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                            <item>
                <title>American Dollar Vs Indian Rupee: 100 डॉलर की कीमत जानकर चौंक जाएंगे! आज भारत में इतने रुपये के बराबर है USD</title>
                                    <description><![CDATA[आज के दौर में डॉलर और रुपये की कीमत पर पूरी दुनिया की नजर रहती है। विदेश यात्रा, ऑनलाइन शॉपिंग, पढ़ाई, बिजनेस या निवेश—हर जगह अमेरिकी डॉलर (USD) का बड़ा महत्व है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/you-will-be-shocked-to-know-the-value-of-100/article-84977"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-05/american-dollar-vs-indian-rupee.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">American Dollar Vs Indian Rupee: आज के दौर में डॉलर और रुपये की कीमत पर पूरी दुनिया की नजर रहती है। विदेश यात्रा, ऑनलाइन शॉपिंग, पढ़ाई, बिजनेस या निवेश—हर जगह अमेरिकी डॉलर (USD) का बड़ा महत्व है। ऐसे में लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका के 100 डॉलर भारत में कितने रुपये के बराबर होते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">आज भारत में 100 डॉलर की कितनी कीमत है?</h4>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा एक्सचेंज रेट के अनुसार 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब ₹96 के आसपास चल रही है। यानी 100 डॉलर की कीमत भारत में लगभग ₹9,600 के करीब बैठती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि डॉलर और रुपये का रेट हर दिन बदलता रहता है। इसलिए बैंक, मनी एक्सचेंज या ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के समय थोड़ी अलग कीमत देखने को मिल सकती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्यों बदलता रहता है डॉलर का रेट?</h4>
<p style="text-align:justify;">डॉलर और रुपये की कीमत कई वैश्विक और घरेलू कारणों से ऊपर-नीचे होती रहती है। इनमें शामिल हैं—</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका और भारत की आर्थिक स्थिति<br />कच्चे तेल की कीमतें<br />शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव<br />विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री<br />युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनाव<br />ब्याज दरों में बदलाव</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में मिडिल ईस्ट तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण रुपया कमजोर हुआ है, जिससे डॉलर महंगा हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">किन लोगों के लिए जरूरी है डॉलर का रेट जानना?<br />विदेश यात्रा करने वाले लोग<br />अगर आप अमेरिका या किसी दूसरे देश घूमने जा रहे हैं, तो डॉलर खरीदने से पहले एक्सचेंज रेट जरूर चेक करें।<br />विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्र<br />अमेरिका में पढ़ाई करने वाले छात्रों की फीस और खर्च डॉलर में होता है।<br />ऑनलाइन शॉपिंग और गेमिंग<br />कई इंटरनेशनल वेबसाइट्स और गेमिंग प्लेटफॉर्म डॉलर में पेमेंट लेते हैं।<br />बिजनेस और निवेश<br />इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट और शेयर बाजार से जुड़े लोग रोजाना डॉलर की चाल पर नजर रखते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">लाइव USD to INR रेट कहां देखें?</h4>
<p style="text-align:justify;">सही और लाइव एक्सचेंज रेट देखने के लिए आप इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर सकते हैं—<br />Xe Currency Converter<br />Wise Currency Converter<br />Google Currency Converter</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/2026-05/american-dollar-vs-indian-rupee.jpeg" alt="American Dollar Vs Indian Rupee" width="778" height="436"></img></p>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 17 May 2026 15:51:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sarvesh Kumar]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Violence: महिला जेल में हिंसा, 41 कैदियों की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[टेगुसिगलपा (एजेंसी)। Violence: अमेरिकी देश होंडुरास की एक महिला जेल में दंगा और आगजनी की घटना होने से कम से कम 41 कैदियों की मौत हो गई। लोक मंत्रालय के फोरेंसिक मेडिसिन निदेशालय ने पुष्टि की। मंत्रालय की प्रवक्ता यूरी मोरा ने संवाददताओं से कहा कि ‘मारा’ गैंग की वजह से यह हिंसा हुई है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/violence-in-womens-jail-41-inmates-died/article-49077"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/violence.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>टेगुसिगलपा (एजेंसी)। </strong>Violence: अमेरिकी देश होंडुरास की एक महिला जेल में दंगा और आगजनी की घटना होने से कम से कम 41 कैदियों की मौत हो गई। लोक मंत्रालय के फोरेंसिक मेडिसिन निदेशालय ने पुष्टि की। मंत्रालय की प्रवक्ता यूरी मोरा ने संवाददताओं से कहा कि ‘मारा’ गैंग की वजह से यह हिंसा हुई है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने पता लगाया है कि राजधानी शहर टेगुसिगलपा से लगभग 35 किमी दूर फ्रांसिस्को मोरजान में 25 महिलाओं की आग में झुलसकर मौत हो गयी और अन्य 16 को गोली लगने से मौत हो गयी है। उन्होंने कहा कि मृतकों की संख्या बढ़ सकती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या है मामला | Violence</h3>
<p style="text-align:justify;">कैदियों के रिश्तेदारों के एक प्रतिनिधि डेल्मा आॅडोर्नेज ने कहा कि अधिकारियों द्वारा जेल के लिए नए नियमों की घोषणा करने के बाद दंगा भड़क गया, जिसमें टीवी और अन्य उपकरणों पर प्रतिबंध लगाना और उन्हें जब्त करना शामिल था। स्थानीय मीडिया के अनुसार घायल कैदियों को टेगुसिगलपा के एक अस्पताल में स्थानांतरित किया गया है। राष्ट्रपति शाओमारा कास्त्रो ने कहा, मारा गैंग ने ही यह दंगा प्लान किया था। Violence</p>
<p style="text-align:justify;">इसकी जानकारी प्रशासन को भी थी। उप सुरक्षा मंत्री जुलिसा विलानुएवा ने दंगा शुरू होने पर ट्विटर के माध्यम से कहा, ‘हम इस जेल में बर्बरता की हरकतों और अनियमितताओं को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने आपातकाल घोषित किया और राष्ट्रीय पुलिस और सेना के साथ-साथ अग्निशामकों के ‘तत्काल हस्तक्षेप’ करने को कहा है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 21 Jun 2023 12:56:01 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिकी वीजा का इंतजार करने वालों के लिए खुशखबरी</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली/ वाशिंगटन (एजेंसी)। अमेरिका ने कहा है कि भारतीय वीजा (indian Visa) प्रक्रिया में तेजी लाना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और भारत (India) में उसकी कांसुलर टीमें वीजा प्रक्रिया तेजी से पूरा करने पर खासा जोर दे रही हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने इस मुद्दे पर एक सवाल के जवाब […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/america-announcement-on-giving-visa-to-indians/article-48056"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/passport.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली/ वाशिंगटन (एजेंसी)।</strong> अमेरिका ने कहा है कि भारतीय वीजा (indian Visa) प्रक्रिया में तेजी लाना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और भारत (India) में उसकी कांसुलर टीमें वीजा प्रक्रिया तेजी से पूरा करने पर खासा जोर दे रही हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने इस मुद्दे पर एक सवाल के जवाब में कहा, ‘फिर मैं विशेष रूप से अनुरोध के साथ कहूंगा-जैसा कि यह वीजा मुद्दे से संबंधित है।</p>
<p style="text-align:justify;">हम स्पष्ट रूप से मानते हैं कि यह चिंता का विषय है और हमारी कांसुलर टीमें (Consular Teams) प्रक्रिया में तेजी लाने पर खासा जोर दे रही हैं। उन्होंने कहा, ‘यह हमारी सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है और मुझे पता है कि यह देश में हमारे दूतावास के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। दरअसल वह इस सवाल का जवाब दे रहे थे कि भारत में वीजा प्रक्रिया में काफी देरी के मुद्दे पर क्या अमेरिका के नये राजदूत एरिक गारसेटी चुप्पी तोड़ेंगे।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
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                <pubDate>Thu, 25 May 2023 17:01:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आईएस के लिए लड़ने वाली अमेरिकी महिला को 20 साल की सजा</title>
                                    <description><![CDATA[वाशिंगटन (एजेंसी)। इस्लामिक स्टेट (आईएस) की महिला बटालियन का नेतृत्व करने वाली एक अमेहरकी महिला को 20 वर्ष कैद की सजा सुनाई गई है। यह जानकारी बीबीसी ने बुधवार को दी। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, कंसास निवासी 42 वर्षीय एलिसन फ्लूक-एकरेन ने स्वीकार किया कि उसने आठ वर्षों तक इराक, सीरिया और लीबिया में […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/american-woman-who-fought-for-is-sentenced-to-20-years/article-39526"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-11/court-hammer.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन (एजेंसी)</strong>। इस्लामिक स्टेट (आईएस) की महिला बटालियन का नेतृत्व करने वाली एक अमेहरकी महिला को 20 वर्ष कैद की सजा सुनाई गई है। यह जानकारी बीबीसी ने बुधवार को दी। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, कंसास निवासी 42 वर्षीय एलिसन फ्लूक-एकरेन ने स्वीकार किया कि उसने आठ वर्षों तक इराक, सीरिया और लीबिया में आतंकवादी कृत्यों को अंजाम दिया। उसने यह भी माना कि उसने 100 से ज्यादा महिलाओं और लड़कियों को आतंकी प्रशिक्षण दिया है जिसमें से कुछ 10 वर्ष की थीं। वह जून में अपनी कृत्यों के लिए अपराधी साबित हुई थी। सजा सुनाए जाने से पहले अभियोजन पक्ष ने कहा कि कानून द्वारा दी जाने वाली अधिकतम स्वीकार्य सजा भी उसे दंडित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। उनकी बचाव टीम ने उसके लिए कम सजा की मांग करते हुए तर्क दिया था कि वह युद्धग्रस्त सीरिया में प्राप्त अनुभवों के कारण सदमे में थीं।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>क्या है मामला</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">बीबीसी ने अदालत में जमा दस्तावेजों के हवाले से कहा कि पूर्व शिक्षक कंसास के ओवरब्रुक के छोटे समुदाय से ताल्लुक रखती है जो बाद में एक कट्टरपंथी आतंकवादी बन गई और आईएस की रैंकों में ऊपर तक पहुंची। यद्यपि, कई महिलाएं आईएस से संबद्घ रही हैं और इस समूह के लिए लड़ाई और अन्य कार्यों को अंजाम भी दिया है लेकिन फ्लूक-एकरेन एक अपवाद है जो पुरूष-प्रधान समूह में नेतृत्व वाले स्तर तक पहुंची। अमेरिकी न्याय विभाग और सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार, वह 2000 के दशक की शुरूआत में अपने दूसरे पति और लेबनान के आतंकी संगठन अंसार अल-शरिया और आईएस के सदस्य के साथ मध्य पूर्व चली गईं और कभी-कभार कंसास भी जाती थीं। 2012 के आसपास वह सीरिया पहुंची और आईएस की सक्रिय सदस्य बनी और जब उसका पति एक लड़ाई में मारा गया तब उसने कई आंतकियों से शादी की जिसमें एक बंग्लादेश का ड्रोन विशेषज्ञ भी था वह भी लड़ाई में मारा गया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, उसका प्राथमिक काम महिलाओं को आतंकी प्रशिक्षण देना था जिसमें एके-47, ग्रेनेड और आत्मघाती बेल्ट चलाना शामिल है। उस पर अमेरिका में संभावित आतंकी हमले के लिए लोगों की भर्ती करने का भी आरोप है।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 02 Nov 2022 14:18:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जापान तट पर ईंधन भरते वक्त दो अमेरिकी विमान दुर्घटनाग्रस्त</title>
                                    <description><![CDATA[विमानों में एक F-18 फाइटर और दूसरा C-130 टैंकर था वॉशिंगटन (एजेंसी) । अमेरिका के मरीन कॉर्पोरेशन के 2 एयरक्राफ्ट दुर्घटना का शिकार हो गए (Two American airplane crash) । यह हादसा तब हुआ, जब जापान तट के पास एयरक्राफ्ट में ईंधन भरा जा रहा था। एक अमेरिकी रक्षा अधिकारी ने बुधवार को बताया कि […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/two-american-airplane-crash/article-6841"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/airplane-crash.jpg" alt=""></a><br /><h2>विमानों में एक F-18 फाइटर और दूसरा C-130 टैंकर था</h2>
<p><strong>वॉशिंगटन (एजेंसी) ।</strong> अमेरिका के मरीन कॉर्पोरेशन के 2 एयरक्राफ्ट दुर्घटना का शिकार हो गए<strong> (Two American airplane crash)</strong> । यह हादसा तब हुआ, जब जापान तट के पास एयरक्राफ्ट में ईंधन भरा जा रहा था। एक अमेरिकी रक्षा अधिकारी ने बुधवार को बताया कि दुर्घटनाग्रस्त होने वाले विमानों में एक F-18 फाइटर और दूसरा C-130 टैंकर था। बता दें कि यूएस मरीन कॉर्पोरेशन अमेरिकी आर्म्ड फोर्सेज का एक ब्रांच है। अमेरिकी रक्षा अधिकारी के मुताबिक, दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद छह अमेरिकी मरीन लापता हैं।</p>
<h2>हादसे के बाद से सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन जारी</h2>
<p>मरीन कॉर्प ने हादसे की जानकारी देते हुए कहा कि विमानों ने दक्षिणी जापान के इवाकुनी स्थित मरीन कॉर्प एयर स्टेशन से उड़ान भरी थी। हादसे के बाद से सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। बयान में बताया गया है कि हादसा उस वक्त हुआ जब विमान नियमित तौर पर होने वाली ट्रेनिंग में हिस्सा ले रहे थे।</p>
<ul>
<li>स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक C-130 पर 5 क्रू मेंबर सवार थे</li>
<li>जबकि F-18 पर 2 क्रू मेंबर थे।</li>
<li>ओकिनावा स्थित फर्स्ट मरीन एयरक्राफ्ट विंग के प्रवक्ता सेकंड लेफ्टिनेंट एलिसा मोरेल्स ने मिलिट्री न्यूज साइट टास्क और परपज को बताया कि एक मरीन को जिंदा बचा लिया गया है।</li>
<li>हालांकि, इसकी तत्काल पुष्टि नहीं हो पाई है। बता दें कि जापान में यूएस मिलिटरी के करीब 50,000 जवान तैनात हैं।</li>
</ul>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/two-american-airplane-crash/article-6841</link>
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                <pubDate>Thu, 06 Dec 2018 09:45:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अफगानिस्तान में शांति प्रकिया शुरू करने के लिए तालिबान और अमेरिकी दूत के बीच बातचीत</title>
                                    <description><![CDATA[अफगानी शांति प्रकिया को फिर शुरू करना | Taliban-American दोहा (एजेंसी)। अफगनिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी को पूरी तरह समाप्त करने और शांति प्रकिया को फिर शुरू करने के लिए अफगानी तालिबान के एक प्रतिनिधि ने अमेरिकी राजदूत जालमे खालिजाद से तीन दिवसीय बातचीत की प्रकिया में हिस्सा लिया है (Taliban-American)। समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/interaction-between-taliban-american-envoy/article-6657"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/taliban.jpg" alt=""></a><br /><h2>अफगानी शांति प्रकिया को फिर शुरू करना | Taliban-American</h2>
<p><strong>दोहा (एजेंसी)।</strong> अफगनिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी को पूरी तरह समाप्त करने और शांति प्रकिया को फिर शुरू करने के लिए अफगानी तालिबान के एक प्रतिनिधि ने अमेरिकी राजदूत जालमे खालिजाद से तीन दिवसीय बातचीत की प्रकिया में हिस्सा लिया है <strong>(Taliban-American)</strong>। समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्टों में तालिबान से जुड़े सूत्रों के हवाले से बातचीत की पुष्टि की है। इसका मकसद अफगानी शांति प्रकिया को फिर शुरू करना और अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों के सबसे लंबे युद्ध को समाप्त करना है।</p>
<p>सूत्रों ने बताया कि इस बातचीत में तालिबान की तरफ से हेरात के पूर्व तालिबानी गवर्नर और पूर्व तालिबानी सैन्य प्रमुुख मोहम्मद फजल ने हिस्सा लिया है। ये दोनों गुआनतानामो खाड़ी में अमेरिकी जेल में एक साथ बंद थे। तालिबान का अफगानिस्तान के लगभग आधे हिस्सा पर कब्जा है और वह सरकारी अधिकारियों तथा स्थानीय सुरक्षा बलों को निशाना बनाकर रोजाना हमले की घटनाओं को अंजाम देता है।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/international/interaction-between-taliban-american-envoy/article-6657</link>
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                <pubDate>Sun, 18 Nov 2018 18:25:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पत्रकार खाशोज्जी की हत्या पर अमेरिकी दहाड़</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका की दो छवियां हैं जो पूरी दुनिया को दुखी भी करती है, प्रताड़ित भी करती हैं, लूटती भी हैं और प्रसन्न भी करती हंै, अमानवीय नीतियों से बचाती हैं, लोकतंत्र की रक्षा करती हैं, अभिव्यक्ति की रक्षा करती हैं, आंदोलनों और अभियानों को गति भी देती हैं। एक छवि उनकी चौधराहट की है, दुनिया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/american-roar-on-the-murder-of-journalist-khashoggi/article-6400"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/murder1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका की दो छवियां हैं जो पूरी दुनिया को दुखी भी करती है, प्रताड़ित भी करती हैं, लूटती भी हैं और प्रसन्न भी करती हंै, अमानवीय नीतियों से बचाती हैं, लोकतंत्र की रक्षा करती हैं, अभिव्यक्ति की रक्षा करती हैं, आंदोलनों और अभियानों को गति भी देती हैं। एक छवि उनकी चौधराहट की है, दुनिया का स्वयंभू चौधरी भी है, दुनिया के संसाधनों पर उसकी बुरी नजर रहती है पर दूसरी छवि में वह पालनहार भी है, शांति और सहायता का नायक भी है और लोकतांत्रिक दुनिया का संरक्षणकर्ता भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">पर पहली छवि की ही चर्चा होती है और खलनायक की संज्ञा दे दी जाती है। खलनायक की संज्ञा दी ही जानी चाहिए। पर हमें यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए जहां पर पूरी दुनिया चुप बैठ जाती है, कानों को बंद कर लेती है वहां पर आवाज लगाने के लिए अमेरिका ही खड़ा होता है, दुनिया में जहां भी मानवता को शर्मसार करने वाली घटनाएं घटती हैं, मानवता को लहूलुहान किया जाता है, लोकतंत्र को कुचला जाता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर तुषराघात होता है वहां पर अमेरिका ही खड़ा होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अभी-अभी जमाल खाशोज्जी की हत्या का प्रश्न देख लीजिये। जमाल खाशोज्जी की हत्या पर जहां पूरा विश्व चुप है, जहां पर पूरे विश्व के लिए जमाल खाशोज्जी की हत्या कोई चिंता की बात नहीं है, जहां पर पूरे विश्व के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न बेअर्थ है वहां पर सिर्फ और सिर्फ अमेरिका ही अकेला ऐसा देश है जो खड़ा है और यह कहने से भी नहीं चूकता है कि जमाल खाशोज्जी की हत्या के दुष्परिणाम झेलने पड़ेगे, हत्यारों को बेनकाब किया जायेगा, हत्यारों को सबक सिखाया जायेगा। जमाल खाशोज्जी की हत्या को लेकर अमेरिका की उठी नाराजगी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दहाड़ ने न केवल हत्यारे सउदी अरब के राजशाही सरगना क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की हडिडयों को कंपकपाने के लिए बाध्य किया है बल्कि तुर्की को भी चिंता में डाला है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुखद परिणाम निकला। सुखद परिणाम क्या है? सुखद परिणाम यह है कि सउदी अरब की राजशाही को हत्या की संलिपत्ता स्वीकार करनी पड़ी और अपनी गुप्तचर सेवा के प्रमुख सहित अन्य अधिकारियों को पद से बर्खास्त तक करने की मजबूरी उठानी पड़ी है। फिर भी अमेरिका की कार्यवाहियां काल बनेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अब यहां एक नहीं बल्कि कई प्रश्न उठते हैं। जिसके जवाब की जरूरत है। पहला प्रश्न यह है कि पत्रकार खाशोज्जी थे कौन और पत्रकार खाशोज्जी किस लिए विख्यात थे, क्या खाशोज्जी सही में लोकतंत्र के नायक थे, क्या पत्रकार खाशोज्जी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतीक थे? दूसरा प्रश्न यह है कि सउदी अरब ने पत्रकार खाशोज्जी की हत्या क्यों करायी, सउदी अरब क्या सिर्फ एक पत्रकार की लेखनी को अपने लिए खतरनाक और अस्तित्व सक्रियता के लिए हानिकारक समझ बैठा था, क्या सउदी अरब में लोकतंत्र बहाली आंदोलन जोर पकड़ेगा, क्या सउदी अरब में राजशाही के खिलाफ बंवडर उठेगा?</p>
<p style="text-align:justify;">तीसरा प्रमुख प्रश्न यह है कि सउदी अरब और अमेरिका के सबंध किस हद तक बिगड़ेंगे, अमेरिका की सहायता के बिना सउदी अरब मजबूती के साथ खड़ा रह सकता है क्या, अरब में सउदी अरब की शक्ति कितनी घटेगी? चौथा प्रश्न यह है कि चीन-रूस जैसे देश जो अपने आप को दुनिया की चौघंराहट कायम करने के लिए तत्पर रहते है, उनके लिए पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या कोई चिंता की बात क्यों नहीं होती है?</p>
<p style="text-align:justify;">अब इस प्रश्न पर आते हैं कि जमाल खाशोज्जी कौन थे और उनकी सक्रियता क्या थी? जमाल खाशोज्जी सिर्फ पत्रकार ही नहीं थे, वे सिर्फ वाशिगटन पोस्ट से ही नहीं जुडेÞ हुए थे। सच तो यह था कि जमाल खाशोज्जी की दुनिया में एक पहचान थी, खासकार उनकी पहचान बहुत बड़ी थी, उनकी पहचान कोई सउदी अरब तक नहीं छिपी हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी पहचान अरब जगत में विख्यात थी, सउदी अरब छोडने के बाद जमाल खाशोज्जी की पहचान पूरी अमेरिका में फैली हुई थी, यूरोप की पत्रकारिता भी खाशोज्जी की पहचान के साथ सक्रिय थी। कहने का अर्थ यह है कि जमाल खाशोज्जी की पहचान और जमाल खाशोज्जी की पत्रकारिता सउदी अरब, अरब जगत, अमेरिका और यूरोप तक विख्यात थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अरब जगत की पत्रकारिता पूरी तरह से मुस्लिम तानाशाही के किले में बंद रहती है, मुस्लिम तानाशाही का गुणगान ही पत्रकारिता का अंतिम निष्कर्ष होता है, मुस्लिम तानाशाही के खिलाफ जाने का अर्थ है सर्वनाश को आमंत्रण देना, सीने में तानाशाही का खंजर भोकवाना, तानाशाही और अंधेरगर्दी की जेलों में सड़ना तथा मजहबी कोड़े खाना। हजारों-हजार अभिव्यक्ति के सेनानी मुस्लिम तानाशाही और कम्युनिस्ट तानाशाही की जेलों में सड़ने के लिए बाध्य हैं जिनके अंदर निरंतन लोकतंत्र की ज्योति जलती रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय यह है कि अधिकतर अरब देशों में मुस्लिम तानाशाही ही पसरी हुई है। जमाल खाशोज्जी का परिवार भी विख्यात रहा है। जमाल खाशोज्जी दुनिया के कुख्यात हथियार विक्रेता अदनान खशोज्जी के भतीजे थे। एक समय पूरी दुनिया में अदनान खशोज्जी का डंका बजता था और हथियार बनाने वाले यूरापीय देश और अमेरिका अदनान खशोज्जी की उंगलियों पर नाचते थे। अदनान खाशोज्जी हथियारों की बिक्री और कमीशन में माहिर थे। दुनियां में रसूख रखने वाले परिवार का कोई विख्यात आदमी की जब हत्या होगी तो वह हत्या भी कैसे नहीं चर्चित होगी?</p>
<p style="text-align:justify;">जमाल खाशोज्जी की हत्या तो ऐसे तुर्की में हुई है जहां पर वे सउदी अरब के वाणिज्य दूतावासा में नागरिकता से संबंधित कागजात हासिल करने गये थे। तुर्की स्थित सउदी अरब के वाणिज्य दूतावास के अंदर ही जमाल खाशोज्जी की हत्या होती है, हत्या के बाद उसके शव को तहस-नहस कर विलुप्त कर दिया गया। जब जमाल खाशोज्जी के लापता होने के बाद जांच हुई तब पता चला कि सउदी अरब ने एक साजिशपूर्ण ढंग से जमाल खाशोज्जी की हत्या करायी है। तुर्की की पुलिस पहले दिन से ही यह कह रही थी कि हत्या सउदी अरब दूतावास के अंदर ही हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले सउदी अरब हत्या में अपनी सलिंप्तता से इनकार करता रहा था और तुर्की की पुलिस के आरोपों का खंडन करता रहा था। सउदी अरब ने जमाल खाशोज्जी की हत्या क्यों करायी? मुस्लिम तानाशाही सबसे ज्यादा घृणा और हिंसा अभिव्यक्ति की आजादी पर करती है। अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए किसी भी प्रकार की हिंसा को चुनने के लिए तैयार होती है, हिंसक और घृणात्मक कार्रवाई करने से भी नहीं हिचकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुस्लिम तानाशाही हो या फिर कम्युनिस्ट तानाशाही, इसके अंदर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात सोची भी नहीं जा सकती है। सउदी अरब से लेकर चीन तक इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं और यह जाने जा सकते है कि तानाशाही की घेराबंदी में मानवता और अभिव्यक्ति की आजादी किस प्रकार से बंधित है, प्रताड़ित है, हिंसक रूप से शिकार है।</p>
<p style="text-align:justify;">जमाल खाशोज्जी सउदी अरब के लोकतांत्रिक करण के पक्षधर थे। सउदी अरब के राजशाही शासक क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीतियों के भी वे आलोचक रहे थे। मोहम्मद बिन सलमान ने सउदी अरब के अंदर में कई ऐसे हथकंडे अपनाये हैं जिसके दुष्परिणाम गंभीर हुए हैं। जमाल खाशोज्जी को पहले ही खतरे का अंदेशा था। इसीलिए वे सउदी अरब को छोड़ कर अमेरिका चले गये थे।</p>
<p style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प ने यह नहीं देखा कि सउदी अरब में उसका हिता प्रभावित होगा। फिर भी उसने आवाज उठायी और सउदी अरब को झुकने के लिए बाध्य किया है। अभी भी डोनार्ल्ड ट्रम्प संतुष्ट नहीं है। ट्रम्प ने सउदी अरब पर प्रतिबंध लगाने की बात तक कह डाली है। साल भर पूर्व ही सउदी अरब ने अमेरिका से 110 बिलियन डालर्स का हथियार सौदा किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">सउदी अरब ने अप्रत्यक्ष तौर पर धमकी दी है कि अगर अमेरिका ने कार्यवाही की और प्रतिबंध लगाये तो फिर वह चीन और रूस के साथ सुरक्षा समझौता करेगा और चीन-रूस से हथियार खरीदेगा। इसके साथ ही साथ तेल का उत्पादन घटा देगा जिससे तेल के बाजार में आग लग जायेगी। सउदी अरब के रास्ते आसान नहीं हैं। सउदी अरब यमन और सीरिया में उलझा हुआ है, सउदी अरब को अपनी सुरक्षा और अस्तित्व के लिए अमेरिकी सहायता और संरक्षण की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">सऊदी अरब को ऐसी हत्याओं की नीति पर नही चलनी चाहिए। एक-दो कलम के सिपाहियों की हत्या से कोई विचार दफन नहीं हो जाता है। जमाल खाशोगी के हत्यारों को सजा तो मिलनी ही चाहिए और ऐसी हत्याओं पर रोक लगनी चाहिए। जमाल खाशोज्जी की हत्या के खिलाफ अमेरिकी दहाड से अन्य मुस्लिम तानाशाही वाले देशों को भी सबक मिलेगा और इस तरह की हत्या पर डर भी कायम होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">विष्णुगुप्त</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो।</p>
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                <pubDate>Tue, 23 Oct 2018 10:24:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>ईरान पर प्रतिबंध अमेरिकी दंभ का परिणाम तो नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाए जाने की अमेरीकी घोषणा के बाद तेल के वैश्विक बाजार में हलचल शुरू हो गई है। ईरान को पटरी पर लाने के लिए अमेरिका एक साथ दो मोर्चो पर काम कर रहा है। एक ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ओपेक (तेल उत्पादक देशों का संघ) देशों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-ban-on-iran-is-not-the-result-of-american-concealment/article-6014"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/the-ban-on-iran-is-not-the-result-of-american-concealment.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाए जाने की अमेरीकी घोषणा के बाद तेल के वैश्विक बाजार में हलचल शुरू हो गई है। ईरान को पटरी पर लाने के लिए अमेरिका एक साथ दो मोर्चो पर काम कर रहा है। एक ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ओपेक (तेल उत्पादक देशों का संघ) देशों पर तेल के उत्पादन को बढाने का दबाव बना रहे हैं, वही दूसरी तरफ वह दुनिया के देशों को ईरान से तेल नहीं खरीदने के लिए बाध्य कर रहे है। अब तक जो परिणाम सामने आए हैं, उसमें ट्रंप दोनोें ही मोर्चों पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हंै। ईरान का तेल उत्पादन जुलाई 2016 के बाद अब तक के सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका ने विश्व समुदाय को 4 नवंबर तक की डेडलाईन दे रखी है। उसका कहना है कि 4 नवंबर से सभी देश ईरान से होने वाले तेल के आयात को रोक दे, नहीं तो उन्हें भी अमेरीकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। दूसरी ओर ईरान ने जवाबी कार्रवाई में यूरोपियन यूनियन (ईयू) के सदस्यों को धमकी दी है कि परमाणु समझौते से अमेरिका के अलग होने के बाद अगर यूरोपीय संघ अपने दायित्वों का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो वह यूरेनियम संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने में गुरेज नहीं करेगा। यद्वपि ईरान ने समझौते से अलग होने की संभावना से इंनकार किया है। लेकिन, साथ ही उसने यूरोपीय सहयोगियों को आगाह किया है कि अगर वह समझौते में ईरान के हितों की सुरक्षा करने में विफल रहते हैं तो फिर ईरान कोई कदम उठा सकता है। इतना ही नहीं उसने ओपेक देशों पर भी आरोप लगाया है कि इसके कुछ सदस्यों ने पूरे संगठन को अमेरिका की कठपूतली बना दिया है। उसका इशारा सऊदी अरब और यूएई की ओर था। जून माह में जब ओपेक ने तेल उत्पादन को बढ़ाने पर सहमति दी थी तो ईरान ने ओपेक के इस कदम का विरोध किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान और छह देशों रूस, ब्रिटेन,चीन, फ्रांस, अमेरिका और जर्मनी ने 2015 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता किया था। इस समझौते के बाद आर्थिक प्रतिबंधों को कम करने के बदले तेहरान अपनी न्यूक्लियर क्षमता को सीमित करने के लिए तैयार हो गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते को मौजूदा दशक की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जाता है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने इस साल मई में घोषणा की कि अमेरिका ईरान परमाणु समझौते से अपने को अलग कर रहा है। ट्रंप का मानना है कि यह समझौता ईरान के न्यूक्लियर बम को रोकने में नाकाम साबित हुआ है। वह यह भी कहते हैं कि इस समझौते के बाद भी ईरान गैर परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल का निर्माण कर रहा है। साथ ही वह सीरिया, यमन और इराक में शिया लड़ाकों और हिजबुल्ला जैसे संगठनों को हथियार सप्लाई कर रहा है। जिसके चलते फिर से प्रतिबंध लागू किये गये है। इन प्रतिबंधों में ईरान के साथ व्यापारिक गतिविधियों को जारी रखने वाले देशों पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान किया गया है। अमेरिका ने दो टूक शब्दों में कहा है कि ईरान से तेल आयात करने वाले देशों को ईरान या अमेरिका में से किसी एक को चुनना होगा। हालांकी इसके लिए उसने अन्य देशों को थोडा वक्त और मौका जरूर दिया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि ट्रंप के ईरान पर लगाए गए आरोपों का आधार क्या है। वह किस आधार पर कह रहे है कि ईरान न्यूक्लियर बम न बनाने की अपनी शर्त पर नाकाम रहा है। क्या अमेरिका के पास इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण है? अगर है, तो क्या उन प्रमाणों को अपने सहयोगी देशों के साथ साझा नहीं किया जाना चाहिए था। अकेले अमेरिका के अलावा क्या किसी अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इस बात का खुलासा किया है कि ईरान न्यूक्लियर टैस्ट की तैयारी कर रहा है। कंही ऐसा तो नहीं कि परमाणु समझौते की आड़ में ट्रंप अपने किन्ही छिपे हुए हितों को साध रहे हो।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) का कहना था कि ईरान एक गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम शरू करने की तैयारी कर रहा है, जिसका लक्ष्य मिसाइलों के लिए परमाणु हथियार बनाकर उनका परीक्षण करना है। अमेरिका इसी अवसर की तलाश में था। इसके बाद अमेरिका की अगुवाई में अतरराष्ट्रीय समुदाय ने ईरान पर कडे़ आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा उठी। इसके बाद पी5प्लस वन कही जाने वाली छह शक्तियों (अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, रूस और चीन ) के साथ उसकी बातचीत का लंबा दौर शुरू हुआ जिसका अंत जुलाई 2015 में वियना समझौते (ईरान परमाणु समझौते )के साथ हुआ। समझौते के तहत ईरान अपने करीब नौ टन सवंर्धित यूरेनियम भंडार को कम करके 300 किलोगा्रम तक करने के लिए राजी हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">समझौते की एक अन्य शर्त यह भी थी कि आईएईए को समय-समय पर इस बात की जांच करने की स्वतंत्रता होगी कि ईरान संधि के प्रावधानों का पालन कर रहा है या नहीं। इन शर्तों के बदले में पश्चिमी देश ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने पर सहमत हो गए। यहां एक ओर अहम सवाल यह भी उठता है कि क्या आईएईए ने ईरान में बीते तीन वर्षों में समझौते की शर्तों को लेकर किसी तरह का शक जाहीर किया है। या उसने किसी भी तरह से ईरान द्वारा समझौते की शर्तों का उल्लंघल किया जाना पाया है। अगर ऐसा नहीं है तो निश्चिय ही ट्रंप अपनी व्यक्तिगत खुंदस निकालने के लिए समझौते को तौड़ रहे हंै।<br />
ट्रंप ईरान समझौता तोड़ने के पीछे की दूसरी वजह इसका बेहद उदार होना बताते हैं। ट्रंप का कहना है कि ईरान की इन हरकतों को रोकने के लिए इस समझौते को रद्द कर इसे और कठोर बनाया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">
सच तो यह है कि समझौते से पीछे हटने की असल वजह अमेरिका की आंतरिक राजनीति भी है। साल 2015 में रूस, ईरान और हिजबुल्लाह के गठजोड़ के चलते उसे सीरिया में हार का सामना करना पड़ा था। अमेरिका और इसरायल अपनी लाख कोशिश के बावजूद सीरिया में बशर-अल -असद को हटा नहीं पाए। बहुत से यूरोपिय देश तो अमेरिका पर खुला आरोप लगा रहे हैं कि सीरिया की पराजय का बदला लेने और ईरान को सबक सिखाने के लिए उसने परमाणु समझौता तोड़ा है। द्वितीय, यह समझौता ट्रंप के लिए व्यक्तिगत तौर पर भी खासा महत्व रखता है। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी उन्होंने इस मुददे को जमकर भुनाया था। ट्रंप ने प्रचार के दौरान वादा किया था कि ईरान को उसकी हरकत के लिए सजा देगे और परमाणु समझौता रद्द कर उस पर और कडे़ प्रतिबंध लगायेंगे। समझौता तोड़ने की घोषणा के दौरान उन्होंने कहा था कि मैं जो कहता हूं, वह करता हूं। तृतीय, प्रतिबंधों के जरिये उŸार कोरिया को काबू में करने वाले ट्रंप संभवत ईरान में भी इसी फामुर्ले का प्रयोग कर रहे हो।</p>
<p style="text-align:justify;">
हाल फिलहाल भारत असंमजस कि स्थिति में है। अमेरीकी दबाव के चलते अगर वह ईरान से तेल का आयात बंद करता है, तो संभव है ईरान में चल रही चाबहार सहीत अन्य परियोजनाएं प्रभावित होगी। दूसरी ओर अगर वह यूरोपीय संघ, रूस तथा चीन जैसे देशों का अनुसरण करते हुए ईरान से तेल व्यापार जारी रखता है तो न केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख बढ़ेगी बल्कि उसके स्वंत्रत विदेश नीति के सिद्वांत की कल्पना भी दुनिया तक पहुंच सकेगी। संभवत भारत दूसरे मार्ग का ही अनुसरण करे। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज का वक्तव्य भारत के इसी दृष्टिकोण को प्रकट करता है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लगाए गये प्रतिबंधों को तो स्वीकार करने के लिए तैयार है, किन्तु वह किसी एक विशेष देश के फैसले को मानने के लिए प्रतिबद्व नहीं है। ऐसे मे देखना यह है कि भारत टू प्लस टू संवाद की पृष्ठभूमि के बीच वह ईरान से अपने संबंधों को कैसे साधकर चलता है। <strong>डॉ. एन.के. सोमानी</strong></p>
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                <pubDate>Fri, 21 Sep 2018 12:58:25 +0530</pubDate>
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                <title>विश्वकप में टीम नहीं, लेकिन अमेरिकी फैन्स सबसे ज्यादा</title>
                                    <description><![CDATA[बर्लिन (एजेंसी)। अमेरिका की फुटबाल टीम भले ही फीफा विश्वकप-2018 के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाई हो लेकिन वीरवार से रुस में शुरु होने जा रहे टूर्नामेंट में अमेरिका के फुटबाल प्रशंसकों की भारी संख्या स्टेडियमों में अन्य टीमों की हौंसला अफज़ाई करते हुए जरुरी दिखेगी। यह भी दिलचस्प है कि अमेरिका और रुस दो चिर प्रतिद्वंद्वी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/sports/not-a-team-in-the-world-cup-but-most-of-the-american-fans/article-4122"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/usa.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बर्लिन (एजेंसी)। </strong>अमेरिका की फुटबाल टीम भले ही फीफा विश्वकप-2018 के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाई हो लेकिन वीरवार से रुस में शुरु होने जा रहे टूर्नामेंट में अमेरिका के फुटबाल प्रशंसकों की भारी संख्या स्टेडियमों में अन्य टीमों की हौंसला अफज़ाई करते हुए जरुरी दिखेगी। यह भी दिलचस्प है कि अमेरिका और रुस दो चिर प्रतिद्वंद्वी विकसित देश हैं लेकिन रुस में हो रहे विश्वकप के लिए अमेरिका से जाने वाले फुटबाल प्रेमियों की संख्या अन्य देशों से कहीं अधिक है, यह स्थिति तब है जब अमेरिका की राष्ट्रीय फुटबाल टीम इस बार टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई ही नहीं कर सकी है। टिकटों की बुकिंग डाटा के अनुसार विश्वकप के दौरान अमेरिका से रुस जाने के लिए 66 फीसदी लोगों ने टिकट बुक कराई है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि अमेरिका की तरह ही क्वालीफाई नहीं कर सके इटली के प्रशंसकों की रुस के लिए बुकिंग में 16 फीसदी की कमी आई है। यह इतिहास में पहला मौका है जब इटली विश्वकप के लिए क्वालीफाई नहीं कर सका है। यात्रा तकनीक से जुड़ी कंपनी ट्रैवलपोर्ट ने बताया कि 14 जून से 15 जुलाई तक होने वाले विश्वकप के लिए अमेरिका से रुस की ओवरआॅल फ्लाइट बुकिंग कुल एक लाख 36 हजार 503 बढ़ गई है। विशलेषकों के अनुसार रुस में इस बार टूर्नामेंट के दौरान जाने वाले प्रशंसकों में अमेरिकी नागरिकों का प्रतिशत सबसे अधिक रह सकता है क्योंकि अमेरिका में लातिन अमेरिकी लोगों की बड़ी जनसंख्या रहती है। अमेरिका के वर्ष 1994 में विश्वकप की मेजबानी करने के बाद से देश में फुटबाल को लेकर रुचि काफी बढ़ी है।</p>
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                <pubDate>Tue, 12 Jun 2018 17:00:00 +0530</pubDate>
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                <title>सिंगापुर में अमेरिकी की नागरिकता रद्द</title>
                                    <description><![CDATA[सिंगापुर (एजेंसी)। सिंगापुर ने कहा है कि देश की खुफिया जानकारी को दूसरे देशों के साथ साझा करने के आरोप में एक मशहूर विश्वविद्यालय के एक अमेरिकी प्रोफेसर की स्थाई नागरिकता रद्द कर दी गई है। सिंगापुर के गृह मंत्रालय ने कहा कि ली कुआन येऊ स्कूल आॅफ पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर हुआंग जिंग की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/american-professor-citizenship-canceled-in-singapore/article-2918"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/singapore.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सिंगापुर (एजेंसी)।</strong> सिंगापुर ने कहा है कि देश की खुफिया जानकारी को दूसरे देशों के साथ साझा करने के आरोप में एक मशहूर विश्वविद्यालय के एक अमेरिकी प्रोफेसर की स्थाई नागरिकता रद्द कर दी गई है। सिंगापुर के गृह मंत्रालय ने कहा कि ली कुआन येऊ स्कूल आॅफ पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर हुआंग जिंग की पहचान विदेश के लिए खुफिया एजेंट के तौर पर काम करने वाले के रूप में की गई है। इसके पीछे सिंगापुर की विदेश नीति को परिवर्तित करने की मंशा थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अमेरिकी दूतावास प्रवक्ता की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">आदेश के अनुसार हुआंग जिंग तथा उनकी पत्नी शिरले यांग ज्यूपिंग द्वारा देश छोड़ने के बाद दोबारा सिंगापुर प्रवेश करने की अनुमति नहीं होगी। इस मामले में अमेरिकी दंपति की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं उपलब्ध नहीं हो पाई है। सिंगापुर में अमेरिकी दूतावास प्रवक्ता की ओर से भी इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि श्री हुआंग के मामले में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि वह इसे प्रासंगिक नहीं समझते। सिंगापुर के गृह मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि हुआंग तथा उनकी पत्नी नागरिकता रद्द होने के खिलाफ अपील कर सकते हैं लेकिन अपील नामंजूर होने पर निर्धारित समय सीमा के अंदर देश छोड़ना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Aug 2017 07:42:07 +0530</pubDate>
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