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                <title>Tradition - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>परंपरा की चाशनी में लिपटा आधुनिक शहर है कोलकाता</title>
                                    <description><![CDATA[उमंगों में डूबा शहर कुमारटुली (एजेंसी)। कुमारटुली कोलकाता का वह हिस्सा है जहां पूरे बंगाल से आकर कुम्हारों ने एक बस्ती बसा ली है। साल भर यहां पर मूर्तिकारों को माटी से मूर्ति में जान डालते हुए देखा जा सकता है लेकिन यदि आप दुर्गा पूजा से कुछ महीनों पहले यहां जाएं तो यहां की गलियां […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/rangmanch/tradition-is-kolkata/article-6264"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/kolkata.jpg" alt=""></a><br /><h2>उमंगों में डूबा शहर</h2>
<p><strong>कुमारटुली (एजेंसी)। </strong>कुमारटुली कोलकाता का वह हिस्सा है जहां पूरे बंगाल से आकर कुम्हारों ने एक बस्ती बसा ली है। साल भर यहां पर मूर्तिकारों को माटी से मूर्ति में जान डालते हुए देखा जा सकता है लेकिन यदि आप दुर्गा पूजा से कुछ महीनों पहले यहां जाएं तो यहां की गलियां एकदम सजीव जान पड़ेंगी, जहां कोई छोटी तो कोई बड़ी मूर्ति बना रहा होता है। एक पूरी गली मां के श्रृंगार की वस्तुओं की दुकानों से सज जाती है। यहीं से लोग अपने-अपने पंडालों के लिए दुर्गा मां की एक से बढ़कर एक खूबसूरत मूर्तियां और साज-सज्जा के सामान लेकर जाते हैं। यदि आप इन दिनों कोलकाता के भ्रमण पर हैं तो आप पूरा एक दिन इस इलाके में गुजार सकते हैं।कोलकाता के दो चेहरे हैं। एक, कोलकाता बंगाल की प्राचीन परंपराओं का वाहक तो दूसरा, कोलकाता अंग्रेजों की छाप या प्रभाव वाला। इसमें औपनिवेशिक जमाने की यादें देखने को मिलती हैं। एक कोलकाता में जहां प्राचीन मंदिर, मठ हैं तो दूसरी ओर आप देख सकते हैं विक्टोरिया मेमोरियल, हावड़ा ब्रिज जैसी आधुनिक संरचनाएं। सबसे अच्छी बात यह है कि इतने सारे विरोधाभासों के बीच भी यह शहर सच में सिटी ऑफ जॉय है। दरअसल, यहां पर खुशियां बहुत सारे पैसों की मोहताज नहीं हैं। आप चंद पैसों में भी कोलकाता का आनंद ले सकते हैं।</p>
<h2>प्रिंसेप घाट में रात में नौका विहार का आनंद</h2>
<p>विक्टोरिया मेमोरियल से थोड़ी दूरी पर है सफेद खंभों से सजी खूबसूरत संरचना प्रिंसेप घाट। इसका निर्माण एंग्लो-इंडियन स्कॉलर जेम्स प्रिंसेप की याद मेंसन् 1843 में हुगली नदी के किनारे करवाया गया था। यहां एक खूबसूरत गार्डन भी है। यदि आपको पारंपरिक तरीके से नौका विहार करनी है तो शाम के समय यहां आएं।यहां से रात में जगमगाता हुआ विवेकानंदन सेतु बहुत खूबसूरत नजऱ आता है।</p>
<h2>अपनी तरह का अनूठा रवींद्र सेतु यानी हावड़ा ब्रिज</h2>
<p>कोलकाता की पहचान हावड़ा ब्रिज दो शहरों कोलकाता और हावड़ा को जोडऩे के लिए आज से 75 साल पहले हुगली नदी पर बनाया गया था। सन् 1965 में इसका नाम बदल कर प्रसिद्ध कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर रवींद्र सेतु रखा गया। हालांकि आज भी लोग इसे हावड़ा ब्रिज कहना ही पसंद करते हैं। यह एक ऐसा ब्रिज है जिसमें कहीं भी नट बोल्ट नहीं लगाए गए हैं। यह दुनिया के सबसे लंबे 6 सस्पेंशन ब्रिजों में से एक है। इसका निर्माण 1942 में पूरा हुआ और फरवरी 1943 में लोगों के लिए खोला गया। यह ब्रिज 705 मीटर लंबा और 30 मीटर चौड़ा है। एक अनुमान के अनुसार इस विशाल ब्रिज से हर रोज 80 हजार से अधिक वाहन और 10 लाख पैदल यात्री गुजरते हैं। हावड़ा ब्रिज के नीचे ही एक दार्शनिक स्थल है मलिक घाट फ्लॉवर मार्केट। सुबह के समय इस मार्केट में काफी चहल-पहल देखने को मिलेगी। यहां भांति-भांति के फूल बिकते हैं। हावड़ा ब्रिज से इसका व्यू बहुत ही सुंदर नजर आता है।</p>
<h2>ट्राम की सवारी</h2>
<p>कोलकाता के ट्राम को एशिया के सबसे पुराना ट्रांसपोर्ट माना जाता है। इसकी शुरुआत 27 मार्च, 1902 में हुई थी। पहली ट्राम सियालदाह और आर्मीनियन घाट स्ट्रीट के बीच चली थी। यह वो जमाना था जब ट्राम को घोड़े खींचा करते थे। घोड़ों द्वारा खींचने वाली ट्राम को खासतौर पर लंदन से आयात किया गया था। इसका उद्घाटन लॉर्ड रिपन ने किया था। वक्त के साथ-साथ कोलकाता ट्राम को लोकोमोटिव इंजन मिला और तब से यह लगातार यहां की सड़कों पर दौड़ रही है। आज भले ही शहर ने टैक्सी और मेट्रो के साथ गति पकड़ ली हो लेकिन कोलकाता का ओल्ड व‌र्ल्ड चार्म इन ट्राम के जरिए बरकरार है।</p>
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<p> </p>
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                <pubDate>Mon, 15 Oct 2018 09:41:07 +0530</pubDate>
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                <title>भारतीय संसदीय परंपरा को समृद्ध करने वाले सोमनाथ</title>
                                    <description><![CDATA[देश के वामपंथी राजनीति के पुरोधा एवं शिखर स्तंभ सोमनाथ चटर्जी का निधन संपूर्ण राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है।13 अगस्त सुबह,कोलकाता के एक अस्पताल में उन्होंने 89 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस ली। उन्होंने संसदीय प्रणाली के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक लोकसभाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया।वे 2004 से 2009 बीच […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/somnath-enriches-indian-parliamentary-tradition/article-5378"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/somnath-enriches.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश के वामपंथी राजनीति के पुरोधा एवं शिखर स्तंभ सोमनाथ चटर्जी का निधन संपूर्ण राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है।13 अगस्त सुबह,कोलकाता के एक अस्पताल में उन्होंने 89 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस ली। उन्होंने संसदीय प्रणाली के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक लोकसभाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया।वे 2004 से 2009 बीच लोकसभाध्यक्ष पद पर रहे।इस दौरान उन्होंने “स्पीकर”अर्थात लोकसभाध्यक्ष पद को भी नवीन गरिमाओं से युक्त किया।पेशे से वकील सोमनाथ चटर्जी ने 1968 में राजनीति शुरू की। मात्र 3 साल बाद ही 1971 में लोकसभा के सदस्य बन गये।इस दौरान वे निर्दलीय जीते थे,हालांकि उन्हें सीपीएम का समर्थन प्राप्त था।भारत के संसदीय इतिहास में उन्हें 10 बार सांसद बनने का गौरव हासिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">1971 से शुरू हुई संसदीय पारी 2009 तक चली।इसमें से 1984 अपवाद है,जब उन्हें पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हार का सामना करना पड़ा।वर्ष 2004 में 14 वीं लोकसभा में वे 10 वीं बार निर्वाचित हुए।साल 1989 से 2004 तक वे लोकसभा में सीपीआईएम के नेता भी रहे।उन्होंने 35 सालों तक एक सांसद के रुप में देश की सेवा की।इसके लिए उन्हें साल 1996 में उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार से नवाजा गया।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभाध्यक्ष के रूप में एक नए इतिहास का सृजन: 4 जून 2004 को 14 वीं लोकसभा के अध्यक्ष के रुप में श्री सोमनाथ चटर्जी का सर्वसहमति से निर्वाचन से सदन में एक इतिहास रच गया।लोकसभा अध्यक्ष के रुप में सोमनाथ चटर्जी का निर्वाचन प्रस्ताव तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने रखा,जिसे तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अनुमोदित किया।इस लोकसभा के 17 अन्य दलों ने भी सोमनाथ चटर्जी का नाम प्रस्तावित किया,जिसका समर्थन अन्य दलों के नेताओं द्वारा किया गया।इसके बाद वह निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी पैसों से सांसदों के चायपानी पर रोक: बतौर स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने सरकारी पैसों से सांसदों के चाय पानी पर रोक लगा दी थी।सोमनाथ चटर्जी ने ही दबाव डाला था कि अगर कोई सांसद विदेशी दौरे पर जाता है,और उसके साथ उसके परिवार वाले जाते हैं,तो परिवार वालों का खर्चा सांसदों को ही वहन करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पीकर सोमनाथ चटर्जी और संसद तथा न्यायपालिका आमने-सामने: भारत में संसदीय व्यवस्था ब्रिटेन से ग्रहण किया गया है,परंतु भारतीय संसद ब्रिटिश संसद के तरह सर्वशक्तिमान नहीं है।यहाँ स्वतंत्र न्यायपालिका विद्यमान है,परंतु न्यायिक संप्रभुता की भी स्थिति नहीं है।ऐसे में भारतीय संविधान संसदीय संप्रभुता और न्यायिक सर्वोच्चता के सिद्धांतों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करता है।यही कारण है कि लोकसभाध्यक्ष के रूप में सोमनाथ चटर्जी ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा विधायी कार्यों में हस्तक्षेप को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया।उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस को भी स्वीकार करने से इंकार कर दिया था।उसी समय जब झारखंड विधानसभा में बहुमत परीक्षण के दौरान सदन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कैमरे लगाने के निर्देश दिए,तब भी सोमनाथ चटर्जी ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया कि न्यायपालिका अपने कार्यक्षेत्र से आगे जाकर विधायी कार्यों में हस्तक्षेप कर रही है।अंतत: उन्होंने विधायी कार्यों में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर देश के सभी विधानसभाध्यक्षों की बैठक भी बुलाई।यही वह समय था,जब संसद और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने थी तथा देश ने “लोकसभाध्यक्ष” को वास्तव में विधायिका के अभिभावक के रूप में भी देखा।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभाध्यक्ष की जिम्मेदारी को सही मायने में दलगत राजनीति से ऊपर रखा: सैंद्धांतिक तौर पर मनमोहन सिंह की अगुवाई में जब भारत सरकार ने अमेरिका से परमाणु समझौता किया ,तो ये वक्त सोमनाथ चटर्जी के जीवन में सियासी उथल पुथल का था।एक तरफ सोमनाथ चटर्जी के ऊपर दलगत राजनीति से तटस्थ होकर लोकसभाध्यक्ष की भूमिका के निर्वहन की जिम्मेदारी थी,तो दूसरी ओर उनकी पार्टी सीपीआई(एम) परमाणु समझौते का विरोध करते हुए सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सोमनाथ चटर्जी से भी लोकसभाध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया।लेकिन सोमनाथ चटर्जी ,जो सिद्धांत के पक्के थे,उन्होंने पार्टी जिम्मेदारी की तुलना में संवैधानिक जिम्मेदारी को महत्व दिया तथा स्पीकर पद से इस्तीफा नहीं दिया।22 जुलाई 2008 को विश्वास मत के दौरान किए गए लोकसभा के संचालन के लिए उनको देश के विभिन्न नागरिकों तथा विदेशों से काफी सराहना मिली।लेकिन इस घटनाक्रम से नाराज सीपीईसी(एम) ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।इस घटनाक्रम से दुखी सोमनाथ चटर्जी के आंसुओं को संपूर्ण देश ने लोकसभा में देखा था।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभाध्यक्ष के रुप में अन्य महत्वपूर्ण कार्य: सितंबर 2006 में सोमनाथ चटर्जी को अबुजा,नाइजीरिया में राष्ट्रमंडल संसदीय संघ का अध्यक्ष चुना गया।उनके नेतृत्व तथा समर्थ दिशा निर्देश में भारत ने सितंबर ,2007 के दौरान नई दिल्ली में 53 वें सीपीए सम्मेलन की सफलतापूर्वक मेजबानी की,जिसमें 52 देशों को विविध क्षेत्रों में भारत की उपलब्धियों से अवगत कराया। लोकसभाध्यक्ष के रूप में व्यापक मीडिया कवरेज प्रदान करने हेतु सोमनाथ चटर्जी के प्रयासों से ही जुलाई 2006 से 24 घंटे का लोकसभा चैनल शुरू किया गया।उनके लोकसभाध्यक्ष पद पर रहते हुए उनकी पहल पर ही भारत की लोकतांत्रिक विरासत पर अत्याधुनिक संसदीय संग्रहालय की स्थापना की गई।14 अगस्त 2006 को इस संग्रहालय का उदघाटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया गया।यह संग्रहालय जनता के दर्शन के लिए खुला है।</p>
<p style="text-align:justify;">सोमनाथ चटर्जी ने कामगार वर्ग तथा वंचित वर्ग के लोगों के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाकर उनके हितों के लिए आवाज बुलंद करने का कोई अवसर नहीं गंवाया।सोमनाथ चटर्जी का वाद-विवाद कौशल ,राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की स्पष्ट समझ,भाषा के ऊपर पकड़ और जिस नम्रता के साथ वो सदन में अपना दृष्टिकोण रखते थे,उसे सुनने के लिए पूरा सदन एकाग्रचित्त होकर सुनता था।सोमनाथ चटर्जी ने भले ही 2009 में सक्रिय राजनीति से अलविदा कह दिया था और 2018 में हम सबों को अलविदा कह दिया,लेकिन उनके वे अमूल्य सिद्धांत सदैव जीवंत रहेंगे,जिन्होंने भारतीय संसदीय परंपरा को कई नवीन आयामों से विभूषित किया।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Aug 2018 10:53:15 +0530</pubDate>
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                <title>किसी भी मुद्दे अथवा विवाद का हल सिर्फ बातचीत: मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। चीन के साथ चल रहे डोकलाम विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इशारों में चीन को घेरा है। नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि मुश्किल मुद्दों, विवादों को सिर्फ बातचीत के रास्ते ही सुलझाया जा सकता है। उन्होंने खुद को प्राचीन भारत की परंपरा में यकीन करने वाला बताया। मोदी ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/conversation-the-solution-of-any-issue-modi/article-2907"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/modi-in-meeting.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली।</strong> चीन के साथ चल रहे डोकलाम विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इशारों में चीन को घेरा है। नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि मुश्किल मुद्दों, विवादों को सिर्फ बातचीत के रास्ते ही सुलझाया जा सकता है। उन्होंने खुद को प्राचीन भारत की परंपरा में यकीन करने वाला बताया। मोदी ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘यह एक पुरानी भारतीय अवधारणा है जिसमें संवाद और बहस पर विचारों के आदान-प्रदान के मॉडल को अपनाया गया है। जिसमें किसी भी मुद्दे को बातचीत के जरिए हल किया जाता था।’</p>
<p>‘संवाद-ग्लोबल इनिशिएटिव ऑन कॉन्फ्लिक्ट अवॉयडेंस एंड एंटरटेनमेंट कॉन्शियसनेस’ कार्यक्रम को वीडियो मैसेज के जरिए संबोधित करते हुए पीएम ने कहा, “21वीं सदी में दुनिया के सभी देश एक-दूसरे से जुड़े हुए और एक-दूसरे पर निर्भर हैं। फिर भी यह सदी आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन (climate change) जैसी वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही है। मुझे भरोसा है कि इसका हल एशिया की सबसे पुरानी बातचीत और चर्चा की परंपरा से ही निकलेगा।”</p>
<h2>भारत-चीन के बीच सिक्किम में सीमा विवाद</h2>
<p>गौरतलब है कि भारत-चीन के बीच सिक्किम में सीमा विवाद काफी बढ़ चुका है। चीन, भूटान के डोकलाम में सड़क बना रहा है और भारत ने इसका जोरदार विरोध कर रहा है।</p>
<p>भूटान का डोकलाम पठार भारत (सिक्किम), चीन, भूटान के ट्राइजंक्शन पर है। डोकलाम को चीन डोंगलांग कहता है। इस इलाके में चीन की दखलंदाजी और सड़क बनाकर अपनी स्थिति मजबूत करने से भारत और भूटान को परेशानी है।</p>
<p>मोदी ने कहा, “तर्क शास्त्र (डिबेट) प्राचीन भारत का ही कॉन्सेप्ट है, बातचीत और चर्चा के जरिये इसे पाया गया और यह विवादों को खत्म करने और विचारों को एक-दूसरे से साझा करने का मॉडल बना।”<br />
– “भारत में मानवता का लंबा इतिहास रहा है, कई धर्मों, सभ्यताओं और अध्यात्म में इसकी गहरी जड़ें हैं। इसके रास्ते ही हमनें कई सवालों के जवाब खोजे हैं।”</p>
<p> </p>
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                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Aug 2017 03:34:43 +0530</pubDate>
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