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                <title>Politician - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>पवार ने मचाई विपक्ष में खलबली</title>
                                    <description><![CDATA[क्या प्रधानमंत्री मोदी को परास्त किया जा सकता है? उन्हें परास्त करने के (Sharad Pawar) लिए क्या करना होगा? क्या उनका कोई विकल्प है? क्या कोई ऐसा नेता है जो उनकी बराबरी कर सकता है? क्या विपक्ष में एकजुटता हो सकती है? क्या विपक्षी दल ऐसा करने के लिए तैयार हैं? ऐसे अनेक प्रश्न हैं। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/pawar-created-a-panic-in-the-opposition/article-47381"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/editorial.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">क्या प्रधानमंत्री मोदी को परास्त किया जा सकता है? उन्हें परास्त करने के (Sharad Pawar) लिए क्या करना होगा? क्या उनका कोई विकल्प है? क्या कोई ऐसा नेता है जो उनकी बराबरी कर सकता है? क्या विपक्ष में एकजुटता हो सकती है? क्या विपक्षी दल ऐसा करने के लिए तैयार हैं? ऐसे अनेक प्रश्न हैं। विगत माह राकांपा नेता शरद पवार ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हिंडनबर्ग-अदानी मुद्दे पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की मांग पर कहा है कि उन्हें जेपीसी के गठन में कोई तर्कसंगता नहीं दिखाई दे रही है और अडानी को निशाना बनाया जा रहा है और इस प्रकार उन्होंने विपक्षी दलों में एकता की मृग मरीचिका को भी भेद दिया है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="जालंधर लोकसभा उपचुनाव : फीका रहा चुनाव प्रचार" href="http://10.0.0.122:1245/jalandhar-lok-sabha-by-election/">जालंधर लोकसभा उपचुनाव : फीका रहा चुनाव प्रचार</a></p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि मेरे विचार से बेरोजगारी, महंगाई, किसानों के मुद्दे जैसे रोजी-रोटी से जुडे हुए मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने ऐसे समय पर कुछ अन्य दलों की भावनाओं को व्यक्त किया जब कांग्रेस नेतृत्व विपक्षी एकता के लिए उनकी मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है और यह बताता है कि अडानी मुद्दे पर विपक्षी दलों में भी मतभेद हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले में पवार और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी के विचार एक समान लगते हैं (Sharad Pawar) और उन्होंने जेपीसी के गठन के लिए कांगे्रस के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन से दूरी बना ली थी। मोदी द्वारा प्रत्येक दिन भ्रष्टाचार पर हमला करने को विपक्ष अडानी मुद्दे और अपने विरुद्ध चलाए जा रहे अभियान को निष्फल करने के रूप में देखता है और नेतृत्व, विकास, हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के साथ-साथ एक चौथा मुद्दा भी उठाया जा रहा है। विशेषकर उच्चतम न्यायालय द्वारा विपक्षी नेताओं के विरुद्ध सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के दुरूपयोग के विरुद्ध विपक्ष की याचिका को सुनने से इनकार करने के बाद ऐसा देखने को मिल रहा है।</p>
<h3>कांग्रेसी नेता भी सशंकित | Sharad Pawar</h3>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा भाजपा ने इसमें हिन्दुत्व की विचारधारा को समाहित कर राजनीतिक माहौल को बदला है। विपक्षी दल इस मोर्चे पर इसका विरोध करने के लिए साझा वैचारिक आधार या नरम हिन्दुत्व अपनाने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। मोदी को अपने व्यक्तित्व और विपक्षी दलों में मतभेद का लाभ मिल रहा है। हालांकि इसके परिणाम गिलास आधा भरा या आधा खाली हो सकता है। कांग्रेसी नेता भी सशंकित हैं कि क्या अडानी मुद्दे से लोगों में राजनीतिक और चुनावी जागृति पैदा हो रही है या इसका भी वही हश्र होगा जो 2019 के चुनावों से पूर्व राहुल द्वारा बनाए गए राफेल मुद्दे का हुआ था क्योंकि उस वक्त भी राफेल मुद्दा भी मतदाताओं को नहीं लुभा पाया था और भाजपा को प्रशासन की अनेक खामियों और कमियों से मतदाताओं का ध्यान हटाने में मदद मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">न जाने क्यों राहुल को अपनी बात से मुकरने की आदत पड़ गई है। वे बार-बार राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के विचारक सावरकर के विरुद्ध टिप्पणियां करते हैं जिससे महाराष्ट्र में उनके सहयोगी उद्धव ठाकरे की पार्टी नाराज हो गई है जो उन्हें महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मानती है। क्या ये सभी 16 विपक्षी दल जिन्होंने अडानी मुद्दे पर कांगे्रस के साथ संसद में विरोध प्रदर्शन किया, क्या वे एकजुट रह पाएंगे, इस बारे में अनेक आशंकाएं हैं। ममता ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वे 2024 का चुनाव अकेले लड़ेंगी और किसी भी विपक्षी गठबंधन में शामिल नहीं होंगी। यही रूख समाजवादी पार्टी के अखिलेश का भी है। साथ ही कांग्रेस में कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी नेतृत्व को मोदी सरकार के विरुद्ध अभियान को व्यापक बनाना चाहिए और उसमें ऐसे आर्थिक मुद्दे भी शामिल करने चाहिए जो आम आदमी को प्रभावित कर रहा है।</p>
<h3>विपक्षी दलों की एकता में दो मुख्य अडचनें</h3>
<p style="text-align:justify;">पार्टी के रायपुर महाधिवेशन में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से बनी लोकप्रियता को भुनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी को ऐसी रणनीति बनानी चाहिए जिसके अंतर्गत वह स्वयं एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में अपनी सर्वोच्चता का प्रदर्शन न करे ताकि उसे महागठबंधन बनाने में आसानी हो। इसके अलावा चुनावों से पूर्व प्रधानमंत्री पद की घोषणा न की जाए। किंतु पार्टी उच्च कमान किसी क्षेत्रीय नेतृत्व को स्वीकार कर अपनी सर्वोच्च राष्ट्रीय स्थिति को छोड़ने या निर्णय लेने में नेहरू-गांधी के परिवार के उत्तराधिकारियों की स्थिति के साथ कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं है और विपक्षी दलों की एकता में ये दो ही मुख्य अडचनें हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विपक्षी दलों में पहले ही इस मुद्दे पर मतभेद हैं कि कांग्रेस के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। ममता की तृणमूल कांगे्रस, केजरीवाल की आप और चन्द्रशेखर राव की बीआरएस, जिनके मिलाकर लोक सभा में 80 सीटें हैं, वे विपक्षी छतरी के नीचे कांग्रेस के खिलाफ हैं। स्टालिन की द्रमुक, नीतीश की जद (यू) लालू की राजद, सोरेन की जेएमएम, ठाकरे की शिवसेना आदि कांग्रेस की समर्थक हैं और वे मिलकर 100 सीटों पर चुनाव लड़ सकते हैं। तीसरा समूह अवसरवादी नेताओं का है जो किसी भी ओर जा सकते हैं हालांकि वे अपने अपने राज्यों में अपना स्थान कांग्रेस को देना नहीं चाहते हैं किंतु सत्ता के बंटवारे में कांग्रेस के साथ जाने के लिए तैयार हैं।</p>
<h3>अन्य दल चिंतित</h3>
<p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र में पवार की राकांपा, कर्नाटक में गौडा की जद (एस), उत्तर प्रदेश मे अखिलेश की सपा, मायावती की बसपा तथा वामपंथी दल आदि की मिलाकर लगभग 80 सीटें हैं। वामपंथी दल की अब केरल के अलावा कहीं उपस्थिति नहीं रह गई है किंतु दूसरी ओर ओडिशा में पटनायक की बीजद और आंध्र प्रदेश में जगनरेड्डी की वाईएसआर-सीपी को किसी राजनीतिक शिविर में जाने के बजाय अपने-अपने राज्य महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा का सीधा मुकाबला है जहां से लोक सभा की 90 सीटें हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस स्वयं को विपक्षी एकता का केन्द्र मानती है किंतु वह दो कटु वास्तविकताओं को नजरंदाज करती है कि पहले वह अपनी पार्टी में व्यवस्था बनाने का संघर्ष कर रही है और विभिन्न राज्य इकाइयों में विद्रोह हो रहा है। दूसरा, उसका चुनावी गणित उसके पक्ष में नहीं है जैसा कि हाल ही में पूर्वोत्तर क्षेत्र में देखने को मिला है और त्रिपुरा विधान सभा चुनावों में माकपा के साथ उसका गठबंधन था पर वह अपने मतों को माकपा को अंतरित नहीं करा पाई और इससे अन्य दल चिंतित हैं। एक क्षेत्रीय नेता का कहना है कि हम अपने राज्य में भाजपा का आसानी से मुकाबला कर रहे हैं और दिल्ली में कांगे्रस को मजबूत बनाने में हमारी कोई रुचि नहीं है क्योंकि हमारे राज्य में उससे हमें कोई मदद नहीं मिलती।</p>
<h3>गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में पैर जमाना चाहती है आप</h3>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा राज्य स्तरीय चुनाव जीतना एक बात है और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विरुद्ध जीत के लिए विभिन्न विचारधारा वाले विपक्षी दलों का एक क्षेत्रीय नेता द्वारा नेतृत्व करना अलग बात है। इसके अलावा एक व्यापक आधार वाले गठबंधन का दृष्टिकोण शायद सफल न हो क्योंकि राज्यों में कांग्रेस को अपने प्रतिद्वंदियों के साथ कार्य करना कठिन हो जाएगा। जरा सोचिए कांग्रेस तथा आप दिल्ली-पंजाब में प्रतिद्वंदी हैं और शायद आप गठबंधनों की ऐसी धारणा को स्वीकार नहीं करेगी क्योंकि अब उसे एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता मिल गई है और वह गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में अपने पैर जमाना चाहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">विपक्षी दलों में तब भी एकता का अभाव देखने को मिला जब आठ विपक्षी दलों ने आप के मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के विरुद्ध पत्र लिखा। किंतु कांग्रेस सहित तीन विपक्षी दलों ने ऐसा नहीं किया। यही स्थिति तेलंगाना में भी है जहां पर चन्द्रशेखर राव की बीआरएस और कांग्रेस आमने-समने हैं। इसलिए कांग्रेस विपक्षी एकता का आधार और उसमें अड़चन दोनों हैं। जब तक कांग्रेस अपने अहंकार को नहीं त्याग देती और क्षेत्रीय नेताओं के साथ बातचीत के लिए पहल नहीं करती और अनचाहे ही सही उन्हें राजनीतिक स्थान नहीं देता तब तक विपक्षी एकता की बातें सफल नहीं होंगी।</p>
<h3>विपक्ष ने पिछले आठ सालों में मतदाताओं को समझाने का कोई प्रयास नहीं किया</h3>
<p style="text-align:justify;">भाजपा को हराना और मोदी को हटाने का लक्ष्य स्पष्ट है, किंतु जिस तरह से विपक्षी दलों में अहंकार, नकारात्मकता और अपने-अपने स्वार्थ हैं, उससे यह आसान नहीं है। दुर्भाग्यवश विपक्षी या उनके नेताओं ने पिछले आठ सालों में मतदाताओं को समझाने का कोई प्रयास नहीं किया है कि वे भाजपा से बेहतर शासन दे सकते हैं। इस वर्षान्त विशेषकर कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश में वाले विधान सभा चुनाव भाजपा और विपक्षी दलों के लिए सेमीफाइनल होगा जहां पर कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है।</p>
<p>विपक्षी दलों को ऐसी भाषा और अन्य उपायों को करना होगा जो भाजपा के दृढ़ संकल्प, भाषा अर्थात चुनाव लड़ने वाली मशीन का मुकाबला कर सके। मोदी ने हिन्दुत्व का मुद्दा पुन: उठाकर पहल कर दी है। वे राष्ट्रवाद और देश के आत्मसम्मान के मुद्दे को उठा रहे हैं और उसको पुन: परिभाषित कर रहे हैं। जब तक दृष्टिकोण में एकरूपता न हो विपक्षी दल मतदाताओं को केवल एकता का सपना ही दिखा सकते हैं। रैलियों में नारों से परे भाजपा के विरुद्ध कौन बिगुल बजाएगा?</p>
<p style="text-align:right;"><strong>पूनम आई कौशिश</strong><br />
<strong>वरिष्ठ लेखिका एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखिका के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 May 2023 11:01:12 +0530</pubDate>
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                <title>यादें शेष : आदर्श राजनेता थे जॉर्ज फर्नांडीज</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक राजनेताओं की श्रेणी शामिल प्रसिद्ध समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीज अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन देश के लिए उनके किए गए कार्य जॉर्ज फर्नांडीज को चिरकाल तक जीवित रखेंगे। 88 वर्षीय जॉर्ज फर्नांडीज अल्जाइमर की बीमारी से पीड़ित थे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज भारतीय राजनीति की प्रमुख हस्तियों में से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक राजनेताओं की श्रेणी शामिल प्रसिद्ध समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीज अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन देश के लिए उनके किए गए कार्य जॉर्ज फर्नांडीज को चिरकाल तक जीवित रखेंगे। 88 वर्षीय जॉर्ज फर्नांडीज अल्जाइमर की बीमारी से पीड़ित थे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज भारतीय राजनीति की प्रमुख हस्तियों में से एक रहे हैं। अपनी आवाज से देश और राज्यों की सरकार को हिला देने वाले जॉर्ज फर्नांडीज के कई आंदोलन पूरे देश की आवाज बनते हुए दिखाई दिए। इसका कारण एक मात्र यही था कि उन्होंने सत्ता के लिए राजनीति नहीं की, वह मात्र जन हित की राजनीति ही करते रहे। इस कारण उन्हें जनता की आवाज कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं कही जाएगी। एक बार जॉर्ज फर्नांडीज ने 1974 में आॅल इंडिया रेलवेमैन फेडरेशन के प्रमुख रहते हुए ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल की थी, जिसने सरकार को हिलाकर रख दिया था। इस हड़ताल की गूंज पूरे देश में सुनाई दी। इसके साथ ही जॉर्ज फर्नांडीज ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के संत्राश को भी भोगा। जॉर्ज फर्नांडीज ने आपातकाल के विरुद्ध देश भर में ऐसी आवाज उठाई कि सरकार भी सोचने पर विवश होती दिखाई दी। इसके बाद जॉर्ज फर्नांडीज ऐसे भूमिगत हुए कि जांच एजेंसिया भी उनका सुराग नहीं लगा सकीं।</p>
<p style="text-align:justify;">जॉर्ज फर्नांडीज बिहार के मुजफ्फरपुर सीट से चार बार सांसद रहे। 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरपुर से जीते थे। उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में रेलवे मंत्री के पद पर अपनी सेवा दी। उनका रेल मंत्री का कार्यकाल आज भी एक आदर्श उदाहरण के रुप में याद किया जाता है। 1998 के चुनाव में वाजपेयी सरकार पूरी तरह सत्ता में आयी थी उस वक्त राजग का गठन हुआ था। इस वक्त जॉर्ज फर्नांडीस राजग के संयोजक भी रहे। उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल का उपयोग करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को सफलतापूर्वक चलाने में अभूतपूर्व योगदान दिया। वे राजग की सरकार में दोनों बार रक्षामंत्री बने। वे जब रक्षामंत्री के पद पर थे तभी पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया, जिसके बाद कारगिल युद्ध हुआ था। भारतीय सेना ने तब आॅपरेशन विजय के दौरान पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे कर दिये थे। इतना ही नहीं पाकिस्तान की सेना ने भारतीय सेना की शक्ति के समक्ष अपने घुटने टेक दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">जॉर्ज फर्नांडीज वास्तव में भारतीय राजनीति के एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में शुचिता का उदाहरण प्रस्तुत किया। हमें स्मरण होगा कि जॉर्ज फर्नांडीज के रक्षा मंत्री रहते हुए रक्षा सौदे का एक झूठ पर आधारित घोटाला सामने आया, जिसके चलते उन्होंने भारतीय राजनीति में आदर्श प्रस्तुत करते हुए अपने पद से त्याग पत्र दे दिया, लेकिन जब वे पूरी तरह से निर्दोष सावित हो गए, तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें ससम्मान केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया। पूर्णत: ईमानदारी की राह पर चलने वाले जॉर्ज फर्नांडीज को वर्तमान राजनीति ने न तो अपनी जिम्मेदारियों से भटकने के लिए मजबूर किया और न ही वे सिद्धांतों से समझौता ही करते दिखाई दिए। जॉर्ज फर्नांडीज के बारे में कहा जाता है कि वे फक्कड़ स्वभाव के राजनेता थे, जिन्होंने कभी अपने कपड़ों पर प्रेस नहीं की और न ही अपने बालों में कंघी का उपयोग किया। वे कभी चमक दमक भरी राजनीति नहीं करते थे, उनका व्यक्तित्व ही उनकी चमक का पर्याय था।</p>
<p style="text-align:justify;">जॉर्ज फर्नांडीज का जन्म 3 जून 1930 को कर्नाटक के मैंगलोर में एक ईसाई परिवार में हुआ था। वे पहले जनता पार्टी और बाद में बने जनता दल के प्रमुख रहे। जनता दल से अलग होकर उन्होंने समता पार्टी की स्थापना की, जो आज की जनता दल यूनाइटेड है, जिसके नेता नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने मोरारजी देसाई की जनता पार्टी और अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में संचार, उद्योग, रेलवे और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी बखूबी संभाली। जॉर्ज के माता-पिता ने उन्हें ईसाई धर्म की शिक्षा के लिए बैंगलोर भेजा था, उन्होंने पादरी बनने का प्रशिक्षण भी लिया, लेकिन वे पादरी न बनकर एक मजदूर नेता के रुप में प्रसिद्ध होते चले गए। बाद में भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरकर सामने आए। भारतीय राजनीति में जिस प्रकार से उनके रक्षा मंत्री के कार्यकाल को कारगिल युद्ध में भारत की शानदार विजय के रुप में स्मरण किया जाता है, ठीक वैसे ही उनके उद्योग मंत्री रहते हुए भी देश भाव की राजनीति का प्रकटीकरण भी होता दिखाई दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के समय में यह बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि 1977 में जब वे देश के उद्योग मंत्री रहे, तब गलत तरीके से व्यापार करने वाली विदेशी कंपनियों पर शिकंजा कसा और आईबीएम, कोका कोला कंपनी को देश छोड़ने का निर्देश प्रसारित किया। जॉर्ज फर्नांडीज का यह कदम निसंदेह विदेशी कंपनियों की बढ़ती मनमानी को रोकने के लिए राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा देने वाला ही था। जॉर्ज फर्नांडीज के इस कदम की देश के छोटे व्यापारियों ने भरपूर प्रशंसा की।जॉर्ज फर्नांडीज भले ही अपनी बीमारी के चलते वर्तमान में सक्रिय राजनीति से दूर रहे, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्यों की अमिट छाप देश की राजनीति के लिए स्थायी भाव पैदा करने वाली है। उन्होंने हमेशा मन, वचन और कर्म से भारत के लिए ही जीवन जिया। कहा जाता है कि व्यक्ति शरीर रुप से भले ही इस संसार से विदा हो जाए, लेकिन उसके कार्य व्यक्ति को हमेशा जिन्दा रखते हैं। उनके कर्म का एक मात्र सिद्धांत यही था कि उनके सारे कार्य उनके अपने लिए नहीं थे, वे सदैव दूसरों की ही चिंता किया करते थे। ऐसे राजनेता आज के समय में बहुत ही कम हैं। कई व्यक्ति तो देवलोक गमन करने के बाद चर्चा के केन्द्र बनते हैं लेकिन जॉर्ज फर्नांडीज एक ऐसे राजनेता थे, जो अपने जीवनकाल में भारतीय राजनीति के आदर्श बन गए थे। आज के राजनेताओं के लिए जॉर्ज फर्नांडीज का जीवन एक आदर्श है। जिस पर हर किसी को चलना ही चाहिए।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></p>
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<p>Ideal, Politician, George Fernandes</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 29 Jan 2019 19:52:54 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>फारुख आसमान की तरफ मुंह कर न थूकें</title>
                                    <description><![CDATA[नेताओं के लिए शायद सत्ता ही सब कुछ है, राष्ट्र एवं राष्ट्रवासी उनके लिए महज सत्ता पाने व भोगने के साधन मात्र हैं। तभी तो फारूख अब्बदुला जैसे नेता कभी पत्थरबाज युवाओं को आजादी के लड़ाके बोलते हैं कभी कश्मीर के हल में तीसरे पक्ष की बात करते हैं। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न भाग […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/miserable-behavior-of-farooq-abdullah/article-2528"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/farooq-abdullah1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नेताओं के लिए शायद सत्ता ही सब कुछ है, राष्ट्र एवं राष्ट्रवासी उनके लिए महज सत्ता पाने व भोगने के साधन मात्र हैं। तभी तो फारूख अब्बदुला जैसे नेता कभी पत्थरबाज युवाओं को आजादी के लड़ाके बोलते हैं कभी कश्मीर के हल में तीसरे पक्ष की बात करते हैं। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न भाग है, जिसका एक हिस्सा पाकिस्तान ने व दूसरा हिस्सा चीन ने अवैध तौर पर अपने कब्जे में ले रखा है। अपना ही जमीन को वापिस पाने के लिए भारत को किसी तीसरे की सलाह क्यों चाहिए? फिर फारूख अब्बदुला से सलाह मांगी किसने है कि वह कश्मीर का हल करें? फारूख अब्दुल्ला को कश्मीर ने सब कुछ दिया। मान-सम्मान, ताज तक दिया वह क्यों नहीं पाकिस्तान व चीन को ललकारते की उसकी सरजमीं को खाली कर दें।</p>
<p style="text-align:justify;">फारूख अब्दुल्ला जिन अलगाववादियों या आतंकियों की सहानुभूति या समर्थन चाहने के स्वार्थ में कश्मीर के साथ दोगला व्यवहार कर रहे हैं, वह लोग तो महज चंद सिक्कों में बिक जाने वाले प्यादे हैं, जिन्हें पाकिस्तान ने हर माह पगार पर रख छोड़ा है, वह जननेता नहीं हैं। कश्मीरी ऐसे पाक परस्त नेताओं के बारे में जानते हैं कि उनके हाथों में पत्थर देने के सिवा कुछ नहीं है, नहीं तो क्या कश्मीरी उन्हें सत्ता नहीं सौंप दें? अभी अब्दुल्ला यदि सत्ता से बाहर हैं तब उन्हें चाहिए कि वह कश्मीर के उन युवाओं को समय दें, जो कश्मीर व भारत सरकार से नाराज हैं। फारूख अब्बदुला उन्हें समझा सकते हैं कि किसी की नाराजगी सरकार से हो सकती है, कश्मीर व राष्ट्र ने उनका क्या बिगाड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">युवा कच्ची मिट्टी जैसे होते हैं, जो बहकते भी बहुत जल्द हैं और समझते भी बहुत जल्द हैं। फारुख कश्मीरी युवाओं को खेती, बागवानी, पर्यटन, इंजीनियरिंग, प्रशासनिक सेवाओं में जाने की शिक्षा दे सकते हैं। नेशनल कांफ्रैंस विपक्ष में बैठी है तो क्या? पार्टी मर थोड़े ही गई है। चीन पाकिस्तान दोनों मिलकर भी नेश्नल कांफ्रैंस का भला नहीं कर सकते जितना भला कि कश्मीर के लिए नेश्नल कांफ्रैंस को चुनने वाले कर सकते हैं। अत: फारूख अब्बदुला को राष्ट्र व कश्मीरियों के साथ खड़ा होना चाहिए न कि चीन या पाकिस्तान के साथ। कश्मीर भारत का हिस्सा है इस तथ्य को फारूख अब्बदुला मिटा नहीं सकते। अत: वह आसमान की तरफ मुंह करके थूकने की जहमत न उठाएं, भारत की समस्या को भारत स्वयं सुलझा लेगा। बस समय का फेर है।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Jul 2017 03:32:13 +0530</pubDate>
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