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                <title>बच्चों की सेहत के लिए जानलेवा है वायु प्रदूषण</title>
                                    <description><![CDATA[वायु प्रदूषण पर वैश्विक संगठनों की चेतावनियों का भारत पर कोई असर नहीं पड़ा है। वायु प्रदूषण का खतरा बच्चे से बुजुर्गों तक सामान रूप से मंडरा रहा है। भारत सहित विश्व के अनेक देश इसकी चपेट में है। वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा बच्चों की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है। जहरीली हवा ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/air-pollution-is-deadly-for-childrens-health/article-6530"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/untitled-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वायु प्रदूषण पर वैश्विक संगठनों की चेतावनियों का भारत पर कोई असर नहीं पड़ा है। वायु प्रदूषण का खतरा बच्चे से बुजुर्गों तक सामान रूप से मंडरा रहा है। भारत सहित विश्व के अनेक देश इसकी चपेट में है। वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा बच्चों की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है। जहरीली हवा ने नौनिहालों को अपना शिकार बनाकर मौत के मुँह में धकेला है जो बेहद चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वायु प्रदूषण और बच्चों पर जारी नई रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 15 साल से कम उम्र के 93 प्रतिशत बच्चे प्रदूषित हवा में साँस लेने को मजबूर है जिससे उनके स्वास्थ्य और विकास पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। यूनिसेफ की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण बच्चों के दिमाग को हमेशा के लिए नुकसान पहुंचा सकता है। दिल्ली-एनसीआर समेत देश के अधिकांश शहर गंभीर रूप से प्रदूषण से जूझ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2016 में वायु प्रदूषण से होने वाली श्वसन संबंधी बीमारियों की वजह से दुनियाभर में 5 साल से कम उम्र के 5.4 लाख बच्चों की मौत हुई है। 5 साल से कम उम्र के 10 बच्चों की मौत में से 1 बच्चे की मौत का कारण प्रदूषित हवा है। वायु प्रदूषण फेफड़ों और श्वसन प्रणाली और दिल की सेहत को बहुत अधिक प्रभावित कर रहा है । बच्चों को वायु प्रदूषण का खतरा सबसे ज्यादा है क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम और फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं होते। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में 2016 में पांच साल से कम उम्र के 60,987 बच्चों को जहरीली हवा की वजह से जान गंवानी पड़ी है। यह दुनिया में सबसे ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के मुताबिक इस आयु वर्ग में मारे गए बच्चों में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक है. भारत में 2016 में 32,889 लड़कियों की मौत इसी कारण से हुई है। वहीं, पांच से 14 साल के 4,360 बच्चों को वायु प्रदूषण के कारण जान गंवानी पड़ी है। सभी उम्र के बच्चों को मिलाकर देखें तो वायु प्रदूषण से करीब एक लाख दस हजार बच्चों की मौत हो गई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अब करीब 20 लाख लोगों की मौत प्रदूषण की वजह से हुई है जो पूरी दुनिया में इस कारण से हुई मौतों का 25 प्रतिशत है। वयस्कों की तुलना में बच्चे वायु प्रदूषण के आसानी से शिकार बन रहे हैं। वे अपने विकासशील फेफड़ों और इम्यून सिस्टम के चलते हवा में मौजूद विषैले तत्वों को सांस से अपने अंदर ले रहे हैं और अधिक जोखिम का शिकार बन रहे हैं। कुछ बच्चे दूसरों की तुलना में अधिक संवेदनशील होते हैं और ऐसे में वे अधिक जोखिम में हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वीडन की ऊमेआ यूनिवर्सिटी की नई रिसर्च कहती है कि वायु प्रदूषण से इंसानी जीवन का बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि इसका सीधा घातक असर दिमाग पर होता है, इसकी चपेट में बच्चे और किशोर सीधे आते हैं जो कि बच्चों के दिमाग पर बुरा असर डालता है और इस कारण कभी-कभी बच्चे मानसिक रोगों के शिकार भी हो जाते हैं। ग्रीनपीस ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत के 4.70 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां हवा में पीएम10 का स्तर मानक से अधिक है । इसमें अधिकतर बच्चे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली के हैं। इस 4.70 करोड़ के आंकड़ें में, 1.70 करोड़ वे बच्चे हैं जो कि मानक से दोगुने पीएम10 स्तर वाले क्षेत्र में निवास करते हैं। वहीं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली राज्यों में लगभग 1.29 करोड़ बच्चे रह रहे हैं जो पांच साल से कम उम्र के हैं और प्रदूषित हवा की चपेट में हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अनुमान है कि हर साल अकेले पंजाब-हरियाणा के खेतों में कुल तीन करोड़ 50 लाख टन पराली जलाई जाती है। एक टन पराली जलाने पर दो किलो सल्फर डाईआॅक्साइड, तीन किलो ठोस कण, 60 किलो कार्बन मोनोआॅक्साइड, 1460 किलो कार्बन डाईआॅक्साइड और करीब 200 किलो राख निकलती हैैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब कई करोड़ टन फसल अवशेष जलते हैैं तो वायुमंडल की कितनी दुर्गति होती होगी। हानिकारक गैसों एवं सूक्ष्म कणों से परेशान दिल्ली वालों के फेफड़ों को कुछ महीने हरियाली से उपजे प्रदूषण से भी जूझना पड़ता है। विडंबना है कि परागण से सांस की बीमारी पर चर्चा कम ही होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पराग कणों की ताकत उनके प्रोटीन और ग्लाइकॉल प्रोटीन में निहित होती है, जो मनुष्य के बलगम के साथ मिलकर अधिक जहरीले हो जाते हैं। ये प्रोटीन जैसे ही हमारे खून में मिलते हैैं, एक तरह की एलर्जी को जन्म देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह एलर्जी इंसान को गंभीर सांस की बीमारी की तरफ ले जाती है। चूंकि गर्मी में ओजोन परत और मध्यम आकार के धूल कणों का प्रकोप ज्यादा होता है इसलिए पराग कणों के शिकार लोगों के फेफड़े क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। लिहाजा ठंड शुरू होते ही दमा के मरीजों का दम फूलने लगता है।हवा जहरीली और प्रदूषित होने का मतलब है वायु में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के स्तर में वृद्धि होना । हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 60 और पीएम10 की मात्रा 100 होने की मात्रा पर इसे सुरक्षित माना जाता है । लेकिन इससे ज्यादा हो तो वह बेहद ही नुकसान दायक माना जाता है ।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>बाल मुकुन्द ओझा</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Nov 2018 09:45:54 +0530</pubDate>
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                <title>डायबिटीज मरीजों के लिए जानलेवा है वायु प्रदूषण</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया भर में आम हो चुकी डायबिटीज की बीमारी का एक नया कारण सामने आया है। एक नए अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण के कारण भी आप डायबिटीज यानी मधुमेह के शिकार हो सकते हैं। अमेरिका में हुए एक रिसर्च के अनुसार 2016 में डायबिटीज के सात नए मामलों में एक मामले के लिए वायु […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/diabetes-is-deadly-for-air-pollution/article-4635"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/air.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया भर में आम हो चुकी डायबिटीज की बीमारी का एक नया कारण सामने आया है। एक नए अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण के कारण भी आप डायबिटीज यानी मधुमेह के शिकार हो सकते हैं। अमेरिका में हुए एक रिसर्च के अनुसार 2016 में डायबिटीज के सात नए मामलों में एक मामले के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार रहा। इसमें पता चला है कि वायु प्रदूषण की वजह से भी इस बीमारी के पनपने की आशंका बढ़ जाती है। आहार की आदतों और सुस्त जीवनशैली को इस बीमारी का मुख्य कारक माना जाता था लेकिन सेंट लुइस में वाशिंगटन यूनिवर्सिटी आॅफ मेडिसिन के अध्ययन में कहा गया है कि प्रदूषण भी मधुमेह होने में बड़ी भूमिका निभाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन में सामने आया कि 2016 में दुनियाभर में प्रदू्षण की वजह से डायबिटीज के 32 लाख नए मामले सामने आए। यह उस साल दुनियाभर में मधुमेह के कुल नए मामलों का करीब 14 प्रतिशत हैं। हवा में मौजूद कई प्रकार के जहरीले पदार्थो की वजह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर काफी प्रभाव पड़ता हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">शोध अध्ययन में पता चला है कि प्रदूषित हवा से अधिक कोलस्टॅ्राल और मधुमेह का खतरा काफी बढ़ जाता हैं। शोधकर्ता का मानना है कि वायु प्रदूषण की वजह से शरीर में इंफ्लेमेशन की मात्रा अधिक हो जाती है जो शुगर के स्तर को संतुलन में नहीं रहने देती और आगे चलकर वह मधुमेह का कारण बनती है। फैक्ट्री, कारखानों और गाडियों आदि से निकलने वाले धुएं में मौजूद कार्बन मोनोआॅक्साइड, सल्फर डाइआॅक्साइड और नाइट्रोजन डाइआॅक्साइड आदि केमिकल्स का समूह सबसे पहले फेफड़ों के लिए नुकसानदायक होता है आगे चलकर यह मधुमेह होने का कारण बनता है।</p>
<p style="text-align:justify;">डायबिटीज ने देश और दुनिया में घर घर में अपना स्थान सुरक्षित कर लिया है। भारत में हर तीसरे घर में इसके मरीज मिल जायेंगे। इस बीमारी पर नित नए शोध हो रहे हंै। लाख प्रयासों के बावजूद यह बीमारी काबू में नहीं आ रही है। डायबिटीज मुख्य रूप से जीवनशैली से जुड़ी होती है। मगर देखा गया है कि इसके किये केवल जीवनशैली ही जिम्मेदार नहीं है। अन्य बहुत से कारकों का पता चला है जो इस रोग के फैलने के जिम्मेदार हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आंकड़ों की बात करें तो दुनियाभर में फिलहाल 42 करोड़ मधुमेह के रोगी हैं। वर्तमान में भारत में ही 3 करोड़ से ज्यादा डायबिटीज के शिकार लोग हैं। शोध में यह जानकारी भी सामने आयी कि प्रदूषण शरीर में इंसुलिन के उत्पादन को रोकता है इससे शरीर ब्लड शुगर को शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी ऊर्जा में नहीं बदल पाता। वेटरन्स अफेयर्स क्लीनिकल ऐपिडेमियोलॉजी सेंटर के वैज्ञानिकों के साथ काम करने वाले अनुसंधानकतार्ओं ने 17 लाख अमेरिकी पूर्व सैनिकों से जुड़े आंकड़ों पर अध्ययन किया जिन्हें पहले कभी मधुमेह की शिकायत नहीं रही।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के अनुसंधान से ये पता चला है कि लंबे समय से वायु प्रदूषण के संपर्क में रह रहीं मधुमेह पीड़ित महिलाओं को हृदय रोग की संभावना सबसे अधिक होती है। बॉस्टन के हावर्ड मेडिकल के अध्ययन में औसतन 64 साल तक की 114,537 महिलाओं को शामिल किया गया था। शोधार्थियों ने दिल के रोग, कोरोनरी रोग और हृदयाघात से प्रभावित घटनाओं का जायजा लिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही शोधार्थियों ने वाहनों, बिजली घरों, कारखानों से पैदा हुए वायु प्रदूषण के अलग-अलग कणों (तत्वों) का भी विश्लेषण किया। वैज्ञानिकों ने वायु प्रदूषण के संपर्क में रह रही सभी महिलाओं का अध्ययन किया। जिसके बाद यह सामने आया कि मधुमेह पीड़ित महिलाओं में हृदय रोग और हृदयाघात होने का खतरा अन्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा बढ़ गया था। रिपोर्ट में बताया कि इन उपसमूहों की पहचान करना जरूरी है। इससे हमें प्रदूषण के मानकों और बचाव के तरीकों को जानने में मदद मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;">फेडरेशन आॅफ अमेरीकन सोसाइटीज फॉर एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी के जर्नल में प्रकाशित हुए एक अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि खुली और प्रदूषित हवा में सांस लेने के कारण सामान्य और स्वस्थ व्यक्ति भी सांस संबंधी बीमारियों के साथ साथ मधुमेह और मोटापा जैसी समस्याओं का भी शिकार हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्रदूषित हवा में कम समय रहने वाले की अपेक्षा अधिक समय रहने वाले के शरीर पर इसके अत्यधिक भयावह परिणाम देखने को मिल सकते हैं। मोटापा जैसी समस्या से लड़ रहे लोगों के लिए यह निष्कर्ष और डरावने हो सकते हैं। हवा में प्रदूषण की बढ़ती मात्रा और स्वास्थ्य पर इसके दुष्प्रभावों को देखते हुए वायु प्रदूषण को कम करने के लिए व्यापक कदम उठाने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार डायबिटीज का कारण बन रहे वायु प्रदूषण को रोका जा सकता है। जिन लोगों के परिवार में पहले से किसी को डायबिटीज रहा है, उन्हें इसका ज्यादा खतरा होता है। उन्हें आवश्यक सावधानियां बरतनी चाहिए और प्रदूषित हवा से बचने के लिए बाहर कम से कम जाना चाहिए। उन्हें अपने खान-पान पर भी नजर रखनी चाहिए और नियमित रूप से सुबह एक्सरसाइज करनी चाहिए, जब हवा कुछ साफ होती है। प्रदूषण से बचाव के लिए काबरेहाईड्रेटसयुक्त भोजन करें और साल के 80 दिन उपवास रखें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-बाल मुकुन्द ओझा</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Tue, 03 Jul 2018 09:14:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>क्यों जानलेवा साबित होती जा रही है गर्मी?</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तर तथा मध्य भारत समेत कमोबेश पूरा देश भीषण गर्मी की चपेट में है। देश के कई राज्यों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में गर्मी ने पिछले दस साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। दुखद यह है कि सूरज की यह तपिश धीरे-धीरे जानलेवा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-is-summer-becoming-proven-deadly/article-3836"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-05/summer-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उत्तर तथा मध्य भारत समेत कमोबेश पूरा देश भीषण गर्मी की चपेट में है। देश के कई राज्यों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में गर्मी ने पिछले दस साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। दुखद यह है कि सूरज की यह तपिश धीरे-धीरे जानलेवा साबित होती जा रही है। सूरजदेव के सितम के आगे लोग बेदम नजर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में दर्जनों लोगों का तपिश से मर जाना भी किसी राष्ट्रीय चिंता से कम नहीं है। लगातार चलती गर्म हवाओं (लू) ने लोगों को अपने घरों में दुबकने को मजबूर कर दिया है। कई शहर, जो आए दिन भीषण जाम का सामना करते थे, आज वहां दोपहर के समय कर्फ्यू जैसे हालात हैं। बाजार से भीड़ गायब है, सड़कें सुनी हो गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सूरज की तेज किरणें, सूखे और पेयजल संकट की मार झेल रहे भारतीयों पर दोहरी मुसीबत साबित हो रही है। सूरज की यह तपिश जैसे-जैसे बढ़ेगी, पेयजल संकट और अधिक गहराता जाएगा। सूखा व पेयजल संकट के कारण देश के अनेक इलाकों में स्थिति भयावह होती जा रही है। दरअसल, तापमान के 40 से 50 डिग्री पर पहुंचने से आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। वहीं, बिजली की आंखमिचौली के कारण लोगों की नींद और चैन हराम हो गई है। सूरज की तपिश और उमस के आगे लोग बिलबिला रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बिजली हमारे दैनिक जीवन को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करती है, इसलिए अनियमित बिजली आपूर्ति के कारण समाज के सभी वर्ग के लोगों पर इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है। एक तरफ, अघोषित बिजली कटौती से कामकाजी लोगों की श्रम-उत्पादकता प्रभावित हो रही है, तो दूसरी तरफ बच्चों की पढ़ाई तथा घरेलू कामकाज भी बाधित हो रहे है। दिहाड़ी मजदूरों, किसानों और अनौपचारिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए दिन में काम पर निकलना मुश्किल हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इंसानों की तरह बेजुबान जानवरों और परिंदों पर भी यह मौसम कहर ढा रहा है। उनके समक्ष भी चारे और पेयजल संकट तथा छायादार स्थान खोजने की चुनौती है। वे पक्षी और जानवर जो पालतू नहीं हैं, वे भोजन और पानी का प्रबंध जेठ की इस तपती दोपहरी में कैसे करेंगे, यह भी सोचनीय है। वहीं, गर्म हवाओं के चलने से खेत-खलिहानों और कच्चे घरों में आगजनी की घटनाएं भी आम हो चुकी हैं। कुछ प्रदेशों में दर्जनों घर जलकर स्वाहा हो चुके हैं, जबकि दावानल के कारण वन नष्ट हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन विषम हालातों को देखते हुए ऐसा लगता है, मानो पृथ्वी हमारी सहनशीलता की परीक्षा ले रही है। आखिर, इस आपदा के लिए कहीं न कहीं मानव का प्रकृति से अनियंत्रित छेड़छाड़ ही तो जिम्मेदार है। देखना दिलचस्प होगा कि मानव जाति प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से उत्पन्न विनाश के मंजर को कब तक झेल पाता है?</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि हमारी पृथ्वी, सौरमंडल का इकलौता ग्रह है, जहां जीवन जीने की अनुकूल परिस्थितियां विद्यमान हैं। यहां, हम खुली हवा में सांस लेते हैं। शुद्ध पेयजल पीते हैं और आराम से जीवन गुजारते हैं। बावजूद इसके, वृक्षारोपण, जल-संरक्षण व पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विषय आज केवल वैचारिकी तक ही सीमित रह गये हैं अथवा संविधान के अंतर्गत वर्णित ‘मूल कर्तव्यों’ की सूची में एक तत्त्व के रुप में केवल शोभा बढ़ा रहे हैं! यह भी देखा जा रहा है कि एक बड़ा तबका प्रकृति के साथ कथित रुप से सहानुभूति तो रख रहा है, लेकिन इस दिशा किसी भी तरह की जमीनी पहल न करने की अपनी परंपरागत आदत से मजबूर भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब, जबकि हमारा पर्यावरण बुरे दौर से गुजर रहा है, तब इस बात की चर्चा प्रासंगिक हो जाती है कि आखिर क्या वजह है कि प्रकृति मानव समुदाय के साथ दोस्ताना व्यवहार नहीं कर रही है? यह भी विचार-विमर्श किया जा सकता है कि विगत कुछ वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि पृथ्वी पर जीवन के लिए अनुकूल दशाएं दिन ब दिन मानव समुदाय के लिए कठोर से कठोरतम होती चली गईं ?</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, औद्योगिक विकास की गोद में पला-बढ़ा पिछला एक-दो दशक पर्यावरणीय दृष्टि से चिंता का विषय रहा है। इस दौरान, जीवन के भौतिकवादी लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन कर प्राकृतिक चक्र को तोड़ने की तमाम कोशिशें की गईं, जिससे आज प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">औद्योगिक विकास की आड़ में पृथ्वी के साथ मानव का सौतेला व्यवहार जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों के सृजन के लिए उत्तरदायी रहा है। प्राकृतिक संसाधनों का सततपोषणीय उपभोग एक प्राकृतिक क्रिया है, लेकिन अब इसे शोषण का स्वरुप दे दिया गया है। जो प्रकृति पहले हमारे लिए सर्वेसर्वा थी, उसे हमने अपना दास समझ लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति के अनियंत्रित शोषण ने पारिस्थितिक तंत्र को विच्छेद किया, नतीजतन प्राय: प्रतिदिन पृथ्वी का कुछ हिस्सा आपदा से प्रभावित रहता है। विदित हो कि बाढ़, सूखा, भू-स्खलन और भूकंप जैसी आपदाएं वसुंधरा पर बारंबार दस्तक दे रही हैं। आधुनिक जीवन का पर्याय बन चुके, औद्योगीकरण और नगरीकरण की तीव्र रफ्तार के आगे हमारा पर्यावरण बेदम हो गया है। अगर इसकी सुध न ली गई, तो हमारे अस्तित्व की समाप्ति पर पूर्णविराम लग जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">पेड़-पौधों का सफाया कर कंक्रीट से बनी आलीशान भवनें, पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ा रही हैं।घरों में प्रयुक्त एसी और कुलर जैसे उपकरणों से निकलने वाले गैसें भी ग्लोबल वार्मिंग की एक बड़ी कारक हैं। इस तरह,वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की आवश्यकता से अधिक मात्रा होने पर वैश्विक ऊष्णता में तेजी से वृद्धि हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैश्विक ऊष्णता के कारण, एक तरफ आपदाओं की बारंबारता है, तो दूसरी तरफ, जीव-जंतु, पेड़-पौधों तथा फसलों इत्यादि पर इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है। लेकिन, यह भी याद रहे कि जिस आर्थिक विकास की नोंक पर आज का मानव विश्व में सिरमौर बनने का सपना हृदय में संजोये हैं, वह एक दिन, मानव सभ्यता के पतन का कारण बनेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा समय में, औद्योगिक विकास की दिशा में अग्रसर वैश्विक समाज के सामने यह बड़ी चुनौती है कि असंतुलित हो चुकी प्राकृतिक तंत्र को संतुलित कैसे किया जाए? प्रतिवर्ष स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अनगिनत सभा-सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है, लेकिन यह बस भाषणों तक ही सीमित रह जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह जानते हुए भी कि वनों के ह्रास की प्रक्रिया पर्यावरण को सीधे तौर पर प्रभावित करती है, बावजूद इसके भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों के वन क्षेत्रों में तेजी से कमी आ रही है। कुछ वर्ष पहले पेड़ों की संख्या अधिक थी, तो समय पर बारिश होती थी और गर्मी भी कम लगती थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, पानी तरसा रहा है और गर्मी झुलसा रही है। औद्योगिक कूड़ा-कचरा, सभी प्रकार के प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन, ग्रीनहाउस प्रभाव और ग्लोबल वार्मिंग से पूरा पर्यावरण दूषित हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, बढ़ती आबादी और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के चक्कर में निर्दोष पेड़-पौधों की बलि चढ़ाई जा रही है। इसी का नतीजा है कि पर्यावरणीय चक्र बिल्कुल विच्छेद हो गया है। बढ़ते वैश्विक ऊष्मण के कारण आसमान से आग तो बरस ही रहे हैं, लेकिन मानसून की अनिश्चितता व अनियमितता से देश में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सच तो यह भी है कि औद्योगिक विकास की बदलती परिभाषा मानव सभ्यता के अंत का अध्याय लिख रही है। लेकिन,बेफ्रिकी के रथ पर सवार होकर हम अंधाधुंध विकास का गुणगान कर रहे हैं। आखिर, प्रकृति के प्रति इतनी निर्दयता क्यों? क्या केवल कंक्रीट के आलीशान भवनें और औद्योगिक संयंत्र ही मानव का पोषण करेंगी? अगर नहीं, तो फिर यह मूर्खता क्यों? अगर हां,तो फिर कैसे?</p>
<p style="text-align:justify;">आज पृथ्वी कि जो दुर्दशा हमने की है,उस परिस्थिति में अंतर्राष्ट्रीय विद्वान हेनरी डेविड थोरियो का कथन सटीक बैठता है, जिन्होंने कहा था-भगवान का धन्यवाद कि हम उड़ नहीं सकते, अन्यथा पृथ्वी के साथ आकाश को भी बरबाद कर देते। दरअसल, मौसम और जलवायु परिवर्तन की मार से बचने के लिए आवश्यक है कि वृक्षारोपण पर अधिक से अधिक जोर दिया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">नाना प्रकार के पेड़-पौधे हमारी पृथ्वी का श्रृंगार करते हैं। वृक्षारोपण कई मर्ज की दवा भी है। पर्यावरण संबंधी अधिकांश समस्याओं की जड़ वनोन्मूलन है। वैश्विक ऊष्मण, बाढ़, सूखा जैसी समस्याएं वनों के ह्रास के कारण ही उत्पन्न हुई है। मजे की बात यह है कि इसका समाधान भी वृक्षारोपण ही है। जंगल,पृथ्वी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक समय धरती का अधिकांश हिस्सा वनों से आच्छादित था, किंतु आज इसका आकार दिन-ब-दिन सिमटता जा रहा है। मानसून चक्र को बनाए रखने,मृदा अपरदन को रोकने,जैव-विविधता को संजोये रखने और दैनिक उपभोग की दर्जनाधिक उपदानों की सुलभ प्राप्ति के लिए जंगलों का होना बेहद जरूरी है। ये वातावरण से अतिरिक्त व नुकसानदेह कार्बन-डाईआक्साइड को अपने अंदर सोख कर ग्लोबल वार्मिंग से हमारी रक्षा करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुधीर कुमार</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 May 2018 07:59:18 +0530</pubDate>
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                <title>राजनीतिक हिंसा लोकतंत्र के लिए घातक</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/political-violence-is-deadly-for-democracy/article-2892"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/rahul-cart1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गुजरात में राहुल गांधी अपनी पार्टी की ओर से बाढ़ पीड़ितों का हालचाल जानने पहुंचे तब कुछ लोगों ने उन पर पत्थर फैंके व मोदी-मोदी के नारे लगाए। स्पष्ट है पत्थरबाज लोग दर्शा रहे थे कि वह भाजपा एवं मोदी के प्रशंसक है और राहुल को नहीं चाहते। लेकिन पत्थरबाजी क्यों? केरल में मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी पर भाजपा के आरोप हैं कि वहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकतार्ओं को कम्युनिष्ट काडर मार रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">ठीक ऐसा ही किसी वक्त पश्चिम बंगाल में त्रृणमूल कांग्रेस भी कम्युनिष्ट पार्टी पर आरोप लगाती थी। पंजाब में भी एक कट्टरपंथी वर्ग जो अपने-आपको खालिस्तान का समर्थक कहता है पर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के लोगों की हत्या के अंदेशे हैं। ये सारी घटनाएं एक प्रमाण हैं कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहे जाने वाले भारत में राजनीतिक हिंसा भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले दिनों देश में राष्ट्रीय चुनाव सम्पन्न हुए और मीडिया ने दिखाया कि किस तरह भारत में बड़ी शांति से सर्वोच्चय पद पर सत्ता एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को सौंप देता है परन्तु देश में बढ़ रही राजनीतिक हिंसा की घटनाएं कुछ और ही ब्यां करने लगी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले यह हिंसा चुनावों के वक्त ज्यादा होती थी तब बूथों पर कब्जे, राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा एक दूसरे पर जानलेवा हमले करना एवं हत्याएं हर चुनाव की कहानी थी चुनाव जितना छोटा होता हिंसा उतनी ज्यादा होती। पंचायत चुनाव, विधानसभा व लोकसभा चुनावों में हिंसा के लिए अघोषित तौर पर सत्तापक्ष का दल छूट देता एवं प्रशासन को पंगु बनाता ताकि उसके द्वारा फैलाई जा रही हिंसा में वह रक्षात्मक तौर पर बाधा नहीं बने।</p>
<p style="text-align:justify;">परन्तु चुनाव आयोग के सशक्त होने, सुरक्षा व्यवस्था को ज्यादा चुस्त कर लेने से, मतदाताओं द्वारा जागरूक हो जाने से अब चुनावी हिंसा में कमी आई है। लेकिन अब सत्तापक्ष के नेताओं की कृपादृष्टि पाने या अपने आपको उनकी नजरों में चढ़ाने के लिए राजनीतिक कार्यकर्ता विपक्षी दलों पर हमले करते हैं। हिंसा लोकतंत्र की घोर शत्रु है इसका समर्थन किसी भी तरह से होना देश में तानाशाही को जन्म देने जैसा है।</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल एक नेता का नाम हो सकता है परन्तु वास्तव में यह राजनीतिक मतभिन्नता रखने वालों पर गुंडागर्दी है। देश के राजनीतिक, संवैधानिक एवं प्रशासनिक प्रतिष्ठानों को इसके विरुद्ध अपना निर्णय देना होगा और दोषियों पर बिना किसी बचाव के कार्रवाई होनी चाहिए। अन्यथा भाजपा नैतिक रूप से वह आधार खो देगी जिसकी दुहाई वह केरल में दे रही है। भारतीय मतदाताओं को ऐसी घटनाओं पर अपना तीव्र रोष व्यक्त करना चाहिए। हो सके तो घटनाएं याद रखी जाएं और हर उस व्यक्ति व विचारधारा को हाशिए पर धकेला जाए जो हिंसा की राजनीति में विश्वास करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Fri, 04 Aug 2017 22:51:24 +0530</pubDate>
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