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                <title>Direction - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>गांव मिड्ढा का स्कूल प्राईमरी शिक्षा को दे रहा नयी दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[सम्राट क्लास रूम ने बच्चों के सीखने का स्तर किया ऊंचा मलोट(मलोट)। जिला श्री मुक्तसर साहब के गांव मिड्डा का सरकारी प्राइमरी स्कूल राज्य के बदल रहे शिक्षा के चेहरे की झलक पेश करता है। स्कूल के मेहनती स्टाफ ने इसे ऐसे विद्या मंदिर के तौर पर विकसित किया है जहां बच्चे अपने सुनेहरे भविष्य […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/village-middas-school-giving-new-direction-to-primary-education/article-4927"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/midda-school-news.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">सम्राट क्लास रूम ने बच्चों के सीखने का स्तर किया ऊंचा</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>मलोट(मलोट)।</strong> जिला श्री मुक्तसर साहब के गांव मिड्डा का सरकारी प्राइमरी स्कूल राज्य के बदल रहे शिक्षा के चेहरे की झलक पेश करता है। स्कूल के मेहनती स्टाफ ने इसे ऐसे विद्या मंदिर के तौर पर विकसित किया है जहां बच्चे अपने सुनेहरे भविष्य की मजबूत नींव रख सकते हैं। स्कूल प्रमुख रेनू बाला ने बताया कि स्कूल के स्टाफ ने बच्चों को नई अध्यापन तकनीकें द्वारा पढ़ाने के लिए 50 इंच ऐलईडी खरीद कर स्कूल में लगाई है, जिससे बच्चे किताबें पढ़ने के साथ साथ वीडियो देख कर भी विभिन्न विषयों के कठिन शब्द सहज ही याद कर लेते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्कूल विद्यार्थी प्रिंयका, जसनदीप, नोमलप्रीत, सुखमनी बताते हैं कि इस विधि के साथ उनको गणित, विज्ञान के विषय आसानी के साथ समझ आ जाते हैं। इसी तरह बच्चों को साहित्य के साथ जोड़ने व उनको साकार रूप देने के लिए स्कूल द्वारा हर साल ‘तारों के सितारे’ बाल मैगजीन तैयार की जाती है। 2014 से लगातार यह मैगजीन राज्य स्तर पर अच्छे स्कूल मेग्जीनों में चुनी जाती रही है।</p>
<h1 style="text-align:center;">लाईब्रेरी व बाल मैगजीन से साहित्य के साथ जुड़ रहे बच्चे</h1>
<p style="text-align:justify;">स्कूल प्रमुख रेनू बाला ने बताया कि 125 विद्यार्थियों वाले इस स्कूल में विक्रमजीत, विजय कुमार, रूपाली व रेनू बाला व अन्य अध्यापक बच्चों को किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि जिंदगी के सबक भी सिखा रहे हैं। स्कूल अध्यापक विक्रमजीत ने बताया कि उन्होंने स्कूल को हर पक्ष से ऐसा बनाने का प्रयास किया है कि बच्चों के लिए पढ़ाई बोझ न लगे। वह स्कूल में बनी गणित दीवार का जिक्र करते बताते हैं कि यहां समान रखने के लिए जो सैलफें बनाई हैं वह त्रिभ्भुज, वर्ग, आयत, गोलाकार आदि गणित की आकृतियों में बनाई गई है और यहां गणित के सभी मूलभूत सिद्धांत समझाए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा विद्यार्थी गैवी कुमार राज्य स्तरीय भाषण मुकाबलों के लिए चुना गया था, नोमलप्रीत जोन स्तरीय चित्रकला मुकाबलों में भाग ले चुकी है व राकेश की चयन जवाहर नवोद्या विद्यालय में हुआ है। प्रवेश प्रोजैक्ट के जिला कोआडीनेटर कमलप्रीत सिंह कहते हैं कि ‘पढ़ो पंजाब, पढ़ाओ पंजाब’ की पढ़ाने विधियों और स्कूल के मेहनती स्टाफ ने इस विद्या मंदिर को खास बना दिया है।</p>
<h1 style="text-align:center;">अध्यापकों ने विद्यार्थियों के लिए तैयार की 10 किताबें</h1>
<p style="text-align:justify;">स्कूल में एक अलग किस्म की लाइब्रेरी भी स्कूल अध्यापकों ने बनाई है, जिसके अंतर्गत अखबारों में प्रकाशित होने वाली बाल मन के लिए रोचक, ज्ञानवर्धक व वैज्ञानिक, भौगोलिक जानकारी वाली रचनाआें को खाली अभ्यास कापी में चिपका कर अध्यापक सस्ती परंतु बहुत ही अच्छी जानकारी वाली किताब तैयार करते हैं। इस तरह 10 किताबें इन अध्यापकों ने स्कूल विद्यार्थियों के लिए तैयार की हैं। इसी साल गणतंत्र दिवस स्कूल में मनाकर स्कूल ने एक नयी प्रवृत्ति भी डाली है।</p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Jul 2018 03:43:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>वृद्धों को मिले जीने की नई दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[हमारे देश में अन्तर्राष्ट्रीय दिवसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अगस्त माह में अनेक अन्तर्राष्ट्रीय दिवस आयोजित होते हैं जैसे युवा दिवस, मित्रता दिवस, हिरोशिमा दिवस, स्तनपान दिवस, आदिवासी दिवस, मच्छर दिवस, फोटोग्राफी दिवस, मानवीय दिवस आदि-आदि उनमें एक महत्वपूर्ण दिवस है विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस जो 8 अगस्त को पूरी दुनिया में वृद्धों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">हमारे देश में अन्तर्राष्ट्रीय दिवसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अगस्त माह में अनेक अन्तर्राष्ट्रीय दिवस आयोजित होते हैं जैसे युवा दिवस, मित्रता दिवस, हिरोशिमा दिवस, स्तनपान दिवस, आदिवासी दिवस, मच्छर दिवस, फोटोग्राफी दिवस, मानवीय दिवस आदि-आदि उनमें एक महत्वपूर्ण दिवस है विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस जो 8 अगस्त को पूरी दुनिया में वृद्धों को समर्पित किया गया है। यह दिवस वरिष्ठ नागरिकों के उन्नत, स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन के लिये आयोजित होता है। इस दिवस को आयोजित करने की आवश्यकता इसलिये पड़ी कि आज के वरिष्ठ नागरिक जो दुनियाभर में उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं, उनको उचित सम्मान एवं उन्नत जीवन जीने की दिशाएं मिलें।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान दौर की एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि इस समय की बुजुर्ग पीढ़ी घोर उपेक्षा और अवमानना की शिकार है। यह पीढ़ी उपेक्षा, भावनात्मक रिक्तता और उदासी को ओढ़े हुए है। इस पीढ़ी के चेहरे पर पड़ी झुर्रियां, कमजोर आंखें, थका तन और उदास मन जिन त्रासद स्थितियों को बयां कर रही है उसके लिए जिम्मेदार है हमारी आधुनिक सोच और स्वार्थपूर्ण जीवन शैली। समूची दुनिया में वरिष्ठ नागरिकों की दयनीय स्थितियां एक चुनौती बन कर खड़ी है, एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय परिप्रेक्ष्य में वरिष्ठ नागरिकों की दशा अधिक चिन्तनीय है। दादा-दादी, नाना-नानी की यह पीढ़ी एक जमाने में भारतीय परंपरा और परिवेश में अतिरिक्त सम्मान की अधिकारी हुआ करती थी और उसकी छत्रछाया में संपूर्ण पारिवारिक परिवेश निश्चिंत और भरापूरा महसूस करता था। न केवल परिवार में बल्कि समाज में भी इस पीढ़ी का रुतबा था, शान थी। आखिर यह शान क्यों लुप्त होती जा रही है? क्यों वृद्ध पीढ़ी उपेक्षित होती जा रही है? क्यों वृद्धों को निरर्थक और अनुपयोगी समझा जा रहा है? वृद्धों की उपेक्षा से परिवार तो कमजोर हो ही रहे हैं लेकिन सबसे ज्यादा नई पीढ़ी प्रभावित हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या हम वृद्ध पीढ़ी को परिवार की मूलधारा में नहीं ला सकते? ऐसे कौन से कारण और हालात हैं जिनके चलते वृद्धजन इतने उपेक्षित होते जा रहे हैं? यह इतनी बड़ी समस्या कि किसी एक अभियान से इसे रास्ता नहीं मिल सकता। इस समस्या का समाधान पाने के लिए जन-जन की चेतना को जागना होगा। इस दृष्टि से विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस की आयोजना की एक महत्वपूर्ण हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जरूरी है कि हम बुजुर्ग पीढ़ी को उसकी उम्र के अंतिम पड़ाव में मानसिक स्वस्थता का माहौल दें, आधि, व्याधि और उपाधियों को भोग चुकने के बाद वे अपना अंतिम समय समाधि के साथ गुजार सकें ऐसी स्थितियों को निर्मित करें। नई पीढ़ी और बुजुर्ग पीढ़ी की संयुक्त जीवनशैली से अनेक तरह के फायदे हैं जिनसे न केवल समाज और राष्ट्र मजबूत होगा बल्कि परिवार भी अपूर्व शांति और उल्लास का अनुभव करेगा। सबसे अधिक नई पीढ़ी अपने बुजुर्ग दादा-दादी या नाना-नानी की छत्रछाया में अपने आपको शक्तिशाली एवं समृद्ध महसूस करेगी। एक अवस्था के पश्चात निश्चित ही व्यक्ति में परिपक्वता और ठोसता आती है। बड़े लोगों के अनुभव से लाभ उठाकर युवा पीढ़ी भी संस्कार समृद्ध बन सकती है और वृद्धजनों के अनुभवों का वैभव और ज्ञान की अपूर्व संपदा उन्हें दुनिया की रफ्तार के साथ कदमताल करने में सहायक हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हावर्ड और वर्लिन के वैज्ञानिकों/मनोचिकित्सकों ने इस दिशा में गहन खोजें की हंै। जर्मन वैज्ञानिकों ने युवाओं और बुजुर्गों के समक्ष कुछ जटिल समस्याएं तथा कुछ सुविधाजनक परिस्थितियां प्रस्तुत कीं और उन्हें हल करने को कहा। देखा गया कि जीवन संबंधी समस्याओं को सुलझाने में युवाओं की अपेक्षा बुजुर्ग लोग अधिक सफल या कुशल साबित हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">अन्य अध्ययनों/विश्लेषणों से भी यह तथ्य सामने आया कि बुजुर्गों के सामने यदि कोई लक्ष्य रख दिया जाए तो वे अपने धीमे सोचने की शक्ति की क्षतिपूर्ति अपने पैने नजरिए एवं बेहतर योजनाओं के द्वारा कर लेते हैं। यह भी एक तथ्य है कि सम्यक दृष्टिकोण, पारदर्शी सोच, परिणामों का आंकलन किसी भी चीज के अच्छे-बुरे पहलुओं को तोलने/परखने की क्षमता-ये गुण वृद्धों में अपेक्षाकृत अच्छी मात्रा में उपलब्ध होते हैं। अत: आॅफिसों, संस्थाओं या घरों में बुजुर्गों को उपेक्षित करने का जो प्रचलन बढ़ रहा है, उस पर गंभीरता से पुनर्विचार की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>यह पीढ़ी उपेक्षा, भावनात्मक रिक्तता और उदासी को ओढ़े हुए है। इस पीढ़ी के चेहरे पर पड़ी झुर्रियां, कमजोर आंखें, थका तन और उदास मन जिन त्रासद स्थितियों को बयां कर रही है उसके लिए जिम्मेदार है हमारी आधुनिक सोच और स्वार्थपूर्ण जीवनशैली।</em></p>
<p style="text-align:justify;">
<em><strong>-ललित गर्ग</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                <pubDate>Tue, 08 Aug 2017 03:45:10 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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