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                <title>Agricultural Crisis - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Agricultural Crisis RSS Feed</description>
                
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                <title>पंजाब सरकार के कृषि बिल बनाम कृषि संकट</title>
                                    <description><![CDATA[पंजाब सरकार ने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव लाकर तीनों बिल विधानसभा में पेश किए। पंजाब सरकार के इन बिलों का सबसे बड़ा फैसला गेहूँ व धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी) पर फसल की खरीद का आधार कानूनी बनाना है। एमएसपी से कम रेट पर खरीद करने वालों को तीन वर्ष की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/punjab-governments-agricultural-bill-vs-agricultural-crisis/article-19371"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/punjab-governments-agricultural-bill-vs.-agricultural-crisis.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">पंजाब सरकार ने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव लाकर तीनों बिल विधानसभा में पेश किए। पंजाब सरकार के इन बिलों का सबसे बड़ा फैसला गेहूँ व धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी) पर फसल की खरीद का आधार कानूनी बनाना है। एमएसपी से कम रेट पर खरीद करने वालों को तीन वर्ष की सजा का प्रावधान किया गया है। देश के इतिहास में पंजाब पहला राज्य बन गया है जहां खरीद का कानूनी आधार होगा। कृषि की खस्ता हालत व बढ़ते कृषि लागत खर्चों के संबंध में फसलों की उचित रेट पर खरीद आवश्यक है। केंद्र सरकार भी बार-बार यह मौखिक तौर पर घोषणा कर चुकी है कि एमएसपी पर खरीद में कोई समस्या नहीं आएगी। किसी कानून के नफे-नुक्सान का पता कुछ समय बाद या उसकी प्रासंगिकता से ही सामने आता है, जिसका फिलहाल इंतजार करना होगा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">कृषि संबंधी पंजाब सरकार के नए तीन कानूनों की उपयोगिकता व व्यवहारिकता पर मंथन व तथ्यों पर विचार किया जाना बाकी है। यह मुद्दा भी अहम है कि गेहूँ-धान के चक्कर से निकलने के लिए कृषि वैज्ञानिकों व किसानों द्वारा दूसरी हरी क्रांति की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। क्या पंजाब सरकार के नए कानूनों से उस क्रांति को लाने के प्रयास कमजोर तो नहीं पड़ेंगे? गेहूँ-धान के जाल में बुरी तरह फंसा किसान आत्महत्याएं कर रहा है। जिस पारंपरिक खेती को किसानों के लिए मजबूरी माना जाता रहा है, क्या उसे बरकरार रखकर कृषि संकट का समाधान निकलेगा? इज्रराइल की आधुनिक तकनीक वाली कृषि का सपना साकार करने के लिए क्या वर्तमान राजनीतिक प्रभाव वाले सरकारी ढांचें से कोई सही दिशा मिल सकेगी? यह मामला अभी लंबित है। क्या एमएसपी के साथ कृषि संकट का समाधान निकल सकेगा? क्योंकि समय-समय पर किसानों का तर्क रहा है कि एमएसपी लागत खर्चों के मुताबिक कम होने के कारण कृषि की हालत खस्ता हो रही है। पंजाब सरकार के तीनों बिल किसानों के हित में हैं लेकिन देश व अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अब इसके परिणाम देखे जाने हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">फिलहाल मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह केंद्र सरकार के खिलाफ एक बार फिर बड़े कदम उठाने वाले मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं। 2004 में पड़ोसी राज्यों के साथ नदियों के पानी के समझौते रद्द करने का कानून पास करने पर भी अमरेन्द्र सिंह पंजाबियों के नायक बन चुके हैं। तीन बिलों का सर्वसम्मति से पास होना उनकी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करता है और कई गैर-भाजपा सरकारों वाले राज्यें में भी ऐसे बिल पास हो सकते हैं। आने वाले दिनों में ये बिल पंजाब के कृषि, व्यापारिक व राजनीतिक क्षेत्र में यह चर्चा का विषय बनेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।</h6>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Oct 2020 21:18:29 +0530</pubDate>
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                <title>बदलाव की मांग कर रहा कृषि संकट</title>
                                    <description><![CDATA[आज देश में अनाज का भंडार इतना बढ़ गया कि संभल ही नहीं रहा है। कैग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2011 से 2016 तक 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का अनाज बर्बाद हो गया। हर साल लगभग 100 करोड़ से ज्यादा का अनाज खराब हुआ। अनाज की बहुतायत उपलब्धि बनने की बजाए समस्या बनती […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/seeking-of-agricultural-crisis-change/article-2933"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/farmers-3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज देश में अनाज का भंडार इतना बढ़ गया कि संभल ही नहीं रहा है। कैग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2011 से 2016 तक 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का अनाज बर्बाद हो गया। हर साल लगभग 100 करोड़ से ज्यादा का अनाज खराब हुआ। अनाज की बहुतायत उपलब्धि बनने की बजाए समस्या बनती जा रही है। किसान अनाज के अंबार लगाकर भी खुदकुशियां कर रहा है। अनाज के अधिक उत्पादन के बावजूद किसान की जेब खाली की खाली और कर्जदार है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस संबंध में सरकार, विशेषज्ञ और किसान तीनों को विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। बहुतयात की कभी भी पूछ नहीं होती। अपने पेशे को बदल पाना मुश्किल व जोखिम भरा निर्णय है, लेकिन इसके बिना गुजारा भी नहीं। जब अनाज की पूछ नहीं तो किसान की इज्जत कैसे होगी? किसान को ऐसी परिस्थितियां बनानी होंगी कि सरकार व निजी कंपनियां उनके साथ फसलों की बिजाई संबंधी लिखित करार करें। फिलहाल किसान को अच्छी कीमत के लिए खरीददार को ताकना पड़ता है। कपड़े की दुकान पर मूल्य दुकानदार ही बताता है और ग्राहक को खरीदना होता है। ग्राहक अपनी मर्जी का मूल्य नहीं देता। किसान के लिए ऐसा नहीं। यह तभी संभव होगा यदि उत्पादन सीमित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर लाखों टन अनाज खराब हो जाने के बावजूद कभी कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हो सकी। कारण यही है कि देश में अनाज की कमी नहीं। यदि अनाज खराब होने से भुखमरी का संकट पैदा होगा तो कार्रवाई का स्तर भी बदल जाएगा।किसान नई फसलों की तरफ ध्यान दें और अपनी फसल का पूरा मूल्य प्राप्त करें। किसानों को आत्म चिंतन करने की भी जरूरत है। जब उत्पादन कम था, तब किसान खुशहाल था। उत्पादन बढ़ा तो किसान परेशान हो गया। किसान का संकट पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि उपभोक्ता संस्कृति की भी देन है। पश्चिम से चली दिखावे की रुचि ने सभी बड़े-छोटों को सोच के राजा-महाराजा बना दिया। यह तो पैसों की कमी है, अन्यथा सोच यही बन गई है कि हर कोई लड़के-लड़की का विवाह करने के लिए करोड़ों खर्चने के लिए तैयार है। इससे किसान भी नहीं बच सका।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के एक ही राज्य में यदि हर साल 100 करोड़ से ज्यादा का अनाज मिट्टी में मिल जाए तो किसान खुशहाल कैसे होंगे? आखिर इतने बड़े स्तर पर फसल खेतों में पैदा होकर मंडी में पहुंचती है उसकी अदायगी भी होती है फिर भी किसान कर्ज में डूबा है। कर्ज केवल कृषि में घाटे का नहीं बल्कि अन्य कारणों का भी है। सरकारें हर बार यह कह देती हैं कि सारा कर्ज नहीं केवल कृषि के लिए लिया कर्ज माफ करेंगे। यह मामला किसी एक पक्ष की बयानबाजी से हल होने वाला नहीं बल्कि सभी पक्षों द्वारा किसान पूरी ईमानदारी, सच्चाई और वचनबद्धता से हल करने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Sun, 06 Aug 2017 05:05:00 +0530</pubDate>
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