है। दूसरी तरफ विपक्ष को इस मामले में स्पष्ट व ईमानदारी वाला रवैया अपनाते हुए यह बात सार्वजनिक करनी चाहिए कि विधायकों की खरीद-फरोख्त या दबाव की राजनीति नहीं की जा रही। अक्सर सत्तापक्ष यह आरोप लगाता है कि विपक्षी पार्टी उनके विधायकों को लालच दे रही है। आखिर में यह स्वीकार करना होगा कि विधायकों को छुपाने का यह चलन लोकतंत्र के नाम पर कलंक है।</p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Sep 2022 07:28:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजनीतिक सुधार ही भावी लोकतंत्र की शक्ति</title>
                                    <description><![CDATA[देश में कई राजनीतिक पार्टियां बड़े संकट का सामना कर रही हैं। कांग्रेस सहित कई क्षेत्रीय पार्टियों को भी लोक सभा चुनावों सहित विधान सभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर 23-जी की बयानबाजी के कारण वर्गवादम बनी हुई है। इन पार्टियों में हार का मंथन जारी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/political-reform-is-the-power-of-future-democracy/article-31635"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/politics-21.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में कई राजनीतिक पार्टियां बड़े संकट का सामना कर रही हैं। कांग्रेस सहित कई क्षेत्रीय पार्टियों को भी लोक सभा चुनावों सहित विधान सभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर 23-जी की बयानबाजी के कारण वर्गवादम बनी हुई है। इन पार्टियों में हार का मंथन जारी है और नई नीतियां-रणनीतियां तैयार करने की भी तैयारी चल रही हैं। वास्तव में राजनीति में गिरावट या सुधार को देश या संबंधित राज्यों की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। किसी भी पार्टी का नेता अपने राज्य, क्षेत्र या समाज के प्रभाव से मुक्त नहीं। पूंजीवादी आर्थिक प्रबंधों ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को भी बुरी तरह अपने रंग में रंग लिया है, जिसका प्रभाव नकारात्मक ही रहा है। दूसरे क्षेत्रों की तरह राजनीति भी पैसा कमाने, पहुंच बनाने का जरिया बनकर रह गई।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि राजनीति का मुख्य उद्देश्य जनता की सेवा करना था किंतु राजनीति के बदलते उद्देश्यों ने लखपतियों को अरबपति बना दिया और जनता की सेवा का विचार बुरी तरह फेल हो गया। सत्तापक्ष सांसद-विधायकों को मिल रहे वेतन/पेंशन और सुविधाओं की बदौलत राजनीति को पांच सालों की नौकरी समझा जाने लगा है। हर हाल में चुनाव जीतने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं, यही कारण है कि अनैतिकता हावी हो गई है। यदि पारंपरिक पार्टियों की बात करें तब इन प्रत्येक का अस्तित्व जनता की सेवा करना ही था। इन पार्टियों के वर्तमान संकट का समाधान भी अपने अतीत को दोबारा जिंदा करने के साथ ही है। शुरूआत और वर्तमान समय को समझने, स्वीकार करने और कमियों को दूर करने के लिए पहल करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जो नेता या पार्टी देश की पारंपरिक राजनीति को समझकर अपना गया उसके रास्ते आसान हो रहे हैं। भारत महान देश है जिसके राजनीतिक मार्गदर्शकों ने ईमानदारी, जनता की सेवा, त्याग और सादगी वाले राजनीतिक कल्चर का निर्माण किया था। देश के चल बसे राजनीतिज्ञों में जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपायी, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, डॉ. राधा कृष्णन, राम मनोहर लोहिया, महात्मा गांधी जैसे नेताओं की धाक पूरी दुनिया में थी। समाज में आई कुरीतियों का प्रभाव राजनीतिक लोगों पर नहीं पड़ना चाहिए, बल्कि उन्हें समाज में सुधार करने वाली राजनीति करनी चाहिए। ईमानदारी, धार्मिक सम्भाव, समाज में बिना जात-पात, कर्तव्यनिष्ठा का व्यवहार करने जैसे गुणों को धारण कर कोई भी राजनीतिक पार्टी आगे बढ़ सकतीं हैं, जोकि अच्छा व सच्चा लोकतंत्र मजबूत करने के लिए आज की जरूरत है।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Mar 2022 09:33:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकतंत्र के प्रति मतदाताओं की आस्था बढ़ी है लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने निराश किया है: नायडु</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली। राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडु ने सदस्यों ने बजट सत्र में बेहतर उत्पादकता में सहयोग करने की अपील करते हुये आज कहा कि वर्ष 1951-52 के आम चुनाव की तुलना में वर्ष 2019 के चुनाव में लोकतंत्र के प्रति मतदाताओं की आस्था बढ़ी है जबकि इस दौरान निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/voters-faith-in-democracy-has-increased-but-elected-representatives-have-disappointed-naidu/article-30454"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-02/understand-the-pain-of-naidu-hindi-language.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली।</strong> राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडु ने सदस्यों ने बजट सत्र में बेहतर उत्पादकता में सहयोग करने की अपील करते हुये आज कहा कि वर्ष 1951-52 के आम चुनाव की तुलना में वर्ष 2019 के चुनाव में लोकतंत्र के प्रति मतदाताओं की आस्था बढ़ी है जबकि इस दौरान निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली में गिरावट आयी है। नायडु ने बजट सत्र के पहले चरण में आज सदन की कार्यवाही शुरू होने पर अपने संबोधन में सदस्यों से बजट सत्र में बेहतर उत्पादकता देने में सहयोग करने की अपील करते हुये कहा कि पिछले बजट सत्र में सदन की उत्पादकता 94 प्रतिशत रही थी। उन्होंने कहा कि देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और आजादी के बाद चुनाव का 70वां वर्ष चल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बजट सत्र के महत्व को रेखांकित करते हुये सभी दलों एवं सदस्यों से बेहतर उत्पादकता में सहयोग करने की अपील की और कहा कि पिछले बजट सत्र में हमारी उत्पादकता 93.50 प्रतिशत रही थी। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद हुये पहले आम चुनाव में 45 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया था जो वर्ष 2019 के चुनाव में 50 प्रतिशत बढ़कर 67 प्रतिशत पर पहुंच गया। इससे पता चलता है कि लोकतंत्र के प्रति मतदाताओं की आस्था बढ़ी है जबकि इस दौरान विधायिका और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली में गिरावट आयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने देश के पांच हजार सांसदों, विधायकों और विधान पार्षदों से मतदाताओं की तरह ही लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में काम करने की अपील करते हुये कहा कि ऐसे काम किये जाने चाहिए जिससे आम लोगों का विश्वास संसदीय लोकतंत्र के प्रति और मजबूत हो। उन्होंने कहा कि यह बजट सत्र ऐसे में हो रहा जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। उन्होंने सदस्यों से अपील की कि लोगों ने जिस स्वराज को लड़कर और जीत कर हासिल किया था वह जज्बा हमें सदन की कार्यवाही में दौरान भी दिखना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानसून सत्र में सदन का 52.10 प्रतिशत समय और मानसून सत्र में 70 प्रतिशत से अधिक समय बर्वाद हुआ था। उन्होंने कहा कि यह तरह का रूख बहुत ही निराशाजनक है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 02 Feb 2022 14:13:42 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>पारिवारिक राजनीतिक दल लोकतंत्र के लिए खतरा : मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परिवार आधारित राजनीतिक दलों को लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा करार देते हुए शुक्रवार को कहा कि भ्रष्टाचार में लिप्त घोषित लोगों का महिमामंडन युवाओं को गलत रास्ते पर चलने के लिए उकसाता है। मोदी ने यहां संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में सविधान दिवस के अवसर पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/family-political-parties-a-threat-to-democracy/article-28649"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/prime-minister-narendra-modi1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परिवार आधारित राजनीतिक दलों को लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा करार देते हुए शुक्रवार को कहा कि भ्रष्टाचार में लिप्त घोषित लोगों का महिमामंडन युवाओं को गलत रास्ते पर चलने के लिए उकसाता है। मोदी ने यहां संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में सविधान दिवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत के हर हिस्से में परिवार आधारित राजनीतिक दलों का वर्चस्व बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। इसके लिए देशवासियों को जागरूक करने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री ने कहा कि वह एक ही परिवार के कई सदस्यों के राजनीति में आने के खिलाफ नहीं है लेकिन यह योग्यता के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह परिवार आधारित राजनीतिक दल अपना लोकतांत्रिक चरित्र खो चुके हैं, तो इनसे लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की रक्षा करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। परिवार आधारित राजनीतिक दल पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं और यह लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर सकते। ऐसे राजनीतिक दल लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। उन्होंने कहा कि ऐसे राजनीतिक दल बहुत बड़ी चिंता का विषय है।</p>
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">LinkedIn</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Nov 2021 14:43:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वार्थपूर्ण दलबदली लोकतंत्र के लिए घातक</title>
                                    <description><![CDATA[अब चुनाव निष्ठा बदल जाने का दूसरा नाम बनता जा रहा है। जैसे-जैसे पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है उसी तरह राजनीतिक वफादारियों की अदला-बदली बढ़ रही है। एक दूसरी पार्टी के विधायक तोड़ने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल के बाद अब उत्तर-प्रदेश […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/selfish-defections-are-dangerous-for-democracy/article-24511"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-06/democracy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अब चुनाव निष्ठा बदल जाने का दूसरा नाम बनता जा रहा है। जैसे-जैसे पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है उसी तरह राजनीतिक वफादारियों की अदला-बदली बढ़ रही है। एक दूसरी पार्टी के विधायक तोड़ने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल के बाद अब उत्तर-प्रदेश में समाजवादी (सपा) पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच विधायक तोड़ने की जंग छिड़ गई है। अपने कुछ विधायक सपा में जाते देख बसपा बिफर पड़ी है। इससे पहले मध्य-प्रदेश में ऐसी दल-बदली हुई थी जिसने कांग्रेस की सरकार गिरा दी थी। इसी तरह राजस्थान में राज्य सरकार टूटते-टूटते बामुश्किल से बची और अब फिर पंजाब को देख राजस्थान में बगावत शुरू हो गई है। कांग्रेस के बागियों को उकसाने पर भाजपा नेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने ब्यान दिया कि जो देश के लिए सोचते हैं उनके लिए पार्टी के दरवाजे खुले हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल मौकाप्रस्त नेता चुनावी मौसम में खूब चांदी काटते हैं। विशेष तौर पर उस वक्त जब चुनावों में किसी पार्टी की एकतरफा जीत तय नहीं होती। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्टियां भटकी हुई हैं या दल-बदलू नेता। हम जानते हैं कि हर विपक्ष, सत्ताधारी पार्टी के हर फैसले का विरोध करना ही अपना धर्म समझने लगे हैं। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि जब वही विपक्ष सत्ता में होता है, तब उसे वही सब अच्छा लगने लगता है जिसको पहले वह पानी पी-पीकर कोसता था। लोगों की मजबूरी यह है कि वे मूक दर्शक बनकर देखने के सिवा कुछ कर नहीं सकते, क्योंकि चुन लेने पर व्यवस्था ने इन सियासी रहनुमाओं को पाँच साल की गारंटी जो दे रखी है। यही वह कारण हैं जिसने देश की राजनीति में विश्वसनीयता का संकट खड़ा कर दिया है। सरकार चुनते वक्त वोटर को खुद पर भरोसा नहीं होता कि जिसे वह वोट दे रहे हैं वह उम्मीदवार सही है या गलत। वास्तव में इस दौर में पार्टियां और नेता एक जैसे हो गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पार्टियां लालची नेता की कमजोरी का फायदा उठाकर अपने स्वार्थ साधने के लिए सिद्धांतों की धज्ज्यिां उड़ाती हैं। जो नेता कभी किसी पार्टी की सख्त निंदा करने में मशहूर होता है, ऐसा नेता दलबदली के बाद उसी पार्टी की तारीफ करने लगता है। जिसकी निंदा करता था। दरअसल राजनीति इस हद तक गिर गई है कि पार्टियां और नेता दोनों में आदर्शों की बात अब नहीं होती। संसद ने बहुत मेहनत से दल-बदल विरोधी कानून पास किया लेकिन चालाक नेताओं और पार्टियों ने इस कानून के बावजूद नए रास्ते निकाल दल बदलन् जारी रखा हुआ है, जिससे देश को कई बार केंद्र व राज्यों में मध्यकालीन चुनाव करवाने पड़े हैं। इस बुरे चलन से जहां राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, वहीं देश को चुनावों का अनावश्यक खर्च उठाना पड़ा। दलबदली प्रवृति न केवल लोकतंत्र को कमजोर कर रही है बल्कि राजनेताओं की जनता के प्रति समर्पण भावना भी खत्म हो रही है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 17 Jun 2021 09:37:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पंजाब में लोकतंत्र का अपमान</title>
                                    <description><![CDATA[पंजाब में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर 14 फरवरी को चुनाव सम्पन्न होने वाले हैं, किंतु जिस प्रकार जिला फाजिल्का, फिरोजपुर और तरनतारन में प्रत्याशियों के नामांकन पत्र रोकने के लिए पथराव व मारपीट की गई है, उससे ऐसा लग रहा है कि अब राजनीति ताकत और अहंकार का खेल हो लिया है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/insult-to-democracy-in-punjab/article-21450"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/democracy-in-punjab.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>चुनावों में पहले हिंसा केवल मतदान के दिन होती थी, अधिकतर फर्जी वोट डालने-रोकने या फिर बूथों पर कब्जा जैसी घटनाएं होती थी, लेकिन छोटे स्तर के चुनावों में नामांकन दाखिले के वक्त बढ़ी हिंसक घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। यह केवल निम्न स्तर के नेता की संकुचित सोच का ही परिणाम नहीं बल्कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की भी राजनीतिक साजिश से इन्कार नहीं किया जा सकता।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">पंजाब में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर 14 फरवरी को चुनाव सम्पन्न होने वाले हैं, किंतु जिस प्रकार जिला फाजिल्का, फिरोजपुर और तरनतारन में प्रत्याशियों के नामांकन पत्र रोकने के लिए पथराव व मारपीट की गई है, उससे ऐसा लग रहा है कि अब राजनीति ताकत और अहंकार का खेल हो लिया है। वास्तव में लोकतंत्र में विपक्षी के बिना राजनीति की कल्पना ही नहीं की जा सकती। देश में प्रत्येक व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार है। राजनीति किसी की जागीर नहीं। यह नैतिक तौर पर भी नीच हरकत है कि किसी प्रत्याशी को नामांकन पत्र दाखिल करने से रोका जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">विधान सभा चुनाव और लोक सभा चुनावों में हिंसक घटनाओं में निरंतर गिरावट आ रही है, लेकिन पंचायती चुनावों व स्थानीय निकाय चुनावों में हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं। चुनावों में पहले हिंसा केवल मतदान के दिन होती थी, अधिकतर फर्जी वोट डालने-रोकने या फिर बूथों पर कब्जा जैसी घटनाएं होती थी, लेकिन छोटे स्तर के चुनावों में नामांकन दाखिले के वक्त बढ़ी हिंसक घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। यह केवल निम्न स्तर के नेता की संकुचित सोच का ही परिणाम नहीं बल्कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की भी राजनीतिक साजिश से इन्कार नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">बूथ स्तर पर अपनी पार्टी ईकाईयों को मजबूत करने के लिए अपने वर्करों को उकसाकर किसी भी प्रकार की हिंसक घटनाओं को अंजाम देने से नहीं कतराते। इस खतरनाक परंपरा की सबसे बड़ी चोट प्रदेश की जनता को झेलनी पड़ रही है। गांव स्तर पर राजनीतिक शत्रुता तनाव का कारण बन रही है, यही कारण है कि पिछले दो तीन पंचायती चुनावों में हत्याओं की कई घटनाएं घटीं हैं। विधायकों के खिलाफ हिंसा के मामले दर्ज हो रहे हैं। देखा जाए तो इन चुनावों में विधायकों व सांसदों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए, ये चुनाव छोटे नेताओं को वरिष्ठ नेताओं की दखलअंदाजी के बिना लड़ने दिया जाना चाहिए। विधायकों पर इस बात का दबाव नहीं होना चाहिए कि पार्टी से सबंधित पार्षदों की जीत-हार से विधायक की लोकप्रियता, कार्यकुशलता या वफादारी तय की जाएगी।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Feb 2021 09:48:29 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>राजनीतिक हिंसा भारतीय लोकतंत्र पर धब्बा</title>
                                    <description><![CDATA[कोरोना काल में पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ा त्यौहार दुर्गा पूजा भले ही फीका रहा लेकिन प्रदेश के विधानसभा चुनावों को लेकर माहौल पूरी तरह गर्मा गया है। पिछले हफ्ते पश्चिम बंगाल गए भाजपा के राष्टÑीय अध्यक्ष जेपी नड्डा पर यहां हिंसक हमला हुआ वहीं पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे बीजेपी का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/political-violence-stains-on-indian-democracy/article-20690"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/democracy2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कोरोना काल में पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ा त्यौहार दुर्गा पूजा भले ही फीका रहा लेकिन प्रदेश के विधानसभा चुनावों को लेकर माहौल पूरी तरह गर्मा गया है। पिछले हफ्ते पश्चिम बंगाल गए भाजपा के राष्टÑीय अध्यक्ष जेपी नड्डा पर यहां हिंसक हमला हुआ वहीं पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे बीजेपी का खुद का प्रायोजित हमला बताया। भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व पर हमले को लेकर गृह मंत्रालय ने कलकत्ता से तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को प्रति नियुक्त पर केन्द्र में बुला लिया जिस पर ममता बनर्जी ने अपने अफसरों का पक्ष लेते हुए कहा कि भाजपा अफसरों को परेशान कर रही है। अभी गृहमंत्री व भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह पश्चिम बंगाल दौरे पर गए हैं और उन्होंने ममता बनर्जी के एक विधायक को भाजपा ज्वाईन करवाई है, साथ ही कहा कि चुनाव आते-आते ममता दीदी अकेली रह जाएंगी। इस वक्त पं. बंगाल में भाजपा व तृणमूल कांग्रेस मानों अपने-अपने वजूद की लड़ाई लड़ने पर आमादा हो गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीति में विचारधाराएं फैलती व सिमटती रहती हैं। पं. बंगाल में कोई समय था जब वामपंथी विचारधारा ने करीब 30 वर्ष तक एकछत्र राज किया। ज्योतिबसु व बुद्धदेव भट्टाचार्य के दौर में वामपंथियों के सामने टिकने का किसी का माद्दा ही नहीं था। ममता बनर्जी ने पं. बंगाल में वामपंथ के विरुद्ध ऐसा बिगुल बजाया कि देखते ही देखते वामपंथी अपने ही घर में बचे रहने के लिए दूसरों का सहारा ढूंढ रहे हैं। अब वक्त एक बार फिर करवट ले रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पं. बंगाल में भाजपा ने कुल 42 में से 18 सीटें जीत ली हैं, जहां कि पहले उसका कोई खास आधार नहीं था। 18 सीटों व केन्द्र में सरकार बनने से भाजपा इतनी ज्यादा आक्रमक हो गई है कि वह वहां अब विधानसभा की 200 सीट जीतने का दम ठोक रही है। आए दिन भाजपा की बढ़त रोकने को लेकर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस व भाजपा के लोग टकराए रहते हैं। अब तक दोनों ही दलों के हजारों कार्यकर्ता घायल हो चुके हैं, कुछ दर्जन लोग इस राजनीतिक हिंसा की बलि भी चढ़ गए हैं। किसी वक्त में रक्तरजिंत राजनीति का यह चलन वामपंथियों द्वारा चलाया जाता था।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में अब हालांकि झंडे व झंडों के रंग बदल चुके हैं परन्तु हिंसा का तौर तरीका वामपंथी बंगाल वाला ही है। भारत एक शांत व वृहद लोकतंत्र की पहचान है लेकिन पश्चिम बंगाल में हो रही राजनीतिक हिंसा व हत्याएं इस लोकतंत्र पर काले धब्बे के जैसी हैं। ममता बनर्जी व भाजपा दोनों ही दलों को अपनी वैचारिक व राजनीतिक लड़ाई मुद्दों पर बहस कर लड़नी चाहिए। हिंसा से कभी भी विकास के लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सकते। हिंसा की कोई विचारधारा भी नहीं होती, भले ही आज हिंसा कर रहे लोगों की यह पहचान है कि वह राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। लेकिन हिंसा करने वाले राजनीति की आड़ में अपने स्वार्थ पूरे कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव पूर्व हो रही घटनाएं अगर यूं ही जारी रहती हैं, तब अप्रैल तक जब विधानसभा चुनाव होंगे माहौल चुनावी होने की बजाय उपद्रव वाला होगा, जिससे आमजन की सही मांगें व मुद्दे खो जाएंगे जोकि अंत में पं.बंगाल का ही नुक्सान होगा। पं. बंगाल के आम नागरिकों को भी अपना राजनीतिक माहौल गर्म विचारों से पलटकर उदार विचारों पर केन्द्रित करना चाहिए ताकि उन्हें भावी विधानसभा में अच्छे विधायक मिल सकें। तृणमूल कांग्रेस व भाजपा दोनों पर भी यह महत्वपूर्ण जिम्मेवारी है कि वह भावी विधानसभा बदमाशों, हत्यारों की बजाए सुशिक्षित, ईमानदार व कर्मठ शांतिप्रिय प्रतिनिधियों की बनाएं।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 20 Dec 2020 09:46:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>लोकतंत्र में हिंसा का कोई काम नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनावों से पूर्व हिंसा का खतरा बनना चिंताजनक व शर्मनाक है। यह राज्य न तो कश्मीर की तरह आतंकवाद से प्रभावित है और न ही नक्सली हिंसा की कोई समस्या है लेकिन राजनीतिक हिंसा का खतरा इतना ज्यादा मंडरा रहा है कि भाजपा के प्रदेश इंचार्ज कैलाश विजयवर्गीय को जैड […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/no-work-of-violence-in-democracy/article-20573"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/democracy1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनावों से पूर्व हिंसा का खतरा बनना चिंताजनक व शर्मनाक है। यह राज्य न तो कश्मीर की तरह आतंकवाद से प्रभावित है और न ही नक्सली हिंसा की कोई समस्या है लेकिन राजनीतिक हिंसा का खतरा इतना ज्यादा मंडरा रहा है कि भाजपा के प्रदेश इंचार्ज कैलाश विजयवर्गीय को जैड सुरक्षा के साथ बुलेट प्रूफ गाड़ी देनी पड़ी है। ऐसे हालात लोकतंत्र की परिभाषा को कमजोर करते हैं। यदि वरिष्ठ नेताओं को किसी बड़े खतरे की संभावना है तो उस वक्त क्या होगा जब दो गुटों के हिंसक माहौल में वोटर पोलिंग बूथ पर वोट डालने जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव लोकतंत्र की आत्मा है, जिसमें वोटर स्वतंत्र व सुरक्षित है। जब कोई वोटर बिना भय के वोट ही नहीं डाल सकेगा, तब लोकतंत्र की कल्पना करना मुश्किल होगा। ऐसे में राज्य सरकार की जिम्मेवारी पर सवाल उठना स्वभाविक है कि वह अमन-शांति क्यों नहीं बहाल कर सकी। इसमें कोई संदेह नहीं कि तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो व राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी फायर ब्रांड नेता है। वे विरोधियों को बेबाकी व कड़े शब्दों में जवाब देने के लिए जानी जाती हैं, लेकिन यहां सत्ता के लिए सद्भावना को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। हालांकि अब वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए सरकार के प्रयास की चर्चा होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी तरफ विरोधी दलों ने भी टकराव से बचकर आम लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करने के लिए प्रयास करने होते हैं। ऐसी कुछ ही मिसालें हैं जब चुनाव से पूर्व दो आईपीएस अधिकारियों को डेपूटेशन पर केंद्र में लेना पड़ा है। हमारे देश के संविधान निर्माताओं व स्वतंत्रता सेनानियों ने कभी नहीं सोचा होगा कि देश में उनकी कुर्बानियां देकर मिली स्वतंत्रता का इस प्रकार अपमान होगा। सरकार बनने से भी ज्यादा आवश्यक यह बात है कि लोगों को उनके वोट के अधिकार का प्रयोग करने के लिए शांतिपूर्ण माहौल दिया जाए। लोकतंत्र की जीत तब होगी जब विकास व मुद्दों पर चर्चा होगी और पार्टी नेता आरोप-प्रत्यारोप को छोड़कर विकास की बात करेंगे। किसी पार्टी को हराने की अपेक्षा जरूरी है समस्याओं को हराना। हिंसा लोकतंत्र के नाम पर कलंक है। सभी दलों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Tue, 15 Dec 2020 10:09:54 +0530</pubDate>
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