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                <title>जेएनयू की राह पर एएमयू</title>
                                    <description><![CDATA[अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आतंकवादी मनन वानी की नमाज-ए-जनाजा को परिसर में ही गोपनीय ढंग से जिस तरह पढ़ने की नाकाम कोशिश की गई, उससे लगता है, कहीं न कहीं इसे जवाहरलाल नेहरू विवि की राह पर धकेले जाने का षड्यंत्र तो नहीं चल रहा ? हालांकि विवि प्रशासन ने तुरंत सक्रिय होकर इस गतिविधि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/amu-on-the-path-of-jnu/article-6331"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/amu-on-the-path-of-jnu.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आतंकवादी मनन वानी की नमाज-ए-जनाजा को परिसर में ही गोपनीय ढंग से जिस तरह पढ़ने की नाकाम कोशिश की गई, उससे लगता है, कहीं न कहीं इसे जवाहरलाल नेहरू विवि की राह पर धकेले जाने का षड्यंत्र तो नहीं चल रहा ? हालांकि विवि प्रशासन ने तुरंत सक्रिय होकर इस गतिविधि पर अंकुश लगाने के साथ हरकत में शामिल तीन छात्रों को निलंबित कर दिया है। सेना के हाथों जम्मू-कश्मीर की सरहद हिंदवाड़ा पर मारा गया आतंकी मनन वानी इसी विवि का छात्र था और पीएचडी कर रहा था। जनवरी 2017 में उसने सोशल मीडिया साइट पर एके-47 राइफल के साथ अपनी तस्वीर डाली थी, इसके तुरंत बाद उसे विवि से निष्कासित कर दिया गया था। यह हिजबुल मुजाहिदीन संगठन का आतंकी बन गया था। इस घटना के बाद कश्मीर से दुर्भाग्यपूर्ण पहलू में यह सामने आया है कि वहां देशविरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के पक्ष में माहौल बनाया जा रहा है। मांग की जा रही है कि यदि देशद्रोह का मुकदमा वापस नहीं लिया गया तो एएमयू में पढ़ने वाले 1200 कश्मीरी छात्र विवि छोड़ देंगे। शासन को अलगाववादियों की इस धमकी के दबाव में आने की जरूरत नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">विवि सांप्रदायिक बंटवारे से बचा रहे इस नाते यहां के प्रवक्ता प्राध्यापक शाफे किदवई और एएमयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष फैजुल हसन के निष्पक्ष व बाजिब दखल को दाद देनी होगी। जब विवि प्रशासन को इस हरकत की खबर लगी कि जम्मू-कश्मीर के रहने वाले कुछ छात्र केनेडी हॉल के पास एकत्रित होकर वानी की नमाज-ए-जनाजा पढ़ने की फिराक में हैं। इस पर विवि के सुरक्षाकर्मी व अन्य कर्मचारी मौके पर पहुंचे। फैजुल हसन भी पहुंच गए। इन लोगों ने कड़ा हस्तक्षेप करते हुए नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी। फैजुल ने बेहिचक कहा कि एक आतंकवादी के जनाजे की नमाज पढ़ना स्वीकार नहीं है और न ही कश्मीरी छात्रों को इस परिसर में ऐसा करने दिया जाएगा। एएमयू के कर्मचारियों ने भी कुछ इसी तरह का दबाव बनाया। दोनों पक्षों में तीखी बहस भी हुई। किदवई ने भी हरकती छात्रों से कहा कि वे किसी भी राष्ट्रविरोधी गतिविधि को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेंगे। विवि प्रशासन के इस विरोध के चलते हरकती छात्रों को राष्ट्रविरोधी गतिविधि बंद करनी पड़ी। इस कार्यक्रम के टलने के बाद फैजुल हसन ने स्पष्ट किया कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत करते हैं, लेकिन राष्ट्रद्रोह या आतंकवाद किसी भी हाल में सहन नहीं किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दहशतगर्दों के समर्थन का कोई भी कार्यक्रम विवि परिसर में नहीं होने दिया जाएगा। इसी बीच अलीगढ़ से भाजपा सांसद सतीश गौतम ने नमाए-ए-जनाजा पढ़ने की कोशिश करने वाले छात्रों को एएमयू से निष्कासित करने की मांग की। साथ ही उन्होंने नमाज पढ़ने से रोकने वाले फैजुल किदवई और कर्मचारियों की भी सराहना की। इस घटना का एमएमयू छात्र संघ और कर्मचारियों के हस्तक्षेप से संतोषजनक पटाक्षेप हो गया। अन्यथा यह मामला भी जेएनयू और जादवपुर विवि की तरह सांप्रदायिक रूप ले सकता था। हालांकि कश्मीर में सांप्रदायिक उभार को हवा देकर एएमयू का सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश हो रही है, जो कतई उचित नहीं है। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर इन विवि में राष्ट्रविरोधी मानसिक कुरुपता कैसे और क्यों विकसित हो रही है ? इसके पीछे वे कौन से शड्यंत्रकारी तत्व हैं, जो मासूम छात्रों के जीवन से खिलवाड़ कर धर्म के नाम पर आतंक का पाठ पढ़ाकर आतंक के अनुयायी बना रहे हैं ? इस दुश्चक्र का शुरूआती पहलू जेएनयू में फरवरी 2016 में सामने आया था। यहां अफजल गुरू के समर्थन में नारे लगने के साथ देश तोड़ने के भी नारे लगाए गए थे। हालांकि बाद में जांच से पता चला कि ये आपत्तिजनक गतिविधियां इस विवि में पिछले चार साल से चल रही थीं। बाद में इसी मामले की हुंकार पश्चिम बंगाल के जादवपुर विवि में भरी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">देशद्रोह से जुड़े नारों को लगाते वक्त षड्यंत्रकारियों ने यह भ्रम फैलाने की कवायद की थी कि इसमें मुख्यधारा के विद्यार्थी भी शामिल हैं। क्योंकि इस समूह में शामिल जेएनयू छात्रसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। हालांकि कन्हैया ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहा कि उसके रहते हुए कोई भी राष्ट्रविरोधी गतिविधि नहीं चली। उसकी संविधान में पूरी आस्था है और वह देश तोड़ने वाली ताकतों के खिलाफ है। लेकिन इस मामले में विडंबना यह रही कि जिस डेमोक्रेटिक स्टूडेंस यूनियन ने और उसके जिस नेता ने अफजल के समर्थन में नारे लगाने और देश के हजार टुकड़े करने की हुंकार भरी थी उसके विरुद्ध कोई कठोर कार्यवाही नहीं की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">इन विश्वविद्यालयों में प्रशासन और छात्रों को स्वायक्ता इसलिए दी गई है, जिससे वे कुछ मौलिक व रचनात्मक ज्ञान अर्जित करें और देश व दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाएं। शिक्षा के जो भी प्रतिष्ठान हैं, चरित्र निर्माण, सहिष्णुता, विवेकशीलता, वैचारिकता और सत्य के अनुसंधान के लिए हैं। यदि ये संस्थान सम्यक दायित्व बोध में असफल सिद्ध होते हैं तो कालांतर में ये अराजक तत्वों का सह-उत्पाद बनकर रह जाएंगे। धार्मिक कट्टरता और जातीय आरक्षण को लेकर देश में जैसे मतांतर पिछले दिनों देखने में आए हैं, वे भी शिक्षा की प्रसांगिकता पर सवाल खड़े करते हैं कि आखिर हम ऐसी कौनसी शिक्षा का पाठ पढ़ा रहे हैं, जिसके चलते छात्र धर्म और जाति के दायरे में ध्रुवीकृत हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कोई विवि यदि राष्ट्रविरोधी हरकतों के चलते चर्चा में आता है, तो वहां के शिक्षक व प्रशासक भी निंदा के दायरे में आते हैं। ऐसे में यह शक स्वाभाविक रूप में जहन में उभरता है कि क्या इनके स्वायत्ता से संबद्ध विधान, आधारभूत सरंचना, पाठ्य पुस्तकें और शोध प्रक्रिया जैसे बुनियादी तत्वों में कहीं कोई कमी है ? दरअसल जेएनय, एमएमयू, वणारस हिंदू विवि, जादवपुर विवि जैसे शीर्ष शिक्षा संस्थानों की आधारशीला रखते वक्त परिकल्पना यह की गई थी कि ये संस्थान विश्वस्तरीय वैज्ञानिक, अभियंता और चिकित्सक देंगे। लेकिन देखने में आया है कि आज तक इन विवि ने ऐसा कोई वैज्ञानिक या आविष्कारिक नहीं दिया, जिसके सिद्धांत अथवा अविष्कार को वैश्विक मान्यता या नोबेल पुरस्कार मिला हो ? क्या ऐसा वामपंथी वैचारिक जड़ता के कारण हुआ ? क्योंकि खासतौर से जेएनयू में तो परंपरा ही बन गईं है कि वामपंथी विद्धानों की इस संस्थान में नियुक्ति हो, छात्रों में इसी एकमात्र विचारधारा को वे प्रोत्साहित करें, जिससे देश में वर्ग संघर्श उत्पन्न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">बहुलतावादी वैचारिक सोच का समावेश न होने पाए। अब परिदृश्य बदल रहा है, इसलिए इस वामपंथी चौखट को तोड़ना होगा। गांधी ने भारतीय भौगोलिक परिवेश और मानसिकता के अनुसार ज्ञानार्जन की बात कही थी, उस गांधी दर्शन का प्रवेश इन परिसरों में जरूरी हो गया है। लोहिया ने समानता का भाव पैदा करने वाली शिक्षा को अंगीकार किया था। इसी तरह दक्षिणपंथी दीनदयाल उपध्याय ने अंत्योदय की बात कही है। क्यों नहीं अब विभिन्न अकादमिक पदों पर विचार भिन्नता से जुड़े अध्यापकों की भर्ती हो ? यदि ऐसा होता है तो एकपक्षीय विचारों की जड़ता टूटेगी। नए विचार संपन्न संवादों के संप्रेषण से समावेशी सोच विकसित होगी। जब हम देश की अखंडता बनाए रखने की दृष्टि से विविधता में एकता का नारा देते हैं तो फिर शिक्षा में वैचारिक एकरूपता क्यों ? जेएनयू में शायद वाम विचारधारा को महत्व इसलिए दिया जाता रहा है, जिससे दूसरे प्रकार की वैचारिकता से चुनौती मिले ही नहीं ? अब जेएनयू की तरह अन्य विश्वविद्यालयों में दक्षिणपंथी की उपस्थिति दर्ज हो रही है, तो वामपंथी धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने बचने की कोशिश में हैं। किंतु धर्मनिरपेक्षता को केवल मुस्लिम तुष्टिकरण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पाकिस्तान जिंदाबाद के नारों से मुक्त होना होगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी संविधान के दायरे में नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि आर्थिक उदारवाद के इस कठिन दौर में जिस तरह का भूमंडलीकरण उभरा है, उसके तईं सांस्कृतिक मूल्य और परिदृश्य भी तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में छात्रों की स्वतंत्रता कब स्वछंदता का रूप ले लेती है, यह रेखांकित करना मुश्किल हो जाता है। इन संस्थानों से निकले छात्र ही, कल देश के नेतृत्वकर्ता होंगे ? इस नाते इनके क्या उत्तरदायित्व बनते हैं, यह गंभीरता से सोचने की जरूरत है। अंतत: देश में समरसता और समृद्धि समावेशी उदारता से ही पनपेगी, इसलिए बहुलतावादी सोच को अंगीकार करना अनिवार्य हो गया है। <strong><em>प्रमोद भार्गव</em></strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Oct 2018 12:28:31 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी की राह पर चलेंगे इमरान</title>
                                    <description><![CDATA[इस्लामाबाद (वार्ता): क्रिकेट जगत से सियासी गलियारे में कदम रखने वाले पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के अध्यक्ष इमरान खान ने 11 अगस्त को अपने प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दक्षेस (सार्क) नेताओं को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुला सकते हैं। गौरतलब है कि भारत में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/imran-on-the-path-of-narendra-modi/article-5106"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/imran.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>इस्लामाबाद (वार्ता):</strong></p>
<p style="text-align:justify;">क्रिकेट जगत से सियासी गलियारे में कदम रखने वाले पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के अध्यक्ष इमरान खान ने 11 अगस्त को अपने प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दक्षेस (सार्क) नेताओं को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुला सकते हैं। गौरतलब है कि भारत में भारी बहुमत से जीतने के बाद वर्ष 2014 में श्री मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क नेताओं को बुलाया था। पाक चुनाव में इमरान खान की पार्टी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। रीपोर्टाें के मुताबिक इस संबंध में इमरान खान अपनी पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के वरिष्‍ठ नेताओं से चर्चा कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्‍लेखनीय है कि 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्‍ता में आए थे तो उन्‍होंने पाकिस्‍तान के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ समेत सार्क देशों के नेताओं को अपने शपथ ग्रहण कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए आमंत्रित किया था। नवाज शरीफ समेत ये नेता आए भी थे। सूत्रों के मुताबिक मोदी की तर्ज पर ही इमरान खान भी ऐसा करने की सोच रहे हैं। यह भी कहा जाता है कि अपने चुनावी अभियान में भी इमरान खान ने काफी हद तक पीएम मोदी की स्‍टाइल को अपनाया था। इस संबंध में जम्‍मू-कश्‍मीर के पूर्व मुख्‍यमंत्री फारूक अब्‍दुल्‍ला ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इससे भारत और पाकिस्‍तान के बीच अच्‍छे संबंध होंगे।</p>
<h1 style="text-align:center;">आम चुनावों में इमरान खान की पार्टी के सबसे बड़े दल के रुप में उभरी</h1>
<p style="text-align:justify;">उल्‍लेखनीय है कि 25 जुलाई को पाकिस्‍तान में हुए आम चुनावों में इमरान खान की पार्टी के सबसे बड़े दल के रुप में उभरी है। ‘नया पाकिस्‍तान’ और ‘चेंज’ का नारा देने वाले इमरान खान ने इसके बाद सोमवार को घोषणा करते हुए कहा था कि वह 11 अगस्‍त को पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। इस तारीख के ऐलान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को इमरान खान से बात की और उम्मीद जताई कि पड़ोसी देश में लोकतंत्र अपनी जड़ें गहरी करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी किए गए एक बयान के अनुसार मोदी ने पाकिस्तान में लोकतंत्र के जड़े गहरी होने की उम्मीद जताई। बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री ने पूरे क्षेत्र में शांति एवं विकास का अपना विजन भी दोहराया। इस बीच, इस्लामाबाद में खान की पार्टी ने एक बयान में कहा कि खान ने प्रधानमंत्री मोदी की शुभकामनाओं को लेकर उनका शुक्रिया अदा किया है।</p>
<h1 style="text-align:center;">‘संघर्षों का समाधान वार्ता के जरिए निकाला जाना चाहिए: इमरान</h1>
<p style="text-align:justify;">बयान में इमरान खान के हवाले से कहा गया है, ‘‘संघर्षों का समाधान वार्ता के जरिए निकाला जाना चाहिए.’’ इमरान खान ने पीएम मोदी के साथ अपनी बातचीत में यह सुझाव भी दिया कि पाकिस्तान और भारत की सरकारों को अपने-अपने लोगों को गरीबी के जाल से मुक्त कराने के लिए एक संयुक्त रणनीति बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि संघर्षों का हल करने की बजाय युद्ध और खूनखराबा त्रासदियों को जन्म देंगे।”</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि यह भी कहा जाता है कि जब नवाज शरीफ यहां आए थे तो उससे पहले भारतीय प्रधानमंत्री के आमंत्रण को स्‍वीकार करने में उनको कई दिन लग गए थे। माना जाता है कि पाकिस्‍तान सेना इस आमंत्रण को स्‍वीकार करने के खिलाफ थी। लेकिन नवाज शरीफ नहीं माने। यह भी कहा जाता है कि इस एपिसोड के बाद उनके सेना के साथ रिश्‍ते असहज होने शुरू हो गए. माना जाता रहा है कि नवाज शरीफ, भारत के साथ संबंध सुधारने के इच्‍छुक थे लेकिन अपनी सेना के कारण वह ऐसा नहीं कर सके. यह भी कहा जाता है कि भारत के साथ दोस्‍ती की चाह के कारण ही उनको सत्‍ता से बेदखल होना पड़ा और फिलहाल भ्रष्टाचार के मामले में अपनी बेटी मरियम के साथ जेल में बंद हैं।</p>
<p> </p>
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                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Aug 2018 07:19:23 +0530</pubDate>
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                <title>सरल नहीं है कैटालोनिया की राह</title>
                                    <description><![CDATA[स्पेन के उत्तर पूर्व में स्थित दूसरा सबसे बड़ा तटवर्ती राज्य कैटालोनिया अपनी आजादी को लेकर जारी संघर्ष में एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। इसी एक अक्टूबर को हुए जनमत संग्रह में कैटालोनिया के 90 फीसदी लोगों ने स्पेन से अलग होने के पक्ष में मतदान किया है। हालांकि स्पेन के मौजूदा प्रधानमंत्री और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-path-of-catalonia-is-not-easy/article-3394"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/us.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">स्पेन के उत्तर पूर्व में स्थित दूसरा सबसे बड़ा तटवर्ती राज्य कैटालोनिया अपनी आजादी को लेकर जारी संघर्ष में एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। इसी एक अक्टूबर को हुए जनमत संग्रह में कैटालोनिया के 90 फीसदी लोगों ने स्पेन से अलग होने के पक्ष में मतदान किया है। हालांकि स्पेन के मौजूदा प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ने इस जनमत संग्रह के फैसले को बलपूर्वक दबाने के लिए सभी जरूरी हथकंडे अपनाए, बावजूद इसके बड़ी संख्या में लोगों ने स्पेन से अलग होने के लिए किये गये जनमत संग्रह में कैटालोनिया की आजादी का समर्थन किया।</p>
<p style="text-align:justify;">जनमत संग्रह में लगभग 23 लाख (40 फीसदी मतदाता) लोगों ने मतदान में भाग लिया और 90 प्रतिशत से अधिक लोगो ने स्पेन से अलग होने के पक्ष मे मतदान किया। 5 लाख 5 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और पौने 5 करोड़ जनसंख्या वाला देश स्पेन 17 स्वायतशासी क्षेत्रों व प्रदेशों वाला एक संसदीय राजतंत्र है। इसके उत्तर में स्थित दो प्रदेश बास्कलैंड और कैटालोनिया पिछले लंबे समय से अपनी आजादी के लिए संघर्षरत हैंं। इससे पहले घटे घटनाक्रम में कैटालोनिया की प्रादेशिक सरकार ने 6 सितंबर को एक शासकीय आदेश जारी किया। आदेश में कहा गया कि 1 अक्टूबर को प्रदेशभर में लोगों की इस राय को जानने के लिए जनमत संग्रह करवाया जाएगा कि क्या कैटालोनिया को स्पेन से अलग व स्वतंत्र राज्य होना चाहिए या नहीं?</p>
<p style="text-align:justify;">आदेश में यह भी कहा गया कि जनमत संग्रह का परिणाम चाहे जो भी आए राज्य सरकार उससे बंधी होगी। अगर जनमत संग्रह में जनता की राय स्पेन से अलग होने के पक्ष में आती है तो प्रदेश सरकार 48 घंटों के भीतर ही, यानी तीन अक्टूबर तक कैटालोनिया को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर देगी। दूसरी ओर मैड्रिड स्थित स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय ने कैटालोनिया सरकार के शासकीय आदेश को इस आधार पर अवैध घोषित कर दिया कि संविधान में देश की अखंडता को अक्षुण बनाये रखने की बात कही गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">कैटालोनिया स्पेन का सर्वाधिक सपन्न और दूसरा सबसे बड़ा प्रदेश है। इसकी जनसंख्या 74 लाख है। यह क्षेत्र स्पेन के विकास का प्रमुख केन्द्र है। स्पेन के सकल घरेलू उत्पाद में कैटालोनिया का योगदान 20 प्रतिशत के बराबर है। बेरोजगारी भी स्पेन के अन्य प्रदेशों से कम है। प्रतिव्यक्ति आय के मामले में भी कैटालोनिया स्पेन के दूसरे राज्यों से अधिक सपन्न है, ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि कैटालोनिया के लोग स्पेन से अलग क्यों होना चाहते हैं? इसके कुछ कारण स्पेन व कैटालोनिया के इतिहास में छिपे है, तो कुछ कारण मौजूदा प्रशासनिक व राजव्यवस्था में दिखाई देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पहला कारण तो यह कि इतिहास में एक समय ऐसा था जब कैटालोनिया के लोग एक स्वतंत्र देश के नागरिक के रूप में रहे हैं, स्वतंत्र देश के नागरिक के रूप में जिन सुखसुविधाओं का उपभोग उनके पुरखों ने किया था आज के कतालन नागरिक भी उन सुविधाओं का उपभोग करना चाहते है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा यहां के लोग अपनी भाषा व अपनी संस्कृति से बेइंतहा प्रेम करते हैं, ऐसे में जब -जब उनकी स्वतंत्रता को छीना गया तब- तब उनकी भाषा और संस्कृति का गला घोंटा गया। भाषा और संस्कृति से छेड़छाड़ के प्रयास कतालन लोगों के लिए अब असहनीय हो गया। तृतीय, जनरल फ्रांको की तानाशाही के समय स्पेन के कोने कोने से 20 लाख से अधिक लोेगों को उनकी भूमि पर बसाया गया आज वही लोग उनकी स्वतंत्रता का विरोध कर रहे है। चतुर्थ, वर्ष 2006 में स्पेन में सोशलिस्ट पार्टी की सरकार के समय एक नया स्वायत समझौता हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समझौते के तहत कैटालोनिया को एक स्वायतशासी प्रदेश घोषित किया जाना था। इस समझौते पर स्पेन की संसद और कैटालोनिया की विधानसभा ने भी मुहर लगा दी। कैटालोनिया की जनता ने भी एक जनमत संग्रह में उसका अनुमोदन कर दिया था। लेकिन वर्तमान स्पेनी प्रधानमंत्री मारियानो राखोय की अनुदारवादी पार्टी (पोपुलार जनता पार्टी) ने समझौते को अदालत में चुनौती दी। 2010 में स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की व्याख्या करते कहा कि कैटालोनिया को एक राष्ट्र का दर्जा दिये जाने का कोई कानूनी आधार नहीं है, इसलिए एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में किये गए समझौते की बहुत सी धाराए अवैध है।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वोच्च अदालत के इस निर्णय से कतालन की जनता की भावनाए आहत हुई। नतिजतन कैटालोनिया के नागरिक पूर्ण स्वतंत्रा की मांग करने लगे। पांचवा कारण कतालन लोगों की रोजी-रोटी व पेट से जुड़ा हुआ है। यूरो मुद्रा वाले देशोंं में यूनान के बाद अब स्पेन ही ऐसा राष्ट्र है जो आर्थिक दीवालियेपन के नजदीक है। आर्थिक मंदी से उबरने के लिए सरकार ने खर्च में कटौतियों का जो निर्णय किया उससे कैटालोनिया व बास्कलैंड जैसे खुशहाल प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित हुए। वे अपनी वित्तीय ंहिस्सेदारी को स्पेन के अन्य प्रदेशों के साथ बाटने के लिए तैयार नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर स्पेन की शासन व्यवस्था और वहां का संविधान ईकाईयों को संघ से अलग होने की इजाजत नहीं देता हैै। ऐसे में कतालन लोगों को अपनी आजादी के लिए आरंभ किये गये आंदोलन का प्रतिफल कब प्राप्त होगा कहा नहीं जा सकता है। यद्यपि 1978 से लागू लोकतांत्रिक राजशाही वाले स्पेन के वर्तमान संविधान में कैटालोनिया को एक स्वयातशासी प्रदेश का दर्जा तो दे दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उनकी एक स्वतंत्र प्रदेश की मांग की राह इतनी आसान नहीं है, जिसको कैटालोनिया के नागरिक गांधीवादी सिंद्वातों के मार्फत प्राप्त करना चाहते है। सच तो यह है कि जब तक स्पेन की सरकार और वहां का संविधान कैटालोनिया की स्वतंत्रता का समर्थन नहीें करेगे तब तक कैटालोनिया एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व मानचित्र पर उभर पाएगा इसमें सन्देह है?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-एन.के. सोमानी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Oct 2017 04:52:11 +0530</pubDate>
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                <title>कश्मीर बनने की राह पर कर्नाटक</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/karnataka-on-the-path-to-becoming-kashmir/article-2497"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/karnatka.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Karnataka</strong> की कांगे्रस सरकार ने राज्य के लिए अलग झंडे की मांग करके एक नई राजनीतिक चाल चली है। वास्तव में यह पूरा कदम अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति पर उठाया हुआ दिखाई दे रहा है। कांगे्रस को यह बात अच्छी तरह से समझना चाहिए कि राज्य हित से देश हित बड़ा होता है और देश में पहले से ही राष्ट्रीय ध्वज के रुप में तिरंगा बहुत ही आदर का पात्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब पूरा देश राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर एक भाव का प्रदर्शन करता है तो कर्नाटक की सरकार ने राज्य के अलग ध्वज बनाने का खेल क्यों खेला है, यह समझ से परे है। राष्ट्रीय महत्व को प्रतिपादित करने वाले विषयों को महत्वहीन बनाने का यह खेल निश्चित रुप से राष्ट्रवाद पर करारा प्रहार कहा जा सकता है। हमारा प्रत्येक राज्य राष्ट्रीय महत्व का हिस्सा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उसकी संस्कृति भी राष्ट्रीय संस्कृति है। इसी कारण से ही हम विविधता में एकता के भाव को विश्व में संचरित कर रहे हैं। और यही भाव हमारे देश की विशेषता है। देश में स्वतंत्रता संग्राम में जान देने वाले महापुरुषों के मन में भारत के प्रति यही भाव रहा कि भारत एक देश रहे, उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक एक ही संस्कार रहें। उन्होंने पूरे भारत के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके मन में कोई भेद नहीं था। भूमि के टुकड़े का कोई लगाव या अलगाव नहीं था। उनके भाव यही प्रदर्शित करते थे कि सारा भारत एक है। लेकिन आज हम क्या देखते हैं भारतीय समाज में वैमनस्य का भाव पैदा करके वर्तमान राजनीतिक दल फूट डालने का काम कर रहे हैं। आज अगर आजादी की लड़ाई में प्राणों का उत्सर्ग करने वाले महापुरुष जीवित होते तो हमारे राजनीतिक दलों की कार्यपद्धति को कोस रहे होते।</p>
<p style="text-align:justify;">कांगे्रस पर सदैव यह आरोप लगते रहे हैं कि उसने इन महापुरुषों के भाव को पूरी तरह से त्याग दिया है। कश्मीर को अलग राज्य का दर्जा देना और अब कर्नाटक में अलग पहचान स्थापित करने की लालसा से अलग झंडा बनाना क्या संदेश दे रहा है। कहीं हम गलत राह पर तो नहीं जा रहे हैं। ऐसे कदम राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा साबित भी हो सकते हैं। वास्तव में यह कदम फूट डालो और राज करो जैसा ही कहा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां एक सवाल यह आता है कि कांगे्रस राष्ट्रीय महत्व के विषयों को हमेशा बौना करने का काम क्यों करती है। हम जानते हैं कि जम्मू कश्मीर राज्य में अलग ध्वज है, उसे कांगे्रस ने विशेष राज्य का दर्जा दिया। वर्तमान में कश्मीर की स्थिति क्या है, यह किसी से छिपी नहीं है। क्या कांगे्रस सरकार कर्नाटक को अलग पहचान देकर कश्मीर जैसा बनाने की राजनीति कर रही है। अगर यह सत्य है तो यह कदम देश की संप्रभुता के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ ही माना जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">समझा जा रहा है कि कर्नाटक में आगामी वर्ष में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार ने यह राजनीतिक षड्यंत्र किया है। इसके लिए सरकार ने नौ सदस्यों की एक समिति भी बनाई है, जो राज्य के अलग झंडे का स्वरुप तय करेगी, इसके साथ ही उसे कानूनी मान्यता दिलाने की संभावनाओं का अध्ययन करेगी। हालांकि केन्द्र सरकार ने इस मांग को देश विरोधी मानते हुए खारिज कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन कांगे्रस सरकार ने अलग झंडा बनाने की तैयारियां जारी रखी हैं। इससे कांगे्रस की इस मानसिकता का पता चलता है कि वह कर्नाटक को किस दिशा की ओर ले जाने का रास्ता बना रही है। कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के कारण ही वहां वर्षों से निवास कर रहे हिन्दुओं को प्रताड़ित किया गया, और उन्हें वहां से भागने के लिए मजबूर कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में कश्मीर घाटी पाकिस्तानी मानसिकता के दंश से पीड़ित है। कश्मीर के वर्तमान को देखते हुए कर्नाटक में अलग ध्वज बनाने की मंशा क्या एक और कश्मीर बनाने का मार्ग प्रशस्त नहीं कर रही? वास्तव में देखा जाए तो कांगे्रस सरकार का यह कदम कर्नाटक को भारत से काटने जैसा ही कहा जाएगा। क्योंकि जब भारत का एक राष्ट्रीय ध्वज विद्यमान है, तब इस प्रकार की मांग करना पूरी तरह से बेतुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में आज जिस प्रकार से अराष्ट्रीय करण का भाव पैदा हो रहा है या किया जा रहा है, उससे लोगों के मन में देश के प्रति अलगाव की स्थिति भी निर्मित हो रही है। कर्नाटक को अलग पहचान दिलाने वाली कार्यवाही क्या कर्नाटक के लोगों के मन में देश के प्रति अलगाव पैदा नहीं करेगा। जैसा कश्मीर में दिखाई दे रहा है, वहां भारत के प्रति अलगाव की स्थिति बनी हुई है। अलगाववाद के नाम पर कई नेता पाकिस्तान के संकेत पर वहां की जनता को गुमराह कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कर्नाटक राज्य के लिए कांगे्रस सरकार द्वारा अलग झंडे की मांग को राजनीतिक चाल के तौर में भी देखा जा रहा है। राजनीतिक लाभ के लिए इस प्रकार की विभाजन पैदा करने वाली मानसिकता देश के लिए घातक है। कर्नाटक राज्य के लिए अलग झंडे की मांग को अगर केन्द्र सरकार नकारती है तो राज्य की कांगे्रस सरकार को प्रचार करने का एक नया तरीका मिल जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही राज्य की संप्रभुता और मुद्दे के भावनात्मक स्वरूप को देखते हुए विपक्षी दल भाजपा और जनता दल एस भी खुलकर इसका विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि इससे कन्नड़ एवं कर्नाटक विरोधी होने का ठप्पा लग जाएगा। पिछले दिनों बेंगलूरु मेट्रो में कन्नड़ और अंग्रेजी के साथ हिंदी में लिखे नाम देखकर कुछ लोगों ने राज्य पर हिंदी को थोपने का आरोप लगाया था। हिन्दी के प्रति दुराभाव भी ऐसे ही राजनीतिक कारणों की देन है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद कांग्रेस सरकार के इस कदम को अगला पड़ाव बताया जा रहा है। कश्मीर को छोड़कर देश के किसी भी अन्य राज्य के लिए कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त कोई भी ध्वज नहीं है। सांस्कृतिक और क्षेत्रीय दृष्टिकोण से झंडे फहराए जाते हैं लेकिन ऐसे झंडे किसी राज्य या क्षेत्र का कानूनी रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं भारतीय राष्ट्र ध्वज नियमों के अनुसार कोई भी ध्वज तिरंगे का अपमान नहीं कर सकता। साथ ही कोई भी दूसरा ध्वज अगर तिरंगे के साथ फहराया जाता है तो उसे तिरंगे से नीचे रखा जाएगा। हालांकि जम्मू और कश्मीर का अलग ध्वज इसलिए है क्योंकि राज्य को धारा-370 के तहत विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुरेश हिंदुस्थानी</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Fri, 21 Jul 2017 04:00:32 +0530</pubDate>
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