<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/andolan/tag-4592" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>Andolan - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/4592/rss</link>
                <description>Andolan RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अब एक नयी सम्पूर्ण क्रांति हो</title>
                                    <description><![CDATA[आजादी के आंदोलन से हमें ऐसे बहुत से नेता मिले जिनके प्रयासों के कारण ही यह देश आज तक टिका हुआ है और उसकी समस्त उपलब्धियां उन्हीं नेताओं की दूरदृष्टि और त्याग का नतीजा है। ऐसे ही नेताओं में जीवनभर संघर्ष करने वाले और इसी संघर्ष की आग में तपकर कुंदन की तरह दमकते हुए […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/now-there-is-a-whole-new-revolution/article-3383"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/leaders.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आजादी के आंदोलन से हमें ऐसे बहुत से नेता मिले जिनके प्रयासों के कारण ही यह देश आज तक टिका हुआ है और उसकी समस्त उपलब्धियां उन्हीं नेताओं की दूरदृष्टि और त्याग का नतीजा है। ऐसे ही नेताओं में जीवनभर संघर्ष करने वाले और इसी संघर्ष की आग में तपकर कुंदन की तरह दमकते हुए समाज के सामने आदर्श बन जाने वाले पे्ररणास्रोत थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण। जो अपने त्यागमय जीवन के कारण मृत्यु से पहले ही प्रात: स्मरणीय बन गये थे। अपने जीवन में संतों जैसा प्रभामंडल केवल दो नेताओं ने प्राप्त किया। एक महात्मा गांधी थे तो दूसरे जयप्रकाश नारायण। इसलिए जब सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद वे 1974 में ह्यसिंहासन खाली करो जनता आती है के नारे के साथ वे मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा, जैसे किसी संत महात्मा के पीछे चल रहा हो।</p>
<p style="text-align:justify;">11 अक्टूबर, 1902 को जन्मे जयप्रकाश नारायण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। वे समाज-सेवक थे, जिन्हें लोकनायक के नाम से भी जाना जाता है। 1999 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल भी उनके नाम पर है।लोकनायक जयप्रकाशजी की समस्त जीवन यात्रा संघर्ष तथा साधना से भरपूर रही। उसमें अनेक पड़ाव आए, उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि आम जनजीवन को एक नई दिशा दी, नए मानक गढ़े।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे- भौतिकवाद से अध्यात्म, राजनीति से सामाजिक कार्य तथा जबरन सामाजिक सुधार से व्यक्तिगत दिमागों में परिवर्तन।  लोकनायक जयप्रकाशजी की जीवन की विशेषताएं और उनके व्यक्तित्व के आदर्श कुछ विलक्षण और अद्भुत हैं जिनके कारण से वे भारतीय राजनीति के नायकों में अलग स्थान रखते हैं। उनका सबसे बड़ा आदर्श था जिसने भारतीय जनजीवन को गहराई से प्रेरित किया, वह था कि उनमें सत्ता की लिप्सा नहीं थी, मोह नहीं था, वे खुद को सत्ता से दूर रखकर देशहित में सहमति की तलाश करते रहे और यही एक देशभक्त की त्रासदी भी रही थी। वे कुशल राजनीतिज्ञ भले ही न हो किन्तु राजनीति की उन्नत दिशाओं के पक्षधर थे, प्रेरणास्रोत थे।</p>
<p style="text-align:justify;">वे देश की राजनीति की भावी दिशाओं को बड़ी गहराई से महसूस करते थे। यही कारण है कि राजनीति में शुचिता एवं पवित्रता की निरंतर वकालत करते रहे। महात्मा गांधी जयप्रकाश की साहस और देशभक्ति के प्रशंसक थे। उनका हजारीबाग जेल से भागना काफी चर्चित रहा और इसके कारण से वे असंख्य युवकों के सम्राट बन चुके थे। वे अत्यंत भावुक थे लेकिन महान क्रांतिकारी भी थे। वे संयम, अनुशासन और मयार्दा के पक्षधर थे। इसलिए कभी भी मयार्दा की सीमा का उल्लंघन नहीं किया। विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना अध्ययन नहीं छोड़ा और आर्थिक तंगी ने भी उनका मनोबल नहीं तोड़ा। यह उनके किसी भी कार्य की प्रतिबद्धता को ही निरूपित करता था, उनके दृढ़ विश्वास को परिलक्षित करता है। मैंने जेपी को नहीं देखा लेकिन उनकी प्रेरणाएं मेरे पारिवारिक परिवेश की आधारभित्ति रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी माताजी स्व. सत्यभामा गर्ग उनकी अनन्य सेविका थी। राजस्थान में होने वाले जेपी के कार्यक्रमों को वे संचालित किया करती थी, उनके व्यक्तिगत व्यवस्था में जुड़े होने के कारण उनके आदर्श एवं प्रेरणाएं हमारे परिवार का हिस्सा थे। मेरे आध्यात्मिक गुरु आचार्य श्री तुलसी के जीवन से जुड़े एक बड़े विरोधपूर्ण वातावरण के समाधान में भी जयप्रकाश का अमूल्य योगदान है। उनकी चर्चित पुस्तक अग्निपरीक्षा को लेकर जब देश भर में दंगें भड़के, तो जेपी के आह्वान से ही शांत हुए। जेपी के कहने पर आचार्य तुलसी ने अपनी यह पुस्तक भी वापस ले ली।  जयप्रकाश नारायण को 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इन्दिरा गांधी को पदच्युत करने के लिये उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति नामक आन्दोलन चलाया।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकनायक ने कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ शामिल हैं-राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है। सम्पूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। जयप्रकाश नारायण की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे। लालमुनि चैबे, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या फिर सुशील मोदी, आज के सारे नेता उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में आजादी की लड़ाई से लेकर वर्ष 1977 तक तमाम आंदोलनों की मशाल थामने वाले जेपी यानी जयप्रकाश नारायण का नाम देश के ऐसे शख्स के रूप में उभरता है जिन्होंने अपने विचारों, दर्शन तथा व्यक्तित्व से देश की दिशा तय की थी। उनका नाम लेते ही एक साथ उनके बारे में लोगों के मन में कई छवियां उभरती हैं। लोकनायक के शब्द को असलियत में चरितार्थ करने वाले जयप्रकाश नारायण अत्यंत समर्पित जननायक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही इसके साथ-साथ उनकी छवि अत्यंत शालीन और मर्यादित सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की भी है। उनका समाजवाद का नारा आज भी हर तरफ गूंज रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही उनके नारे पर राजनीति करने वाले उनके सिद्धान्तों को भूल रहे हों, क्योंकि उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का नारा एवं आन्दोलन जिन उद्देश्यों एवं बुराइयों को समाप्त करने के लिये किया था, वे सारी बुराइयां इन राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं में व्याप्त है। सम्पूर्ण क्रान्ति के आह्वान में उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, सम्पूर्ण क्रान्ति आवश्यक है। इसलिये आज एक नयी सम्पूर्ण क्रांति की जरूरत है। यह क्रांति व्यक्ति सुधार से प्रारंभ होकर व्यवस्था सुधार पर केन्द्रित हो। कुर्सी पर कोई भी बैठे, लेकिन मूल्य प्रतिष्ठापित होने जरूरी है। ऐसा करके ही हम एक महान लोकनायक को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ललित गर्ग</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/now-there-is-a-whole-new-revolution/article-3383</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/now-there-is-a-whole-new-revolution/article-3383</guid>
                <pubDate>Wed, 11 Oct 2017 04:33:16 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-10/leaders.jpg"                         length="29360"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>समस्या का हल नहीं है आंदोलन या आत्महत्या</title>
                                    <description><![CDATA[अन्नदाता के खेती से होते मोहभंग और देश में चल रहे किसान आंदोलनों के परिपे्रक्ष्य में एक बात साफ हो जानी चाहिए कि आंदोलन, आत्महत्या या केवल कर्जमाफी से अन्नदाता की समस्या का हल नहीं होने वाला है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज किसान ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां उसे कोई विकल्प […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/problem-solution-not-the-andolan-or-suicide/article-2573"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/problems.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अन्नदाता के खेती से होते मोहभंग और देश में चल रहे किसान आंदोलनों के परिपे्रक्ष्य में एक बात साफ हो जानी चाहिए कि आंदोलन, आत्महत्या या केवल कर्जमाफी से अन्नदाता की समस्या का हल नहीं होने वाला है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज किसान ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां उसे कोई विकल्प दिखाई नहीं देता। यूं कहें कि मानसून की बेरुखी या अधिक मेहरबानी तो किसान को नुकसान, और फसल तैयार होने के समय आंधी तूफान तो किसान को नुकसान।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे-तैसे इन सबसे किसान निपट भी लेता है, तो बाजार में लागत भी नहीं मिले, तो किसान अपने-आपको ठगा-सा महसूस करता है। सबसे अधिक चिंतनीय बात यह है कि इस सबका फायदा मिलता है बिचौलियों को।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान संघों द्वारा देशभर में किसानों के कर्ज के बोझ तले दबे होने के कारण आत्महत्या को मुद्दा बनाते हुए कर्जमाफी की मांग की जा रही है। राजनीतिक दलों द्वारा भी इसे हवा दी जा रही है। कर्जमाफी का मुद्दा भी चुनाव घोषणा पत्रों के कारण अधिक उभरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनावों के समय किसानों की भी अधिक ही याद आती है। घोषणा पत्रों में कर्ज की चर्चा मात्र को कर्ज माफी से जोड़ दिया जाता है और उसके बाद चुनावी वादें के नाम पर कर्ज माफी की बात होने लगती है। आत्महत्याओं को राजनीतिक रंग दिए जाने के प्रयास होते हैं। पता नहीं कब शांतिपूर्ण आंदोलन हिंसक हो जाते हैं और इन सबमें अन्नदाता अंततोगत्वा ठगा ही जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक कर्जमाफी का प्रश्न है, यह साफ हो जाना चाहिए कि इससे सभी किसानों का भला होने वाला नहीं है। इस गणित को यूं समझा जाना चाहिए कि बैंकों द्वारा चाहे सार्वजनिक क्षेत्र के हों, निजी क्षेत्र के हों या सहकारी क्षेत्र के बैंक हों आजादी के 70 साल बाद भी एक तिहाई किसान ही ऋण सुविधा से जुड़ पाए हैं। एक और बात यह है कि आज भी लगभग दो तिहाई किसान संस्थागत ऋण सुविधा से वंचित है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक फसली ऋण की बात है, पिछले कुछ वर्षों से केन्द्र सरकार समय पर ऋण चुकाने वाले काश्तकारों को तीन फीसदी ब्याज अनुदान दे रही है। राजस्थान, मध्यप्रदेश सहित कुछ राज्यों द्वारा समय पर ऋण चुकाने वाले काश्तकारों को शेष 4 प्रतिशत ब्याज भी अनुदान के रुप में दिया जा रहा है। ब्याज मुक्त ऋण होने के कारण 80 से 90 फीसदी किसान अपना फसली ऋण ब्याज बचाने के चक्कर में ऐन केन प्रकारेण चुका देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में जहां तक सहकारी बैंकों से लिए गए फसली सहकारी ऋणों का प्रश्न है केवल दस से पन्द्रह फीसदी किसान ही ऋण नहीं चुका पाते हैं। इसमें कुछ प्रतिशत व्यवस्था के दोष को भी नकारा नहीं जा सकता है। ऐसे में जब ऋण माफी की बात होती है, तो समय पर ऋण चुकाने वाले काश्तकार अपने आपको ठगा महसूस करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार द्वारा खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी करने, उर्वरकों के संतुलित उपयोग और नीमकोटेड यूरिया के वितरण से कुछ सुधार दिखाई देने लगा है। जैविक खेती पर भी जोर दिया जा रहा है। पिछले दो सालों से कृषि उपज के समर्थन मूल्य में भी बढ़ोतरी कर युक्तिसंगत बनाया जा रहा है। पर इससे परिणाम नहीं आने वाला है। फसल तैयार होकर आते ही उसकी खरीद की पुख्ता व्यवस्था हो जाए तो किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">होता यह है कि फसल आने पर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने में भी परेशानी होने लगती है। ऐसे में सरकारी कागजी खानापूर्ति के स्थान पर फसल के आते ही यदि भाव गिरते हैं, तो सरकार द्वारा घोषित एमएसपी पर तो तत्काल खरीद शुरु हो जानी चाहिए और खरीद ही नहीं किसान को खरीदी गई, जिंस का पैसा भी हाथोंहाथ किसान के खाते में हस्तांतरित हो जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">किसानों के हित में दीर्घकालीन नीति बनाते समय किसान को सस्ता कृषि आदान और फसल का लाभकारी मूल्य यह दो बाते सुनिश्चित करनी ही होगी। इसके साथ ही फसलोत्तर गतिविधियों में सुधार और मूल्य संबर्द्घन सुविधाआें के विस्तार से खेती किसानी को लाभकारी बनाया जा सकता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि इस साल भी विकास दर बढ़ने का प्रमुख कारण खेती किसानी रही है, ऐसे मेंं आंदोलन, आत्म हत्याओं को हवा देने के स्थान पर किसानों की वास्तविक भलाई के लिए आगे आना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/problem-solution-not-the-andolan-or-suicide/article-2573</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/problem-solution-not-the-andolan-or-suicide/article-2573</guid>
                <pubDate>Mon, 24 Jul 2017 01:11:19 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-07/problems.jpg"                         length="50909"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        