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                <title>law - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Sedition Law: गृह मंत्री ने किया काले कानून का खात्मा</title>
                                    <description><![CDATA[Sedition Law: लोकसभा में भारतीय न्याय संहिता 2023 को पेश किया गया, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राजद्रोह अधिनियम की धारा 124-ए को समाप्त करने का ऐलान किया। यह वास्तव में एक एतिहासिक निर्णय है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल राजद्रोह कानून की धारा 124-ए पर रोक लगा दी थी और सरकार से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/home-minister-abolished-the-black-law/article-51116"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/amit-shah1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Sedition Law: लोकसभा में भारतीय न्याय संहिता 2023 को पेश किया गया, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राजद्रोह अधिनियम की धारा 124-ए को समाप्त करने का ऐलान किया। यह वास्तव में एक एतिहासिक निर्णय है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल राजद्रोह कानून की धारा 124-ए पर रोक लगा दी थी और सरकार से इस कानून को खत्म करने के लिए कहा था। यह अच्छी बात है कि सरकार ने जनभावना का सम्मान करते हुए इस काले कानून को खत्म कर दिया है। दरअसल, कोई भी कानून जनभावनाओं से ऊपर नहीं हो सकता। यह भी सच है कि निरंकुश ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को लूटने के लिए देश की जनता पर राजद्रोह का कानून थोपा था। Section 124A</p>
<p style="text-align:justify;">कानून की आड़ में देशभक्तों को देश का गद्दार की भांति पेश किया गया। लाखों भारतीय अंग्रेजों के इस काले कानून का शिकार हुए। वास्तव में किसी भी प्रकार की देश विरोधी गतिविधि को अंजाम देना, जिससे देश की एकता व अखंडता को खतरना हो यही देशद्रोह होता है, परंतु देश में लोकतंत्र व मानवीय विचारधारा की बदौलत ही ऐसे हालात बहुत कम पैदा हुए हैं जिससे देश को कोई खतरा हो। आजादी की पौनी सदी के बाद भी देश मजबूत है और मजबूत हो रहा है। हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। Sedition Law</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संविधान का मान-सम्मान बढ़ा है। इन परिस्थितियों में देश को किसी किसी भी तरह के खतरे की बात कोरी कल्पना है। राजद्रोह कानून के मुताबिक सरकार के खिलाफ बोलना, उंगली उठाना या लिखना भी राजद्रोह है। यह अवधारणा पूर्णतया गलत है। वास्तव में सरकार और देश अलग-अलग हैं। सरकार के किसी भी फैसले का विरोध देश का विरोध नहीं हो सकता। संविधान कुछ शर्तों के तहत लिखने, बोलने, विरोध करने और जुलूस निकालने की आजादी देता है। इसी तरह के व्यवहार को राष्ट्रविरोधी मानना ​​गलत है, लेकिन यह सरकार और संविधान की महानता है जो अपने नागरिकों को आजादी देता है। Amit Shah</p>
<p style="text-align:justify;">यदि बोलना और लिखना देश के खिलाफ होता तो सूचना का अधिकार एक्ट जैसा कानून बनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। केंद्र सरकार और संसद का राजद्रोह कानून को खत्म करना एक स्वागत योग्य निर्णय है और इस कदम से देश की एकता और अखंडता मजबूत होगी। देश विरोधी ताकतों और आतंकवाद विरोधी सख्त कानून पहले से ही मौजूद हैं, जो देश की एकता और अखंडता को बरकरार बनाए हुए हैं। Sedition Law</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Tiranga Hoisting: घर पर तिरंगा फहराने से पहले रखें इन बातों का ध्यान, जानें राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े नियम" href="http://10.0.0.122:1245/tricolour-hoisting-rules/">Tiranga Hoisting: घर पर तिरंगा फहराने से पहले रखें इन बातों का ध्यान, जानें राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े न…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 12 Aug 2023 15:48:08 +0530</pubDate>
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                <title>कानूनों की प्रासंगिता खत्म तो नहीं हो प्रयोग</title>
                                    <description><![CDATA[आखिर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए 152 सालों से अंग्रेजों के समय से चले आ रहे राजद्रोह कानून पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कह दिया कि जब तक केंद्र सरकार इस कानून पर पुनर्विचार कर रही है, तब तक इसके तहत कोई नया मामला दर्ज करना ठीक नहीं होगा। राजद्रोह के जो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/if-the-relevance-of-laws-is-not-lost-then-use/article-33361"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/supreme-court-of-india-22.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आखिर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए 152 सालों से अंग्रेजों के समय से चले आ रहे राजद्रोह कानून पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कह दिया कि जब तक केंद्र सरकार इस कानून पर पुनर्विचार कर रही है, तब तक इसके तहत कोई नया मामला दर्ज करना ठीक नहीं होगा। राजद्रोह के जो मामले लंबित हैं, वे भी पुनर्विचार प्रक्रिया पूरी होने तक के लिए स्थगित कर दिए गए हैं। नि:संदेह इस कानून का दुरुपयोग होता रहा है। वास्तव में अंग्रेज हमारे लिए अपरिचित थे और जबरन शासन करने के लिए हर प्रकार की सख्ती को उचित मानते रहे। अंग्रेजों की मानसिकता और उद्देश्य भारतीयों को अपना गुलाम बनाकर रखना था। अंग्रेज सरकार ने भारतीयों के विरोध को विद्रोह करार देकर अमानवीय अत्याचार किए लेकिन हमारे देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था है और सरकार है। संविधान विरोध करने की अनुमति भी देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में अंग्रेजों ने हमें केवल देशद्रोह के खिलाफ ही कानून नहीं दिया बल्कि 1935 एक्ट भी हमारे संविधान पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। भले ही किसी कानून को मूल में अपनाया जाए या संशोधित कर, लेकिन बदलती परिस्थितियों के अनुसार उसमें बदलाव आवश्यक है। नि:संदेह आज भी देश विरोधी ताकतें देश को कमजोर करने के लिए बम धमाके, दंगों और अन्य तौर-तरीकों से देश को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं जिनके खिलाफ सख्त निर्णय लेने की आवश्यकता है लेकिन हमारे देश में बड़ी समस्या कानूनों के हो रहे दुरुपयोग की है। जब किसी कानून का प्रयोग विरोधियों को ठिकाने या राजनीतिक हित साधने के लिए किया जा रहा हो तब कानून देश की सुरक्षा करने की बजाय निर्दोष लोगों का उत्पीड़न करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही आज भी देशद्रोह के मामलों में फंसे सभी लोग निर्दोष नहीं, लेकिन यह भी वास्तविक्ता है सैकड़ों निर्दोष लोग भी फंसे हुए हैं जिन्होंने कभी लाठी तक नहीं उठाई व न ही मारी एवं हमेशा समाज व देश की भलाई में योगदान दिया है। भले ही देश आतंकवाद की समस्या का सामना कर रहा है लेकिन देशद्रोह जैसे कानून की सही तरीके से पालना अपने आप में बड़ी चुनौती है। यूं भी फांसी की सजा आज भी हमारे देश में बरकरार है और सख्त कानूनों को सिरे से नकारा नहीं जा सकता लेकिन सख्त कानूनों के पालन के लिए कोई व्यवस्था या माहौल न होने के चलते ऐसे कानूनों की आलोचना होना स्वाभाविक है। अब केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती यह है कि देश की परिस्थितियों व सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर नया रास्ता निकाला जा सकता है। विरोध और विद्रोह की बारीकी से पहचान करनी होगी।</p>
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                <pubDate>Sat, 14 May 2022 09:56:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>अमेरिका में भीड़ हत्या अपराध पर बना कानून</title>
                                    <description><![CDATA[वॉशिंगटन (एजेंसी)। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के भीड़ हत्या कानून पर हस्ताक्षर किए के साथ ही अब यह अमेरिका में घृणा अपराध बन गया है। बाइडेन ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि मैंने अभी-अभी एम्मेट टिल एंटी-लिंचिंग एक्ट कानून पर हस्ताक्षर किए हैं, जो कि देश में भीड़ हत्या को एक घृणा अपराध बनाता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/law-on-homicide-crime-in-america/article-31909"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/joe-biden2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वॉशिंगटन (एजेंसी)।</strong> अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के भीड़ हत्या कानून पर हस्ताक्षर किए के साथ ही अब यह अमेरिका में घृणा अपराध बन गया है। बाइडेन ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि मैंने अभी-अभी एम्मेट टिल एंटी-लिंचिंग एक्ट कानून पर हस्ताक्षर किए हैं, जो कि देश में भीड़ हत्या को एक घृणा अपराध बनाता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका में नस्लीय नफरत कोई पुरानी समस्या नहीं है, लेकिन यह समस्या लगातार बनी हुई है। उल्लेखनीय है कि मीडिया रिपोर्ट के आधार पर अमेरिका में 1882 से 1968 तक 4,743 अल्पसंख्यक अफ्रीकी अमेरिकी लोगों की भीड़ द्वारा हत्या की गई। विधेयक का नाम 14 वर्षीय अफ्रीकी अमेरिकी एम्मेट टिल के नाम पर रखा गया है जिसकी 1955 में मिसिसिपी प्रांत में एक श्वेत महिला को सिटी बजाने को लेकर श्वेत लोगों के समूह ने हत्या कर दी थी।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 Mar 2022 11:52:17 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के एडीजी (कानून व्यवस्था) को हटाया</title>
                                    <description><![CDATA[कोलकाता (एजेंसी)। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) जावेद शमीम को तत्काल प्रभाव से उनके पद से हटा दिया है। राज्य में 294 विधानसभा सीटों के लिए 27 मार्च से आठ चरणों में चुनावों की घोषणा के एक ही दिन बाद यह तबादला किया गया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/election-commission-removed-adg-law-and-order-of-west-bengal/article-22074"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/know-election-commission-guidelines.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कोलकाता (एजेंसी)।</strong> चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) जावेद शमीम को तत्काल प्रभाव से उनके पद से हटा दिया है। राज्य में 294 विधानसभा सीटों के लिए 27 मार्च से आठ चरणों में चुनावों की घोषणा के एक ही दिन बाद यह तबादला किया गया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और अग्निशमन विभाग के महानिदेशक जगमोहन को शमीम के स्थान पर भेजा गया है और शमीम को उनके पद की जिम्मेदारी दी गई है। शमीम अगले आदेशों तक नागरिक सुरक्षा के महानिदेशक का पद भार भी संभालेंगे। गौरतलब है कि शुक्रवार को चुनाव आयोग ने राज्य के चुनावी कार्यक्रम की घोषणा की थी और शनिवार को शमीम को उनके पद से हटा दिया। शमीम को यह जिम्मेदारी आईपीएस अधिकारी ज्ञानमंत सिंह के स्थान पर छह फरवरी को दी गई थी।</p>
<p> </p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Feb 2021 15:57:28 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>कानून व्यवस्था की धार्मिक व्याख्या गलत</title>
                                    <description><![CDATA[दुखदायी घटनाओं पर राजनीति करने की बजाय पीड़ितों का दु:ख बांटना इन्सानियत व दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रयास करना ही कानून का राज है। राजनीतिक हितों की होड़ में राजनीति से इन्सानियत खत्म नहीं होनी चाहिए। इन्सानियत को सलामत रखने से ही राजनीति का अस्तित्व है। बयानबाजी से अखबारों की सुर्खियां तो हासिल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/religious-interpretation-of-law-and-order-is-wrong/article-21753"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/arvind-kejriwal.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><em><strong>दुखदायी घटनाओं पर राजनीति करने की बजाय पीड़ितों का दु:ख बांटना इन्सानियत व दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रयास करना ही कानून का राज है। राजनीतिक हितों की होड़ में राजनीति से इन्सानियत खत्म नहीं होनी चाहिए। इन्सानियत को सलामत रखने से ही राजनीति का अस्तित्व है। बयानबाजी से अखबारों की सुर्खियां तो हासिल हो सकती हैं।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने एक दिल्ली वासी की हत्या को लेकर बहुत ही अजीबो गरीब बयान दिया है। उन्होंने केन्द्रीय गृहमंत्री का इस्तीफा मांगते तर्क दिया है भाजपा के राज में हिन्दू भी सुरक्षित नहीं है। नि:संदेह एक भी व्यक्ति की हत्या होना पुलिस प्रबंध की बड़ी खामी है लेकिन मृतक के धर्म का हवाला देकर बयानबाजी करना अपने आप में एक नई गलती करना है। कानून के सामने पीड़ित का कोई धर्म नहीं होता वह सिर्फ और सिर्फ देश का नागरिक होता है। कानून लागू करने वाले मंत्री या अधिकारी की जिम्मेवारी किसी धर्म विशेष के लोगों की सुरक्षा यकीनी बनाना नहीं होता। बल्कि हर नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेवारी होती है। इसमें धर्म-जात का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">मृृतक के धर्म का हवाला अगर कोई अनाड़ी या सीनीयर नेता दे तो बात समझ में आती है लेकिन मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर बैठा नेता जब ऐसे बयान जारी करता है तो पद की गरिमा पर सवाल उठना स्वभाविक है। दरअसल यह राजनीति ही है, जिसने जनता को हिन्दू, मुस्लमान, सिख व ईसाई बनाकर पेश किया है व अलग-अलग धर्मों दरमियान दीवारें खड़ी करने का पाप भी राजनेताओं के सिर ही जाता है। इस संकीर्ण सोच वाली राजनीति के कारण ही देश को दंगों का दंश झेलना पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">खासकर दिल्ली तो कई बार लहु-लुहान हो चुकी है। बीते समय में घटित हुई घटनाओं के मद्देनजर राजनेताओं को संयम व जिम्मेवारी के साथ बयानबाजी करने की आवश्यकता है। पीड़ितों के आंसू पोंछते वक्त उनका धर्म-जात न देखा जाए। राजनीति इतनी नीचे न जाए कि धर्म-जात की व्याख्या ही राजनीति बन जाए। दुखदायी घटनाओं पर राजनीति करने की बजाय पीड़ितों का दु:ख बांटना इन्सानियत व दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रयास करना ही कानून का राज है। राजनीतिक हितों की होड़ में राजनीति से इन्सानियत खत्म नहीं होनी चाहिए। इन्सानियत को सलामत रखने से ही राजनीति का अस्तित्व है। बयानबाजी से अखबारों की सुर्खियां तो हासिल हो सकती हैं लेकिन राजनीति सड़ जाती है। शवों में से धार्मिक मुद्दे नहीं ढूंढें जाने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Feb 2021 10:57:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>व्हाट्सएप, फेसबुक या ट्विटर, सबको देश के कानूनों को मानना होगा: सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के दुरूपयोग से संबंधित मामलों पर बेहद सख्त रूख अपनाते हुए सरकार ने वीरवार को साफ शब्दों में कहा कि इन कंपनियों को दोहरे मापदंड छोड़कर देश के संविधान और कानूनों को पूरी तरह से मानना होगा वरना तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। केन्द्रीय संचार, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/whatsapp-facebook-or-twitter-everyone-has-to-obey-the-laws-of-the-country-government/article-21671"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/601-cases-of-fake-news-spread-on-social-media-during-lockdown-in-maharashtra.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के दुरूपयोग से संबंधित मामलों पर बेहद सख्त रूख अपनाते हुए सरकार ने वीरवार को साफ शब्दों में कहा कि इन कंपनियों को दोहरे मापदंड छोड़कर देश के संविधान और कानूनों को पूरी तरह से मानना होगा वरना तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। केन्द्रीय संचार, इलेक्ट्रानिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गुरूवार को राज्यसभा में पूरक प्रश्नों का जवाब देते हुए कहा कि सरकार सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करती है और यह भी मानती है कि इनसे लोगों का सशक्तिकरण होता है लेकिन यदि इनका दुरूपयोग कर झूठी खबर फैलायी जाती है या हिंसा भड़कायी जाती है या चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है तो सरकार कड़ी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">देश के कानून के हिसाब से करना होगा काम</h4>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि इन प्लेटफार्म को चलाने वाली कंपनियों को निष्पक्ष होकर तथा देश के कानून के हिसाब से काम करना होगा वरना तो इनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यदि ये कंपनी दोहरे मापदंड अपनाती हैं और देश के कानून तथा संविधान को नहीं मानती हैं तो सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई करने में नहीं हिचकिचाएगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ट्विटर के अधिकारियों के सामने मामला उठाया</h4>
<p style="text-align:justify;">प्रसाद ने इस बात की पुष्टि की कि सरकार ने हाल ही में कुछ पोस्ट को लेकर विवाद पैदा होने के संबंध में ट्विटर के अधिकारियों के सामने मामला उठाया है और इस बारे में बातचीत की जा रही है। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उनका मंत्रालय तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मिलकर इन प्लेटफार्म से संबंधित दिशा निर्देशों की समीक्षा कर रहे हैं और जल्द ही सभी कमियों को दूर कर लिया जाएगा।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Feb 2021 13:43:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमन कानून कायम रखना जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[गणतंत्र दिवस का दिन प्रत्येक देशभक्त भारतीय के जीवन में बहुत गौरवशाली दिन होता है, लेकिन किसानों की ट्रैक्टर परेड़ की आड़ में कुछ उपद्रवियों ने नियम-कायदे-कानूनों को ठेंगा दिखाकर जमकर हुडदंग मचाया, संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग करके देश की छवि को विश्व में खराब करने का दुस्साहस किया।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/it-is-necessary-to-maintain-the-peace-law/article-21355"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-01/police-1.jpg" alt=""></a><br /><p><span style="color:#0000ff;">लाल किले की घटना के बाद राजनीति भी गर्मा गई है। दो दर्जन के करीब राजनीतिक पार्टियां किसानों के समर्थन में आ गई हैं। धड़ाधड़ ब्यानबाजी हो रही है, यहां राजनीतिक पार्टियों को ब्यानबाजी करने से बच कर अमन शान्ति कायम करने में सहयोग करना चाहिए।</span></p>
<p style="text-align:justify;">गणतंत्र दिवस का दिन प्रत्येक देशभक्त भारतीय के जीवन में बहुत गौरवशाली दिन होता है, लेकिन किसानों की ट्रैक्टर परेड़ की आड़ में कुछ उपद्रवियों ने नियम-कायदे-कानूनों को ठेंगा दिखाकर जमकर हुडदंग मचाया, संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग करके देश की छवि को विश्व में खराब करने का दुस्साहस किया। किसानों के ट्रैक्टर मार्च दौरान कुछ लोगों ने लाल किले पर कोई और झंडा लहरा दिया। बड़ी संख्या में किसान संगठनों ने इस घटना की निंदा की और दो किसान संगठनों व पंजाब के दो चर्चित चेहरों का बायकाट कर दिया। इसके बाद गाजीपुर व सिंघु बार्डर पर घटी हिंसक घटनाएं भी चिंताजनक हैं।  पुलिस व किसानों के बीच टकराव की घटनाओं के साथ अमन-कानून को खतरा पैदा हो सकता है। यहां केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार और किसान संगठनों को मिलकर अमन कानून कायम करने के लिए कदम उठाने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">कई घटनाओं में पुलिस के अलावा अन्य लोग भी जो साधारण कपड़ों में हैं किसानों के साथ उलझते देखे गए हैं। कानून के अनुसार कार्यवाही जरूरी है लेकिन किसी को भी कानून हाथ में नहीं लेने दिया जाना चाहिए। पुलिस ने अपने नियमों के अनुसार कार्रवाई कर अमन-कानून कायम रखे, जो लोग किसानों के साथ उलझ रहे हैं उनके खिलाफ कार्रवाई भी जरूरी है। समाज में हिंसा नहीं फैलनी चाहिए और साथ ही इसे किसी भी प्रकार की धार्मिक रंगत देने से बचाया जाना चाहिए। पिछले दो महीनों से किसानों का धरना शांतिमय तरीके से चल रहा है, फिर हिंसा की घटनाएं कैसे घट गर्इं? इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लाल किले की घटना के बाद राजनीति भी गर्मा गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दो दर्जन के करीब राजनीतिक पार्टियां किसानों के समर्थन में आ गई हैं। धड़ाधड़ ब्यानबाजी हो रही है, यहां राजनीतिक पार्टियों को ब्यानबाजी करने से बच कर अमन शान्ति कायम करने में सहयोग करना चाहिए। किसानों के समर्थक या किसान विरोधी लोगों को उकसाने से दूर रहना होगा। धरनार्थी हो या पुलिस कर्मचारी या आम नागरिक किसी को भी नुक्सान नहीं पहुंचना चाहिए। केंद्र ने कृषि कानून पास किए हैं और किसान इनका विरोध कर रहे हैं, लोकतंत्र में विरोध करने का प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है लेकिन इस दौरान कानून व्यवस्था बिगड़ने की समस्या के प्रति सभी को सावधान रहना होगा और कानून का सम्मान आवश्यक है। किसी भी समस्या का समाधान बातचीत से संभव है और इसकी आशा नहीं छोड़नी चाहिए।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/it-is-necessary-to-maintain-the-peace-law/article-21355</link>
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                <pubDate>Sat, 30 Jan 2021 09:54:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कानून के सिद्धांतों को समझने का समय</title>
                                    <description><![CDATA[केन्द्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन पूरे जोरों पर है। इधर सरकार की ओर से किसानों के साथ तीसरे दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही है व आज फिर बातचीत होनी है। किसानों का ऐलान स्पष्ट है कि कानून रद्द होने तक वे धरनों से नहीं हटेंगे। अब गेंद केन्द्र सरकार के पाले में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/time-to-understand-the-principles-of-law/article-20297"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/farmers1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केन्द्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन पूरे जोरों पर है। इधर सरकार की ओर से किसानों के साथ तीसरे दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही है व आज फिर बातचीत होनी है। किसानों का ऐलान स्पष्ट है कि कानून रद्द होने तक वे धरनों से नहीं हटेंगे। अब गेंद केन्द्र सरकार के पाले में है। देश की निगाहें सरकार की तरफ है कि सरकार कानून रद्द करने की मांग मानती है या नहीं। दरअसल अब कानून के सिद्धांतों को समझने व सिद्धांतों की रोशनी में ठोस निर्णय लेने का समय है। कानून शास्त्र में यह सिद्धांत सर्व व्यापक व सर्व प्रमाणित है कि कानून वही है, जिसे लागू किया जा सकता है, जो कानून लागू नहीं किया जा सकता उसके लिए नागरिकों पर जोर जबरदस्ती करना सही है या नहीं, यह सरकार को देखना होगा। लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली के दो बड़े आधार लोक सहमति व लोकहित है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब आबादी का ऐसा बड़ा हिस्सा किसी कानून के खिलाफ हो तो कानून की महत्ता कमजोर पड़ने लगती है। कानून का दूसरा सिद्धांत व्यवहारिकता है। अतीत में बने कानून जब वर्तमान व भविष्य के लिए गैरजरूरी व अप्रासंगिक हो जाएं तो उनका केवल कागजी अस्तित्व ही रह जाता है। एनडीए सरकार अपने पिछले कार्यकाल में ऐसे काफी कानून खत्म कर चुकी है, जो आऊटडेटड हैं। जिन कानूनों की व्यवहारिकता उसके लागू करने के शुरूआती दौर में ही सवालों के घेरे में आ जाए, उसे कायम रखने की भी कोई वजह नहीं रह जाती। कृषि कानूनों के मामले में केन्द्र व किसानों के अपने-अपने तर्क व दावे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">केन्द्र का दावा है कि आंदोलन केवल पंजाब व हरियाणा के ही किसान कर रहे हैं व इन किसानों को भी विपक्ष की राजनीतिक पार्टियां भड़का रही हैं। वहीं दूसरी तरफ किसान संगठन इसे पूरे देश का आंदोलन होने का दावा करते हैं। तथ्य यह है कि कृषि मामले पर विपक्षी पार्टियां बुरी तरह से पिछड़ गई हैं। असल में आंदोलन आगे निकल गया है व पार्टियां पीछे आंदोलन को बढ़ता देख आंदोलन का लाभ उठाने की कोशिशों में जुट गई हैं। यूं भी किसान संगठन विपक्षी पार्टियों के स्वार्थ व इशारों के प्रति पूरी तरह से सचेत हैं व पूरे आंदोलन में किसी भी राजनेता को मंच पर आने नहीं दिया गया। आवश्यकता है मुद्दे को राजनीतिक दाव पेचों से परे हटकर संवैधानिक व व्यवाहारिक नजरिये से हल किया जाए।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Thu, 03 Dec 2020 09:55:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उत्तर प्रदेश सरकार ने लव जेहाद कानून का प्रस्ताव विधि विभाग को भेजा</title>
                                    <description><![CDATA[लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लव जेहाद को लेकर सख्त कानून बनाने की वकालत कर चुके हैं और इसी क्रम में सरकार ने न्याय ओर विधि वभाग को इसका प्रस्ताव भेजा है । आधिकरिक सूत्रों ने आज यहां कहा कि राज्य के गृह विभाग ने न्याय और विधि विभाग को प्रस्ताव भेज दिया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/uttar-pradesh-government-sent-proposal-of-love-jihad-law-to-law-department/article-19996"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/hapurs-artistry-sparkles-in-the-country-yogi1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ।</strong> उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लव जेहाद को लेकर सख्त कानून बनाने की वकालत कर चुके हैं और इसी क्रम में सरकार ने न्याय ओर विधि वभाग को इसका प्रस्ताव भेजा है । आधिकरिक सूत्रों ने आज यहां कहा कि राज्य के गृह विभाग ने न्याय और विधि विभाग को प्रस्ताव भेज दिया है जिसकी समीक्षा की जा रही है । इस कानून का मकसद लोभ, लालच, दबाव, धमकी या शादी का झांसा देकर शादी की घटनाओं को रोकना है। इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले पर सहमति जताई थी जिसमें कहा गया था कि महज शादी करने के लिए किया गया धर्म परिवर्तन अवैध होगा। प्रदेश सरकार इस बाबत सख्त प्रावधानों वाला कानून लाएगी और फिर ऐसी हरकत करने वालों का ‘राम नाम सत्य’ ही होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर आल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अम्बर ने लव जिहाद कानून बनाये जाने वाले कानून का सख्त विरोध किया है । उन्होंने लव जिहाद कानून को संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ बताया। उन्होंने जारी बयान में कहा कि राजनीति की मर्यादाओं और भारत के संविधान तथा भारतीय संस्कृति की रक्षा और देश की सुरक्षा हम सब नागरिकों और सरकारों का कर्तव्य है। लव जिहाद कानून बनाकर सरकार क्या साबित करना चाहती है? किसी धर्म के नाम पर लव जिहाद कानून लाना संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ होने के साथ देश की साझी संस्कृति पर भी एक बड़ा हमला है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Nov 2020 13:21:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजस्थान में कानून नाम की कोई व्यवस्था नहीं-पूनियां</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर। राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष डा सतीश पूनियां ने अलवर जिले में सेल्समैन को जलाकर हत्या कर देने के मामले की कड़ी निंदा करते हुए राज्य सरकार पर कानून व्यवस्था बनाये रखने में पूरी तरह विफल रहने का आरोप लगाया है। डा पूनियां ने आज सोशल मीडिया के जरिए कहा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/there-is-no-law-called-law-in-rajasthan/article-19502"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/bjp2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर।</strong> राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष डा सतीश पूनियां ने अलवर जिले में सेल्समैन को जलाकर हत्या कर देने के मामले की कड़ी निंदा करते हुए राज्य सरकार पर कानून व्यवस्था बनाये रखने में पूरी तरह विफल रहने का आरोप लगाया है। डा पूनियां ने आज सोशल मीडिया के जरिए कहा “करौली जिले में पुजारी को जिंदा जलाने की घटना के बाद अलवर में “सेल्समैन ने सैलरी मांगी तो जिंदा जलाया” पढ़कर ऐसा लगता है कि हम अफ्रीका के सोमालिया जैसे देश में रह रहे हैं,जहां कानून नाम की कोई व्यवस्था नहीं है, क्या गृहमंत्री गहलोत को अपने पद पर रहने का हक है।”</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/dileep-rai-imprisoned-for-three-years-in-coal-scam-case/">यह भी पढ़े – कोयला घाेटाला मामले में दिलीप राय को तीन साल की कैद</a></p>
<p style="text-align:justify;">उधर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) के संयोजक हनुमान बेनीवाल ने इस मामले की कड़ी निंदा करते हुए मुख्यमंत्री से अपराधियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने जाने की मांग की हैं। बेनीवाल ने कहा कि अलवर जिले में हुआ यह कृत्य निंदनीय है। उन्होंने कहा कि अपराध का यह रूप राजस्थान के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि वह राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से अपील करना चाहते है कि अपराधियों के खिलाफ तत्काल सख्त कदम उठाये जाए। उल्लेखनीय है कि अलवर जिले के कुमपुर गांव में शनिवार शाम पांच महीने से तनख्वाह मांग रहे एक शराब ठेके सेल्समैन को जलाकर हत्या कर देने का मामला सामने आया हैं। करीब 20 दिन पहले ही करौली जिले में जमीन विवाद में एक पुजारी की जलाकर हत्या कर दी गई थी।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Oct 2020 13:34:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कानून में संशोधन की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[प्रशांत भूषण मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने एक बार फिर से नई बहस को जन्म दिया है। इस मामले ने न्यायालय की अवमानना कानून में संशोधन के महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाया है। इस कानून के पक्ष और विपक्ष में मजबूत तर्क दिए गए हैं। यदि कोई कानून बनाया जाता है तो न्यायालयों और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-to-amend-the-law/article-18133"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-09/cbse-to-consider-canceling-remaining-examinations-of-10th-12th-supreme-court.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रशांत भूषण मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने एक बार फिर से नई बहस को जन्म दिया है। इस मामले ने न्यायालय की अवमानना कानून में संशोधन के महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाया है। इस कानून के पक्ष और विपक्ष में मजबूत तर्क दिए गए हैं। यदि कोई कानून बनाया जाता है तो न्यायालयों और न्यायधीशों को मामले के गुण-दोषों के आधार पर उस कानून को लागू करना होता है और यह पूर्णत: न्यायधीशों के अधिकार क्षेत्र में है। आम जनता इस बारे में केवल बहस कर सकती है कि क्या ऐसा कानून आज प्रासंगिक हैै। क्या ऐसा कानून आवश्यक है तथा उसकी समीक्षा तथा उसमे संशोधन के बारे में सुझाव दे सकती है। भूषण मामले ने इस बहस को फिर से छेड दिया है। न्यायालय की अवमानना एक ऐसा अपराध है जिसमें न्यायालय और इसके अधिकारियों के प्रति व्यवहार से अवज्ञा की जाती है जिसमें प्राधिकारियों, न्याय और न्यायालय की गरिमा का विरोध या उल्लंघन किया जाता है। विधायी निकायों के विरुद्ध ऐसे व्यवहार को संसद या विधान मंडलों की अवमानना कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अवमानना कानून का मूल न्यायालय की सर्वोच्चता और स्वतंत्रता में निहत है और इसकी शुरूआत प्राचीन राज्यों तथा अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन गं्रथों में मिलती है किंतु इसके वर्तमान स्वरूप में आम धारणा यह है कि इसके अंतर्गत न्याय, न्यायधीश और न्यायिक संस्थाओं की अवमानना की जाती है। इस कानून का उद्देश्य न्यायालय की गरिमा बचाना और जनता की नजरों मे न्यायालय की गरिमा और आदर्श को बनाए रखना है। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया, न्यायपालिका के प्राधिकार तथा न्यायालय की प्रतिष्ठा बनाए रखना भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायालय कानून का शासन बनाए रखने के अंतिम प्राधिकारी हैं। इसलिए इस संस्था तथा उससे जुडेÞ अधिकारियों को उचित सम्मान दिया जाना चाहिए। अवमानना में न्यायधीशों के विरुद्ध टिप्पणियां और आरोप भी शामिल हैं। न्यायिक प्रणाली के लिए न्यायधीशों में जनता का विश्वास बहुत महतवपूर्ण है। अमरीका में न्यायमूर्ति मार्शले ने अपनी इस टिप्पणी में विस्तार से कहा है कि न्यायपालिका की शक्ति न तो मामलों का निर्णय करने में है, न ही दंड देने में, न ही सजा सुनाने में अपितु आम जनता के विश्वास और आस्था में है। अवमानना के मामलों में इस आस्था और विश्वास को ही निशाना बनाया जाता है। आम जनता को कानून और न्याय का ज्ञान न हो किंतु वे व्यक्तिगत तथा अपमानजनक टिप्पणियों, घृणास्पद भाषणों, भ्रष्टाचार के आरोपों और अन्य आरोपों से भ्रमित होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज जन संचार तक लागों की पहुंच बढ जाने के कारण यह क्षण भर में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है और मानव प्रवृति के अनुसार वह आक्रामक टिप्पणियों में प्रशंसा से अधिक आनंद लेता है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ सीमा लगाना आवश्यक है ताकि मुद्दे, प्रक्रिया और निर्णय न कि अस्पष्ट आरोप, विख्यात व्यक्तियों, और संस्थाओं के विरुद्ध प्रचालित किए जएं। न्यायालय की अवमानना आपराधिक मानहानि से भिन्न है। आपराधिक मानहानि का मुकदमा पीडित व्यक्ति आरोपी के विरुद्ध दर्ज करा सकता है तथा न्यायालय की अवमानना उच्चतम नयायालय या किसी उच्च न्यायालय द्वारा स्वत: शुरू किया जा सकता है या एडवोकेट जनरल या विधि अधिकारी या उच्च न्यायालय को किसी अधीनस्थ न्यायालय द्वारा भेजे गए मामले के आधार पर उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय द्वारा स्वत: शुरू किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अवमानना कानून की उत्पत्ति स्वयं संविधान से हुई है। भारत में न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971 है जिसमें तीन प्रकार की अवमाननओं को मान्यता दी गयी है। सिविल अवमानना, न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री निर्देश या आदेश की अवज्ञा है। आपराधिक अवमानना किसी न्यायलय को बदनाम करने या उसके अधिकारों को कम करने के लिए किसी सामग्री को प्रकाशित करना या न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना या किस अन्य तरह से न्याय के प्रशासन में बाधा डालना है। यदि किसी प्रकाशन में न्यायालय को बदनाम किया जाता है या न्यायिक प्रकिया में हस्तक्षेप या बाधा डाली जाती है तो उसे भी न्यायालय की अवमानना माना जा सकता है। यह अपराध न्यायिक प्राधिकारियों का अनादर या न्यायिक आदेशों की अवज्ञा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में न्यायिक की अवमानना अधिनियम सबसे पहले अंगे्रजी हुकूमत के दौरान 1926 में पारित किया गया था। इसमें 1937 में संशोधन किया गया। स्वतंत्रता के बाद पहला अवमानना कानून 1952 में पारित किया गया तथा विद्यमान अधिनियम 1971 में बनाया गया तथा इसमें 2006 में संशोधन किया गया जिसमें सच्चाई को एक वैध बचाव माना गया है जबकि वह लोक हित में कहा गया हो। 1971 के अधिनियम की प्रस्तावना में स्पष्ट किया गया है कि इस अधिनियम का उद्देश्य न्यायधीशों की व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा करना नहीं अपितु न्याय के प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया की रक्षा करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्याय देने का हमेशा एक पवित्र जिम्मेदारी के रूप में सम्मान किया जाना चाहिए। अनेक देशों में न्यायालय की अवमानना को अब एक दंडनीय अपराध नहीं माना जाता है। मौनवाद से न्यायालय सुदृढ नहीं बन सकते हैं, यह बात 1936 में ब्रिटेन लार्ड एटकिन ने कही थी। ब्रिटेन में न्यायालय की अवमानना कानून के प्रयोग न होने के कारण व्यावहारिक रूप से यह यहां रद्द कर दिया गया है। किंत पब्लिक आॅर्डर एक्ट, 1986, कम्युनिकेशन एक्ट, 2003 आदि के अंतर्गत न्यायालयों को बदनाम करना आज भी वहां दंडनीय अपराध है। आस्टेÑलिया में एक न्यायधीश ने टिप्पणी की थी कि जब तक बचाव पक्ष आलोचना के अधिकार का वास्तविक प्रयोग कर रहा है और जब तक वह किसी दुर्भावना से कार्य नहीं कर रहा है वह इस कानून से बच सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अवमानना के मामलों में निर्णय करने में बचाव पक्ष के इरादे महत्वपूर्ण बन जाते हैं। अमरीका में न्यायधीशों या कानूनी प्रक्रिया के विरुद्ध टिप्पणी करने को न्यायालय की अवमानना नहीं माना जाता है। अमरीका के संविधान में पहले संशोधन द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनेक प्रतिबंधों को हटाया गया है क्योंकि सिद्धान्तत: वहां इस बात को स्वीकार किया गया कि जनता से जुडे मुद्दों पर बहस स्पष्ट और खुली होनी चाहिए। न्यायालय की अवमानना अधिनियम में संशोधन के बारे में विधि आयोग की 2018 की 274वीं रिपोर्ट में संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख किया गया है और यह घोषणा की गयी कि इस कानून में किसी भी संशोधन से उच्चतम नयायलय की अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति प्रभावित नहंी होंगी क्योंकि ये शक्तियां साविधिक प्रावधानों से स्वतंत्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा निर्भीक न्याय के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है और इसीलिए न्यायालय की अवमानना को एक अपराध माना गया है और इसीलिए अवमानना के विरुद्ध कानून बनाया गया है। बचाव पक्ष द्वारा दिए गए संदेशों की संवीक्षा और इसके संभावित प्रभाव भौतिक अभिव्यक्ति, शारीरिक हावभाव, संदेश देने की शैली और सामाजिक परिस्थितियां अवमानना का निर्णय करने में महतवपूर्ण बन जाती है। यह वास्तव में न्यायालय के लिए एक कठिन कार्य है कि वह न्यायिक प्रणाली में सुधार के लिए रचनात्मक टिपपणियों और विध्वंस्वात्मक आलोचना के बीच अंतर करे। विध्वंस्वात्मक टिप्पणियों का उद््देश्य न्यायिक प्रणाली को कमजोर करना तथा न्यायिक प्रशासन को बदनाम करना होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल दिया जाता है इसलिए मानहानि और न्यायालय की अवमानना जैसे अपराधों की गुंजाइश भी बढती जा रही है। इसलिए तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए तथा दुर्भावना से किसी के विरुद्ध की गई टिप्पणियों को संरक्षण नहंी दिया जाना चाहिए। शब्दों का संदर्भ में अर्थ और प्रयोजन होता है। अत: स्वतंत्रता की रक्षा तथा घोटालों को रोकने के लिए न्यायालय की अवमानना कानून की समीक्षा किए जाने की आवष्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">                                                                                                              <strong>-डॉ. एस सरस्वती</strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2020 09:50:23 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>उप्र में दम तोड़ रही है कानून व्यवस्था: मायावती</title>
                                    <description><![CDATA[लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी(बसपा) अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में अपराध-नियंत्रण व कानून-व्यवस्था के मामले में पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी(सपा) और भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) की सरकार में भला फिर अब क्या अन्तर रह गया है। उन्होंने कहा कि उत्‍तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था दम तोड़ रही है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/law-and-order-is-dying-in-up-mayawati/article-17544"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/mayawati.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ।</strong> बहुजन समाज पार्टी(बसपा) अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में अपराध-नियंत्रण व कानून-व्यवस्था के मामले में पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी(सपा) और भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) की सरकार में भला फिर अब क्या अन्तर रह गया है। उन्होंने कहा कि उत्‍तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था दम तोड़ रही है। बुधवार को अलीगढ़ में स्थानीय भाजपा विधायक और पुलिस द्वारा एक-दूसरे पर लगाया गया था। आरोप और मारपीट अति-गंभीर और काफी चिन्ताजनक है। उन्‍होंने इस प्रकरण की न्यायोचित जांच कराकर जो भी दोषी हो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।</p>
<p style="text-align:justify;">मायावती ने गुरूवार को ट्वीटकर कहा “ यूपी में अब कानून-व्यवस्था दम तोड़ रही है। कल अलीगढ़ में स्थानीय भाजपा विधायक व पुलिस द्वारा एक-दूसरे पर लगाया गया आरोप व मारपीट अति-गंभीर व काफी चिन्ताजनक। इस प्रकरण की न्यायोचित जाँच होनी चाहिए व जो भी दोषी हैं उनके विरूद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, बीएसपी की यह माँग है।” उन्होंने कहा “साथ ही, यूपी में इस प्रकार की लगातार हो रही जंगलराज जैसी घटनाओं से यह स्पष्ट है कि खासकर अपराध-नियंत्रण व कानून-व्यवस्था के मामले में सपा व बीजेपी की सरकार में भला फिर क्या अन्तर रह गया है? सरकार इसपर समुचित ध्यान दे, बीएसपी की जनहित में यही सलाह। ” बसपा अध्यक्ष ने कहा कि सुविधाओं के अभाव में चिकित्सक जान जोखिम में डालकर कोरोना पीड़ितों की सेवा कर रहे है। चिकित्सकों पर सरकारी दबाव से स्थिति बिगड़ रही है।</p>
<p> </p>
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                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Aug 2020 11:32:03 +0530</pubDate>
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