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                <title>आरबीआई और सरकार: विवाद और समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के बीच स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा विवाद फिलहाल सुलझ गया है। इसे अच्छा संकेत इसलिए माना जाना चाहिए कि रिजर्व बैंक वह सर्वोच्च निकाय है,जो देश के बैंकिंग तंत्र को नियंत्रित करता है। ऐसे में अगर किन्हीं मुद्दों पर सरकार के साथ शीर्ष बैंक का टकराव होता तो बाजार, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/rbi-and-government-disputes-and-solutions/article-6677"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/rbi-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के बीच स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा विवाद फिलहाल सुलझ गया है। इसे अच्छा संकेत इसलिए माना जाना चाहिए कि रिजर्व बैंक वह सर्वोच्च निकाय है,जो देश के बैंकिंग तंत्र को नियंत्रित करता है। ऐसे में अगर किन्हीं मुद्दों पर सरकार के साथ शीर्ष बैंक का टकराव होता तो बाजार, उद्योग जगत या संपूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता था। व्यापक तौर पर देखा जाए तो सरकार जहाँ अर्थव्यवस्था,नकदी और ऋण की कमी को लेकर चितिंत थी,वहीं आरबीआई प्रबंधन मानकों को लेकर।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों असहमति एक बड़े संकट में बदल गई थी और कहा जा रहा था कि सरकार आरबीआई की धारा-7 का इस्तेमाल करने जा रही है। इस धारा के तहत वह आरबीआई को अपना निर्णय मानने को बाध्य कर सकती है। यह पहली बार है जब आजाद भारत की किसी सरकार में आरबीआई के खिलाफ सेक्शन -7 लागू करने पर चर्चा हो रही है। सेक्शन -7 लागू होने के बाद बैंक कारोबार से जुड़े फैसले आरबीआई गर्वनर के बजाए रिजर्व बैंक के “बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स लेंगे। यानी सरल शब्दों में कहें तो सेक्शन -7 कहीं न कहीं आरबीआई गवर्नर के अधिकारों को कमजोर करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सेक्शन-7 की चर्चा से विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया कि रिजर्व बैंक के एक डिप्टी गवर्नर ने तो सरकारी दखल पर गंभीर नतीजों की बात तक कह डाली। पिछले पखवाड़े इस विवाद को थामने के लिए कुछ प्रयास किए गए लेकिन ऐसी अटकल थी कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं। अगर ऐसा होता तो यह देश की नीति निर्माण व्यवस्था के लिए बड़ा झटका होता। आरबीआई के कामकाज और स्वायत्तता में सरकार की ऐसी दखल उस पर शिकंजा कसना ही है,ताकि केंद्रीय बैंक सरकार की इच्छानुरूप ही फैसले करे। इस परिदृश्य में यह बहुत राहत की बात है कि आरबीआई एवं सरकार के बीच तनाव फिलहाल रुका।</p>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा विवाद की नींव इस साल फरवरी में तब पड़ी जब रिजर्व बैंक ने एनपीए के मसले पर बैंकों पर कठोरता बरतनी शुरू की। सरकारी बैंक डूबता कर्ज यानी एनपीए की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में बैंकों ने नियमों को ताक पर रखते हुए जिस तरह अंधाधुंध कर्ज बांटे थे,उसी से एनपीए की समस्या खड़ी हुई थी और इसीलिए अब रिजर्व बैंक ने बैंकों पर सख्ती की थी। ऐसे में कदम उठा कर रिजर्व बैंक ने कुछ गलत नहीं किया था। लेकिन सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच विवाद यहीं तक ही सीमित नहीं रहा। जुलाई में सरकार ने रिजर्व बैंक पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वह छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज देने के मामले में ढील दे। बैंकों के डूबते कर्ज की वजह से केंद्रीय बैंक ने व्यवसायिक बैंकों पर इन उद्योगों को कर्ज देने के मामले में सख्ती कर दी थी,इस वजह से अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता दिखा।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन सवाल है कि अब क्या होगा?आरबीआई बोर्ड ने चार विवादास्पद मसलों पर चर्चा की : आरबीआई का आर्थिक पूँजी ढ़ाचा(ईसीएफ अर्थात इकॉनोमिक कैपिटल फ्रेमवर्क),घाटे और फंसे कर्ज की समस्या से जूझ रहे बैंकों के लिए तात्कालिक सुधारात्मक कदम ढांचा(पीसीए,यानी प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन ),संकटग्रस्त मझोले,छोटे और सूक्ष्म उपक्रमों के लिए ऋण पुनर्गठन की योजना और बैंकों के लिए बेसिक नियामकीय पूँजी ढांचा। केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के बीच मतभेद की सबसे बड़ी वजह बना आरबीआई के रिजर्व फंड यानी इकॉनोमिक कैपिटल फ्रेमवर्क। आरबीआई से जारी जुलाई, 2017 से जून,2018 के आँकड़ों के मुताबिक यह राशि अभी 9.69 लाख करोड़ रुपए की है। रिजर्व बैंक के बोर्ड में सरकार के प्रतिनिधि के अनुसार रिजर्व बैंक का मुद्रा भंडार बाजार में चलन में मौजूद कुल करेंसी का 12-18.7 फीसदी के बीच होना चाहिए जबकि मौजूदा समय में यह भंडार 27-28 फीसदी है। इस तरह रिजर्व बैंक की तिजोरियों में 3.6 लाख करोड़ की अतिरिक्त रकम पड़ी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार चाहती है कि यह रकम रिजर्व बैंक उसे लाभांश के रुप में दे दे,ताकि उसे विकास कार्यों पर खर्च किया जा सके। रिजर्व बैंक के पास आखिर कितना रिजर्व फंड हो,इस बारे में आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघु राम राजन का मानना है कि कम से कम 10 लाख करोड़ रुपया। उनके अनुसार 10 लाख रिजर्व फंड के बाद ही रिजर्व बैंक सरकार को लाभांश के रुप में राशि दे सकती है। रिजर्व बैंक के बोर्ड बैठक में इस मामले पर सहमति बनी कि एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए, जो इस मुद्दे पर फैसला करे। समिति में आरबीआई व वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के अलावा बाहर के कुछ विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है। समिति की सिफारिशों पर अंतिम फैसला आरबीआई गवर्नर ही करेंगे,क्योंकि आरबीआई की तरफ से गठित हर समिति की सिफारिशों पर अंतिम तौर पर फैसला करने या नहीं करने का अधिकार गवर्नर के पास ही होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ब प्रश्न उठता है कि आखिर रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड पर अब तक आरबीआई ने किसी भी सरकार को हाथ रखने क्यों नहीं दिया है? इसे समझने के लिए हमें आरबीआई के इस फंड की प्रकृति को समझना होगा। दुनिया के हर बैंक की तरह आरबीआई भी सरकारी प्रतिभूतियों को जारी करने और उनमें निवेश करने का काम करता है। इसके अलावा वह बैंकों की अल्पावधि और दीर्घावधि जरूरतों के लिए ब्याज पर फंड उपलब्ध कराता है। अतिरिक्त फंड को विदेशों में निवेशित करता है। विदेशी मुद्रा भंडार रखने से भी आरबीआई को कमाई होती है। इन सभी आय एवं राजस्व का एक हिस्सा आरबीआई के रिजर्व फंड के तौर पर जाना जाता है,जिसे इकॉनोमिक कैपिटल फ्रेमवर्क के तहत निर्धारित किया जाता है। पिछले एक वर्ष में आरबीआई का यह फंड 7.58 लाख करोड़ से बढ़कर 9.69 लाख करोड़ रुपए हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन आरबीआई इस फंड को लगातार सुरक्षित रखने की कोशिश करता है, जिसके पीछे ठोस कारण हैं। पहली वजह यह है कि अगर अचानक वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारी उथल पुथल आ जाए और देश की विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट हो जाए तो इस फंड का प्रयोग संकट से निपटने में किया जा सकता है। मसलन, 2008-09 के समय जब वैश्विक मंदी गहरा रही थी, तब एक समय इस फंड के इस्तेमाल पर विचार किया गया था। आरबीआई बोर्ड बैठक में दोनों पक्षों ने पीसीए ढांचे को लेकर भी लचीलापन रूख दिखाया।</p>
<p style="text-align:justify;">दो अन्य मुद्दों की बात करें तो आरबीआई ने सरकार की इच्छाओं का काफी हद तक मान रखा। बोर्ड ने आरबीआई प्रबंधन को यह मशविरा दिया कि वह एमएसएमई के कर्जदारों की ऋणग्रस्त मानक परिसंपत्तियों के पुनर्गठन की योजना पर विचार करे। यह सुविधा 25 करोड़ रुपए तक की ऋण सुविधा वाले संस्थानों के लिए तैयार की जानी है। केंद्रीय बैंक ने बैंकों के पूँजी और जोखिम के 9 फीसदी अनुपात के अनुपालन के लिए समय अवधि में भी इजाफा किया।<br />
स्पष्ट है कि रिजर्व बैंक ने सरकार की अधिकांश मांगों को स्वीकार कर लिया है। पिछले वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की रैंकिंग को बढ़ाने वाले क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मूडीज का कहना है कि बेसल-3 मानक के लिए बैंकों को अतिरिक्त समय देने से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसके अतिरिक्त मूडीज ने एनपीए के 25 करोड़ रुपए तक के जोखिम वाले लोन से भी भारतीय बैंकों पर असर पड़ने की आशंका जताई है। अच्छा होगा कि सरकार,रिजर्व बैंक के स्वायत्तता का सम्मान करे। साथ ही रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड का प्रयोग अति आपातकालीन परिस्थितियों के लिए रिजर्व बैंक के विवेक पर ही प्रयोग हो,अन्यथा आर्थिक संकट से निकलने का आखिरी रास्ता भी आपातकाल में बंद हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>राहुल लाल</strong></p>
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                <pubDate>Sat, 24 Nov 2018 10:53:24 +0530</pubDate>
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                <title>चीनी जल वर्चस्व एवं जल हथियार की चुनौती एवं समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय सीमा में चीन द्वारा लगातार घुसपैठ की खबरों के बीच तिब्बत के रास्ते भारत में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी रोक दिया गया है। इसके पीछे चीन का हाथ होने की बात सामने आई है। पानी रूकने की वजह से अरूणाचल प्रदेश के तूतिंग, यिंगकियोंग और पासीघाट इलाके में सूखे की स्थिति उत्पन्न […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/challenges-and-solutions-of-chinese-water-supremacy-and-water-weapons/article-6501"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/artical.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय सीमा में चीन द्वारा लगातार घुसपैठ की खबरों के बीच तिब्बत के रास्ते भारत में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी रोक दिया गया है। इसके पीछे चीन का हाथ होने की बात सामने आई है। पानी रूकने की वजह से अरूणाचल प्रदेश के तूतिंग, यिंगकियोंग और पासीघाट इलाके में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गई है। साथ ही अरूणाचल के जंगल और जलीय पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। गौरतलब है कि चीन ने तिब्बत में बहने वाली यारलुंग सांगपो नदी का पानी रोक दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ये नदी जब अरुणाचलप्रदेश में प्रवेश करती है, तो इसे सियांग के नाम से पुकारा जाता है। आगे चलकर असम में ये ब्रह्यपुत्र के नाम से पहचानी जाती है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार इस नदी के मिलिन सेक्शन में भारी मात्रा में भूस्खलन हुआ है, जिसकी वजह से ब्रह्यपुत्र की मुख्यधारा प्रभावित हुई है। लेकिन कूटनीतिक विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक घटना नहीं मानते,अपितु यह चीन की जल कूटनीति का हिस्सा है। बताया जा रहा है कि चीन ने कृत्रिम भूस्खलन कर ब्रह्यपुत्र नदी के बीच में एक झील का निर्माण कर दिया है, जिसमें पानी के स्तर में 40 मीटर की वृद्धि हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह झील भी अब भारत के लिए खतरा बनी हुई है। जब इस ब्लॉकेज को साफ किया जाएगा तो नदी के जलस्तर में अप्रत्याशित वृद्धि से तबाही भी आ सकती है। जून 2000 में कुछ ऐसा ही हुआ था,जब ब्रह्यपुत्र नदी में चीन की तरफ से अचानक पानी छोड़ने की वजह से अरुणाचल प्रदेश में काफी नुकसान हुआ था।<br />
वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पानी एक महत्वपूर्ण संसाधन हो गया है, और यह संघर्ष का कारण बन सकता है। चीन ने जलसंसाधनों को भी आक्रामक विस्तारवाद का न केवल हिस्सा बना दिया है, अपितु जल संसाधनों को भी हथियार के रुप में प्रयोग करने की तैयारी की है। इस तरह अब ‘जल संसाधन ‘का ‘जल हथियार’ के रुप में प्रयोग करने की चीनी मंशा की संभावनाएँ व्यक्त की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समय चीन तिब्बत में विशाल जल संसाधन पर कब्जा किये हुए है और भारत में बहने वाली बहने वाली नदियों का स्रोत भी वही जल संसाधन है। भारत के उत्तर पूर्व में बहने वाली ब्रह्मपुत्र जलशक्ति का एक बड़ा स्रोत है और पनबिजली पैदा करने के लिए तथा अपने शुष्क उत्तरी क्षेत्र की तरफ बहाव मोड़ने के लिए चीन की इस पर नजर है। इस हालात ने भारत में चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि भारत एक निम्न नदी तटीय देश है। इसके अलावा,पर्यावरण क्षरण तथा पानी की घटती मात्रा भारतीय नीति निमार्ताओं के समक्ष चुनौती है। बता दें कि साल की शुरूआत में भी सियांग और ब्रह्यपुत्र नदी में चीन की तरफ से भारी गंदगी और बाँधों के मलबों को फैला दिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">बाद में चीन ने इसका कारण भी यारलुंग सांगपो में आए भूकंप के मलबे को बताया था। भारतीय देहरादून वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों का मानना है कि चीन के पास पानी की इतनी शक्ति है कि अगर भारत ने उसपर नजर नहीं रखी तो बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। देहरादून वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक संतोष राय के अनुसार अगर चीन घाघरा,गंडक और ब्रह्यपुत्र जैसी नदियों का पानी रोककर अचानक छोड़ता है भारत के लिए हालत बेहद खतरनाक हो जाएंगे। इस संदर्भ में हाल ही में भारत और चीन के बीच यारलुंग सांगपो नदी के पानी का डेटा साझा करने का करार हुआ था। लेकिन चीन इस समझौते का सही ढंग से पालन करता हुआ नहीं दिख रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन जल का प्रयोग संसाधन के रुप में तो कर ही रहा है, वहीं पानी का प्रयोग जल हथियार के रुप में भी कर सकता है। वैज्ञानिकों ने कई बार ब्रह्मपुत्र के जल बहाव में कई वर्ष पुराने पानी को पाया है, जो बांध का जमा हुआ पानी होता है। इससे चीन के खतरनाक इरादों को समझा जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार चीन पानी रोककर छोड़ता है तो असम बंगाल बांगलादेश और मेघालय को डुबा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पानी पर जोर देने वाले देश चीन के पास प्रति व्यक्ति पानी की हिस्सेदारी केवल 2093 क्यूबिक मीटर है तथा 2013 में चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने घोषणा कर दी कि विगत 60 सालों में 23,000 नदियाँ देश से लुप्त हो चुकी हैं। चूँकि ज्यादातर जल संसाधनों पर चीन का कब्जा है और भारत निम्न नदी तटीय देश है। भारत और चीन दोनों की बढ़ती जनसंख्या के लिए संसाधनों एवं बुनियादी वस्तुओं की बढ़ती माँग से संभावना व्यक्त की जाती है कि पानी की माँग भी बढ़ेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन का किसी भी जल समझौते में प्रवेश करने से लगातार इंकार ने भारत के साथ द्विपक्षीय संबंध को लेकर अहम टकराहट को बल दिया है। दुनिया के कुछ शुष्क क्षेत्रों के साथ एक आर्थिक शक्तिगृह के रुप में चीन भी एक प्यासा देश है। 1.3 अरब जनसंख्या के साथ चीन दुनिया का सबसे आबादी वाला देश है। चीन में अप्रत्याशित रुप में प्रदूषित नदियों की संख्या में वृद्धि हो रही है, ऐसे में चीन के लिए पानी बेहद महत्वपूर्ण संसाधन है। तिब्बत का क्षेत्रफल लगभग 470,000 वर्ग किमी है और इस पर चीन ने 1950 में ही कब्जा जमा लिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">तिब्बत का यह पठार सही मायने में पानी का विशाल भंडार है और उपमहाद्वीप में ज्यादातर नदियों का उद्गमस्थल भी है। विशेषज्ञों के अनुसार चीन के पास जितना पानी है, उससे 40,000 गुना पानी तिब्बत के पास है। ज्यादातर नदियों का उद्गम तिब्बत से होने के कारण इस पर चीन का एकाधिकार है, ये नदियाँ निम्न तटीय देशों से होकर बहती हैं और आने वाले वर्षों में भारत ,बांग्लादेश तथा म्यांमार जैसे देशों की कठिनाइयाँ बढ़ सकती हैं। चीन ने दुर्भाग्यवश अपने इन पड़ोसियों की चिंताओं की अवहेलना की है। भारत तिब्बत से निकलने वाली नदियों पर बहुत हद तक निर्भर है, जिनका कुल बहाव प्रतिवर्ष 627 क्यूबिक किलोमीटर है और जो भारत के कुल नदी जल संसाधन का 34 प्रतिशत है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>राहुल लाल</strong></p>
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                <pubDate>Mon, 29 Oct 2018 08:44:42 +0530</pubDate>
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                <title>रेल दुर्घटनाओं की पुनरावृति: समस्या और समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय परिवहन का प्रमुख तंत्र रेलवे पुन: एक बड़ी दुर्घटना के चपेट में आया। मुजफ्फरनगर के खतौली में कलिंग उत्कल एक्सप्रेस के 14 डिब्बे पटरी से उतरे, जिसमें कम से कम 23 लोग मर गए तथा 100 से ज्यादा घायल हुए। दुर्घटना की तस्वीरों से ही स्थिति की भयावहता को समझा जा सकता है। खतौली […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/recurrence-of-rail-accidents-problems-and-solutions/article-3286"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/railway.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय परिवहन का प्रमुख तंत्र रेलवे पुन: एक बड़ी दुर्घटना के चपेट में आया। मुजफ्फरनगर के खतौली में कलिंग उत्कल एक्सप्रेस के 14 डिब्बे पटरी से उतरे, जिसमें कम से कम 23 लोग मर गए तथा 100 से ज्यादा घायल हुए। दुर्घटना की तस्वीरों से ही स्थिति की भयावहता को समझा जा सकता है। खतौली रेलवे स्टेशन से आगे जहां हादसा हुआ, वहां पटरी मरम्मत का कार्य चल रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">पटरी मरम्मत के औजार भी घटनास्थल पर पड़े हुए हैं, फिर भी चालक को इसकी कोई जानकारी नहींं दी गई तथा कलिंग उत्कल एक्सप्रेस चश्मदीदों के अनुसार 100 किमी/घंटा की ज्यादा गति से मरम्मत वाली पटरियों से गुजरी, जिसके बाद यह हादसा तो तय ही था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दुर्घटना में रेल मंत्रालय की लापरवाही स्पष्ट देखी जा सकती है। सबसे महत्वपूर्ण, यह दुर्घटना तब घटी है, जब अगले ही माह सितंबर में भारत में बुलेट ट्रेन की नींव रखी जानी है। इस हादसे की भयावहता को इससे ही समझा जा सकता है कि रेल का एक डिब्बा बगल के घर में घुसते हुए चौधरी तिलक राम इंटर कॉलेज की बिल्डिंग में भी घुस गया। घर के अंदर के लोग भी इससे घायल हुए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह ट्रैक काफी दिनों से खराब था, जिसमें लगातार मरम्मत कार्य जारी था। चश्मदीदों के अनुसार एक माह पहले भी यहां एक बड़ी रेल दुर्घटना को स्थानीय लोगों की पहल से रोका गया था। उस समय भी रेल पटरी मरम्मत के कारण टूटे ट्रैक पर ट्रेन आ रही थी, जिसे लाल कपड़ा दिखाकर किसी तरह रोका गया। इस घटना से भी रेलवे ने कोई सीख नहीं ली।</p>
<p style="text-align:justify;">यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि मरम्मत के दौरान टूटे पटरी पर आखिर ट्रेन को चलने की अनुमति कैसे मिली? देश में रेल दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं? कैसे होती हंै? इसके कारण और निदान नीति-निर्माता से लेकर आम आदमी सभी को पता है, फिर भी हर वर्ष ये दुर्घटनाएं होती हैं, उनकी जांच होती है, बैठकें होती हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार भी मृतकों के परिजनों को 3.5 लाख, गंभीर रुप से घायलों को 50 हजार तथा सामान्य घायलों को 25 हजार मुआवजे की रेल मंत्रालय ने घोषणा की है। दरअसल रेल दुर्घटनाओं का असर किसी भी अन्य दुर्घटनाओं से काफी ज्यादा होता है। भारतीय रेलवे अंतर्देशीय परिवहन का सबसे बड़ा माध्यम है। दुनिया के इस सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक भारत में हर रोज सवा दो करोड़ से भी ज्यादा लोग रेल की सवारी करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में भारतीय रेल दुर्घटनाओं को रोकने के लिए तीव्रतम प्रयास करने होंगे तथा तब तक प्रयत्नशील होना होगा, जब तक रेलवे दुर्घटनाओं को शून्य तक नहीं पहुंचा दे। मानवीय चूक को रोकने के वैश्विक स्तर पर दो उपाय स्वीकार किए गए हैं-प्रथम आधुनिकतम तकनीक का प्रयोग कर मानवीय चूक को कम करना, द्वितीय-रेल कार्मिकों का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर आधुनिकतम तकनीक की बात करें तो इसमें ‘यूबीआरडी’प्रमुख है। रेलवे ने रेल पटरियों की सुरक्षा निगरानी हेतु दक्षिण अफ्रीका से एक खास तकनीक यूबीआरडी आयात की है, जिसमें ट्रांसमीटर एक तरंग छोड़ता है और अगर रिसीवर को वह तरंग नहीं मिलती है तो पता चल जाता है कि कहीं बीच में कोई समस्या है। इस प्रणाली से पटरी के बारीक चटक का भी पता लग जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अतिरिक्त आधुनिक “लिंक हाफमैन बुश” डिब्बे की अनुपस्थिति से भी हताहतों की संख्या में वृद्धि होती है। लिंक हॉफमैन बुश से युक्त डिब्बे पटरी से उतरने के बाद भी ज्यादा असरदार तरीके से झटकों और इसके प्रभाव को झेल सकते हैं और ये पलटते नहीं। इससे जानमाल के नुकसान में अप्रत्याशित कमी आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मानवीय चूक रोकने का दूसरा प्रमुख उपाय रेलकर्मियों का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण है। इस मामले में जिस तरह जानलेवा लापरवाही दिखी, उससे रेल कर्मियों में प्रशिक्षण की भारी कमी स्पष्टत: देखी जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब तेज रफ्तार वाली ट्रेन चल रही हो तो ट्रेन के दोनों ओर तैनात कुशल तकनीशयन द्वारा दूर से आ रही रेलगाड़ी की चाल उसकी लहर व उसके नीचे से निकलने वाली अवांछित आवाजों तथा ईंजन व गार्ड के मध्य सभी डिब्बों के बीच झटकों व उनके परस्पर खिंचाव आदि पर पैनी नजर रखनी चाहिए। साथ ही जिस ट्रैक से वह तीव्र गति ट्रेन गुजर रही हो उस पर भी पूरी चौकस नजर रखी जानी चाहिए। खतौली रेल दुर्घटना में तो पटरी मरम्मत तक की जानकारी ड्राइवर को नहीं मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">आपदा प्रबंधन की तमाम तैयारियों की बातों के बीच भी दिल्ली से केवल 100 किमी दूर खतौली में दुर्घटना के कम से कम एक घंटे बाद ही राहत कार्य अधिकृत तौर पर शुरू हो पाया। इस संपूर्ण मामले में मुजफ्फरनगर के खतौली निवासियों ने अपने स्तर पर घटना घटते ही बड़े पैमाने पर राहत और बचाव कार्य प्रारंभ कर दिया था। स्थानीय लोगों ने तीव्र गति से लोगों को बाहर निकाला और घायलों को हॉस्पिटल पहुँचाया।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले कुछ समय से भीड़ अपने निर्दयी कारणों से चर्चा में थी, लेकिन खतौली में भीड़ का न केवल मानवीय पक्ष सामने आया, अपितु दुर्घटना ग्रस्त यात्रियों के अनुसार वे देवदूत की ही भूमिका में थे। एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल औसतन 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएँ होती है। जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है, मुआवजे की घोषणा कर उसे भुला दिया जाता है। हमें इस प्रवृत्ति से बाहर आना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">रेलवे सुरक्षा के कई पहलू होते हैं, लेकिन प्रबंधन के स्तर पर सभी पहलू जुड़े रहते हैं। होता यह है कि रेलवे विभाग रेल सेवाओं में तो वृद्धि कर देता है, परंतु सुरक्षा का मामला उपेक्षित रह जाता है। राजनीतिज्ञों और प्रबंधकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रेलवे सिस्टम को एक तय सीमा से ज्यादा न खींचा जाए। रेलवे सुरक्षा और सेवाओं के मध्य समुचित संतुलन बनाए जाने की जरुरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">उम्मीद है कि इस वर्ष से अलग रेलवे बजट न होने के कारण रेल मंत्रालय के ऊपर लोकप्रिय निर्णय लेने का दबाव नहीं रहेगा और वह सुरक्षा पर समुचित खर्च कर सकेगी। अब समय आ गया है, जब भारतीय रेलवे सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करें, नहीं तो फिर हम लोग शायद किसी नए दुर्घटना के बाद भी इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करते दिखें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-Rahul Lal</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Aug 2017 00:12:26 +0530</pubDate>
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                <title>विभाग समस्याओं का शीघ्र करें समाधान: अग्रवाल</title>
                                    <description><![CDATA[पीने का पानी रात को 11 से 6 की बजाय दिन में देने की व्यवस्था करें व्यवस्था श्रीगंगानगर (सच कहूँ न्यूज)। जिला प्रभारी सचिव व जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव शिखर अग्रवाल ने कहा है कि जिले में किसी भी विभाग में ऐसे केस पेंडिंग ना हो जिसके लिए बाद में सबके सामने शर्मिंदा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/quick-solutions-on-department-issues/article-2835"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/meeting-1.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">पीने का पानी रात को 11 से 6 की बजाय दिन में देने की व्यवस्था करें व्यवस्था</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>श्रीगंगानगर (सच कहूँ न्यूज)।</strong> जिला प्रभारी सचिव व जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव शिखर अग्रवाल ने कहा है कि जिले में किसी भी विभाग में ऐसे केस पेंडिंग ना हो जिसके लिए बाद में सबके सामने शर्मिंदा होना पड़े। मुख्यमंत्री की राजविकास वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में ऐसे ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जो छह सात साल से पेंडिंग चल रहे थे। मुख्यमंत्री के सामने संबंधित विभाग के उच्च अधिकारियों को शर्मिंदा तो होना ही पड़ता है साथ ही संबंधित अधिकारी को भी समाज और मीडिया के सामने शर्मिंदा होना पड़ेगा। लिहाजा ऐसे कोई केस किसी विभाग में पेंडिंग चल रहे हो तो उन्हें जल्द निपटा लें।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिवसीय दौरे पर श्रीगंगानगर आए जिला प्रभारी सचिव जिला कलेक्ट्रेट सभागार में विभिन्न विभागों की समीक्षा बैठक ले रहे थे। बैठक में जिला प्रभारी सचिव ने विभिन्न विभागों में चल रहे कार्यों की प्रगति जानने के साथ-साथ कुछ जरूरी दिशा निर्देश भी दिए। बैठक में पीएचईडी की समीक्षा करते हुए जिला प्रभारी सचिव ने विभाग के एसई से कहा कि लोगों को रात 11 से सुबह 5 बजे तक पानी सप्लाई करने वाले सिस्टम को कैसे भी बंद करो। इससे ना केवल पानी की बर्बादी होती है बल्कि लोगों को भी रात भर परेशान होना पड़ता है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">डायलिसिस मशीन पीपीपी मोड पर शुरू करने के दिए निर्देश</h2>
<p style="text-align:justify;">रात को लोग भी परेशान होकर नल खुलाकर छोड़ देते हैं फिल्टर पानी व्यर्थ हो जाता है। इसको लेकर एसई को निर्देश दिए कि बिजली विभाग के उच्चाधिकारी से मिलकर इसका समाधान निकाला जाए। सिंचाई विभाग की समीक्षा के दौरान जिला कलक्टर ने रात्रि चौपाल में विभाग का कोई अधिकारी नहीं आने की शिकायत पर जिला प्रभारी सचिव ने कहा कि जब जिला कलक्टर रात्रि चौपाल के लिए जा सकते हैं तो सिंचाई विभाग के अधिकारी क्यों नहीं जा सकता। आगे से ऐसी शिकायत नहीं आनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">जिला अस्पताल में डायलिसिस मशीन पीपीपी मोड पर शुरू करने के जयपुर के उच्चाधिकारियों के आदेश पर प्रभारी सचिव ने इस मामले में उच्च स्तर पर बातकर इसे जल्द शुरू करवाने की बात कही। राजश्री योजना को लेकर प्रभारी सचिव ने प्रथम और दूसरी किस्त को अगले एक महीने में सभी को जारी करने के निर्देश दिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">बैठक में ये रहे मौजूद</h2>
<p style="text-align:justify;">बैठक में जिला प्रभारी सचिव शिखर अग्रवाल के अलावा जिला कलक्टर ज्ञानाराम, एसपी हरेंद्र महावर, सीईओ जिला परिषद विश्राम मीणा, एडीएम विजीलेंस वीरेन्द्र वर्मा, यूआईटी सचिव कैलाशचंद्र शर्मा, एसडीएम श्रीगंगानगर यशपाल आहूजा, कृषि विभाग के उपनिदेशक सतीश शर्मा, एसई पीएचईडी ताराचंद कुलदीप समेत विभिन्न विभागों के जिला स्तरीय अधिकारी मौजूद थे।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Aug 2017 05:02:34 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>चीनी &amp;#8216;जल हथियार&amp;#8217; की चुनौती एवं समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पानी एक महत्वपूर्ण संसाधन हो गया है और यह संघर्ष का कारण बन सकता है। चीन ने जलसंसाधनों को भी आक्रामक विस्तारवाद का न केवल हिस्सा बना दिया है, अपितु जल संसाधनों को भी हथियार के रुप में प्रयोग करने की तैयारी की है। इस तरह अब ‘जल संसाधन’ का ‘जल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/chinese-water-weapons-challenges-and-solutions/article-2595"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/water-weapon.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पानी एक महत्वपूर्ण संसाधन हो गया है और यह संघर्ष का कारण बन सकता है। चीन ने जलसंसाधनों को भी आक्रामक विस्तारवाद का न केवल हिस्सा बना दिया है, अपितु जल संसाधनों को भी हथियार के रुप में प्रयोग करने की तैयारी की है। इस तरह अब ‘जल संसाधन’ का ‘जल हथियार’ के रुप में प्रयोग करने की चीनी मंशा की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समय चीन तिब्बत में विशाल जल संसाधन पर कब्जा किये हुए है और भारत में बहने वाली नदियों का स्रोत भी वही जल संसाधन हैं। भारत के उत्तर पूर्व में बहने वाली ब्रह्मपुत्र जलशक्ति का एक बड़ा स्रोत है और पनबिजली पैदा करने के लिए तथा अपने शुष्क उत्तरी क्षेत्र की तरफ बहाव मोड़ने के लिए चीन की इस पर नजर है। इस हालात ने भारत में चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि भारत एक निम्न नदी तटीय देश है। इसके अलावा, पर्यावरण क्षरण तथा पानी की घटती मात्रा भारतीय नीति निमार्ताओं के समक्ष चुनौती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले एक माह से जिस तरह भारत-चीन के बीच डोकलाम मामले को लेकर तनाव बना हुआ है, उसके बीच भारतीय देहरादून वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों का मानना है कि चीन के पास पानी की इतनी शक्ति है कि अगर भारत ने उस पर नजर नहीं रखी, तो बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">देहरादून वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक संतोष राय के अनुसार अगर चीन घाघरा, गंडक और ब्रह्यपुत्र जैसी नदियों का पानी रोककर अचानक छोड़ता है, तो भारत के लिए हालत बेहद खतरनाक हो जाएंगे। सीमा पर जिस तरह से विवाद चल रहा है, उसके बाद हमारी सरकार और हमें इस मामले को लेकर चौकन्ना रहने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत और चीन दोनों की बढ़ती जनसंख्या के लिए संसाधनों एवं बुनियादी वस्तुओं की बढ़ती माँग से संभावना व्यक्त की जाती है कि पानी की माँग भी बढ़ेगी। चीन का किसी भी जल समझौते में प्रवेश करने से लगातार इंकार ने भारत के साथ द्विपक्षीय संबंध को लेकर अहम् टकराहट को बल दिया है। दुनिया के कुछ शुष्क क्षेत्रों के साथ एक आर्थिक शक्तिगृह के रुप में चीन भी एक प्यासा देश है।</p>
<p style="text-align:justify;">1.3 अरब जनसंख्या के साथ चीन दुनिया का सबसे आबादी वाला देश है। चीन में अप्रत्याशित रुप प्रदूषित नदियों की संख्या में वृद्धि हो रही है, ऐसे में चीन के लिए पानी बेहद महत्वपूर्ण संसाधन है। चीन विश्व का सबसे ताबड़तोड़ बाँध का निर्माता है और विश्व में सबसे ज्यादा बाँध चीन में ही हैं। चीन में कमोवेश 50 हजार से ज्यादा बड़े बाँध हैं। चीन अंतर्राष्ट्रीय नदियों पर बाँध निर्माण करने का एकपक्षीय कदम उठा रहा है,</p>
<p style="text-align:justify;">जो भारत के लिए चिंता का विषय है। चीन पहले ही ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों पर 10 बाँध बना चुका है तथा 3 बांध निमार्णाधीन हैं। इसी क्षेत्र में, चीन 7 और बाँध बनाने पर विचार कर रहा है, तथा 8 और बांध प्रस्तावित हैं। इसमें ‘झंग्मु’ नामक 510 मेगावाट वाली विद्युत परियोजना वाले बाँध का निर्माण भारत और चीन के बीच और टकराहट को जन्म दे सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह चीन को इस बात के लिए राजी करे कि वह ब्रह्मपुत्र पर प्रस्तावित बांध निर्माण को आगे नहीं बढ़ाए।ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध निर्माण के मुद्दे पर सौदेबाजी की तलाश में चीन अक्साई चीन तथा अरुणाचल के मुद्दे पर रियायत देने के लिए भारत को मजबूर कर सकता है।वस्तुत: चीन यथार्थ राजनीति पर आगे बढ़ रहा है और इस कारण वह भारत के साथ किसी भी तरह के बराबरी वाले समाधान को लेकर रुचि नहीं दिखा रहा है,</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि तिब्बत में दस बड़े जल विभाजक पर चीन का कब्जा है और इस क्षेत्र में जल संसाधनों पर इसका नियंत्रण है। इसलिए,भारत को न सिर्फ मुखर होना होगा,बांग्लादेश की चिंता को लेकर भी चीन को उसी तरह ज्यादा पारदर्शी तथा तार्किक तरीके से प्रभावित करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतत: सवाल उठता है कि भारत आखिर चीन द्वारा पैदा की हुई इस हालत से कैसे निपटेगा? भारत को इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि तिब्बत से निकलने वाले जल संसाधनों पर चीन का नियंत्रण है। ऐसे में भारत को तिब्बत को लेकर अपनी नीति पर फिर से विचार करना होगा, उसे नया आकार देना होगा। चीन की नीतियों के सवाल पर भारत को चीन के अन्य जल संपदा संबंधित पड़ोसी देशों को भी शामिल करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही पर्यावरण की निरंतरता के संबंध में एक वैश्विक जागरुकता लानी होगी एवं भारत और बांग्लादेश दोनों देशों को पानी के वास्तविक उपयोग के लिए आवाज उठानी पड़ेगी। भारत को इस मामले में पानी जैसे आम संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर भी वैश्विक स्तर पर जागरूकता लानी होगी तथा इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदायों के बीच दबाव बनाना होगा कि तिब्बत का जल संसाधन सिर्फ चीन के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व समुदाय के लिए है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन बिना किसी अन्य देश के हस्तक्षेप के जल संसाधनों के एक पक्षीय इस्तेमाल के अधिकार को सुरक्षित रखता है, इसीलिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि चीन पर बहुपक्षीय वार्ता के लिए वैैैश्विक दबाव डाला जाए। बहुपक्षीय समायोजन ही चीन पर समझौते को स्वीकार करने का दबाव बना सकता है, जिससे इनमें शामिल सभी देशों को लाभ होगा तथा इससे पर्यावरण को भी नुकसान होने से बचाया जा सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही चीन भारत से समझौतों के अनुसार अपने बांधों की स्थिति, उसमें जल संग्रहण की रियल टाइम सूचनाएँ भी समुचित रुप में साझा नहीं कर रहा है। इसके लिए आवश्यक है कि हम लोग अपने उपग्रहों के द्वारा चीन के बांधों एवं उसके जल संग्रहण की सूक्ष्म सूचनाएँ रखें। इससे हम चीन के किसी भी घृणित जल हथियार के प्रयोग के बारे में पूर्व बचाव की उत्कृष्ट रणनीति एवं बचाव कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राकृतिक भूस्खलन से भी कई बार जलभराव हो जाता है, लेकिन इसके लिए भी चीन कोई सूचना नहीं देता है। उदाहरण के लिए चीन ने 2012 में इसी प्रकार की एक घटना से भारत का पासी घाट डूब गया था और हजारों लोग मर गए थे। इसलिए भारत की तरफ से मजबूत पूर्व तैयारी और उपग्रहों से पूर्व सूचना तंत्र अपरिहार्य हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में बहुपक्षीय नीतियों को बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय जल संसाधन के गैर-नौवहन उपयोग कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का एक मापदंड की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए अनुच्छेद -11 बताता है कि दोनों देशों के लिए अंतर्राष्ट्रीय जल संसाधनों के इस्तेमाल के संदर्भ में सूचनाओं की साझेदारी आवश्यक है, जबकि अनुच्छेद 21 और 23 प्रदूषण की रोकथाम और समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा की व्याख्या करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस तरह यह भारत और चीन दोनों के लिए अहम है कि दोनों देश जलीय आँकड़ों को साझा करने के लिए संस्थागत तथा बहुपक्षीय स्तर पर एक अर्थपूर्ण बातचीत शुरू करें, ताकि इससे जल संसाधनों का स्थायी तथा परस्पर इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके एवं टकराहट की आशंका न्यूनतम हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">‘<strong>-राहुल लाल</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Tue, 25 Jul 2017 00:19:36 +0530</pubDate>
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